नाग पंचमी सनातन परंपरा का एक महत्वपूर्ण पर्व है, जिसमें नाग देवताओं की श्रद्धापूर्वक पूजा की जाती है। यह पर्व सामान्यतः श्रावण मास के शुक्ल पक्ष की पंचमी तिथि को मनाया जाता है। इस दिन नाग देवताओं के पूजन के साथ भगवान शिव की आराधना की भी परंपरा है।
नाग पंचमी से जुड़ी अनेक क्षेत्रीय कथाएँ और मान्यताएँ प्रचलित हैं। इनमें किसान और नागिन की कथा विशेष रूप से उत्तर भारत में नाग पंचमी की व्रत कथा के रूप में सुनाई जाती है।
महत्वपूर्ण: किसान और नागिन की कथा लोक-परंपरा में प्रचलित व्रत-कथा है। इसे किसी एक पुराण की मूल कथा बताना उचित नहीं है। नागों से संबंधित शास्त्रीय आख्यानों में महाभारत का राजा जनमेजय का सर्पसत्र और आस्तीक मुनि का प्रसंग विशेष रूप से महत्वपूर्ण है।
नाग पंचमी की प्रचलित व्रत कथा
प्राचीन समय की बात है। एक किसान अपने परिवार के साथ रहता था। वह खेती करके अपने परिवार का पालन-पोषण करता था।
एक दिन किसान अपने खेत में हल चला रहा था। खेत की मिट्टी के भीतर नागिन के छोटे-छोटे बच्चे थे। किसान को इसका ज्ञान नहीं था। हल चलाते समय अनजाने में हल की नोक से नागिन के बच्चों की मृत्यु हो गई।
किसान को यह भी पता नहीं चला कि उससे अनजाने में कितना बड़ा अनर्थ हो गया है।
कुछ समय बाद जब नागिन अपने स्थान पर लौटी, तो उसने अपने बच्चों को मृत पाया। अपने बच्चों की मृत्यु देखकर वह अत्यंत दुःखी और क्रोधित हुई।
क्रोध और प्रतिशोध की भावना से नागिन किसान के घर पहुँची। लोककथा के अनुसार उसने किसान और उसके परिवार के सदस्यों को डस लिया।
किसान की एक पुत्री उस समय वहाँ उपस्थित नहीं थी। जब नागिन को उसके विषय में पता चला, तो वह उसे भी डसने के उद्देश्य से उसके पास पहुँची।
लेकिन जब किसान की पुत्री ने नागिन को देखा, तो उसने उसके प्रति हिंसा नहीं की। उसने श्रद्धापूर्वक नागिन का स्वागत किया, उसके सामने दूध रखा और उसकी पूजा की।
कन्या ने विनम्रतापूर्वक क्षमा माँगी और कहा कि उसके पिता से नाग-शिशुओं की मृत्यु जानबूझकर नहीं हुई थी।
उस कन्या की श्रद्धा, करुणा और सरलता देखकर नागिन का क्रोध शांत होने लगा।
नागिन उससे प्रसन्न हुई और बोली—
“पुत्री! मैं तुम्हारी श्रद्धा से प्रसन्न हूँ। तुम जो वर चाहो, माँग लो।”
कन्या ने अपने लिए धन, वैभव या सुख नहीं माँगा। उसने अपने परिवार के जीवन की प्रार्थना की।
उसने नागिन से कहा—
“यदि आप मुझसे प्रसन्न हैं, तो मेरे माता-पिता और परिवार पर कृपा कीजिए और उन्हें जीवनदान दीजिए।”
कन्या की निःस्वार्थ भावना से नागिन अत्यंत प्रसन्न हुई। लोक-परंपरा में वर्णित कथा के अनुसार नागिन की कृपा से किसान और उसके परिवार को पुनः जीवन प्राप्त हुआ।
इसके बाद कन्या ने नाग देवता के प्रति श्रद्धा व्यक्त की और परिवार ने भविष्य में नागों तथा अन्य जीवों को अनावश्यक हानि न पहुँचाने का संकल्प लिया।
इस कथा के माध्यम से नाग पंचमी पर जीवों के प्रति करुणा, अहिंसा, क्षमा और प्रकृति के प्रति सम्मान की भावना स्मरण की जाती है।
नाग पंचमी का पौराणिक महत्व
नाग पंचमी की धार्मिक परंपरा को केवल किसान और नागिन की लोककथा तक सीमित करके नहीं देखना चाहिए। सनातन ग्रंथों में नागों का उल्लेख अनेक महत्वपूर्ण प्रसंगों में मिलता है।
शेषनाग, वासुकि, तक्षक और कर्कोटक आदि नागों का विभिन्न धार्मिक ग्रंथों में वर्णन मिलता है।
भगवान विष्णु का शेषनाग पर शयन, समुद्र-मंथन में वासुकि नाग की महत्वपूर्ण भूमिका तथा भगवान शिव के कंठ में नाग का होना—ये सभी नागों के विशिष्ट धार्मिक महत्व को दर्शाते हैं।
राजा जनमेजय का सर्पसत्र और आस्तीक मुनि
महाभारत में नागों से संबंधित एक अत्यंत महत्वपूर्ण कथा राजा जनमेजय के सर्पसत्र की है।
राजा जनमेजय के पिता राजा परीक्षित की मृत्यु तक्षक नाग के दंश से हुई थी। पिता की मृत्यु से दुःखी और क्रोधित होकर जनमेजय ने नागों का विनाश करने के उद्देश्य से एक विशाल सर्पसत्र अर्थात सर्प-यज्ञ आरंभ कराया।
यज्ञ में मंत्रों के प्रभाव से अनेक नाग अग्नि की ओर खिंचे चले आने लगे और उसमें गिरने लगे। स्थिति ऐसी हो गई कि नागवंश पर बड़ा संकट उत्पन्न हो गया।
तभी आस्तीक मुनि यज्ञस्थल पर पहुँचे। आस्तीक मुनि अत्यंत विद्वान और धर्मज्ञ थे। उन्होंने राजा जनमेजय को प्रसन्न किया। राजा ने उनसे वर माँगने के लिए कहा।
आस्तीक मुनि ने वर के रूप में सर्पसत्र को रोक देने की प्रार्थना की।
राजा जनमेजय ने अपने वचन का सम्मान किया और यज्ञ रोक दिया। इस प्रकार आस्तीक मुनि के कारण नागों का व्यापक विनाश रुक गया।
यह प्रसंग महाभारत के आदि पर्व में विस्तार से मिलता है और नाग-परंपरा से संबंधित महत्वपूर्ण शास्त्रीय आख्यानों में से एक है।
भगवान शिव और नाग
नागों का भगवान शिव के स्वरूप से भी गहरा संबंध है। भगवान शिव को अनेक चित्रों और विग्रहों में कंठ में नाग धारण किए हुए दर्शाया जाता है।
भगवान शिव का नाग-भूषण स्वरूप निर्भयता, वैराग्य और मृत्यु के भय से परे स्थित शिव-तत्त्व का स्मरण कराता है।
इसी कारण नाग पंचमी के अवसर पर अनेक शिवभक्त भगवान शिव की पूजा और शिवलिंग का अभिषेक भी करते हैं।
भगवान विष्णु और शेषनाग
भगवान विष्णु का स्वरूप भी नाग-परंपरा से गहराई से जुड़ा हुआ है। भगवान विष्णु को अनन्त शेष पर शयन करते हुए दर्शाया जाता है।
शेषनाग को सनातन परंपरा में अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान प्राप्त है। इससे स्पष्ट होता है कि नाग केवल भय के प्रतीक नहीं हैं, बल्कि अनेक धार्मिक आख्यानों में दिव्य स्वरूपों से जुड़े हुए हैं।
समुद्र-मंथन और वासुकि नाग
समुद्र-मंथन के प्रसिद्ध पौराणिक प्रसंग में वासुकि नाग की महत्वपूर्ण भूमिका थी।
देवताओं और असुरों ने मन्दराचल पर्वत को मथानी बनाया और वासुकि नाग को रस्सी के रूप में प्रयोग करके क्षीरसागर का मंथन किया। यह प्रसंग भी सनातन परंपरा में नागों के विशिष्ट स्थान को दर्शाता है।
नाग पंचमी हमें क्या सिखाती है?
नाग पंचमी को केवल नागों के भय से उनकी पूजा करने का पर्व नहीं समझना चाहिए। इस पर्व से जुड़े धार्मिक और लोक-परंपरागत प्रसंग हमें याद दिलाते हैं कि मनुष्य प्रकृति से अलग नहीं है।
किसान और नागिन की कथा में अनजाने में हुई हिंसा, प्रतिशोध, करुणा और अंततः क्षमा का भाव मिलता है।
वहीं आस्तीक मुनि का प्रसंग यह संदेश देता है कि प्रतिशोध की भावना में सम्पूर्ण समुदाय का विनाश धर्मसम्मत समाधान नहीं है।
इसलिए नाग पंचमी के अवसर पर नाग देवताओं के प्रति श्रद्धा के साथ-साथ जीव-दया, अहिंसा, संयम और प्रकृति के प्रति सम्मान का भाव रखना इस पर्व की भावना के अनुरूप है।
नाग पंचमी पर किन नाग देवताओं का स्मरण किया जाता है?
नाग-पूजन की विभिन्न परंपराओं में अनेक नागों के नाम मिलते हैं। प्रचलित रूप से अनन्त, वासुकि, शेष, पद्म, कम्बल, कर्कोटक, अश्वतर, धृतराष्ट्र, शंखपाल, कालिय और तक्षक आदि नागों का स्मरण किया जाता है।
अलग-अलग ग्रंथों और पूजा-पद्धतियों में नागों की सूची में कुछ भिन्नता मिल सकती है।
नाग पंचमी पूजा का सरल भाव
नाग पंचमी के दिन श्रद्धालु प्रातः स्नान करके भगवान शिव और नाग देवताओं का स्मरण करते हैं। स्थानीय परंपरा और कुलाचार के अनुसार नाग देवता का चित्र अथवा प्रतीक बनाकर पूजन किया जाता है।
पूजा में पुष्प, अक्षत और गंध आदि अर्पित किए जा सकते हैं तथा नाग देवताओं से परिवार की रक्षा और कल्याण की प्रार्थना की जाती है।
जीवित साँप को पकड़ना, परेशान करना अथवा जबरन दूध पिलाना धार्मिक आवश्यकता नहीं है। साँप स्वाभाविक रूप से दूध पर निर्भर जीव नहीं हैं। नागों के प्रति वास्तविक श्रद्धा उनके प्राकृतिक जीवन और सुरक्षा का सम्मान करने में भी है।
नाग पंचमी व्रत कथा का संदेश
नाग पंचमी की प्रचलित कथा का मूल भाव केवल चमत्कार में नहीं, बल्कि उसके संदेश में है।
- अहिंसा रखें।
- जीवों के प्रति करुणा रखें।
- प्रकृति का सम्मान करें।
- क्रोध के स्थान पर क्षमा को स्थान दें।
- ईश्वर की सृष्टि के प्रत्येक जीव के अस्तित्व का सम्मान करें।
नाग देवताओं को श्रद्धापूर्वक नमन।
ॐ नमः शिवाय
नाग देवताभ्यो नमः


