एक बुढ़िया थी, उसके सात बेटे थे। 6 कमाने वाले थे जबकि एक निक्कमा था। बुढ़िया छहों बेटों की रसोई बनाती, भोजन कराती और उनसे जो कुछ जूठन बचती वह सातवें को दे देती। एक दिन वह पत्नी से बोला- देखो मेरी मां को मुझ पर कितना प्रेम है। वह बोली- क्यों नहीं, सबका झूठा जो तुमको खिलाती है। वह बोला- ऐसा नहीं हो सकता है। मैं जब तक आंखों से न देख लूं मान नहीं सकता। बहू हंस कर बोली- देख लोगे तब तो मानोगे।
कुछ दिन बाद त्यौहार आया। घर में सात प्रकार के भोजन और चूरमे के लड्डू बने। वह जांचने को सिर दुखने का बहाना कर पतला वस्त्र सिर पर ओढ़े रसोई घर में सो गया। वह कपड़े में से सब देखता रहा। छहों भाई भोजन करने आए। उसने देखा, मां ने उनके लिए सुन्दर आसन बिछा नाना प्रकार की रसोई परोसी और आग्रह करके उन्हें जमाया। वह देखता रहा। छहों भोजन करके उठे तब मां ने उनकी झूठी थालियों में से लड्डुओं के टुकड़े उठाकर एक लड्डू बनाया। जूठन साफ कर बुढ़िया मां ने उसे पुकारा- बेटा, छहों भाई भोजन कर गए अब तू ही बाकी है, उठ तू कब खाएगा। वह कहने लगा- मां मुझे भोजन नहीं करना, मैं अब परदेश जा रहा हूं। मां ने कहा- कल जाता हो तो आज चला जा। वह बोला- हां आज ही जा रहा हूं। यह कह कर वह घर से निकल गया।
सातवें बेटे का परदेश जाना
चलते समय पत्नी की याद आ गई। वह गौशाला में कण्डे (उपले) थाप रही थी। वहां जाकर बोला- हम जावे परदेश आवेंगे कुछ काल, तुम रहियो संतोष से धर्म आपनो पाल। वह बोली- जाओ पिया आनन्द से हमारो सोच हटाय, राम भरोसे हम रहें ईश्वर तुम्हें सहाय। दो निशानी आपन देख धरूं में धीर, सुधि मति हमारी बिसारियो रखियो मन गम्भीर। वह बोला- मेरे पास तो कुछ नहीं, यह अंगूठी है सो ले और अपनी कुछ निशानी मुझे दे। वह बोली- मेरे पास क्या है, यह गोबर भरा हाथ है। यह कह कर उसकी पीठ पर गोबर के हाथ की थाप मार दी। वह चल दिया, चलते-चलते दूर देश पहुंचा।
परदेश में नौकरी
वहां एक साहूकार की दुकान थी। वहां जाकर कहने लगा- भाई मुझे नौकरी पर रख लो। साहूकार को जरूरत थी, बोला- रह जा। लड़के ने पूछा- तनखा क्या दोगे। साहूकार ने कहा- काम देख कर दाम मिलेंगे। साहूकार की नौकरी मिली, वह सुबह 7 बजे से 10 बजे तक नौकरी बजाने लगा। कुछ दिनों में दुकान का सारा लेन-देन, हिसाब-किताब, ग्राहकों को माल बेचना सारा काम करने लगा। साहूकार के सात-आठ नौकर थे, वे सब चक्कर खाने लगे, यह तो बहुत होशियार बन गया। सेठ ने भी काम देखा और तीन महीने में ही उसे आधे मुनाफे का हिस्सेदार बना लिया। वह कुछ वर्ष में ही नामी सेठ बन गया और मालिक सारा कारोबार उसपर छोड़कर चला गया।
पति की अनुपस्थिति में सास का अत्याचार
इधर उसकी पत्नी को सास ससुर दु:ख देने लगे, सारी गृहस्थी का काम कराके उसे लकड़ी लेने जंगल में भेजते। इस बीच घर के आटे से जो भूसी निकलती उसकी रोटी बनाकर रख दी जाती और फूटे नारियल की नारेली में पानी। एक दिन वह लकड़ी लेने जा रही थी, रास्ते में बहुत सी स्त्रियां संतोषी माता का व्रत करती दिखाई दी।
संतोषी माता का व्रत
वह वहां खड़ी होकर कथा सुनने लगी और पूछा- बहिनों तुम किस देवता का व्रत करती हो और उसके करने से क्या फल मिलता है। यदि तुम इस व्रत का विधान मुझे समझा कर कहोगे तो मैं तुम्हारा बड़ा अहसान मानूंगी। तब उनमें से एक स्त्री बोली- सुनो, यह संतोषी माता का व्रत है। इसके करने से निर्धनता, दरिद्रता का नाश होता है और जो कुछ मन में कामना हो, सब संतोषी माता की कृपा से पूरी होती है। तब उसने उससे व्रत की विधि पूछी।
संतोषी माता व्रत विधि
वह बोली- सवा आने का गुड़ चना लेना, इच्छा हो तो सवा पांच आने का लेना या सवा रुपए का भी सहूलियत के अनुसार लाना। बिना परेशानी और श्रद्धा व प्रेम से जितना भी बन पड़े सवाया लेना। प्रत्येक शुक्रवार को निराहार रह कर कथा सुनना, इसके बीच क्रम टूटे नहीं, लगातार नियम पालन करना, सुनने वाला कोई न मिले तो धी का दीपक जला उसके आगे या जल के पात्र को सामने रख कर कथा कहना। जब कार्य सिद्ध न हो नियम का पालन करना और कार्य सिद्ध हो जाने पर व्रत का उद्यापन करना। तीन मास में माता फल पूरा करती है। यदि किसी के ग्रह खोटे भी हों, तो भी माता वर्ष भर में कार्य सिद्ध करती है, फल सिद्ध होने पर उद्यापन करना चाहिए बीच में नहीं। उद्यापन में अढ़ाई सेर आटे का खाजा तथा इसी परिमाण से खीर तथा चने का साग करना। आठ लड़कों को भोजन कराना, जहां तक मिलें देवर, जेठ, भाई-बंधु के हों, न मिले तो रिश्तेदारों और पास-पड़ोसियों को बुलाना। उन्हें भोजन करा यथा शक्ति दक्षिणा दे माता का नियम पूरा करना। उस दिन घर में खटाई न खाना। यह सुन बुढ़िया के लड़के की बहू चल दी।
व्रत का प्रण करना और मां संतोषी का दर्शन देना
रास्ते में लकड़ी के बोझ को बेच दिया और उन पैसों से गुड़-चना ले माता के व्रत की तैयारी कर आगे चली और सामने मंदिर देखकर पूछने लगी- यह मंदिर किसका है। सब कहने लगे संतोषी माता का मंदिर है, यह सुनकर माता के मंदिर में जाकर चरणों में लोटने लगी। दीन हो विनती करने लगी- मां मैं निपट अज्ञानी हूं, व्रत के कुछ भी नियम नहीं जानती, मैं दु:खी हूं। हे माता जगत जननी मेरा दु:ख दूर कर मैं तेरी शरण में हूं। माता को दया आई – एक शुक्रवार बीता कि दूसरे को उसके पति का पत्र आया और तीसरे शुक्रवार को उसका भेजा हुआ पैसा आ पहुंचा। यह देख जेठ-जिठानी मुंह सिकोडऩे लगे। लड़के ताने देने लगे- काकी के पास पत्र आने लगे, रुपया आने लगा, अब तो काकी की खातिर बढ़ेगी। बेचारी सरलता से कहती- भैया कागज आवे रुपया आवे हम सब के लिए अच्छा है। ऐसा कह कर आंखों में आंसू भरकर संतोषी माता के मंदिर में आ मातेश्वरी के चरणों में गिरकर रोने लगी। मां मैंने तुमसे पैसा कब मांगा है। मुझे पैसे से क्या काम है। मुझे तो अपने सुहाग से काम है। मैं तो अपने स्वामी के दर्शन मांगती हूं। तब माता ने प्रसन्न होकर कहा-जा बेटी, तेरा स्वामी आयेगा। यह सुनकर खुशी से बावली होकर घर में जा काम करने लगी। अब संतोषी मां विचार करने लगी, इस भोली पुत्री को मैंने कह तो दिया कि तेरा पति आयेगा लेकिन कैसे? वह तो इसे स्वप्न में भी याद नहीं करता। उसे याद दिलाने को मुझे ही जाना पड़ेगा। इस तरह माता जी उस बुढ़िया के बेटे के पास जा स्वप्न में प्रकट हो कहने लगी- साहूकार के बेटे, सो रहा है या जागता है। वह कहने लगा- माता सोता भी नहीं, जागता भी नहीं हूं कहो क्या आज्ञा है? मां कहने लगी- तेरे घर-बार कुछ है कि नहीं। वह बोला- मेरे पास सब कुछ है मां-बाप है बहू है क्या कमी है। मां बोली- भोले पुत्र तेरी बहू घोर कष्ट उठा रही है, तेरे मां-बाप उसे परेशानी दे रहे हैं। वह तेरे लिए तरस रही है, तू उसकी सुध ले। वह बोला- हां माता जी यह तो मालूम है, परंतु जाऊं तो कैसे? परदेश की बात है, लेन-देन का कोई हिसाब नहीं, कोई जाने का रास्ता नहीं आता, कैसे चला जाऊं? मां कहने लगी- मेरी बात मान, सवेरे नहा धोकर संतोषी माता का नाम ले, घी का दीपक जला दण्डवत कर दुकान पर जा बैठ।
देखते-देखते सारा लेन-देन चुक जाएगा, जमा का माल बिक जाएगा, सांझ होते-होते धन का भारी ठेर लग जाएगा। अब बूढ़े की बात मानकर वह नहा धोकर संतोषी माता को दण्डवत धी का दीपक जला दुकान पर जा बैठा। थोड़ी देर में देने वाले रुपया लाने लगे, लेने वाले हिसाब लेने लगे। कोठे में भरे सामान के खरीददार नकद दाम दे सौदा करने लगे। शाम तक धन का भारी ठेर लग गया। मन में माता का नाम ले चमत्कार देख प्रसन्न हो घर ले जाने के वास्ते गहना, कपड़ा सामान खरीदने लगा। यहां काम से निपट तुरंत घर को रवाना हुआ।
उधर उसकी पत्नी जंगल में लकड़ी लेने जाती है, लौटते वक्त माताजी के मंदिर में विश्राम करती। वह तो उसके प्रतिदिन रुकने का जो स्थान ठहरा, धूल उड़ती देख वह माता से पूछती है- हे माता, यह धूल कैसे उड़ रही है? माता कहती है- हे पुत्री तेरा पति आ रहा है। अब तू ऐसा कर लकड़ियों के तीन बोझ बना ले, एक नदी के किनारे रख और दूसरा मेरे मंदिर पर व तीसरा अपने सिर पर। तेरे पति को लकड़ियों का गट्ठर देख मोह पैदा होगा, वह यहां रुकेगा, नाश्ता-पानी खाकर मां से मिलने जाएगा, तब तू लकड़ियों का बोझ उठाकर जाना और चौक में गट्ठर डालकर जोर से आवाज लगाना- लो सासूजी, लकडिय़ों का गट्ठर लो, भूसी की रोटी दो, नारियल के खेपड़े में पानी दो, आज मेहमान कौन आया है? माताजी से बहुत अच्छा कहकर वह प्रसन्न मन से लकड़ियों के तीन गट्ठर बनाई। एक नदी के किनारे पर और एक माताजी के मंदिर पर रखा।
इतने में मुसाफिर आ पहुंचा। सूखी लकड़ी देख उसकी इच्छा उत्पन्न हुई कि हम यही पर विश्राम करें और भोजन बनाकर खा-पीकर गांव जाएं। इसी तरह रुक कर भोजन बना, विश्राम करके गांव को गया। सबसे प्रेम से मिला। उसी समय सिर पर लकड़ी का गट्ठर लिए वह उतावली सी आती है। लकड़ियों का भारी बोझ आंगन में डालकर जोर से तीन आवाज देती है- लो सासूजी, लकड़ियों का गट्ठर लो, भूसी की रोटी दो। आज मेहमान कौन आया है। यह सुनकर उसकी सास बाहर आकर अपने दिए हुए कष्टों को भुलाने हेतु कहती है- बहु ऐसा क्यों कहती है? तेरा मालिक ही तो आया है। आ बैठ, मीठा भात खा, भोजन कर, कपड़े-गहने पहिन। उसकी आवाज सुन उसका पति बाहर आता है। अंगूठी देख व्याकुल हो जाता है। मां से पूछता है- मां यह कौन है? मां बोली- बेटा यह तेरी बहु है। जब से तू गया है तब से सारे गांव में भटकती फिरती है। घर का काम-काज कुछ करती नहीं, चार पहर आकर खा जाती है। वह बोला- ठीक है मां मैंने इसे भी देखा और तुम्हें भी, अब दूसरे घर की ताली दो, उसमें रहूंगा। मां बोली- ठीक है, जैसी तेरी मरजी। तब वह दूसरे मकान की तीसरी मंजिल का कमरा खोल सारा सामान जमाया। एक दिन में राजा के महल जैसा ठाट-बाट बन गया। अब क्या था? बहु सुख भोगने लगी। इतने में शुक्रवार आया।
शुक्रवार व्रत के उद्यापन में हुई भूल, किया खटाई का इस्तेमाल
उसने पति से कहा- मुझे संतोषी माता के व्रत का उद्यापन करना है। पति बोला- खुशी से कर लो। वह उद्यापन की तैयारी करने लगी। जिठानी के लड़कों को भोजन के लिए कहने गई। उन्होंने मंजूर किया परन्तु पीछे से जिठानी ने अपने बच्चों को सिखाया, देखो, भोजन के समय खटाई मांगना, जिससे उसका उद्यापन पूरा न हो। लड़के जीमने आए खीर खाना पेट भर खाया, परंतु बाद में खाते ही कहने लगे- हमें खटाई दो, खीर खाना हमको नहीं भाता, देखकर अरुचि होती है। वह कहने लगी- भाई खटाई किसी को नहीं दी जाएगी। यह तो संतोषी माता का प्रसाद है। लड़के उठ खड़े हुए, बोले- पैसा लाओ, भोली बहु कुछ जानती नहीं थी, उन्हें पैसे दे दिए। लड़के उसी समय हठ करके इमली खटाई ले खाने लगे। यह देखकर बहु पर माताजी ने कोप किया। राजा के दूत उसके पति को पकड़ कर ले गए। जेठ जेठानी मन-माने वचन कहने लगे। लूट-लूट कर धन इकट्ठा कर लाया है, अब सब मालूम पड़ जाएगा जब जेल की मार खाएगा। बहु से यह सहन नहीं हुए।
मां संतोषी से मांगी माफी
रोती हुई माताजी के मंदिर गई, कहने लगी- हे माता, तुमने क्या किया, हंसा कर अब भक्तों को रुलाने लगी। माता बोली- बेटी तूने उद्यापन करके मेरा व्रत भंग किया है। वह कहने लगी- माता मैंने कुछ अपराध किया है, मैंने तो भूल से लड़कों को पैसे दे दिए थे, मुझे क्षमा करो। मैं फिर तुम्हारा उद्यापन करूंगी। मां बोली- अब भूल मत करना। वह कहती है- अब भूल नहीं होगी, अब बतलाओ वे कैसे आवेंगे? मां बोली- जा पुत्री तेरा पति तुझे रास्ते में आता मिलेगा। वह निकली, राह में पति आता मिला। वह पूछी- कहां गए थे? वह कहने लगा- इतना धन जो कमाया है उसका टैक्स राजा ने मांगा था, वह भरने गया था। वह प्रसन्न हो बोली- भला हुआ, अब घर को चलो। कुछ दिन बाद फिर शुक्रवार आया
फिर किया व्रत का उद्यापन
वह बोली- मुझे फिर माता का उद्यापन करना है। पति ने कहा- करो। बहु फिर जेठ के लड़कों को भोजन को कहने गई। जेठानी ने एक दो बातें सुनाई और सब लड़कों को सिखाने लगी। तुम सब लोग पहले ही खटाई मांगना। लड़के भोजन से पहले कहने लगे- हमें खीर नहीं खानी, हमारा जी बिगड़ता है, कुछ खटाई खाने को दो। वह बोली- खटाई किसी को नहीं मिलेगी, आना हो तो आओ, वह ब्राह्मण के लड़के लाकर भोजन कराने लगी, यथा शक्ति दक्षिणा की जगह एक-एक फल उन्हें दिया। संतोषी माता प्रसन्न हुई।
संतोषी माता का फल
माता की कृपा होते ही नवमें मास में उसके चन्द्रमा के समान सुन्दर पुत्र प्राप्त हुआ। पुत्र को पाकर प्रतिदिन माता जी के मंदिर को जाने लगी। मां ने सोचा- यह रोज आती है, आज क्यों न इसके घर चलूं। यह विचार कर माता ने भयानक रूप बनाया, गुड़-चने से सना मुख, ऊपर सूंड के समान होठ, उस पर मक्खियां भिन-भिन कर रही थी। देहली पर पैर रखते ही उसकी सास चिल्लाई- देखो रे, कोई चुड़ैल डाकिन चली आ रही है, लड़कों इसे भगाओ, नहीं तो किसी को खा जाएगी। लड़के भगाने लगे, चिल्लाकर खिड़की बंद करने लगे। बहु रौशनदान में से देख रही थी, प्रसन्नता से पगली बन चिल्लाने लगी- आज मेरी माता जी मेरे घर आई है। वह बच्चे को दूध पीने से हटाती है। इतने में सास का क्रोध फट पड़ा। वह बोली- क्या उतावली हुई है? बच्चे को पटक दिया। इतने में मां के प्रताप से लड़के ही लड़के नजर आने लगे। वह बोली- मां मैं जिसका व्रत करती हूं यह संतोषी माता है। सबने माता जी के चरण पकड़ लिए और विनती कर कहने लगे- हे माता, हम मूर्ख हैं, अज्ञानी हैं, तुम्हारे व्रत की विधि हम नहीं जानते, व्रत भंग कर हमने बड़ा अपराध किया है, जग माता आप हमारा अपराध क्षमा करो। इस प्रकार माता प्रसन्न हुई। बहू को प्रसन्न हो जैसा फल दिया, वैसा माता सबको दे, जो पढ़े उसका मनोरथ पूर्ण हो। बोलो संतोषी माता की जय।
Ek Budhiya Thi, Uske Sat Bete The. 6 Kamane Vale The Jabki Ek Nikkma Tha. Budhiya Chhhahon Beton Ki Rasoi Banati, Bhojan Karati Aur Unse Jo Kuchhh Juthan Bachti Vah Satven Ko De Deti. Ek Din Vah Patni Se Bola- Dekho Meri Maa Ko Mujh Par Kitna Prem Hai. Vah Boli- Kyon Nahin, Sabka Jhutha Jo Tumko Khilati Hai. Vah Bola- Aisa Nahin Ho Sakta Hai. Main Jab Tak Ankhon Se N Dekh Lun Man Nahin Sakta. Bahu Hans Kar Boli- Dekh Loge Tab To Manoge.
Kuchhh Din Bad Tyauhar Aya. Ghar Men Sat Prakar Ke Bhojan Aur Churme Ke Laddu Bane. Vah Janchne Ko Sir Dukhne Ka Bahana Kar Patla Vastr Sir Par Odhe Rasoi Ghar Men So Gaya. Vah Kapde Men Se Sab Dekhta Raha. Chhhahon Bhai Bhojan Karne Ae. Usne Dekha, Maa Ne Unke Lie Sundar Asan Bichhha Nana Prakar Ki Rasoi Parosi Aur Agrah Karke Unhen Jamaya. Vah Dekhta Raha. Chhhahon Bhojan Karke Uthe Tab Maa Ne Unki Jhuthi Thaliyon Men Se Ladduon Ke Tukde Uthakar Ek Laddu Banaya. Juthan Saph Kar Budhiya Maa Ne Use Pukara- Beta, Chhhahon Bhai Bhojan Kar Gae Ab Tu Hi Baki Hai, Uth Tu Kab Khaega. Vah Kahne Laga- Maa Mujhe Bhojan Nahin Karna, Main Ab Pardesh Ja Raha Hun. Maa Ne Kaha- Kal Jata Ho To Aj Chala Ja. Vah Bola- Han Aj Hi Ja Raha Hun. Yah Kah Kar Vah Ghar Se Nikal Gaya.
Satven Bete Ka Pardesh Jana
Chalte Samay Patni Ki Yad A Gai. Vah Gaushala Men Kande (Uple) Thap Rahi Thi. Vahan Jakar Bola- Ham Jave Pardesh Avenge Kuchhh Kal, Tum Rahiyo Santosh Se Dharma Apno Pal. Vah Boli- Jao Piya Anand Se Hamaro Soch Hatay, Ram Bharose Ham Rahen Ishwar Tumhen Sahay. Do Nishani Apan Dekh Dharun Men Dhir, Sudhi Mati Hamari Bisariyo Rakhiyo Man Gambhir. Vah Bola- Mere Pas To Kuchhh Nahin, Yah Anguthi Hai So Le Aur Apni Kuchhh Nishani Mujhe De. Vah Boli- Mere Pas Kya Hai, Yah Gobar Bhara Hath Hai. Yah Kah Kar Uski Pith Par Gobar Ke Hath Ki Thap Mar Di. Vah Chal Diya, Chalte-Chalte Dur Desh Pahuncha.
Pardesh Men Naukri
Vahan Ek Sahukar Ki Dukan Thi. Vahan Jakar Kahne Laga- Bhai Mujhe Naukri Par Rakh Lo. Sahukar Ko Jarurat Thi, Bola- Rah Ja. Ladke Ne Puchhha- Tankha Kya Doge. Sahukar Ne Kaha- Kam Dekh Kar Dam Milenge. Sahukar Ki Naukri Mili, Vah Subah 7 Baje Se 10 Baje Tak Naukri Bajane Laga. Kuchhh Dinon Men Dukan Ka Sara Len-Den, Hisab-Kitab, Grahkon Ko Mal Bechna Sara Kam Karne Laga. Sahukar Ke Sat-Ath Naukar The, Ve Sab Chakkar Khane Lage, Yah To Bahut Hoshiyar Ban Gaya. Seth Ne Bhi Kam Dekha Aur Tin Mahine Men Hi Use Adhe Munaphe Ka Hissedar Bana Liya. Vah Kuchhh Varsh Men Hi Nami Seth Ban Gaya Aur Malik Sara Karobar Uspar Chhhodkar Chala Gaya.
Pati Ki Anupasthiti Men Sas Ka Atyachar
Idhar Uski Patni Ko Sas Sasur Du:Kh Dene Lage, Sari Grihasthi Ka Kam Karake Use Lakdi Lene Jangal Men Bhejte. Is Bich Ghar Ke Ate Se Jo Bhusi Niklti Uski Roti Banakar Rakh Di Jati Aur Phute Nariyal Ki Nareli Men Pani. Ek Din Vah Lakdi Lene Ja Rahi Thi, Raste Men Bahut Si Striyan Santoshi Mata Ka Vrat Karti Dikhai Di.
Santoshi Mata Ka Vrat
Vah Vahan Khadi Hokar Katha Sunne Lagi Aur Puchhha- Bahinon Tum Kis Devta Ka Vrat Karti Ho Aur Uske Karne Se Kya Phal Milta Hai. Yadi Tum Is Vrat Ka Vidhan Mujhe Samjha Kar Kahoge To Main Tumhara Bada Ahsan Manungi. Tab Unmen Se Ek Stri Boli- Suno, Yah Santoshi Mata Ka Vrat Hai. Iske Karne Se Nirdhnta, Daridrta Ka Nash Hota Hai Aur Jo Kuchhh Man Men Kamna Ho, Sab Santoshi Mata Ki Kripa Se Puri Hoti Hai. Tab Usne Usse Vrat Ki Vidhi Puchhhi.
Santoshi Mata Vrat Vidhi
Vah Boli- Sava Ane Ka Gud Chana Lena, Ichchhha Ho To Sava Panch Ane Ka Lena Ya Sava Rupae Ka Bhi Sahuliyat Ke Anusar Lana. Bina Pareshani Aur Shraddha V Prem Se Jitna Bhi Ban Pade Savaya Lena. Pratyek Shukrvar Ko Nirahar Rah Kar Katha Sunna, Iske Bich Kram Tute Nahin, Lagatar Niyam Palan Karna, Sunne Vala Koi N Mile To Dhi Ka Deepak Jala Uske Age Ya Jal Ke Patr Ko Samne Rakh Kar Katha Kahna. Jab Kary Siddh N Ho Niyam Ka Palan Karna Aur Kary Siddh Ho Jane Par Vrat Ka Udyapan Karna. Tin Mas Men Mata Phal Pura Karti Hai. Yadi Kisi Ke Grah Khote Bhi Hon, To Bhi Mata Varsh Bhar Men Kary Siddh Karti Hai, Phal Siddh Hone Par Udyapan Karna Chahie Bich Men Nahin. Udyapan Men Adhai Ser Ate Ka Khaja Tatha Isi Pariman Se Khir Tatha Chane Ka Sag Karna. Ath Ladkon Ko Bhojan Karana, Jahan Tak Milen Devar, Jeth, Bhai-Bandhu Ke Hon, N Mile To Rishtedaron Aur Pas-Padosiyon Ko Bulana. Unhen Bhojan Kara Yatha Shakti Dakshina De Mata Ka Niyam Pura Karna. Us Din Ghar Men Khatai N Khana. Yah Sun Budhiya Ke Ladke Ki Bahu Chal Di.
Vrat Ka Pran Karna Aur Maa Santoshi Ka Darshan Dena
Raste Men Lakdi Ke Bojh Ko Bech Diya Aur Un Paison Se Gud-Chana Le Mata Ke Vrat Ki Taiyari Kar Age Chali Aur Samne Mandir Dekhkar Puchhhne Lagi- Yah Mandir Kiska Hai. Sab Kahne Lage Santoshi Mata Ka Mandir Hai, Yah Sunkar Mata Ke Mandir Men Jakar Charnon Men Lotne Lagi. Din Ho Vinti Karne Lagi- Maa Main Nipat Ajnani Hun, Vrat Ke Kuchhh Bhi Niyam Nahin Janti, Main Du:Khi Hun. He Mata Jagat Janni Mera Du:Kh Dur Kar Main Teri Sharan Men Hun. Mata Ko Daya Ai – Ek Shukrvar Bita Ki Dusre Ko Uske Pati Ka Patr Aya Aur Tisre Shukrvar Ko Uska Bheja Hua Paisa A Pahuncha. Yah Dekh Jeth-Jithani Munh Sikodaṉe Lage. Ladke Tane Dene Lage- Kaki Ke Pas Patr Ane Lage, Rupya Ane Laga, Ab To Kaki Ki Khatir Badhegi. Bechari Sarlta Se Kahti- Bhaiya Kagaj Ave Rupya Ave Ham Sab Ke Lie Achchhha Hai. Aisa Kah Kar Ankhon Men Ansu Bharkar Santoshi Mata Ke Mandir Men A Mateshvri Ke Charnon Men Girkar Rone Lagi. Maa Mainne Tumse Paisa Kab Manga Hai. Mujhe Paise Se Kya Kam Hai. Mujhe To Apne Suhag Se Kam Hai. Main To Apne Swami Ke Darshan Mangti Hun. Tab Mata Ne Prasann Hokar Kaha-Ja Beti, Tera Swami Ayega. Yah Sunkar Khushi Se Bavli Hokar Ghar Men Ja Kam Karne Lagi. Ab Santoshi Maa Vichar Karne Lagi, Is Bholi Putri Ko Mainne Kah To Diya Ki Tera Pati Ayega Lekin Kaise? Vah To Ise Svapn Men Bhi Yad Nahin Karta. Use Yad Dilane Ko Mujhe Hi Jana Padega. Is Tarah Mata Ji Us Budhiya Ke Bete Ke Pas Ja Svapn Men Prakat Ho Kahne Lagi- Sahukar Ke Bete, So Raha Hai Ya Jagta Hai. Vah Kahne Laga- Mata Sota Bhi Nahin, Jagta Bhi Nahin Hun Kaho Kya Ajna Hai? Maa Kahne Lagi- Tere Ghar-Bar Kuchhh Hai Ki Nahin. Vah Bola- Mere Pas Sab Kuchhh Hai Maa-Bap Hai Bahu Hai Kya Kami Hai. Maa Boli- Bhole Putr Teri Bahu Ghor Kasht Utha Rahi Hai, Tere Maa-Bap Use Pareshani De Rahe Hain. Vah Tere Lie Taras Rahi Hai, Tu Uski Sudh Le. Vah Bola- Han Mata Ji Yah To Malum Hai, Parantu Jaun To Kaise? Pardesh Ki Bat Hai, Len-Den Ka Koi Hisab Nahin, Koi Jane Ka Rasta Nahin Ata, Kaise Chala Jaun? Maa Kahne Lagi- Meri Bat Man, Savere Naha Dhokar Santoshi Mata Ka Nam Le, Ghi Ka Deepak Jala Dandvat Kar Dukan Par Ja Baith.
Dekhte-Dekhte Sara Len-Den Chuk Jaega, Jama Ka Mal Bik Jaega, Sanjh Hote-Hote Dhan Ka Bhari Ther Lag Jaega. Ab Budhe Ki Bat Mankar Vah Naha Dhokar Santoshi Mata Ko Dandvat Dhi Ka Deepak Jala Dukan Par Ja Baitha. Thodi Der Men Dene Vale Rupya Lane Lage, Lene Vale Hisab Lene Lage. Kothe Men Bhare Saman Ke Khariddar Nakad Dam De Sauda Karne Lage. Sham Tak Dhan Ka Bhari Ther Lag Gaya. Man Men Mata Ka Nam Le Chamatkar Dekh Prasann Ho Ghar Le Jane Ke Vaste Gahna, Kapda Saman Kharidne Laga. Yahan Kam Se Nipat Turant Ghar Ko Ravana Hua.
Udhar Uski Patni Jangal Men Lakdi Lene Jati Hai, Lautte Vakt Mataji Ke Mandir Men Vishram Karti. Vah To Uske Pratidin Rukne Ka Jo Sthan Thahra, Dhul Udti Dekh Vah Mata Se Puchhhti Hai- He Mata, Yah Dhul Kaise Ud Rahi Hai? Mata Kahti Hai- He Putri Tera Pati A Raha Hai. Ab Tu Aisa Kar Lakdiyon Ke Tin Bojh Bana Le, Ek Nadi Ke Kinare Rakh Aur Dusra Mere Mandir Par V Tisra Apne Sir Par. Tere Pati Ko Lakdiyon Ka Gatthar Dekh Moh Paida Hoga, Vah Yahan Rukega, Nashta-Pani Khakar Maa Se Milne Jaega, Tab Tu Lakdiyon Ka Bojh Uthakar Jana Aur Chauk Men Gatthar Dalkar Jor Se Avaj Lagana- Lo Sasuji, Lakdiẏon Ka Gatthar Lo, Bhusi Ki Roti Do, Nariyal Ke Khepde Men Pani Do, Aj Mehman Kaun Aya Hai? Mataji Se Bahut Achchhha Kahkar Vah Prasann Man Se Lakdiyon Ke Tin Gatthar Banai. Ek Nadi Ke Kinare Par Aur Ek Mataji Ke Mandir Par Rakha.
Itne Men Musaphir A Pahuncha. Sukhi Lakdi Dekh Uski Ichchhha Utpann Hui Ki Ham Yahi Par Vishram Karen Aur Bhojan Banakar Kha-Pikar Ganv Jaen. Isi Tarah Ruk Kar Bhojan Bana, Vishram Karke Ganv Ko Gaya. Sabse Prem Se Mila. Usi Samay Sir Par Lakdi Ka Gatthar Lie Vah Utavli Si Ati Hai. Lakdiyon Ka Bhari Bojh Angan Men Dalkar Jor Se Tin Avaj Deti Hai- Lo Sasuji, Lakdiyon Ka Gatthar Lo, Bhusi Ki Roti Do. Aj Mehman Kaun Aya Hai. Yah Sunkar Uski Sas Bahar Akar Apne Die Hue Kashton Ko Bhulane Hetu Kahti Hai- Bahu Aisa Kyon Kahti Hai? Tera Malik Hi To Aya Hai. A Baith, Mitha Bhat Kha, Bhojan Kar, Kapde-Gahne Pahin. Uski Avaj Sun Uska Pati Bahar Ata Hai. Anguthi Dekh Vyakul Ho Jata Hai. Maa Se Puchhhta Hai- Maa Yah Kaun Hai? Maa Boli- Beta Yah Teri Bahu Hai. Jab Se Tu Gaya Hai Tab Se Sare Ganv Men Bhatkti Phirti Hai. Ghar Ka Kam-Kaj Kuchhh Karti Nahin, Char Pahar Akar Kha Jati Hai. Vah Bola- Thik Hai Maa Mainne Ise Bhi Dekha Aur Tumhen Bhi, Ab Dusre Ghar Ki Tali Do, Usmen Rahunga. Maa Boli- Thik Hai, Jaisi Teri Marji. Tab Vah Dusre Makan Ki Tisri Manjil Ka Kamra Khol Sara Saman Jamaya. Ek Din Men Raja Ke Mahal Jaisa That-Bat Ban Gaya. Ab Kya Tha? Bahu Sukh Bhogne Lagi. Itne Men Shukrvar Aya.
Shukrvar Vrat Ke Udyapan Men Hui Bhul, Kiya Khatai Ka Istemal
Usne Pati Se Kaha- Mujhe Santoshi Mata Ke Vrat Ka Udyapan Karna Hai. Pati Bola- Khushi Se Kar Lo. Vah Udyapan Ki Taiyari Karne Lagi. Jithani Ke Ladkon Ko Bhojan Ke Lie Kahne Gai. Unhonne Manjur Kiya Parantu Pichhhe Se Jithani Ne Apne Bachchon Ko Sikhaya, Dekho, Bhojan Ke Samay Khatai Mangna, Jisse Uska Udyapan Pura N Ho. Ladke Jimne Ae Khir Khana Pet Bhar Khaya, Parantu Bad Men Khate Hi Kahne Lage- Hamen Khatai Do, Khir Khana Hamko Nahin Bhata, Dekhkar Aruchi Hoti Hai. Vah Kahne Lagi- Bhai Khatai Kisi Ko Nahin Di Jaegi. Yah To Santoshi Mata Ka Prasad Hai. Ladke Uth Khade Hue, Bole- Paisa Lao, Bholi Bahu Kuchhh Janti Nahin Thi, Unhen Paise De Die. Ladke Usi Samay Hath Karke Imli Khatai Le Khane Lage. Yah Dekhkar Bahu Par Mataji Ne Kop Kiya. Raja Ke Dut Uske Pati Ko Pakad Kar Le Gae. Jeth Jethani Man-Mane Vachan Kahne Lage. Lut-Lut Kar Dhan Ikattha Kar Laya Hai, Ab Sab Malum Pad Jaega Jab Jel Ki Mar Khaega. Bahu Se Yah Sahan Nahin Hue.
Maa Santoshi Se Mangi Maphi
Roti Hui Mataji Ke Mandir Gai, Kahne Lagi- He Mata, Tumne Kya Kiya, Hansa Kar Ab Bhakton Ko Rulane Lagi. Mata Boli- Beti Tune Udyapan Karke Mera Vrat Bhang Kiya Hai. Vah Kahne Lagi- Mata Mainne Kuchhh Apradh Kiya Hai, Mainne To Bhul Se Ladkon Ko Paise De Die The, Mujhe Kshama Karo. Main Phir Tumhara Udyapan Karungi. Maa Boli- Ab Bhul Mat Karna. Vah Kahti Hai- Ab Bhul Nahin Hogi, Ab Batlao Ve Kaise Avenge? Maa Boli- Ja Putri Tera Pati Tujhe Raste Men Ata Milega. Vah Nikli, Rah Men Pati Ata Mila. Vah Puchhhi- Kahan Gae The? Vah Kahne Laga- Itna Dhan Jo Kamaya Hai Uska Taiks Raja Ne Manga Tha, Vah Bharne Gaya Tha. Vah Prasann Ho Boli- Bhala Hua, Ab Ghar Ko Chalo. Kuchhh Din Bad Phir Shukrvar Aya
Phir Kiya Vrat Ka Udyapan
Vah Boli- Mujhe Phir Mata Ka Udyapan Karna Hai. Pati Ne Kaha- Karo. Bahu Phir Jeth Ke Ladkon Ko Bhojan Ko Kahne Gai. Jethani Ne Ek Do Baten Sunai Aur Sab Ladkon Ko Sikhane Lagi. Tum Sab Log Pahle Hi Khatai Mangna. Ladke Bhojan Se Pahle Kahne Lage- Hamen Khir Nahin Khani, Hamara Ji Bigdta Hai, Kuchhh Khatai Khane Ko Do. Vah Boli- Khatai Kisi Ko Nahin Milegi, Ana Ho To Ao, Vah Brahmin Ke Ladke Lakar Bhojan Karane Lagi, Yatha Shakti Dakshina Ki Jagah Ek-Ek Phal Unhen Diya. Santoshi Mata Prasann Hui.
Santoshi Mata Ka Phal
Mata Ki Kripa Hote Hi Navmen Mas Men Uske Chandrma Ke Saman Sundar Putr Prapt Hua. Putr Ko Pakar Pratidin Mata Ji Ke Mandir Ko Jane Lagi. Maa Ne Socha- Yah Roj Ati Hai, Aj Kyon N Iske Ghar Chalun. Yah Vichar Kar Mata Ne Bhayanak Rup Banaya, Gud-Chane Se Sana Mukh, Upar Sund Ke Saman Hoth, Us Par Makkhiyan Bhin-Bhin Kar Rahi Thi. Dehli Par Pair Rakhte Hi Uski Sas Chillai- Dekho Re, Koi Chudail Dakin Chali A Rahi Hai, Ladkon Ise Bhagao, Nahin To Kisi Ko Kha Jaegi. Ladke Bhagane Lage, Chillakar Khidki Band Karne Lage. Bahu Raushndan Men Se Dekh Rahi Thi, Prasannta Se Pagli Ban Chillane Lagi- Aj Meri Mata Ji Mere Ghar Ai Hai. Vah Bachche Ko Dudh Pine Se Hatati Hai. Itne Men Sas Ka Krodh Phat Pada. Vah Boli- Kya Utavli Hui Hai? Bachche Ko Patak Diya. Itne Men Maa Ke Pratap Se Ladke Hi Ladke Najar Ane Lage. Vah Boli- Maa Main Jiska Vrat Karti Hun Yah Santoshi Mata Hai. Sabne Mata Ji Ke Charan Pakad Lie Aur Vinti Kar Kahne Lage- He Mata, Ham Murkh Hain, Ajnani Hain, Tumhare Vrat Ki Vidhi Ham Nahin Jante, Vrat Bhang Kar Hamne Bada Apradh Kiya Hai, Jag Mata Ap Hamara Apradh Kshama Karo. Is Prakar Mata Prasann Hui. Bahu Ko Prasann Ho Jaisa Phal Diya, Vaisa Mata Sabko De, Jo Padhe Uska Manorath Purn Ho. Bolo Santoshi Mata Ki Jai.
We humbly offer this sacred narration, the Friday Vrat Katha of Santoshi Mata, to all devotees. May Maa Santoshi bless us with unwavering faith and grant us the fulfillment of our righteous desires as we immerse ourselves in this divine story.
The Sacred Vrat Katha of Santoshi Mata
There once lived an old woman who had seven sons. Six of them were industrious and earned their livelihood, but the seventh was idle and shiftless. The old woman would cook for the six earning sons, serve them their meals, and whatever leftovers remained, she would give to the seventh son.
One day, he said to his wife, “Look how much love my mother has for me!” His wife replied, “Why wouldn’t she? She feeds you the leftovers from everyone else’s plates!” He protested, “That cannot be! I will not believe it until I see it with my own eyes.” His wife smiled and said, “You will believe it when you see it, won’t you?”
A few days later, a festival arrived. Seven kinds of delicious dishes and Churma Laddus were prepared in the house. To verify the truth, he feigned a headache, covered his head with a thin cloth, and lay down in the kitchen. He watched everything from beneath his cloth. His six brothers came to eat. He saw his mother spread beautiful mats for them, serve various delicacies, and lovingly urge them to eat their fill. He continued to