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श्री हरसिद्धि शक्तिपीठ, उज्जैन

श्री हरसिद्धि शक्तिपीठ, उज्जैन

मध्य प्रदेश के पावन तीर्थ उज्जैन (प्राचीन अवन्तिका) में रुद्र सागर के सुरम्य तट पर श्री हरसिद्धि शक्तिपीठ प्रतिष्ठित है। देवाधिदेव भगवान महाकाल के पावन वन क्षेत्र में स्थित यह दिव्य धाम शैव और शाक्त उपासना के अत्यंत पावन संगम का प्रतीक है।

परिचय

श्री हरसिद्धि माता मन्दिर 51 पावन शक्तिपीठों में अत्यंत प्रतिष्ठित स्थल है। यह महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग से लगभग 500 मीटर की दूरी पर स्थित है। गर्भगृह में सिन्दूर-लेपित हरसिद्धि माता के साथ भगवती महालक्ष्मी, महासरस्वती और भगवती अन्नपूर्णा के स्वरूप विराजित हैं। मन्दिर के विशाल प्रांगण में स्थापित दो गगनचुंबी मराठा-कालीन दीपस्तम्भ यहाँ की अनुपम पहचान हैं।

शक्तिपीठ बनने की कथा

पौराणिक आख्यानों के अनुसार, प्रजापति दक्ष के यज्ञकुण्ड में भगवती सती के देहत्याग के उपरांत भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर व्यथित मन से ब्रह्माण्ड में भ्रमण करने लगे। संसार को महाप्रलय से बचाने और शिवजी के वैराग्य को शान्त करने के उद्देश्य से भगवान श्रीहरि विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से भगवती के पार्थिव स्वरूप को विभिन्न भागों में विभक्त किया। जिन-जिन पवित्र स्थलों पर माता के अंग व आभूषण गिरे, वे स्थान परम पावन शक्तिपीठ के रूप में पूजित हुए।

उज्जयिन्यां कूर्परं व मांगल्य कपिलाम्बरः।

भैरवः सिद्धिदः साक्षात् देवी मंगल चण्डिका।

सती का अंग/आभूषण

पारम्परिक तन्त्र ग्रन्थ पीठनिर्णय एवं शास्त्रीय मान्यताओं के अनुसार उज्जयिनी के इस पावन स्थल पर देवी सती का ‘कूर्पर’ अर्थात दाहिनी कोहनी का पतन हुआ था। इसी कारण यहाँ भगवती के कूर्पर स्वरूप की विशेष अर्चना होती है।

देवी का नाम

तन्त्रग्रन्थों के अनुसार इस शक्तिपीठ की अधिष्ठात्री देवी भगवती मंगल चण्डिका (मङ्गलचण्डिका) हैं। वहीं स्कन्द पुराण के अवन्तीक्षेत्र माहात्म्य के अनुसार, चण्ड और प्रचण्ड नामक दुष्ट असुरों का संहार करने पर भगवान शिव ने भगवती चण्डी को ‘हरसिद्धि’ की संज्ञा प्रदान की थी, जिसका अर्थ है शिव के मनोरथ को सिद्ध करने वाली करुणामयी शक्ति।

भैरव

उज्जयिनी शक्तिपीठ के रक्षक भैरव माङ्गल्य कपिलाम्बर (कपिलाम्बर) के रूप में जाने जाते हैं। पीठनिर्णय में कहा गया है कि यहाँ कपिलाम्बर भैरव की उपस्थिति से यह पावन क्षेत्र साधकों को सिद्धि और रक्षा प्रदान करता है।

धार्मिक महत्व

हरसिद्धि शक्तिपीठ को तंत्र, मंत्र और भक्ति साधना की त्रिवेणी माना जाता है। गर्भगृह में मुख्य पीठ पर पवित्र श्रीयंत्र प्रतिष्ठित है, जिसकी वैदिक एवं तांत्रिक दोनों पद्धतियों से नित्य विधिवत पूजा की जाती है। यह पीठ भक्तों को सर्वकल्याण, आरोग्य और आध्यात्मिक चेतना प्रदान करने वाला माना गया है।

पूजा/दर्शन

मन्दिर में प्रातःकालीन और सायं कालीन आरती का विशेष विधान है। सामान्य दर्शन प्रातः से रात्रि तक सुलभ रहते हैं। सायं आरती के समय जब मन्दिर प्रांगण के दोनों विशाल दीपस्तम्भों को प्रज्वलित किया जाता है, तब सम्पूर्ण परिसर स्वर्णिम आभा से जगमगा उठता है। श्रद्धालु यहाँ माता को कुंकुम, सिन्दूर, लाल चुनरी और श्रीफल अर्पित करते हैं।

प्रमुख पर्व

यहाँ चैत्र एवं शारदीय नवरात्र अत्यंत श्रद्धा और उल्लास के साथ मनाए जाते हैं। नवरात्र की नवमी तिथि पर विशेष महापूजा का विधान है। इसके अतिरिक्त महाशिवरात्रि और सावन मास के सोमवारों पर महाकाल दर्शन के साथ हरसिद्धि दर्शन हेतु लाखों श्रद्धालु उमड़ते हैं।

इतिहास

वर्तमान मन्दिर की संरचना में मराठा स्थापत्य कला का भव्य रूप दिखाई देता है। 18वीं शताब्दी में मराठा काल के दौरान मन्दिर परिसर का भव्य जीर्णोद्धार किया गया था। मन्दिर प्रांगण में एक प्राचीन बावड़ी भी स्थित है। लोक-परम्परा में यह भी सुविख्यात है कि न्यायप्रिय सम्राट विक्रमादित्य भगवती हरसिद्धि को अपनी इष्टदेवी के रूप में नित्य पूजते थे।

कैसे पहुँचें

यह पावन तीर्थ उज्जैन जिला प्रशासन के आधिकारिक पर्यटन स्थलों में प्रमुख रूप से सम्मिलित है। उज्जैन जंक्शन रेलवे स्टेशन से मन्दिर की दूरी मात्र 2.5 किमी है, जहाँ से ई-रिक्शा व ऑटो सुलभ हैं। महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग से श्रद्धालु पैदल ही यहाँ पहुँच सकते हैं। निकटतम हवाई अड्डा देवी अहिल्याबाई होल्कर हवाई अड्डा, इंदौर है, जो लगभग 55 किमी दूर है।

दर्शन समय

मन्दिर सामान्यतः प्रातः 5:00 बजे से रात्रि 9:30 बजे तक खुला रहता है। प्रातःकालीन आरती 5:30 से 6:00 बजे और भव्य सन्ध्या आरती सायं 7:00 से 7:30 बजे सम्पन्न होती है। पर्वों के दौरान दर्शन समय में विस्तार किया जाता है।

विशेष मान्यताएँ

मान्यता है कि हरसिद्धि माता के दरबार में सच्चे हृदय से की गई प्रार्थना कभी निष्फल नहीं होती। मन्दिर के दीपस्तम्भों में दीप प्रज्वलित कराने से जीवन के अज्ञान रूपी अंधकार का नाश होता है और कुल में सुख-समृद्धि की वृद्धि होती है।

आध्यात्मिक संदेश

हरसिद्धि शक्तिपीठ हमें यह पावन संदेश देता है कि दैवीय शक्ति सर्वदा सत्य और धर्म की रक्षा के लिए तत्पर रहती है। जब मनुष्य अहंकार और विकार रूपी चण्ड-प्रचण्ड असुरों से घिर जाता है, तब भगवती की शरणागति ही उसे आत्मिक शान्ति और मुक्ति का मार्ग दिखाती है।

पूछे जाने वाले प्रश्न

हरसिद्धि शक्तिपीठ में माता सती का कौन-सा अंग गिरा था?
पौराणिक व तन्त्र ग्रन्थों के अनुसार यहाँ माता सती का कूर्पर अर्थात कोहनी का पतन हुआ था।
उज्जयिनी शक्तिपीठ की अधिष्ठात्री देवी और भैरव का नाम क्या है?
यहाँ की अधिष्ठात्री शक्ति देवी मंगल चण्डिका हैं और रक्षक भैरव माङ्गल्य कपिलाम्बर हैं।
मन्दिर के प्रांगण में बने विशाल दीपस्तम्भों का क्या महत्व है?
ये दीपस्तम्भ मराठा कालीन स्थापत्य के अनुपम प्रतीक हैं जिन्हें सन्ध्या आरती व नवरात्र में दीपों से आलोकित किया जाता है।
महाकालेश्वर मन्दिर से हरसिद्धि मन्दिर की दूरी कितनी है?
हरसिद्धि मन्दिर महाकालेश्वर ज्योतिर्लिंग से लगभग 500 से 600 मीटर की दूरी पर स्थित है जिसे पैदल तय किया जा सकता है।
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