सनातन धर्म की पावन शाक्त परंपरा में इक्यावन शक्तिपीठों को दिव्य चेतना और भक्ति का सर्वोच्च केंद्र माना गया है। पूर्वोत्तर भारत की सुरम्य जयंतिया पहाड़ियों और ऐतिहासिक क्षेत्र में स्थित श्री जयंती शक्तिपीठ भगवती सती के पावन अंग-निपात से जुड़ा अत्यंत पवित्र तीर्थ है।
परिचय
जयंती शक्तिपीठ प्राचीन काल से ही तंत्र साधना, मातृ-उपासना और असीम श्रद्धा का पावन धाम रहा है। यह तीर्थ स्थल ऐतिहासिक जैन्तिया राज्य की भूमि से जुड़ा हुआ है। वर्तमान समय में इस शक्तिपीठ की मुख्य आराधना मेघालय के पश्चिम जयंतिया हिल्स जिले में स्थित नर्तियांग दुर्गा मंदिर में जीवंत रूप से प्रचलित है, जबकि इसकी ऐतिहासिक स्मृति सीमा पार बांग्लादेश के सिलहट स्थित जैन्त्यापुर क्षेत्र से भी जुड़ी है।
शक्तिपीठ बनने की कथा
पौराणिक आख्यानों के अनुसार जब प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपने पति देवाधिदेव महादेव के अपमान से आहत होकर माता सती ने योगाग्नि में अपने प्राणों की आहुति दे दी, तब भगवान शिव अत्यंत व्यथित हो गए। वे सती के पार्थिव शरीर को कंधे पर धारण कर ब्रह्मांड में विचरण करने लगे।
सृष्टि के संतुलन की रक्षा और भगवान शिव के वैराग्य को शांत करने के लिए भगवान श्रीहरि विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के पार्थिव शरीर के विभिन्न अंग विभक्त किए। जहाँ-जहाँ ये पावन अंग और आभूषण गिरे, वे स्थान भूतल पर परम सिद्ध शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
सती का अंग/आभूषण
शास्त्रीय तंत्र ग्रंथ पीठनिर्णय एवं तन्त्रचूड़ामणि के प्रमाणों के अनुसार, जयंती क्षेत्र में माता सती की वाम जंघा अर्थात बाईं जांघ का निपात हुआ था। पावन अंग के गिरने से यह संपूर्ण क्षेत्र मातृ-कृपा की ऊर्जा से अभिसिंचित हो गया।
देवी का नाम
इस शक्तिपीठ की अधिष्ठात्री महाशक्ति को देवी जयंती के नाम से पूजा जाता है। स्थानीय परंपरा और लोक-श्रद्धा में भगवती को माँ जैन्तेश्वरी और दुर्गा स्वरूप में आदरपूर्वक नमन किया जाता है। माता का यह रूप भक्तों को विजय, अभय और समस्त पाप-तापों से मुक्ति प्रदान करने वाला है।
भैरव
प्रत्येक शक्तिपीठ की भांति यहाँ भी भगवती की रक्षा हेतु भगवान शिव भैरव रूप में विराजमान हैं। जयंती शक्तिपीठ के अधिष्ठाता भैरव भगवान क्रमादीश्वर (क्षेत्रीय उच्चारण में कामादीश्वर) कहलाते हैं। शक्ति और शिव का यह युगल स्वरूप साधक को ज्ञान और वैराग्य प्रदान करता है।
धार्मिक महत्व
शाक्त उपासना में जयंती शक्तिपीठ को आत्मबल, धर्म-रक्षा और आंतरिक संशयों के निवारण का मुख्य केंद्र माना गया है। मान्यता है कि यहाँ श्रद्धापूर्वक शीश नवाने से साधक के जीवन में अधर्म का नाश होता है और सत्य के मार्ग पर चलने की आध्यात्मिक शक्ति प्राप्त होती है।
पूजा/दर्शन
मेघालय के नर्तियांग स्थित मंदिर में दैनिक सेवा-अर्चना वैदिक शाक्त विधि और स्थानीय परंपरा के समन्वय से संपन्न होती है। श्रद्धालु माता के विग्रह और पावन वेदी का दर्शन कर पुष्प, फल, धूप और दीप अर्पित करते हैं। यहाँ शांति और भक्तिमय वातावरण में जप व ध्यान का विशेष फल माना जाता है।
प्रमुख पर्व
यहाँ शारदीय नवरात्र और दुर्गा पूजा का पर्व अत्यंत उल्लास और गरिमा के साथ मनाया जाता है। इस अवसर पर केले के पौधे को विशिष्ट वस्त्रों व आभूषणों से सुसज्जित कर भगवती के रूप में प्रतिष्ठापित करने की अनूठी परंपरा है। उत्सव के अंत में पवित्र मिन्तु नदी में विसर्जन किया जाता है। इसके अतिरिक्त वासंतिक नवरात्र और शिवरात्रि पर भी विशेष अनुष्ठान होते हैं।
इतिहास
ऐतिहासिक रूप से जैन्तिया राज्य का विस्तार मेघालय की पहाड़ियों से लेकर सिलहट के समतल भूभाग तक था। राजाओं की ग्रीष्मकालीन राजधानी नर्तियांग थी और शीतकालीन केंद्र जैन्त्यापुर (अब सिलहट, बांग्लादेश) था। लगभग पाँच से छह शताब्दियों पूर्व निर्मित नर्तियांग का यह दुर्गा मंदिर जैन्तिया नरेशों की शाक्त निष्ठा का अनुपम प्रमाण है। वर्ष 1947 के विभाजन के बाद इस पीठ की ऐतिहासिक स्मृति दोनों क्षेत्रों में विभाजित हो गई।
कैसे पहुँचें
वायु मार्ग: निकटतम हवाई अड्डा उमरोई (शिलांग) लगभग 65 किलोमीटर दूर है। प्रमुख राष्ट्रीय उड़ानों के लिए लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (गुवाहाटी) लगभग 150 किलोमीटर की दूरी पर है।
रेल मार्ग: निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन गुवाहाटी रेलवे जंक्शन है। वहाँ से नर्तियांग के लिए टैक्सी और सड़क वाहन सुलभ हैं।
सड़क मार्ग: शिलांग (लगभग 65 किमी) और जोवाई (लगभग 24 किमी) से नर्तियांग के लिए नियमित रूप से वाहन उपलब्ध रहते हैं।
दर्शन समय
नर्तियांग दुर्गा मंदिर सामान्यतः प्रतिदिन प्रातः 6:00 बजे से सायं 6:00 बजे तक दर्शनार्थियों के लिए खुला रहता है। नवरात्र और विशेष पर्वों के दिनों में पूजा के अनुसार समय में परिवर्तन संभव है।
विशेष मान्यताएँ
मंदिर परिसर के निकट ही नर्तियांग के विश्वप्रसिद्ध विशाल प्रस्तर स्तंभ (मोनोलिथ) स्थित हैं, जिन्हें प्राचीन राजाओं ने ऐतिहासिक स्मृतियों के रूप में स्थापित किया था। लोक-आस्था है कि इस क्षेत्र में माता जैन्तेश्वरी सदैव अपनी संतानों की रक्षा करती हैं और सच्चे मन से की गई प्रार्थना यहाँ कभी व्यर्थ नहीं जाती।
आध्यात्मिक संदेश
जयंती शक्तिपीठ का पावन संदेश है कि जीवन के प्रत्येक संघर्ष में धर्म और सत्य का ही विजय पथ है। माता जयंती का स्मरण हमें सिखाता है कि समस्त भौतिक आसक्तियों से परे ईश्वर की शरण में समर्पित होना ही परम शांति और मोक्ष का साधन है।



