राजस्थान की तपोभूमि पुष्कर में स्थित श्री मणिवेदिका शक्तिपीठ सनातन शक्ति परम्परा का एक परम पावन केन्द्र है। तीर्थराज पुष्कर में जगत्पिता ब्रह्मा के पावन धाम और पवित्र पुष्कर सरोवर के समीप यह दिव्य पीठ स्थित है। इस पावन तीर्थ को शक्तिपीठ परम्परा में ‘मणिबन्ध शक्तिपीठ’ के नाम से भी श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है।
परिचय
श्री मणिवेदिका शक्तिपीठ राजस्थान के अजमेर जिले में स्थित प्रसिद्ध तीर्थ पुष्कर के निकट अरावली की पहाड़ियों में प्रतिष्ठित है। समस्त तीर्थों के गुरु माने जाने वाले पुष्कर क्षेत्र में स्थित होने के कारण इस पीठ का आध्यात्मिक प्रभाव अत्यन्त गहरा माना गया है। यहाँ भगवती की उपासना शान्ति, ज्ञान और अंतःकरण की शुद्धि प्रदान करने वाली कही गई है।
शक्तिपीठ बनने की कथा
पौराणिक उपाख्यान के अनुसार प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपने पति देवाधिदेव महादेव के अपमान से व्यथित होकर भगवती सती ने योगाग्नि में अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। सती के पार्थिव देह को लेकर जब भगवान शिव वैराग्य और वियोग में विचरण करने लगे, तब सृष्टि की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को इक्यावन भागों में विभक्त किया। जिन पावन स्थलों पर सती के अंग और आभूषण गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
सती का अंग/आभूषण
तन्त्र ग्रन्थों और पौराणिक मान्यताओं के अनुसार तीर्थराज पुष्कर की इस पवित्र भूमि पर भगवती सती के दोनों हाथों की कलाइयाँ (मणिबन्ध) अथवा मणियों से जड़े कंगन गिरे थे। कलाई और मणिजड़ित कंकण गिरने के कारण ही इस तीर्थ का नाम मणिवेदिका अथवा मणिबन्ध पड़ा।
देवी का नाम
तन्त्रचूडामणि के अनुसार इस शक्तिपीठ में अधिष्ठात्री शक्ति को देवी ‘गायत्री’ के नाम से पूजा जाता है। स्थानीय परम्परा में इस पीठ को माँ चामुंडा तथा श्री राजराजेश्वरी पुरुहूता स्वरूप में भी नमन किया जाता है।
स्थाणुर्नाम्ना च सावित्री देवता मणिवेदके ।
मणिबन्धे च गायत्री सर्वानन्दस्तु भैरवः ॥
भैरव
मणिवेदिका शक्तिपीठ में भगवती के रक्षक भैरव को ‘सर्वानन्द’ (शर्वानन्द) स्वरूप में पूजा जाता है। भैरव सर्वानन्द भक्तों के भय का हरण कर उन्हें समस्त प्रकार के आनन्द और अभय का वरदान प्रदान करते हैं।
धार्मिक महत्व
पुष्कर क्षेत्र में एक ओर रत्नागिरि पहाड़ी पर माँ सावित्री का मन्दिर प्रतिष्ठित है, तो दूसरी ओर गायत्री पहाड़ी और उसकी तलहटी में भगवती गायत्री का यह शक्तिपीठ विद्यमान है। सनातन मान्यता के अनुसार पुष्कर सरोवर में स्नान, ब्रह्मा जी के पूजन और मणिवेदिका शक्तिपीठ में भगवती के दर्शन से तीर्थ यात्रा पूर्ण मानी जाती है।
पूजा/दर्शन
इस शक्तिपीठ में श्रद्धालु प्रातःकाल और सायंकाल माता की नियमित आरती, कुंकुम अर्चन और दुर्गा सप्तशती के पाठ के साथ पूजन करते हैं। साधक यहाँ गायत्री मन्त्र के अनुष्ठान और भगवती के ध्यान द्वारा आत्मिक बल प्राप्त करते हैं।
प्रमुख पर्व
यहाँ चैत्र और शारदीय दोनों नवरात्र अत्यन्त श्रद्धा और हर्षोल्लास से मनाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त कार्तिक शुक्ल एकादशी से लेकर कार्तिक पूर्णिमा तक चलने वाले पुष्कर मेले के दौरान देश-विदेश से लाखों श्रद्धालु सरोवर स्नान के उपरान्त भगवती के दर्शन हेतु आते हैं।
इतिहास
मणिवेदिका शक्तिपीठ का उल्लेख प्राचीन तन्त्र ग्रन्थों जैसे तन्त्रचूडामणि और शिवचरित्र में मिलता है। ऐतिहासिक दृष्टि से पुष्कर युगों से ऋषि-मुनियों की तपोभूमि रहा है। समय-समय पर स्थानीय भक्तों, राजाओं और तीर्थयात्रियों द्वारा मन्दिर परिसर का जीर्णोद्धार और संरक्षण किया गया।
कैसे पहुँचें
निकटतम रेलवे स्टेशन अजमेर जंक्शन है, जो यहाँ से लगभग ११ से १५ किलोमीटर की दूरी पर स्थित है। अजमेर से पुष्कर के लिए नियमित बस, टैक्सी और ऑटो सेवा उपलब्ध रहती है। निकटतम हवाई अड्डा जयपुर अन्तरराष्ट्रीय हवाई अड्डा है, जो पुष्कर से लगभग १५० किलोमीटर दूर है।
दर्शन समय
मन्दिर में दर्शन सामान्यतः प्रातः ६:०० बजे से दोपहर १२:०० बजे तक और सायंकाल ४:३० बजे से रात्रि ९:०० बजे तक खुले रहते हैं। प्रमुख पर्वों और नवरात्र के दिनों में दर्शन के समय में विस्तार रहता है।
विशेष मान्यताएँ
भक्तों का विश्वास है कि यहाँ देवी गायत्री के सम्मुख श्रद्धापूर्वक शीश नवाने से बुद्धि में शुद्धि और जीवन में समरसता आती है। पुष्कर में गायत्री मन्त्र की साधना को अक्षय फलदायी माना गया है।
आध्यात्मिक संदेश
मणिवेदिका शक्तिपीठ हमें सिखाता है कि शक्ति और ज्ञान का समन्वय ही मुक्ति का मार्ग है। जहाँ ब्रह्मा जी की तपोस्थली ज्ञान और सृजन का प्रतीक है, वहीं भगवती गायत्री का यह शक्तिपीठ जीवन में चेतना, तेज और नैतिक शक्ति का संचार करता है।



