सनातन धर्म में ५१ शक्तिपीठों की गणना अत्यंत पवित्र मानी गई है। तंत्र ग्रंथों के अनुसार लंका द्वीप पर स्थित लंका शक्तिपीठ भगवती की असीम कृपा और साधना का दिव्य केंद्र है।
परिचय
तंत्रचूड़ामणि अंतर्गत पीठनिर्णय में लंका शक्तिपीठ का उल्लेख ५१ शक्तिपीठों में एक महत्वपूर्ण तीर्थ के रूप में मिलता है। यहाँ माता सती के दिव्य आभूषण का पतन हुआ था।
शक्तिपीठ बनने की कथा
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपने पति देवाधिदेव महादेव के अपमान से व्यथित होकर माता सती ने योगाग्नि में देहत्याग कर दिया था। भगवान शिव जब सती के पार्थिव शरीर को लेकर ब्रह्मांड में विचरण करने लगे, तब सृष्टि की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के अंगों और आभूषणों को विभक्त किया। जिन-जिन पावन स्थलों पर वे गिरे, वे शक्तिपीठ कहलाए।
सती का अंग/आभूषण
पीठनिर्णय ग्रंथ के अनुसार, लंका में माता सती का नूपुर (पायल) गिरा था। तंत्र श्लोक में इसका स्पष्ट उल्लेख मिलता है—«लङ्कायां नूपुरञ्चैव…»।
देवी का नाम
इस शक्तिपीठ की अधिष्ठात्री देवी को माता इन्द्राक्षी कहा जाता है। मान्यता है कि प्राचीन काल में देवराज इन्द्र ने अपने संकट निवारण और कल्याण हेतु भगवती के इसी पावन स्वरूप की आराधना की थी।
भैरव
यहाँ के संरक्षक भैरव राक्षसेश्वर कहलाते हैं। वे साधकों को सभी प्रकार के भय, बाधाओं और नकारात्मक प्रभावों से मुक्त रखते हैं।
धार्मिक महत्व
शाक्त उपासना में नूपुर का पतन गतिशीलता, मंगलकारी पगचिह्न और भगवती के चरणों की नित्य उपस्थिति का प्रतीक माना जाता है। देवी इन्द्राक्षी और भैरव राक्षसेश्वर का स्मरण साधक के मन को शांति और आत्मबल प्रदान करता है।
पूजा/दर्शन
इस पीठ पर माता की आराधना महाशक्ति के रूप में की जाती है। श्रद्धालु कुमकुम, लाल पुष्प, अक्षत और दीप अर्पित कर माँ की वंदना करते हैं तथा निष्काम भक्ति का आशीर्वाद मांगते हैं।
प्रमुख पर्व
नवरात्रि (चैत्र एवं शारदीय), महाशिवरात्रि और पूर्णिमा तिथियों पर यहाँ विशेष आराधना की परंपरा है। इन पावन पर्वों पर भक्त देवी स्तुति और भैरव मंत्रों का पाठ करते हैं।
इतिहास
प्राचीन तंत्र ग्रंथों में केवल लंका द्वीप का नाम प्राप्त होता है, किसी आधुनिक मंदिर भवन का विशिष्ट उल्लेख नहीं है। आधुनिक युग में भक्त उत्तरी श्रीलंका के नैनातिवु नागपूषणी अम्मन मंदिर और त्रिंकोमाली के स्वामी रॉक पर स्थित शंकरी देवी क्षेत्र को शक्ति परंपरा के प्रमुख केंद्र के रूप में पूजते हैं।
कैसे पहुँचें
कोलंबो अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डे से श्रीलंका के विभिन्न नगरों के लिए रेल और सड़क मार्ग उपलब्ध हैं। जाफना पहुँचकर फेरी सेवा द्वारा नैनातिवु द्वीप जाया जा सकता है, तथा रेल या सड़क मार्ग से त्रिंकोमाली भी सुगमता से पहुँचा जा सकता है।
दर्शन समय
नैनातिवु मंदिर में सामान्य दर्शन प्रातः 06:30 से दोपहर 01:00 बजे और सायं 04:00 से 06:00 बजे तक होते हैं। त्रिंकोमाली स्थित परिसर में प्रातः 06:00 से दोपहर 01:00 और सायं 04:00 से 07:00 बजे तक दर्शन की व्यवस्था रहती है।
विशेष मान्यताएँ
मान्यता है कि देवराज इन्द्र द्वारा पूजित होने के कारण देवी का नाम इन्द्राक्षी पड़ा। इसके साथ ही, आद्य शंकराचार्य विरचित अष्टादश महाशक्तिपीठ परंपरा में लंका को देवी शंकरी का पावन स्थान माना गया है।
आध्यात्मिक संदेश
माता का नूपुर साधक को धर्म और सत्य के मार्ग पर निरंतर चलने की प्रेरणा देता है। माँ इन्द्राक्षी की शरण में जाने से चित्त के विकार दूर होते हैं और साधक को आंतरिक प्रकाश प्राप्त होता है।



