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श्री वक्त्रेश्वर शक्तिपीठ

श्री वक्त्रेश्वर शक्तिपीठ

पश्चिम बंगाल के बीरभूम मण्डल में स्थित श्री वक्त्रेश्वर शक्तिपीठ (बकरेश्वर) सनातन धर्म के प्रमुख और पावन तीर्थस्थलों में से एक है। बकरेश्वर नदी (पापहरा नदी) के तट पर स्थित यह पवित्र पीठ शैव और शाक्त परम्परा के समन्वय का पावन संगम है।

परिचय

वक्त्रेश्वर शक्तिपीठ पश्चिम बंगाल के बीरभूम जनपद के दुबराजपुर प्रखण्ड के बकरेश्वर ग्राम में स्थित है। यहाँ जगज्जननी भगवती महिषमर्दिनी और भगवान शिव के भैरव स्वरूप वक्रनाथ का वास है। प्राकृतिक तप्त जल के पावन कुण्डों तथा आध्यात्मिक ऊर्जा के कारण यह स्थल सदियों से साधकों और श्रद्धालुओं की आस्था का प्रमुख केन्द्र रहा है।

शक्तिपीठ बनने की कथा

पौराणिक आख्यानों के अनुसार जब प्रजापति दक्ष के यज्ञ में माता सती ने अपने प्राण त्याग दिए, तब भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर व्यथित होकर विचरण करने लगे। सृष्टि के सन्तुलन की रक्षा के लिए भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के पार्थिव शरीर के विभिन्न अंगों का विभाजन किया। वे अंग और आभूषण जहाँ-जहाँ गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ के रूप में पूजित हुए।

सती का अंग/आभूषण

तन्त्र साहित्य के प्रामाणिक ग्रन्थ पीठनिर्णय (तन्त्रचूड़ामणि) के अनुसार वक्त्रेश्वर में माता सती का मन (मानस) गिरा था। लोक-परम्परा और क्षेत्रीय मान्यताओं में इसे दोनों भौंहों के मध्य का भाग (भ्रूमध्य अथवा आज्ञा चक्र) भी माना जाता है।

वक्रेश्वरे मनःपातो वक्रनाथस्तु भैरवः।

नदी पापहरा तत्र देवी महिषमर्दिनी॥

देवी का नाम

इस शक्तिपीठ में प्रतिष्ठापित देवी को महिषमर्दिनी के नाम से पूजा जाता है। यह स्वरूप दुष्ट प्रवृत्तियों और अहंकार के विनाशक तथा शरणागत भक्तों के रक्षक के रूप में वन्दनीय है।

भैरव

यहाँ विराजित भैरव को वक्रनाथ (वक्रेश्वर) कहा जाता है। मन्दिर परिसर में भगवान शिव का प्रसिद्ध शिवालय स्थित है, जहाँ भक्त देवी के दर्शन के साथ महादेव का अभिषेक कर आशीर्वाद प्राप्त करते हैं।

धार्मिक महत्व

शाक्त परम्परा में मन और भ्रूमध्य को चेतना तथा एकाग्रता का मूल माना गया है। इसलिए यहाँ साधना करने से मन की वृत्तियाँ शान्त होती हैं। इसके साथ ही पापहरा नदी और मन्दिर परिसर के पावन कुण्डों का जल तीर्थयात्रियों के लिए शुद्धि का पावन माध्यम माना जाता है।

पूजा/दर्शन

मन्दिर में माँ महिषमर्दिनी की पूजा तन्त्र और वैदिक दोनों विधियों के समन्वित विधान से होती है। भक्त यहाँ नित्य पूजा, धूप-दीप अर्पण और शिवजी के शिवलिंग पर जलाभिषेक कर पुण्य लाभ प्राप्त करते हैं।

प्रमुख पर्व

यहाँ महाशिवरात्रि का पर्व अत्यन्त श्रद्धा और धूमधाम से मनाया जाता है, जिस अवसर पर विशाल मेले का आयोजन होता है। इसके अतिरिक्त शारदीय और वासन्तिक नवरात्र, काली पूजा और माघ पूर्णिमा के अवसर पर भी विशेष अनुष्ठान और दर्शन का विधान है।

इतिहास

वक्त्रेश्वर मन्दिर की स्थापत्य शैली में बंगाल और ओडिशा की प्राचीन शिखर शैली का प्रभाव दिखाई देता है। पुरातात्विक साक्ष्यों और शिलालेखों के अनुसार मन्दिर के कुछ प्रमुख भागों का जीर्णोद्धार अठारहवीं शताब्दी (लगभग १७६१ ईस्वी) में किया गया था। इस स्थल का सम्बन्ध महर्षि अष्टावक्र की प्राचीन तपस्या से भी जोड़ा जाता है।

कैसे पहुँचें

वक्त्रेश्वर पहुँचने के लिए निकटतम रेलवे स्टेशन दुबराजपुर (लगभग १२ किमी) और ज़िला मुख्यालय सूरी (लगभग २० किमी) है। दोनों ही स्थानों से मन्दिर के लिए नियमित बसें और टैक्सियाँ उपलब्ध रहती हैं। बोलपुर (शान्तिनिकेतन) से भी सड़क मार्ग द्वारा यहाँ सरलता से पहुँचा जा सकता है।

दर्शन समय

मन्दिर के कपाट सामान्यतः प्रातः ६:०० बजे से दोपहर १२:३० बजे तक तथा अपराह्न ३:३० बजे से रात्रि ८:३० बजे तक श्रद्धालुओं के दर्शन हेतु खुले रहते हैं। विशेष पर्वों और उत्सवों पर दर्शन समय में विस्तार किया जाता है।

विशेष मान्यताएँ

मन्दिर परिसर में अग्नि कुण्ड, सूर्य कुण्ड, भैरव कुण्ड और ब्रह्म कुण्ड जैसे प्राकृतिक तप्त जल के स्रोत हैं। श्रद्धालुओं की गहरी आस्था है कि इन पावन कुण्डों में स्नान करने के उपरान्त माँ महिषमर्दिनी और वक्रनाथ शिव के दर्शन से दैहिक और मानसिक संताप दूर होते हैं।

आध्यात्मिक संदेश

वक्त्रेश्वर शक्तिपीठ साधकों को अपनी चंचल मनोवृत्तियों को भगवती के चरणों में समर्पित कर एकाग्र होने की प्रेरणा देता है। महर्षि अष्टावक्र की तपस्या यह सन्देश देती है कि बाह्य स्वरूप की तुलना में अन्तःकरण की भक्ति और निष्ठा ही ईश्वर प्राप्ति का सच्चा मार्ग है।

पूछे जाने वाले प्रश्न

वक्त्रेश्वर शक्तिपीठ में माता सती का कौन-सा अंग गिरा था?
पीठनिर्णय तन्त्र के अनुसार यहाँ माता सती का मन गिरा था, जिसे क्षेत्रीय परम्परा में भ्रूमध्य भाग भी माना जाता है।
वक्त्रेश्वर शक्तिपीठ की अधिष्ठात्री देवी और भैरव कौन हैं?
यहाँ देवी महिषमर्दिनी तथा भैरव वक्रनाथ (वक्रेश्वर) के रूप में पूजित हैं।
यह शक्तिपीठ कहाँ स्थित है?
यह मन्दिर पश्चिम बंगाल के बीरभूम ज़िले में दुबराजपुर के निकट बकरेश्वर में पापहरा नदी के तट पर स्थित है।
वक्त्रेश्वर मन्दिर के निकट के पावन कुण्डों का क्या महत्व है?
मन्दिर परिसर में अग्नि कुण्ड और सूर्य कुण्ड जैसे प्राकृतिक गर्म जल के पवित्र कुण्ड हैं, जहाँ दर्शन से पूर्व स्नान की परम्परा है।
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