श्री विराट शक्तिपीठ भगवती आदिशक्ति के 51 पवित्र शक्तिपीठों में अत्यंत पावन और ऐतिहासिक तीर्थ माना जाता है। राजस्थान के सुरम्य अरावली पर्वतमालाओं के मध्य स्थित यह पावन धाम सदियों से देवी भक्तों और साधकों की अटूट आस्था का केंद्र रहा है।
परिचय
विराट शक्तिपीठ राजस्थान के ऐतिहासिक विराटनगर (प्राचीन बैराठ) क्षेत्र में स्थित है। यह क्षेत्र अपनी पौराणिक धरोहर और प्राकृतिक सौंदर्य के लिए प्रसिद्ध है। यहाँ भगवती जगदम्बा माँ अम्बिका के रूप में विराजमान हैं, जिनकी कृपा से भक्तों के कष्ट दूर होते हैं और उन्हें मानसिक शांति मिलती है।
शक्तिपीठ बनने की कथा
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपने पति भगवान शिव के अपमान को सहन न कर पाने के कारण माता सती ने योगाग्नि में अपना देहत्याग कर दिया था। भगवान शिव जब सती के पार्थिव शरीर को लेकर वैराग्य भाव से ब्रह्मांड में विचरण करने लगे, तब संपूर्ण सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता के पार्थिव शरीर को अंगों और आभूषणों में विभक्त किया। जिन-जिन पावन स्थानों पर वे अंग और आभूषण गिरे, वे स्थान परम पूज्य शक्तिपीठ कहलाए।
सती का अंग/आभूषण
शास्त्र सम्मत ग्रंथ तन्त्रचूड़ामणि के अनुसार, विराट क्षेत्र में माता सती के पाँव की उँगलियाँ (पदाङ्गुली) गिरी थीं। इस दिव्य पाद-स्पर्श के कारण इस संपूर्ण क्षेत्र की पावनता अत्यंत फलदायी मानी जाती है।
देवी का नाम
इस शक्तिपीठ में प्रतिष्ठित भगवती को माँ अम्बिका के नाम से पूजा जाता है। माँ अम्बिका जगज्जननी का स्नेहमयी मातृस्वरूप हैं, जो अपने भक्तों की पुकार सुनकर उनके जीवन में धर्म, अर्थ, काम और मोक्ष के मार्ग को सुगम बनाती हैं।
भैरव
प्रत्येक शक्तिपीठ की रक्षा के लिए भगवान शिव एक विशेष भैरव स्वरूप में प्रतिष्ठित रहते हैं। विराट शक्तिपीठ में भगवान शिव अमृत अथवा अमृतेश्वर भैरव के रूप में पूजित हैं। शक्ति की उपासना के साथ भैरव दर्शन से साधना पूर्ण मानी जाती है।
धार्मिक महत्व
शाक्त परम्परा में इस पीठ का विशेष महत्व है। चरण-अंग गिरने के कारण यहाँ भूमि का स्पर्श और दर्शन अत्यंत पुण्यदायी माना जाता है। यहाँ श्रद्धापूर्वक की गई पूजा से साधकों को आत्मिक बल, भय से मुक्ति और निष्काम भक्ति का आशीर्वाद प्राप्त होता है।
पूजा/दर्शन
मन्दिर में प्रातः और सायंकाल नियमित आरती और पूजन सम्पन्न होता है। भक्तजन माँ अम्बिका को चुनरी, पुष्प, फल और नैवेद्य अर्पित कर माँ के चरणों में ध्यान लगाते हैं। यहाँ का शांत पहाड़ी परिवेश जप और साधना के लिए अत्यंत अनुकूल है।
प्रमुख पर्व
यहाँ चैत्र और आश्विन मास की दोनों नवरात्रियों में विशेष पूजा और अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं। नवरात्र के नौ दिनों में दूर-दराज से श्रद्धालु माँ के दर्शन के लिए आते हैं। इसके अतिरिक्त शिवरात्रि और अन्य धार्मिक पर्वों पर भी विशेष भक्तिमय वातावरण रहता है।
इतिहास
विराटनगर का इतिहास महाभारत काल के मत्स्य महाजनपद से जुड़ा है। मान्यता है कि पाण्डवों ने अपने अज्ञातवास का समय इसी विराट नगरी में व्यतीत किया था। यहाँ मौर्य सम्राट अशोक के शिलालेख और प्राचीन बौद्ध अवशेष भी प्राप्त हुए हैं, जो इस भूमि की प्राचीनता और सांस्कृतिक निरंतरता का प्रमाण हैं।
कैसे पहुँचें
विराटनगर राष्ट्रीय राजमार्ग 248A के माध्यम से जयपुर और अलवर दोनों से भली-भाँति जुड़ा हुआ है। शाहपुरा से इसकी दूरी लगभग 25 से 28 किलोमीटर है। जयपुर से विराटनगर लगभग 88 किलोमीटर और अलवर से लगभग 65 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन और हवाई अड्डा जयपुर में उपलब्ध हैं, जहाँ से टैक्सी या बस द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है।
दर्शन समय
मन्दिर के कपाट सामान्यतः सूर्योदय से सूर्यास्त तक खुले रहते हैं। प्रातःकालीन और सांध्यकालीन आरती के समय दर्शन करना विशेष रूप से फलदायी माना जाता है। प्रमुख त्योहारों और नवरात्र में दर्शन का समय विस्तृत हो जाता है।
विशेष मान्यताएँ
स्थानीय जनमानस में माँ अम्बिका को ममतामयी रक्षक देवी के रूप में पूजा जाता है। श्रद्धालु यहाँ पारिवारिक सुख-शांति, संतान के कल्याण और जीवन की बाधाओं से मुक्ति के लिए मन्नत माँगते हैं। ऐसी मान्यता है कि सच्चे मन से की गई प्रार्थना माँ के दरबार से कभी खाली नहीं लौटती।
आध्यात्मिक संदेश
विराट शक्तिपीठ का संदेश मातृशक्ति के प्रति पूर्ण समर्पण और अटूट आस्था का है। यह पावन तीर्थ हमें स्मरण कराता है कि परमात्मा के शक्ति स्वरूप की शरण में जाने से अहंकार विगलित होता है और साधक के हृदय में शुद्ध प्रेम और शांति का उदय होता है।



