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प्रदोष व्रत की कथा
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प्रदोष व्रत की कथा

Story [ Katha ] of Pradosh Vrat

प्रदोष व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की कृपा प्राप्त करने के लिए रखा जाने वाला अत्यंत शुभ व्रत माना जाता है। प्रत्येक मास के कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को यह व्रत किया जाता है। त्रयोदशी की संध्या का समय, जब सूर्यास्त के बाद रात्रि का आरम्भ होने लगता है, प्रदोष काल कहलाता है। इसी समय भगवान शिव की पूजा, जप, ध्यान और कथा श्रवण का विशेष महत्व माना गया है।

प्रदोष व्रत केवल एक उपवास नहीं है, बल्कि मन, वाणी और कर्म को पवित्र करने का संकल्प है। इस दिन भक्त श्रद्धा से भगवान शिव का पूजन करते हैं, “ॐ नमः शिवाय” का जप करते हैं और प्रदोष व्रत कथा सुनते या पढ़ते हैं। मान्यता है कि प्रदोष व्रत से जीवन के कष्ट, ऋण, रोग, भय, दरिद्रता और मानसिक अशांति दूर होती है तथा भगवान शिव की कृपा से सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त होती है।

प्रदोष व्रत क्या है?

प्रदोष व्रत त्रयोदशी तिथि को किया जाने वाला शिव उपासना का व्रत है। यह व्रत प्रत्येक माह में दो बार आता है — एक बार कृष्ण पक्ष में और एक बार शुक्ल पक्ष में। इस व्रत में संध्या समय भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा की जाती है। प्रदोष काल में शिव आराधना को विशेष फलदायी माना गया है क्योंकि यह समय शिव-पूजन, जप, ध्यान और प्रार्थना के लिए श्रेष्ठ माना जाता है।

प्रदोष व्रत में भक्त दिनभर संयम रखते हैं और संध्या समय शिवलिंग या भगवान शिव की प्रतिमा के सामने विधिपूर्वक पूजन करते हैं। इस व्रत में मन की शुद्धि, सत्य वचन, अहिंसा, दया, क्षमा, ब्रह्मचर्य और ईर्ष्या-निंदा से बचने का विशेष महत्व बताया गया है।

प्रदोष व्रत का महत्व

धार्मिक मान्यता के अनुसार प्रदोष व्रत भगवान शिव को अत्यंत प्रिय है। इस व्रत को करने से भक्त के जीवन में शिव कृपा का संचार होता है। प्रदोष काल में की गई पूजा मनुष्य के दोषों का शमन करने वाली मानी गई है। इसलिए इसे “प्रदोष” कहा गया है।

प्रदोष व्रत का महत्व केवल भौतिक इच्छाओं तक सीमित नहीं है। यह व्रत आत्मिक शांति, मन की स्थिरता, पापों के क्षय, शुभ संकल्प और ईश्वर के प्रति समर्पण की भावना को बढ़ाता है। जो भक्त श्रद्धा और नियम से प्रदोष व्रत करता है, उसके जीवन में धैर्य, संतुलन और शुभता बढ़ती है।

प्रदोष व्रत कब किया जाता है?

प्रदोष व्रत त्रयोदशी तिथि को किया जाता है। जिस दिन त्रयोदशी तिथि प्रदोष काल में आती है, उस दिन प्रदोष व्रत रखना श्रेष्ठ माना जाता है। प्रदोष काल सामान्यतः सूर्यास्त के आसपास का संध्या समय होता है। पूजा के लिए अपने स्थान के पंचांग के अनुसार प्रदोष काल अवश्य देखना चाहिए।

यदि किसी महीने में त्रयोदशी दो दिनों में पड़ रही हो, तो व्रत का निर्णय प्रदोष काल में त्रयोदशी की उपस्थिति देखकर किया जाता है। इसलिए सही तिथि और पूजा समय के लिए पंचांग का सहारा लेना उचित है।

प्रदोष व्रत पूजा सामग्री

  • भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या शिवलिंग
  • शुद्ध जल और गंगाजल
  • पंचामृत — दूध, दही, घी, शहद और शक्कर
  • बेलपत्र, धतूरा, आक के फूल या अन्य शिव प्रिय सामग्री
  • सफेद या सुगंधित पुष्प
  • अक्षत, रोली, चंदन और भस्म
  • धूप, दीप, कपूर और नैवेद्य
  • फल, मिठाई और प्रसाद
  • घी का दीपक
  • हवन सामग्री, यदि हवन करना हो

प्रदोष व्रत विधि

  • प्रदोष व्रत के दिन प्रातःकाल जल्दी उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें। यदि संभव हो तो श्वेत वस्त्र पहनें।
  • पूरे दिन मन ही मन भगवान शिव का स्मरण करें और “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करें।
  • अपनी शक्ति के अनुसार उपवास करें। जो भक्त निर्जल या निराहार व्रत कर सकते हैं, वे करें। जिनके लिए कठिन हो, वे फलाहार या नक्तव्रत कर सकते हैं।
  • दिनभर क्रोध, निंदा, असत्य, ईर्ष्या और किसी को कष्ट देने वाले कर्मों से बचें।
  • संध्या समय पुनः स्नान करके पूजा स्थान को स्वच्छ करें।
  • पूजा स्थान पर भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करें। यदि शिवलिंग हो तो उसका जल, गंगाजल या पंचामृत से अभिषेक करें।
  • भगवान शिव को बेलपत्र, पुष्प, अक्षत, चंदन, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
  • माता पार्वती का भी पूजन करें और शिव-पार्वती से परिवार, मन और जीवन की शांति के लिए प्रार्थना करें।
  • प्रदोष व्रत कथा पढ़ें या सुनें। कथा श्रवण के बिना व्रत अधूरा माना जाता है।
  • पूजा के बाद भगवान शिव की आरती करें और प्रसाद वितरित करें।
  • पूजा के बाद अपनी क्षमता के अनुसार दान करें और जरूरतमंदों की सहायता करें।

प्रदोष व्रत में जपने योग्य मंत्र

प्रदोष व्रत में भगवान शिव के मंत्रों का जप करना अत्यंत शुभ माना जाता है। भक्त अपनी श्रद्धा के अनुसार नीचे दिए गए मंत्रों में से किसी एक मंत्र का जप कर सकते हैं।

ॐ नमः शिवाय

ॐ ह्रीं क्लीं नमः शिवाय स्वाहा

ॐ त्र्यम्बकं यजामहे सुगन्धिं पुष्टिवर्धनम्।
उर्वारुकमिव बन्धनान्मृत्योर्मुक्षीय मामृतात्॥

प्रदोष काल में शांत मन से मंत्र जप करने से मन स्थिर होता है और भगवान शिव के प्रति भक्ति भाव गहरा होता है।

प्रदोष व्रत की कथा

स्कंद पुराण में वर्णित एक कथा के अनुसार प्राचीन काल में विदर्भ देश में सत्यरथ नाम के एक परम शिव भक्त, पराक्रमी और तेजस्वी राजा थे। उन्होंने अनेक वर्षों तक राज्य किया, परन्तु कभी एक दिन भी शिव पूजा में किसी प्रकार का अंतर नहीं आने दिया।

एक बार शाल्व देश के राजा ने कई अन्य राजाओं को साथ लेकर विदर्भ पर आक्रमण कर दिया। सात दिन तक घोर युद्ध होता रहा। अंत में दुर्भाग्यवश राजा सत्यरथ को परास्त होना पड़ा। इससे दुखी होकर वे देश छोड़कर कहीं चले गए। शत्रु नगर में घुस पड़े। रानी को जब यह ज्ञात हुआ तो वह राजमहल से निकलकर सघन वन में चली गई। उस समय वह नौ माह की गर्भवती थी और प्रसव का समय निकट था। अचानक एक दिन वन में ही उसने एक पुत्र को जन्म दिया। बच्चे को वहाँ अकेला छोड़कर वह प्यास के कारण जल लेने के लिए एक सरोवर के पास गई, जहाँ एक मगर ने उसे निगल लिया।

उसी समय उमा नाम की एक विधवा ब्राह्मणी अपने एक वर्ष के पुत्र शुचिव्रत को गोद में लिए उसी मार्ग से निकली। बिना नाल कटे नवजात बालक को देखकर उसे बड़ा आश्चर्य हुआ। वह सोचने लगी कि यदि इस बच्चे को अपने घर ले जाऊँगी तो लोग मुझ पर अनेक प्रकार की शंका करेंगे, और यदि इसे यहीं छोड़ दूँगी तो कोई हिंसक पशु इसे खा जाएगा।

वह इस प्रकार विचार कर ही रही थी कि भगवान शिव प्रकट हुए और उस विधवा से कहने लगे — “इस बच्चे को तुम अपने घर ले जाओ। यह राजपुत्र है। अपने पुत्र के समान इसकी रक्षा करना और लोगों के सामने इस बात को प्रकट न करना। इससे तुम्हारा भाग्योदय होगा।” इतना कहकर भगवान शिव अंतर्ध्यान हो गए। ब्राह्मणी ने उस राजपुत्र का नाम धर्मगुप्त रखा।

वह विधवा दोनों बालकों को साथ लेकर उस बच्चे के पिता को ढूँढने लगी। खोजते-खोजते वह शांडिल्य ऋषि के आश्रम में पहुँची। ऋषि ने बताया — “राजा सत्यरथ का देहांत हो गया है। पूर्व जन्म में प्रदोष व्रत को अधूरा छोड़ने के कारण ही उसकी ऐसी गति हुई है। रानी ने भी पूर्व जन्म में अपनी सपत्नी को मारा था, उसी ने इस जन्म में मगर के रूप में उससे बदला लिया।”

यह सुनकर ब्राह्मणी ने दोनों बालकों को ऋषि के चरणों में डाल दिया। ऋषि ने उन्हें शिव पंचाक्षरी मंत्र देकर प्रदोष व्रत करने का उपदेश दिया। इसके बाद ब्राह्मणी ऋषि का आश्रम छोड़कर एकचक्रा नगरी में रहने लगी। वहाँ उसने चार माह तक शिव आराधना करते हुए प्रदोष व्रत किया।

एक दिन शुचिव्रत को अशर्फियों से भरा स्वर्ण कलश मिला। वह उसे लेकर घर आ गया। माता यह देखकर अत्यंत प्रसन्न हुई और उसे प्रदोष व्रत की महिमा का ज्ञान हुआ।

एक दिन दोनों बालक वन में घूम रहे थे। तभी उन्हें कुछ गंधर्व कन्याएँ दिखाई दीं। ब्राह्मण बालक तो घर लौट आया, किंतु राजकुमार धर्मगुप्त “अंशुमती” नाम की गंधर्व कन्या से बात करने लगा। अंशुमती ने धर्मगुप्त से कहा — “मैं एक गंधर्वराज की कन्या हूँ। श्री शिवजी ने मेरे पिता से कहा है कि अपनी कन्या का विवाह राजा सत्यरथ के पुत्र धर्मगुप्त से करना।”

तब धर्मगुप्त ने कहा — “मैं वही धर्मगुप्त हूँ।” इसके बाद अंशुमती ने विवाह के लिए राजकुमार को अपने पिता से मिलवाने का निमंत्रण दिया। धर्मगुप्त ने लौटकर अपनी माता को सारी बात बताई। ब्राह्मणी ने इसे शिव पूजा का फल और शांडिल्य मुनि का आशीर्वाद समझा। बड़े आनंद से धर्मगुप्त और अंशुमती का विवाह संपन्न हुआ। गंधर्वराज ने उन्हें बहुत धन, दास-दासी और संपत्ति प्रदान की।

इसके बाद राजकुमार धर्मगुप्त ने गंधर्व सेना की सहायता से विदर्भ देश पर पुनः अधिकार प्राप्त किया। यह सब ब्राह्मणी और राजकुमार धर्मगुप्त द्वारा श्रद्धापूर्वक प्रदोष व्रत करने का फल था।

स्कंदपुराण के अनुसार, जो भक्त प्रदोष व्रत के दिन शिव पूजा के बाद एकाग्र होकर प्रदोष व्रत कथा सुनता या पढ़ता है, उसे सौ जन्मों तक दरिद्रता का सामना नहीं करना पड़ता।

दिन के अनुसार प्रदोष व्रत

प्रदोष व्रत जिस वार को पड़ता है, उसी के अनुसार उसका नाम, पारंपरिक महत्व और कथा बताई जाती है। सभी प्रदोष व्रत भगवान शिव की पूजा के लिए शुभ माने जाते हैं, लेकिन वार के अनुसार इनके विशेष फल और कथाएँ अलग-अलग मानी गई हैं। नीचे रवि प्रदोष से लेकर शनि प्रदोष तक का महत्व और कथा सरल हिन्दी में दी गई है।

वार प्रदोष व्रत का नाम पारंपरिक महत्व
रविवार रवि प्रदोष सुख, शांति, यश, आरोग्य और दीर्घायु के लिए शुभ माना जाता है।
सोमवार सोम प्रदोष भगवान शिव की विशेष कृपा, मानसिक शांति और मनोकामना पूर्ति के लिए श्रेष्ठ माना जाता है।
मंगलवार भौम प्रदोष कष्ट निवारण, स्वास्थ्य लाभ और साहस-शक्ति के लिए शुभ माना जाता है।
बुधवार बुध प्रदोष ज्ञान, बुद्धि, शुभ विचार और इच्छापूर्ति के लिए फलदायी माना जाता है।
गुरुवार गुरु प्रदोष शत्रु बाधा से रक्षा, गुरु कृपा और पूर्वजों के आशीर्वाद के लिए शुभ माना जाता है।
शुक्रवार शुक्र प्रदोष सौभाग्य, दांपत्य सुख, समृद्धि और सकारात्मकता के लिए शुभ माना जाता है।
शनिवार शनि प्रदोष संतान सुख, शनि संबंधी कष्टों की शांति और दीर्घकालिक बाधाओं के निवारण के लिए शुभ माना जाता है।

वार के अनुसार प्रदोष व्रत कथा

प्रदोष व्रत में कथा सुनना या पढ़ना विशेष फलदायी माना जाता है। जिस दिन प्रदोष व्रत होता है, उस वार की कथा पढ़ने से व्रत का महत्व और भी बढ़ जाता है।

रवि प्रदोष व्रत कथा

रविवार के दिन पड़ने वाले प्रदोष व्रत को रवि प्रदोष कहा जाता है। यह व्रत सुख, शांति, यश, आरोग्य और दीर्घायु देने वाला माना गया है। रवि प्रदोष का संबंध सूर्य देव से भी माना जाता है, इसलिए यह व्रत सम्मान, तेज और जीवन में सकारात्मक ऊर्जा बढ़ाने वाला बताया गया है।

एक समय गंगा तट पर ऋषियों की विशाल सभा हुई। उस सभा में सूत जी महाराज पधारे। ऋषियों ने उनसे पूछा कि यह मंगलकारी और कष्ट दूर करने वाला प्रदोष व्रत सबसे पहले किसने किया और उसका क्या फल मिला। सूत जी ने कहा कि एक गांव में एक निर्धन ब्राह्मण रहता था। उसकी पत्नी धर्मपरायण थी और प्रदोष व्रत किया करती थी। उनका एक पुत्र था।

एक दिन वह बालक गंगा स्नान के लिए गया। मार्ग में चोरों ने उसे घेर लिया और उससे धन के बारे में पूछने लगे। बालक ने विनम्रता से कहा कि उसके पास कोई धन नहीं है, उसकी पोटली में केवल उसकी माता द्वारा दी गई रोटियां हैं। उसकी गरीबी देखकर चोरों ने उसे छोड़ दिया। आगे चलकर बालक थककर एक वृक्ष के नीचे सो गया। उसी समय नगर के सिपाही चोरों की खोज करते हुए वहां पहुंचे और बालक को चोर समझकर राजा के सामने ले गए। राजा ने बिना पूरी बात सुने उसे कारागार में डाल दिया।

घर पर बालक के न लौटने से उसकी माता बहुत चिंतित हुई। अगले दिन प्रदोष व्रत था। उसने श्रद्धा से व्रत किया और भगवान शिव से अपने पुत्र की रक्षा की प्रार्थना की। भगवान शिव ने उसकी प्रार्थना स्वीकार की और उसी रात राजा को स्वप्न में आदेश दिया कि बालक निर्दोष है, उसे तुरंत मुक्त किया जाए।

प्रातः राजा ने बालक को मुक्त कर दिया। बालक ने पूरी घटना राजा को सुनाई। राजा को अपनी भूल का ज्ञान हुआ। उसने ब्राह्मण परिवार को सम्मान दिया और उनकी आजीविका के लिए गांव दान में दिए। भगवान शिव की कृपा से वह परिवार सुखपूर्वक रहने लगा। इसलिए रवि प्रदोष व्रत को आरोग्य, सम्मान और सुख देने वाला माना जाता है।

सोम प्रदोष व्रत कथा

सोमवार के दिन आने वाला प्रदोष व्रत सोम प्रदोष कहलाता है। सोमवार भगवान शिव का प्रिय दिन माना जाता है, इसलिए इस दिन प्रदोष व्रत का महत्व और भी अधिक बताया गया है। यह व्रत मनोकामना पूर्ति, मानसिक शांति और संतान सुख के लिए शुभ माना जाता है।

प्राचीन समय में एक नगर में एक ब्राह्मणी रहती थी। उसके पति का देहांत हो चुका था। वह अपने पुत्र के साथ भिक्षा मांगकर जीवन चलाती थी। एक दिन जब वह भिक्षा लेकर लौट रही थी, तो उसे मार्ग में एक घायल बालक मिला। दया से प्रेरित होकर वह उसे अपने घर ले आई और पुत्रवत उसका पालन करने लगी।

वह बालक विदर्भ देश का राजकुमार था। शत्रुओं ने उसके राज्य पर आक्रमण कर दिया था और वह संकट में भटक रहा था। ब्राह्मणी ने उसे अपने पुत्र के साथ रहने दिया। वह स्वयं श्रद्धा से प्रदोष व्रत करती थी और भगवान शिव का स्मरण करती थी।

एक दिन एक गंधर्व कन्या अंशुमती ने उस राजकुमार को देखा और उसके प्रति आकर्षित हुई। बाद में उसके माता-पिता भी राजकुमार से मिले। भगवान शिव की प्रेरणा से गंधर्व कन्या का विवाह उस राजकुमार से कर दिया गया।

ब्राह्मणी के प्रदोष व्रत के पुण्य प्रभाव और गंधर्वराज की सहायता से राजकुमार ने अपने शत्रुओं को पराजित किया और अपना राज्य पुनः प्राप्त कर लिया। उसने ब्राह्मणी के पुत्र को अपना प्रधानमंत्री बनाया। इस कथा से यह संदेश मिलता है कि भगवान शिव की कृपा से दुख, दरिद्रता और विपत्ति दूर होकर जीवन में शुभ परिवर्तन आते हैं।

भौम प्रदोष व्रत कथा

मंगलवार को पड़ने वाला प्रदोष व्रत भौम प्रदोष या मंगल प्रदोष कहलाता है। यह व्रत स्वास्थ्य, साहस, कष्ट निवारण और जीवन में समृद्धि के लिए शुभ माना गया है। भौम प्रदोष में भगवान शिव के साथ हनुमान जी की कृपा का भी स्मरण किया जाता है, क्योंकि हनुमान जी को रुद्रावतार माना गया है।

एक नगर में एक वृद्धा रहती थी। उसका एक पुत्र था, जिसका नाम मंगल्या था। वृद्धा हनुमान जी की परम भक्त थी। वह प्रत्येक मंगलवार को नियमपूर्वक व्रत रखती और हनुमान जी की पूजा करती थी। उस दिन वह न घर लीपती थी और न मिट्टी खोदती थी।

एक बार हनुमान जी ने उसकी श्रद्धा की परीक्षा लेने का निश्चय किया। वे साधु का वेश धारण करके उसके घर पहुंचे और भोजन की इच्छा प्रकट की। साधु ने वृद्धा से कहा कि वह जमीन लीप दे ताकि वे भोजन बना सकें। वृद्धा ने विनम्रता से कहा कि मंगलवार के व्रत के कारण वह लीपना या मिट्टी खोदना नहीं कर सकती, लेकिन कोई दूसरी सेवा हो तो अवश्य करेगी।

साधु ने उससे प्रतिज्ञा कराई और फिर कहा कि वह अपने पुत्र को बुलाए, क्योंकि वे उसकी पीठ पर अग्नि जलाकर भोजन बनाएंगे। वृद्धा कठिन परीक्षा में पड़ गई, लेकिन प्रतिज्ञा निभाने के लिए उसने अपने पुत्र को बुलाया। साधु ने उसकी पीठ पर अग्नि जलाकर भोजन बनाया। वृद्धा दुखी होकर भीतर चली गई।

भोजन बन जाने पर साधु ने कहा कि अपने पुत्र मंगल्या को बुलाओ ताकि वह भी भोग लगा सके। वृद्धा रोते हुए पुत्र का नाम पुकारने लगी। आश्चर्य की बात यह हुई कि मंगल्या जीवित और स्वस्थ अवस्था में दौड़ता हुआ आ गया। तब साधु अपने वास्तविक रूप में प्रकट हुए। हनुमान जी के दर्शन पाकर वृद्धा का जीवन धन्य हो गया। इस कथा से भौम प्रदोष व्रत में श्रद्धा, धैर्य और भक्ति की महिमा प्रकट होती है।

बुध प्रदोष व्रत कथा

बुधवार को आने वाला प्रदोष व्रत बुध प्रदोष या सौम्य प्रदोष कहलाता है। यह व्रत बुद्धि, ज्ञान, शुभ निर्णय और मनोकामना पूर्ति के लिए शुभ माना जाता है। परंपरा में बुध प्रदोष के दिन संयम और शुभ व्यवहार का विशेष महत्व बताया गया है।

एक पुरुष का नया-नया विवाह हुआ था। विवाह के कुछ दिन बाद उसकी पत्नी मायके चली गई। कुछ समय बाद वह अपनी पत्नी को लेने ससुराल पहुंचा। जिस दिन वह पत्नी को विदा कराकर वापस आना चाहता था, वह बुधवार था। ससुराल पक्ष ने उसे समझाया कि बुधवार को विदाई करना शुभ नहीं माना जाता, लेकिन वह अपनी जिद पर अड़ा रहा। अंत में सास-ससुर ने भारी मन से अपनी पुत्री को विदा कर दिया।

पति-पत्नी बैलगाड़ी से लौट रहे थे। मार्ग में पत्नी को प्यास लगी। पति जल लेने गया और पत्नी एक वृक्ष के नीचे बैठ गई। जब पति पानी लेकर लौटा तो उसने देखा कि उसकी पत्नी किसी दूसरे पुरुष से बात कर रही है और उसी के लोटे से पानी पी रही है। वह क्रोधित हुआ, लेकिन पास पहुंचकर चकित रह गया, क्योंकि वह दूसरा पुरुष उसी के समान दिखता था।

दोनों समान रूप वाले पुरुषों में विवाद होने लगा। लोग इकट्ठा हो गए और सिपाही भी आ गए। जब स्त्री से पूछा गया कि उसका वास्तविक पति कौन है, तो वह असमंजस में पड़ गई। तब उस पुरुष को अपनी भूल का एहसास हुआ। उसने भगवान शिव से प्रार्थना की कि उसने बड़ों की बात न मानकर भूल की है, अब वह ऐसा नहीं करेगा।

जैसे ही उसकी प्रार्थना पूरी हुई, दूसरा पुरुष अदृश्य हो गया। पति-पत्नी सुरक्षित घर लौट आए। इसके बाद दोनों ने नियमपूर्वक बुध प्रदोष व्रत करना आरम्भ किया। इस कथा से सीख मिलती है कि शुभ-अशुभ समय, बड़ों की सलाह और संयम का पालन जीवन में आवश्यक है।

गुरु प्रदोष व्रत कथा

गुरुवार को पड़ने वाला प्रदोष व्रत गुरु प्रदोष कहलाता है। यह व्रत शत्रु बाधा से रक्षा, संकट निवारण, गुरु कृपा और पूर्वजों के आशीर्वाद के लिए शुभ माना जाता है।

एक समय इन्द्र और वृत्रासुर की सेनाओं में भयंकर युद्ध हुआ। देवताओं ने असुरों की सेना को पराजित कर दिया, लेकिन वृत्रासुर अत्यंत क्रोधित होकर युद्ध के लिए आगे बढ़ा। उसने अपनी असुर माया से भयानक रूप धारण कर लिया। उसके विकराल स्वरूप को देखकर इन्द्र सहित सभी देवता भयभीत हो गए और गुरु बृहस्पति की शरण में पहुंचे।

बृहस्पति जी ने देवताओं को वृत्रासुर का पूर्व जन्म बताया। उन्होंने कहा कि वृत्रासुर पहले चित्ररथ नाम का राजा था। एक बार वह कैलाश पर्वत गया। वहां उसने भगवान शिव के समीप माता पार्वती को देखकर अनुचित उपहास किया। माता पार्वती उसके इस व्यवहार से क्रोधित हुईं और उसे असुर योनि में जन्म लेने का शाप दिया। उसी शाप के कारण वह वृत्रासुर बना।

बृहस्पति जी ने इन्द्र से कहा कि वृत्रासुर शिव भक्त है, इसलिए उसे पराजित करने के लिए भगवान शिव की कृपा आवश्यक है। उन्होंने इन्द्र को गुरु प्रदोष व्रत करने का उपदेश दिया। इन्द्र ने श्रद्धा से गुरु प्रदोष व्रत किया और भगवान शिव की पूजा की। व्रत के प्रभाव से इन्द्र ने वृत्रासुर पर विजय प्राप्त की और देवताओं में फिर से शांति स्थापित हुई।

शुक्र प्रदोष व्रत कथा

शुक्रवार के दिन पड़ने वाला प्रदोष व्रत शुक्र प्रदोष या भृगु प्रदोष कहलाता है। यह व्रत सौभाग्य, दांपत्य सुख, समृद्धि और नकारात्मकता के नाश के लिए शुभ माना गया है।

प्राचीन समय में एक नगर में तीन मित्र रहते थे। उनमें एक राजकुमार, दूसरा ब्राह्मण पुत्र और तीसरा धनिक पुत्र था। राजकुमार और ब्राह्मण पुत्र का विवाह हो चुका था। धनिक पुत्र का भी विवाह हो गया था, लेकिन उसकी पत्नी का गौना अभी बाकी था।

एक दिन तीनों मित्र स्त्रियों के महत्व पर चर्चा कर रहे थे। ब्राह्मण पुत्र ने कहा कि स्त्री के बिना घर सूना होता है। यह सुनकर धनिक पुत्र तुरंत अपनी पत्नी को लाने का निश्चय कर बैठा। उसके माता-पिता ने उसे समझाया कि अभी शुक्र अस्त है, ऐसे समय बहू को विदा कराना शुभ नहीं माना जाता। ससुराल पक्ष ने भी उसे रोकने का प्रयास किया, लेकिन उसने किसी की बात नहीं मानी।

धनिक पुत्र अपनी पत्नी को विदा कराकर लौटने लगा। मार्ग में उनकी बैलगाड़ी का पहिया टूट गया और बैल की टांग भी घायल हो गई। आगे डाकुओं ने उनका धन लूट लिया। किसी तरह वे घर पहुंचे, लेकिन वहां धनिक पुत्र को सर्प ने डस लिया। वैद्य ने कहा कि उसकी मृत्यु निकट है।

जब ब्राह्मण मित्र को यह बात पता चली, तो उसने धनिक पुत्र के माता-पिता को शुक्र प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। उसने कहा कि यह संकट इसलिए आया है क्योंकि शुक्र अस्त के समय पत्नी को विदा कराया गया। ब्राह्मण की सलाह मानकर धनिक पुत्र को पत्नी सहित वापस ससुराल भेजा गया और श्रद्धा से शुक्र प्रदोष व्रत किया गया। इसके प्रभाव से धनिक पुत्र की स्थिति सुधरने लगी और सभी संकट दूर हो गए। बाद में पति-पत्नी ने सुखपूर्वक जीवन बिताया।

शनि प्रदोष व्रत कथा

शनिवार को पड़ने वाला प्रदोष व्रत शनि प्रदोष कहलाता है। इसे कई परंपराओं में अत्यंत महत्वपूर्ण प्रदोष माना गया है। यह व्रत संतान सुख, खोए हुए पद या सम्मान की प्राप्ति, शनि संबंधी कष्टों की शांति और जीवन की बाधाओं के निवारण के लिए शुभ माना जाता है।

शनि प्रदोष व्रत कथा – 1

प्राचीन समय में एक निर्धन ब्राह्मण की पत्नी बहुत दुखी थी। वह अपने दोनों पुत्रों के साथ शांडिल्य ऋषि के पास गई और दुख निवारण का उपाय पूछा। ऋषि ने उसे भगवान शिव का प्रदोष व्रत करने की सलाह दी। स्त्री और उसके दोनों पुत्र श्रद्धा से प्रदोष व्रत करने लगे।

कुछ समय बाद छोटे पुत्र को स्नान के लिए जाते समय मार्ग में धन से भरा स्वर्ण कलश मिला। वह धन लेकर घर आया। माता ने इसे भगवान शिव की कृपा माना और दोनों पुत्रों में बांटने को कहा। परंतु बड़े पुत्र ने कहा कि जो धन भगवान शिव उसे देंगे, वही वह स्वीकार करेगा। वह शिव पूजा में लगा रहा।

बाद में दोनों भाई वन में गए। वहां बड़े पुत्र की भेंट एक गंधर्व कन्या अंशुमती से हुई। वह राजकुमार पर मोहित हो गई। गंधर्वराज ने बताया कि भगवान शिव की आज्ञा से वह अपनी पुत्री का विवाह उसी राजकुमार से करने आया है। विवाह के बाद गंधर्वराज की सहायता और भगवान शिव की कृपा से राजकुमार ने अपना खोया हुआ राज्य प्राप्त किया। इस कथा से शनि प्रदोष व्रत की महिमा और शिव कृपा से भाग्योदय का संकेत मिलता है।

शनि प्रदोष व्रत कथा – 2

एक नगर में एक सेठ रहता था। वह धनवान और दयालु था। उसके घर से कोई भी खाली हाथ नहीं लौटता था। सबको दान देने के बाद भी सेठ और उसकी पत्नी दुखी थे, क्योंकि उनके यहां संतान नहीं थी। संतान न होने से दोनों मन ही मन व्यथित रहते थे।

एक दिन सेठ और उसकी पत्नी तीर्थ यात्रा पर निकले। नगर से बाहर उन्हें एक तेजस्वी साधु वृक्ष के नीचे समाधि में बैठे दिखाई दिए। दोनों ने सोचा कि साधु का आशीर्वाद लेकर यात्रा आरम्भ करनी चाहिए। वे हाथ जोड़कर साधु के सामने बैठ गए और उनकी समाधि टूटने की प्रतीक्षा करने लगे। सुबह से शाम और फिर रात बीत गई, लेकिन दोनों धैर्यपूर्वक वहीं बैठे रहे।

अगले दिन साधु समाधि से उठे। सेठ और उसकी पत्नी की श्रद्धा और धैर्य देखकर वे प्रसन्न हुए। उन्होंने कहा कि वे उनके मन का दुख समझ गए हैं। साधु ने उन्हें संतान प्राप्ति के लिए शनि प्रदोष व्रत करने की विधि बताई और भगवान शिव की आराधना का उपदेश दिया।

तीर्थ यात्रा से लौटकर सेठ और उसकी पत्नी ने नियमपूर्वक शनि प्रदोष व्रत करना शुरू किया। कुछ समय बाद सेठ की पत्नी ने एक सुंदर पुत्र को जन्म दिया। भगवान शिव की कृपा से उनके जीवन का अंधकार दूर हुआ और घर में आनंद भर गया।

प्रदोष व्रत में क्या करें?

  • प्रातः और संध्या समय भगवान शिव का ध्यान करें।
  • संध्या में प्रदोष काल के समय शिव-पार्वती की पूजा करें।
  • “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप करें।
  • शिवलिंग पर जल, दूध या पंचामृत से अभिषेक करें।
  • बेलपत्र, पुष्प, धूप और दीप अर्पित करें।
  • प्रदोष व्रत कथा अवश्य पढ़ें या सुनें।
  • दान, सेवा और विनम्रता का भाव रखें।

प्रदोष व्रत में क्या न करें?

  • क्रोध, कटु वचन और निंदा से बचें।
  • ईर्ष्या, छल और असत्य आचरण न करें।
  • पूजा के समय मन को इधर-उधर न भटकने दें।
  • बिना श्रद्धा और संयम के केवल दिखावे के लिए व्रत न करें।
  • यदि स्वास्थ्य अनुकूल न हो तो कठोर उपवास न करें। अपनी क्षमता के अनुसार व्रत रखें।

प्रदोष व्रत उद्यापन विधि

जो भक्त नियमित रूप से प्रदोष व्रत करते हैं, वे अपनी श्रद्धा और सामर्थ्य के अनुसार कुछ व्रतों के बाद उद्यापन कर सकते हैं। परंपरा में 11 या 26 त्रयोदशी व्रत के बाद उद्यापन करने का विधान बताया गया है। उद्यापन का उद्देश्य व्रत को पूर्ण श्रद्धा के साथ भगवान शिव को समर्पित करना है।

  • उद्यापन से एक दिन पहले भगवान गणेश का पूजन करें।
  • रात्रि में भगवान शिव, माता पार्वती और श्री गणेश के भजन-कीर्तन करें।
  • उद्यापन के दिन प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • पूजा स्थान को शुद्ध करें और रंगोली या मंडप बनाकर पूजा की तैयारी करें।
  • चौकी पर भगवान शिव और माता पार्वती की प्रतिमा या शिवलिंग स्थापित करें।
  • विधिपूर्वक शिव-पार्वती का पूजन करें और भोग अर्पित करें।
  • प्रदोष व्रत कथा सुनें या सुनाएं।
  • यदि संभव हो तो हवन करें और भगवान शिव को समर्पित आहुतियां दें।
  • पूजा के बाद आरती करें और उपस्थित लोगों को प्रसाद दें।
  • ब्राह्मण, साधु, गरीब या जरूरतमंद व्यक्ति को भोजन, वस्त्र या दक्षिणा दें।
  • अंत में भगवान शिव से क्षमा प्रार्थना करें और व्रत को पूर्ण मानकर प्रसाद ग्रहण करें।

प्रदोष व्रत का आध्यात्मिक संदेश

प्रदोष व्रत हमें यह सिखाता है कि जीवन की कठिनाइयों में भी श्रद्धा, धैर्य और संयम नहीं छोड़ना चाहिए। भगवान शिव सरल भाव से प्रसन्न होने वाले देव हैं। जो भक्त सच्चे मन से उनका स्मरण करता है, उसके जीवन में मार्ग अपने समय पर खुलता है।

इस व्रत में उपवास से अधिक महत्व भाव का है। यदि कोई व्यक्ति पूरे नियम से कठोर व्रत न भी कर सके, फिर भी श्रद्धा, स्वच्छता, जप, पूजा, कथा और अच्छे आचरण के साथ प्रदोष व्रत कर सकता है। भगवान शिव भक्त के भाव को देखते हैं।

प्रदोष व्रत से जुड़े सामान्य प्रश्न

प्रदोष व्रत किस देवता के लिए रखा जाता है?
प्रदोष व्रत भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा के लिए रखा जाता है। इस दिन शिवलिंग का अभिषेक, मंत्र जप और प्रदोष व्रत कथा का विशेष महत्व है।
प्रदोष व्रत कब रखा जाता है?
प्रदोष व्रत प्रत्येक मास की कृष्ण पक्ष और शुक्ल पक्ष की त्रयोदशी तिथि को रखा जाता है। पूजा प्रदोष काल में की जाती है।
क्या प्रदोष व्रत में निर्जल रहना आवश्यक है?
निर्जल या निराहार व्रत श्रेष्ठ माना गया है, लेकिन यह सभी के लिए संभव नहीं होता। स्वास्थ्य और क्षमता के अनुसार फलाहार या नक्तव्रत भी किया जा सकता है।
प्रदोष व्रत में कौन सा मंत्र जपना चाहिए?
प्रदोष व्रत में “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का जप सबसे सरल और शुभ माना जाता है। भक्त महामृत्युंजय मंत्र का जप भी कर सकते हैं।
क्या प्रदोष व्रत की पूजा घर पर कर सकते हैं?
हाँ, प्रदोष व्रत की पूजा घर पर की जा सकती है। यदि संभव हो तो शिव मंदिर जाकर भी पूजा कर सकते हैं। मुख्य बात श्रद्धा, स्वच्छता और एकाग्रता है।
प्रदोष व्रत उद्यापन कब करना चाहिए?
परंपरा के अनुसार 11 या 26 प्रदोष व्रत पूर्ण करने के बाद उद्यापन किया जा सकता है। उद्यापन में शिव-पार्वती पूजन, कथा, हवन, आरती, प्रसाद और दान का विधान माना गया है।

निष्कर्ष

प्रदोष व्रत भगवान शिव की कृपा प्राप्त करने का सरल और प्रभावशाली मार्ग है। यह व्रत मनुष्य को संयम, भक्ति, शांति और शुभ आचरण की ओर ले जाता है। जो भक्त श्रद्धा से प्रदोष काल में शिव-पार्वती की पूजा करता है, व्रत कथा सुनता है और जीवन में सदाचार अपनाता है, उस पर भगवान शिव की कृपा बनी रहती है।

ॐ नमः शिवाय। हर हर महादेव।

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