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श्री गणेश चतुर्थी कथा

श्री गणेश चतुर्थी कथा

श्री गणेश चतुर्थी, जिसे विनायक चतुर्थी और गणेशोत्सव के नाम से भी जाना जाता है, भगवान श्री गणेश को समर्पित एक प्रमुख हिंदू पर्व है। यह पर्व भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को श्रद्धा और उत्साह के साथ मनाया जाता है। भगवान गणेश को बुद्धि, विवेक, शुभता और समृद्धि का देवता तथा विघ्नों का नाश करने वाला माना जाता है। इसी कारण किसी भी शुभ कार्य, पूजा या धार्मिक अनुष्ठान के आरंभ में सर्वप्रथम भगवान गणेश का स्मरण और पूजन करने की परंपरा है।

गणेश चतुर्थी पर घरों और सार्वजनिक स्थानों पर भगवान गणेश की प्रतिमा स्थापित कर विधिपूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है। विशेष रूप से महाराष्ट्र सहित भारत के अनेक क्षेत्रों में गणेशोत्सव अत्यंत भव्य रूप से मनाया जाता है। भक्त अपनी पारिवारिक और स्थानीय परंपरा के अनुसार भगवान गणेश की प्रतिमा का एक दिन, डेढ़ दिन, तीन दिन, पांच दिन, सात दिन अथवा अनंत चतुर्दशी तक पूजन करते हैं। इसके बाद श्रद्धापूर्वक गणेश विसर्जन किया जाता है।

गणेश चतुर्थी का महत्व

भगवान गणेश को विघ्नहर्ता, मंगलकर्ता, बुद्धि के दाता और गणों के अधिपति के रूप में पूजा जाता है। शिवपुराण में भगवान गणेश को अन्य देवताओं से पहले पूजे जाने का वरदान प्राप्त होने का वर्णन मिलता है। इसी कारण विवाह, गृह प्रवेश, यज्ञ, धार्मिक अनुष्ठान अथवा किसी नए कार्य के आरंभ में श्री गणेश का पूजन किया जाता है।

गणेश चतुर्थी का पर्व केवल भगवान गणेश के पूजन का अवसर ही नहीं है, बल्कि उनकी कथा हमें कर्तव्यनिष्ठा, माता-पिता के प्रति समर्पण, साहस और विवेक का संदेश भी देती है। भगवान गणेश ने माता पार्वती द्वारा दिए गए अपने कर्तव्य का पालन कठिन परिस्थितियों में भी नहीं छोड़ा। इसी दृढ़ता के कारण वे धर्म और कर्तव्य के आदर्श के रूप में भी पूजे जाते हैं।

श्री गणेश चतुर्थी की संपूर्ण कथा — शिवपुराण के अनुसार

शिवपुराण की रुद्रसंहिता के कुमार खंड में भगवान गणेश के प्राकट्य की विस्तृत कथा मिलती है। इस कथा के अनुसार माता पार्वती ने एक ऐसे सेवक की आवश्यकता अनुभव की जो केवल उनकी आज्ञा का पालन करे। इसी प्रसंग से भगवान गणेश के प्राकट्य की लीला आरंभ होती है।

माता पार्वती द्वारा बालक की उत्पत्ति

एक समय कैलाश पर्वत पर माता पार्वती अपनी सखियों के साथ थीं। उनकी सखियों जया और विजया ने माता से कहा कि भगवान शिव के सभी गण भगवान शिव की आज्ञा का पालन करते हैं, इसलिए माता के पास भी ऐसा कोई गण होना चाहिए जो विशेष रूप से उनकी आज्ञा का पालन करे।

कुछ समय बाद जब माता पार्वती स्नान करने जा रही थीं, तब उन्होंने अपने शरीर के उबटन और मैल से एक सुंदर और बलशाली बालक की रचना की। माता ने उसमें जीवन का संचार किया, उसे सुंदर वस्त्र और आभूषण पहनाए और स्नेहपूर्वक अपने पुत्र के रूप में स्वीकार किया।

माता पार्वती ने बालक से कहा— “तुम मेरे पुत्र हो। आज से तुम मेरे द्वारपाल बनो और मेरी अनुमति के बिना किसी को भी भीतर प्रवेश न करने देना।”

बालक ने माता की आज्ञा को स्वीकार किया। माता पार्वती ने उसे एक दंड दिया और स्वयं स्नान करने के लिए भीतर चली गईं। बालक पूरी निष्ठा के साथ द्वार पर पहरा देने लगा।

भगवान शिव और बालक का सामना

कुछ समय बाद भगवान शिव वहां आए और माता पार्वती के कक्ष में प्रवेश करने लगे। बालक भगवान शिव को नहीं पहचानता था। उसने उन्हें रोकते हुए कहा कि माता पार्वती स्नान कर रही हैं और उनकी अनुमति के बिना किसी को भीतर जाने की आज्ञा नहीं है।

भगवान शिव ने बालक को समझाया कि वे माता पार्वती के पति हैं और यह उनका ही निवास है। परंतु बालक के लिए उसकी माता की आज्ञा सर्वोपरि थी। उसने भगवान शिव को भी भीतर प्रवेश नहीं करने दिया।

भगवान शिव ने अपने गणों को उस बालक को द्वार से हटाने का आदेश दिया। नंदी सहित शिवगण बालक के पास पहुंचे और उसे समझाने का प्रयास किया, लेकिन वह अपने कर्तव्य से पीछे नहीं हटा। अंततः शिवगणों और बालक के बीच युद्ध आरंभ हो गया।

भगवान शिव और बालक का युद्ध

माता पार्वती का पुत्र असाधारण बल और पराक्रम से युक्त था। उसने अकेले ही भगवान शिव के अनेक गणों का सामना किया और उन्हें पराजित कर दिया। बालक के अद्भुत पराक्रम को देखकर सभी आश्चर्यचकित हो गए।

जब माता पार्वती को इस युद्ध का पता चला तो उन्होंने अपने पुत्र की सहायता के लिए अपनी शक्तियां प्रदान कीं। इससे बालक और भी शक्तिशाली हो गया। देवताओं ने भी उसे रोकने का प्रयास किया, परंतु वह अपने स्थान से नहीं हटा।

अंततः भगवान विष्णु भी युद्ध में सम्मिलित हुए। भगवान गणेश ने भगवान विष्णु सहित अनेक देवताओं का वीरतापूर्वक सामना किया। उनके अद्भुत बल और साहस को देखकर स्वयं भगवान विष्णु ने भी उनके पराक्रम की प्रशंसा की।

गणेशजी का मस्तक विच्छेद

युद्ध लंबे समय तक चलता रहा। भगवान विष्णु और बालक के बीच भी भीषण संघर्ष हुआ। उसी समय अवसर पाकर भगवान शिव आगे बढ़े और अपने त्रिशूल से बालक का मस्तक उसके शरीर से अलग कर दिया।

बालक के गिरते ही युद्ध समाप्त हो गया। लेकिन यह घटना आगे एक अत्यंत गंभीर स्थिति का कारण बनी, क्योंकि जब माता पार्वती को अपने पुत्र के वध का समाचार मिला तो उनका दुःख प्रचंड क्रोध में परिवर्तित हो गया।

माता पार्वती का क्रोध

अपने पुत्र की मृत्यु का समाचार सुनकर माता पार्वती अत्यंत दुःखी और क्रोधित हुईं। उन्होंने कहा कि यदि उनके पुत्र को पुनः जीवित नहीं किया गया तो वे समस्त सृष्टि का संहार कर देंगी।

क्रोधित माता पार्वती ने अनेक शक्तियों को प्रकट किया। वे शक्तियां देवताओं, गणों और अन्य प्राणियों का संहार करने के लिए आगे बढ़ीं। माता पार्वती का यह रौद्र रूप देखकर देवता भयभीत हो गए।

देवताओं और ऋषियों ने माता पार्वती की स्तुति की और उनसे अपना क्रोध शांत करने की प्रार्थना की। तब माता ने स्पष्ट कहा कि उनके पुत्र को पुनः जीवित किया जाए और उसे देवताओं के बीच सम्मानपूर्ण तथा सर्वोच्च स्थान दिया जाए। तभी उनका क्रोध शांत होगा।

गजमुख स्वरूप में पुनर्जीवन

माता पार्वती की बात सुनकर भगवान शिव ने उनके पुत्र को पुनर्जीवित करने का निर्णय लिया। उन्होंने देवताओं और अपने पार्षदों से कहा कि वे उत्तर दिशा की ओर जाएं और जो प्राणी उन्हें सबसे पहले मिले उसका मस्तक लेकर आएं।

भगवान शिव की आज्ञा से देवगण उत्तर दिशा की ओर गए। वहां उन्हें सबसे पहले एक एकदंत हाथी मिला। वे उसका मस्तक लेकर वापस आए और उसे माता पार्वती के पुत्र के शरीर पर स्थापित कर दिया।

इसके बाद देवताओं ने मंत्रों से अभिमंत्रित पवित्र जल बालक के शरीर पर छिड़का। भगवान शिव की इच्छा से बालक उसी प्रकार चेतना प्राप्त कर उठ बैठा जैसे कोई गहरी नींद से जागा हो। अब उसका मुख हाथी के समान था और वह अत्यंत तेजस्वी दिखाई दे रहा था।

अपने पुत्र को पुनः जीवित देखकर माता पार्वती अत्यंत प्रसन्न हुईं। उन्होंने पुत्र को हृदय से लगा लिया और उसे वस्त्र, आभूषण तथा अनेक आशीर्वाद प्रदान किए।

गणेशजी को प्रथम पूज्य होने का वरदान

इसके बाद माता पार्वती ने अपने पुत्र को वरदान दिया कि संसार में सभी देवताओं से पहले उसकी पूजा की जाएगी। ब्रह्मा, विष्णु और भगवान शिव ने भी गणेशजी को विशेष स्थान प्रदान किया।

भगवान शिव ने उन्हें अपने समस्त गणों का अध्यक्ष बनाया और कहा कि वे संसार में गणेश और गणपति के नाम से प्रसिद्ध होंगे। भगवान शिव ने उन्हें विघ्नों का नाश करने वाला तथा शुभ कार्यों में प्रथम पूज्य होने का वरदान दिया।

इसी कारण किसी भी शुभ कार्य के आरंभ में सबसे पहले “श्री गणेशाय नमः” कहकर भगवान गणेश का स्मरण और पूजन किया जाता है।

इस प्रकार माता पार्वती का पुत्र गणों का स्वामी, विघ्नों का नाश करने वाला और सभी देवताओं में अग्रपूज्य भगवान श्री गणेश कहलाया।

गणेश चतुर्थी पर चंद्रमा क्यों नहीं देखते?

गणेश चतुर्थी से जुड़ी एक प्रचलित धार्मिक मान्यता के अनुसार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी की रात्रि में चंद्रमा का दर्शन करने से बचना चाहिए। इसे मिथ्या दोष या मिथ्या कलंक से जोड़ा जाता है, अर्थात व्यक्ति पर बिना कारण कोई झूठा आरोप लगने की आशंका मानी गई है।

इस मान्यता से जुड़ी प्रसिद्ध कथा के अनुसार एक अवसर पर चंद्रदेव को अपने सुंदर स्वरूप पर अत्यधिक अभिमान हो गया। उन्होंने भगवान गणेश के स्वरूप को देखकर उपहास किया। भगवान गणेश ने चंद्रमा के इस अहंकार को देखकर उन्हें शाप दिया कि उनके दर्शन के कारण मनुष्य को मिथ्या कलंक का सामना करना पड़ सकता है।

चंद्रदेव को अपनी भूल का अनुभव हुआ। उन्होंने भगवान गणेश से क्षमा मांगी और उनकी स्तुति की। तब भगवान गणेश ने शाप के प्रभाव को सीमित कर दिया। इसी से भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन न करने की परंपरा जोड़ी जाती है।

इस कथा का धार्मिक संदेश यह भी माना जाता है कि रूप, ज्ञान, धन अथवा पद का अहंकार उचित नहीं है और किसी के स्वरूप का उपहास नहीं करना चाहिए।

श्रीकृष्ण और स्यमंतक मणि की कथा

गणेश चतुर्थी की प्रचलित व्रत-परंपरा में चंद्र दर्शन के दोष को भगवान श्रीकृष्ण और स्यमंतक मणि के प्रसंग से भी जोड़ा जाता है। वहीं श्रीमद्भागवत महापुराण में स्यमंतक मणि और भगवान श्रीकृष्ण पर लगे झूठे आरोप की विस्तृत कथा मिलती है।

द्वारका में सत्राजित नामक एक व्यक्ति भगवान सूर्य का भक्त था। उसकी भक्ति से प्रसन्न होकर सूर्यदेव ने उसे अत्यंत तेजस्वी स्यमंतक मणि प्रदान की। वह मणि इतनी तेजोमय थी कि जब सत्राजित उसे धारण करके चलता तो लोग उसे सूर्यदेव समझ लेते थे।

एक दिन सत्राजित का भाई प्रसेन उस मणि को गले में पहनकर शिकार करने वन में गया। वहां एक सिंह ने प्रसेन और उसके घोड़े को मार दिया तथा मणि अपने साथ ले गया। बाद में जाम्बवान ने उस सिंह को मार दिया और स्यमंतक मणि को अपनी गुफा में ले जाकर अपने बालक को खेलने के लिए दे दिया।

जब प्रसेन वापस नहीं लौटा तो सत्राजित को संदेह हुआ कि मणि प्राप्त करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण ने ही प्रसेन का वध किया होगा। धीरे-धीरे यह बात द्वारका में फैल गई और भगवान श्रीकृष्ण पर चोरी तथा हत्या का मिथ्या आरोप लगने लगा।

अपने ऊपर लगे इस कलंक को दूर करने के लिए भगवान श्रीकृष्ण स्वयं सत्य की खोज में वन की ओर गए। उन्हें पहले प्रसेन और उसके घोड़े के शव मिले और फिर उस सिंह का शव मिला जिसने प्रसेन को मारा था। उसके बाद पदचिह्नों का अनुसरण करते हुए भगवान श्रीकृष्ण जाम्बवान की गुफा तक पहुंचे।

गुफा में भगवान श्रीकृष्ण ने स्यमंतक मणि को देखा। जाम्बवान भगवान श्रीकृष्ण को तुरंत पहचान नहीं पाए और दोनों के बीच कई दिनों तक युद्ध हुआ। अंततः जाम्बवान ने भगवान श्रीकृष्ण के वास्तविक स्वरूप को पहचान लिया और उनकी शरण ग्रहण की। उन्होंने स्यमंतक मणि भगवान श्रीकृष्ण को सौंप दी तथा अपनी पुत्री जाम्बवती का विवाह भी उनसे कर दिया।

भगवान श्रीकृष्ण मणि लेकर द्वारका वापस लौटे और उन्होंने सत्राजित के सामने सत्य प्रकट कर दिया। इससे भगवान श्रीकृष्ण पर लगा झूठा आरोप समाप्त हो गया।

गणेश चतुर्थी की प्रचलित परंपरा में इस प्रसंग को मिथ्या कलंक से जोड़कर सुनाया जाता है। इसी कारण यदि भूलवश गणेश चतुर्थी की रात्रि में चंद्रमा का दर्शन हो जाए तो स्यमंतक मणि की कथा का श्रवण या पाठ करने की परंपरा भी प्रचलित है।

गणेश चतुर्थी पूजा सामग्री

गणेश चतुर्थी की पूजा के लिए श्रद्धा सबसे महत्वपूर्ण है। उपलब्धता और पारिवारिक परंपरा के अनुसार निम्न सामग्री रखी जा सकती है:

  • भगवान गणेश की प्रतिमा या चित्र
  • पूजा के लिए चौकी और स्वच्छ वस्त्र
  • कलश और स्वच्छ जल
  • रोली या कुमकुम
  • सिंदूर
  • अक्षत
  • चंदन
  • दूर्वा
  • लाल अथवा अन्य सुगंधित पुष्प
  • पुष्पमाला
  • धूप और दीपक
  • रुई और घी अथवा तेल
  • नैवेद्य और मौसमी फल
  • मोदक या लड्डू
  • नारियल
  • सुपारी और पान
  • यज्ञोपवीत
  • दक्षिणा
  • कपूर
  • आरती की थाली

पूजा सामग्री स्थान और परिवार की परंपरा के अनुसार अलग-अलग हो सकती है। सभी वस्तुओं का होना आवश्यक नहीं है। भगवान गणेश की पूजा श्रद्धा और शुद्ध भाव से करना मुख्य माना गया है।

गणेश चतुर्थी पूजा विधि

1. स्नान और शुद्धि: प्रातः स्नान कर स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थल को साफ करके चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाएं।

2. गणपति स्थापना: चौकी पर भगवान गणेश की प्रतिमा अथवा चित्र स्थापित करें। यदि गणेशोत्सव के लिए नई प्रतिमा स्थापित कर रहे हैं तो उसे श्रद्धापूर्वक निर्धारित स्थान पर विराजमान करें।

3. संकल्प: हाथ में जल, अक्षत और पुष्प लेकर भगवान गणेश का स्मरण करें तथा अपनी श्रद्धा के अनुसार पूजा अथवा व्रत का संकल्प लें।

4. भगवान गणेश का ध्यान: भगवान गणेश के स्वरूप का ध्यान करते हुए “ॐ गं गणपतये नमः” मंत्र का जप करें।

ॐ गं गणपतये नमः

5. पूजन: भगवान गणेश को जल, चंदन, अक्षत, सिंदूर, पुष्प और दूर्वा अर्पित करें। इसके बाद धूप और दीप दिखाएं।

6. नैवेद्य: भगवान गणेश को मोदक, लड्डू, फल तथा अपनी श्रद्धा के अनुसार अन्य सात्त्विक नैवेद्य अर्पित करें।

7. मंत्र और स्तोत्र: गणेश मंत्र, गणेश अथर्वशीर्ष, गणेश चालीसा अथवा अपनी परंपरा के अनुसार किसी अन्य स्तोत्र का पाठ किया जा सकता है।

8. गणेश चतुर्थी कथा: भगवान गणेश के प्राकट्य की कथा का श्रद्धापूर्वक श्रवण या पाठ करें।

9. आरती: पूजा के अंत में भगवान गणेश की आरती करें और परिवार सहित उनका आशीर्वाद प्राप्त करें।

10. प्रसाद: पूजा पूर्ण होने के बाद भगवान को अर्पित नैवेद्य को प्रसाद के रूप में परिवार और भक्तों में वितरित करें।

भगवान गणेश को दूर्वा क्यों चढ़ाई जाती है?

भगवान गणेश की पूजा में दूर्वा का विशेष स्थान है। शिवपुराण के कुमार खंड में गणेश व्रत के विधान में भी दूर्वा से भगवान गणेश की पूजा करने का स्पष्ट उल्लेख मिलता है। इस कारण दूर्वा भगवान गणेश की पारंपरिक पूजा सामग्री का महत्वपूर्ण अंग मानी जाती है।

दूर्वा अत्यंत साधारण दिखाई देने वाली घास है, लेकिन उसमें विपरीत परिस्थितियों में भी पुनः उगने की अद्भुत क्षमता होती है। इसलिए इसे जीवन, स्थिरता और निरंतरता का प्रतीक भी माना जाता है। भगवान गणेश को दूर्वा अर्पित करते समय भक्त अपने अहंकार को छोड़कर सरलता और विनम्रता का भाव रखते हैं।

प्रचलित पूजा-पद्धति में भगवान गणेश को दूर्वा की 21 गांठें अथवा दल अर्पित करने की परंपरा भी मिलती है। अलग-अलग क्षेत्रों और परंपराओं में इसकी विधि में कुछ अंतर हो सकता है।

गणेशजी को मोदक क्यों प्रिय हैं?

भगवान गणेश को मोदक का भोग अत्यंत प्रसिद्ध है और इसी कारण उनका एक नाम मोदकप्रिय भी कहा जाता है। गणेश चतुर्थी पर विशेष रूप से मोदक और लड्डू का नैवेद्य अर्पित किया जाता है।

“मोद” शब्द का अर्थ आनंद या प्रसन्नता से भी जोड़ा जाता है। इसी कारण मोदक को आध्यात्मिक आनंद और ज्ञान से प्राप्त होने वाली आंतरिक प्रसन्नता का प्रतीक माना जाता है। बाहर से बंद और भीतर से मधुर मोदक की प्रतीकात्मक व्याख्या यह भी की जाती है कि वास्तविक ज्ञान और आनंद अंतर्मन में प्राप्त होता है।

हालांकि मोदक से जुड़ी कई लोककथाएं अलग-अलग क्षेत्रों में प्रचलित हैं, गणेश चतुर्थी की पूजा में मुख्य भाव यही है कि भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार भगवान गणेश को प्रिय मिष्ठान अर्पित करे।

गणेश विसर्जन क्यों किया जाता है?

गणेश चतुर्थी पर स्थापित भगवान गणेश की प्रतिमा का निर्धारित अवधि तक पूजन करने के बाद श्रद्धापूर्वक विसर्जन किया जाता है। गणेश विसर्जन गणेशोत्सव की पूर्णाहुति माना जाता है।

विसर्जन के समय भक्त भगवान गणेश को विदा करते हुए उनसे पुनः अपने जीवन और घर में आने की प्रार्थना करते हैं। इसी भाव से प्रसिद्ध उद्घोष किया जाता है— “गणपति बप्पा मोरया, पुढच्या वर्षी लवकर या।”

दार्शनिक रूप से प्रतिमा की स्थापना और विसर्जन हमें संसार की परिवर्तनशीलता का स्मरण भी कराता है। मिट्टी से बना स्वरूप कुछ समय के लिए हमारे सामने पूजित होता है और फिर उसी प्रकृति में विलीन हो जाता है। ईश्वर का वास्तविक स्वरूप किसी एक प्रतिमा तक सीमित नहीं है; प्रतिमा भक्त के लिए उपासना और ध्यान का माध्यम है।

आज पर्यावरण की रक्षा को ध्यान में रखते हुए प्राकृतिक मिट्टी से बनी प्रतिमा का उपयोग और पर्यावरण-अनुकूल विधि से विसर्जन करना उचित माना जाता है। जहां संभव हो, स्थानीय प्रशासन द्वारा निर्धारित विसर्जन स्थलों और नियमों का पालन करना चाहिए।

गणेश चतुर्थी से जुड़े महत्वपूर्ण प्रश्न — FAQ

गणेश चतुर्थी क्यों मनाई जाती है?
गणेश चतुर्थी भगवान श्री गणेश को समर्पित प्रमुख हिंदू पर्व है। धार्मिक परंपरा में इसे भगवान गणेश के प्राकट्य से जोड़ा जाता है। इस दिन भक्त भगवान गणेश की स्थापना और पूजा कर बुद्धि, शुभता, समृद्धि और विघ्नों से मुक्ति की प्रार्थना करते हैं।
गणेश चतुर्थी किस तिथि को मनाई जाती है?
गणेश चतुर्थी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। इसे विनायक चतुर्थी और गणेशोत्सव भी कहा जाता है।
भगवान गणेश का प्राकट्य कैसे हुआ?
शिवपुराण की प्रसिद्ध कथा के अनुसार माता पार्वती ने अपने शरीर के उबटन और मैल से एक बालक की रचना की और उसे अपना पुत्र स्वीकार कर द्वार की रक्षा करने का आदेश दिया। यही बालक आगे चलकर भगवान श्री गणेश के रूप में प्रतिष्ठित हुआ।
भगवान गणेश का मस्तक किसने काटा था?
शिवपुराण की कथा के अनुसार माता पार्वती के पुत्र और भगवान शिव के गणों तथा देवताओं के बीच हुए संघर्ष के अंत में भगवान शिव ने अपने त्रिशूल से बालक का मस्तक काट दिया था।
भगवान गणेश को हाथी का मस्तक क्यों लगाया गया?
अपने पुत्र की मृत्यु से माता पार्वती अत्यंत क्रोधित हो गईं। उन्हें शांत करने के लिए भगवान शिव ने बालक को पुनर्जीवित करने का निर्णय लिया। उनके आदेश पर उत्तर दिशा में मिले एकदंत हाथी का मस्तक लाकर बालक के शरीर पर स्थापित किया गया और उसे पुनर्जीवित किया गया।
गणेश चतुर्थी पर चंद्रमा क्यों नहीं देखना चाहिए?
प्रचलित धार्मिक मान्यता के अनुसार भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी के दिन चंद्र दर्शन को मिथ्या कलंक से जोड़ा जाता है। चंद्रदेव के अहंकार और भगवान गणेश द्वारा दिए गए शाप की कथा इस परंपरा से जुड़ी हुई है।
गणेश चतुर्थी पर भूल से चंद्रमा दिख जाए तो क्या करना चाहिए?
परंपरागत मान्यता के अनुसार भूलवश चंद्र दर्शन हो जाने पर भगवान गणेश का स्मरण और पूजन करना तथा श्रीकृष्ण और स्यमंतक मणि की कथा का श्रवण या पाठ करना शुभ माना जाता है। भगवान गणेश के मंत्र 'ॐ गं गणपतये नमः' का जप भी किया जा सकता है।
भगवान गणेश को दूर्वा क्यों चढ़ाई जाती है?
दूर्वा भगवान गणेश की प्रमुख पूजा सामग्रियों में से एक है। शिवपुराण में भी गणेश व्रत के विधान में दूर्वा से भगवान गणेश की पूजा करने का उल्लेख मिलता है। इसलिए गणेश पूजा में दूर्वा अर्पित करने की प्राचीन परंपरा है।
भगवान गणेश को मोदक क्यों चढ़ाया जाता है?
मोदक भगवान गणेश का प्रिय नैवेद्य माना जाता है। मोदक को आनंद और मधुरता का प्रतीक भी माना जाता है। गणेश चतुर्थी पर भक्त श्रद्धापूर्वक भगवान गणेश को मोदक या लड्डू का भोग अर्पित करते हैं।
गणेश विसर्जन क्यों किया जाता है?
गणेशोत्सव के दौरान स्थापित भगवान गणेश की प्रतिमा का निर्धारित अवधि तक पूजन करने के बाद श्रद्धापूर्वक विसर्जन किया जाता है। यह गणेशोत्सव की पूर्णाहुति और भगवान गणेश को पुनः अगले वर्ष आने की प्रार्थना के साथ विदाई देने का प्रतीक है।

॥ श्री गणेशाय नमः ॥

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटि समप्रभ।
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा॥

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