कार्तवीर्य द्वारा रावण को बन्दी बनाने की कथा
अर्जुन ने विनम्र होकर पूछा – “हे माधव! अधिक (लौंद) मास की शुक्ल पक्ष की एकादशी का क्या नाम है? इसका व्रत कैसे किया जाता है और इससे क्या फल मिलता है? जो साधारण एकादशी रखता है, उसे तो बहुत फल मिलता है – फिर इस विशेष एकादशी का प्रभाव कितना होगा?”
भगवान श्रीकृष्ण ने कहा – “हे पार्थ! यह जो अधिक मास आता है, वह मेरे लिये बहुत प्रिय होता है। और इस अधिक मास की जो शुक्ल पक्ष की एकादशी है, उसका नाम ‘पद्मिनी एकादशी’ है। यह पापों को भस्म करने वाली, मनोकामना पूरी करने वाली और बड़े-बड़े असम्भव कामों को भी सम्भव करने वाली है। इसका फल कभी व्यर्थ नहीं जाता।”
राजा का दुःख
त्रेतायुग में महिष्मती नगरी का एक तेजस्वी राजा था। धर्मात्मा, दानी, प्रजावत्सल – सब कुछ था उसके पास, पर एक कमी थी – उसका कोई पुत्र नहीं था। अनेक यज्ञ किये, दान दिये, ब्राह्मणों को तृप्त किया, देवताओं की पूजा की – परन्तु पुत्र नहीं हुआ। राजा की रानी का नाम था प्रमदा – वह भी पतिव्रता, धर्मनिष्ठ और तपस्विनी थी।
राजा ने एक दिन रानी से कहा – “देवी! राज्य है, वैभव है, सेना है, पर उत्तराधिकारी नहीं। बिना संतान के यह सब सूना लगता है। अब मैं वन में जाकर तप करूँगा, शायद भगवान वहीं प्रसन्न हों।”
रानी बोली – “हे नाथ! आप जहाँ भी जायेंगे, मैं साथ चलूँगी। बिना आपके मैं एक क्षण भी नहीं रह सकती।”
वन का दीर्घ तप
दोनों पति-पत्नी गन्धमादन पर्वत की ओर चले गये। वहाँ न ठंडी की चिन्ता, न गर्मी की – सिर्फ एक ही चिन्ता – “भगवान कभी प्रसन्न होंगे?” पति घोर तप में लग गये – धूप-बरसात सब सहते रहे। हज़ारों वर्ष बीत गये, देह क्षीण हो गयी, परन्तु अभी भी पुत्र का वरदान नहीं मिला।
उसी जंगल में महान सत्ती देवी अनसूया का आश्रम था – अत्रि मुनि की पत्नि। रानी प्रमदा ने उनके चरण पकड़ लिये और बोली – “मां! हमारे तप को अभी तक फल क्यों नहीं मिला? क्या हमारा प्रयत्न अधूरा है? क्या हमारी विधि ठीक नहीं? कृपा कर मार्ग बताइये।”
देवी अनसूया का उपदेश
अनसूया बोलीं – “पुत्रि! तुम्हारा तप व्यर्थ नहीं है – बस ‘समय’ पूरा नहीं हुआ है। सुनो, हर तीस छत्तीस महीनों में जो अधिक (लौंद) मास आता है, वह भगवान विष्णु का विशेष प्रिय होता है। उसी मास की जो शुक्ल एकादशी है, उसे ‘पद्मिनी एकादशी’ कहते हैं।
इस दिन जो पुरुष या स्त्री नियम, स्नान, संयम, भगवान का पूजन, रात्रि जागरण और दान करते हैं – उनके लिये असम्भव वर भी सम्भव हो जाते हैं। तुम दोनों उसी एकादशी को करो, फिर देखो, श्रीहरि स्वयं वर देने आयेंगे।”
व्रत का आचरण
महासती के वचन सुनकर राजा और रानी दोनों ने उसी अधिक मास की प्रतीक्षा की। जैसे ही वह पद्मिनी एकादशी आयी – उससे एक दिन पहले दशमी को ही उन्होंने नियम लेना शुरू कर दिया –
• कांस के बर्तन का त्याग
• माँस, मसूर, चना, कोदों, शहद और पराये अन्न का त्याग
• भूमि पर शयन और ब्रह्मचर्य का पालन
एकादशी की सुबह दोनों ने शुद्ध जल से स्नान किया, मिट्टी से देह पवित्र की, तीर्थों का स्मरण किया, फिर धान्य के आसन पर भगवान विष्णु की मूर्ति स्थापित की, धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प, तुलसी से पूजा की और पूरा दिन उपवास किया।
रात को उन्होंने भगवान की कथा सुनी, हरि-कीर्तन किया, दीपदान किया और जागरण किया – क्योंकि इस एकादशी का विशेष बल रात्रि-जागरण में ही बताया गया है।
भगवान की प्रसन्नता
उनकी दृढ़ता, संयम और श्रद्धा देखकर भगवान विष्णु अत्यन्त प्रसन्न हो गये। आकाश से देवताओं का संगीत गूंजा, पुष्पवृष्टि हुई और भगवान ने प्रकट होकर कहा – “हे राजन्, हे सती! तुम्हारा व्रत मुझ तक सीधा पहुँचा है। माँगो, क्या चाहते हो?”
राजा ने हाथ जोड़कर कहा – “हे प्रभो! इतना तप इसलिए नहीं किया कि मैं स्वर्ग, धन, ऐश्वर्य या कीर्ति माँग लूँ – मैं ऐसा पुत्र चाहता हूँ जो सब पर विजयी हो, आपका भक्त भी हो और देव, दानव, मानव – किसी से न डरने वाला हो।”
भगवान मुस्कुराये – “तथास्तु। तुम्हारे यहाँ ऐसा ही तेजस्वी पुत्र जन्म लेगा। यह वर तुम्हें किसी सामान्य साधना से नहीं – इसी पद्मिनी एकादशी के कारण मिला है।”
कार्तवीर्य का जन्म और रावण-विजय
समय पर रानी के गर्भ से एक अद्भुत तेज से युक्त पुत्र उत्पन्न हुआ – यही आगे चलकर कार्तवीर्य अर्जुन (सहस्रबाहु) कहलाया। यह वही था, जिसने हज़ार भुजाओं से दिग्विजय किया, जिसने परम पराक्रमी रावण को भी बन्दी बना लिया। देवर्षि नारद ने जब यह लीला देखी तो पूछा – “रावण जैसे मायावी को यह राजा कैसे बाँध सका?” तब महर्षि पुलस्त्य ने वही रहस्य कहा – “यह पद्मिनी एकादशी के व्रत का प्रभाव था।”
कथा का मर्म
यही इस कथा की जान है: कभी-कभी साधन सही होता है, भक्ति भी होती है, नीयत भी साफ होती है – पर “तिथि” भगवान की प्रिय नहीं जुड़ती, इसलिए फल अटका रहता है। जब साधक का प्रयास, सही समय और भगवान की प्रिय तिथि – तीनों मिल जाते हैं, तब “दुर्लभ” भी मिल जाता है। पद्मिनी एकादशी वही तिथि है – जो अटके हुए फल को खींचकर दे देती है।
इसलिये हे अर्जुन – और हे श्रोताओं – जो मन में “यह तो बहुत बड़ा है, यह कैसे मिलेगा?” ऐसा सोचकर बैठ गये हों, वे इस एकादशी को श्रद्धा से करें – यह व्रत आशा को फिर से जगा देता है।
कथा-सार
जो पद्मिनी एकादशी को विधि से करता है, वह –
• पूर्वजन्म के पापों को गलाता है,
• दैव से रूकी हुई मनोकामना को खोलता है,
• दरिद्रता, संतान-दोष, दुर्भाग्य – इन सबको काटता है,
• और अन्त में उसे विष्णुलोक का मार्ग देता है।


