Follow UsInstagram
Please login to save favourites.
हरछठ (हल षष्ठी) व्रत कथा
भाषा :

हरछठ (हल षष्ठी) व्रत कथा

Harachhhath (Hal Shashthi) Vrat Katha

Story [ Katha ] of Harchat (Hala Shashthi) fast

हरछठ (हल षष्ठी) व्रत भाद्रपद माह के कृष्ण पक्ष की षष्ठी तिथि को मनाया जाता है, जो जन्माष्टमी से दो दिन पूर्व आता है। यह पर्व भगवान कृष्ण के बड़े भाई श्री बलराम जी के जन्म उत्सव के रूप में अत्यंत हर्षोल्लास से मनाया जाता है। बलराम जी का शस्त्र हल और मूसल है, इसलिए इस दिन हल पूजन का विशेष महत्व है। इसे हल छठ, पिन्नी छठ, खमर छठ, ललही छठ, रांधण छठ तथा बजराम जयंती के नामों से भी जाना जाता है। महिलाएँ संतान की दीर्घायु, आरोग्य और सुख-समृद्धि की कामना से यह व्रत रखेंगी। परंपरा अनुसार, व्रती महिलाएँ इस दिन खेत में उगे या हल से जोते गए किसी भी अनाज या सब्जी का सेवन नहीं करतीं। पूजन और कथा के उपरांत वे केवल तालाब में पैदा हुए तिन्नी के चावल, केर्मुआ का साग और पसही के चावल का ही भोजन करती हैं। इस अवसर पर हल छठ माता, शीतला माता और भगवान बलराम की श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है, जिसमें दही, चावल और महुआ का विशेष महत्व होता है।

हरछठ (हलषष्ठी) व्रत पूजा विधि

हरछठ के दिन स्नान-ध्यान करने के बाद विधि-विधान पूर्वक पूजा-अर्चना की जाती है। यह व्रत वही स्त्रियाँ करती हैं जिनको पुत्र होता है। जिनको केवल पुत्री होती है, वह यह व्रत नहीं करती है। इस शुभ दिन दीवार पर गाय के गोबर से हरछठ का चित्र भी बनाया जाता है। इसमें गणेश-लक्ष्मी, शिव-पार्वती, सूर्य-चंद्रमा, गंगा-जमुना आदि के चित्र बनाए जाते हैं। आज कल बाजार में हरछठ माता का बना बनाया चित्र भी मिलने लगा है।

हरछठ बनाने में झरबेरी, ताश और पलाश की एक-एक शाखा का इस्तेमाल किया जाता है। पूजा में सात प्रकार के भुने हुए अनाज का भोग लगाया जाता है। पूजा के लिए सात तरह के अनाज जैसे धान, गेहूं, चना, मटर, मक्का, ज्वार, बाजरा, अरहर चढ़ाएं जाते है। इस व्रत में महिलाएं प्रत्येक पुत्र के आधार पर छह छोटे मिट्टी के बर्तनों में पांच या सात भुने हुए अनाज या सूखे मेवे भरती हैं। अंत में हरछठ की कथा सुनें और विधि-विधान के साथ पूजा-अर्चना करें।

स्त्रियाँ पूजन के समय कुश के पेड़ में गाँठ बाँधती है। इसके लिये स्त्रियाँ कुश लगे हुये स्थान पर जाती है अथवा घर में ही किसी स्थान या गमले में कुश लगाकर गाँठ बाँधती है। पूजा के बाद के महिलाएं भैंस के दूध से बने दही और महुआ को पलाश के पत्ते पर खाती हैं ​इस दिन महिलाओं के द्वारा इस व्रत में हल से जुते हुए अनाज व सब्जियों का सेवन नहीं किया जाता है। इसलिए महिलाएं इस दिन तालाब में उगे पसही/तिन्नी का चावल/पचहर के चावल खाकर व्रत रखती हैं।

केवल वृक्ष पर लगे खाद्य पदार्थ के ही सेवन की अनुमति होती है। विशेष रूप से महुए के फल का सेवन इस व्रत में किया जाता है। इस व्रत में गाय का दूध व दही इस्तेमाल में नहीं लाया जाता है इस दिन महिलाएं भैंस का दूध ,घी व दही इस्तेमाल करती है। इस व्रत को करने से व्रती को धन, ऐश्वर्य आदि की प्राप्ति होती है, इस व्रत को करने से पुत्र पर आने वाले सभी संकट दूर हो जाते हैं।

हलषष्ठी व्रत कथा ॥ 1 ॥

मथुरा के राजा कंस अपनी बहन देवकी को विवाह उपरांत विदा करने जा रहे थे तो आकाशवाणी के वचन सुन कर कि देवकी का आठवाँ गर्भ तेरी मृत्यु का कारण बनेगा, अपनी बहन-बहनोई को कारागार में डाल दिया। वासुदेव-देवकी के छह पुत्रों को एक-एक कर कंस ने मार डाला। जब सातवें बच्चे के जन्म का समय नजदीक आया तो देवर्षि नारद जी वासुदेव और देवकी से मिलने पहुंचे और उनके दुख का कारण जानकर देवकी को हलषष्ठी देवी के व्रत रखने की सलाह दी। देवकी ने नारद जी से हलषष्ठी व्रत की महिमा व कथा पूछी तो नारद ने पुरातन कथा कहना प्रारम्भ किया कि- चन्द्रव्रत नाम का एक राजा हुआ, जिनकों एक ही पुत्र था। राजा ने राहगीरों के लिए एक तालाब खुदवाया किन्तु उसमे जल न रहा, सूख गया। राहगीर उस रास्ते गुजरते और सूखे तालाब को देखकर राजा को गाली देते थे। इस खबर को सुनकर राजा दुखित हुआ कि मैंने तालाब खुदवाया, मेरा धन व धर्म दोनों ही व्यर्थ गया। उसी रोज रात राजा को स्वप्न में वरुण देव ने दर्शन देकर कहा कि यदि तुम अपने पुत्र का बलि तालाब में दोगे तो जल भर जाएगा।

सुबह राजा ने स्वप्र में कही बात दरबार मे सुनाया और कहा कि मेरा धन व धर्म भले ही व्यर्थ हो जाए पर मैं अपने पुत्र की बलि नहीं दूंगा। यह बात लोगों से होता हुआ राजकुमार तक पहुंचा तो वह सोचने लगा कि यदि मेरी बलि से तालाब में पानी आ जाए तो लोगों का भला होगा, यह सोचकर राजकुमार अपनी बलि देने तालाब में बैठ गया। अब वह तालाब पानी से लबालब भर गया, जल के जीव-जंतुओं से तालाब परिपूर्ण हो गया। एकलौते पुत्र के बलि हो जाने से राजा दुखी होकर वन को चला गया।

वहाँ पाँच स्त्रियाँ व्रत कर रही थी जिसे देखकर राजा ने पुछा आप लोग कौन सा व्रत और क्यों कर रही हो पूछने पर स्त्रियों ने हलषष्ठी व्रत की सम्पूर्ण विधि- विधान बतलाई। उसे सुनकर राजा वापिस नगर को गया और अपनी रानी के साथ उस व्रत को किया। व्रत के प्रभाव से राजपुत्र तालाब से जीवित बाहर निकल आया। राजा परिवार सहित हलषष्ठी माता के जयकार कर सुख पूर्वक निवास करने लगा।

हलषष्ठी व्रत कथा ॥ 2 ॥

अब नारदजी ने देवकी से हलषष्ठी व्रत की अन्य कथा कहना शुरू किया कि उज्जैन नगरी में दो सौतन रहती थी। एक का नाम रेवती तथा दूसरी का नाम मानवती था रेवती को कोई संतान न था, जबकि मानवती के दो पुत्र थे। रेवती अपने सौत के बच्चों को देखकर हमेशा सौतिया डाह से जलती रहती और उनके पुत्रों को मारने का जतन ढूंढती रहती थी। एक दिन उन्होने मानवती को बुलाकर कहा कि बहन आज तुम्हारे मायके से कुछ राहगीर मुझसे मिले थे उन्होने बताया कि तुम्हारे पिताजी बहुत बीमार है और वह तुम्हें देखना चाहता है।

पिता की बीमारी को सुनकर मानवती दुखी हुई। रेवती कहने लगी कि बहन तुम शीघ्र अपने पिता से मिलने चली जाओ, तुम्हारे आने तक मैं बच्चों का ध्यान रखूंगी। सौत के बात को सच मान और अपने पुत्रों को रेवती के हाथों सुरक्षित देकर मानवती पिता से मिलने मायके चली गई। अब रेवती बच्चों को मारने का अच्छा मौका जान कर उन दोनों बच्चों को मारकर जंगल में फेंक आयी।

इधर मानवती जब मायके पहुंची तो पिता को स्वस्थ देखकर पिता से अपनी सौत की कही बातों को कह कुशल-क्षेम पूछती है। अब मानवती के पिता ने अनहोनी के संदेह से पुत्री को जाने को कहते है, किन्तु मानवती के माता ने कहा कि पुत्री आज हलषष्ठी माता का व्रत का दिन है अतः तुम भी पुत्रों की दीर्घायु की कामना से यह व्रत कर आज के जगह कल चली जाना। माता की सलाह मान मानवती पुत्रों की स्वास्थ कामना से हलषष्ठी माता का व्रत धारण कर दूसरे दिन अपने घर जाने को निकली।

रास्ते में वही जंगल पड़ा और वहाँ अपने बच्चों को खेलते देख उनसे पूछती है कि तुम लोग यहाँ कैसे पहुंचे। तब पुत्रों ने बताया कि आपके चली जाने पर हमारी दूसरी माता रेवती ने मारकर यहाँ फेंक दिया था कि तभी एक दूसरी स्त्री हमें फिर से जिंदा कर गई। अब मानवती को समझते देर न लगी कि यह सब माता हलषष्ठी की कृपा से संभव है और माता की जयकार करती हुई घर को गई। नगर में मानवती के पुत्रों को पुनः जीवित देख और माता हलषष्ठी की महिमा जान सभी स्त्रियाँ हलषष्ठी व्रत करने लगी।

हलषष्ठी व्रत कथा ॥ 3 ॥ – श्रीकृष्ण एवं युधिष्ठिर संवाद

एक बार धर्मराज युधिष्ठिर ने भगवान श्रीकृष्ण से अत्यंत शोक-संतप्त भाव से कहा — “हे देवकीनंदन! सुभद्रा अपने पुत्र अभिमन्यु के मरणोपरांत व्याकुल हैं और उसकी पत्नी उत्तरा के गर्भ की संतान भी, दुष्ट अश्वत्थामा द्वारा छोड़े गए ब्रह्मास्त्र के तेज से नष्ट हो रही है। द्रौपदी भी अपने पाँच पुत्रों के मारे जाने से अत्यंत दुखी है। कृपा करके इस महान दुःख से उबरने का कोई उपाय बताएं।”

श्रीकृष्ण ने कहा — “राजन! यदि उत्तरा मेरे बताए इस अपूर्व व्रत को करे, तो गर्भ में स्थित निश्तेज शिशु पुनर्जीवित हो जाएगा। यह व्रत भाद्रपद कृष्ण षष्ठी को, भगवान शिव-पार्वती, श्रीगणेश और स्वामी कार्तिकेय की विधिपूर्वक पूजा के साथ किया जाता है। यह व्रत पुत्र-पौत्र की अल्पायु और शोक के महादुःख से मुक्ति प्रदान करने वाला है।”

इसके संदर्भ में भगवान श्रीकृष्ण ने एक कथा सुनाई — पूर्वकाल में सुभद्र नामक एक राजा था, जिनकी रानी का नाम सुवर्णा था। उनका एक पुत्र था हस्ती। एक दिन राजपुत्र हस्ती धाय माँ के साथ गंगाजी स्नान को गया। बाल-स्वभाववश वह जल में खेलने लगा, तभी एक ग्राह (मगर) ने उसे पकड़कर जल में खींच लिया।

धाय माँ ने यह समाचार रानी को दिया। क्रोधवश रानी ने धाय के पुत्र को धधकती आग में डाल दिया। पुत्र-शोक से व्याकुल धाय माँ निर्जन वन में चली गई और एक सुनसान मंदिर के पास रहने लगी। जो सूखा तृण, धान्य, महुआ आदि मिलता, उसी से जीवन-यापन करती और मंदिर में विराजमान शिव-पार्वती व गणेशजी की पूजा करती।

इधर नगर में अद्भुत घटना घटी — धाय का पुत्र अग्नि की भट्टी से जीवित निकल आया और खेलने लगा। यह समाचार राजा-रानी तक पहुँचा। उन्होंने पुरोहित से इसका कारण पूछा। तभी सौभाग्य से दुर्वासा ऋषि वहाँ आए। राजा-रानी ने उनका पूजन कर यह रहस्य पूछा।

दुर्वासा जी ने कहा — “राजन! आपके भय से धाय माँ वन में जाकर हलषष्ठी व्रत कर रही थी, इसी व्रत के प्रभाव से उसका पुत्र जीवित हो गया।” यह सुनकर राजा-रानी नगरवासियों सहित उस वन में धाय के पास पहुँचे और व्रत के विषय में विस्तार से पूछा।

धाय माँ ने बताया — “पुत्र-शोक में मैं यहाँ आकर भगवान शिव-पार्वती, गणेशजी और स्वामी कार्तिकेय का पूजन करती रही और सूखा तृण, धान्य, महुआ आदि खाकर व्रत का पालन किया। एक रात्रि मुझे शिव परिवार के दर्शन हुए और उन्होंने वरदान दिया कि तुम्हारा पुत्र जीवित होगा।”

रानी ने व्रत की विधि पूछी, तो दुर्वासा जी ने हलषष्ठी व्रत की संपूर्ण विधि बताई। राजा-रानी ने यह व्रत किया। व्रत के प्रभाव से राजपुत्र हस्ती ग्राह के चंगुल से मुक्त होकर खेलते हुए नगर लौट आया।

पुत्र को पाकर राजा-रानी प्रसन्न हुए और धाय भी अपने पुत्र संग सुखपूर्वक रहने लगी। वही बालक हस्ती आगे चलकर परम प्रतापी हुआ और उसने अपने नाम पर हस्तिनापुर की स्थापना की।

श्रीकृष्ण ने युधिष्ठिर से कहा — “इस व्रत की महिमा पूर्व में नारदजी से सुनकर मेरी माता देवकी ने भी यह व्रत किया था, जिसके प्रभाव से उनकी संतान सुरक्षित रही। अब तुम यह व्रत उत्तरा से करवाओ।”

युधिष्ठिर ने श्रीकृष्ण के कहे अनुसार उत्तरा से यह व्रत करवाया। व्रत के प्रभाव से अश्वत्थामा द्वारा नष्ट किया गया गर्भ पुनः जीवित हो गया और बालक का जन्म हुआ, जो आगे चलकर राजा परीक्षित नाम से प्रसिद्ध हुआ।

हलषष्ठी व्रत कथा ॥ 4 ॥: राजा और जल-सरवर

पुरातन काल में एक राजा ने प्रजा-हित में एक विशाल सागर/सरवर खुदवाया और सुंदर घाट बनवाए; किंतु आश्चर्य कि उसमें जल भरा ही नहीं।चिंतित राजा ने पुरोहित से उपाय पूछा। पुरोहित बोले— “उपाय तो कठिन है, बड़े पुत्र/पुत्री की बलि दी जाए तो सरवर भर जाएगा।”

यह सुनकर राजा व्यथित हो उठे। पुरोहित ने दूसरी तरकीब सुझाई— “बड़ी बहू को यह कहकर मायके भेज दें कि उसकी माता अत्यंत अस्वस्थ हैं।”राजा ने वैसा ही किया। बहू समाचार पाकर विलाप करती हुई मायके पहुँची। माता ने पूछा— “बिटिया, क्या हुआ?” तब बहू ने सारा वृत्तांत कह सुनाया। माता बोलीं— “आज हल छठ का दिन है— आज खेत पार करना, हल चलना, बच्चों की माताओं का खेत जाना निषिद्ध है; अवश्य कोई छल हुआ है। तुम तुरंत ससुराल लौटो, हरछठ माता का स्मरण करो।”

माता-बेटी ने हृदय से हरछठ माता का आह्वान किया। बहू लौटने लगी तो मार्ग में देखा— जो सरवर सूखा था, वह अब जल से लबालब है; कमल-पत्र लहरा रहे हैं और वहीँ एक बालक खेल रहा है। निकट जाकर पाया— वह तो उसी का पुत्र था! बहू ने अंचल फैलाकर माता का आभार माना और पुत्र को गोद में उठा लिया। गृह पहुँचने पर सास-ससुर भी हरछठ माता की कृपा से पुत्र-वंश को सुरक्षित देखकर आनंदित हुए और बोले— “आज कुल-दीया उज्ज्वल हुआ।”

हलषष्ठी व्रत कथा ॥ 5 ॥:: ग्वालिन, सच्चाई और वरदान

एक ग्वालिन थी; प्रसव-समय निकट था। दुःख यह कि मन दूध-दही बेचने में भी अटका था। उसने सोचा— “यदि अभी प्रसव हो गया तो सारा गौ-रस यूँ ही पड़ा रह जाएगा।” वह घड़े सिर पर रखे निकल पड़ी। कुछ दूर पर पीड़ा बढ़ी तो पास की झरबेरी की ओट में जाकर बालक को जन्म दिया और उसे वहीं रखकर दूध बेचने चली गई।

संयोग से वही दिन हल षष्ठी का था— जब ग्राम-स्त्रियाँ केवल भैंस के दूध का प्रयोग करती हैं। ग्वालिन ने गाय-भैंस का मिश्रित दूध ही भैंस का बताकर बेच दिया। उधर समीप के खेत में एक किसान हल जोत रहा था। अचानक बैल चौंक उठे और हल का फाल उस शिशु के शरीर में जा लगा। किसान ने हिम्मत करके झरबेरी के काँटों से ही टाँके लगाए और चला गया।

दूध बेचकर लौटी ग्वालिन ने बालक को घायल देखा तो उसे अपने झूठ और लालच का फल समझते देर न लगी। वह रोती हुई ग्राम-स्त्रियों के पास पहुँची और सारी बात सत्य-सत्य कह सुनाई। स्त्रियों ने धर्म-रक्षा और दया के हेतु उसे क्षमा किया और आशीर्वाद दिया— “माता की शरण लो, और फिर कभी असत्य न बोलो।”

आशीर्वाद पाकर जब वह पुनः झरबेरी के पास पहुँची, तो देखा— बालक जीवित हो उठा है! यह माता की कृपा देख उसके हृदय में गहरा परिवर्तन हुआ। उसी क्षण उसने प्रण किया— “अब जीवन भर सत्य का ही पालन करूँगी, कभी झूठ नहीं बोलूँगी।”

हरछठ माता और भगवान हलधर बलराम की आराधना से संतान-सुख, आरोग्य, दीर्घायु और कुटुम्ब-कल्याण की प्राप्ति होती है।

हरछठ माता की जय

हलधर बलराम की जय!

Please login to save favourites.