हरियाणा के पावन धर्मक्षेत्र कुरुक्षेत्र में स्थित श्री देवीकूप भद्रकाली शक्तिपीठ सनातन परंपरा के 51 सिद्ध शक्तिपीठों में अत्यंत प्रतिष्ठित है। कुरुक्षेत्र के ऐतिहासिक नगर थानेसर में झांसा मार्ग पर स्थित यह तीर्थस्थल देवीकूप, सावित्री पीठ और माँ भद्रकाली शक्तिपीठ के नाम से प्रसिद्ध है।
परिचय
श्री देवीकूप भद्रकाली मंदिर हरियाणा का एकमात्र शक्तिपीठ माना जाता है। यह दिव्य धाम कुरुक्षेत्र के ऐतिहासिक 48 कोस तीर्थ परिक्रमा क्षेत्र में समाहित है। मंदिर परिसर में एक प्राचीन पवित्र कूप विद्यमान है, जिसे देवीकूप कहा जाता है।
इसी पावन कूप के ऊपर श्वेत संगमरमर का एक भव्य कमल-पुष्प प्रतिष्ठित है, जिस पर भगवती के पावन चरण-चिह्न सुशोभित हैं। मंदिर में देवी माँ भद्रकाली के शांत और करुणामयी स्वरूप की नित्य आराधना होती है।
शक्तिपीठ बनने की कथा
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, प्रजापति दक्ष ने एक महायज्ञ का आयोजन किया था, जिसमें उन्होंने देवाधिदेव भगवान शिव और अपनी पुत्री सती को आमंत्रित नहीं किया। अपने पति के प्रति पिता के अपमानजनक व्यवहार से व्यथित होकर माता सती ने यज्ञ की योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए।
सती के देहत्याग से विह्वल होकर भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर संपूर्ण ब्रह्मांड में तांडव करने लगे। सृष्टि के संतुलन की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के पार्थिव शरीर को इक्यावन भागों में विभक्त कर दिया। जहाँ-जहाँ सती के अंग और आभूषण गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
सती का अंग/आभूषण
धार्मिक ग्रंथों एवं शक्तिपीठ परंपरा के अनुसार, कुरुक्षेत्र के इस पावन स्थल पर माता सती का दायाँ टखना अर्थात गुल्फ गिरा था।
जिस पावन कूप में सती का गुल्फ प्रतिष्ठित हुआ, वही स्थल कालांतर में देवीकूप कहलाया। वर्तमान में गर्भगृह में स्थापित संगमरमर के कमल पर अंकित चरण-चिह्न इसी दिव्य अंग के प्रतीक रूप में पूजे जाते हैं।
देवी का नाम
तंत्र चूड़ामणि और प्राचीन शक्तिग्रंथों में इस पीठ की अधिष्ठात्री महाशक्ति का नाम सावित्री वर्णित है।
स्थानीय लोक परंपरा और उत्तर भारत की भक्ति परंपरा में भक्तजन भगवती को माँ भद्रकाली या कालिका के नाम से श्रद्धापूर्वक पूजते हैं।
भैरव
प्रत्येक शक्तिपीठ की भांति यहाँ भी शक्ति के साथ भगवान शिव भैरव रूप में विराजमान हैं। इस पीठ के अधिष्ठाता भैरव को स्थाणु कहा जाता है।
स्थाणु भैरव का संबंध कुरुक्षेत्र के प्रसिद्ध स्थानेश्वर महादेव मंदिर से भी माना जाता है। मान्यता है कि शक्तिपीठ की यात्रा स्थाणु भैरव के स्मरण के बिना पूर्ण नहीं होती।
धार्मिक महत्व
श्री देवीकूप शक्तिपीठ का धार्मिक महत्व महाभारत काल से जुड़ा हुआ है। मान्यता है कि महाभारत के धर्मयुद्ध से पूर्व भगवान श्रीकृष्ण और पांडवों ने विजय की कामना से यहाँ माँ भद्रकाली की स्तुति की थी।
जनश्रुति के अनुसार भगवान श्रीकृष्ण और उनके बड़े भाई बलराम का प्रथम मुंडन संस्कार भी इसी पावन तीर्थ पर संपन्न हुआ था। इस कारण यह स्थान कुलपरंपरा के धार्मिक संस्कारों के लिए विशेष फलदायी माना गया है।
पूजा/दर्शन
मंदिर में नित्य प्रातः और संध्या काल में विधिवत पंचोपचार व षोडशोपचार पूजन और दिव्य आरती संपन्न होती है। श्रद्धालु गर्भगृह में स्थित देवी के चरण-चिह्नों के दर्शन कर नतमस्तक होते हैं।
यहाँ भक्तजन नारियल, चुनरी, फल और मिष्ठान्न अर्पित कर भगवती की कृपा प्राप्त करते हैं। मंदिर परिसर में अत्यंत शांत और सात्विक वातावरण रहता है, जो ध्यान और साधना के अनुकूल है।
प्रमुख पर्व
यहाँ चैत्र और शारदीय दोनों नवरात्र अत्यंत श्रद्धा एवं उल्लास के साथ मनाए जाते हैं। नवरात्र के नौ दिनों में दूर-दूर से लाखों श्रद्धालु माता के दर्शन हेतु आते हैं।
प्रत्येक शनिवार को भी मंदिर में भक्तों का विशाल जमघट होता है। इसके अतिरिक्त श्रीकृष्ण जन्माष्टमी और महाशिवरात्रि पर भी विशेष अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।
इतिहास
कुरुक्षेत्र और थानेसर का इतिहास वैदिक काल से निरंतर समृद्ध रहा है। देवीकूप का उल्लेख विभिन्न पुराणों और मध्यकालीन यात्रा वृत्तांतों में धर्मक्षेत्र के प्रमुख तीर्थ के रूप में मिलता है।
वर्तमान मंदिर का भव्य स्वरूप श्री देवीकूप भद्रकाली मंदिर ट्रस्ट के संरक्षण और श्रद्धालु समाज के सहयोग से निर्मित हुआ है, जो सनातन वास्तुकला की गरिमा को दर्शाता है।
कैसे पहुँचें
रेल मार्ग: कुरुक्षेत्र जंक्शन रेलवे स्टेशन दिल्ली-अमृतसर मुख्य लाइन पर स्थित है। रेलवे स्टेशन से झांसा रोड पर स्थित मंदिर की दूरी लगभग 4 किलोमीटर है। स्टेशन से ऑटो-रिक्शा और ई-रिक्शा सुलभता से उपलब्ध हैं।
सड़क मार्ग: राष्ट्रीय राजमार्ग 44 पर स्थित पिपली बस स्टैंड से मंदिर लगभग 8 किलोमीटर दूर है। दिल्ली से कुरुक्षेत्र की दूरी लगभग 160 किलोमीटर और चंडीगढ़ से लगभग 85 किलोमीटर है।
वायु मार्ग: निकटतम घरेलू हवाई अड्डा चंडीगढ़ में (लगभग 85 किमी) और अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा नई दिल्ली में (लगभग 170 किमी) स्थित है।
दर्शन समय
मंदिर ट्रस्ट की व्यवस्था के अनुसार दर्शन का समय ग्रीष्म और शीत ऋतु के आधार पर निर्धारित है।
ग्रीष्मकाल में मंदिर प्रातः 5:30 बजे से रात्रि 8:00 बजे तक खुला रहता है। शीतकाल में दर्शन का समय प्रातः 6:00 बजे से सायं 7:30 बजे तक रहता है। शनिवार तथा नवरात्र के पावन पर्वों पर दर्शन रात्रि 8:30 बजे तक किए जा सकते हैं।
विशेष मान्यताएँ
इस शक्तिपीठ की सबसे अनूठी परंपरा मन्नत पूरी होने पर घोड़े अर्पित करने की है। मान्यता के अनुसार महाभारत युद्ध में विजयी होने पर पांडवों ने माँ को अपने श्रेष्ठ अश्व भेंट किए थे।
उसी परंपरा का पालन करते हुए आज भी श्रद्धालु अपनी मन्नत पूर्ण होने पर मिट्टी, टेराकोटा, पीतल अथवा चाँदी के छोटे घोड़े मंदिर में अर्पित करते हैं। इसके अतिरिक्त बच्चों के मुंडन संस्कार के लिए भी यह तीर्थ अत्यंत पवित्र माना जाता है।
आध्यात्मिक संदेश
माँ भद्रकाली का यह पावन धाम हमें धर्म, सत्य और समर्पण के मार्ग पर चलने की प्रेरणा देता है। महाभारत की कथा हमें सिखाती है कि शक्ति का संबल तभी प्राप्त होता है जब कर्म धर्मसंगत हो।
अश्व अर्पण की परंपरा मन के चंचल विचारों और अहंकार को देवी के चरणों में समर्पित करने का आध्यात्मिक प्रतीक है।



