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श्री कामाख्या शक्तिपीठ: नीलाचल पर्वत, इतिहास, अम्बुवाची और दर्शन

श्री कामाख्या शक्तिपीठ: नीलाचल पर्वत, इतिहास, अम्बुवाची और दर्शन

श्री कामाख्या शक्तिपीठ असम के गुवाहाटी में पवित्र नीलाचल पर्वत पर स्थित सनातन धर्म का परम पूजनीय और तंत्र साधना का सर्वोच्च तीर्थ है। 51 शक्तिपीठों और चार प्रमुख आदि शक्तिपीठों में अत्यंत महत्वपूर्ण यह तीर्थ ‘योनि पीठ’ अथवा ‘महामुद्रा पीठ’ के रूप में विख्यात है। ब्रह्मपुत्र नदी के तट पर स्थित यह पावन धाम भगवती की दिव्य सृजन शक्ति का प्रतीक है, जहाँ प्रतिवर्ष लाखों साधक और श्रद्धालु शीश नवाते हैं।

परिचय

कामाख्या शक्तिपीठ असम के कामरूप महानगर जिले में गुवाहाटी के पश्चिमी भाग में स्थित नीलाचल पर्वत पर सुशोभित है। पौराणिक भूगोल में इस पावन क्षेत्र को ‘कामरूप’ या ‘कामगिरि’ कहा गया है। यह समूचा पर्वत तंत्र और शक्ति साधना का महान केंद्र माना जाता है, जहाँ दस महाविद्याओं के अलग-अलग देवालय भी स्थित हैं।

शक्तिपीठ बनने की कथा

पौराणिक परंपरा के अनुसार, प्रजापति दक्ष के यज्ञ में अपने पति भगवान शिव का अपमान देखकर माता सती ने योगाग्नि में अपने प्राण त्याग दिए थे। सती के पार्थिव शरीर को लेकर जब व्यथित भगवान शिव ने ब्रह्मांड में तांडव किया, तब सृष्टि के संतुलन की रक्षा हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता के अंगों को विच्छेदित किया। जिस-जिस स्थान पर सती के पावन अंग गिरे, वे स्थान शक्तिपीठ के रूप में प्रतिष्ठित हुए। नीलाचल पर्वत पर माता सती का योनि भाग गिरा, जिससे यह पावन स्थल महापीठ के रूप में विख्यात हुआ।

सती का अंग/आभूषण

कालिका पुराण और देवी भागवत के अनुसार यहाँ भगवती सती का योनि मंडल (महामुद्रा) गिरा था। इसलिए इस पावन धाम को सभी पीठों में अत्यंत दुर्लभ ‘योनि पीठ’ माना जाता है।

देवी का नाम

यहाँ की अधिष्ठात्री देवी को माता कामाख्या कहा जाता है। ग्रंथों में इन्हें कामेश्वरी, महामाया और षोडशी (त्रिपुर सुंदरी) के रूप में भी पूजा जाता है। देवी सभी भक्तों की शुद्ध मनोकामनाओं को पूर्ण करने वाली हैं।

भैरव

कामाख्या शक्तिपीठ के रक्षक और अधिष्ठाता भैरव के रूप में भगवान उमानंद प्रतिष्ठित हैं। उनका प्रसिद्ध मंदिर ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य भस्माचल (पीकॉक) द्वीप पर स्थित है। इसके अतिरिक्त, नीलाचल पर्वत पर कामेश्वर महादेव भी देवी के साथ पूजित हैं।

धार्मिक महत्व

कालिका पुराण में कहा गया है कि कामदेव ने भगवान शिव के त्रिनेत्र की अग्नि से भस्म होने के बाद इसी पावन स्थान पर माता कामाख्या की आराधना करके पुनः अपना दिव्य रूप प्राप्त किया था। इसी कारण इस क्षेत्र का नाम ‘कामरूप’ पड़ा। इस पीठ में किसी मानवीय प्रतिमा की स्थापना नहीं है, अपितु गर्भगृह में स्थित प्राकृतिक पाषाण शिला (योनि-शिला) ही पूजित है, जो निरंतर एक प्राकृतिक जलस्रोत से सिंचित रहती है।

पूजा/दर्शन

मंदिर के गर्भगृह में प्रवेश करने के लिए भक्तों को सीढ़ियों से नीचे एक प्राकृतिक गुफा में जाना होता है। वहाँ जलस्रोत से प्रवाहित पाषाण शिला को लाल वस्त्र, पुष्प और सिंदूर से अलंकृत किया जाता है। श्रद्धालु शिला का चरणामृत लेते हैं और स्पर्श दर्शन कर आध्यात्मिक शांति का अनुभव करते हैं। मंदिर परिसर में प्रवेश से पूर्व सौभाग्य कुंड की परिक्रमा और श्री गणेश के दर्शन की भी परंपरा है।

प्रमुख पर्व

कामाख्या तीर्थ का सर्वाधिक पावन उत्सव अम्बुवाची मेला (अम्बुवाची महायोग) है, जो आषाढ़ मास में मनाया जाता है। ज्योतिषीय गणना के अनुसार सूर्य के आर्द्रा नक्षत्र में प्रवेश के समय यह माना जाता है कि माता पृथ्वी सृजन चक्र से गुजरती हैं। इस अवधि में तीन दिनों तक मंदिर के पट पूरी तरह बंद रहते हैं। चौथे दिन प्रातः शुद्धि स्नान और पूजा के पश्चात पट खुलते हैं और भक्तों को पवित्र ‘रक्त वस्त्र’ (अंगोदक वस्त्र) प्रसाद रूप में दिया जाता है। इसके अतिरिक्त, यहाँ शारदीय दुर्गा पूजा, देोधनी नृत्य उत्सव और पौष मास में हर-गौरी विवाह (पुष्याभिषेक) बड़े भक्तिभाव से मनाया जाता है।

इतिहास

नीलाचल पर्वत पर प्राचीन काल से शक्ति उपासना की निरंतर परंपरा रही है। मंदिर के निचले पाषाण आधार और नक्काशियों का इतिहास पूर्व-मध्यकालीन कामरूप राजवंशों से जुड़ा है। 16वीं शताब्दी में आक्रमणों के कारण क्षतिग्रस्त होने के बाद, कूचबिहार के कोच राजा नरनारायण और उनके सेनापति-भाई चीलाराय ने शक संवत 1487 (1565 ईस्वी) में इस मंदिर का भव्य पुनर्निर्माण करवाया। मंदिर का वर्तमान मधुमक्खी के छत्ते जैसा शिखर (नीलाचल स्थापत्य शैली) उसी काल की अनुपम देन है। बाद में अहोम नरेशों ने भी यहाँ कई उप-मंदिरों और मार्गों का निर्माण कराकर संरक्षण प्रदान किया।

कैसे पहुँचें

हवाई मार्ग: गुवाहाटी का लोकप्रिय गोपीनाथ बोरदोलोई अंतर्राष्ट्रीय हवाई अड्डा (GAU) मंदिर से लगभग 20 किलोमीटर दूर है, जहाँ से टैक्सी और बसें उपलब्ध हैं।
रेल मार्ग: कामाख्या जंक्शन रेलवे स्टेशन मंदिर की तलहटी से मात्र 3-4 किलोमीटर और मुख्य गुवाहाटी रेलवे स्टेशन लगभग 8 किलोमीटर की दूरी पर है।
सड़क मार्ग: गुवाहाटी नगर से नीलाचल पर्वत शिखर तक पक्की सड़क जाती है, जहाँ ऑटो, टैक्सी और बसें चलती हैं। पैदल जाने वाले श्रद्धालु नरकासुर पथ की पारंपरिक पाषाण सीढ़ियों का उपयोग भी करते हैं। अधिकृत व्यवस्था हेतु माँ कामाख्या देवालय की वेबसाइट देखी जा सकती है।

दर्शन समय

माँ कामाख्या देवालय के दैनिक नियम इस प्रकार हैं:
• प्रातः स्नान एवं नित्य पूजा: 05:30 AM से 08:00 AM
• प्रातः सार्वजनिक दर्शन: 08:00 AM से 01:00 PM
• मध्याह्न भोग विराम: 01:00 PM से 02:30 PM (पट बंद)
• अपराह्न सार्वजनिक दर्शन: 02:30 PM से 05:30 PM
• आरती एवं पट बंद: 05:30 PM
(नोट: अम्बुवाची मेले के दौरान तीन दिन दर्शन पूर्णतः स्थगित रहता है।)

विशेष मान्यताएँ

मान्यता है कि कामाख्या में श्रद्धापूर्वक की गई पूजा से साधक के समस्त संताप दूर होते हैं और आत्मिक शक्ति प्राप्त होती है। अम्बुवाची के पावन काल में प्राप्त होने वाले रक्त-वस्त्र को घर में रखने से सुख-शांति और सुरक्षा बनी रहती है। नीलाचल पर्वत पर दस महाविद्याओं के एक साथ विद्यमान होने के कारण इसे संपूर्ण ब्रह्मांडीय ऊर्जा का केंद्र माना गया है।

आध्यात्मिक संदेश

माँ कामाख्या का संदेश प्रकृति, जननी और सृजन शक्ति के प्रति कृतज्ञता और आदर का है। यह पावन तीर्थ यह स्मरण कराता है कि जीवन की मूल ऊर्जा देवी स्वरूप है, जहाँ पवित्रता, संयम और अनन्य भक्ति से ही जीव मोक्ष और परमानंद की प्राप्ति कर सकता है।

FAQ

कामाख्या मंदिर के गर्भगृह में किस स्वरूप की पूजा होती है?
गर्भगृह में कोई गढ़ी हुई मूर्ति नहीं है; वहाँ प्राकृतिक भूमिगत जलस्रोत से सिंचित योनि-शिला की पूजा होती है।
कामाख्या मंदिर में सार्वजनिक दर्शन का समय क्या है?
सामान्य दिनों में सार्वजनिक दर्शन प्रातः 8:00 बजे से दोपहर 1:00 बजे तक और दोपहर 2:30 बजे से शाम 5:30 बजे तक रहता है।
अम्बुवाची मेले के दौरान मंदिर के पट क्यों बंद रहते हैं?
आषाढ़ मास में पृथ्वी और भगवती के वार्षिक सृजन विश्राम काल के सम्मान में तीन दिनों तक पट बंद रखे जाते हैं।
कामाख्या शक्तिपीठ के रक्षक भैरव कौन हैं?
कामाख्या शक्तिपीठ के मुख्य रक्षक भैरव भगवान उमानंद हैं, जिनका मंदिर ब्रह्मपुत्र नदी के मध्य भस्माचल द्वीप पर स्थित है।
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