दक्षिण भारत की पावन जीवनदायिनी गोदावरी नदी के तट पर स्थित गोदावरी तीर शक्तिपीठ सनातन परंपरा में अत्यंत श्रद्धा और आस्था का केंद्र है।
परिचय
गोदावरी तट शक्तिपीठ 51 शक्तिपीठों में अत्यंत पूजनीय तीर्थ माना जाता है। यह पावन क्षेत्र आंध्र प्रदेश में गोदावरी नदी के तटवर्ती क्षेत्र—विशेष रूप से कुब्बूर (आधुनिक कोव्वूर, पश्चिम गोदावरी) तथा सम्मुख स्थित ऐतिहासिक नगर राजमहेंद्रवरम (राजमुंदरी) के कोटिलिंगेश्वर क्षेत्र से जुड़ा हुआ है।
शक्तिपीठ बनने की कथा
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपने प्राण त्यागने के उपरांत माता सती के पार्थिव शरीर को लेकर भगवान शिव अत्यंत व्यथित भाव से ब्रह्मांड में विचरण कर रहे थे, तब सृष्टि के संतुलन हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी के पार्थिव देह के विभिन्न अंग विभक्त किए। जहाँ-जहाँ ये पावन अंग और आभूषण गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
सती का अंग/आभूषण
मान्यता और तंत्रग्रंथों के अनुसार, गोदावरी के पवित्र तट पर माता सती का वाम गण्ड अर्थात् बायाँ गाल (कपोल) गिरा था। इसी कारण यह तीर्थ वाम कपोल पीठ के नाम से भी जाना जाता है।
देवी का नाम
पीठनिर्णय तंत्र के अनुसार इस शक्तिपीठ की अधिष्ठात्री देवी को विश्वेशी (विश्वेश्वरी अथवा विश्वमातृका) कहा जाता है। कुछ प्रांतीय परंपराओं तथा स्तोत्रों में भगवती को ‘रुक्मिणी’ अथवा ‘राकिणी’ नाम से भी स्मरण किया गया है।
भैरव
गोदावरी तट पीठ के रक्षक भैरव दण्डपाणि हैं। कतिपय सूचियों व ग्रन्थ-भेदों में भैरव स्वरूप को ‘वत्सनाभ’ नाम से भी उल्लिखित किया गया है।
धार्मिक महत्व
गोदावरी नदी को ‘दक्षिण गंगा’ और ‘गौतमी’ के रूप में पूजा जाता है। महर्षि गौतम की तपस्या से अनुग्रहीत इस पावन तट पर शिव और शक्ति का युगल सान्निध्य भक्तों को आत्मिक शांति, पाप-मुक्ति और मोक्ष का फल प्रदान करता है।
पूजा/दर्शन
तीर्थयात्री गोदावरी नदी के पावन जल में स्नान कर देवी विश्वेशी और भगवान दण्डपाणि का स्मरण करते हैं। राजमहेंद्रवरम के कोटिलिंगाला घाट पर स्थित श्री उमा कोटिलिंगेश्वर स्वामी मंदिर तथा कोव्वूर के गोष्पद क्षेत्र में नियमित षोडशोपचार पूजा, चंडी पाठ और रुद्राभिषेक संपन्न होते हैं।
प्रमुख पर्व
यहाँ शारदीय व वासंतिक नवरात्रि, महाशिवरात्रि, कार्तिक पूर्णिमा तथा प्रति बारह वर्ष में आयोजित होने वाला भव्य ‘गोदावरी पुष्करम’ अत्यंत हर्षोल्लास व भक्तिभाव से मनाया जाता है।
इतिहास
ऐतिहासिक दृष्टि से राजमहेंद्रवरम पूर्वी चालुक्य शासकों और वेम रेड्डी वंशजों की राजधानी रहा है। नदी तट के दोनों ओर स्थित कोव्वूर और राजमुंदरी के देवालय सदियों से शक्ति और शैव साधना के प्रमुख केंद्र रहे हैं।
कैसे पहुँचें
यह तीर्थ स्थल रेल, सड़क और वायु मार्ग से भलीभाँति जुड़ा हुआ है:
रेल मार्ग: राजमुंदरी (राजमहेंद्रवरम) और कोव्वूर रेलवे स्टेशन देश के प्रमुख नगरों से सीधे जुड़े हैं।
सड़क मार्ग: राष्ट्रीय राजमार्ग द्वारा विजयवाड़ा, विशाखापट्टनम और हैदराबाद से सीधी बस सेवा उपलब्ध है।
वायु मार्ग: राजमुंदरी हवाई अड्डा (मधुरपुड़ी) निकटतम विमानक्षेत्र है।
दर्शन समय
कोटिलिंगेश्वर मंदिर एवं तटवर्ती प्रमुख देवालयों में सामान्यतः दर्शन प्रातः 06:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक तथा सायं 04:00 बजे से रात्रि 08:00 बजे तक खुले रहते हैं। पर्वों व उत्सवों के समय दर्शन समय में विस्तार संभव है।
विशेष मान्यताएँ
स्थानीय मान्यता है कि गोदावरी के पवित्र जल में स्नान के उपरांत देवी विश्वेशी और दण्डपाणि भैरव की आराधना करने से वाणी दोष दूर होते हैं तथा साधक को आध्यात्मिक तेज की प्राप्ति होती है।
आध्यात्मिक संदेश
गोदावरी तट शक्तिपीठ हमें सिखाता है कि जिस प्रकार सरिता निरंतर प्रवाहित होकर समुद्र में विलीन हो जाती है, उसी प्रकार मानव चेतना को भी भक्ति और ज्ञान के प्रवाह में परमात्मा से एकाकार होना चाहिए।



