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ऋषि पंचमी व्रत कथा

ऋषि पंचमी सनातन धर्म का एक पवित्र व्रत है, जो भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को रखा जाता है। यह दिन भारत की महान ऋषि परंपरा के प्रति श्रद्धा, सम्मान और कृतज्ञता प्रकट करने के लिए विशेष माना गया है। इस दिन मुख्य रूप से सप्तऋषियों – महर्षि कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ – का पूजन किया जाता है।

धार्मिक परंपरा में ऋषि पंचमी व्रत को आत्मशुद्धि, प्रायश्चित और जाने-अनजाने में हुए आचार संबंधी दोषों से मुक्ति की भावना से जोड़ा गया है। इस दिन श्रद्धालु संयमपूर्वक व्रत रखते हैं, सप्तऋषियों का स्मरण करते हैं तथा उनसे धर्म, ज्ञान और सदाचार के मार्ग पर चलने की प्रेरणा प्राप्त करने की प्रार्थना करते हैं।

ऋषि पंचमी का महत्व

भारत की आध्यात्मिक परंपरा में ऋषियों का स्थान अत्यंत उच्च माना गया है। वेद, उपनिषद, दर्शन, धर्मशास्त्र और अनेक आध्यात्मिक परंपराओं का ज्ञान ऋषियों के माध्यम से ही पीढ़ी-दर-पीढ़ी हम तक पहुँचा है। ऋषि पंचमी का दिन उन्हीं महान ऋषियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने का अवसर है।

इस व्रत का उद्देश्य केवल किसी धार्मिक नियम का पालन करना नहीं, बल्कि अपने आचरण का आत्मनिरीक्षण करना भी है। यदि मनुष्य से जाने-अनजाने में कोई अनुचित कर्म हुआ हो तो उसे स्वीकार करके शुद्ध आचरण, संयम और धर्म के मार्ग पर चलने का संकल्प लेना इस व्रत का महत्वपूर्ण भाव माना जा सकता है।

सप्तऋषि कौन हैं?

ऋषि पंचमी के दिन जिन सप्तऋषियों का विशेष पूजन और स्मरण किया जाता है, वे हैं –

  • महर्षि कश्यप
  • महर्षि अत्रि
  • महर्षि भारद्वाज
  • महर्षि विश्वामित्र
  • महर्षि गौतम
  • महर्षि जमदग्नि
  • महर्षि वशिष्ठ

कई धार्मिक परंपराओं में सप्तऋषियों के साथ माता अरुंधती का भी श्रद्धापूर्वक स्मरण और पूजन किया जाता है।

सप्तऋषि स्मरण मंत्र

कश्यपोऽत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ गौतमः।

जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः स्मृताः॥

अर्थात् महर्षि कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ – इन सात महान ऋषियों का श्रद्धापूर्वक स्मरण किया जाता है।

ऋषि पंचमी व्रत कथा

पौराणिक कथा के अनुसार प्राचीन समय में राजा सिताश्व ने ब्रह्माजी से विनम्रतापूर्वक पूछा – “हे पितामह! आपने मुझे अनेक पुण्यदायी व्रतों के विषय में बताया है। कृपा करके ऐसा कोई व्रत बताइए जिसके प्रभाव से मनुष्य अपने जाने-अनजाने में हुए पापों और दोषों का प्रायश्चित कर सके।”

ब्रह्माजी ने राजा से कहा – “हे राजन्! भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को किया जाने वाला ऋषि पंचमी व्रत अत्यंत पुण्यदायी माना गया है। इस दिन श्रद्धापूर्वक सप्तऋषियों का पूजन करना चाहिए। इस व्रत के संबंध में एक प्राचीन कथा प्रचलित है, उसे ध्यानपूर्वक सुनो।”

विदर्भ में उत्तंक ब्राह्मण का परिवार

प्राचीन काल में विदर्भ देश में उत्तंक नामक एक धर्मनिष्ठ और विद्वान ब्राह्मण रहते थे। उनकी पत्नी का नाम सुशीला था। सुशीला अत्यंत सदाचारी और धर्मपरायण थीं। समय आने पर उनके घर एक पुत्र और एक पुत्री का जन्म हुआ।

उत्तंक का पुत्र वेदों और धर्मशास्त्रों का ज्ञाता बना। जब उनकी पुत्री विवाह योग्य हुई तो उत्तंक ने उसका विवाह एक योग्य और सदाचारी युवक के साथ कर दिया। किंतु दुर्भाग्यवश कुछ समय बाद ही उसके पति का देहांत हो गया।

अपनी पुत्री के इस दुःख से उत्तंक और सुशीला भी अत्यंत व्यथित हुए। कुछ समय बाद उत्तंक ने गृहस्थी की जिम्मेदारी अपने पुत्र को सौंप दी और अपनी पत्नी तथा पुत्री के साथ गंगा तट पर जाकर रहने लगे। वहाँ वे तप, साधना और वेदाध्ययन में अपना समय व्यतीत करने लगे तथा अपने शिष्यों को भी धर्म और वेदों का ज्ञान प्रदान करते थे।

उनकी पुत्री भी अपने माता-पिता की सेवा करती और संयमपूर्वक जीवन व्यतीत करती थी।

पुत्री को हुआ असहनीय कष्ट

एक रात जब उत्तंक की पुत्री विश्राम कर रही थी, अचानक उसके शरीर पर अत्यंत कष्टदायक अवस्था उत्पन्न हो गई। पौराणिक कथा में वर्णन आता है कि उसका शरीर कृमियों से भर गया।

उत्तंक के शिष्यों ने जब उसे इस अवस्था में देखा तो वे भयभीत हो गए। उन्होंने तुरंत उसकी माता सुशीला को बुलाया और सारी बात बताई।

अपनी पुत्री को इस प्रकार कष्ट में देखकर सुशीला अत्यंत व्याकुल हो गईं। वे अपनी पुत्री को लेकर उत्तंक के पास पहुँचीं और दुःखी होकर बोलीं – “स्वामी! हमारी पुत्री सदैव धर्म का पालन करती रही है। इसने ऐसा कौन-सा कर्म किया है जिसके कारण इसे इतना कष्ट सहना पड़ रहा है?”

उत्तंक ने जाना पूर्वजन्म का कारण

पत्नी की बात सुनकर उत्तंक ने भगवान नारायण का ध्यान किया और अपनी योगदृष्टि से पुत्री के पूर्वजन्म के कर्मों का विचार किया।

उन्होंने कहा – “पूर्वजन्म में भी यह एक ब्राह्मण परिवार में जन्मी थी। उस जन्म में इसने धार्मिक आचार और शुचिता से संबंधित कुछ नियमों की उपेक्षा की थी। इसके साथ ही इसने ऋषि पंचमी व्रत को देखकर भी उसके प्रति श्रद्धा नहीं रखी।”

उत्तंक ने बताया कि पूर्वजन्म में ऋषि पंचमी व्रत का दर्शन करने के पुण्य के कारण इसे इस जन्म में पुनः एक धर्मपरायण ब्राह्मण परिवार में जन्म प्राप्त हुआ, किंतु व्रत और धार्मिक नियमों के प्रति किए गए अनादर के कारण उसे इस कष्ट का सामना करना पड़ा।

यह सुनकर सुशीला ने अपने पति से पूछा – “स्वामी! ऐसा कौन-सा उपाय है जिससे हमारी पुत्री अपने पूर्व कर्मों के इस दोष से मुक्त हो सके?”

उत्तंक ने बताया ऋषि पंचमी व्रत

उत्तंक ने कहा – “भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को श्रद्धा और संयम के साथ ऋषि पंचमी का व्रत करना चाहिए। इस दिन स्नान करके पवित्र भाव से सप्तऋषियों का पूजन करना चाहिए।”

महर्षि कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ का ध्यान करते हुए उन्हें जल, चंदन, पुष्प, धूप, दीप, वस्त्र, यज्ञोपवीत, फल और नैवेद्य अर्पित करना चाहिए।

व्रती को इस दिन मन, वचन और कर्म से संयम रखना चाहिए तथा अपने जाने-अनजाने में हुए अपराधों के लिए क्षमा माँगनी चाहिए। सप्तऋषियों की कथा सुनकर उनका स्मरण करना और धर्ममय जीवन का संकल्प लेना चाहिए।

ऋषि पंचमी व्रत के प्रभाव से दूर हुआ कष्ट

पिता की आज्ञा पाकर ब्राह्मण कन्या ने श्रद्धापूर्वक ऋषि पंचमी का व्रत किया। उसने सप्तऋषियों का विधिपूर्वक पूजन किया और अपने पूर्व कर्मों के लिए क्षमा प्रार्थना की।

पौराणिक कथा के अनुसार ऋषि पंचमी व्रत के पुण्य प्रभाव से उसके पूर्व कर्मों का प्रायश्चित हुआ और उसे अपने कष्ट से मुक्ति प्राप्त हुई।

ब्रह्माजी ने राजा सिताश्व से कहा कि जो मनुष्य श्रद्धा, संयम और शुद्ध भाव से ऋषि पंचमी के दिन सप्तऋषियों का पूजन करता है तथा इस व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक श्रवण करता है, वह अपने जीवन में सदाचार और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ता है।

॥ इति श्री ऋषि पंचमी व्रत कथा सम्पूर्णम् ॥

॥ सप्तऋषिभ्यो नमः ॥

ऋषि पंचमी व्रत पूजा विधि

ऋषि पंचमी के दिन प्रातःकाल उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान को अच्छी तरह स्वच्छ करके पूजा की तैयारी करें।

एक चौकी पर स्वच्छ वस्त्र बिछाकर सप्तऋषियों का चित्र अथवा उनका प्रतीक स्थापित करें। यदि सप्तऋषियों का चित्र उपलब्ध न हो तो सात सुपारी, सात कलश अथवा सात प्रतीक रखकर सप्तऋषियों का आवाहन किया जा सकता है।

सबसे पहले भगवान गणेश का ध्यान करें और पूजा निर्विघ्न पूर्ण होने की प्रार्थना करें। इसके बाद हाथ में जल, पुष्प और अक्षत लेकर ऋषि पंचमी व्रत का संकल्प लें।

महर्षि कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ – इन सप्तऋषियों का एक-एक करके नाम लेते हुए उनका ध्यान करें।

उन्हें जल अथवा पंचामृत से स्नान कराएँ और चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप, वस्त्र, यज्ञोपवीत, फल तथा नैवेद्य अर्पित करें। अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार माता अरुंधती का भी पूजन किया जा सकता है।

इसके बाद सप्तऋषि स्मरण मंत्र का जप करें और ऋषि पंचमी व्रत कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ अथवा श्रवण करें।

पूजा के अंत में अपने जाने-अनजाने में हुए अपराधों के लिए क्षमा माँगें और ज्ञान, सद्बुद्धि, संयम तथा सदाचार प्रदान करने की प्रार्थना करें। यथाशक्ति दान-दक्षिणा देकर पूजा पूर्ण करें।

ऋषि पंचमी पूजा सामग्री

  • सप्तऋषियों का चित्र अथवा सात प्रतीक
  • पूजा की चौकी और स्वच्छ वस्त्र
  • कलश
  • गंगाजल अथवा शुद्ध जल
  • पंचामृत
  • चंदन
  • रोली या कुमकुम
  • अक्षत
  • पुष्प और पुष्पमाला
  • धूप और दीपक
  • कपूर
  • यज्ञोपवीत
  • मौली
  • फल और नैवेद्य
  • पान और सुपारी
  • दक्षिणा

पूजा सामग्री में क्षेत्र और पारिवारिक परंपरा के अनुसार अंतर हो सकता है। यदि सभी सामग्री उपलब्ध न हो तो श्रद्धापूर्वक जल, पुष्प और दीप अर्पित करके भी सप्तऋषियों का पूजन किया जा सकता है।

ऋषि पंचमी व्रत का संकल्प

पूजा आरंभ करते समय मन में सप्तऋषियों का ध्यान करते हुए यह भाव रखें कि जाने-अनजाने में हुए दोषों के प्रायश्चित, आत्मशुद्धि और धर्ममय जीवन की प्रेरणा प्राप्त करने के लिए यह व्रत किया जा रहा है।

हे सप्तऋषिगण! जाने-अनजाने में मुझसे हुए अपराधों को क्षमा करें। मुझे सद्बुद्धि, संयम, ज्ञान और धर्म के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करें।

ऋषि पंचमी व्रत में क्या खाएँ?

ऋषि पंचमी व्रत में भोजन संबंधी नियम अलग-अलग क्षेत्रों और पारिवारिक परंपराओं में भिन्न पाए जाते हैं। प्राचीन व्रत-विधान में इस दिन शाक के सेवन का उल्लेख मिलता है। कई स्थानों पर श्रद्धालु फल, दूध, फलाहार अथवा साधारण सात्त्विक भोजन ग्रहण करते हैं।

यदि किसी व्यक्ति के स्वास्थ्य के कारण कठोर उपवास संभव न हो तो अपनी सामर्थ्य और चिकित्सकीय आवश्यकता के अनुसार व्रत करना उचित है। व्रत का मुख्य उद्देश्य श्रद्धा, संयम और आत्मशुद्धि है।

ऋषि पंचमी व्रत के नियम

  • प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • सप्तऋषियों का श्रद्धापूर्वक पूजन और स्मरण करें।
  • व्रत अपनी सामर्थ्य और स्वास्थ्य के अनुसार रखें।
  • दिनभर सात्त्विक विचार और संयम बनाए रखें।
  • क्रोध, निंदा, असत्य और कठोर वाणी से बचें।
  • ऋषि पंचमी व्रत कथा का पाठ अथवा श्रवण करें।
  • यथाशक्ति दान और सेवा करें।
  • दिनभर भगवान और ऋषियों का स्मरण करें।

ऋषि पंचमी व्रत और रजस्वला संबंधी पौराणिक मान्यता

ऋषि पंचमी की प्राचीन व्रत कथा में रजस्वला अवस्था के समय प्रचलित धार्मिक शुचिता और आचार संबंधी नियमों का उल्लेख मिलता है। प्राचीन धार्मिक परंपरा में इन नियमों की अवहेलना को दोष के रूप में वर्णित किया गया और ऋषि पंचमी व्रत को उसके प्रायश्चित से जोड़ा गया।

इन वर्णनों को उनके पारंपरिक और ऐतिहासिक धार्मिक संदर्भ में समझना चाहिए। मासिक धर्म स्त्री शरीर की एक स्वाभाविक जैविक प्रक्रिया है। ऋषि पंचमी व्रत का व्यापक आध्यात्मिक संदेश आत्मचिंतन, संयम, प्रायश्चित, सदाचार और ऋषि परंपरा के प्रति श्रद्धा है।

ऋषि पंचमी व्रत का फल

धार्मिक मान्यता के अनुसार श्रद्धा और विधिपूर्वक ऋषि पंचमी व्रत करने से सप्तऋषियों की कृपा प्राप्त होती है। यह व्रत मनुष्य को अपने कर्मों का आत्मनिरीक्षण करने, गलतियों के लिए प्रायश्चित करने और धर्ममय जीवन की ओर बढ़ने की प्रेरणा देता है।

इस दिन ऋषियों के ज्ञान, तप और त्याग का स्मरण करने से व्यक्ति में सद्बुद्धि, संयम, विनम्रता और आध्यात्मिक चेतना की वृद्धि होती है।

ऋषि पंचमी व्रत का वास्तविक संदेश

ऋषि पंचमी केवल एक धार्मिक कर्मकांड नहीं है। यह हमें स्मरण कराती है कि आज हमारे पास जो आध्यात्मिक और वैदिक ज्ञान उपलब्ध है, उसके पीछे हजारों वर्षों की ऋषि परंपरा का तप, साधना और ज्ञान है।

इस दिन सप्तऋषियों का पूजन करके हम उस ज्ञान परंपरा के प्रति अपनी कृतज्ञता व्यक्त करते हैं। साथ ही अपने जीवन और व्यवहार का आत्मनिरीक्षण करके अधिक सत्यनिष्ठ, संयमित और धर्मपरायण जीवन जीने का संकल्प लेते हैं।

ऋषि पंचमी से जुड़े सामान्य प्रश्न

ऋषि पंचमी कब मनाई जाती है?
ऋषि पंचमी भाद्रपद मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन सप्तऋषियों का श्रद्धापूर्वक पूजन और स्मरण किया जाता है।
ऋषि पंचमी 2026 में कब है?
वर्ष 2026 में ऋषि पंचमी मंगलवार, 15 सितंबर को मनाई जाएगी।
ऋषि पंचमी पर किन ऋषियों की पूजा की जाती है?
ऋषि पंचमी के दिन महर्षि कश्यप, अत्रि, भारद्वाज, विश्वामित्र, गौतम, जमदग्नि और वशिष्ठ—इन सप्तऋषियों का पूजन किया जाता है।
ऋषि पंचमी का व्रत क्यों रखा जाता है?
धार्मिक मान्यता के अनुसार ऋषि पंचमी का व्रत आत्मशुद्धि, प्रायश्चित तथा जाने-अनजाने में हुए आचार संबंधी दोषों के लिए क्षमा प्रार्थना करने और सप्तऋषियों के प्रति कृतज्ञता व्यक्त करने के लिए रखा जाता है।
क्या ऋषि पंचमी का व्रत केवल महिलाएँ रख सकती हैं?
ऋषि पंचमी का व्रत विशेष रूप से महिलाओं में प्रचलित है, लेकिन सप्तऋषियों का पूजन, स्मरण और व्रत कोई भी श्रद्धालु अपनी पारिवारिक परंपरा के अनुसार कर सकता है।
क्या ऋषि पंचमी पर माता अरुंधती की पूजा की जाती है?
हाँ, कई धार्मिक परंपराओं में सप्तऋषियों के साथ माता अरुंधती का भी श्रद्धापूर्वक स्मरण और पूजन किया जाता है।
ऋषि पंचमी में कौन-सा मंत्र पढ़ना चाहिए?
ऋषि पंचमी के दिन सप्तऋषियों का स्मरण करते हुए ‘कश्यपोऽत्रिर्भरद्वाजो विश्वामित्रोऽथ गौतमः। जमदग्निर्वसिष्ठश्च सप्तैते ऋषयः स्मृताः॥’ मंत्र का पाठ किया जा सकता है।
ऋषि पंचमी व्रत में क्या खाया जाता है?
ऋषि पंचमी के भोजन संबंधी नियम अलग-अलग क्षेत्रों और परिवारों में भिन्न हो सकते हैं। कई श्रद्धालु फलाहार, शाक अथवा सात्त्विक भोजन ग्रहण करते हैं। व्रत अपनी पारिवारिक परंपरा और स्वास्थ्य के अनुसार करना चाहिए।
ऋषि पंचमी व्रत कथा किससे संबंधित है?
प्रचलित पौराणिक ऋषि पंचमी व्रत कथा में राजा सिताश्व को ब्रह्माजी द्वारा उत्तंक ब्राह्मण, उनकी पत्नी सुशीला और उनकी पुत्री से संबंधित कथा सुनाई जाती है।
ऋषि पंचमी व्रत का मुख्य संदेश क्या है?
ऋषि पंचमी का मुख्य संदेश सप्तऋषियों और ऋषि परंपरा के प्रति कृतज्ञता, आत्मचिंतन, संयम, सदाचार, प्रायश्चित और धर्ममय जीवन की ओर आगे बढ़ना है।
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