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वरूथिनी एकादशी व्रत कथा

वरूथिनी एकादशी व्रत कथा

सौभाग्य-सुरक्षा प्रदान करने वाली एकादशी व्रत कथा

तिथि व महत्व: वैशाख माह के कृष्ण पक्ष की एकादशी को “वरूथिनी एकादशी” कहा जाता है। “वरूथिनी” का अर्थ है — जो साधक को रक्षण, आवरण और सौभाग्य का कवच प्रदान करे। यह एकादशी विशेष रूप से पापों को शान्त करने वाली, दरिद्रता को दूर करने वाली और दीन-सधवा स्त्रियों को पुनः सौभाग्य देने वाली मानी गई है।

श्रीकृष्ण का अर्जुन से उपदेश

श्रीकृष्ण ने कहा — “हे अर्जुन! इस एकादशी का व्रत करने से मनुष्य को वैसा ही पुण्य मिलता है, जैसा दस हज़ार वर्ष की कठिन तपस्या से मिलता है। इससे ही प्राचीनकाल में राजा मान्धाता स्वर्ग के अधिकारी बने और धुन्धुमार आदि पवित्र लोकों को प्राप्त हुए। जो स्त्री दुखी, निराश या विधवा हो और श्रद्धा से यह व्रत करे, उसका भाग्य फिर से उज्ज्वल होता है।”

इस व्रत की तुलनाएँ

भगवान ने आगे समझाया — “हे धनंजय! कुरुक्षेत्र में सूर्यग्रहण के समय यदि कोई स्वर्णदान करे तो जो अलभ्य फल मिलता है, वही फल इस एकादशी के उपवास से उपलब्ध होता है। यह व्रत साधक को इस लोक में सुख और परलोक में उन्नति — दोनों देता है।”

दान का क्रम और एकादशी का स्थान

ग्रन्थों में दान का एक क्रम बताया गया है —

• घोड़े का दान अच्छा, पर उससे ऊपर हाथी का दान।
• हाथी से बढ़कर भूमि का दान।
• भूमि से बढ़कर तिल का दान।
• तिल से बढ़कर स्वर्ण का दान।
• और स्वर्ण से भी बढ़कर है अन्नदान, क्योंकि अन्न से देवता, पितर और मनुष्य — सबकी तृप्ति होती है।
• इसी को शास्त्र में कन्यादान के बराबर भी कहा गया है।

श्रीकृष्ण ने कहा — “हे पार्थ! वरूथिनी एकादशी का व्रत इन दोनों — अन्नदान और कन्यादान — का संयुक्त फल देता है। इसलिए इसका माहात्म्य सामान्य व्रत से बहुत ऊँचा है।”

कन्याधन का दुरुपयोग और चेतावनी

शास्त्र यह भी कहते हैं — जो जन लोभवश कन्या-पक्ष का धन दबा लेते हैं, या जो कन्या-विवाह के नाम पर धन लेकर भोगते हैं, वे प्रलय-समाप्ति तक कष्ट भोगते हैं, और अगले जन्म में भी नीची योनियों (जैसे बिलाव/बिल्ली) में भटक सकते हैं। इसके उलट जो प्रेम से, यज्ञ-विधि से, धर्मपूर्वक कन्यादान करते हैं, उनका पुण्य चित्रगुप्त भी पूरा नहीं लिख पाते

भगवान बोले — “ऐसे महादुर्लभ पुण्य का अंश इस एकादशी के व्रत से मिलता है; इसलिए बुद्धिमान इसे अवश्य करें।”

व्रत का नियम (दशमी से संयम)

इस एकादशी की विशेषता यह है कि इसका संयम एक दिन पहले दशमी से ही शुरू कर दिया जाता है। दशमी से व्रती को ये चीजें छोड़ देनी चाहिए —

• काँसे के पात्र में भोजन
• माँसाहार
• मसूर, चना, कोदो, शाक इत्यादि वर्ज्य पदार्थ
• शहद (मधु)
• दूसरे का पकाया अन्न
• एक दिन में दूसरी बार भोजन
• काम-वासना को उकसाने वाली संगति या चर्चा

एकादशी के दिन पूर्ण ब्रह्मचर्य, क्रोध-त्याग, झूठ-त्याग, चुगली-त्याग और पापी-संग से दूर रहना अनिवार्य माना गया है। रात को अधिक सोना भी मना है — यथाशक्ति हरिनाम, कथा-स्मरण या शास्त्र-चिन्तन से जागरण करना चाहिए।

व्रत का फल

• इस व्रत से इहलोक में सुख-सौभाग्य और परलोक में उत्तम गति दोनों प्राप्त होते हैं।
• जिनके भाग्य में रुकावट, दाम्पत्य में क्लेश या संतान-सुख में कमी हो — वे भी इसे कर सकते हैं।
• जो श्रद्धा से इसका माहात्म्य पढ़ता या सुनाता है, उसे हज़ार गौदान के बराबर पुण्य कहा गया है।
• भगवान ने यह भी कहा — “इसका फल गंगाजल में स्नान करने से भी ऊँचा है।”

कथा-सार

• सौभाग्य कभी केवल किस्मत से नहीं टिकता — वह संयम से सुरक्षित रहता है
• वरूथिनी एकादशी का नियम हमें यही सिखाता है कि जो खाते हैं, जो बोलते हैं, जिसके संग बैठते हैं, जो सोचते हैं — सब पर अनुशासन हो।
• जो व्यक्ति नियम के साथ यह व्रत करता है, उसका पुण्य दो लोकों में उसका रक्षण करता है — जैसे नाम से ही संकेत है: “वरूथिनी” — ढाल, सुरक्षा, कवच।

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