जब भगवान विष्णु ने श्रीकृष्ण रूप में अवतार लिया, तब देव-देवियों ने भी गोप-गोपियों का रूप धारण कर उनकी लीलाओं में सहभाग किया। दिव्य गौ माता कामधेनु ने भी प्रभु सेवा हेतु अपने अंश से बहुला नाम की गाय के रूप में नंद बाबा की गौशाला में अवतार लिया।
श्रीकृष्ण का बहुला से अत्यंत स्नेह था। एक दिन प्रभु ने उसकी सत्यनिष्ठा परखने के लिए सिंह रूप धारण किया। वन में चरती बहुला के सामने सिंह आ खड़ा हुआ। बहुला विनम्रता से बोली— “हे वनराज! मेरा बछड़ा भूखा है, पहले उसे दूध पिला आऊँ, फिर आपके भोजन हेतु स्वयं लौट आऊँगी।”
सिंह (स्वयं श्रीकृष्ण) ने कहा— “सामने आए आहार को कैसे जाने दूँ?” बहुला ने सत्य और धर्म की शपथ ली कि वह अवश्य लौटेगी। उसकी प्रतिज्ञा से प्रसन्न होकर सिंह ने मार्ग दे दिया। बहुला बछड़े को दूध पिलाकर प्रतिज्ञानुसार लौट आई।
बहुला की सत्यव्रता देखकर श्रीकृष्ण अपने वास्तविक स्वरूप में प्रकट हुए और आशीर्वाद दिया— “भाद्रपद कृष्ण चतुर्थी को तुम्हारी गौ-माता रूप में पूजा होगी। श्रद्धापूर्वक पूजन करने वालों को धन-धान्य, संतान-सौभाग्य और गो-सेवा का पुण्य प्राप्त होगा।”
बहुला चतुर्थी व्रत विधि (चरणबद्ध)
1) तैयारी व संकल्प
प्रातः स्नान कर स्वच्छ/सफेद या पीले वस्त्र धारण करें। पूजा स्थान स्वच्छ कर वहाँ गौ माता/बहुला की प्रतिमा या चित्र रखें; साथ में श्रीकृष्ण का चित्र/विग्रह रखें।
हाथ में जल, अक्षत, पुष्प लेकर संकल्प करें— “आज मैं बहुला चतुर्थी का व्रत श्रीकृष्ण एवं गौ माता बहुला को समर्पित कर रही/रहा हूँ; नियमपूर्वक उपवास व पूजन करूँगा/करूँगी।”
2) पूजन सामग्रियाँ
रोली-कुमकुम, अक्षत, हल्दी, चंदन, दूब/घास, पुष्प-माला, धूप-दीप, नैवेद्य (दूध, दही, घी, मिश्री, गुड़), शुद्ध जल, रक्षासूत्र, ताँबे/पीतल का कलश, अगर संभव हो तो गो-चारा (हरी घास/चारा)।
3) मूल पूजा-विधि
कलश स्थापना कर मंगल दीप जलाएँ। श्रीकृष्ण और गौ माता बहुला का आह्वान करें— “ॐ गोमाते नमः, ॐ कृष्णाय नमः।”
चंदन, अक्षत, पुष्प से बहुला (गौ) एवं श्रीकृष्ण की पूजा करें; दूब अर्पित करें; नैवेद्य में दूध-दही-माखन-मिश्री अर्पित करें।
सरल जप (11/21/108 बार): “ॐ गोमाते नमः” तथा “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय”।
बहुला कथा का श्रद्धापूर्वक पाठ करें (ऊपर दी गई कथा)। कथा के पश्चात आरती करें— “ॐ जय गोमाते माता…” या “ॐ जय श्रीकृष्ण हरे…”
4) विशेष अनुष्ठान
यदि संभव हो, गौ-सेवा करें: चारा-रोटी, गुड़-चना, जल सेवा, गोशाला दान। यह व्रत का प्रधान अंग माना गया है।
संध्या/सायंकाल पुनः दीप प्रज्वलित कर संक्षिप्त पूजन और आरती करें।
5) उपवास व नियम
क्षमता अनुसार निर्जल/फलाहार/सात्त्विक व्रत रखें। लहसुन-प्याज, तामसिक पदार्थ व नशे से बचें।
“गौ-अहिंसा” का संकल्प लें— किसी जीव को कष्ट न पहुँचाएँ, मधुर वाणी रखें, क्रोध-द्वेष त्यागें।
6) पारण (समापन)
अगली तिथि (पंचांगानुसार) में ब्राह्मण/गौ-सेवा/दानी-कर्म के साथ व्रत का पारण करें; प्रसाद-वितरण करें।
7) फलश्रुति
शास्त्रीय परंपरा के अनुसार बहुला चतुर्थी का विधिवत व्रत— धन-समृद्धि, संतान-सौभाग्य, रोग-शोक से रक्षा, और गौ-सेवा का अखंड पुण्य प्रदान करता है; गृह में सौभाग्य और शांति बढ़ती है।
संक्षिप्त मंत्र/प्रार्थना
गो-मंत्र: “ॐ गोमाते नमः।”
कृष्ण मंत्र: “ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।”
प्रार्थना: “हे गो-माते बहुला! सत्य, धर्म और करुणा का संकल्प मेरी जीवन-नाड़ी में प्रवाहित हो; मेरे घर-आँगन में सुख-समृद्धि और संतति-सौभाग्य स्थिर रहे।”


