Follow UsInstagram
Please login to save favourites.
श्री नलहाटी शक्तिपीठ: माँ नलाटेश्वरी मंदिर, इतिहास एवं दर्शन

श्री नलहाटी शक्तिपीठ: माँ नलाटेश्वरी मंदिर, इतिहास एवं दर्शन

पश्चिम बंगाल के पावन बीरभूम जनपद में स्थित श्री नलहाटी शक्तिपीठ सनातन शाक्त परंपरा का एक अत्यंत जाग्रत और श्रद्धेय तीर्थ है। एक सुरम्य टीले पर प्रतिष्ठित माँ नलाटेश्वरी का यह धाम बीरभूम के पवित्र शक्तिपीठ मंडल का अभिन्न अंग है, जहाँ देश भर से भक्तजन और साधक माँ के दर्शन हेतु पहुँचते हैं।

परिचय

श्री नलाटेश्वरी मंदिर नलहाटी नगर के एक शांत टीले पर स्थित है। यहाँ जगतजननी भगवती कालिका के रूप में और भगवान शिव योगीश भैरव के रूप में पूजे जाते हैं। प्राकृतिक वातावरण और प्राचीन शाक्त परंपरा से युक्त यह पावन धाम बीरभूम के अन्य प्रमुख पीठों के साथ मिलकर एक अत्यंत पवित्र साधना-क्षेत्र का निर्माण करता है।

शक्तिपीठ बनने की कथा

पौराणिक आख्यानों के अनुसार, राजा दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में अपने पति देवाधिदेव महादेव के अपमान से व्यथित होकर माता सती ने योगाग्नि में अपने देह का त्याग कर दिया था। भगवान शिव सती के पार्थिव शरीर को लेकर तांडव करने लगे, जिससे सृष्टि का संतुलन संकट में पड़ गया।

संसार की रक्षा और महादेव के वैराग्य को शांत करने हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी सती के नश्वर शरीर को इक्यावन भागों में विभक्त कर दिया। जिन-जिन पावन स्थानों पर भगवती के अंग और आभूषण गिरे, वे स्थान परम पवित्र शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हुए।

सती का अंग/आभूषण

शाक्त तंत्र के प्रामाणिक ग्रंथ तन्त्रचूडामणि के अनुसार, नलहाटी में माता सती के कंठ की ‘नला’ अर्थात् कंठ-नली या स्वर-नलिका का निपात हुआ था:

नलाहाट्यां नलापातो योगीशो भैरवस्तथा ।

तत्र सा कालिका देवी सर्वसिद्धिप्रदायिका ॥

गर्भगृह में देवी की विग्रह-पीठिका के समीप इस पावन कंठ-नली के प्रतीक रूप में पवित्र प्रस्तर शिला की पूजा की जाती है।

देवी का नाम

नलहाटी शक्तिपीठ की अधिष्ठात्री महाशक्ति का शास्त्रीय नाम ‘कालिका’ है। स्थानीय जनमानस और क्षेत्रीय परंपरा में भगवती को ‘माँ नलाटेश्वरी’ के नाम से श्रद्धापूर्वक पुकारा जाता है। गर्भगृह में माँ का विग्रह सिंदूर से मंडित है, जिसके त्रिनेत्र और स्वर्णिम जिह्वा भक्तों को अभय और ममता का संबल प्रदान करते हैं।

भैरव

इस शक्तिपीठ के रक्षक भैरव ‘योगीश’ हैं। तंत्र परंपरा में योगीश भैरव योग, ध्यान और आत्मसंयम के प्रतीक माने जाते हैं। शाक्त उपासना के नियमानुसार शक्ति की आराधना के साथ भैरव की पूजा अनिवार्य मानी गई है, जो साधक को निर्भयता प्रदान करती है।

धार्मिक महत्व

बीरभूम का शाक्त मंडल तारापीठ, बक्रेश्वर, नंदीपुर और नलहाटी जैसे महान शक्तिपीठों से सुशोभित है। कंठ और स्वर की अधिष्ठात्री स्थली होने के कारण नलहाटी शक्तिपीठ को वाक्-शक्ति और प्राण-ऊर्जा के जागरण का केंद्र माना जाता है। यहाँ नाम-संकीर्तन और भगवती के ध्यान से अंतःकरण को अपार शांति मिलती है।

पूजा/दर्शन

मंदिर में नित्य वैदिक एवं तांत्रिक दोनों परंपराओं के समन्वय से भगवती की आराधना की जाती है। वर्ष भर माँ की पूजा दक्षिणा काली के स्वरूप में होती है। गर्भगृह में दर्शन कर भक्तजन माँ को लाल पुष्प, चुनरी और मिष्ठान्न अर्पित करते हैं। मंदिर परिसर में भगवान श्री गणेश और देवाधिदेव महादेव के भी छोटे मंदिर विद्यमान हैं।

प्रमुख पर्व

यहाँ शारदीय दुर्गा पूजा और कार्तिक मास की काली पूजा अत्यंत भक्ति और उल्लास के साथ मनाई जाती है। इसके अतिरिक्त महाशिवरात्रि, बंगाली नववर्ष और गुप्त नवरात्र के अवसरों पर मंदिर में विशेष अभिषेक, हवन और संकीर्तन का आयोजन किया जाता है।

इतिहास

नलहाटी तीर्थ की प्राचीनता मध्यकालीन शाक्त साहित्य में वर्णित है। समय-समय पर स्थानीय भक्तों और क्षेत्रीय राजवंशों द्वारा मंदिर का जीर्णोद्धार कराया गया। वर्तमान मंदिर संरचना बीरभूम की पारंपरिक मंदिर स्थापत्य शैली को दर्शाती है, जिसे टीले के शिखर पर भव्य रूप से सहेजा गया है।

कैसे पहुँचें

रेल मार्ग: निकटतम रेलवे स्टेशन नलहाटी जंक्शन है, जो मंदिर से लगभग 2 से 3 किलोमीटर की दूरी पर है। हावड़ा-साहिबगंज मुख्य लाइन पर स्थित रामपुरहाट जंक्शन भी यहाँ से लगभग 16 किलोमीटर दूर है, जहाँ से नियमित ऑटो और टैक्सियाँ मिलती हैं।

सड़क मार्ग: नलहाटी नगर राज्य राजमार्गों के माध्यम से बोलपुर, रामपुरहाट, सूरी और तारापीठ से सुगमता से जुड़ा हुआ है।

वायु मार्ग: निकटतम प्रमुख हवाई अड्डा कोलकाता का नेताजी सुभाष चंद्र बोस अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा है, जो यहाँ से लगभग 230 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।

दर्शन समय

माँ नलाटेश्वरी मंदिर के कपाट प्रातः 5:30 बजे मंगला आरती के साथ खुलते हैं। दोपहर 1:00 बजे से 1:30 बजे के मध्य मध्याह्न अन्न भोग अर्पित किया जाता है। संध्या 7:00 बजे विशेष संध्या आरती संपन्न होती है, जिसके उपरांत रात्रि 8:30 बजे शयन आरती के बाद कपाट बंद कर दिए जाते हैं।

विशेष मान्यताएँ

श्रद्धालुओं का विश्वास है कि जो साधक यहाँ एकाग्र चित्त होकर माँ कालिका और योगीश भैरव का स्मरण करते हैं, उन्हें वाणी का संयम, मानसिक स्पष्टता और आध्यात्मिक प्रगति की प्राप्ति होती है। भक्त अपनी अंतरंग मनोकामनाओं की पूर्ति हेतु यहाँ आकर मौन प्रार्थना करते हैं।

आध्यात्मिक संदेश

नलहाटी शक्तिपीठ यह पावन संदेश देता है कि मानव की वाणी और श्वास ही भगवती का प्रत्यक्ष रूप हैं। अपनी वाणी को सत्य, मधुर और लोक-कल्याणकारी बनाना ही माँ नलाटेश्वरी की सच्ची आराधना है।

पूछे जाने वाले प्रश्न

नलहाटी शक्तिपीठ में माता सती का कौन-सा अंग गिरा था?
शास्त्रीय ग्रंथ तन्त्रचूडामणि के अनुसार यहाँ माता सती के कंठ की नला अर्थात् स्वर अथवा कंठ-नलिका का निपात हुआ था।
नलहाटी शक्तिपीठ की देवी और भैरव कौन हैं?
यहाँ की अधिष्ठात्री शक्ति देवी कालिका हैं जिन्हें स्थानीय रूप से माँ नलाटेश्वरी कहा जाता है और भैरव योगीश हैं।
माँ नलाटेश्वरी मंदिर में दर्शन और आरती का समय क्या है?
मंदिर सामान्यतः प्रातः 5:30 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक तथा दोपहर बाद से रात्रि 8:30 बजे तक खुला रहता है।
नलहाटी शक्तिपीठ का सबसे निकटतम रेलवे स्टेशन कौन-सा है?
निकटतम रेलवे स्टेशन नलहाटी जंक्शन है जो मंदिर परिसर से मात्र 2 से 3 किलोमीटर की दूरी पर स्थित है।
Please login to save favourites.