दक्षिण भारत की पुण्यमयी नगरी कांचीपुरम में स्थित श्री कांची शक्तिपीठ सनातन परंपरा के परम पावन तीर्थों में अग्रगण्य है। यहाँ जगन्माता श्री ललिता महा त्रिपुर सुंदरी माँ कामाक्षी के रूप में भक्तों को वात्सल्य और शांति प्रदान करती हैं।
परिचय
तमिलनाडु के ऐतिहासिक नगर कांचीपुरम में प्रतिष्ठित कामाक्षी अम्मन मंदिर दक्षिण भारत का अत्यंत पूजनीय शाक्त केंद्र है। कांची नगर को प्राचीन काल से ही ‘मोक्षपुरी’ की संज्ञा दी गई है। यह पावन तीर्थ शिवकांची, विष्णुकांची और जैनकांची के सांस्कृतिक संगम के रूप में प्रसिद्ध रहा है। इस संपूर्ण तीर्थ क्षेत्र के केंद्र में माँ कामाक्षी का दिव्य धाम स्थित है, जहाँ जगद्गुरु आदि शंकराचार्य द्वारा प्रतिष्ठित श्रीचक्र की नित्य आराधना की जाती है।
शक्तिपीठ बनने की कथा
पौराणिक आख्यानों के अनुसार जब प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपने पति देवाधिदेव महादेव का अपमान देखकर सती ने योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए, तब भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर व्यथित मन से ब्रह्मांड में विचरण करने लगे। सृष्टि के संतुलन की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को विभक्त किया। जिन-जिन स्थानों पर सती के अंग और आभूषण गिरे, वे स्थान परम पवित्र शक्तिपीठ कहलाए।
सती का अंग/आभूषण
तंत्रचूड़ामणि एवं पीठनिर्णय जैसे शास्त्रीय ग्रंथों के अनुसार कांची क्षेत्र में भगवती सती का कंकाल (अस्थि-पंजर) गिरा था। वहीं दक्षिण भारत की क्षेत्रीय शाक्त परंपरा तथा स्थल पुराणों में इस पावन स्थान को देवी के नाभि-स्थान अथवा ओड्डियाण पीठ (कमरबंध) से भी संबद्ध माना जाता है।
देवी का नाम
शास्त्रीय पीठ ग्रंथों में यहाँ की अधिष्ठात्री शक्ति को देवगर्भा नाम से संबोधित किया गया है। वहीं living tradition और मंदिर की उपासना परंपरा में भगवती को कामाक्षी तथा श्री ललिता महा त्रिपुर सुंदरी के नाम से पूजा जाता है। इनके नेत्रों से कृपा और करुणा की अजस्र धारा प्रवाहित होती है।
भैरव
शास्त्रीय तंत्र परंपरा के अनुसार कांची शक्तिपीठ के रक्षक भैरव रुरु हैं। वहीं मंदिर परिसर में क्षेत्रपाल के रूप में कालभैरव की प्रतिष्ठा है, जो संपूर्ण तीर्थ की रक्षा करते हैं।
धार्मिक महत्व
कांची पीठ श्रीविद्या उपासना का प्रधान केंद्र माना जाता है। कांचीपुरम नगर के स्थापत्य की विशिष्टता है कि यहाँ के अन्य प्राचीन शिव मंदिरों, जैसे एकाम्रेश्वरर मंदिर, में देवी का कोई पृथक गर्भगृह नहीं है। मान्यता है कि संपूर्ण कांची की मूल शक्ति माँ कामाक्षी में ही समाहित है। इस मंदिर परिसर में १०८ वैष्णव दिव्य देशों में परिगणित ‘तिरुक्कलवानूर’ (कल्ल पेरुमाल) का पावन सन्निधि भी है, जो शैव, शाक्त और वैष्णव समन्वय का अनुपम उदाहरण है।
सौंदर्य लहरी में आदि शंकराचार्य ने माँ के दिव्य स्वरूप का वर्णन करते हुए कहा है:
सुधासिन्धोर्मध्ये सुरविटपिवाटीपरिवृते मणिद्वीपे नीपोपवनवति चिन्तामणिगृहे।
शिवाकारे मञ्चे परमशिवपर्यङ्कनिलयां भजन्ति त्वां धन्याः कतिचन चिदानन्दलहरीम्॥
पूजा/दर्शन
मंदिर के गर्भगृह को ‘गायत्री मंडप’ कहा जाता है। यहाँ माँ कामाक्षी पद्मासन मुद्रा में विराजित हैं। चतुर्भुज देवी अपने हाथों में इक्षु-धनुष (गन्ने का धनुष), पंच-बाण, पाश और अंकुश धारण किए हुए हैं। गर्भगृह में देवी के सम्मुख प्रतिष्ठित श्रीचक्र पर ही मुख्य कुंकुमार्चन और अभिषेक संपन्न किया जाता है।
प्रमुख पर्व
मंदिर में प्रतिवर्ष मासी माह (फरवरी-मार्च) में वार्षिक ब्रह्मोत्सव अत्यंत श्रद्धा और उल्लास से मनाया जाता है। इसके अतिरिक्त शारदीय नवरात्रि, वसंतोत्सव, चित्रा पूर्णिमा तथा प्रत्येक माह की पूर्णिमा एवं शुक्रवार को विशेष पूजा-अर्चना आयोजित होती है।
इतिहास
कांचीपुरम का इतिहास पल्लव, चोल और विजयनगर राजवंशों के गौरव से जुड़ा हुआ है। इन राजाओं ने मंदिर के भव्य गोपुरम, मंडप और प्राकार का विस्तार किया। जगद्गुरु आदि शंकराचार्य ने यहाँ श्रीचक्र की स्थापना कर देवी के उग्र रूप को शांत एवं करुणामयी स्वरूप में प्रतिष्ठित किया, जिससे यह स्थल कामकोटि पीठ के रूप में विश्वविख्यात हुआ।
कैसे पहुँचें
कांचीपुरम तमिलनाडु की राजधानी चेन्नई से लगभग ७५ किलोमीटर दक्षिण-पश्चिम में स्थित है। चेन्नई अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा यहाँ का निकटतम हवाई केंद्र है। कांचीपुरम रेलवे स्टेशन चेन्नई, तिरुपति, वेल्लोर और बेंगलुरु से रेल मार्गों द्वारा जुड़ा है। साथ ही तमिलनाडु राज्य परिवहन की बसें सभी प्रमुख नगरों से निरंतर उपलब्ध हैं।
दर्शन समय
मंदिर सामान्यतः प्रातः ५:३० बजे से दोपहर १२:१५ बजे तक तथा सायंकाल ४:०० बजे से रात्रि ८:१५ बजे तक दर्शन के लिए खुला रहता है। शुक्रवार, पूर्णिमा और उत्सवों के दिनों में समय में परिवर्तन संभव है। श्रद्धालु अद्यतन समय के लिए श्री कामाक्षी अम्बल देवस्थानम की आधिकारिक वेबसाइट देख सकते हैं।
विशेष मान्यताएँ
मान्यता के अनुसार ‘कामाक्षी’ नाम में ‘क’ कार ज्ञानमयी सरस्वती का और ‘म’ कार ऐश्वर्यमयी लक्ष्मी का प्रतीक है, जो देवी के दोनों नेत्रों में समाहित होकर उनकी सेवा करती हैं। श्रद्धालु मानते हैं कि यहाँ माँ कामाक्षी के सम्मुख शांत चित्त से प्रार्थना करने पर अंतःकरण को दिव्य शांति और ज्ञान की प्राप्ति होती है।
आध्यात्मिक संदेश
माँ कामाक्षी का स्वरूप साधक को कामनाओं के नियंत्रण और आत्म-साक्षात्कार का मार्ग दिखाता है। उनके कर-कमलों के पाश और अंकुश मन के संयम तथा ज्ञान के अनुशीलन का संदेश देते हैं। भगवती का वात्सल्यमय दर्शन जीव को संसार की नश्वरता से परे परमानंद की ओर उन्मुख करता है।



