श्री पर्वत शक्तिपीठ (Shri Parvat Shaktipeeth) सनातन शक्ति उपासना की परंपरा में एक अत्यंत पावन और श्रद्धास्पद तीर्थ है। शाक्त परंपरा के अनुसार, जब भगवान शिव सती के पार्थिव शरीर को लेकर ब्रह्मांड में विचरण कर रहे थे, तब सृष्टि के संतुलन की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने सुदर्शन चक्र से देवी के अंगों को विभक्त किया था। जिन-जिन पवित्र स्थलों पर माता के अंग और आभूषण गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हुए।
परिचय
श्री पर्वत शक्तिपीठ आदिपराशक्ति के करुणामयी और सुंदर स्वरूप को समर्पित तीर्थ है। तंत्र ग्रंथों में इस पीठ का उल्लेख साधना, ध्यान और आध्यात्मिक स्थिरता प्रदान करने वाले केंद्र के रूप में मिलता है। यहाँ देवी की उपासना जीवन के कल्याण और आत्मिक शांति के लिए की जाती है।
शक्तिपीठ बनने की कथा
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, प्रजापति दक्ष के यज्ञ में पति का अपमान देखकर माता सती ने योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए थे। सती के वियोग में भगवान शिव उनके पावन शरीर को लेकर विलाप करते हुए तीनों लोकों में भ्रमण करने लगे। इस स्थिति से संसार को संकटमुक्त करने के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र का प्रयोग कर सती के शरीर को विभक्त किया। इस दैवीय प्रक्रिया में श्री पर्वत क्षेत्र पर भी माता का एक पावन भाग अवतरित हुआ।
सती का अंग/आभूषण
प्रमाणिक तंत्र ग्रंथ तंत्रचूड़ामणि के ‘पीठनिर्णय’ के अनुसार श्री पर्वत पर माता सती का दक्षगुल्फ अर्थात दायाँ टखना या दाहिनी एड़ी गिरी थी। कुछ परंपराओं में इसे श्रद्धापूर्वक दाहिने चरण का नूपुर (पायल) भी माना जाता है।
देवी का नाम
इस शक्तिपीठ की अधिष्ठात्री देवी को माँ श्री सुन्दरी (Devi Shri Sundari) के नाम से पूजा जाता है। वे सौंदर्य, सौम्यता, दया और मोक्ष प्रदान करने वाली पराशक्ति का पावन विग्रह हैं।
भैरव
श्री पर्वत शक्तिपीठ के संरक्षक भैरव सुंदरानंद (Bhairava Sundarananda) हैं। शक्ति और भैरव का यह पावन युगल साधकों को निर्भयता और आंतरिक संतुलन प्रदान करता है।
धार्मिक महत्व
श्री पर्वत शक्तिपीठ पर ध्यान, जप और अर्चना करने से साधक को दैवीय कृपा प्राप्त होती है। तंत्र और पुराणों में इस क्षेत्र को तपस्या तथा आत्मज्ञान के लिए अत्यंत अनुकूल भूमि माना गया है।
पूजा/दर्शन
इस पीठ पर माँ भगवती की अर्चना कुंकुम, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित कर की जाती है। भक्त यहाँ ललिता सहस्रनाम, दुर्गा सप्तशती और शक्ति मंत्रों का श्रद्धापूर्वक पाठ करते हैं।
प्रमुख पर्व
यहाँ चैत्र और शारदीय नवरात्र अत्यंत भक्तिभाव से मनाए जाते हैं। इसके अतिरिक्त महाशिवरात्रि के पावन पर्व पर भी शक्ति और भैरव की विशेष पूजा-अर्चना संपन्न की जाती है।
इतिहास
प्राचीन संस्कृत वाङ्मय, महाभारत और ऐतिहासिक अभिलेखों में ‘श्रीपर्वत’ नाम मुख्य रूप से नल्लामला पर्वतमाला पर स्थित श्रीशैलम (आंध्र प्रदेश) के लिए प्रयुक्त हुआ है। इतिहासकार और शोधकर्ता इसी ऐतिहासिक तीर्थ को इस पीठ का शास्त्रीय आधार मानते हैं, जबकि लोकपरंपराओं में हिमालयी क्षेत्रों में भी इसकी आराधना की जाती है।
कैसे पहुँचें
ऐतिहासिक श्रीपर्वत (श्रीशैलम) क्षेत्र पहुँचने के लिए निकटतम प्रमुख रेलवे स्टेशन मारकापुर रोड और कर्नूल हैं। हैदराबाद का राजीव गांधी अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा यहाँ का निकटतम हवाई अड्डा है, जहाँ से सड़क मार्ग द्वारा आसानी से पहुँचा जा सकता है।
दर्शन समय
श्रीशैलम देवस्थानम में सामान्यतः प्रातः 04:30 बजे से रात्रि 10:00 बजे तक विभिन्न पूजाओं और दर्शन की व्यवस्था रहती है। दोपहर में कुछ समय के लिए विशेष अनुष्ठानों के कारण सामान्य दर्शन विराम रहता है।
विशेष मान्यताएँ
भक्तों का विश्वास है कि माँ श्री सुन्दरी के स्मरण मात्र से मन का भय और संशय दूर होता है। जीवन में आध्यात्मिक प्रगति और पारिवारिक शांति के लिए यहाँ निष्काम भाव से प्रार्थना की जाती है।
आध्यात्मिक संदेश
श्री पर्वत शक्तिपीठ हमें यह सिखाता है कि बाह्य आकर्षणों से परे आत्मा का दिव्य सौंदर्य ही वास्तविक सत्य है। शक्ति की शरणागति से साधक के अंतःकरण में पवित्रता और वैराग्य का उदय होता है।



