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श्री त्रिपुर सुन्दरी शक्तिपीठ, माताबाड़ी (उदयपुर, त्रिपुरा)

श्री त्रिपुर सुन्दरी शक्तिपीठ, माताबाड़ी (उदयपुर, त्रिपुरा)

पूर्वोत्तर भारत की पावन धरा त्रिपुरा में स्थित श्री त्रिपुर सुन्दरी शक्तिपीठ, जिसे स्थानीय रूप से माताबाड़ी के नाम से जाना जाता है, भगवती के 51 महाशक्तिपीठों में अत्यंत प्रतिष्ठित तीर्थ है। गोमती ज़िले के ऐतिहासिक नगर उदयपुर में एक कछुए के आकार की मनोरम पहाड़ी पर प्रतिष्ठित यह पवित्र धाम भक्तों को वात्सल्य, शांति और आध्यात्मिक शक्ति प्रदान करता है।

परिचय

श्री त्रिपुर सुन्दरी मंदिर त्रिपुरा राज्य की प्राचीन राजधानी उदयपुर से लगभग तीन किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। इस पावन तीर्थ को कूर्म पीठ भी कहा जाता है, क्योंकि जिस टीले पर यह मंदिर निर्मित है, उसकी प्राकृतिक बनावट कूर्म (कछुए) की पीठ के समान है। तंत्र शास्त्र में कूर्म पृष्ठ को साधना और शक्ति की उपासना के लिए अत्यंत पुण्यदायी माना गया है।

गर्भगृह में लाल-काले कसौटी पत्थर (कष्ठी पत्थर) से निर्मित भगवती की भव्य प्रतिमा प्रतिष्ठित है। मुख्य विग्रह के साथ ही एक लघु विग्रह भी विराजमान है, जिसे श्रद्धालु आदर और स्नेह से छोटो माँ (छोटी माता) कहते हैं। ऐतिहासिक परंपरा के अनुसार, त्रिपुरा के मानिक्य राजवंश के नरेश राज-काज और विशेष अभियानों के समय इस लघु विग्रह को रक्षा-शक्ति के रूप में साथ रखते थे।

शक्तिपीठ बनने की कथा

पौराणिक परंपरा के अनुसार, जब प्रजापति दक्ष के यज्ञ कुंड में माता सती ने अपने शरीर का त्याग कर दिया, तब शोकमग्न भगवान शिव उनके पावन पार्थिव शरीर को लेकर संपूर्ण ब्रह्मांड में विचरने लगे। सृष्टि के संतुलन और महादेव के दारुण ताप को शांत करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के अंगों को विच्छेदित किया।

सती के पावन अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ गिरे, वे सभी स्थान शक्तिपीठ के रूप में पूजित हुए। इस पावन भूभाग पर माता का पवित्र चरण अंग गिरा, जिससे यह धरा अखंड शक्ति का शाश्वत केंद्र बन गई।

सती का अंग/आभूषण

प्रमाणिक तंत्र ग्रन्थों एवं पीठनिर्णय के अनुसार, यहाँ माता सती का दायाँ पैर (दक्षिण पाद) अथवा दायाँ अँगूठा गिरा था। इसी कारण इस पावन भूमि को शक्ति के चरण-रज से पूजित परम कल्याणकारी पीठ माना जाता है।

देवी का नाम

इस शक्तिपीठ में आद्याशक्ति की आराधना त्रिपुर सुन्दरी (माँ त्रिपुरेश्वरी) के रूप में की जाती है। दस महाविद्याओं में इन्हें षोडशी अथवा ललिता महात्रिपुरसुन्दरी भी कहा जाता है, जो तीनों लोकों में परम सुंदरी, ज्ञानस्वरूपा और आद्य प्रकृति मानी जाती हैं।

भैरव

यहाँ अधिष्ठात्री शक्ति की रक्षा करने वाले और साधकों को अभय प्रदान करने वाले भैरव त्रिपुरेश हैं। शास्त्रीय मान्यता के अनुसार, पीठनिर्णय में उल्लिखित है कि त्रिपुरेश भैरव के दर्शन और वंदन से सभी सात्विक मनोरथ सिद्ध होते हैं।

धार्मिक महत्व

शैव, शाक्त और वैष्णव समन्वय की दृष्टि से इस पीठ का असाधारण महत्व है। यहाँ माँ त्रिपुर सुन्दरी की उपासना तांत्रिक और वैदिक दोनों विधियों से संपन्न होती है। माना जाता है कि कूर्माकार पीठ पर अवस्थित होने के कारण यहाँ की गई भगवती की आराधना शीघ्र फलदायी होती है और साधक के भय व व्याधियों का नाश करती है।

मंदिर के पूर्व भाग में लगभग 6.4 एकड़ में फैला पवित्र कल्याण सागर सरोवर है। इस सरोवर में दुर्लभ प्रजाति के कछुए (बोस्तामी कछुए) तथा विशाल मछलियाँ वास करती हैं। भक्तगण इन जलचरों को मुड़ी (लाई) खिलाना अत्यंत पुण्यदायी मानते हैं। परंपरा के अनुसार, इस सरोवर के जीवों को किसी भी प्रकार की हानि पहुँचाना पूरी तरह वर्जित है।

पूजा/दर्शन

माता के पावन गर्भगृह में नित्य ब्रह्ममुहूर्त से मंगला आरती और अभिषेक की विधियाँ प्रारंभ होती हैं। दिन में भगवती को विशेष अन्न भोग और स्थानीय प्रसिद्ध दुग्ध मिष्ठान माताबाड़ी पेड़ा अर्पित किया जाता है। दोपहर में भोग के पश्चात कुछ समय के लिए कपाट बंद रहते हैं तथा संध्या काल में पुनः शृंगार और महाआरती की जाती है।

प्रमुख पर्व

मंदिर का सबसे बड़ा और विख्यात उत्सव दीपावली मेला है। कार्तिक मास की अमावस्या को दीपोत्सव और काली पूजा के अवसर पर यहाँ विशाल मेले का आयोजन होता है, जिसमें देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु दीप प्रज्वलित कर माता के दर्शन करने पहुँचते हैं। इसके अतिरिक्त चैत्र व शारदीय नवरात्रि तथा शिवरात्रि पर भी विशेष अनुष्ठान संपन्न होते हैं।

इतिहास

वर्तमान मंदिर का निर्माण 1501 ईस्वी (1423 शक संवत) में त्रिपुरा के प्रतापी महाराजा धन्य माणिक्य द्वारा करवाया गया था। यह मंदिर स्थापत्य की दृष्टि से पारंपरिक मध्यकालीन बंगाली एक-रत्न चार-चाला शैली का अनूठा उदाहरण है, जिसमें चौकोर आधार और अर्धगोलाकार गुंबद विद्यमान है।

त्रिपुरा के ऐतिहासिक वृत्तांत राजमाला के अनुसार, महाराजा धन्य माणिक्य को स्वप्न में देवी का आदेश प्राप्त हुआ था कि चटगाँव पर्वतमाला से इस पवित्र पाषाण प्रतिमा को लाकर इस कूर्माकार टीले पर स्थापित किया जाए। राजा ने स्वप्नादेश का पालन करते हुए इस भव्य मंदिर की नींव रखी। वर्तमान में यह मंदिर माता त्रिपुर सुन्दरी ट्रस्ट तथा गोमती ज़िला प्रशासन की देखरेख में सुचारु रूप से संचालित होता है।

कैसे पहुँचें

वायु मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा अगरतला का महाराजा बीर बिक्रम विमानपत्तन है, जो मंदिर से लगभग 65 से 70 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। वहाँ से नियमित टैक्सियाँ और बसें उपलब्ध हैं।

रेल मार्ग: उदयपुर अब ब्रॉडगेज रेल सेवा से सीधे जुड़ा हुआ है। माताबाड़ी रेलवे स्टेशन (लगभग 2 किमी) और उदयपुर त्रिपुरा रेलवे स्टेशन (UDPU, लगभग 4 किमी) से अगरतला और पूर्वोत्तर के प्रमुख स्टेशनों के लिए सीधी रेल सुविधा उपलब्ध है।

सड़क मार्ग: अगरतला से उदयपुर के बीच पक्की राष्ट्रीय राजमार्ग सुविधा उपलब्ध है। अगरतला के नागेरजाला बस स्टैंड से नियमित अंतराल पर बसें, जीप और निजी गाड़ियाँ लगभग डेढ़ से दो घंटे में माताबाड़ी पहुँचा देती हैं।

दर्शन समय

मंदिर सामान्यतः प्रातः 5:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक और फिर अपराह्न 3:00 बजे से रात्रि 9:30 बजे तक दर्शनार्थियों के लिए खुला रहता है। दोपहर के भोग और विश्राम के समय कपाट अल्पकाल के लिए बंद किए जाते हैं। विशेष पर्वों पर दर्शन का समय बढ़ाया जाता है।

विशेष मान्यताएँ

कल्याण सागर में निवास करने वाले कछुओं को साक्षात कूर्मावतार का प्रतीक माना जाता है। किसी कछुए की स्वाभाविक मृत्यु होने पर मंदिर समिति द्वारा उसे पारंपरिक मर्यादा के साथ समाधि दी जाती है। मान्यता है कि सच्चे मन से माँ त्रिपुर सुन्दरी के चरणों में प्रार्थना करने पर साधक की मानसिक अशांति दूर होती है और गृहस्थ जीवन में सुख-समृद्धि का वास होता है।

आध्यात्मिक संदेश

माँ त्रिपुर सुन्दरी का यह पावन धाम हमें प्रकृति और परमात्मा के अद्वैत संबंध की सीख देता है। कूर्म पीठ की स्थिरता आत्म-संयम का प्रतीक है, सरोवर के जीव प्रकृति के प्रति करुणा का पाठ पढ़ाते हैं, और भगवती त्रिपुर सुन्दरी का सौम्य रूप यह स्मरण कराता है कि परम शक्ति समस्त सृष्टि में मातृभाव से व्याप्त है।

पूछे जाने वाले प्रश्न

त्रिपुर सुन्दरी शक्तिपीठ में सती का कौन सा अंग गिरा था?
पीठनिर्णय ग्रंथ के अनुसार यहाँ माता सती का दायाँ पैर (दक्षिण पाद) गिरा था।
माताबाड़ी मंदिर का निर्माण किस राजा ने करवाया था?
इस मंदिर का निर्माण 1501 ईस्वी में त्रिपुरा के महाराजा धन्य माणिक्य द्वारा करवाया गया था।
इस शक्तिपीठ को कूर्म पीठ क्यों कहा जाता है?
जिस पहाड़ी पर यह मंदिर स्थित है, उसका प्राकृतिक आकार कछुए (कूर्म) की पीठ के समान है, इसलिए इसे कूर्म पीठ कहते हैं।
मंदिर परिसर के प्रसिद्ध सरोवर का क्या नाम है?
मंदिर के पूर्व दिशा में स्थित पावन सरोवर को कल्याण सागर कहा जाता है, जिसमें पवित्र कछुए और मछलियाँ निवास करती हैं।
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