निःसन्तान राजा सुकेतुमान को पुत्र प्राप्ति की कथा
अर्जुन की प्रार्थना: श्रीकृष्ण के चरणों में प्रणाम करके अर्जुन ने कहा — “हे मधुसूदन! अब पौष मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसका नाम, उसका विधान, और उसका फल बताइए। उस दिन किस देवता की पूजा होती है?”
श्रीकृष्ण बोले: “हे अर्जुन! पौष शुक्ल की एकादशी का नाम ‘पुत्रदा एकादशी’ है। इसका व्रत और पूजन पूर्व में बताई गयी एकादशियों की विधि जैसा ही है, किन्तु इसका विशेष फल है — यह निरसन्तान को योग्य पुत्र देने वाली है। इस दिन भगवान श्रीहरि का पूजन करना चाहिए। संसार में पुत्र के इच्छुक लोगों के लिए इससे बढ़कर व्रत दूसरा नहीं है। इसके प्रभाव से मनुष्य विद्वान, तपस्वी, धनवान और पुण्यात्मा बनता है।”
निःसन्तान राजा सुकेतुमान
प्राचीन समय में भद्रावती नाम की नगरी में सुकेतुमान नाम का धर्मनिष्ठ राजा राज्य करता था। उसकी रानी का नाम शैव्या था। राज्य, वैभव, हाथी-घोड़े, कोष, प्रजा — सब कुछ होते हुए भी राजा के हृदय में एक ही दु:ख था — उसके कोई पुत्र नहीं था।
पुत्र के बिना उसे यह चिन्ता सताती रहती — “मेरे बाद मेरा पिण्ड कौन देगा? मेरे पितर किसके सहारे रहेंगे?” उधर पितरलोक में भी उसके पूर्वज यही सोचकर चिन्तित रहते थे कि “सुकेतुमान के बाद हमें कौन तृप्त करेगा?”
राजा ने अनेक यज्ञ किए, ब्राह्मणों को भोजन कराया, दान दिए — फिर भी पुत्र-प्राप्ति न हुई। बार-बार उसके मन में आता — “यदि मैं इसी प्रकार पुत्र बिना चला गया तो यह जन्म व्यर्थ हो जायेगा।” क्षणभर तो उसके मन में देह-त्याग का विचार भी आया, पर तुरन्त ही उसने सोचा — “आत्महत्या महापाप है,” और वह भाव त्याग दिया।
एक दिन वह घोड़े पर सवार होकर वन की ओर निकल गया। वन की शोभा देखकर उसका मन और अधिक विरक्त हो उठा — हिरण अपने बच्चों के साथ, बंदर अपने झुण्ड के साथ, मयूर अपने परिवार के साथ नृत्य कर रहे थे, हाथी हथिनियों और शावकों के बीच चल रहा था। सब ओर सन्तान-सुख का दृश्य था और वह स्वयं पुत्रहीन!
इसी सोच में डूबे-डूबे दोपहर हो गयी। उसे प्यास भी लगी। वह जल की खोज में आगे बढ़ा। कुछ दूर जाने पर उसने एक सुन्दर सरोवर देखा — उसमें हंस, सारस, कमल-कुमुद सब खिले थे, और उसके चारों ओर अनेक ऋषि-मुनि निवास कर रहे थे। दाहिने अंग का फड़कना उसने शुभ संकेत माना, घोड़े से उतरा और विनय से मुनियों को प्रणाम करने लगा।
ऋषियों ने पूछा: “राजन! तुम किस कारण आये हो? हम तुमसे प्रसन्न हैं, वर माँगो।”
राजा ने हाथ जोड़कर कहा — “भगवंतो! मैं पुत्रहीन हूँ। आप लोग कौन हैं और यहाँ किस निमित्त पधारे हैं?”
ऋषियों ने बताया: “हे राजन! आज पौष शुक्ल एकादशी है — वही जो ‘पुत्रदा’ नाम से प्रसिद्ध है। आज जो पुत्र की कामना से व्रत करता है, उसे अवश्य पुत्र मिलता है। हम सब आगे आने वाले माघ-स्नान के लिए यहाँ एकत्र हुए हैं।”
राजा ने तुरन्त कहा — “यदि आज का यह दिन पुत्र देने वाला है, तो कृपा करके आप मुझे भी पुत्ररत्न का आशीर्वाद दें!”
ऋषियों ने उपदेश दिया: “आज ही का व्रत करो। नियम लेकर भगवान विष्णु की पूजा करो। द्वादशी को विधिपूर्वक पारण करो। श्रीहरि की कृपा से तुम्हें अवश्य पुत्र होगा।”
राजा ने उसी समय संकल्प किया, पुत्रदा एकादशी का उपवास किया, रात्रि में हरिनाम-स्मरण किया, और अगले दिन मुनियों को नमस्कार कर अपने नगर लौट आया।
कुछ समय बाद भगवान की कृपा से रानी शैव्या ने गर्भ धारण किया और नियत समय पर एक तेजस्वी, सुशील, प्रतापी पुत्र को जन्म दिया। बड़ा होकर वह धर्मात्मा, वीर और प्रजापालक राजा बना — उसी की कामना में सुकेतुमान इतना समय जल रहा था।
श्रीकृष्ण का उपदेश
श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा: “हे पाण्डुनन्दन! जो भी पुरुष या स्त्री संतान की कामना से पौष शुक्ल की इस पुत्रदा एकादशी का व्रत करता है, उसके घर सुयोग्य पुत्र का आगमन होता है। इस व्रत का माहात्म्य जो सुनता या सुनाता है, उसे भी शुभ सन्तान और विष्णुधाम की प्राप्ति होती है। इससे बढ़कर पुत्र-प्राप्ति का कोई अन्य उपाय नहीं बताया गया है।”
कथा-सार
• पुत्र का न होना बड़ी विषम स्थिति है, पर उससे भी कठिन है कुपुत्र का होना।
• पुत्रदा एकादशी का व्रत “पुत्र” ही नहीं, “सद्गुणी पुत्र” की कामना का व्रत है।
• व्रत की सफलता की जड़ दो ही हैं — संत-समागम और भगवद्-स्मरण।
• इस कलियुग में शास्त्र-सम्मत व्रतों में यह एकादशी संतान-प्राप्ति के लिए अत्यन्त फलदायिनी कही गयी है।
• जो इसके माहात्म्य को श्रद्धा से पढ़ता-सुनता है, उसे पितृ-ऋण से उऋण होने का मार्ग सहज मिल जाता है।


