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श्री कार्तिकेय के मंत्र
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श्री कार्तिकेय के मंत्र

Shri Kartikeya Ke Mantra

भगवान कार्तिकेय भगवान शिव और माता पार्वती के पुत्र तथा देवताओं के सेनापति माने जाते हैं। उन्हें स्कन्द, कुमार, षण्मुख, गुह, महासेन, सुब्रह्मण्य और मुरुगन जैसे अनेक नामों से पूजा जाता है। उनका वाहन मयूर है और उनके हाथ में धारण की गई शक्ति साहस, ज्ञान तथा धर्म की रक्षा का प्रतीक मानी जाती है।

उत्तर भारत में भगवान कार्तिकेय के नाम से और दक्षिण भारत में मुरुगन, सुब्रह्मण्य तथा षण्मुख के रूप में उनकी विशेष आराधना की जाती है। धार्मिक परंपरा में भगवान कार्तिकेय की उपासना साहस, आत्मविश्वास, ज्ञान, अनुशासन, नेतृत्व और नकारात्मक प्रवृत्तियों पर विजय की प्रार्थना के लिए की जाती है।

भगवान कार्तिकेय के नाम मंत्र, षडक्षर मंत्र, गायत्री मंत्र, ध्यान मंत्र और स्तुति मंत्र का श्रद्धापूर्वक जाप किया जा सकता है। सभी मंत्रों का एक साथ जाप करना आवश्यक नहीं है। साधक अपनी सुविधा और परंपरा के अनुसार किसी एक मंत्र का चयन करके नियमित रूप से उसका जाप कर सकता है।

कार्तिकेय मंत्र जाप की विधि

  • प्रातःकाल स्नान करके स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूजा स्थान को स्वच्छ रखें।
  • शांत स्थान पर पूर्व अथवा उत्तर दिशा की ओर मुख करके बैठें।
  • सबसे पहले भगवान श्री गणेश, भगवान शिव, माता पार्वती और अपने इष्टदेव का स्मरण करें।
  • भगवान कार्तिकेय के चित्र अथवा प्रतिमा के सामने दीपक और धूप प्रज्वलित करें।
  • अपनी श्रद्धानुसार पुष्प, फल और नैवेद्य अर्पित करें।
  • नीचे दिए गए मंत्रों में से किसी एक मुख्य मंत्र का चयन करें।
  • सामान्य उपासना में मंत्र का 11, 21 अथवा 108 बार जाप किया जा सकता है।
  • जाप के लिए रुद्राक्ष, तुलसी अथवा लाल चंदन की माला का प्रयोग किया जा सकता है।
  • जाप पूरा होने के बाद भगवान कार्तिकेय से साहस, ज्ञान, अनुशासन और सद्बुद्धि प्रदान करने की प्रार्थना करें।

नोट: भगवान कार्तिकेय की आराधना किसी भी दिन की जा सकती है। षष्ठी तिथि, स्कन्द षष्ठी तथा मंगलवार को उनकी पूजा का विशेष महत्व माना जाता है। किसी विशेष अनुष्ठान, दीक्षा अथवा बड़ी जाप-संख्या के लिए योग्य गुरु या आचार्य का मार्गदर्शन लेना उचित है।

भगवान कार्तिकेय के नाम मंत्र

भगवान कार्तिकेय के नाम मंत्र सरल और दैनिक उपासना के लिए उपयुक्त हैं। जो भक्त लंबे मंत्रों का उच्चारण नहीं कर पाते, वे इनमें से किसी एक मंत्र का जाप कर सकते हैं।

ॐ कार्तिकेयाय नमः॥

ॐ स्कन्दाय नमः॥

ॐ सुब्रह्मण्याय नमः॥

ॐ षण्मुखाय नमः॥

ॐ गुहाय नमः॥

अर्थ: इन मंत्रों के माध्यम से भगवान कार्तिकेय के विभिन्न दिव्य नामों का स्मरण करते हुए उन्हें श्रद्धापूर्वक नमन किया जाता है।

भगवान कार्तिकेय का षडक्षर मंत्र

“शरवणभव” भगवान कार्तिकेय का प्रसिद्ध षडक्षर नाम है। धार्मिक परंपरा के अनुसार इसका संबंध भगवान कार्तिकेय के शरवण अर्थात सरकंडों के वन में प्रकट होने से माना जाता है।

ॐ शरवणभवाय नमः॥

अर्थ: शरवण में प्रकट हुए भगवान कार्तिकेय को मैं नमस्कार करता हूँ। वे मुझे साहस, ज्ञान और धर्म के मार्ग पर आगे बढ़ने की प्रेरणा प्रदान करें।

दक्षिण भारतीय परंपराओं में “सरवणभव” उच्चारण भी अत्यंत प्रचलित है। साधक अपनी गुरु, पारिवारिक अथवा क्षेत्रीय परंपरा के अनुसार पाठ कर सकता है।

श्री कार्तिकेय गायत्री मंत्र

यह भगवान कार्तिकेय का प्रसिद्ध गायत्री मंत्र है। इसमें परम दिव्य स्वरूप को जानने, महासेन का ध्यान करने और षण्मुख भगवान से बुद्धि को प्रकाशित करने की प्रार्थना की गई है।

ॐ तत्पुरुषाय विद्महे महासेनाय धीमहि।

तन्नः षण्मुखः प्रचोदयात्॥

अर्थ: हम उस परम दिव्य पुरुष को जानें और देवताओं के महान सेनापति भगवान कार्तिकेय का ध्यान करें। छह मुख वाले षण्मुख भगवान हमारी बुद्धि को प्रकाशित करके हमें शुभ मार्ग पर प्रेरित करें।

कार्तिकेय गायत्री मंत्र का दूसरा प्रचलित पाठ

ॐ षण्मुखाय विद्महे महासेनाय धीमहि।

तन्नः स्कन्दः प्रचोदयात्॥

अर्थ: हम छह मुख वाले षण्मुख भगवान को जानें और देवसेनापति महासेन का ध्यान करें। भगवान स्कन्द हमारी बुद्धि को ज्ञान, साहस और धर्म की ओर प्रेरित करें।

कार्तिकेय गायत्री मंत्र के एक से अधिक पारंपरिक पाठ मिलते हैं। साधक इनमें से किसी एक पाठ को चुनकर नियमित जाप कर सकता है।

भगवान कार्तिकेय की प्रार्थना

इस प्रार्थना में भगवान कार्तिकेय को ज्ञान और शक्ति धारण करने वाले स्कन्द तथा देवी वल्ली और देवसेना के प्रिय स्वामी के रूप में नमन किया गया है।

ज्ञानशक्तिधर स्कन्द वल्लीकल्याणसुन्दर।

देवसेनामनःकान्त कार्तिकेय नमोऽस्तु ते॥

अर्थ: ज्ञान और शक्ति धारण करने वाले भगवान स्कन्द, देवी वल्ली के मंगलमय और सुन्दर स्वामी तथा देवी देवसेना के मन को प्रिय भगवान कार्तिकेय! आपको बार-बार नमस्कार है।

भगवान कार्तिकेय का ध्यान मंत्र

मुख्य मंत्र का जाप आरंभ करने से पहले भगवान कार्तिकेय के षण्मुख, द्वादशभुज और मयूरवाहन स्वरूप का ध्यान करते हुए इस मंत्र का पाठ किया जा सकता है।

षण्मुखं द्वादशभुजं द्विषण्णयनपङ्कजम्।

कुमारं सुकुमाराङ्गं केकिवाहनमाश्रये॥

अर्थ: मैं छह मुख, बारह भुजाओं और बारह कमल के समान नेत्रों वाले, अत्यंत सुन्दर कुमार स्वरूप तथा मयूर पर विराजमान भगवान कार्तिकेय की शरण ग्रहण करता हूँ।

भगवान कार्तिकेय का आवाहन मंत्र

भगवान कार्तिकेय की विधिवत पूजा करते समय इस मंत्र के माध्यम से उनका आवाहन किया जा सकता है। इसमें उन्हें क्रौञ्च पर्वत का भेदन करने वाले और भक्तों की शुभ इच्छाएँ पूर्ण करने वाले देवता के रूप में संबोधित किया गया है।

सुब्रह्मण्य महाभाग क्रौञ्चाख्यगिरिभेदन।

आवाहयामि देव त्वां भक्ताभीष्टप्रदो भव॥

अर्थ: हे परम सौभाग्यशाली भगवान सुब्रह्मण्य! हे क्रौञ्च नामक पर्वत का भेदन करने वाले देव! मैं आपका आवाहन करता हूँ। आप प्रसन्न होकर भक्तों की शुभ अभिलाषाएँ पूर्ण करने वाले बनें।

मयूरवाहन कार्तिकेय स्तुति

इस स्तुति में भगवान कार्तिकेय के मयूरवाहन स्वरूप, उनके दिव्य ज्ञान, मनोहर रूप और महादेव के पुत्र होने का वर्णन किया गया है।

मयूराधिरूढं महावाक्यगूढं मनोहारिदेहं महच्चित्तगेहम्।

महीदेवदेवं महावेदभावं महादेवबालं भजे लोकपालम्॥

अर्थ: जो मयूर पर विराजमान हैं, प्रणव के गूढ़ ज्ञान से युक्त हैं, जिनका स्वरूप मन को आकर्षित करता है, जो महान चेतना के आधार, वेदों के ज्ञाता, भगवान महादेव के पुत्र और संसार की रक्षा करने वाले हैं—मैं उन भगवान कार्तिकेय का भजन करता हूँ।

कौन-सा कार्तिकेय मंत्र जपना चाहिए?

  • सरल दैनिक उपासना: ॐ कार्तिकेयाय नमः॥
  • दक्षिण भारतीय परंपरा का प्रसिद्ध मंत्र: ॐ शरवणभवाय नमः॥
  • बुद्धि और शुभ प्रेरणा की प्रार्थना: कार्तिकेय गायत्री मंत्र।
  • पूजा से पहले स्वरूप का ध्यान: कार्तिकेय ध्यान मंत्र।
  • विधिवत पूजन में: कार्तिकेय आवाहन मंत्र।
  • ज्ञान और शक्ति की प्रार्थना: ज्ञानशक्तिधर स्कन्द प्रार्थना।

सभी मंत्रों का एक साथ जाप करना आवश्यक नहीं है। किसी एक मुख्य मंत्र का चयन करके नियमितता और स्पष्ट उच्चारण के साथ जाप करना अधिक सरल होता है।

भगवान मुरुगन का पारंपरिक आवाहन

आरुमुगा, ॐ मुरुगा।

वेल वेल, मुरुगा मुरुगा।

वा वा, मुरुगा मुरुगा।

वडिवेल अळगा मुरुगा।

अडियार्क्कु एळिया मुरुगा।

अळगा मुरुगा, वरुवाय्।

वडिवेलुडने वरुवाय्॥

भावार्थ: हे छह मुख वाले सुन्दर भगवान मुरुगन! हे दिव्य वेल धारण करने वाले और भक्तों के लिए सहज-सुलभ प्रभु! पधारिए और अपने भक्तों पर कृपा कीजिए।

दक्षिण भारतीय मुरुगन नाम-संकीर्तन

हरो मुरुगा, हरो मुरुगा शिवकुमारा, हरो हरा।

हरो कन्दा, हरो कन्दा हरो कन्दा, हरो हरा।

हरो षण्मुखा, हरो षण्मुखा हरो षण्मुखा, हरो हरा।

हरो वेला, हरो वेला हरो वेला, हरो हरा।

हरो मुरुगा, हरो मुरुगा ॐ मुरुगा, हरो हरा॥

भावार्थ: भगवान मुरुगन, शिवकुमार, कन्द, षण्मुख और दिव्य वेल धारण करने वाले कार्तिकेय की जय हो। भक्त इस नाम-संकीर्तन के माध्यम से भगवान का स्मरण और गुणगान करते हैं।

कार्तिकेय मंत्र जाप का पारंपरिक महत्व

धार्मिक मान्यता के अनुसार भगवान कार्तिकेय की उपासना साहस, आत्मविश्वास, ज्ञान, नेतृत्व, अनुशासन और कर्तव्यनिष्ठा के लिए की जाती है। उन्हें देवताओं का सेनापति माना जाता है, इसलिए उनका स्वरूप कठिन परिस्थितियों में धैर्य, विवेक और धर्मपूर्वक कार्य करने की प्रेरणा देता है।

  • भय और निराशा के समय साहस की प्रार्थना के लिए।
  • ज्ञान, विवेक और एकाग्रता के लिए।
  • आत्मविश्वास और नेतृत्व क्षमता विकसित करने के लिए।
  • क्रोध और आवेश पर संयम रखने की प्रेरणा के लिए।
  • कर्तव्यों को अनुशासनपूर्वक पूरा करने के लिए।
  • नकारात्मक विचारों और अनुचित प्रवृत्तियों पर विजय की प्रार्थना के लिए।

मंत्र-जाप का उद्देश्य केवल किसी बाहरी विरोधी को पराजित करना नहीं, बल्कि अपने भीतर के भय, क्रोध, आलस्य, अहंकार और असंयम जैसी प्रवृत्तियों पर विजय प्राप्त करना भी है।

कार्तिकेय मंत्र जाप में सावधानियाँ

  • मंत्र का उच्चारण जल्दबाजी में न करें और यथासंभव शुद्ध पाठ रखें।
  • किसी एक मुख्य मंत्र का चयन करके नियमित जाप करें।
  • मंत्र-जाप शांत मन, श्रद्धा और सात्त्विक भाव से करें।
  • मंत्रों को किसी व्यक्ति को हानि पहुँचाने अथवा अनुचित उद्देश्य से न जपें।
  • भय, चमत्कार या निश्चित सफलता की अपेक्षा से मंत्र-जाप न करें।
  • कानूनी विवाद, स्वास्थ्य, शिक्षा अथवा आर्थिक विषयों में केवल मंत्र-जाप पर निर्भर न रहें। आवश्यकता के अनुसार संबंधित विशेषज्ञ की सलाह लें।
  • विशेष तांत्रिक साधना, दीक्षा या बड़े अनुष्ठान योग्य गुरु के मार्गदर्शन में ही करें।
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