पापी बहेलिया एवं राजकुमार वसुरथ की कथा
सूतजी ने अट्ठासी हज़ार ऋषियों से कहा — “हे मुनिवरगण! यह प्रसंग बहुत प्राचीन है। एक बार चक्रवर्ती राजा मान्धाता ने अपने कुलगुरु महर्षि वशिष्ठ से निवेदन किया — ‘हे गुरुदेव! मुझे ऐसा कोई व्रत बताइए जो सब व्रतों का सार हो, जो पापों को जड़ से हर ले और अंत में भगवान के धाम तक पहुँचा दे।’”
इस पर वशिष्ठजी ने बड़ी प्रसन्नता से कहा — “राजन! फाल्गुन शुक्ल की जो एकादशी आती है, उसे ‘आमलकी एकादशी’ कहते हैं। यह विष्णुभक्तों का अत्यंत प्रिय व्रत है। इसका फल हज़ार गौदान के बराबर कहा गया है और इस दिन पूजित आँवला केवल फल नहीं रह जाता — वह विष्णुस्वरूप मान लिया जाता है, क्योंकि पुराविदों का कथन है कि इसकी उत्पत्ति स्वयं श्रीहरि के मुख से हुई है।”
व्रत की उत्पत्ति का प्रसंग
वशिष्ठजी बोले — “यह कथा एक ऐसे नगर की है जिसका नाम था वैदिक। यह नगरी पुण्यात्माओं की नगरी थी — वहाँ ब्राह्मण अपने वेदपाठ में रमे रहते, क्षत्रिय धर्म की रक्षा करते, वैश्य दानशील थे और शूद्र भी सेवा में निरत रहकर नियम का उल्लंघन न करते। नगर में चोरी, छल, नास्तिकता या देवद्वेष जैसा कोई दोष नहीं था।
उसी नगर में चन्द्रवंशी राजा चैत्ररथ राज्य करता था। वह नीति-सम्पन्न, दानी और वैष्णव-धर्म का अनुगामी था। उसके राज्य में एक व्यवस्था थी — जो एकादशी आये, राजा से लेकर बालक तक सब व्रत करेंगे। कोई बहाना नहीं।”
फाल्गुन शुक्ल की वह एकादशी
फाल्गुन शुक्ल की आमलकी एकादशी आई। उस दिन राजा स्वयं आगे रहे। नगरवासी, मंत्री, सैनिक, स्त्रियाँ, वृद्ध — सबने मिलकर मंदिर में प्रवेश किया। वहाँ एक स्वच्छ स्थान पर कलश स्थापित किया गया, धूप, दीप, नैवेद्य, पंचरत्न और छत्र से धात्री (आँवला) वृक्ष का पूजन किया गया। सबने एक स्वर से प्रार्थना की —
“हे धात्रीदेवी! आप ब्रह्मतत्त्व से प्रकट हुई हैं, आप पाप-शोषिणी हैं, श्रीराम द्वारा पूजिता हैं — हमें स्वीकार कीजिए, हमारे दोष उतारिए।”
रात्रि भर वहाँ हरिनाम, कथा, एकादशी-माहात्म्य और कीर्तन चलता रहा।
बहेलिये का संयोग
उसी रात एक बहेलिया इधर-उधर भटकते-भटकते मंदिर तक चला आया। वह स्वभाव से हिंसक था, जीव-जंतु मारकर परिवार पालता था, साधु-संत का आचरण उसे न प्राप्त था — पर उस दिन वह भूख-प्यास से टुटा हुआ था। सोचा — “चलो, यहीं बैठ जाता हूँ।”
वह एक कोने में बैठ गया। वहाँ जो हरिकथा हो रही थी, जो एकादशी का माहात्म्य गाया जा रहा था, जो भजन चल रहे थे — वह सब उसके कानों में भी पड़ता गया। उसने न तो व्रत का संकल्प लिया, न विधि जानी — बस जागता बैठा रहा। प्रातः सब अपने घरों को लौटे तो वह भी लौट गया और अपने ढंग से भोजन कर लिया।
परन्तु भगवान की व्यवस्था देखिए — उसने अनजाने ही एकादशी-जागरण कर लिया था और श्रीहरि की कथा भी सुन ली थी।
अगला जन्म — राजा वसुरथ
कुछ समय बाद उस बहेलिये की मृत्यु हो गई। उसके जीवन में हिंसा अधिक थी इसलिए सामान्यतः उसे नीच गति मिलती, पर उस एक रात्रि के जागरण और आमलकी-पूजन-सभा में उपस्थित रहने के पुण्य से उसे चन्द्रवंशी राजा विदुरथ के यहाँ जन्म मिला। नाम पड़ा — वसुरथ।
यह वसुरथ बड़ा होकर अत्यंत तेजस्वी, बलवान, दानी और धर्मपरायण राजा बना। उसके पास चतुरंगिणी सेना थी, दस हज़ार ग्राम उसके अधीन थे, मुख पर चन्द्र जैसी शीतलता थी और वीरता में वह विष्णु-सा प्रतीत होता था। यह सब उसी पूर्वजन्म की एकादशी-जागरण की कमाई थी।
वन में संकट
एक बार राजा वसुरथ शिकार के लिए निकल पड़ा। वन विशाल था, मार्ग भटक गया। दोपहर ढली तो वह एक पेड़ के नीचे विश्राम करके सो गया। तभी पहाड़ी डाकुओं का झुंड आया।
डाकुओं ने राजा को पहचान लिया और कहने लगे — “यही है वह राजा! इसने पहले हमारे कुल को उजाड़ा था, हमारे लोगों को दण्डित किया था — आज बदला पूरा करेंगे!”
वे सब मिलकर राजा पर टूट पड़े। जिसने जो हथियार था — भाला, कृपाण, शूल — सब राजा की देह पर चलाए।
पर आश्चर्य! वे शस्त्र जैसे ही राजा को छूते, फूल की तरह झर जाते। जो बाण उसे लगना चाहिए था, जैसे थम जाता। डाकू हतप्रभ! वे फिर-फिर प्रहार करते, लेकिन राजा को आघात ही न होता।
देवी का प्रकट होना
तभी राजा के शरीर से एक दिव्य स्त्री प्रकट हुई — उज्ज्वल, आभूषणों से विभूषित, पर भृकुटी तिरछी, नेत्रों से अग्नि सी ज्वाला निकलती हुई।
उस देवी ने एक ही क्षण में उन डाकुओं के सारे अस्त्र उल्टे उन्हीं पर फेर दिए। जो राजा पर चला रहे थे, वही उनके ऊपर बरसने लगे। देखते-ही-देखते सब डाकू धराशायी हो गए।
राजा की नींद खुली तो चारों ओर शव पड़े थे। चकित होकर सोचने लगा — “मैं तो अकेला था, ये सब कौन कर गया? इस वन में मेरा कौन हितैषी है?”
उसी समय आकाश से वाणी हुई — “हे राजन! यह तेरी रक्षा स्वयं भगवान विष्णु ने की है। तू जिसे भूल चुका था, उसने तुझे नहीं भुलाया। यह सब आमलकी एकादशी के संस्कार का ही प्रभाव है।”
राजा ने उसी समय भगवान को नमस्कार किया और अपने नगर को लौट आया।
व्रत का फल
वशिष्ठजी ने कहा — “हे मान्धाता! तुम समझ लो — उस बहेलिये ने न संकल्प जाना, न मंत्र जाना, न विधि जानी — फिर भी अकेले आमलकी एकादशी के दिन कथा-संगत और जागरण का इतना प्रभाव हुआ कि अगले जन्म में राजा हुआ, और संकट में स्वयं भगवान की शक्ति उसके अंग से प्रकट होकर रक्षा करने लगी।
तो जो व्यक्ति जानबूझकर, विधि से, आँवले का पूजन करके, विष्णु का स्मरण करके यह व्रत करेगा — उसके पाप तो जड़ से कटेंगे ही, उसके कर्म-मार्ग में छिपे संकट भी अपने-आप उल्टे पड़ेंगे।”
कथा-सार
• फाल्गुन शुक्ल की आमलकी एकादशी वैष्णव-मार्ग की बहुत कोमल और बहुत शक्तिशाली एकादशी मानी गई है।
• आँवला यहाँ केवल औषधि नहीं, विष्णु-प्रसूत, पाप-हर, कल्याण-कारिणी शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित है।
• अनजाने में भी यदि कोई इस तिथि पर हरिकथा-संगत, जागरण या देव-पूजन में बैठ गया तो उसका लाभ मिलता है — यह कथा इसका साक्ष्य है।
• संकट के समय जो “अदृश्य रक्षा” मिलती है, वह अक्सर ऐसे ही संचित सत्कर्मों का फल होती है।
• इसलिए इस एकादशी को “सब व्रतों से उत्तम और अन्ततः वैकुण्ठदायिनी” कहा गया है।


