सोमवती अमावस्या उस अमावस्या को कहा जाता है जो सोमवार के दिन पड़ती है। सनातन परंपरा में सोमवार भगवान शिव को समर्पित है और अमावस्या पितृ-स्मरण के लिए महत्वपूर्ण मानी जाती है। इसलिए इस दिन शिव-पार्वती पूजा, पवित्र स्नान, पितृ तर्पण, दान और पीपल-वृक्ष की पूजा की परंपरा है।
विवाहित महिलाएँ पारिवारिक परंपरा के अनुसार अखंड सौभाग्य और परिवार के मंगल की प्रार्थना से यह व्रत करती हैं। पुरुष और अविवाहित श्रद्धालु भी भगवान शिव की आराधना, पितृ-स्मरण और दान कर सकते हैं।
सोमवती अमावस्या का धार्मिक महत्व
सोमवती अमावस्या को कई परंपराओं में अश्वत्थ प्रदक्षिणा व्रत से जोड़ा जाता है। अश्वत्थ अर्थात पीपल-वृक्ष की पूजा और परिक्रमा करते हुए भगवान विष्णु, भगवान शिव तथा पितृदेवों का स्मरण किया जाता है। परिक्रमा की संख्या परिवार और क्षेत्र की परंपरा के अनुसार अलग हो सकती है।
सोमवती अमावस्या की प्रचलित व्रत कथा
प्राचीन समय में एक गरीब ब्राह्मण दंपति अपनी गुणवान पुत्री के साथ रहते थे। कन्या विवाह योग्य हो चुकी थी, लेकिन अनेक प्रयासों के बाद भी उसका विवाह नहीं हो पा रहा था। एक दिन एक साधु उनके घर आए। कन्या ने बड़ी श्रद्धा और विनम्रता से उनकी सेवा की। उसकी सेवा से प्रसन्न होकर साधु ने आशीर्वाद दिया, किंतु कहा कि उसके भाग्य में वैवाहिक बाधा दिखाई देती है।
चिंतित माता-पिता ने साधु से उपाय पूछा। साधु ने बताया कि निकट के गाँव में सोना नाम की एक धोबिन रहती है। वह सदाचारी, सेवाभावी और पति-परायण स्त्री है। यदि कन्या निष्काम भाव से उसकी सेवा करे और सोना प्रसन्न होकर उसे अपने सौभाग्य का आशीर्वाद दे, तो उसका कष्ट दूर हो सकता है।
अगले दिन से कन्या प्रातः अंधेरे में सोना के घर जाने लगी। वह घर की सफाई और आवश्यक काम करके किसी को बताए बिना लौट आती। सोना और उसकी बहू दोनों सोचती थीं कि घर का काम दूसरी ने किया है। जब यह क्रम कई दिनों तक चला, तो उन्होंने पता लगाने का निश्चय किया। तब सोना ने कन्या को चुपचाप सेवा करते देखा और उससे इसका कारण पूछा।
कन्या ने साधु की कही पूरी बात बता दी। उसकी निष्कपट सेवा से प्रभावित होकर सोना ने उसकी सहायता स्वीकार कर ली। कथा के अनुसार, कन्या के विवाह के समय सोना ने अपनी माँग का सिंदूर उसकी माँग में लगाया और उसे अखंड सौभाग्य का आशीर्वाद दिया। उसी क्षण सोना के पति के प्राण चले गए। सोना को इसका आभास हो गया, फिर भी वह अपना वचन पूरा करके लौटी।
उस दिन सोमवती अमावस्या थी। सोना ने संकल्प किया था कि पीपल-वृक्ष की पूजा और परिक्रमा के बाद ही जल ग्रहण करेगी। मार्ग में पीपल मिलने पर उसने उपलब्ध साधारण वस्तुओं से भँवरी दी और श्रद्धापूर्वक 108 परिक्रमाएँ कीं। कथा में कहा गया है कि उसके व्रत, सेवा और सत्यनिष्ठा के प्रभाव से उसके पति पुनः जीवित हो उठे।
यह लोकप्रचलित कथा सेवा, वचन-पालन, सत्य और निष्काम भाव की महिमा बताती है। कथा का उद्देश्य किसी चमत्कार का दावा करना नहीं, बल्कि यह समझाना है कि पूजा के साथ सदाचार, करुणा और निष्ठा भी आवश्यक हैं।
॥ सोमवती अमावस्या व्रत कथा सम्पूर्ण ॥
सोमवती अमावस्या पूजा सामग्री
- भगवान शिव और माता पार्वती का चित्र
- शिवलिंग के लिए शुद्ध जल
- पीपल पूजा के लिए जल, रोली, अक्षत और पुष्प
- धूप, दीप, कपूर और नैवेद्य
- कच्चा सूत या मौली—केवल पारिवारिक परंपरा होने पर
- फल और दान की सामग्री
सोमवती अमावस्या की सरल पूजा विधि
- प्रातः स्नान करके स्वच्छ वस्त्र पहनें और व्रत या पूजा का संकल्प लें।
- सूर्यदेव को जल अर्पित करें और पितरों का श्रद्धापूर्वक स्मरण करें।
- भगवान शिव का जलाभिषेक करें और माता पार्वती को पुष्प तथा सुहाग सामग्री अर्पित करें।
- पीपल-वृक्ष की जड़ में आवश्यकता भर जल दें। रोली, अक्षत, पुष्प और दीप से पूजा करें।
- अपनी परंपरा और क्षमता के अनुसार परिक्रमा करें। 108 परिक्रमा प्रचलित हैं, लेकिन स्वास्थ्य अनुमति न दे तो कम परिक्रमा भी श्रद्धा से की जा सकती हैं।
- वृक्ष पर ऐसा धागा न बाँधें जिससे तने या शाखाओं को क्षति हो; प्लास्टिक और अनुपयोगी पूजा-सामग्री वहाँ न छोड़ें।
- सोमवती अमावस्या की कथा पढ़ें, शिव-पार्वती की आरती करें और परिवार के मंगल की प्रार्थना करें।
- अन्न, फल, वस्त्र या आवश्यक वस्तुओं का यथाशक्ति दान करें।
सोमवती अमावस्या मंत्र
ॐ नमः शिवाय।
ॐ नमो भगवते वासुदेवाय।
ॐ सर्वेभ्यो पितृभ्यो नमः।
व्रत के नियम और पारण
- उपवास अपनी क्षमता के अनुसार फलाहार या एक समय सात्त्विक भोजन के रूप में रखें।
- क्रोध, असत्य, निंदा और कटु वचन से बचें।
- पीपल की पूजा करें, लेकिन वृक्ष को हानि न पहुँचाएँ।
- पितृ तर्पण की औपचारिक विधि कुल-परंपरा के अनुसार करें।
- संध्या पूजा के बाद या अपनी परंपरा के अनुसार अगले दिन पारण करें।
सोमवती अमावस्या से संबंधित सामान्य प्रश्न


