नृसिंह जयंती व्रत विशेष
तिथि व महत्व: नृसिंह जयंती वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाई जाती है। इस दिन भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा और अधर्म के अंत के लिए नृसिंह रूप में अवतार लिया था। यह व्रत भय, रोग, शत्रु व विपत्ति से रक्षा का श्रेष्ठ उपाय माना जाता है।
नृसिंह जयंती व्रत कथा
हिन्दू पंचांग के अनुसार नृसिंह जयंती का व्रत वैशाख माह के शुक्ल पक्ष की चतुर्थी तिथि को मनाया जाता है। अग्नि पुराण और अन्य पुराणों में वर्णित कथाओं के अनुसार, इसी पावन दिवस पर भगवान विष्णु ने अपने भक्त प्रह्लाद की रक्षा के लिए नृसिंह अवतार धारण किया था। यह अवतार इतना विलक्षण और अद्भुत था कि न भगवान मनुष्य रूप में थे और न ही पूर्णत: पशु रूप में—वे आधे सिंह और आधे मनुष्य के स्वरूप में प्रकट हुए। यही कारण है कि यह दिन बड़े ही श्रद्धा, आस्था और हर्षोल्लास के साथ भगवान नृसिंह की जयंती के रूप में मनाया जाता है।
कथा के अनुसार, सत्ययुग में हिरण्यकशिपु नामक राक्षसराज का शासन था। उसके भाई हिरण्याक्ष का वध स्वयं भगवान विष्णु ने वराह अवतार में किया था। इस अपमान और प्रतिशोध की अग्नि में जलते हुए हिरण्यकशिपु ने ब्रह्माजी की कठिन तपस्या की और उनसे ऐसा वरदान प्राप्त किया जिससे उसे न कोई मनुष्य मार सके, न पशु; न दिन में, न रात में; न घर में, न बाहर; न अस्त्र से, न शस्त्र से; और न ही भूमि, जल या आकाश में। यह वरदान पाकर वह अजेय हो गया और उसका अहंकार चरम सीमा तक बढ़ गया। उसने पूरे जगत को अपनी पूजा करने का आदेश दिया और भगवान विष्णु के नाम लेने पर कठोर दंड की व्यवस्था की।
उसी समय उसकी पत्नी कयाधु ने एक पुत्र को जन्म दिया, जिसका नाम प्रह्लाद रखा गया। राक्षस कुल में जन्म लेने के बावजूद प्रह्लाद का हृदय जन्म से ही श्रीहरि की भक्ति में रमा हुआ था। वह हर क्षण ‘श्री विष्णु’ का नाम जपता, भजन गाता और ईश्वर की महिमा सुनाता। प्रह्लाद की इस भक्ति को देखकर हिरण्यकशिपु का क्रोध सातवें आसमान पर पहुंच गया। उसने अपने पुत्र को समझाने, धमकाने और डराने का हर उपाय किया, परन्तु प्रह्लाद अडिग रहा।
क्रोधित होकर हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद को समाप्त करने के अनेक प्रयास किए। कभी उसे हाथियों के पैरों तले कुचलने भेजा, कभी विष पिलाने का प्रयास किया, तो कभी सर्पों के बीच डाल दिया। एक बार अपनी बहन होलिका की सहायता से उसे अग्नि में बैठाया गया। होलिका के पास अग्नि से न जलने का वरदान था, परंतु भगवान की कृपा से प्रह्लाद सुरक्षित बच गया और होलिका जलकर भस्म हो गई।
अंततः एक दिन हिरण्यकशिपु ने प्रह्लाद से क्रोधित होकर पूछा—”तू जिस विष्णु की पूजा करता है, वह कहां है?” प्रह्लाद ने शांत स्वर में उत्तर दिया—”वे सर्वत्र हैं, इस स्तंभ (खम्भे) में भी।” यह सुनकर हिरण्यकशिपु ने क्रोध में आकर स्तंभ पर प्रहार किया, और तभी वहां से तेज गर्जना के साथ भगवान नृसिंह प्रकट हुए—आधे सिंह, आधे मनुष्य के स्वरूप में। उन्होंने संध्या समय (न दिन, न रात), महल के द्वार पर (न घर के अंदर, न बाहर), अपनी जंघा पर बिठाकर (न भूमि, न आकाश) और नखों से (न अस्त्र, न शस्त्र) हिरण्यकशिपु का वध कर दिया।
अपने भक्त की रक्षा कर भगवान नृसिंह ने प्रह्लाद को आशीर्वाद दिया और कहा—”हे वत्स, तेरा नाम युगों-युगों तक भक्तिरस के प्रतीक के रूप में लिया जाएगा।”
मान्यता है कि इस दिन जो भी भक्त श्रद्धा और पूर्ण आस्था के साथ व्रत रखकर भगवान नृसिंह का पूजन करता है, वह जन्म-जन्मांतर के पापों से मुक्त होकर मोक्ष और प्रभु के परमधाम को प्राप्त करता है। नृसिंह जयंती व्रत का पुण्य हर प्रकार की भय, रोग और विपत्ति से रक्षा करता है।
व्रत विधि
- व्रत वाले दिन प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें और स्वच्छ वस्त्र धारण करें।
- व्रत का संकल्प लें—”मैं आज भगवान नृसिंह की कृपा प्राप्त करने के लिए निर्जल/फलाहार व्रत करूंगा।”
- पूर्व दिशा की ओर मुख करके नृसिंह भगवान की मूर्ति या चित्र को पीले वस्त्र पर स्थापित करें।
- मूर्ति के सामने कलश स्थापना करें, उस पर नारियल व आम के पत्ते रखें।
- पंचोपचार या षोडशोपचार से पूजन करें—गंध, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
- नृसिंह कवच, विष्णु सहस्रनाम या नृसिंह स्तोत्र का पाठ करें।
- विशेष नैवेद्य में गेहूं का हलवा, पंचामृत और भीगे चने अर्पित करें।
- रात्रि को व्रत जागरण करें, श्रीहरि के भजन-कीर्तन करें।
- अगले दिन प्रातः ब्राह्मणों को दान व दक्षिणा देकर व्रत का पारण करें।
नृसिंह मंत्र
उग्रं वीरं महाविष्णुं ज्वलन्तं सर्वतोमुखम्।
नृसिंहं भीषणं भद्रं मृत्युर्मृत्युं नमाम्यहम् ॥
व्रत का फल
शास्त्रों के अनुसार जो भक्त इस दिन व्रत रखकर भगवान नृसिंह की पूजा करता है, वह समस्त पापों से मुक्त होकर भय, रोग, शत्रु और विपत्ति से मुक्त होता है और अंत में विष्णुलोक की प्राप्ति करता है।


