राजा वैखानस एवं पर्वत ऋषि की कथा
अर्जुन की जिज्ञासा: उत्पन्ना एकादशी की उत्पत्ति, महिमा और माहात्म्य सुनकर अर्जुन भाव-विह्वल हो गये और बोले— “हे त्रिभुवननाथ श्रीकृष्ण! आप सबका कल्याण करने वाले हैं, मैं आपको प्रणाम करता हूँ। अब मेरी एक और जिज्ञासा है — कृपा करके मार्गशीर्ष माह के शुक्ल पक्ष में आने वाली एकादशी का नाम, उसका देवता, उसकी विधि और उसका फल भी बता दीजिए।”
श्रीकृष्ण बोले: “हे पार्थ! यह प्रश्न तुम्हारा अत्यन्त उत्तम है, इसलिए लोक में तुम्हारा यश फैलेगा। मार्गशीर्ष शुक्ल की यह एकादशी अनगिनत पापों को नष्ट करने वाली है और इसे ही ‘मोक्षदा एकादशी’ के नाम से जाना जाता है। इस दिन भक्तिभाव से श्रीदामोदर (श्रीविष्णु) का धूप, दीप, नैवेद्य, पुष्प आदि से पूजन करना चाहिए। इस एकादशी के व्रत के पुण्य से नरक में पड़े माता, पिता या पितृजन भी स्वर्ग और विष्णुधाम को प्राप्त हो जाते हैं।”
राजा वैखानस की व्यथा
प्राचीन काल में एक नगर का अधिपति वैखानस नाम का राजा था। उसका राज्य सुशील ब्राह्मणों, वेद-पाठी ऋषियों और धर्मप्रिय प्रजा से युक्त था। राजा स्वयं भी प्रजाजनों का पुत्रवत् पालन करता था।
एक रात राजा ने स्वप्न में देखा कि उसके पिता नरक की यातनाएँ सह रहे हैं। वे रोते हुए राजा से कह रहे हैं— “हे पुत्र! मैं बड़े कठोर नरक में हूँ, तुम मुझे यहाँ से मुक्त करो!” यह दृश्य देखकर राजा का हृदय दहक उठा।
भोर होते ही उसने सभा में ब्राह्मणों को बुलाया और कहा—
“हे द्विजो! मैंने आज रात्रि अपने पिता को घोर यातना में देखा। वे मुझसे मुक्ति की प्रार्थना कर रहे थे। अब मुझे राज्य, धन, हाथी-घोड़े, रानियाँ, मनोरंजन—कुछ भी अच्छा नहीं लग रहा। यदि पिता नरक भोग रहा हो और पुत्र सुख से रहे, तो वह सुख नहीं पाप है। आप लोग मुझे कोई ऐसा व्रत, दान या तप बताइए जिससे मेरा पिता मुक्त हो सके। यदि मैंने उसका प्रायश्चित न कराया तो मेरा जीवन व्यर्थ है।”
ब्राह्मणों ने आपस में विचार किया और बोले— “हे राजन! यहाँ से अधिक दूर नहीं पर्वत नाम के एक महर्षि रहते हैं। वे भूत, भविष्य और वर्तमान के ज्ञाता हैं। आप उनके पास जाइए, वे ही उचित मार्ग बताएँगे।”
राजा की भेंट पर्वत मुनि से
राजा वैखानस जंगल के भीतर स्थित मुनि-पर्णकुटी में पहुँचे। वहाँ अनेक योगी तप कर रहे थे। बीच में पर्वत मुनि वैदिक तेज से ऐसे दीख रहे थे मानो द्वितीय ब्रह्मा हों। राजा ने दण्डवत् प्रणाम किया। मुनि ने आशीर्वाद देकर कुशल पूछी। तब राजा ने कहा—
“हे मुनिवर! मेरे राज्य में सब कुशल है, परन्तु आज रात के स्वप्न ने मुझे भीतर से व्याकुल कर दिया है,” और उन्होंने अपने पिता के नरक-भोग का प्रसंग ज्यों का त्यों कह सुनाया।
पर्वत मुनि ने नेत्र मूँदकर योगबल से विचार किया और बोले— “राजन! तुम्हारे पिता ने अपने पूर्व जन्म में पत्नी-भेद किया था। बड़ी रानी के कहने में आकर उन्होंने दूसरी पत्नी को उचित समय (ऋतु) में सन्तान हेतु अधिकार नहीं दिया। यह धर्म-विरुद्ध आचरण था, उसी के कारण वे नरक में गिरे हैं।”
राजा ने नम्र स्वर में कहा— “हे तपोनिधे! अब आप ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरा पिता छूट जाए।”
मोक्षदा एकादशी का उपाय
मुनि ने कहा: “हे राजन! मार्गशीर्ष मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, वही मोक्षदा एकादशी है। इसका व्रत मुक्ति देने वाला है। तुम इस एकादशी को स्वयं नियमपूर्वक करो और फिर उस व्रत का जो भी पुण्य हो, उसका संकल्प अपने पिता के नाम से कर देना। उस पुण्य की शक्ति से तुम्हारे पिता अवश्य नरक से छूट जाएँगे।”
राजा वैखानस वापस लौटा, परिवार सहित इस एकादशी का व्रत किया, रात्रि-जागरण, पूजन, दान सब विधि से किया और द्वादशी को उस संचित पुण्य को पिता को अर्पित कर दिया।
तुरन्त ही उसके पिता नरक-यातना से मुक्त होकर दिव्य रूप में प्रकट हुए और स्वर्ग को जाते हुए बोले— “हे पुत्र! तेरा कल्याण हो, तूने पुत्रधर्म पूर्ण किया।” यह कहकर वे देवलोक को चले गये।
श्रीकृष्ण का उपदेश
श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा: “हे पाण्डुपुत्र! जो लोग मार्गशीर्ष शुक्ल की इस मोक्षदा एकादशी का व्रत करते हैं, उनके अपने पाप तो नष्ट होते ही हैं, साथ ही वे अपने पितरों को भी उठा सकते हैं। यह उपवास चिन्तामणि के समान है — जो इच्छा करो, वह सिद्ध होती है। मोक्ष चाहने वालों के लिए इससे बढ़कर दूसरा उपाय नहीं। पुत्रधर्म का इससे श्रेष्ठ उदाहरण भी नहीं कि उसने अपने पुण्य का फल पिता को अर्पित कर दिया।”
कथा-सार
यह कथा यह सिखाती है कि —
• एकादशी का पुण्य स्थान-विशेष, तीर्थ-विशेष से भी ऊपर है।
• व्रत का फल अर्पण किया जा सकता है — पिता, माता, गुरु, मित्र, या किसी दुखी-रोगी के लिए।
• पुत्र का सच्चा धर्म केवल देह-पालन नहीं, आत्मिक उद्धार का प्रयत्न भी है।
• “मोक्षदा” नाम इसलिए पड़ा कि यह स्वयं मुक्ति प्रदान करने वाली है।
• जो इस व्रत की कथा को श्रद्धा से सुनता-सुनाता है, उसे भी अनन्त फल मिलता है।


