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शिव भूतनाथाष्टकम्
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शिव भूतनाथाष्टकम्

Shiv Bhootanaathaashtakam

Shiv Bhutanathashtakam

भगवान शिव के तांडव रूप, भूतों के अधिपति भैरवस्वरूप और चिदानन्दघन रूप का भावमय स्तवन है — यह भूतनाथाष्टकम्। इसमें शिव की रौद्रता में छिपी करुणा, तांडव में समाहित ध्यान, और भस्मलेपित स्वरूप में प्रकाशित दिव्यता का अनोखा संगम है। इसका पाठ साधक को निर्भयता, भक्ति और ब्रह्मज्ञान की ओर ले जाता है।

शिव शिव शक्तिनाथं संहारं शं स्वरूपम् नव नव नित्यनृत्यं ताण्डवं तं तन्नादम् ।

घन घन घूर्णिमेघं घंघोरं घंन्निनादम् भज भज भस्मलेपं भजामि भूतनाथम् ॥१॥

मैं उस शिव की वंदना करता हूँ, जो शक्ति के अधिपति हैं, जो स्वयं कल्याणस्वरूप हैं, जो प्रतिपल नूतन तांडव नृत्य में लीन रहते हैं। जिनके नाद में घने काले तूफ़ान-से घोर मेघों की गूंज समाहित है। जो भस्म से अलंकृत हैं — उन भूतनाथ की मैं बारंबार भक्ति करता हूँ।

कळकळकाळरूपं कल्लोळंकंकराळम् डम डम डमनादं डम्बुरुं डंकनादम् ।

सम सम शक्तग्रिवं सर्वभूतं सुरेशम् भज भज भस्मलेपं भजामि भूतनाथम् ॥२॥

जो स्वयं कालरूप हैं, जिनका स्वरूप लहराते सागर की भाँति भयानक परंतु गहन है। जिनका डमरू ‘डम-डम’ की गूंज से ब्रह्मांड को नचाता है। जिनका गला शक्तिशाली है और जो समस्त भूतों के अधिपति तथा देवताओं के देव हैं — उन भस्मधारी भूतनाथ को मैं बारंबार प्रणाम करता हूँ।

रम रम रामभक्तं रमेशं रां रारावम् मम मम मुक्तहस्तं महेशं मं मधुरम् ।

बम बम ब्रह्मरूपं बामेशं बं विनाशम् भज भज भस्मलेपं भजामि भूतनाथम् ॥३॥

जो श्रीराम के अनन्य भक्त हैं, जो राम नाम में लीन रहते हैं, जो अत्यंत उदार हैं, मुक्त हस्त से वर देते हैं, जिनका स्वभाव मधुर है। जो ब्रह्मस्वरूप हैं, बामदेव रूपधारी हैं और जगत के संहारकर्ता हैं — उन भस्मलेपित महेश्वर का मैं पुनः पुनः वंदन करता हूँ।

हर हर हरिप्रियं त्रितापं हं संहारम् खमखम क्षमाशीळं सपापं खं क्षमणम् ।

द्दग द्दग ध्यानमूर्त्तिं सगुणं धं धारणम् भज भज भस्मलेपं भजामि भूतनाथम् ॥४॥

जो हरि के प्रिय हैं, जो तीनों प्रकार के तापों (आध्यात्मिक, आधिभौतिक, आधिदैविक) का संहार करते हैं। जो क्षमा के सागर हैं, जो पापियों को भी अपनाते हैं, जो ध्यानमूर्ति हैं और सगुण-साकार रूप से सबका पालन करते हैं — उन भस्मधारी शिव की मैं भक्ति करता हूँ।

पम पम पापनाशं प्रज्वलं पं प्रकाशम् गम गम गुह्यतत्त्वं गिरीशं गं गणानाम् ।

दम दम दानहस्तं धुन्दरं दं दारुणम् भज भज भस्मलेपं भजामि भूतनाथम् ॥५॥

जो समस्त पापों का नाश करते हैं, जो प्रज्वलित प्रकाशस्वरूप हैं। जो गूढ़ रहस्यमय तत्त्व हैं, गिरिश्वर हैं, गणों के अधिपति हैं। जो मुक्त हस्त से दान देते हैं और साथ ही दुष्टों का संहार करने में प्रचंड हैं — उन भूतनाथ शिव की मैं नित्य उपासना करता हूँ।

गम गम गीतनाथं दूर्गमं गं गंतव्यम् टम टम रूंडमाळं टंकारं टंकनादम् ।

भम भम भ्रम् भ्रमरं भैरवं क्षेत्रपाळम् भज भज भस्मलेपं भजामि भूतनाथम् ॥६॥

जो गीतों के अधिपति हैं, जिनका स्वरूप दुर्गम व गूढ़ है। जिनके कंठ में रूंडमाल (खोपड़ी की माला) से टंकार की भयानक ध्वनि होती है। जो भ्रम रूप में विचरण करते हुए भैरवरूप में क्षेत्रपाल हैं — उन भैरवस्वरूप भूतनाथ को मैं बारंबार प्रणाम करता हूँ।

त्रिशुळधारी संहारकारी गिरिजानाथम् ईश्वरम् पार्वतीपति त्वं मायापति शुभ्रवर्णम् महेश्वरम् ।

कैळाशनाथ सतीप्राणनाथ महाकालं कालेश्वरम् अर्धचंद्रं शिरकिरीटं भूतनाथं शिवं भजे ॥७॥

जो त्रिशूलधारी हैं, संहार करने वाले हैं, गिरिजा के स्वामी हैं। जो पार्वतीपति, मायापति, शुभ्रवर्णधारी और महेश्वर हैं। कैलाशपति, सतीजी के जीवनस्वरूप हैं, महाकाल व कालों के भी स्वामी हैं। जिनके मस्तक पर अर्धचन्द्र सुशोभित है — उन शिव भूतनाथ की मैं आराधना करता हूँ।

नीलकंठाय सत्स्वरूपाय सदाशिवाय नमो नमः यक्षरूपाय जटाधराय नागदेवाय नमो नमः ।

इंद्रहाराय त्रिलोचनाय गंगाधराय नमो नमः अर्धचंद्रं शिरकिरीटं भूतनाथं शिवं भजे ॥८॥

जिनका कंठ नील है, जो सच्चिदानंद स्वरूप हैं — उन्हें बारंबार प्रणाम। जो यक्षरूपधारी, जटाधारी, नागों के अधिपति हैं — उन्हें बारंबार नमस्कार। जो त्रिनेत्रधारी हैं, गंगाधर हैं, इंद्र जैसे रत्नों से भी अलंकृत हैं और जिनके शीश पर अर्धचन्द्र शोभायमान है — उन सदा शिव भूतनाथ को मैं शरणागत होकर भजता हूँ।

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