श्री त्रिस्तोता शक्तिपीठ (त्रिस्रोता शक्तिपीठ) सनातन परंपरा के इक्यावन पावन शक्तिपीठों में अत्यंत पूजनीय तीर्थ है। यह पावन धाम पश्चिम बंगाल के जलपाईगुड़ी जिले में तीस्ता नदी के तटवर्ती क्षेत्र और बैकुंठपुर वन के निकट बोड़ागंज (शालबाड़ी) में स्थित है। पौराणिक काल में तीन धाराओं में प्रवाहित होने के कारण तीस्ता नदी को ‘त्रिस्रोता’ कहा गया, जिससे इस पावन स्थल का नाम त्रिस्तोता अथवा त्रिस्रोता शक्तिपीठ विख्यात हुआ।
परिचय
त्रिस्तोता शक्तिपीठ माँ आदिशक्ति के करुणामयी और रक्षणकारी स्वरूप को समर्पित एक अत्यंत शांत एवं दिव्य तीर्थ है। तीस्ता नदी की प्राकृतिक छटा और हरी-भरी वादियों के मध्य स्थित यह देवालय साधकों और भक्तों के लिए शांति और आध्यात्मिक ऊर्जा का केंद्र है।
शक्तिपीठ बनने की कथा
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब प्रजापति दक्ष के यज्ञ में देवी सती ने योगाग्नि द्वारा अपने प्राण त्याग दिए, तब भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर व्यथित होकर ब्रह्मांड में विचरण करने लगे। सृष्टि के संतुलन की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया। जिन-जिन स्थानों पर भगवती के अंग और आभूषण गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
सती का अंग/आभूषण
तंत्र चूड़ामणि के पीठनिर्णय के अनुसार, त्रिस्रोता क्षेत्र में माता सती का वाम चरण (बायाँ पैर) गिरा था। क्षेत्रीय आस्था में इसे माता के बाएँ पैर का अंगूठा भी माना जाता है। चरण गिरने के कारण यह भूमि भक्तों के लिए परम वंदनीय और कल्याणकारी मानी जाती है।
देवी का नाम
यहाँ अधिष्ठात्री महाशक्ति को माँ भ्रामरी के नाम से पूजा जाता है। पौराणिक मान्यता के अनुसार, भगवती ने दैत्य अरुणासुर के वध और धर्म की रक्षा हेतु असंख्य भौरों (भ्रामर) का रूप धारण किया था। अतः वे भ्रामरी रूप में यहाँ भक्तों को अभय और वात्सल्य प्रदान करती हैं।
भैरव
इस शक्तिपीठ के संरक्षक भैरव ईश्वर (जिन्हें भैरवेश्वर अथवा क्षेत्रीय परंपरा में अम्बर भी कहा जाता है) हैं। मंदिर में भैरव जी की अर्चना शिव स्वरूप में की जाती है, जो शक्ति के साधकों को सुरक्षा और सिद्धि प्रदान करते हैं।
धार्मिक महत्व
शास्त्रसम्मत इक्यावन शक्तिपीठों में सम्मिलित होने के कारण इस तीर्थ की महिमा असीम है। मान्यता है कि यहाँ श्रद्धापूर्वक माँ भ्रामरी और भैरवेश्वर की उपासना करने से भय, संकट और मानसिक व्याकुलताओं का नाश होता है तथा जीवन में आध्यात्मिक चेतना का जागरण होता है।
पूजा/दर्शन
मंदिर के गर्भगृह में माँ भ्रामरी के पावन विग्रह और भैरव जी के शिवलिंग स्वरूप की नित्य विधि-विधान से पूजा-अर्चना की जाती है। श्रद्धालु यहाँ चरण वंदना कर पुष्प, फल और धूप-दीप अर्पित करते हैं। मंदिर परिसर में एक प्राचीन वटवृक्ष भी स्थित है, जिसकी परिक्रमा श्रद्धालु बड़े भक्तिभाव से करते हैं।
प्रमुख पर्व
यहाँ शारदीय एवं चैत्र नवरात्रि, दुर्गा पूजा तथा महाशिवरात्रि का पर्व अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इन पर्वों पर विशेष अभिषेक, आरती और अनुष्ठान संपन्न होते हैं, जिनमें दूर-दराज से आए भक्तजन भाग लेते हैं।
इतिहास
यह क्षेत्र ऐतिहासिक रूप से बैकुंठपुर राज्य और उत्तर बंगाल की समृद्ध तांत्रिक व लोक परंपराओं से जुड़ा रहा है। प्राचीन काल से ही तीस्ता के इस कछार पर ऋषि-मुनि और साधक भगवती की आराधना करते रहे हैं। वर्तमान मंदिर संरचना का जीर्णोद्धार स्थानीय श्रद्धालुओं और न्यास द्वारा समय-समय पर कराया गया है।
कैसे पहुँचें
रेल मार्ग: निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन न्यू जलपाईगुड़ी (NJP, लगभग 32–35 किमी) और जलपाईगुड़ी टाउन (लगभग 20 किमी) हैं, जहाँ से टैक्सी और स्थानीय वाहन उपलब्ध रहते हैं।
वायु मार्ग: बागडोगरा विमानक्षेत्र (IXB) निकटतम हवाई अड्डा है, जो यहाँ से लगभग 48 किमी दूर है।
सड़क मार्ग: यह मंदिर सिलीगुड़ी और जलपाईगुड़ी से सड़क मार्ग द्वारा बेलाकोबा होते हुए सुगमता से पहुँचा जा सकता है।
दर्शन समय
मंदिर के कपाट सामान्यतः प्रतिदिन प्रातः 6:00 बजे से सायं 7:00 बजे तक दर्शनार्थियों के लिए खुले रहते हैं। दोपहर में भोग व श्रृंगार के समय कुछ अवधि के लिए पट बंद रह सकते हैं।
विशेष मान्यताएँ
श्रद्धालुओं का विश्वास है कि माता सती के चरण तीर्थ में प्रणाम करने से मार्ग की बाधाएं दूर होती हैं और साधकों को स्थिर बुद्धि व धर्म मार्ग पर चलने की शक्ति प्राप्त होती है। यहाँ की शांत प्रकृति ध्यान और जप के लिए अत्यंत अनुकूल मानी जाती है।
आध्यात्मिक संदेश
माँ भ्रामरी और भैरवेश्वर का यह पावन धाम हमें सिखाता है कि प्रकृति और ईश्वर में कोई भेद नहीं है। माँ भ्रामरी की उपासना से अहंकार का नाश होता है और आत्मा में दिव्यता तथा विनय का उदय होता है।



