॥ श्री गणेशाय नमः ॥
श्रीजानकीवल्लभो विजयते
श्रीरामचरितमानस
सप्तम सोपान
(उत्तरकाण्ड)
॥ श्लोक ॥
केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं
शोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम् ।
पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानं
नौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम् ॥1॥
कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ ।
जानकीकरसरोजलालितौ चिन्तकस्य मनभृङ्गसड्गिनौ ॥2॥
कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम् ।
कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शंकरमनंगमोचनम् ॥3॥
॥ दोहा ॥
रहा एक दिन अवधि कर अति आरत पुर लोग ।
जहँ तहँ सोचहिं नारि नर कृस तन राम बियोग ॥
॥ चौपाई ॥
सगुन होहिं सुंदर सकल मन प्रसन्न सब केर ।
प्रभु आगवन जनाव जनु नगर रम्य चहुँ फेर ॥
कौसल्यादि मातु सब मन अनंद अस होइ ।
आयउ प्रभु श्री अनुज जुत कहन चहत अब कोइ ॥
भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं बार ।
जानि सगुन मन हरष अति लागे करन बिचार ॥
रहेउ एक दिन अवधि अधारा । समुझत मन दुख भयउ अपारा ॥
कारन कवन नाथ नहिं आयउ । जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ ॥
अहह धन्य लछिमन बड़भागी । राम पदारबिंदु अनुरागी ॥
कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा । ताते नाथ संग नहिं लीन्हा ॥
जौं करनी समुझै प्रभु मोरी । नहिं निस्तार कलप सत कोरी ॥
जन अवगुन प्रभु मान न काऊ । दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ ॥
मोरि जियँ भरोस दृढ़ सोई । मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई ॥
बीतें अवधि रहहि जौं प्राना । अधम कवन जग मोहि समाना ॥
॥ दोहा ॥
राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत ।
बिप्र रूप धरि पवन सुत आइ गयउ जनु पोत ॥1(क)॥
बैठि देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात ।
राम राम रघुपति जपत स्त्रवत नयन जलजात ॥1(ख)॥
॥ चौपाई ॥
देखत हनूमान अति हरषेउ । पुलक गात लोचन जल बरषेउ ॥
मन महँ बहुत भाँति सुख मानी । बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी ॥
जासु बिरहँ सोचहु दिन राती । रटहु निरंतर गुन गन पाँती ॥
रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता । आयउ कुसल देव मुनि त्राता ॥
रिपु रन जीति सुजस सुर गावत । सीता सहित अनुज प्रभु आवत ॥
सुनत बचन बिसरे सब दूखा । तृषावंत जिमि पाइ पियूषा ॥
को तुम्ह तात कहाँ ते आए । मोहि परम प्रिय बचन सुनाए ॥
मारुत सुत मैं कपि हनुमाना । नामु मोर सुनु कृपानिधाना ॥
दीनबंधु रघुपति कर किंकर । सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर ॥
मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता । नयन स्त्रवत जल पुलकित गाता ॥
कपि तव दरस सकल दुख बीते । मिले आजु मोहि राम पिरीते ॥
बार बार बूझी कुसलाता । तो कहुँ देउँ काह सुनु भ्राता ॥
एहि संदेस सरिस जग माहीं । करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं ॥
नाहिन तात उरिन मैं तोही । अब प्रभु चरित सुनावहु मोही ॥
तब हनुमंत नाइ पद माथा । कहे सकल रघुपति गुन गाथा ॥
कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं । सुमिरहिं मोहि दास की नाईं ॥
छं0-निज दास ज्यों रघुबंसभूषन कबहुँ मम सुमिरन कर् यो ।
सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि पुलकित तन चरनन्हि पर् यो ॥
रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो ।
काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन सिंधु सो ॥
॥ दोहा ॥
राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह सत्य बचन मम तात ।
पुनि पुनि मिलत भरत सुनि हरष न हृदयँ समात ॥2(क)॥
सो0-भरत चरन सिरु नाइ तुरित गयउ कपि राम पहिं ।
कही कुसल सब जाइ हरषि चलेउ प्रभु जान चढ़ि ॥2(ख)॥
॥ चौपाई ॥
हरषि भरत कोसलपुर आए । समाचार सब गुरहि सुनाए ॥
पुनि मंदिर महँ बात जनाई । आवत नगर कुसल रघुराई ॥
सुनत सकल जननीं उठि धाईं । कहि प्रभु कुसल भरत समुझाई ॥
समाचार पुरबासिन्ह पाए । नर अरु नारि हरषि सब धाए ॥
दधि दुर्बा रोचन फल फूला । नव तुलसी दल मंगल मूला ॥
भरि भरि हेम थार भामिनी । गावत चलिं सिंधु सिंधुरगामिनी ॥
जे जैसेहिं तैसेहिं उटि धावहिं । बाल बृद्ध कहँ संग न लावहिं ॥
एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई । तुम्ह देखे दयाल रघुराई ॥
अवधपुरी प्रभु आवत जानी । भई सकल सोभा कै खानी ॥
बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा । भइ सरजू अति निर्मल नीरा ॥
॥ दोहा ॥
हरषित गुर परिजन अनुज भूसुर बृंद समेत ।
चले भरत मन प्रेम अति सन्मुख कृपानिकेत ॥3(क)॥
बहुतक चढ़ी अटारिन्ह निरखहिं गगन बिमान ।
देखि मधुर सुर हरषित करहिं सुमंगल गान ॥3(ख)॥
राका ससि रघुपति पुर सिंधु देखि हरषान ।
बढ़यो कोलाहल करत जनु नारि तरंग समान ॥3(ग)॥
॥ चौपाई ॥
इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर । कपिन्ह देखावत नगर मनोहर ॥
सुनु कपीस अंगद लंकेसा । पावन पुरी रुचिर यह देसा ॥
जद्यपि सब बैकुंठ बखाना । बेद पुरान बिदित जगु जाना ॥
अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ । यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ ॥
जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि । उत्तर दिसि बह सरजू पावनि ॥
जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा । मम समीप नर पावहिं बासा ॥
अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी । मम धामदा पुरी सुख रासी ॥
हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी । धन्य अवध जो राम बखानी ॥
॥ दोहा ॥
आवत देखि लोग सब कृपासिंधु भगवान ।
नगर निकट प्रभु प्रेरेउ उतरेउ भूमि बिमान ॥4(क)॥
उतरि कहेउ प्रभु पुष्पकहि तुम्ह कुबेर पहिं जाहु ।
प्रेरित राम चलेउ सो हरषु बिरहु अति ताहु ॥4(ख)॥
॥ चौपाई ॥
आए भरत संग सब लोगा । कृस तन श्रीरघुबीर बियोगा ॥
बामदेव बसिष्ठ मुनिनायक । देखे प्रभु महि धरि धनु सायक ॥
धाइ धरे गुर चरन सरोरुह । अनुज सहित अति पुलक तनोरुह ॥
भेंटि कुसल बूझी मुनिराया । हमरें कुसल तुम्हारिहिं दाया ॥
सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा । धर्म धुरंधर रघुकुलनाथा ॥
गहे भरत पुनि प्रभु पद पंकज । नमत जिन्हहि सुर मुनि संकर अज ॥
परे भूमि नहिं उठत उठाए । बर करि कृपासिंधु उर लाए ॥
स्यामल गात रोम भए ठाढ़े । नव राजीव नयन जल बाढ़े ॥
॥ छन्द ॥
राजीव लोचन स्त्रवत जल तन ललित पुलकावलि बनी ।
अति प्रेम हृदयँ लगाइ अनुजहि मिले प्रभु त्रिभुअन धनी ॥
प्रभु मिलत अनुजहि सोह मो पहिं जाति नहिं उपमा कही ।
जनु प्रेम अरु सिंगार तनु धरि मिले बर सुषमा लही ॥1 ॥
बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई ।
सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई ॥
अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो ।
बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो ॥2 ॥
॥ दोहा ॥
पुनि प्रभु हरषि सत्रुहन भेंटे हृदयँ लगाइ ।
लछिमन भरत मिले तब परम प्रेम दोउ भाइ ॥5॥
॥ चौपाई ॥
भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे । दुसह बिरह संभव दुख मेटे ॥
सीता चरन भरत सिरु नावा । अनुज समेत परम सुख पावा ॥
प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी । जनित बियोग बिपति सब नासी ॥
प्रेमातुर सब लोग निहारी । कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी ॥
अमित रूप प्रगटे तेहि काला । जथाजोग मिले सबहि कृपाला ॥
कृपादृष्टि रघुबीर बिलोकी । किए सकल नर नारि बिसोकी ॥
छन महिं सबहि मिले भगवाना । उमा मरम यह काहुँ न जाना ॥
एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा । आगें चले सील गुन धामा ॥
कौसल्यादि मातु सब धाई । निरखि बच्छ जनु धेनु लवाई ॥
छं0-जनु धेनु बालक बच्छ तजि गृहँ चरन बन परबस गईं ।
दिन अंत पुर रुख स्त्रवत थन हुंकार करि धावत भई ॥
अति प्रेम सब मातु भेटीं बचन मृदु बहुबिधि कहे ।
गइ बिषम बियोग भव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे ॥
॥ दोहा ॥
भेटेउ तनय सुमित्राँ राम चरन रति जानि ।
रामहि मिलत कैकेई हृदयँ बहुत सकुचानि ॥6(क)॥
लछिमन सब मातन्ह मिलि हरषे आसिष पाइ ।
कैकेइ कहँ पुनि पुनि मिले मन कर छोभु न जाइ ॥6॥
॥ चौपाई ॥
सासुन्ह सबनि मिली बैदेही । चरनन्हि लागि हरषु अति तेही ॥
देहिं असीस बूझि कुसलाता । होइ अचल तुम्हार अहिवाता ॥
सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं । मंगल जानि नयन जल रोकहिं ॥
कनक थार आरति उतारहिं । बार बार प्रभु गात निहारहिं ॥
नाना भाँति निछावरि करहीं । परमानंद हरष उर भरहीं ॥
कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि । चितवति कृपासिंधु रनधीरहि ॥
हृदयँ बिचारति बारहिं बारा । कवन भाँति लंकापति मारा ॥
अति सुकुमार जुगल मेरे बारे । निसिचर सुभट महाबल भारे ॥
॥ दोहा ॥
लछिमन अरु सीता सहित प्रभुहि बिलोकति मातु ।
परमानंद मगन मन पुनि पुनि पुलकित गातु ॥7॥
॥ चौपाई ॥
लंकापति कपीस नल नीला । जामवंत अंगद सुभसीला ॥
हनुमदादि सब बानर बीरा । धरे मनोहर मनुज सरीरा ॥
भरत सनेह सील ब्रत नेमा । सादर सब बरनहिं अति प्रेमा ॥
देखि नगरबासिन्ह कै रीती । सकल सराहहि प्रभु पद प्रीती ॥
पुनि रघुपति सब सखा बोलाए । मुनि पद लागहु सकल सिखाए ॥
गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे । इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे ॥
ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे । भए समर सागर कहँ बेरे ॥
मम हित लागि जन्म इन्ह हारे । भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे ॥
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए । निमिष निमिष उपजत सुख नए ॥
॥ दोहा ॥
कौसल्या के चरनन्हि पुनि तिन्ह नायउ माथ ॥
आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ ॥8(क)॥
सुमन बृष्टि नभ संकुल भवन चले सुखकंद ।
चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नगर नारि नर बृंद ॥8(ख)॥
॥ चौपाई ॥
कंचन कलस बिचित्र सँवारे । सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे ॥
बंदनवार पताका केतू । सबन्हि बनाए मंगल हेतू ॥
बीथीं सकल सुगंध सिंचाई । गजमनि रचि बहु चौक पुराई ॥
नाना भाँति सुमंगल साजे । हरषि नगर निसान बहु बाजे ॥
जहँ तहँ नारि निछावर करहीं । देहिं असीस हरष उर भरहीं ॥
कंचन थार आरती नाना । जुबती सजें करहिं सुभ गाना ॥
करहिं आरती आरतिहर कें । रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें ॥
पुर सोभा संपति कल्याना । निगम सेष सारदा बखाना ॥
तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं । उमा तासु गुन नर किमि कहहीं ॥
॥ दोहा ॥
नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह दिनेस ।
अस्त भएँ बिगसत भईं निरखि राम राकेस ॥9(क)॥
होहिं सगुन सुभ बिबिध बिधि बाजहिं गगन निसान ।
पुर नर नारि सनाथ करि भवन चले भगवान ॥9(ख)॥
॥ चौपाई ॥
प्रभु जानी कैकेई लजानी । प्रथम तासु गृह गए भवानी ॥
ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा । पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा ॥
कृपासिंधु जब मंदिर गए । पुर नर नारि सुखी सब भए ॥
गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई । आजु सुघरी सुदिन समुदाई ॥
सब द्विज देहु हरषि अनुसासन । रामचंद्र बैठहिं सिंघासन ॥
मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए । सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए ॥
कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका । जग अभिराम राम अभिषेका ॥
अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजे । महाराज कहँ तिलक करीजै ॥
॥ दोहा ॥
तब मुनि कहेउ सुमंत्र सन सुनत चलेउ हरषाइ ।
रथ अनेक बहु बाजि गज तुरत सँवारे जाइ ॥10(क)॥
जहँ तहँ धावन पठइ पुनि मंगल द्रब्य मगाइ ।
हरष समेत बसिष्ट पद पुनि सिरु नायउ आइ ॥10(ख)॥
नवान्हपारायण, आठवाँ विश्राम
॥ चौपाई ॥
अवधपुरी अति रुचिर बनाई । देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई ॥
राम कहा सेवकन्ह बुलाई । प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई ॥
सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए । सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए ॥
पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे । निज कर राम जटा निरुआरे ॥
अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई । भगत बछल कृपाल रघुराई ॥
भरत भाग्य प्रभु कोमलताई । सेष कोटि सत सकहिं न गाई ॥
पुनि निज जटा राम बिबराए । गुर अनुसासन मागि नहाए ॥
करि मज्जन प्रभु भूषन साजे । अंग अनंग देखि सत लाजे ॥
॥ दोहा ॥
सासुन्ह सादर जानकिहि मज्जन तुरत कराइ ।
दिब्य बसन बर भूषन अँग अँग सजे बनाइ ॥11(क)॥
राम बाम दिसि सोभति रमा रूप गुन खानि ।
देखि मातु सब हरषीं जन्म सुफल निज जानि ॥11(ख)॥
सुनु खगेस तेहि अवसर ब्रह्मा सिव मुनि बृंद ।
चढ़ि बिमान आए सब सुर देखन सुखकंद ॥11(ग)॥
॥ चौपाई ॥
प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा । तुरत दिब्य सिंघासन मागा ॥
रबि सम तेज सो बरनि न जाई । बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई ॥
जनकसुता समेत रघुराई । पेखि प्रहरषे मुनि समुदाई ॥
बेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे । नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे ॥
प्रथम तिलक बसिष्ट मुनि कीन्हा । पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा ॥
सुत बिलोकि हरषीं महतारी । बार बार आरती उतारी ॥
बिप्रन्ह दान बिबिध बिधि दीन्हे । जाचक सकल अजाचक कीन्हे ॥
सिंघासन पर त्रिभुअन साई । देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं ॥
॥ छन्द ॥
नभ दुंदुभीं बाजहिं बिपुल गंधर्ब किंनर गावहीं ।
नाचहिं अपछरा बृंद परमानंद सुर मुनि पावहीं ॥
भरतादि अनुज बिभीषनांगद हनुमदादि समेत ते ।
गहें छत्र चामर ब्यजन धनु असि चर्म सक्ति बिराजते ॥1॥
श्री सहित दिनकर बंस बूषन काम बहु छबि सोहई ।
नव अंबुधर बर गात अंबर पीत सुर मन मोहई ॥
मुकुटांगदादि बिचित्र भूषन अंग अंगन्हि प्रति सजे ।
अंभोज नयन बिसाल उर भुज धन्य नर निरखंति जे ॥2॥
॥ दोहा ॥
वह सोभा समाज सुख कहत न बनइ खगेस ।
बरनहिं सारद सेष श्रुति सो रस जान महेस ॥12(क)॥
भिन्न भिन्न अस्तुति करि गए सुर निज निज धाम ।
बंदी बेष बेद तब आए जहँ श्रीराम ॥12(ख)॥
प्रभु सर्बग्य कीन्ह अति आदर कृपानिधान ।
लखेउ न काहूँ मरम कछु लगे करन गुन गान ॥12(ग)॥
॥ छन्द ॥
जय सगुन निर्गुन रूप अनूप भूप सिरोमने ।
दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुज बल हने ॥
अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे ।
जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे ॥1॥
तव बिषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे ।
भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे ॥
जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे ।
भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे ॥2 ॥
जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी ।
ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी ॥
बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे ।
जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे ॥3 ॥
जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी ।
नख निर्गता मुनि बंदिता त्रेलोक पावनि सुरसरी ॥
ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे ।
पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे ॥4 ॥
अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने ।
षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने ॥
फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे ।
पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे ॥5 ॥
जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मनपर ध्यावहीं ।
ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं ॥
करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं ।
मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं ॥6 ॥
सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्हि उदार ।
अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार ॥13(क)॥
बैनतेय सुनु संभु तब आए जहँ रघुबीर ।
बिनय करत गदगद गिरा पूरित पुलक सरीर ॥13(ख)॥
॥ छन्द ॥
जय राम रमारमनं समनं । भव ताप भयाकुल पाहि जनं ॥
अवधेस सुरेस रमेस बिभो । सरनागत मागत पाहि प्रभो ॥1 ॥
दससीस बिनासन बीस भुजा । कृत दूरि महा महि भूरि रुजा ॥
रजनीचर बृंद पतंग रहे । सर पावक तेज प्रचंड दहे ॥2 ॥
महि मंडल मंडन चारुतरं । धृत सायक चाप निषंग बरं ॥
मद मोह महा ममता रजनी । तम पुंज दिवाकर तेज अनी ॥3 ॥
मनजात किरात निपात किए । मृग लोग कुभोग सरेन हिए ॥
हति नाथ अनाथनि पाहि हरे । बिषया बन पावँर भूलि परे ॥4 ॥
बहु रोग बियोगन्हि लोग हए । भवदंघ्रि निरादर के फल ए ॥
भव सिंधु अगाध परे नर ते । पद पंकज प्रेम न जे करते ॥5 ॥
अति दीन मलीन दुखी नितहीं । जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं ॥
अवलंब भवंत कथा जिन्ह के ॥ प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें ॥6 ॥
नहिं राग न लोभ न मान मदा ॥तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा ॥
एहि ते तव सेवक होत मुदा । मुनि त्यागत जोग भरोस सदा ॥7 ॥
करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ । पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ ॥
सम मानि निरादर आदरही । सब संत सुखी बिचरंति मही ॥8 ॥
मुनि मानस पंकज भृंग भजे । रघुबीर महा रनधीर अजे ॥
तव नाम जपामि नमामि हरी । भव रोग महागद मान अरी ॥9 ॥
गुन सील कृपा परमायतनं । प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं ॥
रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं । महिपाल बिलोकय दीन जनं ॥10 ॥
बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग ।
पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग ॥14(क)॥
बरनि उमापति राम गुन हरषि गए कैलास ।
तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास ॥14(ख)॥
॥ चौपाई ॥
सुनु खगपति यह कथा पावनी । त्रिबिध ताप भव भय दावनी ॥
महाराज कर सुभ अभिषेका । सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका ॥
जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं । सुख संपति नाना बिधि पावहिं ॥
सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं । अंतकाल रघुपति पुर जाहीं ॥
सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई । लहहिं भगति गति संपति नई ॥
खगपति राम कथा मैं बरनी । स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी ॥
बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी । मोह नदी कहँ सुंदर तरनी ॥
नित नव मंगल कौसलपुरी । हरषित रहहिं लोग सब कुरी ॥
नित नइ प्रीति राम पद पंकज । सबकें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज ॥
मंगन बहु प्रकार पहिराए । द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए ॥
॥ दोहा ॥
ब्रह्मानंद मगन कपि सब कें प्रभु पद प्रीति ।
जात न जाने दिवस तिन्ह गए मास षट बीति ॥15॥
॥ चौपाई ॥
बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं । जिमि परद्रोह संत मन माही ॥
तब रघुपति सब सखा बोलाए । आइ सबन्हि सादर सिरु नाए ॥
परम प्रीति समीप बैठारे । भगत सुखद मृदु बचन उचारे ॥
तुम्ह अति कीन्ह मोरि सेवकाई । मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई ॥
ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे । मम हित लागि भवन सुख त्यागे ॥
अनुज राज संपति बैदेही । देह गेह परिवार सनेही ॥
सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना । मृषा न कहउँ मोर यह बाना ॥
सब के प्रिय सेवक यह नीती । मोरें अधिक दास पर प्रीती ॥
॥ दोहा ॥
अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम ।
सदा सर्बगत सर्बहित जानि करेहु अति प्रेम ॥16॥
॥ चौपाई ॥
सुनि प्रभु बचन मगन सब भए । को हम कहाँ बिसरि तन गए ॥
एकटक रहे जोरि कर आगे । सकहिं न कछु कहि अति अनुरागे ॥
परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा । कहा बिबिध बिधि ग्यान बिसेषा ॥
प्रभु सन्मुख कछु कहन न पारहिं । पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं ॥
तब प्रभु भूषन बसन मगाए । नाना रंग अनूप सुहाए ॥
सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए । बसन भरत निज हाथ बनाए ॥
प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए । लंकापति रघुपति मन भाए ॥
अंगद बैठ रहा नहिं डोला । प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला ॥
॥ दोहा ॥
जामवंत नीलादि सब पहिराए रघुनाथ ।
हियँ धरि राम रूप सब चले नाइ पद माथ ॥17(क)॥
तब अंगद उठि नाइ सिरु सजल नयन कर जोरि ।
अति बिनीत बोलेउ बचन मनहुँ प्रेम रस बोरि ॥17(ख)॥
॥ चौपाई ॥
सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो । दीन दयाकर आरत बंधो ॥
मरती बेर नाथ मोहि बाली । गयउ तुम्हारेहि कोंछें घाली ॥
असरन सरन बिरदु संभारी । मोहि जनि तजहु भगत हितकारी ॥
मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता । जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता ॥
तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा । प्रभु तजि भवन काज मम काहा ॥
बालक ग्यान बुद्धि बल हीना । राखहु सरन नाथ जन दीना ॥
नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ । पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ ॥
अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही । अब जनि नाथ कहहु गृह जाही ॥
॥ दोहा ॥
अंगद बचन बिनीत सुनि रघुपति करुना सींव ।
प्रभु उठाइ उर लायउ सजल नयन राजीव ॥18(क)॥
निज उर माल बसन मनि बालितनय पहिराइ ।
बिदा कीन्हि भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ ॥18(ख)॥
॥ चौपाई ॥
भरत अनुज सौमित्र समेता । पठवन चले भगत कृत चेता ॥
अंगद हृदयँ प्रेम नहिं थोरा । फिरि फिरि चितव राम कीं ओरा ॥
बार बार कर दंड प्रनामा । मन अस रहन कहहिं मोहि रामा ॥
राम बिलोकनि बोलनि चलनी । सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी ॥
प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी । चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी ॥
अति आदर सब कपि पहुँचाए । भाइन्ह सहित भरत पुनि आए ॥
तब सुग्रीव चरन गहि नाना । भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना ॥
दिन दस करि रघुपति पद सेवा । पुनि तव चरन देखिहउँ देवा ॥
पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा । सेवहु जाइ कृपा आगारा ॥
अस कहि कपि सब चले तुरंता । अंगद कहइ सुनहु हनुमंता ॥
॥ दोहा ॥
कहेहु दंडवत प्रभु सैं तुम्हहि कहउँ कर जोरि ।
बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि ॥19(क)॥
अस कहि चलेउ बालिसुत फिरि आयउ हनुमंत ।
तासु प्रीति प्रभु सन कहि मगन भए भगवंत ॥9(ख)॥
कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि ।
चित्त खगेस राम करसमुझि परइ कहु काहि ॥19(ग)॥
॥ चौपाई ॥
पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा । दीन्हे भूषन बसन प्रसादा ॥
जाहु भवन मम सुमिरन करेहू । मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू ॥
तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता । सदा रहेहु पुर आवत जाता ॥
बचन सुनत उपजा सुख भारी । परेउ चरन भरि लोचन बारी ॥
चरन नलिन उर धरि गृह आवा । प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा ॥
रघुपति चरित देखि पुरबासी । पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी ॥
राम राज बैंठें त्रेलोका । हरषित भए गए सब सोका ॥
बयरु न कर काहू सन कोई । राम प्रताप बिषमता खोई ॥
॥ दोहा ॥
बरनाश्रम निज निज धरम बनिरत बेद पथ लोग ।
चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग ॥20॥
॥ चौपाई ॥
दैहिक दैविक भौतिक तापा । राम राज नहिं काहुहि ब्यापा ॥
सब नर करहिं परस्पर प्रीती । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ॥
चारिउ चरन धर्म जग माहीं । पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं ॥
राम भगति रत नर अरु नारी । सकल परम गति के अधिकारी ॥
अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा । सब सुंदर सब बिरुज सरीरा ॥
नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना । नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना ॥
सब निर्दंभ धर्मरत पुनी । नर अरु नारि चतुर सब गुनी ॥
सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी । सब कृतग्य नहिं कपट सयानी ॥
॥ दोहा ॥
राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं ॥
काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं ॥21॥
॥ चौपाई ॥
भूमि सप्त सागर मेखला । एक भूप रघुपति कोसला ॥
भुअन अनेक रोम प्रति जासू । यह प्रभुता कछु बहुत न तासू ॥
सो महिमा समुझत प्रभु केरी । यह बरनत हीनता घनेरी ॥
सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी । फिरी एहिं चरित तिन्हहुँ रति मानी ॥
सोउ जाने कर फल यह लीला । कहहिं महा मुनिबर दमसीला ॥
राम राज कर सुख संपदा । बरनि न सकइ फनीस सारदा ॥
सब उदार सब पर उपकारी । बिप्र चरन सेवक नर नारी ॥
एकनारि ब्रत रत सब झारी । ते मन बच क्रम पति हितकारी ॥
॥ दोहा ॥
दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज ।
जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज ॥22॥
॥ चौपाई ॥
फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन । रहहि एक सँग गज पंचानन ॥
खग मृग सहज बयरु बिसराई । सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई ॥
कूजहिं खग मृग नाना बृंदा । अभय चरहिं बन करहिं अनंदा ॥
सीतल सुरभि पवन बह मंदा । गूंजत अलि लै चलि मकरंदा ॥
लता बिटप मागें मधु चवहीं । मनभावतो धेनु पय स्त्रवहीं ॥
ससि संपन्न सदा रह धरनी । त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी ॥
प्रगटीं गिरिन्ह बिबिध मनि खानी । जगदातमा भूप जग जानी ॥
सरिता सकल बहहिं बर बारी । सीतल अमल स्वाद सुखकारी ॥
सागर निज मरजादाँ रहहीं । डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं ॥
सरसिज संकुल सकल तड़ागा । अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा ॥
॥ दोहा ॥
बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज ।
मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र के राज ॥23॥
॥ चौपाई ॥
कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे । दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे ॥
श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर । गुनातीत अरु भोग पुरंदर ॥
पति अनुकूल सदा रह सीता । सोभा खानि सुसील बिनीता ॥
जानति कृपासिंधु प्रभुताई । सेवति चरन कमल मन लाई ॥
जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी । बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी ॥
निज कर गृह परिचरजा करई । रामचंद्र आयसु अनुसरई ॥
जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ । सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ ॥
कौसल्यादि सासु गृह माहीं । सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं ॥
उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता । जगदंबा संततमनिंदिता ॥
॥ दोहा ॥
जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ ।
राम पदारबिंद रति करति सुभावहि खोइ ॥24॥
॥ चौपाई ॥
सेवहिं सानकूल सब भाई । राम चरन रति अति अधिकाई ॥
प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं । कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं ॥
राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती । नाना भाँति सिखावहिं नीती ॥
हरषित रहहिं नगर के लोगा । करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा ॥
अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं । श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं ॥
दुइ सुत सुन्दर सीताँ जाए । लव कुस बेद पुरानन्ह गाए ॥
दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर । हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर ॥
दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे । भए रूप गुन सील घनेरे ॥
॥ दोहा ॥
ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार ।
सोइ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार ॥25॥
॥ चौपाई ॥
प्रातकाल सरऊ करि मज्जन । बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन ॥
बेद पुरान बसिष्ट बखानहिं । सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं ॥
अनुजन्ह संजुत भोजन करहीं । देखि सकल जननीं सुख भरहीं ॥
भरत सत्रुहन दोनउ भाई । सहित पवनसुत उपबन जाई ॥
बूझहिं बैठि राम गुन गाहा । कह हनुमान सुमति अवगाहा ॥
सुनत बिमल गुन अति सुख पावहिं । बहुरि बहुरि करि बिनय कहावहिं ॥
सब कें गृह गृह होहिं पुराना । रामचरित पावन बिधि नाना ॥
नर अरु नारि राम गुन गानहिं । करहिं दिवस निसि जात न जानहिं ॥
॥ दोहा ॥
अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज ।
सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप राम बिराज ॥26॥
॥ चौपाई ॥
नारदादि सनकादि मुनीसा । दरसन लागि कोसलाधीसा ॥
दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं । देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं ॥
जातरूप मनि रचित अटारीं । नाना रंग रुचिर गच ढारीं ॥
पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर । रचे कँगूरा रंग रंग बर ॥
नव ग्रह निकर अनीक बनाई । जनु घेरी अमरावति आई ॥
महि बहु रंग रचित गच काँचा । जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा ॥
धवल धाम ऊपर नभ चुंबत । कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत ॥
बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं । गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं ॥
छं0-मनि दीप राजहिं भवन भ्राजहिं देहरीं बिद्रुम रची ।
मनि खंभ भीति बिरंचि बिरची कनक मनि मरकत खची ॥
सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर रुचिर फटिक रचे ।
प्रति द्वार द्वार कपाट पुरट बनाइ बहु बज्रन्हि खचे ॥
॥ दोहा ॥
चारु चित्रसाला गृह गृह प्रति लिखे बनाइ ।
राम चरित जे निरख मुनि ते मन लेहिं चोराइ ॥27॥
॥ चौपाई ॥
सुमन बाटिका सबहिं लगाई । बिबिध भाँति करि जतन बनाई ॥
लता ललित बहु जाति सुहाई । फूलहिं सदा बंसत कि नाई ॥
गुंजत मधुकर मुखर मनोहर । मारुत त्रिबिध सदा बह सुंदर ॥
नाना खग बालकन्हि जिआए । बोलत मधुर उड़ात सुहाए ॥
मोर हंस सारस पारावत । भवननि पर सोभा अति पावत ॥
जहँ तहँ देखहिं निज परिछाहीं । बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं ॥
सुक सारिका पढ़ावहिं बालक । कहहु राम रघुपति जनपालक ॥
राज दुआर सकल बिधि चारू । बीथीं चौहट रूचिर बजारू ॥
॥ छन्द ॥
बाजार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए ।
जहँ भूप रमानिवास तहँ की संपदा किमि गाइए ॥
बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते ।
सब सुखी सब सच्चरित सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे ॥
॥ दोहा ॥
उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर ।
बाँधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर ॥28॥
॥ चौपाई ॥
दूरि फराक रुचिर सो घाटा । जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा ॥
पनिघट परम मनोहर नाना । तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना ॥
राजघाट सब बिधि सुंदर बर । मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर ॥
तीर तीर देवन्ह के मंदिर । चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर ॥
कहुँ कहुँ सरिता तीर उदासी । बसहिं ग्यान रत मुनि संन्यासी ॥
तीर तीर तुलसिका सुहाई । बृंद बृंद बहु मुनिन्ह लगाई ॥
पुर सोभा कछु बरनि न जाई । बाहेर नगर परम रुचिराई ॥
देखत पुरी अखिल अघ भागा । बन उपबन बापिका तड़ागा ॥
॥ छन्द ॥
छं0-बापीं तड़ाग अनूप कूप मनोहरायत सोहहीं ।
सोपान सुंदर नीर निर्मल देखि सुर मुनि मोहहीं ॥
बहु रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं ।
आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं ॥
॥ दोहा ॥
रमानाथ जहँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ ।
अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ ॥29॥
॥ चौपाई ॥
जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं । बैठि परसपर इहइ सिखावहिं ॥
भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि । सोभा सील रूप गुन धामहि ॥
जलज बिलोचन स्यामल गातहि । पलक नयन इव सेवक त्रातहि ॥
धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि । संत कंज बन रबि रनधीरहि ॥
काल कराल ब्याल खगराजहि । नमत राम अकाम ममता जहि ॥
लोभ मोह मृगजूथ किरातहि । मनसिज करि हरि जन सुखदातहि ॥
संसय सोक निबिड़ तम भानुहि । दनुज गहन घन दहन कृसानुहि ॥
जनकसुता समेत रघुबीरहि । कस न भजहु भंजन भव भीरहि ॥
बहु बासना मसक हिम रासिहि । सदा एकरस अज अबिनासिहि ॥
मुनि रंजन भंजन महि भारहि । तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि ॥
॥ दोहा ॥
एहि बिधि नगर नारि नर करहिं राम गुन गान ।
सानुकूल सब पर रहहिं संतत कृपानिधान ॥30॥
॥ चौपाई ॥
जब ते राम प्रताप खगेसा । उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा ॥
पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका । बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका ॥
जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी । प्रथम अबिद्या निसा नसानी ॥
अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने । काम क्रोध कैरव सकुचाने ॥
बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ । ए चकोर सुख लहहिं न काऊ ॥
मत्सर मान मोह मद चोरा । इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा ॥
धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना । ए पंकज बिकसे बिधि नाना ॥
सुख संतोष बिराग बिबेका । बिगत सोक ए कोक अनेका ॥
॥ दोहा ॥
यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास ।
पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास ॥31॥
॥ चौपाई ॥
भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा । संग परम प्रिय पवनकुमारा ॥
सुंदर उपबन देखन गए । सब तरु कुसुमित पल्लव नए ॥
जानि समय सनकादिक आए । तेज पुंज गुन सील सुहाए ॥
ब्रह्मानंद सदा लयलीना । देखत बालक बहुकालीना ॥
रूप धरें जनु चारिउ बेदा । समदरसी मुनि बिगत बिभेदा ॥
आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं । रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं ॥
तहाँ रहे सनकादि भवानी । जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी ॥
राम कथा मुनिबर बहु बरनी । ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी ॥
॥ दोहा ॥
देखि राम मुनि आवत हरषि दंडवत कीन्ह ।
स्वागत पूँछि पीत पट प्रभु बैठन कहँ दीन्ह ॥32॥
॥ चौपाई ॥
कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई । सहित पवनसुत सुख अधिकाई ॥
मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी । भए मगन मन सके न रोकी ॥
स्यामल गात सरोरुह लोचन । सुंदरता मंदिर भव मोचन ॥
एकटक रहे निमेष न लावहिं । प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं ॥
तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा । स्त्रवत नयन जल पुलक सरीरा ॥
कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे । परम मनोहर बचन उचारे ॥
आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा । तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा ॥
बड़े भाग पाइब सतसंगा । बिनहिं प्रयास होहिं भव भंगा ॥
॥ दोहा ॥
दो0-संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ ।
कहहि संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ ॥33 ॥
॥ चौपाई ॥
सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी । पुलकित तन अस्तुति अनुसारी ॥
जय भगवंत अनंत अनामय । अनघ अनेक एक करुनामय ॥
जय निर्गुन जय जय गुन सागर । सुख मंदिर सुंदर अति नागर ॥
जय इंदिरा रमन जय भूधर । अनुपम अज अनादि सोभाकर ॥
ग्यान निधान अमान मानप्रद । पावन सुजस पुरान बेद बद ॥
तग्य कृतग्य अग्यता भंजन । नाम अनेक अनाम निरंजन ॥
सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय । बससि सदा हम कहुँ परिपालय ॥
द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय । ह्रदि बसि राम काम मद गंजय ॥
॥ दोहा ॥
परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम ।
प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम ॥34॥
॥ चौपाई ॥
देहु भगति रघुपति अति पावनि । त्रिबिध ताप भव दाप नसावनि ॥
प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु । होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु ॥
भव बारिधि कुंभज रघुनायक । सेवत सुलभ सकल सुख दायक ॥
मन संभव दारुन दुख दारय । दीनबंधु समता बिस्तारय ॥
आस त्रास इरिषादि निवारक । बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक ॥
भूप मौलि मन मंडन धरनी । देहि भगति संसृति सरि तरनी ॥
मुनि मन मानस हंस निरंतर । चरन कमल बंदित अज संकर ॥
रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक । काल करम सुभाउ गुन भच्छक ॥
तारन तरन हरन सब दूषन । तुलसिदास प्रभु त्रिभुवन भूषन ॥
॥ दोहा ॥
बार बार अस्तुति करि प्रेम सहित सिरु नाइ ।
ब्रह्म भवन सनकादि गे अति अभीष्ट बर पाइ ॥35॥
॥ चौपाई ॥
सनकादिक बिधि लोक सिधाए । भ्रातन्ह राम चरन सिरु नाए ॥
पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं । चितवहिं सब मारुतसुत पाहीं ॥
सुनि चहहिं प्रभु मुख कै बानी । जो सुनि होइ सकल भ्रम हानी ॥
अंतरजामी प्रभु सभ जाना । बूझत कहहु काह हनुमाना ॥
जोरि पानि कह तब हनुमंता । सुनहु दीनदयाल भगवंता ॥
नाथ भरत कछु पूँछन चहहीं । प्रस्न करत मन सकुचत अहहीं ॥
तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ । भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ ॥
सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना । सुनहु नाथ प्रनतारति हरना ॥
॥ दोहा ॥
नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहुँ सोक न मोह ।
केवल कृपा तुम्हारिहि कृपानंद संदोह ॥36॥
॥ चौपाई ॥
करउँ कृपानिधि एक ढिठाई । मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई ॥
संतन्ह कै महिमा रघुराई । बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई ॥
श्रीमुख तुम्ह पुनि कीन्हि बड़ाई । तिन्ह पर प्रभुहि प्रीति अधिकाई ॥
सुना चहउँ प्रभु तिन्ह कर लच्छन । कृपासिंधु गुन ग्यान बिचच्छन ॥
संत असंत भेद बिलगाई । प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई ॥
संतन्ह के लच्छन सुनु भ्राता । अगनित श्रुति पुरान बिख्याता ॥
संत असंतन्हि कै असि करनी । जिमि कुठार चंदन आचरनी ॥
काटइ परसु मलय सुनु भाई । निज गुन देइ सुगंध बसाई ॥
॥ दोहा ॥
ताते सुर सीसन्ह चढ़त जग बल्लभ श्रीखंड ।
अनल दाहि पीटत घनहिं परसु बदन यह दंड ॥37॥
॥ चौपाई ॥
बिषय अलंपट सील गुनाकर । पर दुख दुख सुख सुख देखे पर ॥
सम अभूतरिपु बिमद बिरागी । लोभामरष हरष भय त्यागी ॥
कोमलचित दीनन्ह पर दाया । मन बच क्रम मम भगति अमाया ॥
सबहि मानप्रद आपु अमानी । भरत प्रान सम मम ते प्रानी ॥
बिगत काम मम नाम परायन । सांति बिरति बिनती मुदितायन ॥
सीतलता सरलता मयत्री । द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री ॥
ए सब लच्छन बसहिं जासु उर । जानेहु तात संत संतत फुर ॥
सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं । परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं ॥
॥ दोहा ॥
निंदा अस्तुति उभय सम ममता मम पद कंज ।
ते सज्जन मम प्रानप्रिय गुन मंदिर सुख पुंज ॥38॥
॥ चौपाई ॥
सनहु असंतन्ह केर सुभाऊ । भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ ॥
तिन्ह कर संग सदा दुखदाई । जिमि कलपहि घालइ हरहाई ॥
खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी । जरहिं सदा पर संपति देखी ॥
जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई । हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई ॥
काम क्रोध मद लोभ परायन । निर्दय कपटी कुटिल मलायन ॥
बयरु अकारन सब काहू सों । जो कर हित अनहित ताहू सों ॥
झूठइ लेना झूठइ देना । झूठइ भोजन झूठ चबेना ॥
बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा । खाइ महा अति हृदय कठोरा ॥
॥ दोहा ॥
पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद ।
ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद ॥39॥
॥ चौपाई ॥
लोभइ ओढ़न लोभइ डासन । सिस्त्रोदर पर जमपुर त्रास न ॥
काहू की जौं सुनहिं बड़ाई । स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई ॥
जब काहू कै देखहिं बिपती । सुखी भए मानहुँ जग नृपती ॥
स्वारथ रत परिवार बिरोधी । लंपट काम लोभ अति क्रोधी ॥
मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं । आपु गए अरु घालहिं आनहिं ॥
करहिं मोह बस द्रोह परावा । संत संग हरि कथा न भावा ॥
अवगुन सिंधु मंदमति कामी । बेद बिदूषक परधन स्वामी ॥
बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा । दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा ॥
॥ दोहा ॥
ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेता नाहिं ।
द्वापर कछुक बृंद बहु होइहहिं कलिजुग माहिं ॥40॥
॥ चौपाई ॥
पर हित सरिस धर्म नहिं भाई । पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ॥
निर्नय सकल पुरान बेद कर । कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर ॥
नर सरीर धरि जे पर पीरा । करहिं ते सहहिं महा भव भीरा ॥
करहिं मोह बस नर अघ नाना । स्वारथ रत परलोक नसाना ॥
कालरूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता । सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता ॥
अस बिचारि जे परम सयाने । भजहिं मोहि संसृत दुख जाने ॥
त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक । भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक ॥
संत असंतन्ह के गुन भाषे । ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे ॥
॥ दोहा ॥
सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक ।
गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक ॥41॥
॥ चौपाई ॥
श्रीमुख बचन सुनत सब भाई । हरषे प्रेम न हृदयँ समाई ॥
करहिं बिनय अति बारहिं बारा । हनूमान हियँ हरष अपारा ॥
पुनि रघुपति निज मंदिर गए । एहि बिधि चरित करत नित नए ॥
बार बार नारद मुनि आवहिं । चरित पुनीत राम के गावहिं ॥
नित नव चरन देखि मुनि जाहीं । ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं ॥
सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं । पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं ॥
सनकादिक नारदहि सराहहिं । जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहहिं ॥
सुनि गुन गान समाधि बिसारी ॥ सादर सुनहिं परम अधिकारी ॥
॥ दोहा ॥
जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान ।
जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान ॥42॥
॥ चौपाई ॥
एक बार रघुनाथ बोलाए । गुर द्विज पुरबासी सब आए ॥
बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन । बोले बचन भगत भव भंजन ॥
सनहु सकल पुरजन मम बानी । कहउँ न कछु ममता उर आनी ॥
नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई । सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई ॥
सोइ सेवक प्रियतम मम सोई । मम अनुसासन मानै जोई ॥
जौं अनीति कछु भाषौं भाई । तौं मोहि बरजहु भय बिसराई ॥
बड़ें भाग मानुष तनु पावा । सुर दुर्लभ सब ग्रंथिन्ह गावा ॥
साधन धाम मोच्छ कर द्वारा । पाइ न जेहिं परलोक सँवारा ॥
॥ दोहा ॥
सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ ।
कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाइ ॥43॥
॥ चौपाई ॥
एहि तन कर फल बिषय न भाई । स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई ॥
नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं । पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं ॥
ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई । गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई ॥
आकर चारि लच्छ चौरासी । जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी ॥
फिरत सदा माया कर प्रेरा । काल कर्म सुभाव गुन घेरा ॥
कबहुँक करि करुना नर देही । देत ईस बिनु हेतु सनेही ॥
नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो । सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो ॥
करनधार सदगुर दृढ़ नावा । दुर्लभ साज सुलभ करि पावा ॥
॥ दोहा ॥
जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ ।
सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ ॥44॥
॥ चौपाई ॥
जौं परलोक इहाँ सुख चहहू । सुनि मम बचन ह्रृदयँ दृढ़ गहहू ॥
सुलभ सुखद मारग यह भाई । भगति मोरि पुरान श्रुति गाई ॥
ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका । साधन कठिन न मन कहुँ टेका ॥
करत कष्ट बहु पावइ कोऊ । भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ ॥
भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी । बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी ॥
पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता । सतसंगति संसृति कर अंता ॥
पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा । मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा ॥
सानुकूल तेहि पर मुनि देवा । जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा ॥
॥ दोहा ॥
औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि ।
संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि ॥45॥
॥ चौपाई ॥
कहहु भगति पथ कवन प्रयासा । जोग न मख जप तप उपवासा ॥
सरल सुभाव न मन कुटिलाई । जथा लाभ संतोष सदाई ॥
मोर दास कहाइ नर आसा । करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा ॥
बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई । एहि आचरन बस्य मैं भाई ॥
बैर न बिग्रह आस न त्रासा । सुखमय ताहि सदा सब आसा ॥
अनारंभ अनिकेत अमानी । अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी ॥
प्रीति सदा सज्जन संसर्गा । तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा ॥
भगति पच्छ हठ नहिं सठताई । दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई ॥
॥ दोहा ॥
मम गुन ग्राम नाम रत गत ममता मद मोह ।
ता कर सुख सोइ जानइ परानंद संदोह ॥46॥
सुनत सुधासम बचन राम के । गहे सबनि पद कृपाधाम के ॥
जननि जनक गुर बंधु हमारे । कृपा निधान प्रान ते प्यारे ॥
तनु धनु धाम राम हितकारी । सब बिधि तुम्ह प्रनतारति हारी ॥
असि सिख तुम्ह बिनु देइ न कोऊ । मातु पिता स्वारथ रत ओऊ ॥
हेतु रहित जग जुग उपकारी । तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी ॥
स्वारथ मीत सकल जग माहीं । सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं ॥
सबके बचन प्रेम रस साने । सुनि रघुनाथ हृदयँ हरषाने ॥
निज निज गृह गए आयसु पाई । बरनत प्रभु बतकही सुहाई ॥
॥ दोहा ॥
उमा अवधबासी नर नारि कृतारथ रूप ।
ब्रह्म सच्चिदानंद घन रघुनायक जहँ भूप ॥47॥
॥ दोहा ॥
एक बार बसिष्ट मुनि आए । जहाँ राम सुखधाम सुहाए ॥
अति आदर रघुनायक कीन्हा । पद पखारि पादोदक लीन्हा ॥
राम सुनहु मुनि कह कर जोरी । कृपासिंधु बिनती कछु मोरी ॥
देखि देखि आचरन तुम्हारा । होत मोह मम हृदयँ अपारा ॥
महिमा अमित बेद नहिं जाना । मैं केहि भाँति कहउँ भगवाना ॥
उपरोहित्य कर्म अति मंदा । बेद पुरान सुमृति कर निंदा ॥
जब न लेउँ मैं तब बिधि मोही । कहा लाभ आगें सुत तोही ॥
परमातमा ब्रह्म नर रूपा । होइहि रघुकुल भूषन भूपा ॥
॥ दोहा ॥
तब मैं हृदयँ बिचारा जोग जग्य ब्रत दान ।
जा कहुँ करिअ सो पैहउँ धर्म न एहि सम आन ॥48॥
॥ चौपाई ॥
जप तप नियम जोग निज धर्मा । श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा ॥
ग्यान दया दम तीरथ मज्जन । जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन ॥
आगम निगम पुरान अनेका । पढ़े सुने कर फल प्रभु एका ॥
तब पद पंकज प्रीति निरंतर । सब साधन कर यह फल सुंदर ॥
छूटइ मल कि मलहि के धोएँ । घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ ॥
प्रेम भगति जल बिनु रघुराई । अभिअंतर मल कबहुँ न जाई ॥
सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित । सोइ गुन गृह बिग्यान अखंडित ॥
दच्छ सकल लच्छन जुत सोई । जाकें पद सरोज रति होई ॥
॥ दोहा ॥
नाथ एक बर मागउँ राम कृपा करि देहु ।
जन्म जन्म प्रभु पद कमल कबहुँ घटै जनि नेहु ॥49॥
॥ चौपाई ॥
अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए । कृपासिंधु के मन अति भाए ॥
हनूमान भरतादिक भ्राता । संग लिए सेवक सुखदाता ॥
पुनि कृपाल पुर बाहेर गए । गज रथ तुरग मगावत भए ॥
देखि कृपा करि सकल सराहे । दिए उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे ॥
हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई । गए जहाँ सीतल अवँराई ॥
भरत दीन्ह निज बसन डसाई । बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई ॥
मारुतसुत तब मारूत करई । पुलक बपुष लोचन जल भरई ॥
हनूमान सम नहिं बड़भागी । नहिं कोउ राम चरन अनुरागी ॥
गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई । बार बार प्रभु निज मुख गाई ॥
॥ दोहा ॥
तेहिं अवसर मुनि नारद आए करतल बीन ।
गावन लगे राम कल कीरति सदा नबीन ॥50॥
॥ चौपाई ॥
मामवलोकय पंकज लोचन । कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन ॥
नील तामरस स्याम काम अरि । हृदय कंज मकरंद मधुप हरि ॥
जातुधान बरूथ बल भंजन । मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन ॥
भूसुर ससि नव बृंद बलाहक । असरन सरन दीन जन गाहक ॥
भुज बल बिपुल भार महि खंडित । खर दूषन बिराध बध पंडित ॥
रावनारि सुखरूप भूपबर । जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर ॥
सुजस पुरान बिदित निगमागम । गावत सुर मुनि संत समागम ॥
कारुनीक ब्यलीक मद खंडन । सब बिधि कुसल कोसला मंडन ॥
कलि मल मथन नाम ममताहन । तुलसीदास प्रभु पाहि प्रनत जन ॥
॥ चौपाई ॥
प्रेम सहित मुनि नारद बरनि राम गुन ग्राम ।
सोभासिंधु हृदयँ धरि गए जहाँ बिधि धाम ॥51॥
॥ चौपाई ॥
गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा । मैं सब कही मोरि मति जथा ॥
राम चरित सत कोटि अपारा । श्रुति सारदा न बरनै पारा ॥
राम अनंत अनंत गुनानी । जन्म कर्म अनंत नामानी ॥
जल सीकर महि रज गनि जाहीं । रघुपति चरित न बरनि सिराहीं ॥
बिमल कथा हरि पद दायनी । भगति होइ सुनि अनपायनी ॥
उमा कहिउँ सब कथा सुहाई । जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई ॥
कछुक राम गुन कहेउँ बखानी । अब का कहौं सो कहहु भवानी ॥
सुनि सुभ कथा उमा हरषानी । बोली अति बिनीत मृदु बानी ॥
धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी । सुनेउँ राम गुन भव भय हारी ॥
॥ दोहा ॥
तुम्हरी कृपाँ कृपायतन अब कृतकृत्य न मोह ।
जानेउँ राम प्रताप प्रभु चिदानंद संदोह ॥52(क)॥
नाथ तवानन ससि स्रवत कथा सुधा रघुबीर ।
श्रवन पुटन्हि मन पान करि नहिं अघात मतिधीर ॥52(ख)॥
॥ चौपाई ॥
राम चरित जे सुनत अघाहीं । रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं ॥
जीवनमुक्त महामुनि जेऊ । हरि गुन सुनहीं निरंतर तेऊ ॥
भव सागर चह पार जो पावा । राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा ॥
बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा । श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा ॥
श्रवनवंत अस को जग माहीं । जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं ॥
ते जड़ जीव निजात्मक घाती । जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती ॥
हरिचरित्र मानस तुम्ह गावा । सुनि मैं नाथ अमिति सुख पावा ॥
तुम्ह जो कही यह कथा सुहाई । कागभसुंडि गरुड़ प्रति गाई ॥
॥ दोहा ॥
बिरति ग्यान बिग्यान दृढ़ राम चरन अति नेह ।
बायस तन रघुपति भगति मोहि परम संदेह ॥53॥
॥ चौपाई ॥
नर सहस्त्र महँ सुनहु पुरारी । कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी ॥
धर्मसील कोटिक महँ कोई । बिषय बिमुख बिराग रत होई ॥
कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई । सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई ॥
ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ । जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ ॥
तिन्ह सहस्त्र महुँ सब सुख खानी । दुर्लभ ब्रह्मलीन बिग्यानी ॥
धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी । जीवनमुक्त ब्रह्मपर प्रानी ॥
सब ते सो दुर्लभ सुरराया । राम भगति रत गत मद माया ॥
सो हरिभगति काग किमि पाई । बिस्वनाथ मोहि कहहु बुझाई ॥
॥ दोहा ॥
राम परायन ग्यान रत गुनागार मति धीर ।
नाथ कहहु केहि कारन पायउ काक सरीर ॥54॥
॥ चौपाई ॥
यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा । कहहु कृपाल काग कहँ पावा ॥
तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी । कहहु मोहि अति कौतुक भारी ॥
गरुड़ महाग्यानी गुन रासी । हरि सेवक अति निकट निवासी ॥
तेहिं केहि हेतु काग सन जाई । सुनी कथा मुनि निकर बिहाई ॥
कहहु कवन बिधि भा संबादा । दोउ हरिभगत काग उरगादा ॥
गौरि गिरा सुनि सरल सुहाई । बोले सिव सादर सुख पाई ॥
धन्य सती पावन मति तोरी । रघुपति चरन प्रीति नहिं थोरी ॥
सुनहु परम पुनीत इतिहासा । जो सुनि सकल लोक भ्रम नासा ॥
उपजइ राम चरन बिस्वासा । भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा ॥
॥ दोहा ॥
ऐसिअ प्रस्न बिहंगपति कीन्ह काग सन जाइ ।
सो सब सादर कहिहउँ सुनहु उमा मन लाइ ॥55॥
॥ चौपाई ॥
मैं जिमि कथा सुनी भव मोचनि । सो प्रसंग सुनु सुमुखि सुलोचनि ॥
प्रथम दच्छ गृह तव अवतारा । सती नाम तब रहा तुम्हारा ॥
दच्छ जग्य तब भा अपमाना । तुम्ह अति क्रोध तजे तब प्राना ॥
मम अनुचरन्ह कीन्ह मख भंगा । जानहु तुम्ह सो सकल प्रसंगा ॥
तब अति सोच भयउ मन मोरें । दुखी भयउँ बियोग प्रिय तोरें ॥
सुंदर बन गिरि सरित तड़ागा । कौतुक देखत फिरउँ बेरागा ॥
गिरि सुमेर उत्तर दिसि दूरी । नील सैल एक सुन्दर भूरी ॥
तासु कनकमय सिखर सुहाए । चारि चारु मोरे मन भाए ॥
तिन्ह पर एक एक बिटप बिसाला । बट पीपर पाकरी रसाला ॥
सैलोपरि सर सुंदर सोहा । मनि सोपान देखि मन मोहा ॥
॥ दोहा ॥
सीतल अमल मधुर जल जलज बिपुल बहुरंग ।
कूजत कल रव हंस गन गुंजत मजुंल भृंग ॥56॥
॥ चौपाई ॥
तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई । तासु नास कल्पांत न होई ॥
माया कृत गुन दोष अनेका । मोह मनोज आदि अबिबेका ॥
रहे ब्यापि समस्त जग माहीं । तेहि गिरि निकट कबहुँ नहिं जाहीं ॥
तहँ बसि हरिहि भजइ जिमि कागा । सो सुनु उमा सहित अनुरागा ॥
पीपर तरु तर ध्यान सो धरई । जाप जग्य पाकरि तर करई ॥
आँब छाहँ कर मानस पूजा । तजि हरि भजनु काजु नहिं दूजा ॥
बर तर कह हरि कथा प्रसंगा । आवहिं सुनहिं अनेक बिहंगा ॥
राम चरित बिचीत्र बिधि नाना । प्रेम सहित कर सादर गाना ॥
सुनहिं सकल मति बिमल मराला । बसहिं निरंतर जे तेहिं ताला ॥
जब मैं जाइ सो कौतुक देखा । उर उपजा आनंद बिसेषा ॥
॥ दोहा ॥
तब कछु काल मराल तनु धरि तहँ कीन्ह निवास ।
सादर सुनि रघुपति गुन पुनि आयउँ कैलास ॥57॥
॥ चौपाई ॥
गिरिजा कहेउँ सो सब इतिहासा । मैं जेहि समय गयउँ खग पासा ॥
अब सो कथा सुनहु जेही हेतू । गयउ काग पहिं खग कुल केतू ॥
जब रघुनाथ कीन्हि रन क्रीड़ा । समुझत चरित होति मोहि ब्रीड़ा ॥
इंद्रजीत कर आपु बँधायो । तब नारद मुनि गरुड़ पठायो ॥
बंधन काटि गयो उरगादा । उपजा हृदयँ प्रचंड बिषादा ॥
प्रभु बंधन समुझत बहु भाँती । करत बिचार उरग आराती ॥
ब्यापक ब्रह्म बिरज बागीसा । माया मोह पार परमीसा ॥
सो अवतार सुनेउँ जग माहीं । देखेउँ सो प्रभाव कछु नाहीं ॥
॥ दोहा ॥
भव बंधन ते छूटहिं नर जपि जा कर नाम ।
खर्च निसाचर बाँधेउ नागपास सोइ राम ॥58॥
॥ चौपाई ॥
नाना भाँति मनहि समुझावा । प्रगट न ग्यान हृदयँ भ्रम छावा ॥
खेद खिन्न मन तर्क बढ़ाई । भयउ मोहबस तुम्हरिहिं नाई ॥
ब्याकुल गयउ देवरिषि पाहीं । कहेसि जो संसय निज मन माहीं ॥
सुनि नारदहि लागि अति दाया । सुनु खग प्रबल राम कै माया ॥
जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरई । बरिआई बिमोह मन करई ॥
जेहिं बहु बार नचावा मोही । सोइ ब्यापी बिहंगपति तोही ॥
महामोह उपजा उर तोरें । मिटिहि न बेगि कहें खग मोरें ॥
चतुरानन पहिं जाहु खगेसा । सोइ करेहु जेहि होइ निदेसा ॥
॥ दोहा ॥
अस कहि चले देवरिषि करत राम गुन गान ।
हरि माया बल बरनत पुनि पुनि परम सुजान ॥59॥
॥ चौपाई ॥
तब खगपति बिरंचि पहिं गयऊ । निज संदेह सुनावत भयऊ ॥
सुनि बिरंचि रामहि सिरु नावा । समुझि प्रताप प्रेम अति छावा ॥
मन महुँ करइ बिचार बिधाता । माया बस कबि कोबिद ग्याता ॥
हरि माया कर अमिति प्रभावा । बिपुल बार जेहिं मोहि नचावा ॥
अग जगमय जग मम उपराजा । नहिं आचरज मोह खगराजा ॥
तब बोले बिधि गिरा सुहाई । जान महेस राम प्रभुताई ॥
बैनतेय संकर पहिं जाहू । तात अनत पूछहु जनि काहू ॥
तहँ होइहि तव संसय हानी । चलेउ बिहंग सुनत बिधि बानी ॥
॥ दोहा ॥
परमातुर बिहंगपति आयउ तब मो पास ।
जात रहेउँ कुबेर गृह रहिहु उमा कैलास ॥60॥
॥ चौपाई ॥
तेहिं मम पद सादर सिरु नावा । पुनि आपन संदेह सुनावा ॥
सुनि ता करि बिनती मृदु बानी । परेम सहित मैं कहेउँ भवानी ॥
मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही । कवन भाँति समुझावौं तोही ॥
तबहि होइ सब संसय भंगा । जब बहु काल करिअ सतसंगा ॥
सुनिअ तहाँ हरि कथा सुहाई । नाना भाँति मुनिन्ह जो गाई ॥
जेहि महुँ आदि मध्य अवसाना । प्रभु प्रतिपाद्य राम भगवाना ॥
नित हरि कथा होत जहँ भाई । पठवउँ तहाँ सुनहि तुम्ह जाई ॥
जाइहि सुनत सकल संदेहा । राम चरन होइहि अति नेहा ॥
॥ दोहा ॥
बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग ।
मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग ॥61॥
॥ चौपाई ॥
मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा । किएँ जोग तप ग्यान बिरागा ॥
उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला । तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला ॥
राम भगति पथ परम प्रबीना । ग्यानी गुन गृह बहु कालीना ॥
राम कथा सो कहइ निरंतर । सादर सुनहिं बिबिध बिहंगबर ॥
जाइ सुनहु तहँ हरि गुन भूरी । होइहि मोह जनित दुख दूरी ॥
मैं जब तेहि सब कहा बुझाई । चलेउ हरषि मम पद सिरु नाई ॥
ताते उमा न मैं समुझावा । रघुपति कृपाँ मरमु मैं पावा ॥
होइहि कीन्ह कबहुँ अभिमाना । सो खौवै चह कृपानिधाना ॥
कछु तेहि ते पुनि मैं नहिं राखा । समुझइ खग खगही कै भाषा ॥
प्रभु माया बलवंत भवानी । जाहि न मोह कवन अस ग्यानी ॥
॥ दोहा ॥
ग्यानि भगत सिरोमनि त्रिभुवनपति कर जान ।
ताहि मोह माया नर पावँर करहिं गुमान ॥62(क)॥
मासपारायण, अट्ठाईसवाँ विश्राम
॥ दोहा ॥
सिव बिरंचि कहुँ मोहइ को है बपुरा आन ।
अस जियँ जानि भजहिं मुनि माया पति भगवान ॥62(ख)॥
॥ चौपाई ॥
गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा । मति अकुंठ हरि भगति अखंडा ॥
देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ । माया मोह सोच सब गयऊ ॥
करि तड़ाग मज्जन जलपाना । बट तर गयउ हृदयँ हरषाना ॥
बृद्ध बृद्ध बिहंग तहँ आए । सुनै राम के चरित सुहाए ॥
कथा अरंभ करै सोइ चाहा । तेही समय गयउ खगनाहा ॥
आवत देखि सकल खगराजा । हरषेउ बायस सहित समाजा ॥
अति आदर खगपति कर कीन्हा । स्वागत पूछि सुआसन दीन्हा ॥
करि पूजा समेत अनुरागा । मधुर बचन तब बोलेउ कागा ॥
॥ दोहा ॥
नाथ कृतारथ भयउँ मैं तव दरसन खगराज ।
आयसु देहु सो करौं अब प्रभु आयहु केहि काज ॥63(क)॥
सदा कृतारथ रूप तुम्ह कह मृदु बचन खगेस ।
जेहि कै अस्तुति सादर निज मुख कीन्हि महेस ॥63(ख)॥
॥ चौपाई ॥
सुनहु तात जेहि कारन आयउँ । सो सब भयउ दरस तव पायउँ ॥
देखि परम पावन तव आश्रम । गयउ मोह संसय नाना भ्रम ॥
अब श्रीराम कथा अति पावनि । सदा सुखद दुख पुंज नसावनि ॥
सादर तात सुनावहु मोही । बार बार बिनवउँ प्रभु तोही ॥
सुनत गरुड़ कै गिरा बिनीता । सरल सुप्रेम सुखद सुपुनीता ॥
भयउ तासु मन परम उछाहा । लाग कहै रघुपति गुन गाहा ॥
प्रथमहिं अति अनुराग भवानी । रामचरित सर कहेसि बखानी ॥
पुनि नारद कर मोह अपारा । कहेसि बहुरि रावन अवतारा ॥
प्रभु अवतार कथा पुनि गाई । तब सिसु चरित कहेसि मन लाई ॥
॥ दोहा ॥
बालचरित कहिं बिबिध बिधि मन महँ परम उछाह ।
रिषि आगवन कहेसि पुनि श्री रघुबीर बिबाह ॥64॥
॥ चौपाई ॥
बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा । पुनि नृप बचन राज रस भंगा ॥
पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा । कहेसि राम लछिमन संबादा ॥
बिपिन गवन केवट अनुरागा । सुरसरि उतरि निवास प्रयागा ॥
बालमीक प्रभु मिलन बखाना । चित्रकूट जिमि बसे भगवाना ॥
सचिवागवन नगर नृप मरना । भरतागवन प्रेम बहु बरना ॥
करि नृप क्रिया संग पुरबासी । भरत गए जहँ प्रभु सुख रासी ॥
पुनि रघुपति बहु बिधि समुझाए । लै पादुका अवधपुर आए ॥
भरत रहनि सुरपति सुत करनी । प्रभु अरु अत्रि भेंट पुनि बरनी ॥
॥ दोहा ॥
कहि बिराध बध जेहि बिधि देह तजी सरभंग ॥
बरनि सुतीछन प्रीति पुनि प्रभु अगस्ति सतसंग ॥65॥
॥ चौपाई ॥
कहि दंडक बन पावनताई । गीध मइत्री पुनि तेहिं गाई ॥
पुनि प्रभु पंचवटीं कृत बासा । भंजी सकल मुनिन्ह की त्रासा ॥
पुनि लछिमन उपदेस अनूपा । सूपनखा जिमि कीन्हि कुरूपा ॥
खर दूषन बध बहुरि बखाना । जिमि सब मरमु दसानन जाना ॥
दसकंधर मारीच बतकहीं । जेहि बिधि भई सो सब तेहिं कही ॥
पुनि माया सीता कर हरना । श्रीरघुबीर बिरह कछु बरना ॥
पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्ही । बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही ॥
बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा । जेहि बिधि गए सरोबर तीरा ॥
॥ दोहा ॥
प्रभु नारद संबाद कहि मारुति मिलन प्रसंग ।
पुनि सुग्रीव मिताई बालि प्रान कर भंग ॥66((क)॥
कपिहि तिलक करि प्रभु कृत सैल प्रबरषन बास ।
बरनन बर्षा सरद अरु राम रोष कपि त्रास ॥66(ख)॥
॥ चौपाई ॥
जेहि बिधि कपिपति कीस पठाए । सीता खोज सकल दिसि धाए ॥
बिबर प्रबेस कीन्ह जेहि भाँती । कपिन्ह बहोरि मिला संपाती ॥
सुनि सब कथा समीरकुमारा । नाघत भयउ पयोधि अपारा ॥
लंकाँ कपि प्रबेस जिमि कीन्हा । पुनि सीतहि धीरजु जिमि दीन्हा ॥
बन उजारि रावनहि प्रबोधी । पुर दहि नाघेउ बहुरि पयोधी ॥
आए कपि सब जहँ रघुराई । बैदेही कि कुसल सुनाई ॥
सेन समेति जथा रघुबीरा । उतरे जाइ बारिनिधि तीरा ॥
मिला बिभीषन जेहि बिधि आई । सागर निग्रह कथा सुनाई ॥
॥ दोहा ॥
सेतु बाँधि कपि सेन जिमि उतरी सागर पार ।
गयउ बसीठी बीरबर जेहि बिधि बालिकुमार ॥67(क)॥
निसिचर कीस लराई बरनिसि बिबिध प्रकार ।
कुंभकरन घननाद कर बल पौरुष संघार ॥67(ख)॥
॥ चौपाई ॥
निसिचर निकर मरन बिधि नाना । रघुपति रावन समर बखाना ॥
रावन बध मंदोदरि सोका । राज बिभीषण देव असोका ॥
सीता रघुपति मिलन बहोरी । सुरन्ह कीन्ह अस्तुति कर जोरी ॥
पुनि पुष्पक चढ़ि कपिन्ह समेता । अवध चले प्रभु कृपा निकेता ॥
जेहि बिधि राम नगर निज आए । बायस बिसद चरित सब गाए ॥
कहेसि बहोरि राम अभिषैका । पुर बरनत नृपनीति अनेका ॥
कथा समस्त भुसुंड बखानी । जो मैं तुम्ह सन कही भवानी ॥
सुनि सब राम कथा खगनाहा । कहत बचन मन परम उछाहा ॥
॥ सोरठा ॥
गयउ मोर संदेह सुनेउँ सकल रघुपति चरित ।
भयउ राम पद नेह तव प्रसाद बायस तिलक ॥68(क)॥
मोहि भयउ अति मोह प्रभु बंधन रन महुँ निरखि ।
चिदानंद संदोह राम बिकल कारन कवन ॥68(ख)॥
॥ चौपाई ॥
देखि चरित अति नर अनुसारी । भयउ हृदयँ मम संसय भारी ॥
सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना । कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना ॥
जो अति आतप ब्याकुल होई । तरु छाया सुख जानइ सोई ॥
जौं नहिं होत मोह अति मोही । मिलतेउँ तात कवन बिधि तोही ॥
सुनतेउँ किमि हरि कथा सुहाई । अति बिचित्र बहु बिधि तुम्ह गाई ॥
निगमागम पुरान मत एहा । कहहिं सिद्ध मुनि नहिं संदेहा ॥
संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही । चितवहिं राम कृपा करि जेही ॥
राम कृपाँ तव दरसन भयऊ । तव प्रसाद सब संसय गयऊ ॥
॥ दोहा ॥
सुनि बिहंगपति बानी सहित बिनय अनुराग ।
पुलक गात लोचन सजल मन हरषेउ अति काग ॥69(क)॥
श्रोता सुमति सुसील सुचि कथा रसिक हरि दास ।
पाइ उमा अति गोप्यमपि सज्जन करहिं प्रकास ॥69(ख)॥
॥ चौपाई ॥
बोलेउ काकभसुंड बहोरी । नभग नाथ पर प्रीति न थोरी ॥
सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे । कृपापात्र रघुनायक केरे ॥
तुम्हहि न संसय मोह न माया । मो पर नाथ कीन्ह तुम्ह दाया ॥
पठइ मोह मिस खगपति तोही । रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही ॥
तुम्ह निज मोह कही खग साईं । सो नहिं कछु आचरज गोसाईं ॥
नारद भव बिरंचि सनकादी । जे मुनिनायक आतमबादी ॥
मोह न अंध कीन्ह केहि केही । को जग काम नचाव न जेही ॥
तृस्नाँ केहि न कीन्ह बौराहा । केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा ॥
॥ दोहा ॥
ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार ।
केहि कै लौभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार ॥70(क)॥
श्री मद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि ।
मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि ॥70(ख)॥
॥ चौपाई ॥
गुन कृत सन्यपात नहिं केही । कोउ न मान मद तजेउ निबेही ॥
जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा । ममता केहि कर जस न नसावा ॥
मच्छर काहि कलंक न लावा । काहि न सोक समीर डोलावा ॥
चिंता साँपिनि को नहिं खाया । को जग जाहि न ब्यापी माया ॥
कीट मनोरथ दारु सरीरा । जेहि न लाग घुन को अस धीरा ॥
सुत बित लोक ईषना तीनी । केहि के मति इन्ह कृत न मलीनी ॥
यह सब माया कर परिवारा । प्रबल अमिति को बरनै पारा ॥
सिव चतुरानन जाहि डेराहीं । अपर जीव केहि लेखे माहीं ॥
॥ दोहा ॥
ब्यापि रहेउ संसार महुँ माया कटक प्रचंड ॥
सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड ॥71(क)॥
सो दासी रघुबीर कै समुझें मिथ्या सोपि ।
छूट न राम कृपा बिनु नाथ कहउँ पद रोपि ॥71(ख)॥
॥ चौपाई ॥
जो माया सब जगहि नचावा । जासु चरित लखि काहुँ न पावा ॥
सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा । नाच नटी इव सहित समाजा ॥
सोइ सच्चिदानंद घन रामा । अज बिग्यान रूपो बल धामा ॥
ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता । अखिल अमोघसक्ति भगवंता ॥
अगुन अदभ्र गिरा गोतीता । सबदरसी अनवद्य अजीता ॥
निर्मम निराकार निरमोहा । नित्य निरंजन सुख संदोहा ॥
प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी । ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी ॥
इहाँ मोह कर कारन नाहीं । रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं ॥
॥ दोहा ॥
भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप ।
किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप ॥72(क)॥
जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ ।
सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ ॥72(ख)॥
॥ चौपाई ॥
असि रघुपति लीला उरगारी । दनुज बिमोहनि जन सुखकारी ॥
जे मति मलिन बिषयबस कामी । प्रभु मोह धरहिं इमि स्वामी ॥
नयन दोष जा कहँ जब होई । पीत बरन ससि कहुँ कह सोई ॥
जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा । सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा ॥
नौकारूढ़ चलत जग देखा । अचल मोह बस आपुहि लेखा ॥
बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादीं । कहहिं परस्पर मिथ्याबादी ॥
हरि बिषइक अस मोह बिहंगा । सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा ॥
मायाबस मतिमंद अभागी । हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी ॥
ते सठ हठ बस संसय करहीं । निज अग्यान राम पर धरहीं ॥
॥ दोहा ॥
काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप ।
ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप ॥73(क)॥
निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ ।
सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ ॥73(ख)॥
॥ चौपाई ॥
सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई । कहउँ जथामति कथा सुहाई ॥
जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही । सोउ सब कथा सुनावउँ तोही ॥
राम कृपा भाजन तुम्ह ताता । हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता ॥
ताते नहिं कछु तुम्हहिं दुरावउँ । परम रहस्य मनोहर गावउँ ॥
सुनहु राम कर सहज सुभाऊ । जन अभिमान न राखहिं काऊ ॥
संसृत मूल सूलप्रद नाना । सकल सोक दायक अभिमाना ॥
ताते करहिं कृपानिधि दूरी । सेवक पर ममता अति भूरी ॥
जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाई । मातु चिराव कठिन की नाईं ॥
॥ दोहा ॥
जदपि प्रथम दुख पावइ रोवइ बाल अधीर ।
ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर ॥74(क)॥
तिमि रघुपति निज दासकर हरहिं मान हित लागि ।
तुलसिदास ऐसे प्रभुहि कस न भजहु भ्रम त्यागि ॥74(ख)॥
॥ चौपाई ॥
राम कृपा आपनि जड़ताई । कहउँ खगेस सुनहु मन लाई ॥
जब जब राम मनुज तनु धरहीं । भक्त हेतु लील बहु करहीं ॥
तब तब अवधपुरी मैं ज़ाऊँ । बालचरित बिलोकि हरषाऊँ ॥
जन्म महोत्सव देखउँ जाई । बरष पाँच तहँ रहउँ लोभाई ॥
इष्टदेव मम बालक रामा । सोभा बपुष कोटि सत कामा ॥
निज प्रभु बदन निहारि निहारी । लोचन सुफल करउँ उरगारी ॥
लघु बायस बपु धरि हरि संगा । देखउँ बालचरित बहुरंगा ॥
॥ दोहा ॥
लरिकाईं जहँ जहँ फिरहिं तहँ तहँ संग उड़ाउँ ।
जूठनि परइ अजिर महँ सो उठाइ करि खाउँ ॥75(क)॥
एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर ।
सुमिरत प्रभु लीला सोइ पुलकित भयउ सरीर ॥75(ख)॥
॥ दोहा ॥
कहइ भसुंड सुनहु खगनायक । रामचरित सेवक सुखदायक ॥
नृपमंदिर सुंदर सब भाँती । खचित कनक मनि नाना जाती ॥
बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई । जहँ खेलहिं नित चारिउ भाई ॥
बालबिनोद करत रघुराई । बिचरत अजिर जननि सुखदाई ॥
मरकत मृदुल कलेवर स्यामा । अंग अंग प्रति छबि बहु कामा ॥
नव राजीव अरुन मृदु चरना । पदज रुचिर नख ससि दुति हरना ॥
ललित अंक कुलिसादिक चारी । नूपुर चारू मधुर रवकारी ॥
चारु पुरट मनि रचित बनाई । कटि किंकिन कल मुखर सुहाई ॥
॥ दोहा ॥
रेखा त्रय सुन्दर उदर नाभी रुचिर गँभीर ।
उर आयत भ्राजत बिबिध बाल बिभूषन चीर ॥76 ॥
॥ चौपाई ॥
अरुन पानि नख करज मनोहर । बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर ॥
कंध बाल केहरि दर ग्रीवा । चारु चिबुक आनन छबि सींवा ॥
कलबल बचन अधर अरुनारे । दुइ दुइ दसन बिसद बर बारे ॥
ललित कपोल मनोहर नासा । सकल सुखद ससि कर सम हासा ॥
नील कंज लोचन भव मोचन । भ्राजत भाल तिलक गोरोचन ॥
बिकट भृकुटि सम श्रवन सुहाए । कुंचित कच मेचक छबि छाए ॥
पीत झीनि झगुली तन सोही । किलकनि चितवनि भावति मोही ॥
रूप रासि नृप अजिर बिहारी । नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी ॥
मोहि सन करहीं बिबिध बिधि क्रीड़ा । बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा ॥
किलकत मोहि धरन जब धावहिं । चलउँ भागि तब पूप देखावहिं ॥
॥ दोहा ॥
आवत निकट हँसहिं प्रभु भाजत रुदन कराहिं ।
जाउँ समीप गहन पद फिरि फिरि चितइ पराहिं ॥77(क)॥
प्राकृत सिसु इव लीला देखि भयउ मोहि मोह ।
कवन चरित्र करत प्रभु चिदानंद संदोह ॥77(ख)॥
॥ चौपाई ॥
एतना मन आनत खगराया । रघुपति प्रेरित ब्यापी माया ॥
सो माया न दुखद मोहि काहीं । आन जीव इव संसृत नाहीं ॥
नाथ इहाँ कछु कारन आना । सुनहु सो सावधान हरिजाना ॥
ग्यान अखंड एक सीताबर । माया बस्य जीव सचराचर ॥
जौं सब कें रह ग्यान एकरस । ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस ॥
माया बस्य जीव अभिमानी । ईस बस्य माया गुनखानी ॥
परबस जीव स्वबस भगवंता । जीव अनेक एक श्रीकंता ॥
मुधा भेद जद्यपि कृत माया । बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया ॥
॥ दोहा ॥
रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान ।
ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान ॥78(क)॥
राकापति षोड़स उअहिं तारागन समुदाइ ॥
सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ ॥78(ख)॥
॥ चौपाई ॥
ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा । मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा ॥
हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या । प्रभु प्रेरित ब्यापइ तेहि बिद्या ॥
ताते नास न होइ दास कर । भेद भगति भाढ़इ बिहंगबर ॥
भ्रम ते चकित राम मोहि देखा । बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा ॥
तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ । जाना अनुज न मातु पिताहूँ ॥
जानु पानि धाए मोहि धरना । स्यामल गात अरुन कर चरना ॥
तब मैं भागि चलेउँ उरगामी । राम गहन कहँ भुजा पसारी ॥
जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा । तहँ भुज हरि देखउँ निज पासा ॥
॥ दोहा ॥
ब्रह्मलोक लगि गयउँ मैं चितयउँ पाछ उड़ात ।
जुग अंगुल कर बीच सब राम भुजहि मोहि तात ॥79(क)॥
सप्ताबरन भेद करि जहाँ लगें गति मोरि ।
गयउँ तहाँ प्रभु भुज निरखि ब्याकुल भयउँ बहोरि ॥79(ख)॥
॥ दोहा ॥
॥ चौपाई ॥
मूदेउँ नयन त्रसित जब भयउँ । पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ ॥
मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं । बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं ॥
उदर माझ सुनु अंडज राया । देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया ॥
अति बिचित्र तहँ लोक अनेका । रचना अधिक एक ते एका ॥
कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा । अगनित उडगन रबि रजनीसा ॥
अगनित लोकपाल जम काला । अगनित भूधर भूमि बिसाला ॥
सागर सरि सर बिपिन अपारा । नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा ॥
सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर । चारि प्रकार जीव सचराचर ॥
॥ दोहा ॥
जो नहिं देखा नहिं सुना जो मनहूँ न समाइ ।
सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि बिधि जाइ ॥80(क)॥
एक एक ब्रह्मांड महुँ रहउँ बरष सत एक ।
एहि बिधि देखत फिरउँ मैं अंड कटाह अनेक ॥80(ख)॥
एहि बिधि देखत फिरउँ मैं अंड कटाह अनेक ॥80(ख)॥
॥ दोहा ॥
लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता । भिन्न बिष्नु सिव मनु दिसित्राता ॥
नर गंधर्ब भूत बेताला । किंनर निसिचर पसु खग ब्याला ॥
देव दनुज गन नाना जाती । सकल जीव तहँ आनहि भाँती ॥
महि सरि सागर सर गिरि नाना । सब प्रपंच तहँ आनइ आना ॥
अंडकोस प्रति प्रति निज रुपा । देखेउँ जिनस अनेक अनूपा ॥
अवधपुरी प्रति भुवन निनारी । सरजू भिन्न भिन्न नर नारी ॥
दसरथ कौसल्या सुनु ताता । बिबिध रूप भरतादिक भ्राता ॥
प्रति ब्रह्मांड राम अवतारा । देखउँ बालबिनोद अपारा ॥
॥ दोहा ॥
भिन्न भिन्न मै दीख सबु अति बिचित्र हरिजान ।
अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन ॥81(क)॥
सोइ सिसुपन सोइ सोभा सोइ कृपाल रघुबीर ।
भुवन भुवन देखत फिरउँ प्रेरित मोह समीर ॥81(ख)
॥ चौपाई ॥
भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका । बीते मनहुँ कल्प सत एका ॥
फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ । तहँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ ॥
निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ । निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ ॥
देखउँ जन्म महोत्सव जाई । जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई ॥
राम उदर देखेउँ जग नाना । देखत बनइ न जाइ बखाना ॥
तहँ पुनि देखेउँ राम सुजाना । माया पति कृपाल भगवाना ॥
करउँ बिचार बहोरि बहोरी । मोह कलिल ब्यापित मति मोरी ॥
उभय घरी महँ मैं सब देखा । भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा ॥
॥ दोहा ॥
देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब रघुबीर ।
बिहँसतहीं मुख बाहेर आयउँ सुनु मतिधीर ॥82(क)॥
सोइ लरिकाई मो सन करन लगे पुनि राम ।
कोटि भाँति समुझावउँ मनु न लहइ बिश्राम ॥82(ख)॥
॥ दोहा ॥
देखि चरित यह सो प्रभुताई । समुझत देह दसा बिसराई ॥
धरनि परेउँ मुख आव न बाता । त्राहि त्राहि आरत जन त्राता ॥
प्रेमाकुल प्रभु मोहि बिलोकी । निज माया प्रभुता तब रोकी ॥
कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ । दीनदयाल सकल दुख हरेऊ ॥
कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा । सेवक सुखद कृपा संदोहा ॥
प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी । मन महँ होइ हरष अति भारी ॥
भगत बछलता प्रभु कै देखी । उपजी मम उर प्रीति बिसेषी ॥
सजल नयन पुलकित कर जोरी । कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बहोरी ॥
॥ दोहा ॥
सुनि सप्रेम मम बानी देखि दीन निज दास ।
बचन सुखद गंभीर मृदु बोले रमानिवास ॥83(क)॥
काकभसुंडि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि ।
अनिमादिक सिधि अपर रिधि मोच्छ सकल सुख खानि ॥83(ख)॥
॥ चौपाई ॥
ग्यान बिबेक बिरति बिग्याना । मुनि दुर्लभ गुन जे जग नाना ॥
आजु देउँ सब संसय नाहीं । मागु जो तोहि भाव मन माहीं ॥
सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउँ । मन अनुमान करन तब लागेऊँ ॥
प्रभु कह देन सकल सुख सही । भगति आपनी देन न कही ॥
भगति हीन गुन सब सुख ऐसे । लवन बिना बहु बिंजन जैसे ॥
भजन हीन सुख कवने काजा । अस बिचारि बोलेउँ खगराजा ॥
जौं प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू । मो पर करहु कृपा अरु नेहू ॥
मन भावत बर मागउँ स्वामी । तुम्ह उदार उर अंतरजामी ॥
॥ दोहा ॥
अबिरल भगति बिसुध्द तव श्रुति पुरान जो गाव ।
जेहि खोजत जोगीस मुनि प्रभु प्रसाद कोउ पाव ॥84(क)॥
भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिंधु सुख धाम ।
सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम ॥84(ख)॥
॥ चौपाई ॥
एवमस्तु कहि रघुकुलनायक । बोले बचन परम सुखदायक ॥
सुनु बायस तैं सहज सयाना । काहे न मागसि अस बरदाना ॥
सब सुख खानि भगति तैं मागी । नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी ॥
जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं । जे जप जोग अनल तन दहहीं ॥
रीझेउँ देखि तोरि चतुराई । मागेहु भगति मोहि अति भाई ॥
सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें । सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें ॥
भगति ग्यान बिग्यान बिरागा । जोग चरित्र रहस्य बिभागा ॥
जानब तैं सबही कर भेदा । मम प्रसाद नहिं साधन खेदा ॥
॥ दोहा ॥
माया संभव भ्रम सब अब न ब्यापिहहिं तोहि ।
जानेसु ब्रह्म अनादि अज अगुन गुनाकर मोहि ॥85(क)॥
मोहि भगत प्रिय संतत अस बिचारि सुनु काग ।
कायँ बचन मन मम पद करेसु अचल अनुराग ॥85(ख)॥
॥ चौपाई ॥
अब सुनु परम बिमल मम बानी । सत्य सुगम निगमादि बखानी ॥
निज सिद्धांत सुनावउँ तोही । सुनु मन धरु सब तजि भजु मोही ॥
मम माया संभव संसारा । जीव चराचर बिबिधि प्रकारा ॥
सब मम प्रिय सब मम उपजाए । सब ते अधिक मनुज मोहि भाए ॥
तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी । तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी ॥
तिन्ह महँ प्रिय बिरक्त पुनि ग्यानी । ग्यानिहु ते अति प्रिय बिग्यानी ॥
तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा । जेहि गति मोरि न दूसरि आसा ॥
पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं । मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं ॥
भगति हीन बिरंचि किन होई । सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई ॥
भगतिवंत अति नीचउ प्रानी । मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी ॥
॥ दोहा ॥
सुचि सुसील सेवक सुमति प्रिय कहु काहि न लाग ।
श्रुति पुरान कह नीति असि सावधान सुनु काग ॥86॥
॥ चौपाई ॥
एक पिता के बिपुल कुमारा । होहिं पृथक गुन सील अचारा ॥
कोउ पंडिंत कोउ तापस ग्याता । कोउ धनवंत सूर कोउ दाता ॥
कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई । सब पर पितहि प्रीति सम होई ॥
कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा । सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा ॥
सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना । जद्यपि सो सब भाँति अयाना ॥
एहि बिधि जीव चराचर जेते । त्रिजग देव नर असुर समेते ॥
अखिल बिस्व यह मोर उपाया । सब पर मोहि बराबरि दाया ॥
तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया । भजै मोहि मन बच अरू काया ॥
॥ दोहा ॥
पुरूष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ ।
सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ ॥87(क)॥
सत्य कहउँ खग तोहि सुचि सेवक मम प्रानप्रिय ।
अस बिचारि भजु मोहि परिहरि आस भरोस सब ॥87(ख)॥
॥ चौपाई ॥
कबहूँ काल न ब्यापिहि तोही । सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोही ॥
प्रभु बचनामृत सुनि न अघाऊँ । तनु पुलकित मन अति हरषाऊँ ॥
सो सुख जानइ मन अरु काना । नहिं रसना पहिं जाइ बखाना ॥
प्रभु सोभा सुख जानहिं नयना । कहि किमि सकहिं तिन्हहि नहिं बयना ॥
बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई । लगे करन सिसु कौतुक तेई ॥
सजल नयन कछु मुख करि रूखा । चितइ मातु लागी अति भूखा ॥
देखि मातु आतुर उठि धाई । कहि मृदु बचन लिए उर लाई ॥
गोद राखि कराव पय पाना । रघुपति चरित ललित कर गाना ॥
॥ दोहा ॥
सो0-जेहि सुख लागि पुरारि असुभ बेष कृत सिव सुखद ।
अवधपुरी नर नारि तेहि सुख महुँ संतत मगन ॥88(क)॥
॥ सोरठा ॥
सोइ सुख लवलेस जिन्ह बारक सपनेहुँ लहेउ ।
ते नहिं गनहिं खगेस ब्रह्मसुखहि सज्जन सुमति ॥88(ख)॥
॥ दोहा ॥
॥ चौपाई ॥
मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला । देखेउँ बालबिनोद रसाला ॥
राम प्रसाद भगति बर पायउँ । प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ ॥
तब ते मोहि न ब्यापी माया । जब ते रघुनायक अपनाया ॥
यह सब गुप्त चरित मैं गावा । हरि मायाँ जिमि मोहि नचावा ॥
निज अनुभव अब कहउँ खगेसा । बिनु हरि भजन न जाहि कलेसा ॥
राम कृपा बिनु सुनु खगराई । जानि न जाइ राम प्रभुताई ॥
जानें बिनु न होइ परतीती । बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती ॥
प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई । जिमि खगपति जल कै चिकनाई ॥
॥ सोरठा ॥
बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु ।
गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु ॥89(क)॥
कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु ।
चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ ॥89(ख)॥
॥ चौपाई ॥
बिनु संतोष न काम नसाहीं । काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं ॥
राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा । थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा ॥
बिनु बिग्यान कि समता आवइ । कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ ॥
श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई । बिनु महि गंध कि पावइ कोई ॥
बिनु तप तेज कि कर बिस्तारा । जल बिनु रस कि होइ संसारा ॥
सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई । जिमि बिनु तेज न रूप गोसाई ॥
निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा । परस कि होइ बिहीन समीरा ॥
कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा । बिनु हरि भजन न भव भय नासा ॥
॥ दोहा ॥
बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु ।
राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु ॥90(क)॥
सो0-अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल ।
भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद ॥90(ख)॥
॥ चौपाई ॥
निज मति सरिस नाथ मैं गाई । प्रभु प्रताप महिमा खगराई ॥
कहेउँ न कछु करि जुगुति बिसेषी । यह सब मैं निज नयनन्हि देखी ॥
महिमा नाम रूप गुन गाथा । सकल अमित अनंत रघुनाथा ॥
निज निज मति मुनि हरि गुन गावहिं । निगम सेष सिव पार न पावहिं ॥
तुम्हहि आदि खग मसक प्रजंता । नभ उड़ाहिं नहिं पावहिं अंता ॥
तिमि रघुपति महिमा अवगाहा । तात कबहुँ कोउ पाव कि थाहा ॥
रामु काम सत कोटि सुभग तन । दुर्गा कोटि अमित अरि मर्दन ॥
सक्र कोटि सत सरिस बिलासा । नभ सत कोटि अमित अवकासा ॥
॥ दोहा ॥
मरुत कोटि सत बिपुल बल रबि सत कोटि प्रकास ।
ससि सत कोटि सुसीतल समन सकल भव त्रास ॥91(क)॥
काल कोटि सत सरिस अति दुस्तर दुर्ग दुरंत ।
धूमकेतु सत कोटि सम दुराधरष भगवंत ॥91(ख)॥
॥ चौपाई ॥
प्रभु अगाध सत कोटि पताला । समन कोटि सत सरिस कराला ॥
तीरथ अमित कोटि सम पावन । नाम अखिल अघ पूग नसावन ॥
हिमगिरि कोटि अचल रघुबीरा । सिंधु कोटि सत सम गंभीरा ॥
कामधेनु सत कोटि समाना । सकल काम दायक भगवाना ॥
सारद कोटि अमित चतुराई । बिधि सत कोटि सृष्टि निपुनाई ॥
बिष्नु कोटि सम पालन कर्ता । रुद्र कोटि सत सम संहर्ता ॥
धनद कोटि सत सम धनवाना । माया कोटि प्रपंच निधाना ॥
भार धरन सत कोटि अहीसा । निरवधि निरुपम प्रभु जगदीसा ॥
छं0-निरुपम न उपमा आन राम समान रामु निगम कहै ।
जिमि कोटि सत खद्योत सम रबि कहत अति लघुता लहै ॥
एहि भाँति निज निज मति बिलास मुनिस हरिहि बखानहीं ।
प्रभु भाव गाहक अति कृपाल सप्रेम सुनि सुख मानहीं ॥
॥ चौपाई ॥
रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोइ ।
संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ ॥92(क)॥
सो0-भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन ।
तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीता रवन ॥92(ख)॥
॥ चौपाई ॥
सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए । हरषित खगपति पंख फुलाए ॥
नयन नीर मन अति हरषाना । श्रीरघुपति प्रताप उर आना ॥
पाछिल मोह समुझि पछिताना । ब्रह्म अनादि मनुज करि माना ॥
पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा । जानि राम सम प्रेम बढ़ावा ॥
गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई । जौं बिरंचि संकर सम होई ॥
संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता । दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता ॥
तव सरूप गारुड़ि रघुनायक । मोहि जिआयउ जन सुखदायक ॥
तव प्रसाद मम मोह नसाना । राम रहस्य अनूपम जाना ॥
॥ दोहा ॥
ताहि प्रसंसि बिबिध बिधि सीस नाइ कर जोरि ।
बचन बिनीत सप्रेम मृदु बोलेउ गरुड़ बहोरि ॥93(क)॥
प्रभु अपने अबिबेक ते बूझउँ स्वामी तोहि ।
कृपासिंधु सादर कहहु जानि दास निज मोहि ॥93(ख)॥
॥ चौपाई ॥
तुम्ह सर्बग्य तन्य तम पारा । सुमति सुसील सरल आचारा ॥
ग्यान बिरति बिग्यान निवासा । रघुनायक के तुम्ह प्रिय दासा ॥
कारन कवन देह यह पाई । तात सकल मोहि कहहु बुझाई ॥
राम चरित सर सुंदर स्वामी । पायहु कहाँ कहहु नभगामी ॥
नाथ सुना मैं अस सिव पाहीं । महा प्रलयहुँ नास तव नाहीं ॥
मुधा बचन नहिं ईस्वर कहई । सोउ मोरें मन संसय अहई ॥
अग जग जीव नाग नर देवा । नाथ सकल जगु काल कलेवा ॥
अंड कटाह अमित लय कारी । कालु सदा दुरतिक्रम भारी ॥
॥ सोरठा ॥
तुम्हहि न ब्यापत काल अति कराल कारन कवन ।
मोहि सो कहहु कृपाल ग्यान प्रभाव कि जोग बल ॥94(क)॥
॥ दोहा ॥
प्रभु तव आश्रम आएँ मोर मोह भ्रम भाग ।
कारन कवन सो नाथ सब कहहु सहित अनुराग ॥94(ख)॥
॥ चौपाई ॥
गरुड़ गिरा सुनि हरषेउ कागा । बोलेउ उमा परम अनुरागा ॥
धन्य धन्य तव मति उरगारी । प्रस्न तुम्हारि मोहि अति प्यारी ॥
सुनि तव प्रस्न सप्रेम सुहाई । बहुत जनम कै सुधि मोहि आई ॥
सब निज कथा कहउँ मैं गाई । तात सुनहु सादर मन लाई ॥
जप तप मख सम दम ब्रत दाना । बिरति बिबेक जोग बिग्याना ॥
सब कर फल रघुपति पद प्रेमा । तेहि बिनु कोउ न पावइ छेमा ॥
एहि तन राम भगति मैं पाई । ताते मोहि ममता अधिकाई ॥
जेहि तें कछु निज स्वारथ होई । तेहि पर ममता कर सब कोई ॥
॥ सोरठा ॥
पन्नगारि असि नीति श्रुति संमत सज्जन कहहिं ।
अति नीचहु सन प्रीति करिअ जानि निज परम हित ॥95(क)॥
पाट कीट तें होइ तेहि तें पाटंबर रुचिर ।
कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम ॥95(ख)॥
॥ चौपाई ॥
स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा । मन क्रम बचन राम पद नेहा ॥
सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा । जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा ॥
राम बिमुख लहि बिधि सम देही । कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही ॥
राम भगति एहिं तन उर जामी । ताते मोहि परम प्रिय स्वामी ॥
तजउँ न तन निज इच्छा मरना । तन बिनु बेद भजन नहिं बरना ॥
प्रथम मोहँ मोहि बहुत बिगोवा । राम बिमुख सुख कबहुँ न सोवा ॥
नाना जनम कर्म पुनि नाना । किए जोग जप तप मख दाना ॥
कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं । मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं ॥
देखेउँ करि सब करम गोसाई । सुखी न भयउँ अबहिं की नाई ॥
सुधि मोहि नाथ जन्म बहु केरी । सिव प्रसाद मति मोहँ न घेरी ॥
॥ दोहा ॥
प्रथम जन्म के चरित अब कहउँ सुनहु बिहगेस ।
सुनि प्रभु पद रति उपजइ जातें मिटहिं कलेस ॥96(क)॥
पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलिजुग मल मूल ॥
नर अरु नारि अधर्म रत सकल निगम प्रतिकूल ॥96(ख)॥
॥ चौपाई ॥
तेहि कलिजुग कोसलपुर जाई । जन्मत भयउँ सूद्र तनु पाई ॥
सिव सेवक मन क्रम अरु बानी । आन देव निंदक अभिमानी ॥
धन मद मत्त परम बाचाला । उग्रबुद्धि उर दंभ बिसाला ॥
जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी । तदपि न कछु महिमा तब जानी ॥
अब जाना मैं अवध प्रभावा । निगमागम पुरान अस गावा ॥
कवनेहुँ जन्म अवध बस जोई । राम परायन सो परि होई ॥
अवध प्रभाव जान तब प्रानी । जब उर बसहिं रामु धनुपानी ॥
सो कलिकाल कठिन उरगारी । पाप परायन सब नर नारी ॥
॥ दोहा ॥
कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भए सदग्रंथ ।
दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहु पंथ ॥97(क)॥
भए लोग सब मोहबस लोभ ग्रसे सुभ कर्म ।
सुनु हरिजान ग्यान निधि कहउँ कछुक कलिधर्म ॥97(ख)॥
॥ चौपाई ॥
बरन धर्म नहिं आश्रम चारी । श्रुति बिरोध रत सब नर नारी ॥
द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन । कोउ नहिं मान निगम अनुसासन ॥
मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा । पंडित सोइ जो गाल बजावा ॥
मिथ्यारंभ दंभ रत जोई । ता कहुँ संत कहइ सब कोई ॥
सोइ सयान जो परधन हारी । जो कर दंभ सो बड़ आचारी ॥
जौ कह झूँठ मसखरी जाना । कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना ॥
निराचार जो श्रुति पथ त्यागी । कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी ॥
जाकें नख अरु जटा बिसाला । सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला ॥
॥ दोहा ॥
असुभ बेष भूषन धरें भच्छाभच्छ जे खाहिं ।
तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग माहिं ॥98(क)॥
॥ सोरठा ॥
जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ ।
मन क्रम बचन लबार तेइ बकता कलिकाल महुँ ॥98(ख)॥
॥ चौपाई ॥
नारि बिबस नर सकल गोसाई । नाचहिं नट मर्कट की नाई ॥
सूद्र द्विजन्ह उपदेसहिं ग्याना । मेलि जनेऊ लेहिं कुदाना ॥
सब नर काम लोभ रत क्रोधी । देव बिप्र श्रुति संत बिरोधी ॥
गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी । भजहिं नारि पर पुरुष अभागी ॥
सौभागिनीं बिभूषन हीना । बिधवन्ह के सिंगार नबीना ॥
गुर सिष बधिर अंध का लेखा । एक न सुनइ एक नहिं देखा ॥
हरइ सिष्य धन सोक न हरई । सो गुर घोर नरक महुँ परई ॥
मातु पिता बालकन्हि बोलाबहिं । उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं ॥
॥ दोहा ॥
ब्रह्म ग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात ।
कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात ॥99(क)॥
बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि ।
जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि ॥99(ख)॥
॥ दोहा ॥
पर त्रिय लंपट कपट सयाने । मोह द्रोह ममता लपटाने ॥
तेइ अभेदबादी ग्यानी नर । देखा में चरित्र कलिजुग कर ॥
आपु गए अरु तिन्हहू घालहिं । जे कहुँ सत मारग प्रतिपालहिं ॥
कल्प कल्प भरि एक एक नरका । परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका ॥
जे बरनाधम तेलि कुम्हारा । स्वपच किरात कोल कलवारा ॥
नारि मुई गृह संपति नासी । मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी ॥
ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं । उभय लोक निज हाथ नसावहिं ॥
बिप्र निरच्छर लोलुप कामी । निराचार सठ बृषली स्वामी ॥
सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना । बैठि बरासन कहहिं पुराना ॥
सब नर कल्पित करहिं अचारा । जाइ न बरनि अनीति अपारा ॥
॥ दोहा ॥
भए बरन संकर कलि भिन्नसेतु सब लोग ।
करहिं पाप पावहिं दुख भय रुज सोक बियोग ॥100(क)॥
श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक ।
तेहि न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक ॥100(ख)॥
॥ छन्द ॥
बहु दाम सँवारहिं धाम जती । बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती ॥
तपसी धनवंत दरिद्र गृही । कलि कौतुक तात न जात कही ॥
कुलवंति निकारहिं नारि सती । गृह आनिहिं चेरी निबेरि गती ॥
सुत मानहिं मातु पिता तब लौं । अबलानन दीख नहीं जब लौं ॥
ससुरारि पिआरि लगी जब तें । रिपरूप कुटुंब भए तब तें ॥
नृप पाप परायन धर्म नहीं । करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं ॥
धनवंत कुलीन मलीन अपी । द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी ॥
नहिं मान पुरान न बेदहि जो । हरि सेवक संत सही कलि सो ।
कबि बृंद उदार दुनी न सुनी । गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी ॥
कलि बारहिं बार दुकाल परै । बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै ॥
॥ दोहा ॥
सुनु खगेस कलि कपट हठ दंभ द्वेष पाषंड ।
मान मोह मारादि मद ब्यापि रहे ब्रह्मंड ॥101(क)॥
तामस धर्म करहिं नर जप तप ब्रत मख दान ।
देव न बरषहिं धरनीं बए न जामहिं धान ॥101(ख)॥
॥ छन्द ॥
अबला कच भूषन भूरि छुधा । धनहीन दुखी ममता बहुधा ॥
सुख चाहहिं मूढ़ न धर्म रता । मति थोरि कठोरि न कोमलता ॥1॥
नर पीड़ित रोग न भोग कहीं । अभिमान बिरोध अकारनहीं ॥
लघु जीवन संबतु पंच दसा । कलपांत न नास गुमानु असा ॥2॥
कलिकाल बिहाल किए मनुजा । नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा ।
नहिं तोष बिचार न सीतलता । सब जाति कुजाति भए मगता ॥3॥
इरिषा परुषाच्छर लोलुपता । भरि पूरि रही समता बिगता ॥
सब लोग बियोग बिसोक हुए । बरनाश्रम धर्म अचार गए ॥4॥
दम दान दया नहिं जानपनी । जड़ता परबंचनताति घनी ॥
तनु पोषक नारि नरा सगरे । परनिंदक जे जग मो बगरे ॥5॥
॥ दोहा ॥
सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार ।
गुनउँ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार ॥102(क)॥
कृतजुग त्रेता द्वापर पूजा मख अरु जोग ।
जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग ॥102(ख)॥
॥ चौपाई ॥
कृतजुग सब जोगी बिग्यानी । करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी ॥
त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं । प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं ॥
द्वापर करि रघुपति पद पूजा । नर भव तरहिं उपाय न दूजा ॥
कलिजुग केवल हरि गुन गाहा । गावत नर पावहिं भव थाहा ॥
कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना । एक अधार राम गुन गाना ॥
सब भरोस तजि जो भज रामहि । प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि ॥
सोइ भव तर कछु संसय नाहीं । नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं ॥
कलि कर एक पुनीत प्रतापा । मानस पुन्य होहिं नहिं पापा ॥
॥ दोहा ॥
कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास ।
गाइ राम गुन गन बिमलँ भव तर बिनहिं प्रयास ॥103(क)॥
प्रगट चारि पद धर्म के कलिल महुँ एक प्रधान ।
जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान ॥103(ख)॥
॥ चौपाई ॥
नित जुग धर्म होहिं सब केरे । हृदयँ राम माया के प्रेरे ॥
सुद्ध सत्व समता बिग्याना । कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना ॥
सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा । सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा ॥
बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस । द्वापर धर्म हरष भय मानस ॥
तामस बहुत रजोगुन थोरा । कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा ॥
बुध जुग धर्म जानि मन माहीं । तजि अधर्म रति धर्म कराहीं ॥
काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही । रघुपति चरन प्रीति अति जाही ॥
नट कृत बिकट कपट खगराया । नट सेवकहि न ब्यापइ माया ॥
॥ दोहा ॥
हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं ।
भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहिं ॥104(क)॥
तेहि कलिकाल बरष बहु बसेउँ अवध बिहगेस ।
परेउ दुकाल बिपति बस तब मैं गयउँ बिदेस ॥104(ख)॥
॥ दोहा ॥
गयउँ उजेनी सुनु उरगारी । दीन मलीन दरिद्र दुखारी ॥
गएँ काल कछु संपति पाई । तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई ॥
बिप्र एक बैदिक सिव पूजा । करइ सदा तेहि काजु न दूजा ॥
परम साधु परमारथ बिंदक । संभु उपासक नहिं हरि निंदक ॥
तेहि सेवउँ मैं कपट समेता । द्विज दयाल अति नीति निकेता ॥
बाहिज नम्र देखि मोहि साईं । बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाईं ॥
संभु मंत्र मोहि द्विजबर दीन्हा । सुभ उपदेस बिबिध बिधि कीन्हा ॥
जपउँ मंत्र सिव मंदिर जाई । हृदयँ दंभ अहमिति अधिकाई ॥
॥ दोहा ॥
मैं खल मल संकुल मति नीच जाति बस मोह ।
हरि जन द्विज देखें जरउँ करउँ बिष्नु कर द्रोह ॥105(क)॥
॥ सोरठा ॥
गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम ।
मोहि उपजइ अति क्रोध दंभिहि नीति कि भावई ॥105(ख)॥
॥ चौपाई ॥
एक बार गुर लीन्ह बोलाई । मोहि नीति बहु भाँति सिखाई ॥
सिव सेवा कर फल सुत सोई । अबिरल भगति राम पद होई ॥
रामहि भजहिं तात सिव धाता । नर पावँर कै केतिक बाता ॥
जासु चरन अज सिव अनुरागी । तातु द्रोहँ सुख चहसि अभागी ॥
हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ । सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ ॥
अधम जाति मैं बिद्या पाएँ । भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ ॥
मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती । गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती ॥
अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा । पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा ॥
जेहि ते नीच बड़ाई पावा । सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा ॥
धूम अनल संभव सुनु भाई । तेहि बुझाव घन पदवी पाई ॥
रज मग परी निरादर रहई । सब कर पद प्रहार नित सहई ॥
मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई । पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई ॥
सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा । बुध नहिं करहिं अधम कर संगा ॥
कबि कोबिद गावहिं असि नीती । खल सन कलह न भल नहिं प्रीती ॥
उदासीन नित रहिअ गोसाईं । खल परिहरिअ स्वान की नाईं ॥
मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई । गुर हित कहइ न मोहि सोहाई ॥
॥ दोहा ॥
एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम ।
गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम ॥106(क)॥
सो दयाल नहिं कहेउ कछु उर न रोष लवलेस ।
अति अघ गुर अपमानता सहि नहिं सके महेस ॥106(ख)॥
॥ चौपाई ॥
मंदिर माझ भई नभ बानी । रे हतभाग्य अग्य अभिमानी ॥
जद्यपि तव गुर कें नहिं क्रोधा । अति कृपाल चित सम्यक बोधा ॥
तदपि साप सठ दैहउँ तोही । नीति बिरोध सोहाइ न मोही ॥
जौं नहिं दंड करौं खल तोरा । भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा ॥
जे सठ गुर सन इरिषा करहीं । रौरव नरक कोटि जुग परहीं ॥
त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा । अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा ॥
बैठ रहेसि अजगर इव पापी । सर्प होहि खल मल मति ब्यापी ॥
महा बिटप कोटर महुँ जाई ॥रहु अधमाधम अधगति पाई ॥
॥ दोहा ॥
हाहाकार कीन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप ॥
कंपित मोहि बिलोकि अति उर उपजा परिताप ॥107(क)॥
करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि ।
बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि ॥107(ख)॥
॥ चौपाई ॥
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं । विंभुं ब्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरींह । चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं ॥
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं । गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं ॥
करालं महाकाल कालं कृपालं । गुणागार संसारपारं नतोऽहं ॥
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं । मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं ॥
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा । लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा ॥
चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं । प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं ॥
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं । प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥
प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं । अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं ॥
त्रयःशूल निर्मूलनं शूलपाणिं । भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं ॥
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी । सदा सज्जनान्ददाता पुरारी ॥
चिदानंदसंदोह मोहापहारी । प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं । भजंतीह लोके परे वा नराणां ॥
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं । प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजां । नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं ॥
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं । प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो ॥
॥ दोहा ॥
श्लोक-रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥9॥
॥ चौपाई ॥
गयउँ उजेनी सुनु उरगारी । दीन मलीन दरिद्र दुखारी ॥
गएँ काल कछु संपति पाई । तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई ॥
बिप्र एक बैदिक सिव पूजा । करइ सदा तेहि काजु न दूजा ॥
परम साधु परमारथ बिंदक । संभु उपासक नहिं हरि निंदक ॥
तेहि सेवउँ मैं कपट समेता । द्विज दयाल अति नीति निकेता ॥
बाहिज नम्र देखि मोहि साईं । बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाईं ॥
संभु मंत्र मोहि द्विजबर दीन्हा । सुभ उपदेस बिबिध बिधि कीन्हा ॥
जपउँ मंत्र सिव मंदिर जाई । हृदयँ दंभ अहमिति अधिकाई ॥
॥ दोहा ॥
मैं खल मल संकुल मति नीच जाति बस मोह ।
हरि जन द्विज देखें जरउँ करउँ बिष्नु कर द्रोह ॥105(क)॥
॥ सोरठा ॥
गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम ।
मोहि उपजइ अति क्रोध दंभिहि नीति कि भावई ॥105(ख)॥
॥ चौपाई ॥
एक बार गुर लीन्ह बोलाई । मोहि नीति बहु भाँति सिखाई ॥
सिव सेवा कर फल सुत सोई । अबिरल भगति राम पद होई ॥
रामहि भजहिं तात सिव धाता । नर पावँर कै केतिक बाता ॥
जासु चरन अज सिव अनुरागी । तातु द्रोहँ सुख चहसि अभागी ॥
हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ । सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ ॥
अधम जाति मैं बिद्या पाएँ । भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ ॥
मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती । गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती ॥
अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा । पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा ॥
जेहि ते नीच बड़ाई पावा । सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा ॥
धूम अनल संभव सुनु भाई । तेहि बुझाव घन पदवी पाई ॥
रज मग परी निरादर रहई । सब कर पद प्रहार नित सहई ॥
मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई । पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई ॥
सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा । बुध नहिं करहिं अधम कर संगा ॥
कबि कोबिद गावहिं असि नीती । खल सन कलह न भल नहिं प्रीती ॥
उदासीन नित रहिअ गोसाईं । खल परिहरिअ स्वान की नाईं ॥
मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई । गुर हित कहइ न मोहि सोहाई ॥
॥ दोहा ॥
एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम ।
गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम ॥106(क)॥
सो दयाल नहिं कहेउ कछु उर न रोष लवलेस ।
अति अघ गुर अपमानता सहि नहिं सके महेस ॥106(ख)॥
॥ चौपाई ॥
मंदिर माझ भई नभ बानी । रे हतभाग्य अग्य अभिमानी ॥
जद्यपि तव गुर कें नहिं क्रोधा । अति कृपाल चित सम्यक बोधा ॥
तदपि साप सठ दैहउँ तोही । नीति बिरोध सोहाइ न मोही ॥
जौं नहिं दंड करौं खल तोरा । भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा ॥
जे सठ गुर सन इरिषा करहीं । रौरव नरक कोटि जुग परहीं ॥
त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा । अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा ॥
बैठ रहेसि अजगर इव पापी । सर्प होहि खल मल मति ब्यापी ॥
महा बिटप कोटर महुँ जाई ॥रहु अधमाधम अधगति पाई ॥
॥ दोहा ॥
हाहाकार कीन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप ॥
कंपित मोहि बिलोकि अति उर उपजा परिताप ॥107(क)॥
करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि ।
बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि ॥107(ख)॥
॥ चौपाई ॥
नमामीशमीशान निर्वाणरूपं । विंभुं ब्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं ।
निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरींह । चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं ॥
निराकारमोंकारमूलं तुरीयं । गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं ॥
करालं महाकाल कालं कृपालं । गुणागार संसारपारं नतोऽहं ॥
तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं । मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं ॥
स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा । लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा ॥
चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं । प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं ॥
मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं । प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥
प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं । अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं ॥
त्रयःशूल निर्मूलनं शूलपाणिं । भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं ॥
कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी । सदा सज्जनान्ददाता पुरारी ॥
चिदानंदसंदोह मोहापहारी । प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥
न यावद् उमानाथ पादारविन्दं । भजंतीह लोके परे वा नराणां ॥
न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं । प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥
न जानामि योगं जपं नैव पूजां । नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं ॥
जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं । प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो ॥
श्लोक-रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ।
ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥9॥
॥ दोहा ॥
सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि ब्रिप्र अनुरागु ।
पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु ॥108(क)॥
जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु ।
निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु ॥108(ख)॥
तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान ।
तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपा सिंधु भगवान ॥108(ग)॥
संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल ।
साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल ॥108(घ)॥
॥ चौपाई ॥
एहि कर होइ परम कल्याना । सोइ करहु अब कृपानिधाना ॥
बिप्रगिरा सुनि परहित सानी । एवमस्तु इति भइ नभबानी ॥
जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा । मैं पुनि दीन्ह कोप करि सापा ॥
तदपि तुम्हार साधुता देखी । करिहउँ एहि पर कृपा बिसेषी ॥
छमासील जे पर उपकारी । ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी ॥
मोर श्राप द्विज ब्यर्थ न जाइहि । जन्म सहस अवस्य यह पाइहि ॥
जनमत मरत दुसह दुख होई । अहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई ॥
कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना । सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना ॥
रघुपति पुरीं जन्म तब भयऊ । पुनि तैं मम सेवाँ मन दयऊ ॥
पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें । राम भगति उपजिहि उर तोरें ॥
सुनु मम बचन सत्य अब भाई । हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई ॥
अब जनि करहि बिप्र अपमाना । जानेहु संत अनंत समाना ॥
इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला । कालदंड हरि चक्र कराला ॥
जो इन्ह कर मारा नहिं मरई । बिप्रद्रोह पावक सो जरई ॥
अस बिबेक राखेहु मन माहीं । तुम्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं ॥
औरउ एक आसिषा मोरी । अप्रतिहत गति होइहि तोरी ॥
॥ चौपाई ॥
सुनि सिव बचन हरषि गुर एवमस्तु इति भाषि ।
मोहि प्रबोधि गयउ गृह संभु चरन उर राखि ॥109(क)॥
प्रेरित काल बिधि गिरि जाइ भयउँ मैं ब्याल ।
पुनि प्रयास बिनु सो तनु जजेउँ गएँ कछु काल ॥109(ख)॥
जोइ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास हरिजान ।
जिमि नूतन पट पहिरइ नर परिहरइ पुरान ॥109(ग)॥
सिवँ राखी श्रुति नीति अरु मैं नहिं पावा क्लेस ।
एहि बिधि धरेउँ बिबिध तनु ग्यान न गयउ खगेस ॥109(घ)॥
॥ चौपाई ॥
त्रिजग देव नर जोइ तनु धरउँ । तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ ॥
एक सूल मोहि बिसर न काऊ । गुर कर कोमल सील सुभाऊ ॥
चरम देह द्विज कै मैं पाई । सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई ॥
खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला । करउँ सकल रघुनायक लीला ॥
प्रौढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा । समझउँ सुनउँ गुनउँ नहिं भावा ॥
मन ते सकल बासना भागी । केवल राम चरन लय लागी ॥
कहु खगेस अस कवन अभागी । खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी ॥
प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई । हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई ॥
भए कालबस जब पितु माता । मैं बन गयउँ भजन जनत्राता ॥
जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ । आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ ॥
बूझत तिन्हहि राम गुन गाहा । कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा ॥
सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा । अब्याहत गति संभु प्रसादा ॥
छूटी त्रिबिध ईषना गाढ़ी । एक लालसा उर अति बाढ़ी ॥
राम चरन बारिज जब देखौं । तब निज जन्म सफल करि लेखौं ॥
जेहि पूँछउँ सोइ मुनि अस कहई । ईस्वर सर्ब भूतमय अहई ॥
निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई । सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई ॥
॥ दोहा ॥
गुर के बचन सुरति करि राम चरन मनु लाग ।
रघुपति जस गावत फिरउँ छन छन नव अनुराग ॥110(क)॥
मेरु सिखर बट छायाँ मुनि लोमस आसीन ।
देखि चरन सिरु नायउँ बचन कहेउँ अति दीन ॥110(ख)॥
सुनि मम बचन बिनीत मृदु मुनि कृपाल खगराज ।
मोहि सादर पूँछत भए द्विज आयहु केहि काज ॥110(ग)॥
तब मैं कहा कृपानिधि तुम्ह सर्बग्य सुजान ।
सगुन ब्रह्म अवराधन मोहि कहहु भगवान ॥110(घ)॥
॥ चौपाई ॥
तब मुनिष रघुपति गुन गाथा । कहे कछुक सादर खगनाथा ॥
ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानि । मोहि परम अधिकारी जानी ॥
लागे करन ब्रह्म उपदेसा । अज अद्वेत अगुन हृदयेसा ॥
अकल अनीह अनाम अरुपा । अनुभव गम्य अखंड अनूपा ॥
मन गोतीत अमल अबिनासी । निर्बिकार निरवधि सुख रासी ॥
सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा । बारि बीचि इव गावहि बेदा ॥
बिबिध भाँति मोहि मुनि समुझावा । निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा ॥
पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा । सगुन उपासन कहहु मुनीसा ॥
राम भगति जल मम मन मीना । किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना ॥
सोइ उपदेस कहहु करि दाया । निज नयनन्हि देखौं रघुराया ॥
भरि लोचन बिलोकि अवधेसा । तब सुनिहउँ निर्गुन उपदेसा ॥
मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा । खंडि सगुन मत अगुन निरूपा ॥
तब मैं निर्गुन मत कर दूरी । सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी ॥
उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा । मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा ॥
सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ । उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ ॥
अति संघरषन जौं कर कोई । अनल प्रगट चंदन ते होई ॥
॥ दोहा ॥
बारंबार सकोप मुनि करइ निरुपन ग्यान ।
मैं अपनें मन बैठ तब करउँ बिबिध अनुमान ॥111(क)॥
क्रोध कि द्वेतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान ।
मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि ईस समान ॥111(ख)॥
॥ चौपाई ॥
कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें । तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें ॥
परद्रोही की होहिं निसंका । कामी पुनि कि रहहिं अकलंका ॥
बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें । कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें ॥
काहू सुमति कि खल सँग जामी । सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी ॥
भव कि परहिं परमात्मा बिंदक । सुखी कि होहिं कबहुँ हरिनिंदक ॥
राजु कि रहइ नीति बिनु जानें । अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें ॥
पावन जस कि पुन्य बिनु होई । बिनु अघ अजस कि पावइ कोई ॥
लाभु कि किछु हरि भगति समाना । जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना ॥
हानि कि जग एहि सम किछु भाई । भजिअ न रामहि नर तनु पाई ॥
अघ कि पिसुनता सम कछु आना । धर्म कि दया सरिस हरिजाना ॥
एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ । मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ ॥
पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा । तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा ॥
मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि । उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि ॥
सत्य बचन बिस्वास न करही । बायस इव सबही ते डरही ॥
सठ स्वपच्छ तब हृदयँ बिसाला । सपदि होहि पच्छी चंडाला ॥
लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई । नहिं कछु भय न दीनता आई ॥
॥ दोहा ॥
तुरत भयउँ मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ ।
सुमिरि राम रघुबंस मनि हरषित चलेउँ उड़ाइ ॥112(क)॥
उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध ॥
निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध ॥112(ख)॥
॥ चौपाई ॥
सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन । उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन ॥
कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी । लीन्हि प्रेम परिच्छा मोरी ॥
मन बच क्रम मोहि निज जन जाना । मुनि मति पुनि फेरी भगवाना ॥
रिषि मम महत सीलता देखी । राम चरन बिस्वास बिसेषी ॥
अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई । सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई ॥
मम परितोष बिबिध बिधि कीन्हा । हरषित राममंत्र तब दीन्हा ॥
बालकरूप राम कर ध्याना । कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना ॥
सुंदर सुखद मिहि अति भावा । सो प्रथमहिं मैं तुम्हहि सुनावा ॥
मुनि मोहि कछुक काल तहँ राखा । रामचरितमानस तब भाषा ॥
सादर मोहि यह कथा सुनाई । पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई ॥
रामचरित सर गुप्त सुहावा । संभु प्रसाद तात मैं पावा ॥
तोहि निज भगत राम कर जानी । ताते मैं सब कहेउँ बखानी ॥
राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं । कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं ॥
मुनि मोहि बिबिध भाँति समुझावा । मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा ॥
निज कर कमल परसि मम सीसा । हरषित आसिष दीन्ह मुनीसा ॥
राम भगति अबिरल उर तोरें । बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें ॥
॥ दोहा ॥
सदा राम प्रिय होहु तुम्ह सुभ गुन भवन अमान ।
कामरूप इच्धामरन ग्यान बिराग निधान ॥113(क)॥
जेंहिं आश्रम तुम्ह बसब पुनि सुमिरत श्रीभगवंत ।
ब्यापिहि तहँ न अबिद्या जोजन एक प्रजंत ॥113(ख)॥
॥ चौपाई ॥
काल कर्म गुन दोष सुभाऊ । कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ ॥
राम रहस्य ललित बिधि नाना । गुप्त प्रगट इतिहास पुराना ॥
बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ । नित नव नेह राम पद होऊ ॥
जो इच्छा करिहहु मन माहीं । हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं ॥
सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा । ब्रह्मगिरा भइ गगन गँभीरा ॥
एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी । यह मम भगत कर्म मन बानी ॥
सुनि नभगिरा हरष मोहि भयऊ । प्रेम मगन सब संसय गयऊ ॥
करि बिनती मुनि आयसु पाई । पद सरोज पुनि पुनि सिरु नाई ॥
हरष सहित एहिं आश्रम आयउँ । प्रभु प्रसाद दुर्लभ बर पायउँ ॥
इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा । बीते कलप सात अरु बीसा ॥
करउँ सदा रघुपति गुन गाना । सादर सुनहिं बिहंग सुजाना ॥
जब जब अवधपुरीं रघुबीरा । धरहिं भगत हित मनुज सरीरा ॥
तब तब जाइ राम पुर रहऊँ । सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ ॥
पुनि उर राखि राम सिसुरूपा । निज आश्रम आवउँ खगभूपा ॥
कथा सकल मैं तुम्हहि सुनाई । काग देह जेहिं कारन पाई ॥
कहिउँ तात सब प्रस्न तुम्हारी । राम भगति महिमा अति भारी ॥
॥ दोहा ॥
ताते यह तन मोहि प्रिय भयउ राम पद नेह ।
निज प्रभु दरसन पायउँ गए सकल संदेह ॥114(क)॥
मासपारायण, उन्तीसवाँ विश्राम
॥ दोहा ॥
भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महारिषि साप ।
मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप ॥114(ख)॥
॥ चौपाई ॥
जे असि भगति जानि परिहरहीं । केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं ॥
ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी । खोजत आकु फिरहिं पय लागी ॥
सुनु खगेस हरि भगति बिहाई । जे सुख चाहहिं आन उपाई ॥
ते सठ महासिंधु बिनु तरनी । पैरि पार चाहहिं जड़ करनी ॥
सुनि भसुंडि के बचन भवानी । बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी ॥
तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं । संसय सोक मोह भ्रम नाहीं ॥
सुनेउँ पुनीत राम गुन ग्रामा । तुम्हरी कृपाँ लहेउँ बिश्रामा ॥
एक बात प्रभु पूँछउँ तोही । कहहु बुझाइ कृपानिधि मोही ॥
कहहिं संत मुनि बेद पुराना । नहिं कछु दुर्लभ ग्यान समाना ॥
सोइ मुनि तुम्ह सन कहेउ गोसाईं । नहिं आदरेहु भगति की नाईं ॥
ग्यानहि भगतिहि अंतर केता । सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता ॥
सुनि उरगारि बचन सुख माना । सादर बोलेउ काग सुजाना ॥
भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा । उभय हरहिं भव संभव खेदा ॥
नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर । सावधान सोउ सुनु बिहंगबर ॥
ग्यान बिराग जोग बिग्याना । ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना ॥
पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती । अबला अबल सहज जड़ जाती ॥
॥ दोहा ॥
पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर ॥
न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर ॥115(क)॥
सो0-सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि ।
बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट ॥115(ख)॥
॥ चौपाई ॥
इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ । बेद पुरान संत मत भाषउँ ॥
मोह न नारि नारि कें रूपा । पन्नगारि यह रीति अनूपा ॥
माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ । नारि बर्ग जानइ सब कोऊ ॥
पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी । माया खलु नर्तकी बिचारी ॥
भगतिहि सानुकूल रघुराया । ताते तेहि डरपति अति माया ॥
राम भगति निरुपम निरुपाधी । बसइ जासु उर सदा अबाधी ॥
तेहि बिलोकि माया सकुचाई । करि न सकइ कछु निज प्रभुताई ॥
अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी । जाचहीं भगति सकल सुख खानी ॥
॥ दोहा ॥
यह रहस्य रघुनाथ कर बेगि न जानइ कोइ ।
जो जानइ रघुपति कृपाँ सपनेहुँ मोह न होइ ॥116(क)॥
औरउ ग्यान भगति कर भेद सुनहु सुप्रबीन ।
जो सुनि होइ राम पद प्रीति सदा अबिछीन ॥116(ख)॥
॥ चौपाई ॥
सुनहु तात यह अकथ कहानी । समुझत बनइ न जाइ बखानी ॥
ईस्वर अंस जीव अबिनासी । चेतन अमल सहज सुख रासी ॥
सो मायाबस भयउ गोसाईं । बँध्यो कीर मरकट की नाई ॥
जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई । जदपि मृषा छूटत कठिनई ॥
तब ते जीव भयउ संसारी । छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी ॥
श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई । छूट न अधिक अधिक अरुझाई ॥
जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी । ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी ॥
अस संजोग ईस जब करई । तबहुँ कदाचित सो निरुअरई ॥
सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई । जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई ॥
जप तप ब्रत जम नियम अपारा । जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा ॥
तेइ तृन हरित चरै जब गाई । भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई ॥
नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा । निर्मल मन अहीर निज दासा ॥
परम धर्ममय पय दुहि भाई । अवटै अनल अकाम बिहाई ॥
तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै । धृति सम जावनु देइ जमावै ॥
मुदिताँ मथैं बिचार मथानी । दम अधार रजु सत्य सुबानी ॥
तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता । बिमल बिराग सुभग सुपुनीता ॥
॥ दोहा ॥
जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ ।
बुद्धि सिरावैं ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ ॥117(क)॥
तब बिग्यानरूपिनि बुद्धि बिसद घृत पाइ ।
चित्त दिआ भरि धरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ ॥117(ख)॥
तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि ।
तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि ॥117(ग)॥
॥ सोरठा ॥
सो0-एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय ॥
जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब ॥117(घ)॥
॥ चौपाई ॥
सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा । दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा ॥
आतम अनुभव सुख सुप्रकासा । तब भव मूल भेद भ्रम नासा ॥
प्रबल अबिद्या कर परिवारा । मोह आदि तम मिटइ अपारा ॥
तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा । उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा ॥
छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई । तब यह जीव कृतारथ होई ॥
छोरत ग्रंथि जानि खगराया । बिघ्न अनेक करइ तब माया ॥
रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई । बुद्धहि लोभ दिखावहिं आई ॥
कल बल छल करि जाहिं समीपा । अंचल बात बुझावहिं दीपा ॥
होइ बुद्धि जौं परम सयानी । तिन्ह तन चितव न अनहित जानी ॥
जौं तेहि बिघ्न बुद्धि नहिं बाधी । तौ बहोरि सुर करहिं उपाधी ॥
इंद्रीं द्वार झरोखा नाना । तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना ॥
आवत देखहिं बिषय बयारी । ते हठि देही कपाट उघारी ॥
जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई । तबहिं दीप बिग्यान बुझाई ॥
ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा । बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा ॥
इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई । बिषय भोग पर प्रीति सदाई ॥
बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी । तेहि बिधि दीप को बार बहोरी ॥
॥ दोहा ॥
तब फिरि जीव बिबिध बिधि पावइ संसृति क्लेस ।
हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस ॥118(क)॥
कहत कठिन समुझत कठिन साधन कठिन बिबेक ।
होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक ॥118(ख)॥
॥ चौपाई ॥
ग्यान पंथ कृपान कै धारा । परत खगेस होइ नहिं बारा ॥
जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई । सो कैवल्य परम पद लहई ॥
अति दुर्लभ कैवल्य परम पद । संत पुरान निगम आगम बद ॥
राम भजत सोइ मुकुति गोसाई । अनइच्छित आवइ बरिआई ॥
जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई । कोटि भाँति कोउ करै उपाई ॥
तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई । रहि न सकइ हरि भगति बिहाई ॥
अस बिचारि हरि भगत सयाने । मुक्ति निरादर भगति लुभाने ॥
भगति करत बिनु जतन प्रयासा । संसृति मूल अबिद्या नासा ॥
भोजन करिअ तृपिति हित लागी । जिमि सो असन पचवै जठरागी ॥
असि हरिभगति सुगम सुखदाई । को अस मूढ़ न जाहि सोहाई ॥
॥ दोहा ॥
सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि ॥
भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि ॥119(क)॥
जो चेतन कहँ ज़ड़ करइ ज़ड़हि करइ चैतन्य ।
अस समर्थ रघुनायकहिं भजहिं जीव ते धन्य ॥119(ख)॥
॥ चौपाई ॥
कहेउँ ग्यान सिद्धांत बुझाई । सुनहु भगति मनि कै प्रभुताई ॥
राम भगति चिंतामनि सुंदर । बसइ गरुड़ जाके उर अंतर ॥
परम प्रकास रूप दिन राती । नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती ॥
मोह दरिद्र निकट नहिं आवा । लोभ बात नहिं ताहि बुझावा ॥
प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई । हारहिं सकल सलभ समुदाई ॥
खल कामादि निकट नहिं जाहीं । बसइ भगति जाके उर माहीं ॥
गरल सुधासम अरि हित होई । तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई ॥
ब्यापहिं मानस रोग न भारी । जिन्ह के बस सब जीव दुखारी ॥
राम भगति मनि उर बस जाकें । दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें ॥
चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं । जे मनि लागि सुजतन कराहीं ॥
सो मनि जदपि प्रगट जग अहई । राम कृपा बिनु नहिं कोउ लहई ॥
सुगम उपाय पाइबे केरे । नर हतभाग्य देहिं भटमेरे ॥
पावन पर्बत बेद पुराना । राम कथा रुचिराकर नाना ॥
मर्मी सज्जन सुमति कुदारी । ग्यान बिराग नयन उरगारी ॥
भाव सहित खोजइ जो प्रानी । पाव भगति मनि सब सुख खानी ॥
मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा । राम ते अधिक राम कर दासा ॥
राम सिंधु घन सज्जन धीरा । चंदन तरु हरि संत समीरा ॥
सब कर फल हरि भगति सुहाई । सो बिनु संत न काहूँ पाई ॥
अस बिचारि जोइ कर सतसंगा । राम भगति तेहि सुलभ बिहंगा ॥
॥ दोहा ॥
ब्रह्म पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर आहिं ।
कथा सुधा मथि काढ़हिं भगति मधुरता जाहिं ॥120(क)॥
बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि ।
जय पाइअ सो हरि भगति देखु खगेस बिचारि ॥120(ख)॥
॥ चौपाई ॥
पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ । जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ ॥
नाथ मोहि निज सेवक जानी । सप्त प्रस्न कहहु बखानी ॥
प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा । सब ते दुर्लभ कवन सरीरा ॥
बड़ दुख कवन कवन सुख भारी । सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी ॥
संत असंत मरम तुम्ह जानहु । तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु ॥
कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला । कहहु कवन अघ परम कराला ॥
मानस रोग कहहु समुझाई । तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई ॥
तात सुनहु सादर अति प्रीती । मैं संछेप कहउँ यह नीती ॥
नर तन सम नहिं कवनिउ देही । जीव चराचर जाचत तेही ॥
नरग स्वर्ग अपबर्ग निसेनी । ग्यान बिराग भगति सुभ देनी ॥
सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर । होहिं बिषय रत मंद मंद तर ॥
काँच किरिच बदलें ते लेही । कर ते डारि परस मनि देहीं ॥
नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं । संत मिलन सम सुख जग नाहीं ॥
पर उपकार बचन मन काया । संत सहज सुभाउ खगराया ॥
संत सहहिं दुख परहित लागी । परदुख हेतु असंत अभागी ॥
भूर्ज तरू सम संत कृपाला । परहित निति सह बिपति बिसाला ॥
सन इव खल पर बंधन करई । खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई ॥
खल बिनु स्वारथ पर अपकारी । अहि मूषक इव सुनु उरगारी ॥
पर संपदा बिनासि नसाहीं । जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं ॥
दुष्ट उदय जग आरति हेतू । जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू ॥
संत उदय संतत सुखकारी । बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी ॥
परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा । पर निंदा सम अघ न गरीसा ॥
हर गुर निंदक दादुर होई । जन्म सहस्त्र पाव तन सोई ॥
द्विज निंदक बहु नरक भोग करि । जग जनमइ बायस सरीर धरि ॥
सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी । रौरव नरक परहिं ते प्रानी ॥
होहिं उलूक संत निंदा रत । मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत ॥
सब के निंदा जे जड़ करहीं । ते चमगादुर होइ अवतरहीं ॥
सुनहु तात अब मानस रोगा । जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा ॥
मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला । तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला ॥
काम बात कफ लोभ अपारा । क्रोध पित्त नित छाती जारा ॥
प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई । उपजइ सन्यपात दुखदाई ॥
बिषय मनोरथ दुर्गम नाना । ते सब सूल नाम को जाना ॥
ममता दादु कंडु इरषाई । हरष बिषाद गरह बहुताई ॥
पर सुख देखि जरनि सोइ छई । कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई ॥
अहंकार अति दुखद डमरुआ । दंभ कपट मद मान नेहरुआ ॥
तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी । त्रिबिध ईषना तरुन तिजारी ॥
जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका । कहँ लागि कहौं कुरोग अनेका ॥
॥ दोहा ॥
एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि ।
पीड़हिं संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि ॥121(क)॥
नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान ।
भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं रोग जाहिं हरिजान ॥121(ख)॥
॥ चौपाई ॥
एहि बिधि सकल जीव जग रोगी । सोक हरष भय प्रीति बियोगी ॥
मानक रोग कछुक मैं गाए । हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए ॥
जाने ते छीजहिं कछु पापी । नास न पावहिं जन परितापी ॥
बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे । मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे ॥
राम कृपाँ नासहि सब रोगा । जौं एहि भाँति बनै संयोगा ॥
सदगुर बैद बचन बिस्वासा । संजम यह न बिषय कै आसा ॥
रघुपति भगति सजीवन मूरी । अनूपान श्रद्धा मति पूरी ॥
एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं । नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं ॥
जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई । जब उर बल बिराग अधिकाई ॥
सुमति छुधा बाढ़इ नित नई । बिषय आस दुर्बलता गई ॥
बिमल ग्यान जल जब सो नहाई । तब रह राम भगति उर छाई ॥
सिव अज सुक सनकादिक नारद । जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद ॥
सब कर मत खगनायक एहा । करिअ राम पद पंकज नेहा ॥
श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं । रघुपति भगति बिना सुख नाहीं ॥
कमठ पीठ जामहिं बरु बारा । बंध्या सुत बरु काहुहि मारा ॥
फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला । जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला ॥
तृषा जाइ बरु मृगजल पाना । बरु जामहिं सस सीस बिषाना ॥
अंधकारु बरु रबिहि नसावै । राम बिमुख न जीव सुख पावै ॥
हिम ते अनल प्रगट बरु होई । बिमुख राम सुख पाव न कोई ॥
॥ दोहा ॥
दो0=बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल ।
बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल ॥122(क)॥
मसकहि करइ बिंरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन ।
अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन ॥122(ख)॥
श्लोक- विनिच्श्रितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे ।
हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते ॥122(ग)॥
॥ चौपाई ॥
कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा । ब्यास समास स्वमति अनुरुपा ॥
श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी । राम भजिअ सब काज बिसारी ॥
प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही । मोहि से सठ पर ममता जाही ॥
तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा । नाथ कीन्हि मो पर अति छोहा ॥
पूछिहुँ राम कथा अति पावनि । सुक सनकादि संभु मन भावनि ॥
सत संगति दुर्लभ संसारा । निमिष दंड भरि एकउ बारा ॥
देखु गरुड़ निज हृदयँ बिचारी । मैं रघुबीर भजन अधिकारी ॥
सकुनाधम सब भाँति अपावन । प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन ॥
॥ दोहा ॥
आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन ।
निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन ॥123(क)॥
नाथ जथामति भाषेउँ राखेउँ नहिं कछु गोइ ।
चरित सिंधु रघुनायक थाह कि पावइ कोइ ॥123॥
॥ चौपाई ॥
सुमिरि राम के गुन गन नाना । पुनि पुनि हरष भुसुंडि सुजाना ॥
महिमा निगम नेति करि गाई । अतुलित बल प्रताप प्रभुताई ॥
सिव अज पूज्य चरन रघुराई । मो पर कृपा परम मृदुलाई ॥
अस सुभाउ कहुँ सुनउँ न देखउँ । केहि खगेस रघुपति सम लेखउँ ॥
साधक सिद्ध बिमुक्त उदासी । कबि कोबिद कृतग्य संन्यासी ॥
जोगी सूर सुतापस ग्यानी । धर्म निरत पंडित बिग्यानी ॥
तरहिं न बिनु सेएँ मम स्वामी । राम नमामि नमामि नमामी ॥
सरन गएँ मो से अघ रासी । होहिं सुद्ध नमामि अबिनासी ॥
॥ दोहा ॥
जासु नाम भव भेषज हरन घोर त्रय सूल ।
सो कृपालु मोहि तो पर सदा रहउ अनुकूल ॥124(क)॥
सुनि भुसुंडि के बचन सुभ देखि राम पद नेह ।
बोलेउ प्रेम सहित गिरा गरुड़ बिगत संदेह ॥124(ख)॥
॥ चौपाई ॥
मै कृत्कृत्य भयउँ तव बानी । सुनि रघुबीर भगति रस सानी ॥
राम चरन नूतन रति भई । माया जनित बिपति सब गई ॥
मोह जलधि बोहित तुम्ह भए । मो कहँ नाथ बिबिध सुख दए ॥
मो पहिं होइ न प्रति उपकारा । बंदउँ तव पद बारहिं बारा ॥
पूरन काम राम अनुरागी । तुम्ह सम तात न कोउ बड़भागी ॥
संत बिटप सरिता गिरि धरनी । पर हित हेतु सबन्ह कै करनी ॥
संत हृदय नवनीत समाना । कहा कबिन्ह परि कहै न जाना ॥
निज परिताप द्रवइ नवनीता । पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता ॥
जीवन जन्म सुफल मम भयऊ । तव प्रसाद संसय सब गयऊ ॥
जानेहु सदा मोहि निज किंकर । पुनि पुनि उमा कहइ बिहंगबर ॥
॥ दोहा ॥
तासु चरन सिरु नाइ करि प्रेम सहित मतिधीर ।
गयउ गरुड़ बैकुंठ तब हृदयँ राखि रघुबीर ॥125(क)॥
गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन ।
बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं बेद पुरान ॥125(ख)॥
॥ चौपाई ॥
कहेउँ परम पुनीत इतिहासा । सुनत श्रवन छूटहिं भव पासा ॥
प्रनत कल्पतरु करुना पुंजा । उपजइ प्रीति राम पद कंजा ॥
मन क्रम बचन जनित अघ जाई । सुनहिं जे कथा श्रवन मन लाई ॥
तीर्थाटन साधन समुदाई । जोग बिराग ग्यान निपुनाई ॥
नाना कर्म धर्म ब्रत दाना । संजम दम जप तप मख नाना ॥
भूत दया द्विज गुर सेवकाई । बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई ॥
जहँ लगि साधन बेद बखानी । सब कर फल हरि भगति भवानी ॥
सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई । राम कृपाँ काहूँ एक पाई ॥
॥ दोहा ॥
मुनि दुर्लभ हरि भगति नर पावहिं बिनहिं प्रयास ।
जे यह कथा निरंतर सुनहिं मानि बिस्वास ॥126॥
॥ चौपाई ॥
सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता । सोइ महि मंडित पंडित दाता ॥
धर्म परायन सोइ कुल त्राता । राम चरन जा कर मन राता ॥
नीति निपुन सोइ परम सयाना । श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना ॥
सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा । जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा ॥
धन्य देस सो जहँ सुरसरी । धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी ॥
धन्य सो भूपु नीति जो करई । धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई ॥
सो धन धन्य प्रथम गति जाकी । धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी ॥
धन्य घरी सोइ जब सतसंगा । धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा ॥
॥ दोहा ॥
सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत ।
श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत ॥127॥
॥ चौपाई ॥
मति अनुरूप कथा मैं भाषी । जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी ॥
तव मन प्रीति देखि अधिकाई । तब मैं रघुपति कथा सुनाई ॥
यह न कहिअ सठही हठसीलहि । जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि ॥
कहिअ न लोभिहि क्रोधहि कामिहि । जो न भजइ सचराचर स्वामिहि ॥
द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ । सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ ॥
राम कथा के तेइ अधिकारी । जिन्ह कें सतसंगति अति प्यारी ॥
गुर पद प्रीति नीति रत जेई । द्विज सेवक अधिकारी तेई ॥
ता कहँ यह बिसेष सुखदाई । जाहि प्रानप्रिय श्रीरघुराई ॥
॥ दोहा ॥
राम चरन रति जो चह अथवा पद निर्बान ।
भाव सहित सो यह कथा करउ श्रवन पुट पान ॥128॥
॥ चौपाई ॥
राम कथा गिरिजा मैं बरनी । कलि मल समनि मनोमल हरनी ॥
संसृति रोग सजीवन मूरी । राम कथा गावहिं श्रुति सूरी ॥
एहि महँ रुचिर सप्त सोपाना । रघुपति भगति केर पंथाना ॥
अति हरि कृपा जाहि पर होई । पाउँ देइ एहिं मारग सोई ॥
मन कामना सिद्धि नर पावा । जे यह कथा कपट तजि गावा ॥
कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं । ते गोपद इव भवनिधि तरहीं ॥
सुनि सब कथा हृदयँ अति भाई । गिरिजा बोली गिरा सुहाई ॥
नाथ कृपाँ मम गत संदेहा । राम चरन उपजेउ नव नेहा ॥
॥ दोहा ॥
मैं कृतकृत्य भइउँ अब तव प्रसाद बिस्वेस ।
उपजी राम भगति दृढ़ बीते सकल कलेस ॥129॥
॥ चौपाई ॥
यह सुभ संभु उमा संबादा । सुख संपादन समन बिषादा ॥
भव भंजन गंजन संदेहा । जन रंजन सज्जन प्रिय एहा ॥
राम उपासक जे जग माहीं । एहि सम प्रिय तिन्ह के कछु नाहीं ॥
रघुपति कृपाँ जथामति गावा । मैं यह पावन चरित सुहावा ॥
एहिं कलिकाल न साधन दूजा । जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा ॥
रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि । संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि ॥
जासु पतित पावन बड़ बाना । गावहिं कबि श्रुति संत पुराना ॥
ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई । राम भजें गति केहिं नहिं पाई ॥
॥ छन्द ॥
पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना ।
गनिका अजामिल ब्याध गीध गजादि खल तारे घना ॥
आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे ।
कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते ॥1॥
रघुबंस भूषन चरित यह नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं ।
कलि मल मनोमल धोइ बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं ॥
सत पंच चौपाईं मनोहर जानि जो नर उर धरै ।
दारुन अबिद्या पंच जनित बिकार श्रीरघुबर हरै ॥2॥
सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो ।
सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को ॥
जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ ।
पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ ॥3॥
॥ दोहा ॥
मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर ।
अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर ॥130(क)॥
कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम ।
तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम ॥130(ख)॥
श्लोक-यत्पूर्व प्रभुणा कृतं सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमं
श्रीमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशं प्राप्त्यै तु रामायणम् ।
मत्वा तद्रघुनाथमनिरतं स्वान्तस्तमःशान्तये
भाषाबद्धमिदं चकार तुलसीदासस्तथा मानसम् ॥1॥
पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानभक्तिप्रदं
मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम् ।
श्रीमद्रामचरित्रमानसमिदं भक्त्यावगाहन्ति ये
ते संसारपतङ्गघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवाः ॥2॥
मासपारायण, तीसवाँ विश्राम
नवान्हपारायण, नवाँ विश्राम
इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने
सप्तमः सोपानः समाप्तः ।
उत्तरकाण्ड समाप्त)
आरति श्रीरामायनजी की । कीरति कलित ललित सिय पी की ॥
गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद । बालमीक बिग्यान बिसारद ।
सुक सनकादि सेष अरु सारद । बरनि पवनसुत कीरति नीकी ॥1॥
गावत बेद पुरान अष्टदस । छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस ।
मुनि जन धन संतन को सरबस । सार अंस संमत सबही की ॥2॥
गावत संतत संभु भवानी । अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी ।
ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी । कागभुसुंडि गरुड के ही की ॥3॥
कलिमल हरनि बिषय रस फीकी । सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की ।
दलन रोग भव मूरि अमी की । तात मात सब बिधि तुलसी की ॥4॥


