देवाधिदेव महादेव के पावन धाम कैलास पर्वत की तलहटी में स्थित पवित्र मानसरोवर का तट सनातन साधना का अत्यंत आलोकित केंद्र है। इक्यावन शक्तिपीठों में अत्यंत दुर्गम और परम पावन माना जाने वाला श्री मानस शक्तिपीठ इसी दिव्य सरोवर के तट पर प्रतिष्ठित है। यहाँ प्रकृति का कण-कण भगवती और शिव के साक्षात्कार का अनुभव कराता है।
परिचय
श्री मानस शक्तिपीठ तिब्बत के उच्च हिमालयी क्षेत्र में पवित्र मानसरोवर झील के पावन तट पर स्थित है। यह शक्तिपीठ समुद्र तल से लगभग १५,००० फीट की ऊँचाई पर कैलास पर्वत के सान्निध्य में अवस्थित है। यहाँ भगवती और महादेव का युगल सान्निध्य साधकों को अलौकिक शांति प्रदान करता है।
शक्तिपीठ बनने की कथा
पौराणिक परंपरा के अनुसार, प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपने पति भगवान शिव के अनादर से व्यथित होकर माता सती ने योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए थे। सती के पार्थिव शरीर को लेकर जब व्यथित महादेव तीनों लोकों में विचरण करने लगे, तब सृष्टि का संतुलन बनाए रखने हेतु श्रीहरि विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से उनके अंगों का विभाजन किया। जिन पवित्र स्थानों पर देवी के अंग निपतित हुए, वे सभी पावन शक्तिपीठ कहलाए।
सती का अंग/आभूषण
प्रामाणिक तंत्रग्रंथ तंत्रचूड़ामणि के अनुसार, मानसरोवर के पावन तट पर एक पाषाण शिला पर माता सती का दक्षिण हस्त (दाहिना हाथ) गिरा था। कुछ जनश्रुतियों और क्षेत्रीय संदर्भों में इसे देवी की बायीं हथेली के रूप में भी स्मरण किया जाता है।
देवी का नाम
मानस शक्तिपीठ में अधिष्ठात्री शक्ति को भगवती दाक्षायणी के रूप में पूजा जाता है। प्रजापति दक्ष की पुत्री होने के कारण माता का यह नाम अत्यंत पावन और कल्याणकारी माना जाता है।
भैरव
शाक्त परंपरा में प्रत्येक शक्तिपीठ की रक्षा के लिए भैरव अधिष्ठित रहते हैं। मानस शक्तिपीठ के रक्षक भैरव को अमर नाम से पूजा जाता है, जो अमरत्व और शाश्वत चेतना के प्रतीक हैं।
धार्मिक महत्व
वाल्मीकि रामायण के अनुसार, मानसरोवर का प्राकट्य सृष्टि के रचयिता ब्रह्माजी के मन के संकल्प से हुआ था। इस पवित्र सरोवर के जल में स्नान और आचमन करने से जन्म-जन्मांतर के पापों का क्षय माना जाता है। शक्तिपीठ और कैलास के संयुक्त सान्निध्य के कारण यह स्थान तपस्या और मोक्ष की साधना के लिए अद्वितीय माना जाता है।
पूजा/दर्शन
यहाँ अन्य शक्तिपीठों की भाँति कोई पारंपरिक निर्मित गर्भगृह अथवा मंदिर भवन नहीं है। मानसरोवर के तट पर स्थित पाषाण शिला और सरोवर के पावन जल को ही भगवती दाक्षायणी का प्रत्यक्ष स्वरूप मानकर श्रद्धापूर्वक पूजन और अर्चन किया जाता है। श्रद्धालु यहाँ तीर्थ-जल का मार्जन कर ध्यान और जप संपन्न करते हैं।
प्रमुख पर्व
यहाँ ग्रीष्मकालीन यात्रा अवधि के दौरान, विशेषकर आषाढ़ और श्रावण मास की पूर्णिमा, सोमवती अमावस्या तथा महाशिवरात्रि के पावन पर्वों पर विशेष ध्यान और साधना की जाती है। अनुकूल मौसम में श्रद्धालु सरोवर तट पर दीप प्रज्वलन कर देवी और महादेव की वंदना करते हैं।
इतिहास
कैलास-मानसरोवर क्षेत्र का उल्लेख प्राचीन वैदिक, पौराणिक और तांत्रिक ग्रंथों में निरंतर मिलता है। सदियों से भारतीय संन्यासी, योगी और परिव्राजक इस दुर्गम क्षेत्र की यात्रा कर भगवती दाक्षायणी की उपासना करते रहे हैं। वर्तमान समय में यह क्षेत्र तिब्बत स्वायत्त क्षेत्र (चीन) में स्थित है।
कैसे पहुँचें
मानस शक्तिपीठ की यात्रा उच्च-तुंगता वाले अंतरराष्ट्रीय क्षेत्र में होने के कारण विशेष अनुमतियों और नियमों के अधीन है। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय द्वारा प्रतिवर्ष ग्रीष्म ऋतु में लिपुलेख दर्रा (उत्तराखंड) और नाथू ला दर्रा (सिक्किम) के माध्यम से अधिकृत कैलास-मानसरोवर यात्रा का संचालन किया जाता है। इसके अतिरिक्त काठमांडू (नेपाल) मार्ग से भी अधिकृत यात्रा दल यहाँ पहुँचते हैं।
दर्शन समय
खुले प्राकृतिक तट पर स्थित होने के कारण यहाँ मंदिर के कपाट खुलने अथवा बंद होने का कोई निर्धारित समय नहीं है। मौसम की अनुकूलता को देखते हुए श्रद्धालु दिन के प्राकृतिक उजाले में ही सरोवर तट पर पूजन और ध्यान संपन्न करते हैं।
विशेष मान्यताएँ
जनमानस में दृढ़ आस्था है कि ब्रह्ममुहूर्त में देवगण सूक्ष्म शरीर से मानसरोवर के पावन जल में स्नान करने आते हैं। इस सरोवर की परिक्रमा और तट पर स्थित पवित्र शिला के दर्शन से साधक को परम पद और आत्मिक शांति की प्राप्ति होती है।
आध्यात्मिक संदेश
मानस शक्तिपीठ मानव मन की शुद्धि और सांसारिक अहं के विसर्जन का प्रतीक है। ब्रह्मा के मन से उत्पन्न यह सरोवर हमें अपने अंतर्मन को विकाररहित बनाकर भगवती दाक्षायणी और अमर भैरव की कृपा प्राप्त करने की प्रेरणा देता है।



