ललित-ललिता नामक गन्धर्व दम्पति एवं राजा पुण्डरीक की कथा
तिथि व महिमा: चैत्र मास के शुक्ल पक्ष की जो एकादशी आती है, उसे कामदा एकादशी कहा जाता है। “कामदा” अर्थात जो कामना-जन्य दोषों को भी हर ले और मन की सच्ची अभिलाषा को पूर्ण कर दे। यह व्रत विशेष रूप से पाप-क्षालन, निकृष्ट/निम्न योनि से मुक्ति और संतान-सौभाग्य देने वाला माना गया है। जैसे अग्नि लकड़ी को क्षण में भस्म कर देती है, वैसे ही इस एकादशी का पुण्य पुराने से पुराने पापों को जलाकर राख कर देता है।
राजा दिलीप का प्रश्न, वशिष्ठजी का उत्तर
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा — “हे पार्थ! कभी राजा दिलीप ने भी अपने गुरु वशिष्ठजी से पूछा था — ‘हे गुरुदेव! चैत्र शुक्ल की एकादशी का नाम क्या है, किस देवता की आराधना होती है और इसका फल क्या है?’ तब वशिष्ठजी ने जो कहा था, वही मैं तुम्हें सुना रहा हूँ।”
वशिष्ठजी ने कहा — “हे राजन! उस पवित्र तिथि का नाम है कामदा एकादशी। यह हर प्रकार के अपराध, यहाँ तक कि श्राप-जनित दोषों को भी काटने की सामर्थ्य रखती है। जिसने यह व्रत आदर से कर लिया, वह नरक-समान अवस्थाओं से ऊपर उठ सकता है।”
भागीपुर की देव-सदृश सभा
प्राचीन काल में भागीपुर नाम की एक समृद्ध नगरी थी। उस पर राजा पुण्डरीक राज्य करते थे। उनका दरबार देवसभा जैसा था — गन्धर्व, किन्नर, अप्सराएँ, उच्च कोटि के वादक-गायक सबका वहाँ आवागमन था।
इसी शहर में एक अत्यंत रूपवान और संगीत-निपुण गन्धर्व दम्पति रहते थे — ललित और उसकी पत्नी ललिता। दोनों का प्रेम इतना गाढ़ा था कि एक पल का भी विरह उन्हें असह्य था। गान भी साथ, विहार भी साथ, यात्रा भी साथ — उनके लिए एक-दूसरे के बिना कुछ भी शोभा नहीं देता था।
राजा के दरबार में भूल
एक दिन राजा पुण्डरीक ने विशाल संगीत-सभा रखी। सभी गन्धर्व अपने-अपने वाद्य के साथ उपस्थित हुए। उसी सभा में ललित को भी गाना था, पर उस समय ललिता किसी कारण से वहाँ नहीं थी।
ललित गाने लगा, पर बीच गान में ही उसका मन पत्नी की ओर चला गया। सुर थोड़े ढीले पड़े, लय हल्की बिगड़ गई। सभा में बैठे नागराज कर्कोटक ने यह असावधानी देख ली और राजा से कह दिया — “राजन! यह गन्धर्व सभा में न होकर स्त्री-स्मरण में खोया है!”
राजा को यह बड़ा अनादर लगा। उन्होंने क्रोध में कह दिया — “हे मूढ़! राजसभा में भी जो स्त्री-चिन्तन में डूबा रहे, वह गन्धर्व कहलाने योग्य नहीं। अभी इसी क्षण तू राक्षस-योनि में जा!”
राजकीय वचन गिरते ही ललित का दिव्य रूप छिन गया। उसका मुख विकट हो गया, दाँत बाहर आ गए, नेत्र अंगार-से दीखने लगे, भुजाएँ योजन-योजन लम्बी, देह विराट और भीषण — वह एक भयंकर दैत्य बन चुका था।
पत्नी ललिता का विलाप
अपने सुहाग को इस दशा में देखकर ललिता का हृदय फटने लगा। वह सोचने लगी — “न जाने एक क्षण की चूक ने कितनी बड़ी विपत्ति ला दी! अब इसे इसके मूल रूप में कौन लाएगा?”
ललिता ने अपने पति को छोड़ा नहीं। वह जहाँ-जहाँ वह दैत्यरूप ललित जंगलों में भटकता, हिंसा करता, पाप करता — यह पतिव्रता पत्नी पीछे-पीछे रोती हुई जाती। वह जानती थी: पाप तो हो ही रहा है, पर यह मूल रूप से पापी नहीं — यह तो श्राप के कारण ऐसा हुआ है।
ऋषि श्रृंगी का सान्निध्य
एक दिन वह अपने राक्षस-पति के पीछे-पीछे चलते-चले विन्ध्याचल पर्वत के पास पहुँची। वहाँ एक दिव्य आश्रम था — महर्षि श्रृंगी का। आश्रम में वेद-पाठ की ध्वनि थी, शान्ति थी, तप की गम्भीरता थी।
ललिता ने दण्डवत् किया और रुद्ध कण्ठ से बोली — “हे मुनिश्रेष्ठ! मैं गन्धर्व कुल की कन्या ललिता हूँ। मेरे पति ललित को राजा के श्राप से राक्षस-देह मिल गई है। पति का यह दुर्गति-दर्शन मुझसे सहा नहीं जाता। आप किसी प्रकार का ऐसा उपाय बताइए जिससे मेरे पति को फिर से दिव्य देह मिल सके।”
कामदा एकादशी का उपाय
महर्षि श्रृंगी ने करुणा से कहा — “हे सुभगे! तुम्हारा प्रश्न सत्प्रश्न है, क्योंकि तुम अपने लिए नहीं, अपने पति के उद्धार के लिए आई हो। सुनो — चैत्र शुक्ल की जो एकादशी है, उसका नाम है कामदा एकादशी। यह व्रत विशेष रूप से ‘श्राप-निवारक’ माना गया है।
इस दिन प्रातः स्नान कर श्रीहरि का पूजन करना, दिनभर उपवास रखना, रात्रि को यथाशक्ति हरि-कीर्तन करना और द्वादशी को ब्राह्मणों को तर्पण-दान देकर अपने व्रत का फल पति को अर्पित कर देना — तब इस व्रत का चमत्कार दिखेगा। जिस पर यह फल चढ़ा दिया जाए, उसके पाप और उसकी विकट योनि दोनों शिथिल हो जाती हैं।”
पतिव्रता की शक्ति
ललिता ने जैसे ऋषि ने कहा था, वैसा ही किया। एकादशी को भाव से व्रत, हरि-पूजन, नियम, जप — सब किया। द्वादशी को उसने हाथ उठाकर कहा —
“हे विष्णु! जो कुछ मैं कर पाई हूँ, वह सब मेरे पतिदेव को लग जाए। मैं चाहे अल्प-सामर्थ्य की हूँ, पर मेरी निष्ठा पूर्ण है — कृपा कर उनके राक्षस-रूप का बन्धन काट दीजिए।”
पतिव्रता का यह संकल्प स्वीकार हुआ। उसी क्षण वह भयंकर दैत्यरूप गिर पड़ा — जैसे किसी ने जर्जर आवरण उतार फेंका हो — और वहाँ फिर से वही मनोहर, गन्धर्व-तुल्य ललित खड़ा था: तेज से भरा, आभूषणों से विभूषित, पहले जैसा सुकोमल।
पति को पहले जैसा पाकर ललिता की आँखों से आँसुओं की धारा बह निकली। दोनों ने मुनि को प्रणाम किया। मुनि ने आशीर्वाद दिया — “तुम दोनों यह जीवन भी हरि-भक्ति में बिताओगे और देह त्याग कर दिव्य विमान से विष्णुलोक जाओगे।”
श्रीकृष्ण का निष्कर्ष
भगवान श्रीकृष्ण ने अर्जुन से कहा — “हे धनंजय! यह है कामदा एकादशी का माहात्म्य। यह केवल अपने करने वाले का ही नहीं, जिसके लिए की जाए उसका भी कल्याण करती है। इसीलिए इसे कामना-पूर्ति और पाप-नाश — दोनों का संगम कहा गया है। ब्रह्महत्या-जैसे पाप, या श्राप के कारण मिली निकृष्ट योनि — इनसे भी मुक्त कराने की शक्ति इस व्रत में बताई गई है।
कथा-सार
• सभा, कर्तव्य और सेवा के समय मन को भटकने देना अनर्थ का कारण बन सकता है — जैसे ललित के साथ हुआ।
• परन्तु दैवी नियम यह भी है कि यदि कोई अपने प्रिय के लिए, निष्काम भाव से, नियमपूर्ण व्रत कर ले — तो दूसरों के दोष भी हल्के हो सकते हैं।
• कामदा एकादशी यह सिखाती है कि श्राप स्थायी नहीं, यदि प्रायश्चित सच्चा हो।
• जो इस कथा को श्रद्धा से पढ़े या सुनाए, उसे भी पुण्य एकादशी-व्रत के तुल्य कहा गया है।


