सनातन धर्म की पावन शाक्त परंपरा में इक्यावन शक्तिपीठों का स्थान अत्यंत विशिष्ट और कल्याणकारी माना गया है। इनमें भैरवपर्वत शक्तिपीठ भगवती सती के पावन अंग के निपात और शिव-शक्ति के शाश्वत संबंध का जाग्रत केंद्र है।
परिचय
भैरवपर्वत शक्तिपीठ तन्त्र ग्रंथों में वर्णित एक अत्यंत पवित्र तीर्थ है। तंत्रग्रंथ ‘तन्त्रचूडामणि’ के अनुसार यहाँ भगवती सती का ऊपरी होंठ गिरा था। इस स्थान पर शक्ति ‘अवन्ती’ तथा भैरव ‘लम्बकर्ण’ के रूप में प्रतिष्ठित हैं। भौगोलिक दृष्टि से इसका मुख्य संबंध प्राचीन अवन्तिका नगरी अर्थात वर्तमान उज्जैन (मध्य प्रदेश) के शिप्रा नदी तटवर्ती भैरवगढ़ क्षेत्र से माना जाता है, जबकि एक अन्य परंपरा में गुजरात के गिरनार पर्वत की भैरव पहाड़ी का भी उल्लेख मिलता है।
शक्तिपीठ बनने की कथा
पौराणिक उपाख्यानों के अनुसार प्रजापति दक्ष द्वारा आयोजित महायज्ञ में भगवान शिव का अपमान सहन न कर पाने के कारण माता सती ने योगाग्नि में अपने प्राणों की आहुति दे दी थी। सती के पार्थिव शरीर को लेकर जब व्यथित भगवान शिव ने ब्रह्मांड में तांडव आरंभ किया, तब सृष्टि के संतुलन और शिवजी के वैराग्य को शांत करने हेतु भगवान श्रीहरि विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को इक्यावन भागों में विभक्त कर दिया। जिन-जिन स्थानों पर भगवती के पावन अंग और आभूषण गिरे, वे स्थान परम जाग्रत शक्तिपीठ कहलाए।
सती का अंग/आभूषण
तन्त्रचूडामणि के पीठनिर्णय श्लोक के अनुसार भैरवपर्वत पर माता सती का ऊर्ध्वोष्ठ अर्थात ऊपरी होंठ गिरा था। वाक् और अभिव्यक्ति के इस पावन अंश के पतन से यह भूमि दिव्य ऊर्जा से प्रतिष्ठित हुई।
देवी का नाम
इस शक्तिपीठ में विराजित भगवती को अवन्ती (महादेवी) के नाम से पूजा जाता है। अवन्ती नाम इस बात का प्रमाण माना जाता है कि इस पीठ का केंद्रीय स्वरूप प्राचीन अवन्तिका नगरी से अभिन्न है।
भैरव
प्रत्येक शक्तिपीठ की भांति यहाँ भी शक्ति के संरक्षक के रूप में भगवान शिव प्रतिष्ठित हैं। भैरवपर्वत पीठ के अधिष्ठाता भैरव लम्बकर्ण हैं, जिनकी वंदना शक्ति के साथ अनिवार्य रूप से की जाती है।
धार्मिक महत्व
भैरवपर्वत शक्तिपीठ साधकों के लिए तपोभूमि और शक्ति की कृपा प्राप्ति का पावन धाम है। मुखांग के रूप में माता का ऊपरी होंठ यहाँ प्रतिष्ठित होने के कारण यह वाणी की पवित्रता, सत्य-निष्ठा और आत्मिक शुद्धि की प्रेरणा देने वाला तीर्थ माना जाता है। उज्जैन की पावन शिप्रा धारा इस स्थान के माहात्म्य को और अधिक दिव्य बनाती है।
पूजा/दर्शन
उज्जैन के भैरवगढ़ क्षेत्र में स्थित माँ गढ़कालिका मन्दिर और निकटवर्ती भैरव टीले पर श्रद्धालु नित्य श्रद्धाभाव से माता की पूजा-अर्चना करते हैं। यहाँ देवी को कुंकुम, पुष्प, नारियल और चुनरी अर्पित की जाती है। भक्तगण प्रातः और सांध्य आरती में सम्मिलित होकर भगवती अवन्ती और लम्बकर्ण भैरव का ध्यान करते हैं।
प्रमुख पर्व
यहाँ चैत्र और शारदीय दोनों नवरात्र अत्यंत श्रद्धा एवं उल्लास के साथ मनाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त महाशिवरात्रि और भैरव अष्टमी के अवसर पर भी विशेष पूजन एवं अभिषेक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।
इतिहास
ऐतिहासिक और शास्त्रीय दृष्टि से अवन्तिका शाक्त, शैव और वैष्णव उपासना का प्राचीन संगम रही है। प्राचीन काल से ही शिप्रा के उत्तरी क्षेत्र में स्थित भैरवगढ़ और कालिका टीला सिद्धपीठ के रूप में विख्यात रहा है। यद्यपि मन्दिरों के स्थापत्य में समय-समय पर जीर्णोद्धार हुए हैं, किन्तु इस क्षेत्र की शक्तिपीठ के रूप में मान्यता सदियों पुरानी है।
कैसे पहुँचें
उज्जैन देश के सभी प्रमुख नगरों से रेल मार्ग द्वारा भलीभाँति जुड़ा हुआ है। उज्जैन जंक्शन से भैरवगढ़ क्षेत्र लगभग 5 किलोमीटर की दूरी पर है। वायु मार्ग से आने वाले श्रद्धालुओं के लिए निकटतम हवाई अड्डा इंदौर स्थित देवी अहिल्याबाई होल्कर विमानतल है, जो यहाँ से लगभग 55 किलोमीटर दूर है। अधिक प्रशासनिक विवरण हेतु श्रद्धालु जिला प्रशासन उज्जैन पर्यटन पोर्टल का अवलोकन कर सकते हैं।
दर्शन समय
सामान्य दिनों में गढ़कालिका और भैरवगढ़ क्षेत्र के मन्दिरों में दर्शन प्रातः 6:00 बजे से रात्रि 9:30 बजे तक सुलभ रहते हैं। प्रातःकालीन आरती 6:30 बजे और सांध्य आरती लगभग 7:30 बजे संपन्न होती है। पर्व-त्योहारों के अवसर पर दर्शन के समय में विस्तार रहता है।
विशेष मान्यताएँ
स्थानीय परंपरा के अनुसार उज्जैन में दो पृथक शक्तिपीठ विद्यमान हैं—रुद्रसागर के तट पर स्थित माँ हरसिद्धि मन्दिर (जहाँ माता की कोहनी गिरी थी) और भैरवगढ़ क्षेत्र स्थित भैरवपर्वत पीठ (जहाँ माता का ऊपरी होंठ गिरा था)। तंत्र ग्रंथों में ‘अवन्ती’ नाम का स्पष्ट उल्लेख होने के कारण अधिकांश मनीषी भैरवपर्वत की पहचान उज्जैन के इसी पावन अंचल से करते हैं।
आध्यात्मिक संदेश
भैरवपर्वत शक्तिपीठ हमें यह आध्यात्मिक संदेश देता है कि वाक् और सत्य ही धर्म का सर्वोच्च स्वरूप हैं। भगवती अवन्ती और लम्बकर्ण भैरव की आराधना साधक के चित्त को शांत कर उसमें सत्य, संयम और भक्ति का संचार करती है।



