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श्री विशालाक्षी शक्तिपीठ, वाराणसी: इतिहास, धार्मिक महत्व एवं दर्शन

श्री विशालाक्षी शक्तिपीठ, वाराणसी: इतिहास, धार्मिक महत्व एवं दर्शन

श्री विशालाक्षी शक्तिपीठ देवाधिदेव महादेव की पावन नगरी काशी (वाराणसी) में गंगा तट के समीप स्थित अत्यंत पूजनीय तीर्थ है। यह पावन शक्तिपीठ प्रसिद्ध मीरघाट पर, श्री काशी विश्वनाथ मंदिर तथा मणिकर्णिका घाट के निकट स्थित है। सनातन परंपरा में काशी को मोक्षदायिनी नगरी माना गया है, जहाँ भगवान शिव और आदि पराशक्ति नित्य रूप से विराजमान रहते हैं।

परिचय

विशालाक्षी शक्तिपीठ भारत के 51 शक्तिपीठों में प्रमुख स्थान रखता है। यह मंदिर वाराणसी के मीरघाट क्षेत्र की पावन गलियों में स्थित है। दक्षिण भारत की माँ मीनाक्षी (मदुरै) और माँ कामाक्षी (कांचीपुरम) के साथ माँ विशालाक्षी (काशी) को शक्ति के पवित्र त्रिकोण के रूप में पूजा जाता है। यहाँ दर्शन करने मात्र से साधक को असीम शांति एवं आध्यात्मिक ऊर्जा की अनुभूति होती है।

शक्तिपीठ बनने की कथा

पौराणिक आख्यानों के अनुसार जब देवी सती ने अपने पिता दक्ष प्रजापति के यज्ञ में अपने प्राणों की आहुति दे दी, तब शोकमग्न भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर संपूर्ण ब्रह्मांड में विचरण करने लगे। सृष्टि के संतुलन की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के अंगों को विभाजित किया। वे पवित्र अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

सती का अंग/आभूषण

तांत्रिक परंपरा के प्रामाणिक ग्रंथ तंत्रचूड़ामणि के अनुसार, काशी के इस पावन स्थल पर भगवती सती के कान की मणि अथवा कर्ण-कुंडल का निपात हुआ था। आभूषण के पतन के कारण इस क्षेत्र का संबंध मणिकर्णिका से भी माना जाता है। जनमानस में कुछ परंपराएँ ‘अक्षि’ शब्द के आधार पर नेत्र गिरने की लोकमान्यता भी मानती हैं, किंतु अधिकांश शास्त्रीय ग्रंथों में कर्ण-आभूषण का ही स्पष्ट उल्लेख प्राप्त होता है।

देवी का नाम

‘विशालाक्षी’ नाम दो शब्दों से मिलकर बना है—’विशाल’ और ‘अक्षि’, जिसका अर्थ है ‘विशाल तथा करुणापूर्ण नेत्रों वाली भगवती’। देवी भागवत पुराण और मत्स्य पुराण में देवी को काशी की अधिष्ठात्री शक्ति के रूप में विशालाक्षी कहकर नमन किया गया है। स्कंद पुराण के काशी खंड में इन्हें काशी की ‘नव गौरी’ में पंचम गौरी के रूप में प्रतिष्ठित किया गया है।

भैरव

प्रत्येक शक्तिपीठ की भांति विशालाक्षी शक्तिपीठ के भी अधिष्ठाता भैरव विद्यमान हैं। तंत्र ग्रंथों और स्थानीय परंपरा के अनुसार, काशी क्षेत्र के संपूर्ण रक्षक एवं शक्तिपीठ के भैरव भगवान काल भैरव हैं। काशी यात्रा में माँ विशालाक्षी के दर्शन के साथ काल भैरव के दर्शन का भी विशेष शास्त्रीय विधान है।

धार्मिक महत्व

देवी भागवत पुराण के 108 शक्तिपीठों में काशी की विशालाक्षी का नाम आदरपूर्वक लिया गया है। काशी खंड में वर्णित है कि देवाधिदेव विश्वेश्वर माँ विशालाक्षी के धाम के निकट विश्राम करते हैं। यहाँ देवी की उपासना से साधक के अंतःकरण की शुद्धि होती है तथा ज्ञान और मोक्ष के मार्ग प्रशस्त होते हैं।

पूजा/दर्शन

मंदिर के गर्भगृह में श्रद्धालुओं को माँ विशालाक्षी के दो विग्रहों के दर्शन होते हैं। मुख्य वेदी पर काले पाषाण से निर्मित भव्य एवं अलंकृत विग्रह स्थापित है, जिसके ठीक पीछे एक अत्यंत प्राचीन, लघु स्वयंभू पाषाण प्रतिमा विराजमान है, जिसे ‘आदि विशालाक्षी’ कहा जाता है। श्रद्धालु गंगा स्नान कर पवित्र जल, पुष्प, धूप, दीप और कुमकुम से माता की अर्चना करते हैं।

प्रमुख पर्व

यहाँ वासंती (चैत्र) और शारदीय नवरात्रि अत्यंत श्रद्धा एवं उल्लास से मनाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की तृतीया तिथि को मनाया जाने वाला ‘कजली तीज’ पर्व इस मंदिर का प्रमुख उत्सव है। इस अवसर पर देवी का विशेष शृंगार किया जाता है और रात्रि जागरण के साथ भजन-कीर्तन संपन्न होते हैं।

इतिहास

विशालाक्षी मंदिर की वर्तमान वास्तुकला में उत्तर भारतीय और दक्षिण भारतीय द्रविड़ स्थापत्य का सुंदर समन्वय देखने को मिलता है। 19वीं एवं 20वीं शताब्दी में तमिलनाडु के नाट्टुकोट्टई नगरथार (चेट्टियार) समुदाय द्वारा इस मंदिर का भव्य जीर्णोद्धार कराया गया और नित्य पूजन की सुदृढ़ व्यवस्था की गई। मंदिर के प्रवेश द्वार पर गोपुरम और माता गजलक्ष्मी की नक्काशी दक्षिण भारतीय शिल्प की गवाही देती है।

कैसे पहुँचें

विशालाक्षी मंदिर वाराणसी के मीरघाट पर स्थित है। यहाँ पहुँचने के लिए कैंट (वाराणसी जंक्शन) रेलवे स्टेशन अथवा बाबतपुर हवाई अड्डे से गोदौलिया या चौक तक ऑटो अथवा टैक्सी ली जा सकती है। गोदौलिया या दशाश्वमेध घाट से संकरी ऐतिहासिक गलियों से होते हुए पैदल मंदिर पहुँचा जा सकता है। यह मंदिर श्री काशी विश्वनाथ मंदिर से मात्र कुछ मिनटों की दूरी पर है।

दर्शन समय

मंदिर सामान्यतः प्रतिदिन प्रात: 05:00 बजे से दोपहर 11:30 बजे तक और सायंकाल 05:00 बजे से रात्रि 09:30 बजे तक खुला रहता है। प्रात:काल सूर्योदय के समय मंगला आरती तथा सायंकाल गोधूलि वेला में शृंगार आरती की जाती है। पर्व-त्योहारों और नवरात्रि के दिनों में दर्शन के समय में विस्तार हो सकता है।

विशेष मान्यताएँ

परंपरागत मान्यता के अनुसार, काशी तीर्थ की यात्रा तब तक पूर्ण नहीं मानी जाती जब तक श्री काशी विश्वनाथ, माँ अन्नपूर्णा, माँ विशालाक्षी और काल भैरव के दर्शन न कर लिए जाएं। भक्त श्रद्धापूर्वक यहाँ आकर देवी को लाल चुनरी और सिंदूर अर्पित कर परिवार के कल्याण और आध्यात्मिक शांति की प्रार्थना करते हैं।

आध्यात्मिक संदेश

माँ विशालाक्षी के विशाल नेत्र संपूर्ण जगत पर भगवती की अखंड करुणा और वात्सल्य के प्रतीक हैं। यह शक्तिपीठ हमें स्मरण कराता है कि सांसारिक बंधनों से मुक्ति और परमतत्व की प्राप्ति केवल देवी की कृपा और अंतर्दृष्टि से ही संभव है।

पूछे जाने वाले प्रश्न

माँ विशालाक्षी शक्तिपीठ कहाँ स्थित है?
यह शक्तिपीठ उत्तर प्रदेश के वाराणसी में गंगातट के निकट मीरघाट पर स्थित है।
विशालाक्षी शक्तिपीठ में देवी सती का कौन सा अंग अथवा आभूषण गिरा था?
तंत्रचूड़ामणि के अनुसार यहाँ माता सती के कान की मणि अथवा कर्ण-कुंडल गिरे थे।
इस शक्तिपीठ के भैरव कौन हैं?
विशालाक्षी शक्तिपीठ के क्षेत्रपाल और भैरव भगवान काल भैरव हैं।
मंदिर में दर्शन का सामान्य समय क्या है?
मंदिर सामान्यतः सुबह 05:00 से 11:30 बजे तक और शाम 05:00 से रात 09:30 बजे तक खुला रहता है।
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