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श्री मानस शक्तिपीठ

श्री मानस शक्तिपीठ

मानस शक्तिपीठ

हिंदुओं के लिए कैलास पर्वत ‘भगवान शिव का सिंहासन’ है। बौद्धों के लिए विशाल प्राकृतिक मण्डप और जैनियों के लिए ऋषभदेव का निर्वाण स्थल है। हिन्दू तथा बौद्ध दोनों ही इसे तांत्रिक शक्तियों का भण्डार मानते हैं। भले ही भौगोलिक दृष्टि से यह चीन के अधीन है तथापि यह हिंदुओं, बौद्धों, जैनियों और तिब्बतियों के लिए अति-पुरातन तीर्थस्थान है।

नामकरण

देवी माँ का शक्तिपीठ चीन अधिकृत मानसरोवर के तट पर है, जहाँ सती की ‘बायीं हथेली’ का निपात हुआ था। यहाँ की शक्ति ‘दाक्षायणी’तथा भैरव ‘अमर’ हैं। ‘कैलास शक्तिपीठ’ मानसरोवर का गौरवपूर्ण वर्णन हिन्दू, बौद्ध, जैन धर्मग्रंथों में मिलता है। वाल्मीकि रामायण के अनुसार यह ब्रह्मा के मन से निर्मित होने के कारण ही इसे ‘मानसरोवर’ कहा गया। यहाँ स्वयं शिव हंस रूप में विहार करते हैं। जैन धर्मग्रंथों में कैलास को ‘अष्टपद’ तथा मानसरोवर को ‘पद्महद’ कहा गया है। इसके सरोवर में अनेक तीर्थंकरों ने स्नान कर तपस्या की थी। बुद्ध के जन्म के साथ भी मानसरोवर का घनिष्ट संबंध है। तिब्बती धर्मग्रंथ ‘कंगरी करछक’ में मानसरोवर की देवी ‘दोर्जे फांग्मो’ यहाँ निवास कहा गया है। यहाँ भगवान देमचोर्ग, देवी फांग्मो के साथ नित्य विहार करते हैं। इस ग्रंथ में मानसरोवर को ‘त्सोमफम’ कहते हैं, जिसके पीछे मान्यता है कि भारत से एक बड़ी मछली आ कर उस सरोवर में ‘मफम’ करते हुए प्रविष्ट हुई। इसी से इसका नाम ‘त्सोमफम’ पड़ गया। मानसरोवर के पास ही राक्षस ताल है, जिसे ‘रावण हृद’ भी कहते हैं। मानसरोवर का जल एक छोटी नदी द्वारा राक्षस ताल तक जाता है। तिब्बती इस नदी को ‘लंगकत्सु’ कहते हैं। जैन-ग्रंथों के अनुसार रावण एक बार ‘अष्टपद’ की यात्रा पर आया और उसने ‘पद्महद’ में स्नान करना चाहा, किंतु देवताओं ने उसे रोक दिया। तब उसने एक सरोवर, ‘रावणहृद’ का निर्माण किया और उसमें मानसरोवर की धारा ले आया तथा स्नान किया।

मार्ग स्थिति

मानसरोवर की यात्रा दुर्गम है। इसके लिए पहले पंजीकरण कराना होता है तथा चीन की अनुमति लेनी पड़ती है। उत्तराखण्ड के काठगोदाम रेलवे स्टेशन से बस द्वारा अल्मोड़ा, वहाँ से पिथौरागढ़ जाया जाता है। दूसरा विकल्प यह है कि बस द्वारा काठगोदाम से वैद्यनाथ, वागेश्वर, डीडीहाट होकर पिथौरागढ़ पहुँचा जाए या सीधे टनकपुर रेलवे स्टेशन से पिथौरागढ़ जाया जाए। वहाँ से ‘थानीघाट’ सोसा जिप्ती मार्ग से गंटव्यांग गुंजी, वहाँ से नवीडांग होकर हिमाच्छादित 17900 फुट ऊँचे लिपुला पार कर तिब्बत होते हुए तकलाकोट मण्डी के आगे टोयो, रिंगुंग बलढक होकर समुद्र तल से 14950 फुट ऊँचे मानसरोवर के दर्शन होते हैं। अन्य सुगम विकल्प है-अल्मोड़ा से अस्कोट, नार्विंग, लिपूलेह खिण्ड, तकलाकोट होकर। यह 1100 किलोमीटर लंबा मार्ग है। इसमें अनेक उतार-चढ़ाव हैं। जाते समय 70 किलोमीटर सरलकीट तक चढ़ाई फिर 74 किलोमीटर उतराई है। तकलाकोट तिब्बत का पहला गाँव है। तकलाकोट से ताट चौन के मार्ग से ही मानसरोवर है। तारकोट से 40 किलोमीटर पर मांधाता पर्वत पर स्थित 16200 फुट की ऊँचाई पर गुलैला दर्रा है। इसके मध्य में बायीं ओर मानसरोवर, दाहिनी ओर राक्षस ताल, उत्तर की ओर कैलास पर्वत का धवल शिखर है। दर्रा समाप्त होने पर तीर्थपुरी नामक स्थान है, जहाँ गर्म पानी के झरने हैं। इसके निकट ही गौरी कुण्ड है।

वैसे नेपाल होकर भी मानसरोवर जाया जा सकता है। इधर से जाने पर काठमाण्डू से मानसरोवर लगभग 1000 किलोमीटर पड़ता है। यह यात्रा प्राइवेट टैक्सी या कार से करना सुविधाजनक है। काठमाण्डू से ही टैक्सी मिल जाती है। नेपाल-चीन की सीमा पर स्थित है-फ़्रेण्डशिप ब्रिज’। यहाँ कस्टम क्लियरेंस तथा अन्य प्रमाण आदि की जाँच की जाती है। यहाँ के बाद तिब्बत में ‘नायलम’ पहुँचते हैं, जो समुद्रतल से 3700 मीटर ऊँचा है। एक दिन में 250-300 किलोमीटर यात्रा की जाती है तथा स्थान-स्थान पर रुकते हुए जाया जाता है। सागा में पहले पड़ाव पर विश्राम के लिए होटल मौजूद हैं। सागा से 270 किलोमीटर दूर प्रयाग है, वहाँ भी होटल हैं। लगभग 4 दिनों बाद ‘विश्व की छत’ मानसरोवर पहुँचते हैं।

मानसरोवर झील

85 किलोमीटर क्षेत्र में विस्तृत मानसरोवर झील की छटा निराली और अद्भुत है। उसमें आज भी सुनहरे हंस तैरते रहते हैं, जो अपनी गर्दन घुमाकर यात्रियों को देखते हैं। लोग मानसरोवर की परिक्रमा भी करते हैं। इस झील के एक किनारे से कैलास पर्वत और दक्षिणी हिस्सा दिखाई देता है। राक्षस ताल का विस्तार 125 किलोमीटर है। मानसरोवर के किनारे यात्रियों के ठहरने के लिए एक सुंदर भवन भी है, जिसका निर्माण ऋषिकेश के परमार्थ निकेतन तथा कुछ प्रवासी भारतीयों के आर्थिक सहयोग से हुआ है।

परिक्रमा

लोग कैलास पर्वत की भी परिक्रमा करते हैं। यह मानसरोवर झील से 60 किलोमीटर दूर तारचंद बेस कैंप से की जाती है। 54 किलोमीटर के दायरे में फैले कैलास पर्वत की चतुर्मुखी परिक्रमा घोड़े से या पैदल की जाती है। इस परिक्रमा में गौरीकुण्ड, कैलास पर्वत के दक्षिणी, उत्तरी और पश्चिमी मुख के भी दर्शन होते हैं। शिव के वासस्थान माने जाने वाले कैलास पर्वत पर हमेशा बर्फ़ जमी रहती है। अतः इसको स्पर्श करना मना है। इसके आस-पास अनेक देवियों के भी पर्वत हैं।

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