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आदित्य हृदय स्तोत्र

॥ श्रीगणेशाय नमः ॥

॥ अथ आदित्य हृदय स्तोत्रम् ॥

ततो युद्धपरिश्रान्तं समरे चिन्तया स्थितम्।

रावणं चाग्रतो दृष्ट्वा युद्धाय समुपस्थितम्॥१॥

लंका के युद्ध में अत्यधिक परिश्रम करने के कारण भगवान श्रीराम कुछ क्षणों के लिए चिंतन में खड़े थे। उसी समय उन्होंने अपने सामने युद्ध के लिए पूर्ण रूप से तैयार रावण को देखा। यह परिस्थिति निर्णायक युद्ध से ठीक पहले की थी।

दैवतैश्च समागम्य द्रष्टुमभ्यागतो रणम्।

उपगम्याब्रवीद्रामम् अगस्त्यो भगवानृषिः॥२॥

उस महान युद्ध को देखने के लिए देवताओं का समूह आकाश में एकत्र हुआ। उसी समय महर्षि अगस्त्य भगवान श्रीराम के समीप आए और उनके कल्याण के लिए दिव्य उपदेश देने लगे।

राम राम महाबाहो शृणु गुह्यं सनातनम्।

येन सर्वानरीन्वत्स समरे विजयिष्यसि॥३॥

महर्षि अगस्त्य ने कहा— हे महाबाहु श्रीराम! एक सनातन और अत्यन्त गुप्त स्तोत्र सुनिए। इसके जप से आप युद्ध में सभी शत्रुओं पर निश्चित रूप से विजय प्राप्त करेंगे।

आदित्यहृदयं पुण्यं सर्वशत्रुविनाशनम्।

जयावहं जपेन्नित्यं अक्षयं परमं शिवम्॥४॥

यह आदित्य हृदय स्तोत्र अत्यन्त पुण्यदायक है। इसका नित्य जप करने से शत्रुओं का नाश होता है, विजय प्राप्त होती है तथा जीवन में अक्षय मंगल और परम कल्याण की प्राप्ति होती है।

सर्वमङ्गलमाङ्गल्यं सर्वपापप्रणाशनम्।

चिन्ताशोकप्रशमनम् आयुर्वर्धनमुत्तमम्॥५॥

यह स्तोत्र समस्त मंगलों में श्रेष्ठ है। इसके पाठ से पापों का नाश होता है, चिंता और शोक दूर होते हैं तथा आयु, स्वास्थ्य और आत्मबल में वृद्धि होती है।

रश्मिमन्तं समुद्यन्तं देवासुरनमस्कृतम्।

पूजयस्व विवस्वन्तं भास्करं भुवनेश्वरम्॥६॥

उन तेजस्वी, उदित होने वाले, देवताओं और असुरों द्वारा पूजित, समस्त लोकों के स्वामी भगवान सूर्यदेव की श्रद्धापूर्वक उपासना करें।

सर्वदेवात्मको ह्येष तेजस्वी रश्मिभावनः।

एष देवासुरगणान् लोकान्पाति गभस्तिभिः॥७॥

भगवान सूर्य समस्त देवताओं के आत्मस्वरूप हैं। वे अपनी दिव्य किरणों द्वारा देवताओं, मनुष्यों तथा सम्पूर्ण जगत का पालन और संरक्षण करते हैं।

एष ब्रह्मा च विष्णुश्च शिवः स्कन्दः प्रजापतिः।

महेन्द्रो धनदः कालो यमः सोमो ह्यपां पतिः॥८॥

भगवान सूर्य ही ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, प्रजापति, इन्द्र, कुबेर, काल, यम, चन्द्रमा तथा वरुण आदि समस्त देवशक्तियों के मूल स्वरूप हैं। समस्त दिव्य शक्तियाँ उन्हीं में समाहित हैं।

पितरो वसवः साध्या अश्विनौ मरुतो मनुः।

वायुर्वह्निः प्रजाप्राण ऋतुकर्ता प्रभाकरः॥९॥

भगवान सूर्य पितरों, वसुओं, साध्य देवताओं, अश्विनी कुमारों, मरुद्गणों, मनु, वायु, अग्नि तथा समस्त प्राणियों के जीवनदाता हैं। वे ही ऋतुओं का संचालन करते हैं और अपने प्रकाश से सम्पूर्ण जगत का पालन करते हैं।

आदित्यः सविता सूर्यः खगः पूषा गभस्तिमान्।

सुवर्णसदृशो भानुः हिरण्यरेता दिवाकरः॥१०॥

सूर्यदेव के अनेक दिव्य नाम हैं— आदित्य, सविता, सूर्य, खग, पूषा, गभस्तिमान, भानु, हिरण्यरेता और दिवाकर। ये सभी नाम उनके तेज, प्रकाश, सृष्टि के पालन और जीवनदायी स्वरूप का वर्णन करते हैं।

हरिदश्वः सहस्रार्चिः सप्तसप्तिर्मरीचिमान्।

तिमिरोन्मथनः शम्भुः त्वष्टा मार्तण्ड अंशुमान्॥११॥

भगवान सूर्य हरे वर्ण के अश्वों वाले, हजारों किरणों से युक्त, सात घोड़ों के रथ पर विराजमान, अंधकार का नाश करने वाले, मंगलमय, सृष्टि के रचयिता, मार्तण्ड तथा अनन्त किरणों से प्रकाशित देव हैं।

हिरण्यगर्भः शिशिरः तपनो भास्करो रविः।

अग्निगर्भोऽदितेः पुत्रः शङ्खः शिशिरनाशनः॥१२॥

वे हिरण्यगर्भ, तप प्रदान करने वाले, प्रकाशस्वरूप भास्कर, रवि, अग्नितुल्य तेज वाले, अदिति के पुत्र तथा शीत का नाश करने वाले हैं। उनके तेज से सम्पूर्ण संसार में ऊर्जा और जीवन का संचार होता है।

व्योमनाथस्तमोभेदी ऋग्यजुःसामपारगः।

घनवृष्टिरपां मित्रो विन्ध्यवीथीप्लवङ्गमः॥१३॥

भगवान सूर्य आकाश के स्वामी, अज्ञानरूपी अंधकार का नाश करने वाले तथा ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेद के तत्त्व को जानने वाले हैं। वे वर्षा के कारण, जल के मित्र तथा आकाश मार्ग में निरंतर गतिशील रहने वाले हैं।

आतपी मण्डली मृत्युः पिङ्गलः सर्वतापनः।

कविर्विश्वो महातेजाः रक्तः सर्वभवोद्भवः॥१४॥

वे प्रचण्ड ताप देने वाले, गोलाकार मंडल में स्थित, समय के अनुसार मृत्यु के कारण, स्वर्णिम आभा वाले, सर्वज्ञ, महान तेजस्वी तथा सम्पूर्ण सृष्टि की उत्पत्ति के आधार हैं। सम्पूर्ण जीवन उन्हीं की ऊर्जा पर आधारित है।

नक्षत्रग्रहताराणाम् अधिपो विश्वभावनः।

तेजसामपि तेजस्वी द्वादशात्मन् नमोऽस्तु ते॥१५॥

हे सूर्यदेव! आप समस्त नक्षत्रों, ग्रहों और तारागण के स्वामी हैं। आप सम्पूर्ण विश्व का पालन करने वाले तथा सभी तेजस्वी वस्तुओं से भी अधिक तेजस्वी हैं। वर्ष के बारह आदित्य रूपों में विराजमान आपको बार-बार प्रणाम है।

नमः पूर्वाय गिरये पश्चिमायाद्रये नमः।

ज्योतिर्गणानां पतये दिनाधिपतये नमः॥१६॥

पूर्व दिशा के पर्वत से उदित होने वाले तथा पश्चिम दिशा के पर्वत पर अस्त होने वाले प्रभु सूर्य को नमस्कार है। समस्त ज्योतियों के स्वामी और दिन के अधिपति भगवान सूर्यदेव को बार-बार प्रणाम है।

जयाय जयभद्राय हर्यश्वाय नमो नमः।

नमो नमः सहस्रांशो आदित्याय नमो नमः॥१७॥

हे विजय प्रदान करने वाले, कल्याणस्वरूप, हरित अश्वों से युक्त रथ पर आरूढ़, सहस्रों किरणों से प्रकाशित आदित्यदेव! आपको बार-बार नमस्कार है। आपकी कृपा से जीवन में सफलता, उत्साह और आत्मबल की प्राप्ति होती है।

नम उग्राय वीराय सारङ्गाय नमो नमः।

नमः पद्मप्रबोधाय प्रचण्डाय नमोऽस्तु ते॥१८॥

हे उग्र तेजस्वी, पराक्रमी तथा कमलों को खिलाने वाले प्रभु! आपको बार-बार प्रणाम है। आपका प्रचण्ड प्रकाश सम्पूर्ण संसार में चेतना, ऊर्जा और नवीन जीवन का संचार करता है।

ब्रह्मेशानाच्युतेशाय सूर्यायादित्यवर्चसे।

भास्वते सर्वभक्षाय रौद्राय वपुषे नमः॥१९॥

ब्रह्मा, शिव और विष्णु के दिव्य स्वरूप वाले, आदित्य के समान तेजस्वी, सम्पूर्ण जगत को प्रकाशित करने वाले तथा समय आने पर सबको अपने नियमों में समाहित करने वाले भगवान सूर्य को मेरा प्रणाम है।

तमोघ्नाय हिमघ्नाय शत्रुघ्नायामितात्मने।

कृतघ्नघ्नाय देवाय ज्योतिषां पतये नमः॥२०॥

अज्ञानरूपी अंधकार का नाश करने वाले, शीत का अंत करने वाले, शत्रुओं का विनाश करने वाले, अनंत स्वरूप तथा समस्त ज्योतियों के स्वामी भगवान सूर्यदेव को बार-बार नमस्कार है।

तप्तचामीकराभाय वह्नये विश्वकर्मणे।

नमस्तमोऽभिनिघ्नाय रुचये लोकसाक्षिणे॥२१॥

तप्त स्वर्ण के समान तेजस्वी, अग्निरूप, समस्त सृष्टि के निर्माता, अंधकार का पूर्णतः नाश करने वाले तथा सम्पूर्ण संसार के साक्षी भगवान सूर्यदेव को सादर प्रणाम है।

नाशयत्येष वै भूतं तदेव सृजति प्रभुः।

पायत्येष तपत्येष वर्षत्येष गभस्तिभिः॥२२॥

भगवान सूर्य ही समय आने पर सृष्टि का संहार करते हैं और पुनः उसी का सृजन भी करते हैं। वे अपनी किरणों से पृथ्वी का पालन करते हैं, ऊष्मा प्रदान करते हैं तथा जलचक्र के माध्यम से वर्षा का कारण बनते हैं।

एष सुप्तेषु जागर्ति भूतेषु परिनिष्ठितः।

एष चैवाग्निहोत्रं च फलं चैवाग्निहोत्रिणाम्॥२३॥

जब समस्त प्राणी विश्राम करते हैं तब भी भगवान सूर्य अपनी व्यवस्था से संसार का संचालन करते रहते हैं। वे प्रत्येक प्राणी में स्थित हैं तथा सभी यज्ञों और अग्निहोत्रों के आधार एवं उनके फलदाता भी वही हैं।

वेदाश्च क्रतवश्चैव क्रतूनां फलमेव च।

यानि कृत्यानि लोकेषु सर्व एष रविः प्रभुः॥२४॥

चारों वेद, सभी यज्ञ, उनके फल तथा संसार में किए जाने वाले समस्त शुभ कर्म अंततः भगवान सूर्य की दिव्य शक्ति पर ही आधारित हैं। वे सम्पूर्ण जगत के पालनकर्ता तथा सभी कर्मों के साक्षी हैं।

एनमापत्सु कृच्छ्रेषु कान्तारेषु भयेषु च।

कीर्तयन् पुरुषः कश्चित् नावसीदति राघव॥२५॥

हे राघव! जो मनुष्य विपत्ति, कठिन परिस्थितियों, वन, यात्रा अथवा किसी भी प्रकार के भय के समय श्रद्धापूर्वक आदित्य हृदय स्तोत्र का स्मरण करता है, वह कभी निराश नहीं होता। भगवान सूर्य की कृपा से उसे साहस, धैर्य और संकटों पर विजय प्राप्त होती है।

पूजयस्वैनमेकाग्रो देवदेवं जगत्पतिम्।

एतत्त्रिगुणितं जप्त्वा युद्धेषु विजयिष्यसि॥२६॥

इसलिए हे श्रीराम! एकाग्रचित्त होकर देवों के देव, सम्पूर्ण जगत के स्वामी भगवान सूर्यदेव की उपासना करें। इस आदित्य हृदय स्तोत्र का तीन बार जप करने से युद्ध सहित प्रत्येक धर्मयुक्त कार्य में विजय प्राप्त होती है।

अस्मिन्क्षणे महाबाहो रावणं त्वं वधिष्यसि।

एवमुक्त्वा तदागस्त्यो जगाम च यथागतम्॥२७॥

महर्षि अगस्त्य ने कहा— हे महाबाहु श्रीराम! इसी क्षण आप रावण का वध करेंगे। ऐसा कहकर महर्षि अगस्त्य अपने स्थान को लौट गए।

एतच्छ्रुत्वा महातेजा नष्टशोकोऽभवत् तदा।

धारयामास सुप्रीतो राघवः प्रयतात्मवान्॥२८॥

महर्षि अगस्त्य के उपदेश को सुनकर तेजस्वी श्रीराम का समस्त शोक और चिंता दूर हो गई। उन्होंने प्रसन्न मन और पूर्ण श्रद्धा के साथ आदित्य हृदय स्तोत्र को हृदयंगम कर लिया।

आदित्यं प्रेक्ष्य जप्त्वा तु परं हर्षमवाप्तवान्।

त्रिराचम्य शुचिर्भूत्वा धनुरादाय वीर्यवान्॥२९॥

भगवान सूर्य का दर्शन कर श्रीराम ने आदित्य हृदय स्तोत्र का जप किया। इसके बाद वे अत्यन्त प्रसन्न और आत्मविश्वास से भर गए। आचमन करके स्वयं को शुद्ध किया और अपना धनुष धारण किया।

रावणं प्रेक्ष्य हृष्टात्मा युद्धाय समुपागमत्।

सर्वयत्नेन महता वधे तस्य धृतोऽभवत्॥३०॥

इसके पश्चात् प्रसन्नचित्त और उत्साह से परिपूर्ण श्रीराम रावण की ओर युद्ध के लिए अग्रसर हुए। उन्होंने पूर्ण पराक्रम और दृढ़ संकल्प के साथ रावण का वध करने का निश्चय किया।

अथ रविरवदन्निरीक्ष्य रामं मुदितमनाः परमं प्रहृष्यमाणः।

देवनिशाचरपतिसङ्क्षयं विदित्वा सुरगणमध्यगतो वचस्त्वरेति॥३१॥

श्रीराम की श्रद्धा, आत्मविश्वास और दिव्य तेज को देखकर भगवान सूर्यदेव अत्यन्त प्रसन्न हुए। देवताओं ने भी जान लिया कि अब राक्षसराज रावण का अंत निश्चित है। तब देवगणों के मध्य स्थित सूर्यदेव ने श्रीराम को शीघ्र युद्ध करने के लिए प्रेरित किया और उनकी विजय का आशीर्वाद दिया।

॥ इति श्रीवाल्मीकीय रामायणे युद्धकाण्डे आदित्यहृदय स्तोत्रं सम्पूर्णम् ॥

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