पश्चिम बंगाल के बीरभूम जनपद में लाभपुर के सुरम्य अंचल में प्रतिष्ठित माँ फुल्लरा का पावन धाम ही शाक्त परम्परा में अट्टहास शक्तिपीठ के नाम से वन्दनीय है। शांत ग्रामीण परिवेश, प्राकृतिक वृक्ष-कुंज और समीप प्रवाहित होने वाली ईशान नदी के तट पर स्थित यह तीर्थ शक्ति-उपासकों के लिए गहन साधना और अंतर्मुखी श्रद्धा का पावन केंद्र है।
परिचय
अट्टहास शक्तिपीठ बावन शक्तिपीठों में अत्यंत प्रतिष्ठित स्थल है, जिसे स्थानीय स्तर पर माँ फुल्लरा तला अथवा फुलरा मंदिर कहा जाता है। बीरभूम की पावन भूमि पर स्थित यह तीर्थस्थल अपनी नैसर्गिक शांति और प्राचीन तांत्रिक महत्व के लिए विख्यात है। यहाँ आने वाले भक्त शांत चित्त से माँ की कृपा और आदिशक्ति के वरदान की अनुभूति करते हैं।
शक्तिपीठ बनने की कथा
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपने पति महादेव का अपमान देखकर सती ने योगाग्नि में प्राण त्याग दिए, तब भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर वैराग्य भाव से सम्पूर्ण ब्रह्मांड में भ्रमण करने लगे। शिव के इस विलाप से सृष्टि के क्रम को संकट में देखकर भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से सती के शरीर को इक्यावन अंगों में विभक्त किया। जिन-जिन स्थानों पर भगवती के पावन अंग और आभूषण गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
सती का अंग/आभूषण
पीठनिर्णय तन्त्र और अन्य प्रामाणिक शाक्त ग्रन्थों के अनुसार अट्टहास पीठ में माता सती का अधरोष्ठ यानी निचला होंठ गिरा था। भगवती का यह दिव्य अंग वाणी, सत्य और वाक्सिद्धि की प्रेरणा प्रदान करने वाला माना जाता है।
देवी का नाम
यहाँ प्रतिष्ठित अधिष्ठात्री शक्ति को माँ फुल्लरा के नाम से जाना जाता है। फुल्लरा का अर्थ प्रफुल्लित, प्रसन्नचित्त अथवा पूर्ण विकसित पुष्प के समान दैवीय तेज से परिपूर्ण स्वरूप है, जो अपने शरणागत भक्तों के जीवन के समस्त संतापों को हर लेती हैं।
भैरव
प्रत्येक शक्तिपीठ की भांति यहाँ भी माँ के साथ भैरव की नित्य उपस्थिति है। अट्टहास धाम के रक्षक भैरव देवाधिदेव महादेव विश्वेश अथवा विश्वेश्वर के रूप में पूजे जाते हैं। तन्त्र ग्रन्थ पीठनिर्णय में इसका स्पष्ट उल्लेख है:
अट्टहासे चोष्ठपातो देवी सा फुल्लरा स्मृता ।
विश्वेशो भैरवस्तत्र सर्वाभीष्टप्रदायकः ॥
धार्मिक महत्व
अट्टहास शक्तिपीठ वाक् शुद्धि, साधना सिद्धि और अंतःकरण की पवित्रता के लिए विशेष रूप से वंदनीय है। शाक्त मत में यह मान्यता है कि देवी के इस पावन अधरोष्ठ स्थल पर श्रद्धापूर्वक नमन करने से व्यक्ति की वाणी निर्मल होती है और उसे भय एवं अज्ञान से मुक्ति प्राप्त होती है।
पूजा/दर्शन
मंदिर के गर्भगृह में किसी मानवाकार पाषाण अथवा धातु की मूर्ति की स्थापना नहीं है। यहाँ लगभग पंद्रह से अठारह फीट चौड़ी एक विशाल प्राकृतिक शिला को सिन्दूर से विभूषित कर देवी के अधरोष्ठ स्वरूप मानकर पूजा जाता है। गर्भगृह के निकट ही भगवान विश्वेश का पृथक शिव मंदिर अवस्थित है, जहाँ भक्त शिव-शक्ति दोनों की अर्चना सम्पन्न करते हैं।
प्रमुख पर्व
यहाँ प्रतिवर्ष माघ पूर्णिमा के पावन अवसर पर दस दिवसीय प्रसिद्ध फुल्लरा मेला आयोजित होता है, जिसमें दूर-दूर से श्रद्धालु सम्मिलित होते हैं। इसके साथ ही शारदीय एवं वासंतिक नवरात्रि, श्री दुर्गा पूजा और महाशिवरात्रि पर यहाँ विशेष पूजा-अर्चना और कीर्तन का आयोजन किया जाता है।
इतिहास
अट्टहास का उल्लेख प्राचीन तांत्रिक संहिताओं और मध्यकालीन मंगलकाव्यों में मिलता है। यह स्थल सदियों से बीरभूम के शाक्त परिपथ का अभिन्न अंग रहा है। वर्तमान मंदिर परिसर का निर्माण और जीर्णोद्धार स्थानीय श्रद्धालुओं तथा भक्तों की श्रद्धा द्वारा समय-समय पर कराया गया है।
कैसे पहुँचें
अट्टहास शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के बीरभूम ज़िले में लाभपुर कस्बे के समीप स्थित है। निकटतम रेलवे स्टेशन लाभपुर है, जबकि प्रमुख जंक्शन अहमदपुर और बोलपुर-शान्तिनिकेतन लगभग तीस किलोमीटर की दूरी पर स्थित हैं। कोलकाता से सड़क मार्ग द्वारा अथवा रेल मार्ग द्वारा यहाँ सुगमता से पहुँचा जा सकता है।
दर्शन समय
सामान्य दिनों में मंदिर के पट प्रातः 6:00 बजे खुलते हैं और दोपहर में भोग के पश्चात कुछ समय के लिए विश्राम हेतु बंद होते हैं। अपराह्न पश्चात् मंदिर पुनः खुलता है और रात्रि लगभग 8:30 बजे शयन आरती के बाद पट बंद कर दिए जाते हैं। पर्व-त्योहारों पर समय में परिवर्तन संभव है।
विशेष मान्यताएँ
मंदिर के समीप ही एक प्राचीन सरोवर स्थित है। जनश्रुति और रामायण की स्थानीय लोकगाथाओं के अनुसार, त्रेतायुग में लंका युद्ध से पूर्व जब प्रभु श्रीराम ने माँ दुर्गा का अकाल-बोधन किया था, तब पवनपुत्र हनुमान ने देवी पूजा के लिए एक सौ आठ नीलकमल इसी पावन सरोवर से संचित किए थे।
आध्यात्मिक संदेश
संस्कृत में अट्टहास का अर्थ भगवती का वह दिव्य और गंभीर हास्य है जो अज्ञान, भ्रम और अंधकार का संहार करता है। माँ फुल्लरा हमें जीवन की विषमताओं के मध्य भी आंतरिक प्रसन्नता और शिव-शक्ति के प्रति पूर्ण समर्पण का संदेश देती हैं।



