श्री हिंगलाज शक्तिपीठ सनातन शक्ति परंपरा के पावन शक्तिपीठों में अत्यंत प्रतिष्ठित और जागृत तीर्थ माना जाता है। तंत्र शास्त्रों एवं पुराणों के अनुसार, यह वह परम पावन स्थान है जहाँ भगवती सती का ब्रह्मरंध्र गिरा था। मरुभूमि और दुर्गम पर्वतमालाओं के मध्य स्थित यह गुफा मंदिर न केवल देवी भक्तों की अगाध आस्था का केंद्र है, बल्कि सर्वोच्च आध्यात्मिक चेतना और आंतरिक शुद्धि का प्रतीक भी है।
परिचय
हिंगलाज शक्तिपीठ पाकिस्तान के बलूचिस्तान प्रांत में लसबेला जिले के अंतर्गत हिंगोल राष्ट्रीय उद्यान की प्राकृतिक पर्वत श्रृंखलाओं में स्थित है। यह पावन तीर्थ कराची से लगभग 250 किलोमीटर उत्तर-पश्चिम में मकरान तटीय राजमार्ग के समीप, पवित्र हिंगोल (अघोर) नदी के तट पर एक संकीर्ण घाटी में स्थित प्राकृतिक गुफा के रूप में विद्यमान है।
शक्तिपीठ बनने की कथा
पौराणिक आख्यान के अनुसार, दक्ष प्रजापति के महायज्ञ में अपने पति देवाधिदेव महादेव का अपमान सहन न कर पाने के कारण सती ने योगाग्नि में अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। सती के पार्थिव शरीर को लेकर जब भगवान शिव वैराग्य और वियोग में ब्रह्मांडीय भ्रमण कर रहे थे, तब सृष्टि के संतुलन की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के अंगों का विच्छेदन किया। जिन-जिन स्थानों पर सती के अंग, वस्त्र और आभूषण गिरे, वे स्थान परम पवित्र शक्तिपीठ बने।
सती का अंग/आभूषण
प्रामाणिक तंत्र ग्रंथों और पीठ निर्णयों के अनुसार, हिंगलाज क्षेत्र में भगवती सती का ब्रह्मरंध्र (मस्तिष्क का शीर्ष भाग) गिरा था। योग और तंत्र में ब्रह्मरंध्र को सहस्त्रार चक्र तथा सर्वोच्च आत्मिक ज्ञान का द्वार माना जाता है, जिससे इस पीठ का महत्व अद्वितीय हो जाता है।
देवी का नाम
यहाँ आद्याशक्ति भगवती कोट्टरी रूप में प्रतिष्ठित हैं, जिन्हें हिंगुला या महामाया भी कहा जाता है। संस्कृत में ‘हिंगुल’ का अर्थ सिंदूर होता है। गर्भगृह में कोई गढ़ी हुई मूर्ति स्थापित नहीं है, बल्कि माँ एक स्वयंभू पावन शिला (पिंडी) के रूप में विराजमान हैं, जिन्हें श्रद्धापूर्वक सिंदूर का लेप कर पूजा जाता है।
भैरव
प्रत्येक शक्तिपीठ में देवी के साथ भगवान शिव भैरव रूप में उनके रक्षक के रूप में विराजमान रहते हैं। हिंगलाज पीठ में भगवान शिव भीमलोचन (भीमलोचन भैरव) के रूप में पूजित हैं।
धार्मिक महत्व
बृहन्नील तंत्र, पीठ निर्णय और शिवचरित्र में इस शक्तिपीठ का विशेष उल्लेख मिलता है:
ब्रह्मरन्ध्रं हिङ्गुलायांभैरवो भीमलोचनः।
कोट्टरी सा महामाया त्रिगुणा या दिगम्बरी॥
मान्यता है कि यहाँ श्रद्धापूर्वक शीश नवाने से साधक के अंतःकरण की अशुद्धियाँ दूर होती हैं और उसे परम शांति व मोक्ष की प्राप्ति होती है।
पूजा/दर्शन
हिंगलाज गुफा में माँ के दर्शन से पूर्व श्रद्धालु पवित्र अघोर नदी में स्नान कर शुद्धि प्राप्त करते हैं। गुफा के गर्भगृह में जलती अखंड ज्योति और सिंदूरयुक्त पावन पिंडी के सम्मुख नारियल, लाल वस्त्र और सिंदूर अर्पित कर प्रार्थना की जाती है। यहाँ पूजा अत्यंत सादगीपूर्ण और पूर्णतः भक्तिभाव से संपन्न होती है।
प्रमुख पर्व
यहाँ का सबसे बड़ा धार्मिक उत्सव प्रतिवर्ष चैत्र मास (मार्च-अप्रैल) में आयोजित होने वाली चार दिवसीय ‘हिंगलाज माता तीर्थ यात्रा’ है। इस पावन अवसर पर दूर-दूर से लाखों श्रद्धालु कठिन मार्ग तय कर माँ के दर्शन हेतु पहुँचते हैं। इसके अतिरिक्त चैत्र और आश्विन मास की नवरात्रि में भी विशेष अर्चना की जाती है।
इतिहास
यह पीठ प्राचीन काल से क्षत्रिय, ब्रह्मक्षत्रिय, राजपूत, खत्री और चारण समुदायों की कुलदेवी के रूप में पूजनीय रही है। इस तीर्थ की एक विलक्षण विशेषता यहाँ का सांस्कृतिक समन्वय भी है; स्थानीय बलूच निवासी माँ को आदरपूर्वक ‘बीबी नानी’ कहकर नमन करते हैं और इस यात्रा को अत्यंत सम्मान की दृष्टि से देखते हैं।
कैसे पहुँचें
हिंगलाज शक्तिपीठ कराची से मकरान कोस्टल हाईवे (N-10) के माध्यम से सड़क मार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है। कराची से सड़क यात्रा में लगभग 4 से 5 घंटे का समय लगता है। अंतरराष्ट्रीय व भारतीय श्रद्धालुओं के लिए पाकिस्तान का वैध पासपोर्ट और धार्मिक तीर्थयात्रा वीज़ा अनिवार्य होता है।
दर्शन समय
मरुस्थलीय और वन्य क्षेत्र में स्थित होने के कारण मंदिर में दर्शन सामान्यतः सूर्योदय से सूर्यास्त के मध्य, प्राकृतिक प्रकाश के समय ही कराए जाते हैं। तीर्थयात्रियों को दिन के समय ही दर्शन पूर्ण कर सुरक्षित स्थानों पर लौटने की सलाह दी जाती है।
विशेष मान्यताएँ
हिंगलाज यात्रा के मार्ग में स्थित चंद्रकूप (पंक ज्वालामुखी) का दर्शन अत्यंत महत्वपूर्ण माना जाता है। श्रद्धालु गुफा तक पहुँचने से पहले चंद्रकूप के शिखर पर जाकर नारियल अर्पित करते हैं और अपने पापों के प्रायश्चित व सत्य के संकल्प के साथ आगे की यात्रा की अनुमति मांगते हैं।
आध्यात्मिक संदेश
हिंगलाज शक्तिपीठ की यात्रा केवल एक भौतिक सफर नहीं, अपितु अहंकार के विसर्जन और आत्म-साक्षात्कार का मार्ग है। सती का ब्रह्मरंध्र हमें यह स्मरण कराता है कि सर्वोच्च चेतना की प्राप्ति सांसारिक मोह के त्याग और ईश्वर के प्रति अनन्य समर्पण से ही संभव है।



