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सफला एकादशी व्रत कथा

सफला एकादशी व्रत कथा

राजा महिष्मान के पापी पुत्र लुम्पक की कथा

अर्जुन की जिज्ञासा: मोक्षदा एकादशी की महिमा सुनकर अर्जुन ने कहा — “हे कमलनयन माधव! अब कृपा करके पौष मास के कृष्ण पक्ष में आने वाली एकादशी का नाम, उसका देवता, पूजा-विधान और उसका फल भी बताइए।”

श्रीकृष्ण बोले: “हे कुन्तीपुत्र! तुम्हारा प्रश्न अत्यन्त शुभ है, इसलिए मैं विस्तार से कहता हूँ। पौष कृष्ण की यह एकादशी ‘सफला एकादशी’ कहलाती है। इस दिन श्रीमन नारायण की विधिपूर्वक पूजा करनी चाहिए। जैसे नागों में अनन्त, पक्षियों में गरुड़, ग्रहों में सूर्य, यज्ञों में अश्वमेध और देवों में स्वयं विष्णु श्रेष्ठ हैं — वैसे ही समस्त व्रतों में एकादशी सर्वोपरि है। जो इस दिन श्रद्धा से उपवास और रात्रि-जागरण करता है, उसे वैसा फल मिलता है जैसे किसी ने हज़ारों वर्षों तक तपस्या की हो।”

इस एकादशी के दिन नींबू, नारियल, मौसमी फल, नैवेद्य, धूप, दीपादि अर्पित करके भगवान विष्णु की आराधना करनी चाहिए।

राजा महिष्मान और उसका पुत्र लुम्पक

प्राचीन काल में चम्पावती नामक नगरी में महिष्मान नाम का प्रतापी राजा राज्य करता था। उसके चार पुत्र थे। उनमें से ज्येष्ठ पुत्र लुम्पक स्वभाव से ही दुष्ट, उच्छृंखल और महापापी था।

वह पिता के धन को वेश्याओं पर उड़ाता, पर-स्त्री गमन करता, देवता, वैष्णव और ब्राह्मणों की निन्दा करके प्रसन्न होता था। राजकुमार होने के कारण प्रजा चुप थी, पर भीतर से सब अत्यन्त दुखी थे।

एक समय राजा को उसके पाप-कर्मों का भेद खुल गया। राजा महिष्मान अत्यन्त क्रुद्ध हुआ और बोला — “ऐसे दुराचारी को मैं पुत्र नहीं मानता।” उसने लुम्पक को राज्य से निष्कासित कर दिया।

राज्य से निकाले जाते ही सबने उसे छोड़ दिया। असुर-दृष्टि से प्रेरित होकर उसने सोचा — “दिन में तो मैं बाहर जंगल में रहूँगा और रात को पिता के नगर में घुसकर चोरी करूँगा।” वह ऐसा ही करने लगा।

वह दिन में जंगल में रहता, रात को नगर में आकर चोरी, उत्पीड़न, मारपीट और पाप-कर्म करता। जंगल में वह निरपराध पशु-पक्षियों तक को मारकर खा जाता। कभी पकड़ा भी जाता तो राजकुमार समझकर सैनिक उसे छोड़ देते।

भगवान का प्रिय वन: जिस वन में वह रहता था, वहाँ एक प्राचीन पीपल का वृक्ष था। वह स्थान देवताओं का क्रीड़ा-स्थल माना जाता था और स्वयं भगवान को भी प्रिय था। लुम्पक उसी पीपल के नीचे पड़ा रहता था।

अज्ञानपूर्वक हुआ व्रत

समय आया — पौष कृष्ण की दशमी की रात। भीषण ठण्ड थी। लुम्पक के पास ढंग का वस्त्र भी न था। ठण्ड से उसका शरीर अकड़ गया, वह रातभर सो नहीं सका और लगभग मूर्च्छित हो गया।

दूसरा दिन था — वही सफला एकादशी। मध्याह्न तक भी वह मूर्च्छा-ग्रस्त पड़ा रहा। सूर्य की किरणों की तपन से जब उसे कुछ होश आया तो वह वन में खाने के लिए कुछ खोजने लगा, पर उस दिन वह शिकार करने की शक्ति नहीं जुटा पाया।

जितने गिरे हुए फल उसे मिल सके, वे उठा लाया और पीपल की जड़ में बैठ गया। संध्या तक उसे बहुत भूख लगी, पर उसी समय उसके भीतर एक संकोच आया — “जो मैं रोज़ जीवों को मारकर खाता हूँ, आज मुझे केवल फल ही मिले हैं!”

भूख से व्याकुल होने पर भी उसने वे फल स्वयं न खाए, बल्कि पीपल की जड़ में रखकर कह दिया —

“हे देव! हे अज्ञात ईश्वर! ये फल आपको अर्पित हैं, आप ही इन्हें स्वीकार करें।”

उस रात उसे फिर नींद नहीं आयी — वह ठण्ड, पश्चात्ताप और अकेलेपन से रोता रहा। इस प्रकार उससे पूरे दिन का उपवास भी हो गया और रात्रि-जागरण भी — और वह भी सफला एकादशी की रात को!

अज्ञान से, बिना नियम जाने, बिना विधि समझे — परन्तु किसी भीतरी पश्चात्ताप के साथ — किया गया यह उपवास भगवान श्रीहरि को अत्यन्त प्रिय हो गया। उसी क्षण उसके पूर्वकृत भयानक पाप क्षीण होने लगे।

भगवान की कृपा

प्रातः समय एक दिव्य रथ आसमान से उतरा। वह रथ शोभा, ध्वजा, दास-दासियों और दिव्य वस्त्रों से सुसज्जित था। उसी समय आकाशवाणी हुई —

“हे महिष्मान-पुत्र लुम्पक! तेरे द्वारा अनजाने में किए गए सफला एकादशी-व्रत, फल-समर्पण और रात्रि-जागरण से तेरा समस्त पापकर्म नष्ट हो चुका है। अब तू पिता के पास जा, वे तुझे स्वीकार करेंगे, और राज्य भी तुझे ही प्राप्त होगा।”

यह सुनकर लुम्पक रो पड़ा और बोला — “हे प्रभु! आपकी जय हो! मैं सचमुच दुराचारी था, फिर भी आपने कृपा की।” उसने दिव्य वस्त्र धारण किए और पिता के पास गया।

राजा महिष्मान ने जब उसका पश्चात्ताप देखा और उसने पूरी कथा सुनाई कि “कैसे एकादशी के दिन अनजाने में उपवास हो गया और कैसे आकाशवाणी हुई” — तब राजा का हृदय पिघल गया। उन्होंने तत्काल पूरा राज्य उसे सौंप दिया और स्वयं वन में चले गये।

लुम्पक ने फिर शास्त्रानुसार, धर्मपूर्वक राज्य किया, परिवार सहित विष्णुभक्त बन गया, और वृद्ध होने पर राज्य पुत्र को देकर वन में भजन करने चला गया। अन्त में उसने परम पद प्राप्त किया।

फल और उपदेश

श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा: “हे पार्थ! जो पुरुष श्रद्धा और भक्ति से सफला एकादशी का उपवास करते हैं, उनके सभी पाप नष्ट हो जाते हैं और अन्ततः उन्हें मुक्ति प्राप्त होती है। जो इसके माहात्म्य को तुच्छ मानते हैं, उन्हें बुद्धिहीन समझना चाहिए। और जो इसकी कथा का श्रवण या पाठ करते हैं, उन्हें राजसूय यज्ञ के बराबर फल मिलता है।”

कथा-सार

• भगवान की कृपा कारण की अपेक्षा नहीं करती — अज्ञान से किया उपवास भी स्वीकार हो सकता है।
• एक दिन का सच्चा पश्चात्ताप बरसों के पापों को धो सकता है।
• एकादशी का व्रत इतना प्रभावी है कि वह दुराचारी को भी वैकुण्ठ-पात्र बना सकता है।
• जो कुछ हमें मिले — फल, समय, श्वास — यदि हम उसे ईश्वर को अर्पित कर दें, तो वही सफल (सफला) हो जाता है। इसी भाव से इसका नाम ‘सफला एकादशी’ पड़ा है।

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