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सोमवार व्रत कथा
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सोमवार व्रत कथा

Monday Fasting Story [ Vrat Katha ]

सावन सोमवार व्रत का महत्त्व

श्रावण मास भगवान शिव की आराधना के लिए अत्यन्त पवित्र माना जाता है। इस महीने में आने वाले प्रत्येक सोमवार को श्रद्धालु भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करते हैं, शिवलिंग पर जल अर्पित करते हैं तथा अपनी सामर्थ्य और स्वास्थ्य के अनुसार व्रत रखते हैं। सावन सोमवार का व्रत केवल मनोकामनाओं की पूर्ति के लिए ही नहीं, बल्कि मन की शुद्धि, आत्म-संयम, भक्ति और भगवान शिव के प्रति पूर्ण समर्पण का अभ्यास भी माना जाता है।

धार्मिक परम्परा के अनुसार सावन सोमवार के दिन श्रद्धापूर्वक शिवलिंग का अभिषेक, बिल्वपत्र अर्पण, पंचाक्षर मंत्र का जाप और व्रत-कथा का पाठ करना शुभ माना गया है। भक्त भगवान शिव से प्रार्थना करते हैं कि वे उनके जीवन से भय, दुःख, अहंकार और नकारात्मकता को दूर करके उन्हें धर्म, विवेक और सदाचार के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करें।

सावन सोमवार व्रत की सरल पूजा-विधि

  • प्रातःकाल उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
  • भगवान शिव और माता पार्वती का ध्यान करते हुए सावन सोमवार व्रत का संकल्प लें।
  • पूजा-स्थान को स्वच्छ करके शिवलिंग अथवा भगवान शिव के चित्र के सामने दीपक प्रज्वलित करें।
  • शिवलिंग पर स्वच्छ जल अर्पित करें। परम्परा और सुविधा के अनुसार दूध, दही, घी, मधु अथवा गंगाजल से अभिषेक भी किया जा सकता है।
  • भगवान शिव को बिल्वपत्र, सफेद पुष्प, धतूरा, आक-पुष्प, चन्दन और ऋतुफल अर्पित करें।
  • माता पार्वती को कुमकुम, अक्षत, पुष्प और श्रृंगार की सामग्री अर्पित करें।
  • “ॐ नमः शिवाय” मंत्र का कम-से-कम 108 बार श्रद्धापूर्वक जाप करें।
  • इसके पश्चात सावन सोमवार व्रत कथा का पाठ अथवा श्रवण करें।
  • भगवान शिव की आरती करके अपनी भूलों के लिए क्षमा माँगें और प्रसाद वितरित करें।
  • व्रत का पालन अपनी आयु, स्वास्थ्य और पारिवारिक परम्परा के अनुसार करें।

सावन सोमवार व्रत कथा

प्राचीन समय की बात है। किसी नगर में एक अत्यन्त धनवान और प्रतिष्ठित साहूकार रहता था। भगवान शिव की कृपा से उसके घर में धन-धान्य, वैभव, सेवक और सभी प्रकार की सुख-सुविधाएँ थीं। उसकी पत्नी भी धर्मपरायण, विनम्र और सदाचारी थी। संसार की लगभग प्रत्येक सुविधा प्राप्त होने के बाद भी पति-पत्नी के जीवन में एक गहरा दुःख था—उनकी कोई सन्तान नहीं थी।

सन्तान न होने के कारण साहूकार भीतर ही भीतर बहुत दुःखी रहता था। वह प्रत्येक सोमवार भगवान शिव के मंदिर जाता, शिवलिंग का जलाभिषेक करता और पूर्ण श्रद्धा से उपवास रखता था। उसकी पत्नी भी भगवान शिव और माता पार्वती की पूजा करके उनसे सन्तान प्राप्ति की प्रार्थना करती थी। अनेक वर्षों तक दोनों ने धैर्य, श्रद्धा और नियमपूर्वक सोमवार का व्रत किया।

एक सोमवार साहूकार मंदिर में भगवान शिव की आराधना कर रहा था। उसी समय भगवान शिव और माता पार्वती अदृश्य रूप में वहाँ उपस्थित हुए। साहूकार की निष्कपट भक्ति देखकर माता पार्वती का हृदय करुणा से भर गया। उन्होंने भगवान शिव से कहा, “हे महादेव! यह आपका भक्त कितने वर्षों से पूर्ण श्रद्धा के साथ आपका व्रत और पूजन कर रहा है। इसके हृदय में सन्तान प्राप्ति की अभिलाषा है। कृपा करके इसकी मनोकामना पूर्ण कीजिए।”

भगवान शिव ने माता पार्वती से कहा, “हे देवी! संसार में प्रत्येक प्राणी को अपने कर्म और प्रारब्ध के अनुसार फल प्राप्त होता है। इस साहूकार के भाग्य में सन्तान-सुख नहीं लिखा है।”

माता पार्वती ने पुनः विनम्र आग्रह किया, “हे करुणानिधान! इसकी भक्ति अटल है। यदि सच्चे भक्त की प्रार्थना भी स्वीकार न हो, तो उसका विश्वास दुर्बल हो सकता है। आप कृपा करके इसे पुत्र-प्राप्ति का वरदान प्रदान करें।”

माता पार्वती के आग्रह पर भगवान शिव बोले, “हे पार्वती! तुम्हारी इच्छा से इस साहूकार को एक तेजस्वी पुत्र अवश्य प्राप्त होगा, परन्तु उस पुत्र की आयु केवल बारह वर्ष होगी।”

संयोग से साहूकार भगवान शिव और माता पार्वती के इस संवाद को सुन रहा था। पुत्र प्राप्ति का वरदान सुनकर उसके हृदय में प्रसन्नता हुई, लेकिन पुत्र की केवल बारह वर्ष की आयु जानकर वह अत्यन्त व्याकुल भी हो गया। फिर भी उसने भगवान शिव के निर्णय को स्वीकार किया और किसी से इस रहस्य का उल्लेख नहीं किया। उसने सोमवार का व्रत और शिवपूजन पहले की तरह जारी रखा।

साहूकार के घर पुत्र का जन्म

कुछ समय बाद साहूकार की पत्नी गर्भवती हुई और उचित समय पर उसने एक सुन्दर तथा तेजस्वी पुत्र को जन्म दिया। पूरे नगर में उत्सव मनाया गया। साहूकार ने ब्राह्मणों, निर्धनों और जरूरतमन्द लोगों को भोजन, वस्त्र और धन का दान दिया। परिवार के सभी लोग अत्यन्त प्रसन्न थे, परन्तु साहूकार को भगवान शिव की कही हुई बात स्मरण थी। इसलिए आनन्द के बीच भी उसके मन में पुत्र की अल्पायु की चिन्ता बनी रहती थी।

समय बीतता गया। बालक बड़ा होने लगा। वह बुद्धिमान, विनम्र, धर्मपरायण और माता-पिता की आज्ञा का पालन करने वाला था। जब उसकी आयु ग्यारह वर्ष हुई, तब उसकी माता ने साहूकार से उसके विवाह की चर्चा की। साहूकार ने कहा, “अभी हमारा पुत्र बहुत छोटा है। पहले इसे काशी भेजकर वेद, शास्त्र और धर्म की शिक्षा दिलानी चाहिए। शिक्षा पूर्ण होने के बाद ही इसके विवाह पर विचार करेंगे।”

इसके पश्चात साहूकार ने बालक के मामा को बुलाया और उससे कहा, “तुम इसे काशी ले जाओ और वहाँ किसी योग्य गुरु के आश्रम में इसकी शिक्षा की व्यवस्था करो। मार्ग में जहाँ भी ठहरो, यज्ञ, ब्राह्मण-भोजन और दान करते हुए आगे बढ़ना।” साहूकार ने यात्रा और धर्मकार्य के लिए पर्याप्त धन देकर दोनों को विदा किया।

यात्रा के मार्ग में राजकुमारी का विवाह

बालक अपने मामा के साथ काशी की ओर चल पड़ा। यात्रा करते हुए वे एक ऐसे नगर में पहुँचे जहाँ वहाँ के राजा की पुत्री का विवाह होने वाला था। राजकुमारी का विवाह जिस राजकुमार से निश्चित हुआ था, उसकी एक आँख में दोष था। वर के पिता को भय था कि विवाह से पहले यदि राजा को यह बात पता चल गई, तो वह अपनी पुत्री का विवाह करने से मना कर देगा।

उसी समय वर के पिता की दृष्टि साहूकार के सुन्दर, तेजस्वी और सदाचारी पुत्र पर पड़ी। उसने बालक के मामा से निवेदन किया कि विवाह की मुख्य रस्में पूरी होने तक वह बालक को वर के स्थान पर बैठने की अनुमति दे दे। बदले में उसने पर्याप्त धन देने का प्रस्ताव रखा। बालक के मामा ने परिस्थिति को देखकर प्रस्ताव स्वीकार कर लिया।

विवाह के समय साहूकार के पुत्र को वर के रूप में बैठाया गया और राजकुमारी के साथ सभी वैदिक संस्कार सम्पन्न हुए। बालक सत्यवादी और धर्मनिष्ठ था। वह राजकुमारी को धोखे में नहीं रखना चाहता था। विदाई से पहले उसने अवसर पाकर राजकुमारी की चुनरी पर लिख दिया, “तुम्हारा वास्तविक विवाह मेरे साथ हुआ है। मैं एक साहूकार का पुत्र हूँ और अपने मामा के साथ शिक्षा प्राप्त करने काशी जा रहा हूँ। जिस राजकुमार के साथ तुम्हें विदा किया जाएगा, उसकी एक आँख में दोष है।”

जब राजकुमारी ने चुनरी पर लिखा हुआ सन्देश पढ़ा, तो उसने अपने माता-पिता को पूरी बात बता दी। सत्य जानने के बाद राजा ने अपनी पुत्री को उस राजकुमार के साथ विदा करने से मना कर दिया। दूसरी ओर साहूकार का पुत्र अपने मामा के साथ काशी की यात्रा पर आगे बढ़ गया।

काशी में बालक की शिक्षा

काशी पहुँचकर बालक ने एक योग्य गुरु के आश्रम में रहकर वेद, शास्त्र और धार्मिक आचरण की शिक्षा ग्रहण करनी आरम्भ की। उसका मामा भी साहूकार की आज्ञा के अनुसार समय-समय पर यज्ञ, पूजा, ब्राह्मण-भोजन और दान करता रहा।

धीरे-धीरे बालक की आयु बारह वर्ष के निकट पहुँच गई। जिस दिन उसने बारहवाँ वर्ष पूर्ण किया, उस दिन उसके मामा ने एक विशेष यज्ञ का आयोजन किया था। यज्ञ के मध्य बालक ने अपने मामा से कहा, “मामाजी, आज मेरा शरीर बहुत दुर्बल लग रहा है। मुझे विश्राम करने की आवश्यकता है।” मामा ने कहा, “पुत्र! तुम भीतर जाकर थोड़ी देर विश्राम करो। यज्ञ पूर्ण होने पर मैं तुम्हें देखने आता हूँ।”

बालक भीतर जाकर लेट गया। भगवान शिव के पूर्व कथन के अनुसार उसी समय उसके प्राण शरीर से निकल गए। यज्ञ पूर्ण होने के बाद जब मामा भीतर पहुँचा, तो उसने बालक को मृत पाया। अपने प्रिय भांजे की ऐसी अवस्था देखकर वह शोक से व्याकुल हो उठा।

फिर भी उसने विचार किया कि यदि यज्ञ में उपस्थित लोग इस घटना को जान लेंगे, तो धार्मिक कार्य अधूरा रह जाएगा। इसलिए उसने पहले यज्ञ और ब्राह्मण-भोजन पूर्ण कराया। सभी अतिथियों के चले जाने के बाद वह अपने भांजे के पास बैठकर जोर-जोर से विलाप करने लगा।

भगवान शिव और माता पार्वती का आगमन

उसी समय भगवान शिव और माता पार्वती उस मार्ग से जा रहे थे। माता पार्वती ने किसी के विलाप की करुण ध्वनि सुनी तो उन्होंने भगवान शिव से कहा, “हे प्रभु! किसी भक्त पर बहुत बड़ा दुःख आया है। उसका विलाप मुझसे सहन नहीं हो रहा। कृपा करके उसके कष्ट को दूर कीजिए।”

भगवान शिव माता पार्वती के साथ वहाँ पहुँचे। उन्होंने देखा कि भूमि पर वही साहूकार का पुत्र निश्चेष्ट पड़ा है, जिसे उन्होंने बारह वर्ष की आयु का वरदान दिया था। भगवान शिव बोले, “हे देवी! यह उसी साहूकार का पुत्र है। इसके जीवन की निर्धारित आयु पूर्ण हो चुकी है।”

माता पार्वती ने करुणापूर्वक कहा, “हे महादेव! इसके माता-पिता आपके अनन्य भक्त हैं। उन्होंने वर्षों तक नियमपूर्वक सोमवार का व्रत किया और आपकी शरण नहीं छोड़ी। यदि यह बालक जीवित न हुआ तो उसके माता-पिता पुत्र-वियोग में अपने प्राण त्याग सकते हैं। कृपा करके इसे जीवनदान और दीर्घायु प्रदान कीजिए।”

माता पार्वती की करुणा और साहूकार की अटल भक्ति से प्रसन्न होकर भगवान शिव ने बालक को जीवनदान प्रदान किया। भगवान शिव की कृपा से बालक ऐसे उठ बैठा, मानो गहरी नींद से जागा हो। अपने भांजे को जीवित देखकर मामा की प्रसन्नता का कोई ठिकाना नहीं रहा। उसने भगवान शिव और माता पार्वती को बार-बार प्रणाम किया और अश्रुपूर्ण नेत्रों से उनका धन्यवाद किया।

राजकुमारी से पुनर्मिलन

अपनी शिक्षा पूर्ण करने के बाद बालक अपने मामा के साथ घर लौटने के लिए काशी से चल पड़ा। मार्ग में वे उसी नगर पहुँचे जहाँ बालक का राजकुमारी के साथ विवाह हुआ था। वहाँ पहुँचकर मामा ने पुनः यज्ञ और ब्राह्मण-भोजन का आयोजन किया।

नगर के राजा ने जब बालक को देखा, तो उसने उसे पहचान लिया। राजा ने आदरपूर्वक उसे राजमहल में बुलाया और अपनी पुत्री को उसके साथ विधिपूर्वक विदा कर दिया। राजा ने कन्या को वस्त्र, आभूषण और आवश्यक सामग्री देकर आशीर्वाद सहित भेजा। बालक अपनी पत्नी और मामा के साथ प्रसन्नतापूर्वक अपने नगर की ओर चल पड़ा।

साहूकार की प्रतीक्षा

दूसरी ओर साहूकार और उसकी पत्नी बारहवें वर्ष के बाद से अपने पुत्र की प्रतीक्षा कर रहे थे। साहूकार को भगवान शिव का वह कथन स्मरण था कि उसके पुत्र की आयु केवल बारह वर्ष होगी। उसने अपनी पत्नी से यह संकल्प कर रखा था कि यदि उनका पुत्र जीवित वापस नहीं आया, तो वे अपना जीवन त्याग देंगे।

जब साहूकार का पुत्र, उसका मामा और राजकुमारी नगर के निकट पहुँचे, तो मामा ने एक सेवक को आगे भेजकर उनके सकुशल लौटने का समाचार दिया। पुत्र के जीवित और स्वस्थ होने की बात सुनकर साहूकार तथा उसकी पत्नी की आँखों से आनन्द के आँसू बहने लगे।

उन्होंने भगवान शिव और माता पार्वती का हृदय से धन्यवाद किया। पूरे नगर में उत्सव मनाया गया। साहूकार ने ब्राह्मणों, निर्धनों और जरूरतमन्दों को भोजन, वस्त्र तथा धन का दान दिया। उसने जीवनभर श्रद्धापूर्वक सोमवार व्रत और भगवान शिव की आराधना जारी रखी। भगवान शिव की कृपा से उसका परिवार सुख, शान्ति, धर्म और समृद्धि के साथ जीवन व्यतीत करने लगा।

सावन सोमवार व्रत कथा का संदेश

यह कथा हमें सिखाती है कि सच्ची भक्ति केवल इच्छाओं की पूर्ति तक सीमित नहीं होती। साहूकार को अपने पुत्र की अल्पायु का ज्ञान होने के बाद भी उसने भगवान शिव की आराधना नहीं छोड़ी। उसने दुःख, भय और अनिश्चितता के बीच भी अपने धर्म, दान और व्रत का पालन जारी रखा। उसकी भक्ति किसी शर्त पर आधारित नहीं थी, बल्कि भगवान शिव के प्रति पूर्ण विश्वास और समर्पण पर आधारित थी।

माता पार्वती की करुणा और भगवान शिव की कृपा यह संदेश देती है कि निष्कपट भक्ति, धैर्य, सत्य और धर्माचरण कभी व्यर्थ नहीं जाते। व्रत का वास्तविक उद्देश्य केवल सांसारिक इच्छाओं को प्राप्त करना नहीं, बल्कि मन को शुद्ध करना, अहंकार को कम करना और जीवन की प्रत्येक परिस्थिति में भगवान का स्मरण बनाए रखना है।

कथा के बाद की प्रार्थना

हे देवाधिदेव महादेव! जैसे आपने अपने भक्त साहूकार की श्रद्धा की रक्षा की और उसके पुत्र को जीवनदान प्रदान किया, उसी प्रकार हम सभी पर अपनी कृपादृष्टि बनाए रखें। हमारे मन से भय, क्रोध, अहंकार और नकारात्मकता को दूर करें। हमें सत्य, धर्म, करुणा और सदाचार के मार्ग पर चलने की शक्ति प्रदान करें।

हे माता पार्वती! अपने भक्तों पर मातृवत् करुणा बनाए रखें। हमारे परिवार में प्रेम, शान्ति और सद्भाव स्थापित करें। हमारी उचित मनोकामनाएँ पूर्ण करें और हमें भगवान शिव के श्रीचरणों में अटल भक्ति प्रदान करें।

ॐ नमः शिवाय।
हर हर महादेव।

सावन सोमवार व्रत में ध्यान रखने योग्य बातें

  • व्रत श्रद्धा और आत्म-संयम के साथ करें, भय अथवा अन्धविश्वास के कारण नहीं।
  • शिवलिंग पर अर्पित की जाने वाली सामग्री स्वच्छ और सात्त्विक होनी चाहिए।
  • बिल्वपत्र अर्पित करते समय उसका चिकना भाग शिवलिंग की ओर रखने की परम्परा प्रचलित है।
  • व्रत के दिन क्रोध, कटु वचन, निन्दा और किसी का अपमान करने से बचें।
  • भोजन और उपवास का नियम अपने स्वास्थ्य तथा पारिवारिक परम्परा के अनुसार रखें।
  • गर्भवती महिलाओं, वृद्ध व्यक्तियों, बच्चों, मधुमेह के रोगियों अथवा नियमित दवा लेने वालों को कठोर उपवास नहीं करना चाहिए। वे फलाहार अथवा सामान्य सात्त्विक भोजन के साथ पूजा कर सकते हैं।
  • भगवान शिव भाव के भूखे हैं; इसलिए पूजा में दिखावे की अपेक्षा शुद्ध मन, विनम्रता और श्रद्धा को अधिक महत्त्व दें।

।। ॐ नमः शिवाय ।।
।। हर हर महादेव ।।

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