स्कंद पुराण तथा भागवत महापुराण में वर्णित है कि द्वापर युग में यदुवंश के महान और धर्मप्रिय राजा उग्रसेन मथुरा पर राज्य करते थे। उनके शासन में प्रजा सुखी और संतुष्ट थी। परंतु कालचक्र के अनुसार, उनके ही पुत्र कंस ने सिंहासन हड़पने के लिए छल और बल का मार्ग अपनाया। कंस अत्यंत बलवान, युद्धकला में निपुण, परंतु क्रूर और स्वार्थी स्वभाव का था। उसने अपने पिता को बंदी बनाकर स्वयं मथुरा का राजा बन बैठा।
कंस की एक बहन देवकी थी, उनका विवाह यदुवंशी वीर और धर्मनिष्ठ वसुदेव के साथ हुआ। कंस अपनी बहन से अत्यंत प्रेम करता था, अतः उसने स्वयं रथ हांककर देवकी को उनके ससुराल पहुँचाने का निश्चय किया। भाई-बहन के प्रेम और स्नेह का वह दृश्य देखने योग्य था। लेकिन जैसे ही कंस ने रथ हांका एक आकाशवाणी हुई,
“हे कंस! जिस देवकी को तु बड़े प्रेम से विदा करने जा रहा है उसका आठवां पुत्र तेरा संहार करेगा।”
यह वाणी सुनते ही कंस का हृदय भय और क्रोध से भर गया। उसका प्रेम लोभ और प्राणरक्षा की लालसा में बदल गया।। उसने सोचा — “यदि देवकी जीवित नहीं रहेगी, तो उसका कोई संतान भी नहीं होगी, और मेरा मृत्यु का भय समाप्त हो जाएगा।” वह तुरंत अपनी तलवार की ओर बढ़ा और देवकी की हत्या करने को उद्यत हुआ। रथ में बैठे वासुदेव यह देखकर विचलित तो हुए, परंतु उन्होंने धैर्य और बुद्धि का परिचय दिया। उन्होंने शांत स्वर में कहा —
“हे कंस! तुम्हें देवकी से भय करने की आवश्यकता नहीं है। मैं वचन देता हूँ कि समय आने पर देवकी से उत्पन्न होने वाली प्रत्येक संतान को स्वयं तेरे हाथों में सौंप दूँगा।”
उनके समझाने पर कंस का गुस्सा शांत हो गया। वासुदेव के वचन की सत्यता से कंस भलीभांति परिचित था। वह जानता था कि वसुदेव धर्मनिष्ठ हैं और कभी असत्य नहीं बोलते।
इसलिए उसने तलवार वापस रख दी, परंतु साथ ही एक कठोर निर्णय लिया और वसुदेव व देवकी को कारागार में बन्द कर दिया और सख्त पहरा लगवा दिया। कारागार के चारों ओर लोहे के दरवाजे, ऊँची दीवारें, और चारों पहरों में चुस्त प्रहरी तैनात कर दिए गए। उसका आदेश था —
“इनके प्रत्येक संतान के जन्म होते ही मुझे सूचित किया जाए, और मैं स्वयं उनका अंत करूँगा।”
आठवें पुत्र के रूप में भगवान का जन्म
समय के साथ कंस ने देवकी की एक-एक करके सातों संतानों का वध कर दिया। जब आठवीं संतान का समय आया, उसने कारागार की सुरक्षा और भी कड़ी कर दी। भाद्रपद मास के कृष्ण पक्ष की अष्टमी, रोहिणी नक्षत्र की मध्यम रात्रि में, कारागार के भीतर श्रीकृष्ण ने अवतार लिया। उसी क्षण गोकुल में यशोदा के गर्भ से एक कन्या का जन्म हुआ, जो कोई साधारण बालिका नहीं, बल्कि स्वयं योगमाया थीं। शिशु के जन्म होते ही कारागार में दिव्य प्रकाश छा गया और चारभुजधारी भगवान विष्णु प्रकट हुए। उन्होंने मधुर वाणी में वसुदेव से कहा —
“मैं ही बालक रूप में तुम्हारे पुत्र के रूप में अवतरित हुआ हूँ। अभी इसी क्षण मुझे अपने मित्र नंदजी के घर गोकुल पहुँचा दो, और वहाँ जो कन्या जन्मी है, उसे लाकर कंस को सौंप दो।”
खुल गई बेड़ियां, यमुना ने दिया रास्ता
भगवान का आदेश सुनकर वसुदेव ने नवजात श्रीकृष्ण को एक सूप में रखा और कारागार से निकल पड़े। आश्चर्यजनक चमत्कार घटने लगे — पहरेदार गहरी नींद में सो गए, कारागार के विशाल दरवाजे स्वयं खुल गए, हाथों-पाँवों की बेड़ियाँ टूटकर गिर पड़ीं। वसुदेव ने अंधेरी, वर्षा से उफनती यमुना का रुख किया।
जैसे ही वे यमुना में उतरे, उफनती लहरें शांत हो गईं और बीच में मार्ग बन गया। यमुना ने बढ़कर श्रीकृष्ण के चरणों का स्पर्श किया और फिर शांत हो गई। गोकुल पहुँचकर वसुदेव ने बालक को यशोदा के पास सुला दिया और वहाँ जन्मी कन्या को लेकर मथुरा लौट आए।
भगवान कृष्ण द्वारा कंस का अंत
जब कंस को सूचना मिली कि वसुदेव और देवकी को संतान हुई है, वह क्रोध से तमतमाता हुआ बंदीगृह में पहुँचा। उसने देवकी के हाथ से नवजात कन्या को छीन लिया और पूरी शक्ति से उसे पृथ्वी पर पटकने का प्रयास किया। लेकिन वह कन्या अचानक उसके हाथों से छूटकर आकाश में उठ गई। वह दिव्य रूप धारण कर आकाशवाणी के समान बोली — “अरे मूर्ख कंस! मुझे मारकर तेरा क्या होगा? तुझे मारने वाला तो पहले ही जन्म ले चुका है और इस समय वृंदावन में है। बहुत शीघ्र ही वह तेरे पापों का अंत करेगा।”
यह सुनकर कंस का हृदय भय और क्रोध से भर उठा। उसने तुरंत अपने राक्षस सेनापतियों और असुरों को आदेश दिया कि वे हर संभव उपाय से गोकुल के बालक कृष्ण का वध करें। पूतना, शकटासुर, त्रिणावर्त, अघासुर, बकासुर जैसे अनेक दैत्य एक-एक कर कृष्ण द्वारा मारे गए।
समय बीतता गया, और जब भगवान कृष्ण लगभग 11 वर्ष के थे, तब वे अपने बड़े भाई बलराम के साथ मथुरा पहुँचे। वहाँ धनुषयज्ञ के बहाने कंस ने उन्हें बुलाया था। मल्लयुद्ध में चाणूर और मुष्टिक जैसे पहलवानों को परास्त कर कृष्ण ने स्वयं कंस को उसके राजसिंहासन से खींचकर भूमि पर गिराया और उसके पापों का अंत कर दिया।
कंस के वध के बाद मथुरा में धर्म और शांति की स्थापना हुई, और उग्रसेन को पुनः मथुरा का राजा बनाया गया। इस प्रकार श्रीकृष्ण ने अपनी जन्मभूमि को अत्याचार से मुक्त कराया।
जन्माष्टमी व्रत विधि
भविष्य पुराण और स्कंद पुराण में वर्णित है कि श्रीकृष्ण जन्माष्टमी का व्रत न केवल भगवान कृष्ण की कृपा प्राप्त करने का माध्यम है, बल्कि यह पापों के नाश और मोक्ष प्राप्ति का भी श्रेष्ठ साधन है।
१. व्रत का संकल्प: व्रत वाले दिन प्रातः ब्रह्ममुहूर्त में उठकर स्नान करें, स्वच्छ वस्त्र धारण करें और पूर्व दिशा की ओर मुख करके हाथ में जल, अक्षत, पुष्प लेकर व्रत का संकल्प करें — “मैं श्रीकृष्ण जन्माष्टमी व्रत पूर्ण श्रद्धा एवं नियम से करूंगा।”
२. सूतिका गृह की सजावट: मध्याह्न में माता देवकी के लिए एक सूतिका गृह (प्रसव कक्ष) तैयार करें। इसे स्वच्छ कपड़ों, आम के पत्तों, बंदनवार और विभिन्न पुष्पों से सजाएँ। घर के उत्तर-पूर्व (ईशान कोण) में इसे बनाना शुभ माना जाता है।
३. मूर्ति स्थापना: सूतिका गृह में माता देवकी के साथ बाल गोपाल की मूर्ति स्थापित करें। साथ ही नन्दबाबा, यशोदा माता, देवी लक्ष्मी और भगवान विष्णु की प्रतिमाएं भी रखें।
४. पूजन विधि: किसी सुयोग्य पंडित या ज्ञानी व्यक्ति के निर्देशन में, वैदिक मंत्रों और श्रीकृष्ण के नामों का जप करते हुए पूजन करें। पंचोपचार या षोडशोपचार विधि से स्नान, वस्त्र, आभूषण, चंदन, अक्षत, पुष्प, धूप, दीप और नैवेद्य अर्पित करें।
५. रात्रि जागरण: सूर्यास्त के बाद भजन-कीर्तन, श्रीकृष्ण की लीलाओं का वर्णन और जन्माष्टमी की कथा का श्रवण करें। आधी रात (निशीथ काल) में जब रोहिणी नक्षत्र हो, तब श्रीकृष्ण जन्मोत्सव मनाएं — घंटा, शंख, नगाड़े, मृदंग आदि बजाकर आरती करें।
६. वसोर्धारा एवं षष्ठी पूजन: आधी रात को गुड़ और घी से ‘वसोर्धारा’ (लगातार आहुति देने की क्रिया) करें और षष्ठी देवी की पूजा करें, ताकि बालक की आयु, बल और सौभाग्य की रक्षा हो।
७. अर्पण एवं दान: अगले दिन नवमी को माता भगवती की पूजा करें और ब्राह्मणों को यथाशक्ति दक्षिणा, वस्त्र, अनाज और प्रसाद दें।
८. व्रत पारण: नवमी के दिन ब्राह्मण भोजन कराने के बाद स्वयं फलाहार या सात्त्विक भोजन ग्रहण करके व्रत का पारण करें।
फलश्रुति: शास्त्रों में कहा गया है कि इस विधि से जन्माष्टमी व्रत करने वाले के सात जन्मों के पाप नष्ट हो जाते हैं, वह वैकुण्ठ लोक में स्थान पाता है और जीवन में सुख, शांति और समृद्धि प्राप्त करता है।


