सनातन शक्ति साधना में इक्यावन शक्तिपीठों का स्थान अत्यंत पावन माना गया है। देवीभागवत और प्राचीन तंत्र ग्रंथों के अनुसार, जहाँ-जहाँ भगवती सती के पावन अंग और आभूषण गिरे, वे स्थल शक्तिपीठ के रूप में पूजित हुए। मध्य भारत की पुण्य सलिला मंदाकिनी के पावन अंचल में स्थित रामगिरि शक्तिपीठ मातृभाव, वात्सल्य और दैवीय चेतना का परम केंद्र है।
परिचय
रामगिरि शक्तिपीठ सनातन परंपरा के प्रमुख ५१ शक्तिपीठों में से एक है। तंत्रचूड़ामणि के अनुसार, यह वह पावन पीठ है जहाँ भगवती सती का पावन स्तन अंग गिरा था। इस तीर्थ में जगज्जननी को माँ शिवानी के रूप में और भगवान शिव को चण्ड भैरव के रूप में पूजा जाता है।
इस शक्तिपीठ की पहचान मुख्य रूप से उत्तर प्रदेश और मध्य प्रदेश की सीमा पर स्थित पवित्र तीर्थ चित्रकूट (मंदाकिनी नदी तट / कामदगिरि क्षेत्र) से की जाती है। यहाँ प्रकृति की गोद में श्रद्धालु भगवती की ममतामयी कृपा का अनुभव करते हैं।
शक्तिपीठ बनने की कथा
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, प्रजापति दक्ष ने कनखल में एक विराट यज्ञ का आयोजन किया था। उस यज्ञ में उन्होंने देवाधिदेव महादेव और सती को आमंत्रित नहीं किया। अपने पिता द्वारा पति का घोर अपमान देखकर देवी सती ने यज्ञ की योगाग्नि में अपने प्राणों की आहुति दे दी।
जब भगवान शिव को इस दारुण घटना का भान हुआ, तो वे अत्यंत व्यथित हो उठे। उन्होंने सती के नश्वर शरीर को अपने कंधे पर धारण कर त्रैलोक्य में संहारक तांडव प्रारंभ किया। सृष्टि के संतुलन की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के अंगों को विलग किया। वे अंग जिन पवित्र भूमियों पर गिरे, वे स्थान शाश्वत शक्तिपीठ कहलाए।
सती का अंग/आभूषण
प्राचीन तंत्र ग्रंथ तन्त्रचूडामणि के अनुसार, रामगिरि पर्वत पर माता सती के स्तन (पारंपरिक मान्यता के अनुसार दायाँ स्तन) का निपात हुआ था।
शोणाख्या भद्रसेनस्तु नर्मदाख्ये नितम्बकः ।
रामगिरौ स्तनान्यञ्च शिवानी चण्डभैरवः ॥
स्तन मातृत्व, वात्सल्य, पोषण और अमृतमयी कृपा का प्रतीक है। इसलिए इस पीठ को साधक संतान-सुख, मातृ-कृपा और आंतरिक शांति प्रदान करने वाला पावन तीर्थ मानते हैं।
देवी का नाम
रामगिरि पीठ की अधिष्ठात्री महाशक्ति का नाम शिवानी है। ‘शिवानी’ का अर्थ है भगवान शिव की आल्हादिनी और कल्याणकारी पराशक्ति। चित्रकूट अंचल में स्थानीय श्रद्धालु माता को फूलमती देवी के स्वरूप में भी नमन करते हैं।
माँ शिवानी का स्वरूप अत्यंत शांत, सौम्य और वरदायिनी माना गया है, जो अपने भक्तों के समस्त भयों और संतापों का हरण करती हैं।
भैरव
प्रत्येक शक्तिपीठ की रक्षा के लिए भगवान शिव एक विशेष भैरव रूप में विराजमान रहते हैं। रामगिरि शक्तिपीठ के रक्षक भैरव चण्ड हैं।
तंत्र शास्त्र में भैरव साधना के बिना शक्ति उपासना को अधूरा माना गया है। चण्ड भैरव का स्मरण साधक को आंतरिक विकारों, नकारात्मक ऊर्जाओं और अकाल मृत्यु के भय से मुक्ति दिलाता है।
धार्मिक महत्व
रामगिरि शक्तिपीठ का धार्मिक महत्व प्रभु श्रीराम की तपोभूमि चित्रकूट से जुड़े होने के कारण और भी अधिक बढ़ जाता है। भगवान श्रीराम ने अपने वनवास काल के साढ़े ग्यारह वर्ष इसी तपोवन में व्यतीत किए थे।
यहाँ शक्ति और वैष्णव परंपरा का अद्भुत समन्वय देखने को मिलता है। मन्दाकिनी नदी में स्नान और कामदगिरि की परिक्रमा के साथ शक्ति स्वरूपा माँ शिवानी के दर्शन करने से कायिक, वाचिक और मानसिक पापों का शमन माना जाता है।
पूजा/दर्शन
रामगिरि शक्तिपीठ में दैनिक पूजन सात्विक और भक्तिभाव से संपन्न होता है। भक्त प्रातःकाल माता को पंचामृत, सुगंधित पुष्प, सिंदूर, चुनरी और मौसमी फल अर्पित करते हैं।
यहाँ विशेष रूप से श्रीसूक्त, दुर्गा सप्तशती और ललिता सहस्रनाम का पाठ अत्यंत फलदायी माना गया है। संध्या आरती के समय वातावरण दिव्य शंखध्वनि और दीपों के प्रकाश से आलौकिक हो उठता है।
प्रमुख पर्व
यहाँ चैत्र और शारदीय नवरात्रि अत्यंत उल्लास और श्रद्धा के साथ मनाए जाते हैं। नौ दिनों तक यहाँ शतचंडी पाठ, भजन-कीर्तन और अखंड ज्योति प्रज्वलित की जाती है।
इसके अतिरिक्त महाशिवरात्रि, रामनवमी, कार्तिक पूर्णिमा और सोमवती अमावस्या पर चित्रकूट धाम में लाखों श्रद्धालु एकत्र होते हैं और माँ शिवानी के साथ चण्ड भैरव का पूजन करते हैं।
इतिहास
साहित्यिक और ऐतिहासिक दृष्टि से ‘रामगिरि’ का उल्लेख अत्यंत प्राचीन है। महाकवि कालिदास ने अपने अमर खंडकाव्य ‘मेघदूत’ में ‘रामगिर्याश्रमेषु’ कहकर जिस पर्वत और आश्रम का वर्णन किया है, परंपरा उसे चित्रकूट पर्वत ही मानती है।
महर्षि वाल्मीकि रचित रामायण से लेकर मध्यकालीन संत तुलसीदास की रामचरितमानस तक, इस भूभाग की आध्यात्मिक गरिमा अनवरत बनी रही है। विभिन्न कालखंडों में स्थानीय राजाओं और संतों ने यहाँ के देवी मंदिरों का संरक्षण व संवर्धन किया।
कैसे पहुँचें
रेल मार्ग: निकटतम मुख्य रेलवे स्टेशन चित्रकूटधाम कर्वी (CKTD) है, जो उत्तर मध्य रेलवे के झांसी-माणिकपुर रेलमार्ग पर स्थित है। यह स्टेशन दिल्ली, प्रयागराज, कानपुर, लखनऊ और वाराणसी से नियमित ट्रेनों द्वारा जुड़ा हुआ है। स्टेशन से मंदिर परिसर हेतु ऑटो व टैक्सी उपलब्ध हैं।
सड़क मार्ग: चित्रकूट राष्ट्रीय और प्रांतीय राजमार्गों द्वारा प्रयागराज (लगभग १३० किमी), बांदा (लगभग ७० किमी), सतना (लगभग ७५ किमी) और झांसी (लगभग २६० किमी) से भली-भाँति जुड़ा है। इन नगरों से नियमित बस सेवाएँ सुलभ हैं।
वायु मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा चित्रकूट हवाई अड्डा है, जहाँ से सीमित उड़ानें संचालित होती हैं। इसके अलावा प्रयागराज (१३५ किमी) और खजुराहो (१७५ किमी) प्रमुख हवाई अड्डे हैं।
दर्शन समय
चित्रकूट अंचल के देवी मंदिरों में दर्शन सामान्यतः प्रातः ५:०० बजे से दोपहर १२:०० बजे तक और सायंकाल ४:०० बजे से रात्रि ९:०० बजे तक खुले रहते हैं।
दोपहर में भोग और विश्राम के लिए पट कुछ समय हेतु बंद रहते हैं। पर्व-त्योहारों एवं नवरात्रि के दिनों में मंदिर के कपाट दर्शनार्थियों की सुविधा हेतु दीर्घकाल तक खुले रहते हैं। यात्रा से पूर्व स्थानीय पुजारियों अथवा मंदिर समिति से समय की पुष्टि करना उचित रहता है।
विशेष मान्यताएँ
रामगिरि की भौगोलिक पहचान को लेकर लोकपरंपरा में दो प्रमुख केंद्र माने जाते हैं। एक ओर जहाँ बहुसंख्यक विद्वान चित्रकूट के शिवानी/फूलमती स्वरूप को तंत्रोक्त रामगिरि मानते हैं, वहीं दूसरी ओर मध्य प्रदेश के मैहर में त्रिकूट पर्वत पर स्थित माँ शारदा मंदिर को भी कई श्रद्धालु ५१ शक्तिपीठों से जोड़कर देखते हैं।
मान्यता है कि यहाँ सच्चे मन से की गई प्रार्थना से वात्सल्य सुख की प्राप्ति होती है और साधक को भगवती की अभय कृपा प्राप्त होती है।
आध्यात्मिक संदेश
रामगिरि शक्तिपीठ हमें यह शाश्वत संदेश देता है कि तपस्या और प्रकृति के सान्निध्य में ही चेतना का सर्वोच्च जागरण संभव है। भगवान शिव और शक्ति का यह एकात्म भाव जीवन में वैराग्य और दायित्व के बीच संतुलन बनाए रखने की प्रेरणा देता है।
यहाँ आकर भक्त अहंकार का त्याग कर परम जननी के चरणों में पूर्ण शरणागति का अनुभव करते हैं, जिससे अंतःकरण शुद्ध और शांत बनता है।



