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जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा

जीवित्पुत्रिका व्रत को जितिया या जिउतिया व्रत भी कहा जाता है। यह व्रत माताएँ अपनी संतान की दीर्घायु, आरोग्य और मंगल की कामना से करती हैं। इस व्रत से जुड़ी राजा जीमूतवाहन की कथा त्याग, करुणा और प्राण-रक्षा का अत्यंत सुंदर संदेश देती है।

जीवित्पुत्रिका व्रत की कथा

प्राचीन काल में गंधर्वों के कुल में जीमूतवाहन नाम के एक धर्मात्मा और दयालु राजकुमार हुए। वे राज्य और वैभव से अधिक अपने माता-पिता की सेवा तथा जीवों के कल्याण को महत्त्व देते थे।

कुछ समय बाद उन्होंने राजपाट का मोह त्याग दिया और अपने माता-पिता के साथ वन में रहने लगे।

जीमूतवाहन का हृदय अत्यंत करुणामय था। किसी भी प्राणी को दुःख में देखकर वे उसकी सहायता के लिए तत्पर हो जाते थे।

वृद्ध नाग माता का विलाप

एक दिन जीमूतवाहन वन में भ्रमण कर रहे थे। तभी उन्हें समुद्र तट के निकट किसी स्त्री के रोने की आवाज सुनाई दी।

उन्होंने वहाँ जाकर देखा तो एक वृद्ध माता अत्यंत दुःखी होकर विलाप कर रही थी।

जीमूतवाहन ने उससे पूछा—

“माता! आप इतना दुःखी क्यों हैं? आपके इस विलाप का कारण क्या है?”

वृद्धा ने बताया कि वह नागवंश की है और उसका पुत्र शंखचूड़ आज गरुड़ के भोजन के लिए भेजा जाने वाला है।

उसने बताया कि गरुड़ के भय के कारण नागों ने यह व्यवस्था स्वीकार कर ली थी कि निश्चित समय पर नागकुल से एक नाग उनके भोजन के लिए भेजा जाएगा।

उस दिन वृद्धा के पुत्र शंखचूड़ की बारी थी।

अपने पुत्र को खोने के दुःख में वह माता अत्यंत व्याकुल थी।

जीमूतवाहन ने लिया महान संकल्प

वृद्ध माता का दुःख देखकर जीमूतवाहन का हृदय द्रवित हो उठा।

उन्होंने मन ही मन निश्चय किया कि यदि उनके प्राणों के बदले इस माता के पुत्र का जीवन बच सकता है, तो वे अपने प्राणों का त्याग करने से भी पीछे नहीं हटेंगे।

उन्होंने वृद्धा से कहा—

“माता, आज आपके पुत्र के स्थान पर मैं स्वयं जाऊँगा। आपका पुत्र जीवित रहेगा।”

वृद्धा यह सुनकर आश्चर्यचकित हो गई और उन्हें रोकने लगी, लेकिन जीमूतवाहन अपने संकल्प पर दृढ़ रहे।

जीमूतवाहन वध्य-शिला पर बैठे

जीमूतवाहन उस स्थान पर पहुँचे जहाँ नाग को गरुड़ के भोजन के लिए छोड़ा जाता था।

वे स्वयं वध्य-शिला पर जाकर बैठ गए और गरुड़ की प्रतीक्षा करने लगे।

कुछ समय बाद आकाश में विशाल पंखों की ध्वनि सुनाई दी और पक्षीराज गरुड़ वहाँ पहुँचे।

गरुड़ ने जीमूतवाहन को नाग समझकर अपने पंजों में उठा लिया।

गरुड़ उन्हें घायल करने लगे, लेकिन जीमूतवाहन ने न तो भय प्रकट किया और न ही अपने प्राण बचाने का कोई प्रयास किया।

वे शांत रहे, क्योंकि उनके मन में केवल यही संतोष था कि उनके कारण एक माता का पुत्र जीवित रहेगा।

गरुड़ को हुआ आश्चर्य

जीमूतवाहन की सहनशीलता देखकर गरुड़ आश्चर्यचकित हो गए।

उन्होंने सोचा कि कोई साधारण नाग मृत्यु के सामने इतना शांत कैसे रह सकता है।

तभी शंखचूड़ वहाँ पहुँच गया और उसने गरुड़ से कहा—

“पक्षीराज! इन्हें छोड़ दीजिए। ये नाग नहीं हैं। ये धर्मात्मा जीमूतवाहन हैं, जिन्होंने मेरे प्राण बचाने के लिए स्वयं को आपके सामने प्रस्तुत कर दिया है।”

जीमूतवाहन के त्याग से बदला गरुड़ का हृदय

यह सुनकर गरुड़ अत्यंत आश्चर्यचकित हुए।

उन्होंने जीमूतवाहन से पूछा कि उन्होंने किसी अन्य जीव के लिए अपने प्राणों का त्याग करने का निर्णय क्यों लिया।

जीमूतवाहन ने उत्तर दिया—

“यदि मेरे जीवन के बदले किसी माता के पुत्र का जीवन बच सकता है, तो मेरे लिए इससे बड़ा पुण्य और क्या हो सकता है?”

जीमूतवाहन की करुणा, त्याग और निःस्वार्थ भावना देखकर गरुड़ का हृदय परिवर्तन हो गया।

उन्होंने जीमूतवाहन को छोड़ दिया और यह संकल्प लिया कि अब वे इस प्रकार नागों का वध नहीं करेंगे।

इस प्रकार जीमूतवाहन के त्याग से शंखचूड़ के प्राण बच गए और नागों को भी भय से मुक्ति मिली।

जीवित्पुत्रिका व्रत से कथा का संबंध

राजा जीमूतवाहन ने जिस प्रकार एक माता के पुत्र की रक्षा के लिए अपने प्राणों की भी चिंता नहीं की, उसी प्रकार जीवित्पुत्रिका व्रत में माताएँ अपनी संतान की दीर्घायु और रक्षा की कामना से कठिन व्रत करती हैं।

जीमूतवाहन की कथा मातृत्व, त्याग, करुणा और जीवन की रक्षा के महत्व को दर्शाती है।

चील और सियारिन की लोक-प्रचलित कथा

जीवित्पुत्रिका व्रत के साथ विशेष रूप से बिहार, झारखंड और पूर्वी उत्तर प्रदेश में चील और सियारिन की एक लोककथा भी प्रचलित है।

लोकमान्यता के अनुसार एक चील और एक सियारिन आपस में सखियाँ थीं। दोनों ने महिलाओं को जीवित्पुत्रिका व्रत करते देखा और स्वयं भी यह व्रत रखने का निश्चय किया।

चील ने पूरी श्रद्धा और नियमपूर्वक व्रत का पालन किया, लेकिन सियारिन भूख सहन नहीं कर सकी और उसने रात में छिपकर भोजन कर लिया।

लोककथा के अनुसार व्रत का नियमपूर्वक पालन करने वाली चील की संतानों का कल्याण हुआ, जबकि नियम तोड़ने वाली सियारिन को संतान से संबंधित दुःख सहना पड़ा।

ध्यान दें: चील और सियारिन की कथा क्षेत्रीय लोक-परंपरा में प्रचलित है और इसके अलग-अलग स्थानों पर कुछ भिन्न रूप सुनने को मिलते हैं।

जीवित्पुत्रिका व्रत कथा का संदेश

जीवित्पुत्रिका व्रत हमें यह संदेश देता है कि माता का अपनी संतान के प्रति प्रेम, त्याग और प्रार्थना अत्यंत पवित्र होती है।

राजा जीमूतवाहन की कथा हमें सिखाती है कि दूसरे प्राणी के जीवन की रक्षा करना और संकट में किसी की सहायता करना महान धर्म है।

करुणा से बड़ा कोई धर्म नहीं।

परोपकार से बड़ा कोई पुण्य नहीं।

और किसी प्राणी के जीवन की रक्षा करना श्रेष्ठ कर्म है।

जीमूतवाहन के त्याग से हमें करुणा मिले, माताओं के संकल्प से हमें श्रद्धा मिले और सभी संतानों पर प्रभु की कृपा एवं रक्षा बनी रहे।

॥ इति जीवित्पुत्रिका व्रत कथा ॥

जीवित्पुत्रिका व्रत क्या है?
जीवित्पुत्रिका व्रत, जिसे जितिया या जिउतिया भी कहा जाता है, माताएँ अपनी संतान की दीर्घायु, स्वास्थ्य और मंगल के लिए रखती हैं।
जीवित्पुत्रिका व्रत कब रखा जाता है?
यह व्रत सामान्यतः आश्विन मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी तिथि को रखा जाता है।
जीवित्पुत्रिका व्रत की मुख्य कथा किसकी है?
इस व्रत से राजा जीमूतवाहन, शंखचूड़ नाग और गरुड़ की कथा प्रमुख रूप से जुड़ी हुई है।
चील और सियारिन की कथा क्या है?
चील और सियारिन की कथा जीवित्पुत्रिका व्रत से जुड़ी एक लोकप्रिय लोककथा है, जो व्रत में श्रद्धा और नियम के महत्व को बताती है।
जीवित्पुत्रिका व्रत का उद्देश्य क्या है?
इस व्रत का मुख्य उद्देश्य संतान की दीर्घायु, सुरक्षा, स्वास्थ्य और कल्याण की कामना करना है।
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