शरद ऋतु की उजली, ठंडी और चन्द्रमामयी रात को आने वाली यह पूर्णिमा केवल चन्द्र दर्शन का पर्व नहीं, बल्कि संकल्प को पूरा करने का भी दिन है। इसी संकल्प-शक्ति को बताने के लिये एक प्राचीन कथा कही जाती है।
किसी गाँव में एक धनवान साहूकार रहता था। उसके दो बेटियाँ थीं—बड़ी सरल, भक्ति-भाव से भरी और छोटी ज़रा लापरवाह स्वभाव की। दोनों ही शरद पूर्णिमा का व्रत रखती थीं, पर रखने का ढंग बिलकुल अलग था।
बड़ी बहन स्नान, शुद्धि, दीप-प्रज्वलन, चन्द्रोदय की प्रतीक्षा, फिर ठंडे दूध-माखन का नैवेद्य और अन्त में चन्द्रमा को अर्घ्य दे कर ही व्रत खोलती थी। वह यह भी ध्यान रखती कि रात के बीच से पहले व्रत न टूटे—व्रत पूरा हो, तब ही मुख में अन्न जाए।
छोटी बहन भी व्रत तो करती थी, पर बस नाम-मात्र का—कभी बीच में ही खा लेती, कभी चन्द्रमा को अर्घ्य दिये बिना ही व्रत तोड़ देती, कभी नियम का समय बदल देती। उसे लगता था, “बस कहने को व्रत कर लिया, यही काफ़ी है।”
समय बीता, दोनों बहनों का विवाह हुआ। कुछ ही समय में बड़ी बहन के यहाँ स्वस्थ, सुन्दर सन्तान जन्म लेने लगी। उधर छोटी बहन के घर जो भी बच्चा जन्म लेता, क्षण भर में उसकी मृत्यु हो जाती। बार-बार की इस पीड़ा से उसका मन टूट गया।
अन्ततः वह एक तपस्वी संत के पास गयी और रोते हुए बोली—“महाराज! मैंने क्या अपराध किया कि मेरी गोद बार-बार सूनी हो जाती है?”
संत ने धैर्य से कहा—“बेटी! व्रत तभी फल देता है जब वह पूरे नियम, श्रद्धा और समय से किया जाए। तुम व्रत को आधे में तोड़ती रहीं, इसलिए उसका पूरा फल तुम्हें नहीं मिला। शरद पूर्णिमा की रात स्वयं चन्द्रदेव की अनुग्रह-रात्रि होती है, उस दिन यदि नियम से व्रत किया जाए तो आयु, आरोग्य और सन्तान—तीनों की प्राप्ति होती है। इस बार तुम पुरे विधान से व्रत करो, देवानुग्रह अवश्य होगा।”
छोटी बहन को अपनी चूक समझ आ गयी। उसने निश्चय किया—“इस बार मैं व्रत बिल्कुल वैसा ही करूँगी जैसे मेरी दीदी करती है।” शरद पूर्णिमा आयी—उसने भोर से ही संयम रखा, दिनभर जप-ध्यान किया, रात को चन्द्रमा निकलने के बाद अर्घ्य दिया, ठंडी खीर का नैवेद्य चढ़ाया और फिर ही अपना व्रत तोड़ा।
भगवान की कृपा से उसके गर्भ में सन्तान आयी और ठीक समय पर पुत्र जन्मा—पर पुरानी कुटिल कर्मरेखा के कारण जन्मते ही बालक के प्राण निकल गये। वह घबरा गयी, पर उसे एक बात याद थी—“दीदी का व्रत अटूट है, उन पर चन्द्रमा की कृपा अधिक है।”
उसने बच्चा एक छोटी-सी खाट पर सुला दिया, हल्का-सा कपड़ा डाल दिया और अपनी बड़ी बहन को बुला लायी। घर आते ही उसने कहा—“दीदी, ज़रा यहाँ बैठो।” जैसे ही बड़ी बहन का पवित्र, व्रतशील वस्त्र उस शिशु को स्पर्श कर गया, मृत बालक ने रो कर प्राण ले लिए!
बड़ी बहन चौंक पड़ी—“अरे, तुमने इतने छोटे शिशु को यूँ खुले में क्यों रखा था? ज़रा-सी लापरवाही से बच्चा चला भी जा सकता था!”
तभी छोटी बहन ने चरणों में गिरकर सारा प्रसंग कह दिया—“दीदी, यह बच्चा तो पैदा होते ही मर गया था। मुझे बताया गया था कि पूर्णिमा का व्रत अधूरा करने की मेरी पुरानी आदत ही इस दुःख का कारण है। इस बार मैंने पूरा व्रत किया, पर जन्म की रुकावट अभी भी भारी थी। मुझे भरोसा था—आपकी पूर्ण, निष्कपट व्रत-शक्ति के स्पर्श से यह बच्चा जी उठेगा… और वैसा ही हुआ।”
बड़ी बहन ने कहा—“यह मेरी शक्ति नहीं, यह तो शरद पूर्णिमा की रात में चन्द्रदेव का वरदान और पूर्ण व्रत का फल है। व्रत को कभी हल्का नहीं समझना चाहिये।”
उस दिन से यह लोक-मान्यता और भी प्रबल हो गयी कि शरद पूर्णिमा का व्रत यदि श्रद्धा, शुद्धि, सही समय और पूर्ण नियम से किया जाए तो घर की सन्तान-सुख, आरोग्य और सुख-सम्पदा बनी रहती है।
कथा-मर्म: यह कथा सिखाती है कि व्रत, पूजा, जप—इनका फल “किया या नहीं” से नहीं, बल्कि “कैसे किया” से मिलता है। आधा किया व्रत आधा फल देता है, और पूरा भरोसे से किया व्रत मृत समान भाग्य को भी जगा देता है। शरद पूर्णिमा की उजली रात इसी पूर्णता के संकल्प की रात है।


