ओडिशा के पावन जाजपुर नगर में वैतरणी नदी के निकट प्रतिष्ठित माँ विरजा शक्तिपीठ सनातन परंपरा के अत्यंत प्राचीन और प्रतिष्ठित शक्ति-तीर्थों में से एक है। इस पवित्र क्षेत्र को विरजा क्षेत्र तथा नाभि गया के नाम से भी जाना जाता है। यहाँ जगज्जननी भगवती अपने दुर्लभ द्विभुजी महिषासुरमर्दिनी स्वरूप में भक्तों को दर्शन देती हैं।
परिचय
माँ विरजा शक्तिपीठ ओडिशा के जाजपुर जिले में स्थित है। प्राचीन ग्रंथों और तीर्थ-परंपरा में जाजपुर को विरजा क्षेत्र के रूप में विशेष महत्त्व प्राप्त है। इसे देवी के प्रमुख शक्तिपीठों में माना जाता है। मंदिर परिसर से जुड़ा नाभि गया क्षेत्र पितृ-श्राद्ध, पिंडदान और तर्पण के लिए भी अत्यंत प्रसिद्ध है।
प्राचीन काल से जाजपुर शक्ति-उपासना का प्रमुख केंद्र रहा है। वैतरणी नदी, विरजा देवी तथा यहाँ के अनेक प्राचीन तीर्थ इस क्षेत्र की धार्मिक महत्ता को और बढ़ाते हैं।
शक्तिपीठ बनने की कथा
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब प्रजापति दक्ष के यज्ञ में माता सती ने अपने प्राणों की आहुति दे दी, तब भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर अत्यंत व्यथित होकर विचरण करने लगे। सृष्टि की व्यवस्था बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को खंडित किया। जिन-जिन पवित्र स्थानों पर देवी के अंग अथवा आभूषण गिरे, वे आगे चलकर शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
सती का अंग/आभूषण
प्रचलित शक्तिपीठ परंपरा के अनुसार, इस क्षेत्र में माता सती की नाभि का निपात माना जाता है। इसी कारण जाजपुर का यह पवित्र क्षेत्र नाभि पीठ और नाभि गया के नाम से प्रसिद्ध हुआ।
उत्कल क्षेत्र से संबंधित प्रसिद्ध शक्तिपीठ श्लोक में कहा गया है—
उत्कले नाभिदेशस्तु विरजाक्षेत्रमुच्यते।
विमला सा महादेवी जगन्नाथस्तु भैरवः॥
देवी का नाम
यहाँ अधिष्ठात्री देवी को माँ विरजा अथवा माँ बिरजा के नाम से पूजा जाता है। ‘विरजा’ शब्द का भाव उस दिव्य शक्ति से है जो रज, मल और सांसारिक विकारों से परे पूर्णतः निर्मल है।
माँ विरजा को दुर्गा और महिषासुरमर्दिनी का स्वरूप माना जाता है। जाजपुर की धार्मिक पहचान इतनी गहराई से देवी विरजा से जुड़ी है कि यह पूरा क्षेत्र ही प्राचीन काल से विरजा क्षेत्र कहलाता रहा है।
भैरव
शक्तिपीठों की विभिन्न ग्रंथीय सूचियों में उत्कल के नाभि पीठ के साथ भगवान जगन्नाथ को भैरव रूप में स्मरण किया गया है। प्रसिद्ध श्लोक में स्पष्ट रूप से— ‘जगन्नाथस्तु भैरवः’ — कहा गया है।
हालाँकि जाजपुर की स्थानीय धार्मिक परंपरा में क्षेत्र के अन्य शिव एवं विष्णु स्वरूपों का भी विशेष महत्त्व है। इसलिए भैरव संबंधी विवरण देते समय जाजपुर की विरजा परंपरा और पुरी की विमला-पुरुषोत्तम परंपरा के बीच पाए जाने वाले मतांतर को ध्यान में रखना आवश्यक है।
विरजा, विमला और उत्कल पीठ का मतांतर
उत्कल के नाभि शक्तिपीठ की पहचान को लेकर विभिन्न ग्रंथों और परंपराओं में मतांतर मिलता है। एक प्रमुख परंपरा जाजपुर स्थित माँ विरजा को उस नाभि पीठ से जोड़ती है जहाँ माता सती की नाभि गिरने की मान्यता है। दूसरी ओर कुछ शक्तिपीठ सूचियाँ पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर परिसर में प्रतिष्ठित माँ विमला को उत्कल अथवा पुरुषोत्तम क्षेत्र की शक्ति मानती हैं और भगवान जगन्नाथ को उनके भैरव के रूप में स्मरण करती हैं।
कुछ पारंपरिक 108 शक्तिपीठ सूचियों में ‘विरजा’ नाम के स्थान पर पुरुषोत्तम पीठ का उल्लेख मिलता है, जिसकी शक्ति विमला कही गई है—
गंगायां मंगला नाम विमला पुरुषोत्तमे।
एक अन्य पाठभेद में यही भाव इस प्रकार मिलता है—
गंगायां मंगला प्रोक्ता विमला पुरुषोत्तमे॥
इसी कारण कुछ परंपराओं में विरजा क्षेत्र और विमला-पुरुषोत्तम क्षेत्र के वर्णन परस्पर संबद्ध दिखाई देते हैं। फिर भी जाजपुर की माँ विरजा और पुरी के श्रीजगन्नाथ मंदिर परिसर की माँ विमला दो अलग-अलग स्थानों पर प्रतिष्ठित स्वतंत्र देवी-मंदिर हैं। शक्तिपीठ संबंधी ग्रंथ-सूचियों और स्थानीय परंपराओं में दोनों की अपनी-अपनी मान्यता है।
धार्मिक महत्व
विरजा क्षेत्र शक्ति साधना के साथ-साथ पितृकर्म और मोक्ष की कामना से किए जाने वाले धार्मिक अनुष्ठानों का भी प्रमुख केंद्र है। यहाँ स्थित नाभि गया में श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान का विशेष महत्त्व माना जाता है।
भारतीय तीर्थ परंपरा में गया क्षेत्र से संबंधित विभिन्न पवित्र स्थलों में जाजपुर का नाभि गया विशेष रूप से प्रसिद्ध है। धार्मिक मान्यता है कि यहाँ श्रद्धापूर्वक पितृकर्म करने से पूर्वजों की तृप्ति और सद्गति की कामना पूर्ण होती है।
ब्रह्मपुराण में विरजा क्षेत्र में पिंडदान तथा देवी विरजा के दर्शन की विशेष महिमा का वर्णन मिलता है।
नाभि गया का महत्व
जाजपुर का नाभि गया क्षेत्र पितृ-श्राद्ध के लिए अत्यंत पवित्र माना जाता है। गया से जुड़ी एक प्राचीन पौराणिक परंपरा के अनुसार गयासुर के शरीर के विभिन्न भाग अलग-अलग पवित्र क्षेत्रों से संबद्ध माने गए, जिनमें जाजपुर को नाभि क्षेत्र की प्रतिष्ठा प्राप्त हुई।
इसी कारण देश के विभिन्न भागों से श्रद्धालु यहाँ अपने पूर्वजों के निमित्त पिंडदान, तर्पण और अन्य श्राद्ध कर्म करने आते हैं।
पूजा/दर्शन
मंदिर में माँ विरजा की अत्यंत दुर्लभ द्विभुजी महिषासुरमर्दिनी प्रतिमा प्रतिष्ठित है। देवी अपने एक हाथ से शस्त्र द्वारा महिषासुर का संहार करती हुई दिखाई देती हैं, जबकि दूसरे हाथ से महिषासुर की पूँछ पकड़े हुए हैं। यह स्वरूप भारतीय देवी प्रतिमाओं में अत्यंत विशिष्ट माना जाता है।
माँ विरजा की प्रतिमा में शक्ति, शांति और मातृत्व का अद्भुत समन्वय दिखाई देता है। भक्त प्रातःकाल से ही देवी के दर्शन, पूजन, पुष्पार्चन और विभिन्न धार्मिक अनुष्ठानों के लिए मंदिर पहुँचते हैं।
प्रमुख पर्व
शारदीय नवरात्रि और दुर्गा पूजा यहाँ के सबसे प्रमुख उत्सवों में हैं। इस अवसर पर माँ विरजा से संबंधित प्रसिद्ध रथयात्रा आयोजित होती है। देवी का प्रतिनिधि स्वरूप सिंहध्वज रथ पर विराजमान होकर नगर भ्रमण करता है।
नवरात्रि के अतिरिक्त चैत्र नवरात्रि तथा अन्य देवी पर्वों पर भी यहाँ बड़ी संख्या में श्रद्धालु पहुँचते हैं। पितृपक्ष के समय नाभि गया में श्राद्ध और तर्पण करने वाले श्रद्धालुओं की संख्या विशेष रूप से बढ़ जाती है।
इतिहास
जाजपुर का विरजा क्षेत्र अत्यंत प्राचीन तीर्थ है। महाभारत के वनपर्व में वैतरणी नदी और विरजा तीर्थ का उल्लेख मिलता है, जिससे इस क्षेत्र की प्राचीनता और धार्मिक प्रतिष्ठा का संकेत मिलता है।
ब्रह्मपुराण में भी विरजा देवी और विरजा क्षेत्र की महिमा का वर्णन मिलता है। वहाँ देवी के दर्शन तथा विरजा क्षेत्र में किए जाने वाले धार्मिक कर्मों को अत्यंत पुण्यदायी बताया गया है।
विरजे विरजा माता ब्रह्माणी संप्रतिष्ठिता।
यस्याः संदर्शनान्मर्त्यः पुनात्यासप्तमं कुलम्॥
परंपरा में यह भी माना जाता है कि ब्रह्मा जी ने इस क्षेत्र में महान यज्ञ किया था और उसी यज्ञ से देवी विरजा के प्राकट्य की कथा जुड़ी हुई है।
जाजपुर प्राचीन ओडिशा का एक महत्त्वपूर्ण राजनीतिक, सांस्कृतिक और धार्मिक केंद्र भी रहा। भौमकर और सोमवंशी शासकों के काल में इस क्षेत्र में शक्ति उपासना को विशेष संरक्षण मिला। वर्तमान मंदिर की स्थापत्य परंपरा को भी सोमवंशी काल से जोड़ा जाता है, जबकि बाद के समय में मंदिर का पुनर्निर्माण और संरक्षण किया गया।
पुराणों और प्राचीन ग्रंथों में विरजा क्षेत्र
विरजा देवी और उनके क्षेत्र का उल्लेख केवल स्थानीय परंपराओं तक सीमित नहीं है। महाभारत, ब्रह्मपुराण तथा विभिन्न तांत्रिक ग्रंथों में विरजा और उत्कल क्षेत्र से संबंधित वर्णन मिलते हैं।
कालिका पुराण की पीठ-परंपरा में प्राचीन औड्र अथवा ओड्र क्षेत्र का उल्लेख मिलता है। ओड्र प्राचीन ओडिशा से संबंधित नाम है और शक्ति साधना की प्राचीन परंपराओं में इस भूभाग का विशेष महत्त्व रहा है।
औड्राख्यं प्रथमं पीठं द्वितीयं जालशैलकम्।
कुब्जिका तंत्र और अन्य तांत्रिक परंपराओं में भी विरजा का उल्लेख मिलता है। इन ग्रंथीय संदर्भों से यह स्पष्ट होता है कि जाजपुर क्षेत्र प्राचीन काल से शक्ति साधना और तीर्थ परंपरा का एक महत्त्वपूर्ण केंद्र रहा है।
वैतरणी और विरजा तीर्थ
जाजपुर की धार्मिक पहचान पवित्र वैतरणी नदी से भी जुड़ी हुई है। महाभारत में वैतरणी के साथ विरजा तीर्थ का उल्लेख मिलता है। पुराणों में भी वैतरणी को पुण्यदायी नदी के रूप में वर्णित किया गया है।
तीर्थ परंपरा में वैतरणी में स्नान, विरजा देवी के दर्शन और पितरों के निमित्त धार्मिक कर्म करने को विशेष फलदायी माना गया है।
कैसे पहुँचें
रेल मार्ग: निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन जाजपुर क्योंझर रोड (Jajpur Keonjhar Road) है। स्टेशन से जाजपुर और माँ विरजा मंदिर के लिए सड़क मार्ग से टैक्सी, ऑटो तथा स्थानीय परिवहन उपलब्ध रहता है।
सड़क मार्ग: जाजपुर सड़क मार्ग से भुवनेश्वर, कटक तथा ओडिशा के अन्य प्रमुख नगरों से जुड़ा हुआ है।
वायु मार्ग: निकटतम प्रमुख हवाई अड्डा बीजू पटनायक अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा, भुवनेश्वर है। भुवनेश्वर से जाजपुर की दूरी लगभग 125 किलोमीटर है।
दर्शन समय
ओडिशा पर्यटन विभाग द्वारा उपलब्ध जानकारी के अनुसार माँ विरजा मंदिर में सामान्य दर्शन का समय लगभग प्रातः 5:30 बजे से रात्रि 9:30 बजे तक है। विशेष पूजा, पर्व और नवरात्रि के अवसर पर दर्शन एवं अनुष्ठानों के समय में परिवर्तन हो सकता है, इसलिए यात्रा से पहले स्थानीय स्तर पर समय की पुष्टि करना उचित है।
विशेष मान्यताएँ
मान्यता है कि माँ विरजा के दर्शन से साधक के अंतःकरण की अशुद्धियाँ दूर होती हैं और उसे आध्यात्मिक निर्मलता प्राप्त होती है। इसी भाव से देवी को ‘विरजा’ अर्थात् रज और विकार से रहित शक्ति कहा जाता है।
नाभि गया में श्रद्धापूर्वक किए गए श्राद्ध, तर्पण और पिंडदान को पितरों की तृप्ति और सद्गति की कामना से विशेष फलदायी माना जाता है। ब्रह्मपुराण में भी विरजा क्षेत्र में पितरों के निमित्त किए जाने वाले पिंडदान की महिमा का उल्लेख मिलता है।
आध्यात्मिक संदेश
माँ विरजा का महिषासुरमर्दिनी स्वरूप साधक को यह प्रेरणा देता है कि मनुष्य को अपने भीतर उपस्थित अहंकार, क्रोध, मोह और अन्य विकारों पर विजय प्राप्त करनी चाहिए। ‘विरजा’ का भाव ही अंतःकरण की निर्मलता और सांसारिक मलिनताओं से ऊपर उठने का संदेश देता है।
नाभि गया की परंपरा हमें अपने पूर्वजों के प्रति कृतज्ञता और अपने पारिवारिक एवं आध्यात्मिक उत्तरदायित्वों का स्मरण कराती है। इस प्रकार विरजा क्षेत्र शक्ति उपासना, आत्मशुद्धि और पितृ-स्मरण—इन तीनों भावों का अद्भुत संगम है।



