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उत्तरकाण्ड

उत्तरकाण्ड

॥ श्री गणेशाय नमः ॥

श्रीजानकीवल्लभो विजयते

श्रीरामचरितमानस
सप्तम सोपान
(उत्तरकाण्ड)

॥ श्लोक ॥

केकीकण्ठाभनीलं सुरवरविलसद्विप्रपादाब्जचिह्नं

शोभाढ्यं पीतवस्त्रं सरसिजनयनं सर्वदा सुप्रसन्नम् ।

पाणौ नाराचचापं कपिनिकरयुतं बन्धुना सेव्यमानं

नौमीड्यं जानकीशं रघुवरमनिशं पुष्पकारूढरामम् ॥1॥

कोसलेन्द्रपदकञ्जमञ्जुलौ कोमलावजमहेशवन्दितौ ।

जानकीकरसरोजलालितौ चिन्तकस्य मनभृङ्गसड्गिनौ ॥2॥

कुन्दइन्दुदरगौरसुन्दरं अम्बिकापतिमभीष्टसिद्धिदम् ।

कारुणीककलकञ्जलोचनं नौमि शंकरमनंगमोचनम् ॥3॥

॥ दोहा ॥

रहा एक दिन अवधि कर अति आरत पुर लोग ।

जहँ तहँ सोचहिं नारि नर कृस तन राम बियोग ॥

॥ चौपाई ॥

सगुन होहिं सुंदर सकल मन प्रसन्न सब केर ।

प्रभु आगवन जनाव जनु नगर रम्य चहुँ फेर ॥

कौसल्यादि मातु सब मन अनंद अस होइ ।

आयउ प्रभु श्री अनुज जुत कहन चहत अब कोइ ॥

भरत नयन भुज दच्छिन फरकत बारहिं बार ।

जानि सगुन मन हरष अति लागे करन बिचार ॥

रहेउ एक दिन अवधि अधारा । समुझत मन दुख भयउ अपारा ॥

कारन कवन नाथ नहिं आयउ । जानि कुटिल किधौं मोहि बिसरायउ ॥

अहह धन्य लछिमन बड़भागी । राम पदारबिंदु अनुरागी ॥

कपटी कुटिल मोहि प्रभु चीन्हा । ताते नाथ संग नहिं लीन्हा ॥

जौं करनी समुझै प्रभु मोरी । नहिं निस्तार कलप सत कोरी ॥

जन अवगुन प्रभु मान न काऊ । दीन बंधु अति मृदुल सुभाऊ ॥

मोरि जियँ भरोस दृढ़ सोई । मिलिहहिं राम सगुन सुभ होई ॥

बीतें अवधि रहहि जौं प्राना । अधम कवन जग मोहि समाना ॥

॥ दोहा ॥

राम बिरह सागर महँ भरत मगन मन होत ।

बिप्र रूप धरि पवन सुत आइ गयउ जनु पोत ॥1(क)॥

बैठि देखि कुसासन जटा मुकुट कृस गात ।

राम राम रघुपति जपत स्त्रवत नयन जलजात ॥1(ख)॥

॥ चौपाई ॥

देखत हनूमान अति हरषेउ । पुलक गात लोचन जल बरषेउ ॥

मन महँ बहुत भाँति सुख मानी । बोलेउ श्रवन सुधा सम बानी ॥

जासु बिरहँ सोचहु दिन राती । रटहु निरंतर गुन गन पाँती ॥

रघुकुल तिलक सुजन सुखदाता । आयउ कुसल देव मुनि त्राता ॥

रिपु रन जीति सुजस सुर गावत । सीता सहित अनुज प्रभु आवत ॥

सुनत बचन बिसरे सब दूखा । तृषावंत जिमि पाइ पियूषा ॥

को तुम्ह तात कहाँ ते आए । मोहि परम प्रिय बचन सुनाए ॥

मारुत सुत मैं कपि हनुमाना । नामु मोर सुनु कृपानिधाना ॥

दीनबंधु रघुपति कर किंकर । सुनत भरत भेंटेउ उठि सादर ॥

मिलत प्रेम नहिं हृदयँ समाता । नयन स्त्रवत जल पुलकित गाता ॥

कपि तव दरस सकल दुख बीते । मिले आजु मोहि राम पिरीते ॥

बार बार बूझी कुसलाता । तो कहुँ देउँ काह सुनु भ्राता ॥

एहि संदेस सरिस जग माहीं । करि बिचार देखेउँ कछु नाहीं ॥

नाहिन तात उरिन मैं तोही । अब प्रभु चरित सुनावहु मोही ॥

तब हनुमंत नाइ पद माथा । कहे सकल रघुपति गुन गाथा ॥

कहु कपि कबहुँ कृपाल गोसाईं । सुमिरहिं मोहि दास की नाईं ॥

छं0-निज दास ज्यों रघुबंसभूषन कबहुँ मम सुमिरन कर् यो ।

सुनि भरत बचन बिनीत अति कपि पुलकित तन चरनन्हि पर् यो ॥

रघुबीर निज मुख जासु गुन गन कहत अग जग नाथ जो ।

काहे न होइ बिनीत परम पुनीत सदगुन सिंधु सो ॥

॥ दोहा ॥

राम प्रान प्रिय नाथ तुम्ह सत्य बचन मम तात ।

पुनि पुनि मिलत भरत सुनि हरष न हृदयँ समात ॥2(क)॥

सो0-भरत चरन सिरु नाइ तुरित गयउ कपि राम पहिं ।

कही कुसल सब जाइ हरषि चलेउ प्रभु जान चढ़ि ॥2(ख)॥

॥ चौपाई ॥

हरषि भरत कोसलपुर आए । समाचार सब गुरहि सुनाए ॥

पुनि मंदिर महँ बात जनाई । आवत नगर कुसल रघुराई ॥

सुनत सकल जननीं उठि धाईं । कहि प्रभु कुसल भरत समुझाई ॥

समाचार पुरबासिन्ह पाए । नर अरु नारि हरषि सब धाए ॥

दधि दुर्बा रोचन फल फूला । नव तुलसी दल मंगल मूला ॥

भरि भरि हेम थार भामिनी । गावत चलिं सिंधु सिंधुरगामिनी ॥

जे जैसेहिं तैसेहिं उटि धावहिं । बाल बृद्ध कहँ संग न लावहिं ॥

एक एकन्ह कहँ बूझहिं भाई । तुम्ह देखे दयाल रघुराई ॥

अवधपुरी प्रभु आवत जानी । भई सकल सोभा कै खानी ॥

बहइ सुहावन त्रिबिध समीरा । भइ सरजू अति निर्मल नीरा ॥

॥ दोहा ॥

हरषित गुर परिजन अनुज भूसुर बृंद समेत ।

चले भरत मन प्रेम अति सन्मुख कृपानिकेत ॥3(क)॥

बहुतक चढ़ी अटारिन्ह निरखहिं गगन बिमान ।

देखि मधुर सुर हरषित करहिं सुमंगल गान ॥3(ख)॥

राका ससि रघुपति पुर सिंधु देखि हरषान ।

बढ़यो कोलाहल करत जनु नारि तरंग समान ॥3(ग)॥

॥ चौपाई ॥

इहाँ भानुकुल कमल दिवाकर । कपिन्ह देखावत नगर मनोहर ॥

सुनु कपीस अंगद लंकेसा । पावन पुरी रुचिर यह देसा ॥

जद्यपि सब बैकुंठ बखाना । बेद पुरान बिदित जगु जाना ॥

अवधपुरी सम प्रिय नहिं सोऊ । यह प्रसंग जानइ कोउ कोऊ ॥

जन्मभूमि मम पुरी सुहावनि । उत्तर दिसि बह सरजू पावनि ॥

जा मज्जन ते बिनहिं प्रयासा । मम समीप नर पावहिं बासा ॥

अति प्रिय मोहि इहाँ के बासी । मम धामदा पुरी सुख रासी ॥

हरषे सब कपि सुनि प्रभु बानी । धन्य अवध जो राम बखानी ॥

॥ दोहा ॥

आवत देखि लोग सब कृपासिंधु भगवान ।

नगर निकट प्रभु प्रेरेउ उतरेउ भूमि बिमान ॥4(क)॥

उतरि कहेउ प्रभु पुष्पकहि तुम्ह कुबेर पहिं जाहु ।

प्रेरित राम चलेउ सो हरषु बिरहु अति ताहु ॥4(ख)॥

॥ चौपाई ॥

आए भरत संग सब लोगा । कृस तन श्रीरघुबीर बियोगा ॥

बामदेव बसिष्ठ मुनिनायक । देखे प्रभु महि धरि धनु सायक ॥

धाइ धरे गुर चरन सरोरुह । अनुज सहित अति पुलक तनोरुह ॥

भेंटि कुसल बूझी मुनिराया । हमरें कुसल तुम्हारिहिं दाया ॥

सकल द्विजन्ह मिलि नायउ माथा । धर्म धुरंधर रघुकुलनाथा ॥

गहे भरत पुनि प्रभु पद पंकज । नमत जिन्हहि सुर मुनि संकर अज ॥

परे भूमि नहिं उठत उठाए । बर करि कृपासिंधु उर लाए ॥

स्यामल गात रोम भए ठाढ़े । नव राजीव नयन जल बाढ़े ॥

॥ छन्द ॥

राजीव लोचन स्त्रवत जल तन ललित पुलकावलि बनी ।

अति प्रेम हृदयँ लगाइ अनुजहि मिले प्रभु त्रिभुअन धनी ॥

प्रभु मिलत अनुजहि सोह मो पहिं जाति नहिं उपमा कही ।

जनु प्रेम अरु सिंगार तनु धरि मिले बर सुषमा लही ॥1 ॥

बूझत कृपानिधि कुसल भरतहि बचन बेगि न आवई ।

सुनु सिवा सो सुख बचन मन ते भिन्न जान जो पावई ॥

अब कुसल कौसलनाथ आरत जानि जन दरसन दियो ।

बूड़त बिरह बारीस कृपानिधान मोहि कर गहि लियो ॥2 ॥

॥ दोहा ॥

पुनि प्रभु हरषि सत्रुहन भेंटे हृदयँ लगाइ ।

लछिमन भरत मिले तब परम प्रेम दोउ भाइ ॥5॥

॥ चौपाई ॥

भरतानुज लछिमन पुनि भेंटे । दुसह बिरह संभव दुख मेटे ॥

सीता चरन भरत सिरु नावा । अनुज समेत परम सुख पावा ॥

प्रभु बिलोकि हरषे पुरबासी । जनित बियोग बिपति सब नासी ॥

प्रेमातुर सब लोग निहारी । कौतुक कीन्ह कृपाल खरारी ॥

अमित रूप प्रगटे तेहि काला । जथाजोग मिले सबहि कृपाला ॥

कृपादृष्टि रघुबीर बिलोकी । किए सकल नर नारि बिसोकी ॥

छन महिं सबहि मिले भगवाना । उमा मरम यह काहुँ न जाना ॥

एहि बिधि सबहि सुखी करि रामा । आगें चले सील गुन धामा ॥

कौसल्यादि मातु सब धाई । निरखि बच्छ जनु धेनु लवाई ॥

छं0-जनु धेनु बालक बच्छ तजि गृहँ चरन बन परबस गईं ।

दिन अंत पुर रुख स्त्रवत थन हुंकार करि धावत भई ॥

अति प्रेम सब मातु भेटीं बचन मृदु बहुबिधि कहे ।

गइ बिषम बियोग भव तिन्ह हरष सुख अगनित लहे ॥

॥ दोहा ॥

भेटेउ तनय सुमित्राँ राम चरन रति जानि ।

रामहि मिलत कैकेई हृदयँ बहुत सकुचानि ॥6(क)॥

लछिमन सब मातन्ह मिलि हरषे आसिष पाइ ।

कैकेइ कहँ पुनि पुनि मिले मन कर छोभु न जाइ ॥6॥

॥ चौपाई ॥

सासुन्ह सबनि मिली बैदेही । चरनन्हि लागि हरषु अति तेही ॥

देहिं असीस बूझि कुसलाता । होइ अचल तुम्हार अहिवाता ॥

सब रघुपति मुख कमल बिलोकहिं । मंगल जानि नयन जल रोकहिं ॥

कनक थार आरति उतारहिं । बार बार प्रभु गात निहारहिं ॥

नाना भाँति निछावरि करहीं । परमानंद हरष उर भरहीं ॥

कौसल्या पुनि पुनि रघुबीरहि । चितवति कृपासिंधु रनधीरहि ॥

हृदयँ बिचारति बारहिं बारा । कवन भाँति लंकापति मारा ॥

अति सुकुमार जुगल मेरे बारे । निसिचर सुभट महाबल भारे ॥

॥ दोहा ॥

लछिमन अरु सीता सहित प्रभुहि बिलोकति मातु ।

परमानंद मगन मन पुनि पुनि पुलकित गातु ॥7॥

॥ चौपाई ॥

लंकापति कपीस नल नीला । जामवंत अंगद सुभसीला ॥

हनुमदादि सब बानर बीरा । धरे मनोहर मनुज सरीरा ॥

भरत सनेह सील ब्रत नेमा । सादर सब बरनहिं अति प्रेमा ॥

देखि नगरबासिन्ह कै रीती । सकल सराहहि प्रभु पद प्रीती ॥

पुनि रघुपति सब सखा बोलाए । मुनि पद लागहु सकल सिखाए ॥

गुर बसिष्ट कुलपूज्य हमारे । इन्ह की कृपाँ दनुज रन मारे ॥

ए सब सखा सुनहु मुनि मेरे । भए समर सागर कहँ बेरे ॥

मम हित लागि जन्म इन्ह हारे । भरतहु ते मोहि अधिक पिआरे ॥

सुनि प्रभु बचन मगन सब भए । निमिष निमिष उपजत सुख नए ॥

॥ दोहा ॥

कौसल्या के चरनन्हि पुनि तिन्ह नायउ माथ ॥

आसिष दीन्हे हरषि तुम्ह प्रिय मम जिमि रघुनाथ ॥8(क)॥

सुमन बृष्टि नभ संकुल भवन चले सुखकंद ।

चढ़ी अटारिन्ह देखहिं नगर नारि नर बृंद ॥8(ख)॥

॥ चौपाई ॥

कंचन कलस बिचित्र सँवारे । सबहिं धरे सजि निज निज द्वारे ॥

बंदनवार पताका केतू । सबन्हि बनाए मंगल हेतू ॥

बीथीं सकल सुगंध सिंचाई । गजमनि रचि बहु चौक पुराई ॥

नाना भाँति सुमंगल साजे । हरषि नगर निसान बहु बाजे ॥

जहँ तहँ नारि निछावर करहीं । देहिं असीस हरष उर भरहीं ॥

कंचन थार आरती नाना । जुबती सजें करहिं सुभ गाना ॥

करहिं आरती आरतिहर कें । रघुकुल कमल बिपिन दिनकर कें ॥

पुर सोभा संपति कल्याना । निगम सेष सारदा बखाना ॥

तेउ यह चरित देखि ठगि रहहीं । उमा तासु गुन नर किमि कहहीं ॥

॥ दोहा ॥

नारि कुमुदिनीं अवध सर रघुपति बिरह दिनेस ।

अस्त भएँ बिगसत भईं निरखि राम राकेस ॥9(क)॥

होहिं सगुन सुभ बिबिध बिधि बाजहिं गगन निसान ।

पुर नर नारि सनाथ करि भवन चले भगवान ॥9(ख)॥

॥ चौपाई ॥

प्रभु जानी कैकेई लजानी । प्रथम तासु गृह गए भवानी ॥

ताहि प्रबोधि बहुत सुख दीन्हा । पुनि निज भवन गवन हरि कीन्हा ॥

कृपासिंधु जब मंदिर गए । पुर नर नारि सुखी सब भए ॥

गुर बसिष्ट द्विज लिए बुलाई । आजु सुघरी सुदिन समुदाई ॥

सब द्विज देहु हरषि अनुसासन । रामचंद्र बैठहिं सिंघासन ॥

मुनि बसिष्ट के बचन सुहाए । सुनत सकल बिप्रन्ह अति भाए ॥

कहहिं बचन मृदु बिप्र अनेका । जग अभिराम राम अभिषेका ॥

अब मुनिबर बिलंब नहिं कीजे । महाराज कहँ तिलक करीजै ॥

॥ दोहा ॥

तब मुनि कहेउ सुमंत्र सन सुनत चलेउ हरषाइ ।

रथ अनेक बहु बाजि गज तुरत सँवारे जाइ ॥10(क)॥

जहँ तहँ धावन पठइ पुनि मंगल द्रब्य मगाइ ।

हरष समेत बसिष्ट पद पुनि सिरु नायउ आइ ॥10(ख)॥

नवान्हपारायण, आठवाँ विश्राम

॥ चौपाई ॥

अवधपुरी अति रुचिर बनाई । देवन्ह सुमन बृष्टि झरि लाई ॥

राम कहा सेवकन्ह बुलाई । प्रथम सखन्ह अन्हवावहु जाई ॥

सुनत बचन जहँ तहँ जन धाए । सुग्रीवादि तुरत अन्हवाए ॥

पुनि करुनानिधि भरतु हँकारे । निज कर राम जटा निरुआरे ॥

अन्हवाए प्रभु तीनिउ भाई । भगत बछल कृपाल रघुराई ॥

भरत भाग्य प्रभु कोमलताई । सेष कोटि सत सकहिं न गाई ॥

पुनि निज जटा राम बिबराए । गुर अनुसासन मागि नहाए ॥

करि मज्जन प्रभु भूषन साजे । अंग अनंग देखि सत लाजे ॥

॥ दोहा ॥

सासुन्ह सादर जानकिहि मज्जन तुरत कराइ ।

दिब्य बसन बर भूषन अँग अँग सजे बनाइ ॥11(क)॥

राम बाम दिसि सोभति रमा रूप गुन खानि ।

देखि मातु सब हरषीं जन्म सुफल निज जानि ॥11(ख)॥

सुनु खगेस तेहि अवसर ब्रह्मा सिव मुनि बृंद ।

चढ़ि बिमान आए सब सुर देखन सुखकंद ॥11(ग)॥

॥ चौपाई ॥

प्रभु बिलोकि मुनि मन अनुरागा । तुरत दिब्य सिंघासन मागा ॥

रबि सम तेज सो बरनि न जाई । बैठे राम द्विजन्ह सिरु नाई ॥

जनकसुता समेत रघुराई । पेखि प्रहरषे मुनि समुदाई ॥

बेद मंत्र तब द्विजन्ह उचारे । नभ सुर मुनि जय जयति पुकारे ॥

प्रथम तिलक बसिष्ट मुनि कीन्हा । पुनि सब बिप्रन्ह आयसु दीन्हा ॥

सुत बिलोकि हरषीं महतारी । बार बार आरती उतारी ॥

बिप्रन्ह दान बिबिध बिधि दीन्हे । जाचक सकल अजाचक कीन्हे ॥

सिंघासन पर त्रिभुअन साई । देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाईं ॥

॥ छन्द ॥

नभ दुंदुभीं बाजहिं बिपुल गंधर्ब किंनर गावहीं ।

नाचहिं अपछरा बृंद परमानंद सुर मुनि पावहीं ॥

भरतादि अनुज बिभीषनांगद हनुमदादि समेत ते ।

गहें छत्र चामर ब्यजन धनु असि चर्म सक्ति बिराजते ॥1॥

श्री सहित दिनकर बंस बूषन काम बहु छबि सोहई ।

नव अंबुधर बर गात अंबर पीत सुर मन मोहई ॥

मुकुटांगदादि बिचित्र भूषन अंग अंगन्हि प्रति सजे ।

अंभोज नयन बिसाल उर भुज धन्य नर निरखंति जे ॥2॥

॥ दोहा ॥

वह सोभा समाज सुख कहत न बनइ खगेस ।

बरनहिं सारद सेष श्रुति सो रस जान महेस ॥12(क)॥

भिन्न भिन्न अस्तुति करि गए सुर निज निज धाम ।

बंदी बेष बेद तब आए जहँ श्रीराम ॥12(ख)॥

प्रभु सर्बग्य कीन्ह अति आदर कृपानिधान ।

लखेउ न काहूँ मरम कछु लगे करन गुन गान ॥12(ग)॥

॥ छन्द ॥

जय सगुन निर्गुन रूप अनूप भूप सिरोमने ।

दसकंधरादि प्रचंड निसिचर प्रबल खल भुज बल हने ॥

अवतार नर संसार भार बिभंजि दारुन दुख दहे ।

जय प्रनतपाल दयाल प्रभु संजुक्त सक्ति नमामहे ॥1॥

तव बिषम माया बस सुरासुर नाग नर अग जग हरे ।

भव पंथ भ्रमत अमित दिवस निसि काल कर्म गुननि भरे ॥

जे नाथ करि करुना बिलोके त्रिबिधि दुख ते निर्बहे ।

भव खेद छेदन दच्छ हम कहुँ रच्छ राम नमामहे ॥2 ॥

जे ग्यान मान बिमत्त तव भव हरनि भक्ति न आदरी ।

ते पाइ सुर दुर्लभ पदादपि परत हम देखत हरी ॥

बिस्वास करि सब आस परिहरि दास तव जे होइ रहे ।

जपि नाम तव बिनु श्रम तरहिं भव नाथ सो समरामहे ॥3 ॥

जे चरन सिव अज पूज्य रज सुभ परसि मुनिपतिनी तरी ।

नख निर्गता मुनि बंदिता त्रेलोक पावनि सुरसरी ॥

ध्वज कुलिस अंकुस कंज जुत बन फिरत कंटक किन लहे ।

पद कंज द्वंद मुकुंद राम रमेस नित्य भजामहे ॥4 ॥

अब्यक्तमूलमनादि तरु त्वच चारि निगमागम भने ।

षट कंध साखा पंच बीस अनेक पर्न सुमन घने ॥

फल जुगल बिधि कटु मधुर बेलि अकेलि जेहि आश्रित रहे ।

पल्लवत फूलत नवल नित संसार बिटप नमामहे ॥5 ॥

जे ब्रह्म अजमद्वैतमनुभवगम्य मनपर ध्यावहीं ।

ते कहहुँ जानहुँ नाथ हम तव सगुन जस नित गावहीं ॥

करुनायतन प्रभु सदगुनाकर देव यह बर मागहीं ।

मन बचन कर्म बिकार तजि तव चरन हम अनुरागहीं ॥6 ॥

सब के देखत बेदन्ह बिनती कीन्हि उदार ।

अंतर्धान भए पुनि गए ब्रह्म आगार ॥13(क)॥

बैनतेय सुनु संभु तब आए जहँ रघुबीर ।

बिनय करत गदगद गिरा पूरित पुलक सरीर ॥13(ख)॥

॥ छन्द ॥

जय राम रमारमनं समनं । भव ताप भयाकुल पाहि जनं ॥

अवधेस सुरेस रमेस बिभो । सरनागत मागत पाहि प्रभो ॥1 ॥

दससीस बिनासन बीस भुजा । कृत दूरि महा महि भूरि रुजा ॥

रजनीचर बृंद पतंग रहे । सर पावक तेज प्रचंड दहे ॥2 ॥

महि मंडल मंडन चारुतरं । धृत सायक चाप निषंग बरं ॥

मद मोह महा ममता रजनी । तम पुंज दिवाकर तेज अनी ॥3 ॥

मनजात किरात निपात किए । मृग लोग कुभोग सरेन हिए ॥

हति नाथ अनाथनि पाहि हरे । बिषया बन पावँर भूलि परे ॥4 ॥

बहु रोग बियोगन्हि लोग हए । भवदंघ्रि निरादर के फल ए ॥

भव सिंधु अगाध परे नर ते । पद पंकज प्रेम न जे करते ॥5 ॥

अति दीन मलीन दुखी नितहीं । जिन्ह के पद पंकज प्रीति नहीं ॥

अवलंब भवंत कथा जिन्ह के ॥ प्रिय संत अनंत सदा तिन्ह कें ॥6 ॥

नहिं राग न लोभ न मान मदा ॥तिन्ह कें सम बैभव वा बिपदा ॥

एहि ते तव सेवक होत मुदा । मुनि त्यागत जोग भरोस सदा ॥7 ॥

करि प्रेम निरंतर नेम लिएँ । पद पंकज सेवत सुद्ध हिएँ ॥

सम मानि निरादर आदरही । सब संत सुखी बिचरंति मही ॥8 ॥

मुनि मानस पंकज भृंग भजे । रघुबीर महा रनधीर अजे ॥

तव नाम जपामि नमामि हरी । भव रोग महागद मान अरी ॥9 ॥

गुन सील कृपा परमायतनं । प्रनमामि निरंतर श्रीरमनं ॥

रघुनंद निकंदय द्वंद्वघनं । महिपाल बिलोकय दीन जनं ॥10 ॥

बार बार बर मागउँ हरषि देहु श्रीरंग ।

पद सरोज अनपायनी भगति सदा सतसंग ॥14(क)॥

बरनि उमापति राम गुन हरषि गए कैलास ।

तब प्रभु कपिन्ह दिवाए सब बिधि सुखप्रद बास ॥14(ख)॥

॥ चौपाई ॥

सुनु खगपति यह कथा पावनी । त्रिबिध ताप भव भय दावनी ॥

महाराज कर सुभ अभिषेका । सुनत लहहिं नर बिरति बिबेका ॥

जे सकाम नर सुनहिं जे गावहिं । सुख संपति नाना बिधि पावहिं ॥

सुर दुर्लभ सुख करि जग माहीं । अंतकाल रघुपति पुर जाहीं ॥

सुनहिं बिमुक्त बिरत अरु बिषई । लहहिं भगति गति संपति नई ॥

खगपति राम कथा मैं बरनी । स्वमति बिलास त्रास दुख हरनी ॥

बिरति बिबेक भगति दृढ़ करनी । मोह नदी कहँ सुंदर तरनी ॥

नित नव मंगल कौसलपुरी । हरषित रहहिं लोग सब कुरी ॥

नित नइ प्रीति राम पद पंकज । सबकें जिन्हहि नमत सिव मुनि अज ॥

मंगन बहु प्रकार पहिराए । द्विजन्ह दान नाना बिधि पाए ॥

॥ दोहा ॥

ब्रह्मानंद मगन कपि सब कें प्रभु पद प्रीति ।

जात न जाने दिवस तिन्ह गए मास षट बीति ॥15॥

॥ चौपाई ॥

बिसरे गृह सपनेहुँ सुधि नाहीं । जिमि परद्रोह संत मन माही ॥

तब रघुपति सब सखा बोलाए । आइ सबन्हि सादर सिरु नाए ॥

परम प्रीति समीप बैठारे । भगत सुखद मृदु बचन उचारे ॥

तुम्ह अति कीन्ह मोरि सेवकाई । मुख पर केहि बिधि करौं बड़ाई ॥

ताते मोहि तुम्ह अति प्रिय लागे । मम हित लागि भवन सुख त्यागे ॥

अनुज राज संपति बैदेही । देह गेह परिवार सनेही ॥

सब मम प्रिय नहिं तुम्हहि समाना । मृषा न कहउँ मोर यह बाना ॥

सब के प्रिय सेवक यह नीती । मोरें अधिक दास पर प्रीती ॥

॥ दोहा ॥

अब गृह जाहु सखा सब भजेहु मोहि दृढ़ नेम ।

सदा सर्बगत सर्बहित जानि करेहु अति प्रेम ॥16॥

॥ चौपाई ॥

सुनि प्रभु बचन मगन सब भए । को हम कहाँ बिसरि तन गए ॥

एकटक रहे जोरि कर आगे । सकहिं न कछु कहि अति अनुरागे ॥

परम प्रेम तिन्ह कर प्रभु देखा । कहा बिबिध बिधि ग्यान बिसेषा ॥

प्रभु सन्मुख कछु कहन न पारहिं । पुनि पुनि चरन सरोज निहारहिं ॥

तब प्रभु भूषन बसन मगाए । नाना रंग अनूप सुहाए ॥

सुग्रीवहि प्रथमहिं पहिराए । बसन भरत निज हाथ बनाए ॥

प्रभु प्रेरित लछिमन पहिराए । लंकापति रघुपति मन भाए ॥

अंगद बैठ रहा नहिं डोला । प्रीति देखि प्रभु ताहि न बोला ॥

॥ दोहा ॥

जामवंत नीलादि सब पहिराए रघुनाथ ।

हियँ धरि राम रूप सब चले नाइ पद माथ ॥17(क)॥

तब अंगद उठि नाइ सिरु सजल नयन कर जोरि ।

अति बिनीत बोलेउ बचन मनहुँ प्रेम रस बोरि ॥17(ख)॥

॥ चौपाई ॥

सुनु सर्बग्य कृपा सुख सिंधो । दीन दयाकर आरत बंधो ॥

मरती बेर नाथ मोहि बाली । गयउ तुम्हारेहि कोंछें घाली ॥

असरन सरन बिरदु संभारी । मोहि जनि तजहु भगत हितकारी ॥

मोरें तुम्ह प्रभु गुर पितु माता । जाउँ कहाँ तजि पद जलजाता ॥

तुम्हहि बिचारि कहहु नरनाहा । प्रभु तजि भवन काज मम काहा ॥

बालक ग्यान बुद्धि बल हीना । राखहु सरन नाथ जन दीना ॥

नीचि टहल गृह कै सब करिहउँ । पद पंकज बिलोकि भव तरिहउँ ॥

अस कहि चरन परेउ प्रभु पाही । अब जनि नाथ कहहु गृह जाही ॥

॥ दोहा ॥

अंगद बचन बिनीत सुनि रघुपति करुना सींव ।

प्रभु उठाइ उर लायउ सजल नयन राजीव ॥18(क)॥

निज उर माल बसन मनि बालितनय पहिराइ ।

बिदा कीन्हि भगवान तब बहु प्रकार समुझाइ ॥18(ख)॥

॥ चौपाई ॥

भरत अनुज सौमित्र समेता । पठवन चले भगत कृत चेता ॥

अंगद हृदयँ प्रेम नहिं थोरा । फिरि फिरि चितव राम कीं ओरा ॥

बार बार कर दंड प्रनामा । मन अस रहन कहहिं मोहि रामा ॥

राम बिलोकनि बोलनि चलनी । सुमिरि सुमिरि सोचत हँसि मिलनी ॥

प्रभु रुख देखि बिनय बहु भाषी । चलेउ हृदयँ पद पंकज राखी ॥

अति आदर सब कपि पहुँचाए । भाइन्ह सहित भरत पुनि आए ॥

तब सुग्रीव चरन गहि नाना । भाँति बिनय कीन्हे हनुमाना ॥

दिन दस करि रघुपति पद सेवा । पुनि तव चरन देखिहउँ देवा ॥

पुन्य पुंज तुम्ह पवनकुमारा । सेवहु जाइ कृपा आगारा ॥

अस कहि कपि सब चले तुरंता । अंगद कहइ सुनहु हनुमंता ॥

॥ दोहा ॥

कहेहु दंडवत प्रभु सैं तुम्हहि कहउँ कर जोरि ।

बार बार रघुनायकहि सुरति कराएहु मोरि ॥19(क)॥

अस कहि चलेउ बालिसुत फिरि आयउ हनुमंत ।

तासु प्रीति प्रभु सन कहि मगन भए भगवंत ॥9(ख)॥

कुलिसहु चाहि कठोर अति कोमल कुसुमहु चाहि ।

चित्त खगेस राम करसमुझि परइ कहु काहि ॥19(ग)॥

॥ चौपाई ॥

पुनि कृपाल लियो बोलि निषादा । दीन्हे भूषन बसन प्रसादा ॥

जाहु भवन मम सुमिरन करेहू । मन क्रम बचन धर्म अनुसरेहू ॥

तुम्ह मम सखा भरत सम भ्राता । सदा रहेहु पुर आवत जाता ॥

बचन सुनत उपजा सुख भारी । परेउ चरन भरि लोचन बारी ॥

चरन नलिन उर धरि गृह आवा । प्रभु सुभाउ परिजनन्हि सुनावा ॥

रघुपति चरित देखि पुरबासी । पुनि पुनि कहहिं धन्य सुखरासी ॥

राम राज बैंठें त्रेलोका । हरषित भए गए सब सोका ॥

बयरु न कर काहू सन कोई । राम प्रताप बिषमता खोई ॥

॥ दोहा ॥

बरनाश्रम निज निज धरम बनिरत बेद पथ लोग ।

चलहिं सदा पावहिं सुखहि नहिं भय सोक न रोग ॥20॥

॥ चौपाई ॥

दैहिक दैविक भौतिक तापा । राम राज नहिं काहुहि ब्यापा ॥

सब नर करहिं परस्पर प्रीती । चलहिं स्वधर्म निरत श्रुति नीती ॥

चारिउ चरन धर्म जग माहीं । पूरि रहा सपनेहुँ अघ नाहीं ॥

राम भगति रत नर अरु नारी । सकल परम गति के अधिकारी ॥

अल्पमृत्यु नहिं कवनिउ पीरा । सब सुंदर सब बिरुज सरीरा ॥

नहिं दरिद्र कोउ दुखी न दीना । नहिं कोउ अबुध न लच्छन हीना ॥

सब निर्दंभ धर्मरत पुनी । नर अरु नारि चतुर सब गुनी ॥

सब गुनग्य पंडित सब ग्यानी । सब कृतग्य नहिं कपट सयानी ॥

॥ दोहा ॥

राम राज नभगेस सुनु सचराचर जग माहिं ॥

काल कर्म सुभाव गुन कृत दुख काहुहि नाहिं ॥21॥

॥ चौपाई ॥

भूमि सप्त सागर मेखला । एक भूप रघुपति कोसला ॥

भुअन अनेक रोम प्रति जासू । यह प्रभुता कछु बहुत न तासू ॥

सो महिमा समुझत प्रभु केरी । यह बरनत हीनता घनेरी ॥

सोउ महिमा खगेस जिन्ह जानी । फिरी एहिं चरित तिन्हहुँ रति मानी ॥

सोउ जाने कर फल यह लीला । कहहिं महा मुनिबर दमसीला ॥

राम राज कर सुख संपदा । बरनि न सकइ फनीस सारदा ॥

सब उदार सब पर उपकारी । बिप्र चरन सेवक नर नारी ॥

एकनारि ब्रत रत सब झारी । ते मन बच क्रम पति हितकारी ॥

॥ दोहा ॥

दंड जतिन्ह कर भेद जहँ नर्तक नृत्य समाज ।

जीतहु मनहि सुनिअ अस रामचंद्र कें राज ॥22॥

॥ चौपाई ॥

फूलहिं फरहिं सदा तरु कानन । रहहि एक सँग गज पंचानन ॥

खग मृग सहज बयरु बिसराई । सबन्हि परस्पर प्रीति बढ़ाई ॥

कूजहिं खग मृग नाना बृंदा । अभय चरहिं बन करहिं अनंदा ॥

सीतल सुरभि पवन बह मंदा । गूंजत अलि लै चलि मकरंदा ॥

लता बिटप मागें मधु चवहीं । मनभावतो धेनु पय स्त्रवहीं ॥

ससि संपन्न सदा रह धरनी । त्रेताँ भइ कृतजुग कै करनी ॥

प्रगटीं गिरिन्ह बिबिध मनि खानी । जगदातमा भूप जग जानी ॥

सरिता सकल बहहिं बर बारी । सीतल अमल स्वाद सुखकारी ॥

सागर निज मरजादाँ रहहीं । डारहिं रत्न तटन्हि नर लहहीं ॥

सरसिज संकुल सकल तड़ागा । अति प्रसन्न दस दिसा बिभागा ॥

॥ दोहा ॥

बिधु महि पूर मयूखन्हि रबि तप जेतनेहि काज ।

मागें बारिद देहिं जल रामचंद्र के राज ॥23॥

॥ चौपाई ॥

कोटिन्ह बाजिमेध प्रभु कीन्हे । दान अनेक द्विजन्ह कहँ दीन्हे ॥

श्रुति पथ पालक धर्म धुरंधर । गुनातीत अरु भोग पुरंदर ॥

पति अनुकूल सदा रह सीता । सोभा खानि सुसील बिनीता ॥

जानति कृपासिंधु प्रभुताई । सेवति चरन कमल मन लाई ॥

जद्यपि गृहँ सेवक सेवकिनी । बिपुल सदा सेवा बिधि गुनी ॥

निज कर गृह परिचरजा करई । रामचंद्र आयसु अनुसरई ॥

जेहि बिधि कृपासिंधु सुख मानइ । सोइ कर श्री सेवा बिधि जानइ ॥

कौसल्यादि सासु गृह माहीं । सेवइ सबन्हि मान मद नाहीं ॥

उमा रमा ब्रह्मादि बंदिता । जगदंबा संततमनिंदिता ॥

॥ दोहा ॥

जासु कृपा कटाच्छु सुर चाहत चितव न सोइ ।

राम पदारबिंद रति करति सुभावहि खोइ ॥24॥

॥ चौपाई ॥

सेवहिं सानकूल सब भाई । राम चरन रति अति अधिकाई ॥

प्रभु मुख कमल बिलोकत रहहीं । कबहुँ कृपाल हमहि कछु कहहीं ॥

राम करहिं भ्रातन्ह पर प्रीती । नाना भाँति सिखावहिं नीती ॥

हरषित रहहिं नगर के लोगा । करहिं सकल सुर दुर्लभ भोगा ॥

अहनिसि बिधिहि मनावत रहहीं । श्रीरघुबीर चरन रति चहहीं ॥

दुइ सुत सुन्दर सीताँ जाए । लव कुस बेद पुरानन्ह गाए ॥

दोउ बिजई बिनई गुन मंदिर । हरि प्रतिबिंब मनहुँ अति सुंदर ॥

दुइ दुइ सुत सब भ्रातन्ह केरे । भए रूप गुन सील घनेरे ॥

॥ दोहा ॥

ग्यान गिरा गोतीत अज माया मन गुन पार ।

सोइ सच्चिदानंद घन कर नर चरित उदार ॥25॥

॥ चौपाई ॥

प्रातकाल सरऊ करि मज्जन । बैठहिं सभाँ संग द्विज सज्जन ॥

बेद पुरान बसिष्ट बखानहिं । सुनहिं राम जद्यपि सब जानहिं ॥

अनुजन्ह संजुत भोजन करहीं । देखि सकल जननीं सुख भरहीं ॥

भरत सत्रुहन दोनउ भाई । सहित पवनसुत उपबन जाई ॥

बूझहिं बैठि राम गुन गाहा । कह हनुमान सुमति अवगाहा ॥

सुनत बिमल गुन अति सुख पावहिं । बहुरि बहुरि करि बिनय कहावहिं ॥

सब कें गृह गृह होहिं पुराना । रामचरित पावन बिधि नाना ॥

नर अरु नारि राम गुन गानहिं । करहिं दिवस निसि जात न जानहिं ॥

॥ दोहा ॥

अवधपुरी बासिन्ह कर सुख संपदा समाज ।

सहस सेष नहिं कहि सकहिं जहँ नृप राम बिराज ॥26॥

॥ चौपाई ॥

नारदादि सनकादि मुनीसा । दरसन लागि कोसलाधीसा ॥

दिन प्रति सकल अजोध्या आवहिं । देखि नगरु बिरागु बिसरावहिं ॥

जातरूप मनि रचित अटारीं । नाना रंग रुचिर गच ढारीं ॥

पुर चहुँ पास कोट अति सुंदर । रचे कँगूरा रंग रंग बर ॥

नव ग्रह निकर अनीक बनाई । जनु घेरी अमरावति आई ॥

महि बहु रंग रचित गच काँचा । जो बिलोकि मुनिबर मन नाचा ॥

धवल धाम ऊपर नभ चुंबत । कलस मनहुँ रबि ससि दुति निंदत ॥

बहु मनि रचित झरोखा भ्राजहिं । गृह गृह प्रति मनि दीप बिराजहिं ॥

छं0-मनि दीप राजहिं भवन भ्राजहिं देहरीं बिद्रुम रची ।

मनि खंभ भीति बिरंचि बिरची कनक मनि मरकत खची ॥

सुंदर मनोहर मंदिरायत अजिर रुचिर फटिक रचे ।

प्रति द्वार द्वार कपाट पुरट बनाइ बहु बज्रन्हि खचे ॥

॥ दोहा ॥

चारु चित्रसाला गृह गृह प्रति लिखे बनाइ ।

राम चरित जे निरख मुनि ते मन लेहिं चोराइ ॥27॥

॥ चौपाई ॥

सुमन बाटिका सबहिं लगाई । बिबिध भाँति करि जतन बनाई ॥

लता ललित बहु जाति सुहाई । फूलहिं सदा बंसत कि नाई ॥

गुंजत मधुकर मुखर मनोहर । मारुत त्रिबिध सदा बह सुंदर ॥

नाना खग बालकन्हि जिआए । बोलत मधुर उड़ात सुहाए ॥

मोर हंस सारस पारावत । भवननि पर सोभा अति पावत ॥

जहँ तहँ देखहिं निज परिछाहीं । बहु बिधि कूजहिं नृत्य कराहीं ॥

सुक सारिका पढ़ावहिं बालक । कहहु राम रघुपति जनपालक ॥

राज दुआर सकल बिधि चारू । बीथीं चौहट रूचिर बजारू ॥

॥ छन्द ॥

बाजार रुचिर न बनइ बरनत बस्तु बिनु गथ पाइए ।

जहँ भूप रमानिवास तहँ की संपदा किमि गाइए ॥

बैठे बजाज सराफ बनिक अनेक मनहुँ कुबेर ते ।

सब सुखी सब सच्चरित सुंदर नारि नर सिसु जरठ जे ॥

॥ दोहा ॥

उत्तर दिसि सरजू बह निर्मल जल गंभीर ।

बाँधे घाट मनोहर स्वल्प पंक नहिं तीर ॥28॥

॥ चौपाई ॥

दूरि फराक रुचिर सो घाटा । जहँ जल पिअहिं बाजि गज ठाटा ॥

पनिघट परम मनोहर नाना । तहाँ न पुरुष करहिं अस्नाना ॥

राजघाट सब बिधि सुंदर बर । मज्जहिं तहाँ बरन चारिउ नर ॥

तीर तीर देवन्ह के मंदिर । चहुँ दिसि तिन्ह के उपबन सुंदर ॥

कहुँ कहुँ सरिता तीर उदासी । बसहिं ग्यान रत मुनि संन्यासी ॥

तीर तीर तुलसिका सुहाई । बृंद बृंद बहु मुनिन्ह लगाई ॥

पुर सोभा कछु बरनि न जाई । बाहेर नगर परम रुचिराई ॥

देखत पुरी अखिल अघ भागा । बन उपबन बापिका तड़ागा ॥

॥ छन्द ॥

छं0-बापीं तड़ाग अनूप कूप मनोहरायत सोहहीं ।

सोपान सुंदर नीर निर्मल देखि सुर मुनि मोहहीं ॥

बहु रंग कंज अनेक खग कूजहिं मधुप गुंजारहीं ।

आराम रम्य पिकादि खग रव जनु पथिक हंकारहीं ॥

॥ दोहा ॥

रमानाथ जहँ राजा सो पुर बरनि कि जाइ ।

अनिमादिक सुख संपदा रहीं अवध सब छाइ ॥29॥

॥ चौपाई ॥

जहँ तहँ नर रघुपति गुन गावहिं । बैठि परसपर इहइ सिखावहिं ॥

भजहु प्रनत प्रतिपालक रामहि । सोभा सील रूप गुन धामहि ॥

जलज बिलोचन स्यामल गातहि । पलक नयन इव सेवक त्रातहि ॥

धृत सर रुचिर चाप तूनीरहि । संत कंज बन रबि रनधीरहि ॥

काल कराल ब्याल खगराजहि । नमत राम अकाम ममता जहि ॥

लोभ मोह मृगजूथ किरातहि । मनसिज करि हरि जन सुखदातहि ॥

संसय सोक निबिड़ तम भानुहि । दनुज गहन घन दहन कृसानुहि ॥

जनकसुता समेत रघुबीरहि । कस न भजहु भंजन भव भीरहि ॥

बहु बासना मसक हिम रासिहि । सदा एकरस अज अबिनासिहि ॥

मुनि रंजन भंजन महि भारहि । तुलसिदास के प्रभुहि उदारहि ॥

॥ दोहा ॥

एहि बिधि नगर नारि नर करहिं राम गुन गान ।

सानुकूल सब पर रहहिं संतत कृपानिधान ॥30॥

॥ चौपाई ॥

जब ते राम प्रताप खगेसा । उदित भयउ अति प्रबल दिनेसा ॥

पूरि प्रकास रहेउ तिहुँ लोका । बहुतेन्ह सुख बहुतन मन सोका ॥

जिन्हहि सोक ते कहउँ बखानी । प्रथम अबिद्या निसा नसानी ॥

अघ उलूक जहँ तहाँ लुकाने । काम क्रोध कैरव सकुचाने ॥

बिबिध कर्म गुन काल सुभाऊ । ए चकोर सुख लहहिं न काऊ ॥

मत्सर मान मोह मद चोरा । इन्ह कर हुनर न कवनिहुँ ओरा ॥

धरम तड़ाग ग्यान बिग्याना । ए पंकज बिकसे बिधि नाना ॥

सुख संतोष बिराग बिबेका । बिगत सोक ए कोक अनेका ॥

॥ दोहा ॥

यह प्रताप रबि जाकें उर जब करइ प्रकास ।

पछिले बाढ़हिं प्रथम जे कहे ते पावहिं नास ॥31॥

॥ चौपाई ॥

भ्रातन्ह सहित रामु एक बारा । संग परम प्रिय पवनकुमारा ॥

सुंदर उपबन देखन गए । सब तरु कुसुमित पल्लव नए ॥

जानि समय सनकादिक आए । तेज पुंज गुन सील सुहाए ॥

ब्रह्मानंद सदा लयलीना । देखत बालक बहुकालीना ॥

रूप धरें जनु चारिउ बेदा । समदरसी मुनि बिगत बिभेदा ॥

आसा बसन ब्यसन यह तिन्हहीं । रघुपति चरित होइ तहँ सुनहीं ॥

तहाँ रहे सनकादि भवानी । जहँ घटसंभव मुनिबर ग्यानी ॥

राम कथा मुनिबर बहु बरनी । ग्यान जोनि पावक जिमि अरनी ॥

॥ दोहा ॥

देखि राम मुनि आवत हरषि दंडवत कीन्ह ।

स्वागत पूँछि पीत पट प्रभु बैठन कहँ दीन्ह ॥32॥

॥ चौपाई ॥

कीन्ह दंडवत तीनिउँ भाई । सहित पवनसुत सुख अधिकाई ॥

मुनि रघुपति छबि अतुल बिलोकी । भए मगन मन सके न रोकी ॥

स्यामल गात सरोरुह लोचन । सुंदरता मंदिर भव मोचन ॥

एकटक रहे निमेष न लावहिं । प्रभु कर जोरें सीस नवावहिं ॥

तिन्ह कै दसा देखि रघुबीरा । स्त्रवत नयन जल पुलक सरीरा ॥

कर गहि प्रभु मुनिबर बैठारे । परम मनोहर बचन उचारे ॥

आजु धन्य मैं सुनहु मुनीसा । तुम्हरें दरस जाहिं अघ खीसा ॥

बड़े भाग पाइब सतसंगा । बिनहिं प्रयास होहिं भव भंगा ॥

॥ दोहा ॥

दो0-संत संग अपबर्ग कर कामी भव कर पंथ ।

कहहि संत कबि कोबिद श्रुति पुरान सदग्रंथ ॥33 ॥

॥ चौपाई ॥

सुनि प्रभु बचन हरषि मुनि चारी । पुलकित तन अस्तुति अनुसारी ॥

जय भगवंत अनंत अनामय । अनघ अनेक एक करुनामय ॥

जय निर्गुन जय जय गुन सागर । सुख मंदिर सुंदर अति नागर ॥

जय इंदिरा रमन जय भूधर । अनुपम अज अनादि सोभाकर ॥

ग्यान निधान अमान मानप्रद । पावन सुजस पुरान बेद बद ॥

तग्य कृतग्य अग्यता भंजन । नाम अनेक अनाम निरंजन ॥

सर्ब सर्बगत सर्ब उरालय । बससि सदा हम कहुँ परिपालय ॥

द्वंद बिपति भव फंद बिभंजय । ह्रदि बसि राम काम मद गंजय ॥

॥ दोहा ॥

परमानंद कृपायतन मन परिपूरन काम ।

प्रेम भगति अनपायनी देहु हमहि श्रीराम ॥34॥

॥ चौपाई ॥

देहु भगति रघुपति अति पावनि । त्रिबिध ताप भव दाप नसावनि ॥

प्रनत काम सुरधेनु कलपतरु । होइ प्रसन्न दीजै प्रभु यह बरु ॥

भव बारिधि कुंभज रघुनायक । सेवत सुलभ सकल सुख दायक ॥

मन संभव दारुन दुख दारय । दीनबंधु समता बिस्तारय ॥

आस त्रास इरिषादि निवारक । बिनय बिबेक बिरति बिस्तारक ॥

भूप मौलि मन मंडन धरनी । देहि भगति संसृति सरि तरनी ॥

मुनि मन मानस हंस निरंतर । चरन कमल बंदित अज संकर ॥

रघुकुल केतु सेतु श्रुति रच्छक । काल करम सुभाउ गुन भच्छक ॥

तारन तरन हरन सब दूषन । तुलसिदास प्रभु त्रिभुवन भूषन ॥

॥ दोहा ॥

बार बार अस्तुति करि प्रेम सहित सिरु नाइ ।

ब्रह्म भवन सनकादि गे अति अभीष्ट बर पाइ ॥35॥

॥ चौपाई ॥

सनकादिक बिधि लोक सिधाए । भ्रातन्ह राम चरन सिरु नाए ॥

पूछत प्रभुहि सकल सकुचाहीं । चितवहिं सब मारुतसुत पाहीं ॥

सुनि चहहिं प्रभु मुख कै बानी । जो सुनि होइ सकल भ्रम हानी ॥

अंतरजामी प्रभु सभ जाना । बूझत कहहु काह हनुमाना ॥

जोरि पानि कह तब हनुमंता । सुनहु दीनदयाल भगवंता ॥

नाथ भरत कछु पूँछन चहहीं । प्रस्न करत मन सकुचत अहहीं ॥

तुम्ह जानहु कपि मोर सुभाऊ । भरतहि मोहि कछु अंतर काऊ ॥

सुनि प्रभु बचन भरत गहे चरना । सुनहु नाथ प्रनतारति हरना ॥

॥ दोहा ॥

नाथ न मोहि संदेह कछु सपनेहुँ सोक न मोह ।

केवल कृपा तुम्हारिहि कृपानंद संदोह ॥36॥

॥ चौपाई ॥

करउँ कृपानिधि एक ढिठाई । मैं सेवक तुम्ह जन सुखदाई ॥

संतन्ह कै महिमा रघुराई । बहु बिधि बेद पुरानन्ह गाई ॥

श्रीमुख तुम्ह पुनि कीन्हि बड़ाई । तिन्ह पर प्रभुहि प्रीति अधिकाई ॥

सुना चहउँ प्रभु तिन्ह कर लच्छन । कृपासिंधु गुन ग्यान बिचच्छन ॥

संत असंत भेद बिलगाई । प्रनतपाल मोहि कहहु बुझाई ॥

संतन्ह के लच्छन सुनु भ्राता । अगनित श्रुति पुरान बिख्याता ॥

संत असंतन्हि कै असि करनी । जिमि कुठार चंदन आचरनी ॥

काटइ परसु मलय सुनु भाई । निज गुन देइ सुगंध बसाई ॥

॥ दोहा ॥

ताते सुर सीसन्ह चढ़त जग बल्लभ श्रीखंड ।

अनल दाहि पीटत घनहिं परसु बदन यह दंड ॥37॥

॥ चौपाई ॥

बिषय अलंपट सील गुनाकर । पर दुख दुख सुख सुख देखे पर ॥

सम अभूतरिपु बिमद बिरागी । लोभामरष हरष भय त्यागी ॥

कोमलचित दीनन्ह पर दाया । मन बच क्रम मम भगति अमाया ॥

सबहि मानप्रद आपु अमानी । भरत प्रान सम मम ते प्रानी ॥

बिगत काम मम नाम परायन । सांति बिरति बिनती मुदितायन ॥

सीतलता सरलता मयत्री । द्विज पद प्रीति धर्म जनयत्री ॥

ए सब लच्छन बसहिं जासु उर । जानेहु तात संत संतत फुर ॥

सम दम नियम नीति नहिं डोलहिं । परुष बचन कबहूँ नहिं बोलहिं ॥

॥ दोहा ॥

निंदा अस्तुति उभय सम ममता मम पद कंज ।

ते सज्जन मम प्रानप्रिय गुन मंदिर सुख पुंज ॥38॥

॥ चौपाई ॥

सनहु असंतन्ह केर सुभाऊ । भूलेहुँ संगति करिअ न काऊ ॥

तिन्ह कर संग सदा दुखदाई । जिमि कलपहि घालइ हरहाई ॥

खलन्ह हृदयँ अति ताप बिसेषी । जरहिं सदा पर संपति देखी ॥

जहँ कहुँ निंदा सुनहिं पराई । हरषहिं मनहुँ परी निधि पाई ॥

काम क्रोध मद लोभ परायन । निर्दय कपटी कुटिल मलायन ॥

बयरु अकारन सब काहू सों । जो कर हित अनहित ताहू सों ॥

झूठइ लेना झूठइ देना । झूठइ भोजन झूठ चबेना ॥

बोलहिं मधुर बचन जिमि मोरा । खाइ महा अति हृदय कठोरा ॥

॥ दोहा ॥

पर द्रोही पर दार रत पर धन पर अपबाद ।

ते नर पाँवर पापमय देह धरें मनुजाद ॥39॥

॥ चौपाई ॥

लोभइ ओढ़न लोभइ डासन । सिस्त्रोदर पर जमपुर त्रास न ॥

काहू की जौं सुनहिं बड़ाई । स्वास लेहिं जनु जूड़ी आई ॥

जब काहू कै देखहिं बिपती । सुखी भए मानहुँ जग नृपती ॥

स्वारथ रत परिवार बिरोधी । लंपट काम लोभ अति क्रोधी ॥

मातु पिता गुर बिप्र न मानहिं । आपु गए अरु घालहिं आनहिं ॥

करहिं मोह बस द्रोह परावा । संत संग हरि कथा न भावा ॥

अवगुन सिंधु मंदमति कामी । बेद बिदूषक परधन स्वामी ॥

बिप्र द्रोह पर द्रोह बिसेषा । दंभ कपट जियँ धरें सुबेषा ॥

॥ दोहा ॥

ऐसे अधम मनुज खल कृतजुग त्रेता नाहिं ।

द्वापर कछुक बृंद बहु होइहहिं कलिजुग माहिं ॥40॥

॥ चौपाई ॥

पर हित सरिस धर्म नहिं भाई । पर पीड़ा सम नहिं अधमाई ॥

निर्नय सकल पुरान बेद कर । कहेउँ तात जानहिं कोबिद नर ॥

नर सरीर धरि जे पर पीरा । करहिं ते सहहिं महा भव भीरा ॥

करहिं मोह बस नर अघ नाना । स्वारथ रत परलोक नसाना ॥

कालरूप तिन्ह कहँ मैं भ्राता । सुभ अरु असुभ कर्म फल दाता ॥

अस बिचारि जे परम सयाने । भजहिं मोहि संसृत दुख जाने ॥

त्यागहिं कर्म सुभासुभ दायक । भजहिं मोहि सुर नर मुनि नायक ॥

संत असंतन्ह के गुन भाषे । ते न परहिं भव जिन्ह लखि राखे ॥

॥ दोहा ॥

सुनहु तात माया कृत गुन अरु दोष अनेक ।

गुन यह उभय न देखिअहिं देखिअ सो अबिबेक ॥41॥

॥ चौपाई ॥

श्रीमुख बचन सुनत सब भाई । हरषे प्रेम न हृदयँ समाई ॥

करहिं बिनय अति बारहिं बारा । हनूमान हियँ हरष अपारा ॥

पुनि रघुपति निज मंदिर गए । एहि बिधि चरित करत नित नए ॥

बार बार नारद मुनि आवहिं । चरित पुनीत राम के गावहिं ॥

नित नव चरन देखि मुनि जाहीं । ब्रह्मलोक सब कथा कहाहीं ॥

सुनि बिरंचि अतिसय सुख मानहिं । पुनि पुनि तात करहु गुन गानहिं ॥

सनकादिक नारदहि सराहहिं । जद्यपि ब्रह्म निरत मुनि आहहिं ॥

सुनि गुन गान समाधि बिसारी ॥ सादर सुनहिं परम अधिकारी ॥

॥ दोहा ॥

जीवनमुक्त ब्रह्मपर चरित सुनहिं तजि ध्यान ।

जे हरि कथाँ न करहिं रति तिन्ह के हिय पाषान ॥42॥

॥ चौपाई ॥

एक बार रघुनाथ बोलाए । गुर द्विज पुरबासी सब आए ॥

बैठे गुर मुनि अरु द्विज सज्जन । बोले बचन भगत भव भंजन ॥

सनहु सकल पुरजन मम बानी । कहउँ न कछु ममता उर आनी ॥

नहिं अनीति नहिं कछु प्रभुताई । सुनहु करहु जो तुम्हहि सोहाई ॥

सोइ सेवक प्रियतम मम सोई । मम अनुसासन मानै जोई ॥

जौं अनीति कछु भाषौं भाई । तौं मोहि बरजहु भय बिसराई ॥

बड़ें भाग मानुष तनु पावा । सुर दुर्लभ सब ग्रंथिन्ह गावा ॥

साधन धाम मोच्छ कर द्वारा । पाइ न जेहिं परलोक सँवारा ॥

॥ दोहा ॥

सो परत्र दुख पावइ सिर धुनि धुनि पछिताइ ।

कालहि कर्महि ईस्वरहि मिथ्या दोष लगाइ ॥43॥

॥ चौपाई ॥

एहि तन कर फल बिषय न भाई । स्वर्गउ स्वल्प अंत दुखदाई ॥

नर तनु पाइ बिषयँ मन देहीं । पलटि सुधा ते सठ बिष लेहीं ॥

ताहि कबहुँ भल कहइ न कोई । गुंजा ग्रहइ परस मनि खोई ॥

आकर चारि लच्छ चौरासी । जोनि भ्रमत यह जिव अबिनासी ॥

फिरत सदा माया कर प्रेरा । काल कर्म सुभाव गुन घेरा ॥

कबहुँक करि करुना नर देही । देत ईस बिनु हेतु सनेही ॥

नर तनु भव बारिधि कहुँ बेरो । सन्मुख मरुत अनुग्रह मेरो ॥

करनधार सदगुर दृढ़ नावा । दुर्लभ साज सुलभ करि पावा ॥

॥ दोहा ॥

जो न तरै भव सागर नर समाज अस पाइ ।

सो कृत निंदक मंदमति आत्माहन गति जाइ ॥44॥

॥ चौपाई ॥

जौं परलोक इहाँ सुख चहहू । सुनि मम बचन ह्रृदयँ दृढ़ गहहू ॥

सुलभ सुखद मारग यह भाई । भगति मोरि पुरान श्रुति गाई ॥

ग्यान अगम प्रत्यूह अनेका । साधन कठिन न मन कहुँ टेका ॥

करत कष्ट बहु पावइ कोऊ । भक्ति हीन मोहि प्रिय नहिं सोऊ ॥

भक्ति सुतंत्र सकल सुख खानी । बिनु सतसंग न पावहिं प्रानी ॥

पुन्य पुंज बिनु मिलहिं न संता । सतसंगति संसृति कर अंता ॥

पुन्य एक जग महुँ नहिं दूजा । मन क्रम बचन बिप्र पद पूजा ॥

सानुकूल तेहि पर मुनि देवा । जो तजि कपटु करइ द्विज सेवा ॥

॥ दोहा ॥

औरउ एक गुपुत मत सबहि कहउँ कर जोरि ।

संकर भजन बिना नर भगति न पावइ मोरि ॥45॥

॥ चौपाई ॥

कहहु भगति पथ कवन प्रयासा । जोग न मख जप तप उपवासा ॥

सरल सुभाव न मन कुटिलाई । जथा लाभ संतोष सदाई ॥

मोर दास कहाइ नर आसा । करइ तौ कहहु कहा बिस्वासा ॥

बहुत कहउँ का कथा बढ़ाई । एहि आचरन बस्य मैं भाई ॥

बैर न बिग्रह आस न त्रासा । सुखमय ताहि सदा सब आसा ॥

अनारंभ अनिकेत अमानी । अनघ अरोष दच्छ बिग्यानी ॥

प्रीति सदा सज्जन संसर्गा । तृन सम बिषय स्वर्ग अपबर्गा ॥

भगति पच्छ हठ नहिं सठताई । दुष्ट तर्क सब दूरि बहाई ॥

॥ दोहा ॥

मम गुन ग्राम नाम रत गत ममता मद मोह ।

ता कर सुख सोइ जानइ परानंद संदोह ॥46॥

सुनत सुधासम बचन राम के । गहे सबनि पद कृपाधाम के ॥

जननि जनक गुर बंधु हमारे । कृपा निधान प्रान ते प्यारे ॥

तनु धनु धाम राम हितकारी । सब बिधि तुम्ह प्रनतारति हारी ॥

असि सिख तुम्ह बिनु देइ न कोऊ । मातु पिता स्वारथ रत ओऊ ॥

हेतु रहित जग जुग उपकारी । तुम्ह तुम्हार सेवक असुरारी ॥

स्वारथ मीत सकल जग माहीं । सपनेहुँ प्रभु परमारथ नाहीं ॥

सबके बचन प्रेम रस साने । सुनि रघुनाथ हृदयँ हरषाने ॥

निज निज गृह गए आयसु पाई । बरनत प्रभु बतकही सुहाई ॥

॥ दोहा ॥

उमा अवधबासी नर नारि कृतारथ रूप ।

ब्रह्म सच्चिदानंद घन रघुनायक जहँ भूप ॥47॥

॥ दोहा ॥

एक बार बसिष्ट मुनि आए । जहाँ राम सुखधाम सुहाए ॥

अति आदर रघुनायक कीन्हा । पद पखारि पादोदक लीन्हा ॥

राम सुनहु मुनि कह कर जोरी । कृपासिंधु बिनती कछु मोरी ॥

देखि देखि आचरन तुम्हारा । होत मोह मम हृदयँ अपारा ॥

महिमा अमित बेद नहिं जाना । मैं केहि भाँति कहउँ भगवाना ॥

उपरोहित्य कर्म अति मंदा । बेद पुरान सुमृति कर निंदा ॥

जब न लेउँ मैं तब बिधि मोही । कहा लाभ आगें सुत तोही ॥

परमातमा ब्रह्म नर रूपा । होइहि रघुकुल भूषन भूपा ॥

॥ दोहा ॥

तब मैं हृदयँ बिचारा जोग जग्य ब्रत दान ।

जा कहुँ करिअ सो पैहउँ धर्म न एहि सम आन ॥48॥

॥ चौपाई ॥

जप तप नियम जोग निज धर्मा । श्रुति संभव नाना सुभ कर्मा ॥

ग्यान दया दम तीरथ मज्जन । जहँ लगि धर्म कहत श्रुति सज्जन ॥

आगम निगम पुरान अनेका । पढ़े सुने कर फल प्रभु एका ॥

तब पद पंकज प्रीति निरंतर । सब साधन कर यह फल सुंदर ॥

छूटइ मल कि मलहि के धोएँ । घृत कि पाव कोइ बारि बिलोएँ ॥

प्रेम भगति जल बिनु रघुराई । अभिअंतर मल कबहुँ न जाई ॥

सोइ सर्बग्य तग्य सोइ पंडित । सोइ गुन गृह बिग्यान अखंडित ॥

दच्छ सकल लच्छन जुत सोई । जाकें पद सरोज रति होई ॥

॥ दोहा ॥

नाथ एक बर मागउँ राम कृपा करि देहु ।

जन्म जन्म प्रभु पद कमल कबहुँ घटै जनि नेहु ॥49॥

॥ चौपाई ॥

अस कहि मुनि बसिष्ट गृह आए । कृपासिंधु के मन अति भाए ॥

हनूमान भरतादिक भ्राता । संग लिए सेवक सुखदाता ॥

पुनि कृपाल पुर बाहेर गए । गज रथ तुरग मगावत भए ॥

देखि कृपा करि सकल सराहे । दिए उचित जिन्ह जिन्ह तेइ चाहे ॥

हरन सकल श्रम प्रभु श्रम पाई । गए जहाँ सीतल अवँराई ॥

भरत दीन्ह निज बसन डसाई । बैठे प्रभु सेवहिं सब भाई ॥

मारुतसुत तब मारूत करई । पुलक बपुष लोचन जल भरई ॥

हनूमान सम नहिं बड़भागी । नहिं कोउ राम चरन अनुरागी ॥

गिरिजा जासु प्रीति सेवकाई । बार बार प्रभु निज मुख गाई ॥

॥ दोहा ॥

तेहिं अवसर मुनि नारद आए करतल बीन ।

गावन लगे राम कल कीरति सदा नबीन ॥50॥

॥ चौपाई ॥

मामवलोकय पंकज लोचन । कृपा बिलोकनि सोच बिमोचन ॥

नील तामरस स्याम काम अरि । हृदय कंज मकरंद मधुप हरि ॥

जातुधान बरूथ बल भंजन । मुनि सज्जन रंजन अघ गंजन ॥

भूसुर ससि नव बृंद बलाहक । असरन सरन दीन जन गाहक ॥

भुज बल बिपुल भार महि खंडित । खर दूषन बिराध बध पंडित ॥

रावनारि सुखरूप भूपबर । जय दसरथ कुल कुमुद सुधाकर ॥

सुजस पुरान बिदित निगमागम । गावत सुर मुनि संत समागम ॥

कारुनीक ब्यलीक मद खंडन । सब बिधि कुसल कोसला मंडन ॥

कलि मल मथन नाम ममताहन । तुलसीदास प्रभु पाहि प्रनत जन ॥

॥ चौपाई ॥

प्रेम सहित मुनि नारद बरनि राम गुन ग्राम ।

सोभासिंधु हृदयँ धरि गए जहाँ बिधि धाम ॥51॥

॥ चौपाई ॥

गिरिजा सुनहु बिसद यह कथा । मैं सब कही मोरि मति जथा ॥

राम चरित सत कोटि अपारा । श्रुति सारदा न बरनै पारा ॥

राम अनंत अनंत गुनानी । जन्म कर्म अनंत नामानी ॥

जल सीकर महि रज गनि जाहीं । रघुपति चरित न बरनि सिराहीं ॥

बिमल कथा हरि पद दायनी । भगति होइ सुनि अनपायनी ॥

उमा कहिउँ सब कथा सुहाई । जो भुसुंडि खगपतिहि सुनाई ॥

कछुक राम गुन कहेउँ बखानी । अब का कहौं सो कहहु भवानी ॥

सुनि सुभ कथा उमा हरषानी । बोली अति बिनीत मृदु बानी ॥

धन्य धन्य मैं धन्य पुरारी । सुनेउँ राम गुन भव भय हारी ॥

॥ दोहा ॥

तुम्हरी कृपाँ कृपायतन अब कृतकृत्य न मोह ।

जानेउँ राम प्रताप प्रभु चिदानंद संदोह ॥52(क)॥

नाथ तवानन ससि स्रवत कथा सुधा रघुबीर ।

श्रवन पुटन्हि मन पान करि नहिं अघात मतिधीर ॥52(ख)॥

॥ चौपाई ॥

राम चरित जे सुनत अघाहीं । रस बिसेष जाना तिन्ह नाहीं ॥

जीवनमुक्त महामुनि जेऊ । हरि गुन सुनहीं निरंतर तेऊ ॥

भव सागर चह पार जो पावा । राम कथा ता कहँ दृढ़ नावा ॥

बिषइन्ह कहँ पुनि हरि गुन ग्रामा । श्रवन सुखद अरु मन अभिरामा ॥

श्रवनवंत अस को जग माहीं । जाहि न रघुपति चरित सोहाहीं ॥

ते जड़ जीव निजात्मक घाती । जिन्हहि न रघुपति कथा सोहाती ॥

हरिचरित्र मानस तुम्ह गावा । सुनि मैं नाथ अमिति सुख पावा ॥

तुम्ह जो कही यह कथा सुहाई । कागभसुंडि गरुड़ प्रति गाई ॥

॥ दोहा ॥

बिरति ग्यान बिग्यान दृढ़ राम चरन अति नेह ।

बायस तन रघुपति भगति मोहि परम संदेह ॥53॥

॥ चौपाई ॥

नर सहस्त्र महँ सुनहु पुरारी । कोउ एक होइ धर्म ब्रतधारी ॥

धर्मसील कोटिक महँ कोई । बिषय बिमुख बिराग रत होई ॥

कोटि बिरक्त मध्य श्रुति कहई । सम्यक ग्यान सकृत कोउ लहई ॥

ग्यानवंत कोटिक महँ कोऊ । जीवनमुक्त सकृत जग सोऊ ॥

तिन्ह सहस्त्र महुँ सब सुख खानी । दुर्लभ ब्रह्मलीन बिग्यानी ॥

धर्मसील बिरक्त अरु ग्यानी । जीवनमुक्त ब्रह्मपर प्रानी ॥

सब ते सो दुर्लभ सुरराया । राम भगति रत गत मद माया ॥

सो हरिभगति काग किमि पाई । बिस्वनाथ मोहि कहहु बुझाई ॥

॥ दोहा ॥

राम परायन ग्यान रत गुनागार मति धीर ।

नाथ कहहु केहि कारन पायउ काक सरीर ॥54॥

॥ चौपाई ॥

यह प्रभु चरित पवित्र सुहावा । कहहु कृपाल काग कहँ पावा ॥

तुम्ह केहि भाँति सुना मदनारी । कहहु मोहि अति कौतुक भारी ॥

गरुड़ महाग्यानी गुन रासी । हरि सेवक अति निकट निवासी ॥

तेहिं केहि हेतु काग सन जाई । सुनी कथा मुनि निकर बिहाई ॥

कहहु कवन बिधि भा संबादा । दोउ हरिभगत काग उरगादा ॥

गौरि गिरा सुनि सरल सुहाई । बोले सिव सादर सुख पाई ॥

धन्य सती पावन मति तोरी । रघुपति चरन प्रीति नहिं थोरी ॥

सुनहु परम पुनीत इतिहासा । जो सुनि सकल लोक भ्रम नासा ॥

उपजइ राम चरन बिस्वासा । भव निधि तर नर बिनहिं प्रयासा ॥

॥ दोहा ॥

ऐसिअ प्रस्न बिहंगपति कीन्ह काग सन जाइ ।

सो सब सादर कहिहउँ सुनहु उमा मन लाइ ॥55॥

॥ चौपाई ॥

मैं जिमि कथा सुनी भव मोचनि । सो प्रसंग सुनु सुमुखि सुलोचनि ॥

प्रथम दच्छ गृह तव अवतारा । सती नाम तब रहा तुम्हारा ॥

दच्छ जग्य तब भा अपमाना । तुम्ह अति क्रोध तजे तब प्राना ॥

मम अनुचरन्ह कीन्ह मख भंगा । जानहु तुम्ह सो सकल प्रसंगा ॥

तब अति सोच भयउ मन मोरें । दुखी भयउँ बियोग प्रिय तोरें ॥

सुंदर बन गिरि सरित तड़ागा । कौतुक देखत फिरउँ बेरागा ॥

गिरि सुमेर उत्तर दिसि दूरी । नील सैल एक सुन्दर भूरी ॥

तासु कनकमय सिखर सुहाए । चारि चारु मोरे मन भाए ॥

तिन्ह पर एक एक बिटप बिसाला । बट पीपर पाकरी रसाला ॥

सैलोपरि सर सुंदर सोहा । मनि सोपान देखि मन मोहा ॥

॥ दोहा ॥

सीतल अमल मधुर जल जलज बिपुल बहुरंग ।

कूजत कल रव हंस गन गुंजत मजुंल भृंग ॥56॥

॥ चौपाई ॥

तेहिं गिरि रुचिर बसइ खग सोई । तासु नास कल्पांत न होई ॥

माया कृत गुन दोष अनेका । मोह मनोज आदि अबिबेका ॥

रहे ब्यापि समस्त जग माहीं । तेहि गिरि निकट कबहुँ नहिं जाहीं ॥

तहँ बसि हरिहि भजइ जिमि कागा । सो सुनु उमा सहित अनुरागा ॥

पीपर तरु तर ध्यान सो धरई । जाप जग्य पाकरि तर करई ॥

आँब छाहँ कर मानस पूजा । तजि हरि भजनु काजु नहिं दूजा ॥

बर तर कह हरि कथा प्रसंगा । आवहिं सुनहिं अनेक बिहंगा ॥

राम चरित बिचीत्र बिधि नाना । प्रेम सहित कर सादर गाना ॥

सुनहिं सकल मति बिमल मराला । बसहिं निरंतर जे तेहिं ताला ॥

जब मैं जाइ सो कौतुक देखा । उर उपजा आनंद बिसेषा ॥

॥ दोहा ॥

तब कछु काल मराल तनु धरि तहँ कीन्ह निवास ।

सादर सुनि रघुपति गुन पुनि आयउँ कैलास ॥57॥

॥ चौपाई ॥

गिरिजा कहेउँ सो सब इतिहासा । मैं जेहि समय गयउँ खग पासा ॥

अब सो कथा सुनहु जेही हेतू । गयउ काग पहिं खग कुल केतू ॥

जब रघुनाथ कीन्हि रन क्रीड़ा । समुझत चरित होति मोहि ब्रीड़ा ॥

इंद्रजीत कर आपु बँधायो । तब नारद मुनि गरुड़ पठायो ॥

बंधन काटि गयो उरगादा । उपजा हृदयँ प्रचंड बिषादा ॥

प्रभु बंधन समुझत बहु भाँती । करत बिचार उरग आराती ॥

ब्यापक ब्रह्म बिरज बागीसा । माया मोह पार परमीसा ॥

सो अवतार सुनेउँ जग माहीं । देखेउँ सो प्रभाव कछु नाहीं ॥

॥ दोहा ॥

भव बंधन ते छूटहिं नर जपि जा कर नाम ।

खर्च निसाचर बाँधेउ नागपास सोइ राम ॥58॥

॥ चौपाई ॥

नाना भाँति मनहि समुझावा । प्रगट न ग्यान हृदयँ भ्रम छावा ॥

खेद खिन्न मन तर्क बढ़ाई । भयउ मोहबस तुम्हरिहिं नाई ॥

ब्याकुल गयउ देवरिषि पाहीं । कहेसि जो संसय निज मन माहीं ॥

सुनि नारदहि लागि अति दाया । सुनु खग प्रबल राम कै माया ॥

जो ग्यानिन्ह कर चित अपहरई । बरिआई बिमोह मन करई ॥

जेहिं बहु बार नचावा मोही । सोइ ब्यापी बिहंगपति तोही ॥

महामोह उपजा उर तोरें । मिटिहि न बेगि कहें खग मोरें ॥

चतुरानन पहिं जाहु खगेसा । सोइ करेहु जेहि होइ निदेसा ॥

॥ दोहा ॥

अस कहि चले देवरिषि करत राम गुन गान ।

हरि माया बल बरनत पुनि पुनि परम सुजान ॥59॥

॥ चौपाई ॥

तब खगपति बिरंचि पहिं गयऊ । निज संदेह सुनावत भयऊ ॥

सुनि बिरंचि रामहि सिरु नावा । समुझि प्रताप प्रेम अति छावा ॥

मन महुँ करइ बिचार बिधाता । माया बस कबि कोबिद ग्याता ॥

हरि माया कर अमिति प्रभावा । बिपुल बार जेहिं मोहि नचावा ॥

अग जगमय जग मम उपराजा । नहिं आचरज मोह खगराजा ॥

तब बोले बिधि गिरा सुहाई । जान महेस राम प्रभुताई ॥

बैनतेय संकर पहिं जाहू । तात अनत पूछहु जनि काहू ॥

तहँ होइहि तव संसय हानी । चलेउ बिहंग सुनत बिधि बानी ॥

॥ दोहा ॥

परमातुर बिहंगपति आयउ तब मो पास ।

जात रहेउँ कुबेर गृह रहिहु उमा कैलास ॥60॥

॥ चौपाई ॥

तेहिं मम पद सादर सिरु नावा । पुनि आपन संदेह सुनावा ॥

सुनि ता करि बिनती मृदु बानी । परेम सहित मैं कहेउँ भवानी ॥

मिलेहु गरुड़ मारग महँ मोही । कवन भाँति समुझावौं तोही ॥

तबहि होइ सब संसय भंगा । जब बहु काल करिअ सतसंगा ॥

सुनिअ तहाँ हरि कथा सुहाई । नाना भाँति मुनिन्ह जो गाई ॥

जेहि महुँ आदि मध्य अवसाना । प्रभु प्रतिपाद्य राम भगवाना ॥

नित हरि कथा होत जहँ भाई । पठवउँ तहाँ सुनहि तुम्ह जाई ॥

जाइहि सुनत सकल संदेहा । राम चरन होइहि अति नेहा ॥

॥ दोहा ॥

बिनु सतसंग न हरि कथा तेहि बिनु मोह न भाग ।

मोह गएँ बिनु राम पद होइ न दृढ़ अनुराग ॥61॥

॥ चौपाई ॥

मिलहिं न रघुपति बिनु अनुरागा । किएँ जोग तप ग्यान बिरागा ॥

उत्तर दिसि सुंदर गिरि नीला । तहँ रह काकभुसुंडि सुसीला ॥

राम भगति पथ परम प्रबीना । ग्यानी गुन गृह बहु कालीना ॥

राम कथा सो कहइ निरंतर । सादर सुनहिं बिबिध बिहंगबर ॥

जाइ सुनहु तहँ हरि गुन भूरी । होइहि मोह जनित दुख दूरी ॥

मैं जब तेहि सब कहा बुझाई । चलेउ हरषि मम पद सिरु नाई ॥

ताते उमा न मैं समुझावा । रघुपति कृपाँ मरमु मैं पावा ॥

होइहि कीन्ह कबहुँ अभिमाना । सो खौवै चह कृपानिधाना ॥

कछु तेहि ते पुनि मैं नहिं राखा । समुझइ खग खगही कै भाषा ॥

प्रभु माया बलवंत भवानी । जाहि न मोह कवन अस ग्यानी ॥

॥ दोहा ॥

ग्यानि भगत सिरोमनि त्रिभुवनपति कर जान ।

ताहि मोह माया नर पावँर करहिं गुमान ॥62(क)॥

मासपारायण, अट्ठाईसवाँ विश्राम

॥ दोहा ॥

सिव बिरंचि कहुँ मोहइ को है बपुरा आन ।

अस जियँ जानि भजहिं मुनि माया पति भगवान ॥62(ख)॥

॥ चौपाई ॥

गयउ गरुड़ जहँ बसइ भुसुंडा । मति अकुंठ हरि भगति अखंडा ॥

देखि सैल प्रसन्न मन भयऊ । माया मोह सोच सब गयऊ ॥

करि तड़ाग मज्जन जलपाना । बट तर गयउ हृदयँ हरषाना ॥

बृद्ध बृद्ध बिहंग तहँ आए । सुनै राम के चरित सुहाए ॥

कथा अरंभ करै सोइ चाहा । तेही समय गयउ खगनाहा ॥

आवत देखि सकल खगराजा । हरषेउ बायस सहित समाजा ॥

अति आदर खगपति कर कीन्हा । स्वागत पूछि सुआसन दीन्हा ॥

करि पूजा समेत अनुरागा । मधुर बचन तब बोलेउ कागा ॥

॥ दोहा ॥

नाथ कृतारथ भयउँ मैं तव दरसन खगराज ।

आयसु देहु सो करौं अब प्रभु आयहु केहि काज ॥63(क)॥

सदा कृतारथ रूप तुम्ह कह मृदु बचन खगेस ।

जेहि कै अस्तुति सादर निज मुख कीन्हि महेस ॥63(ख)॥

॥ चौपाई ॥

सुनहु तात जेहि कारन आयउँ । सो सब भयउ दरस तव पायउँ ॥

देखि परम पावन तव आश्रम । गयउ मोह संसय नाना भ्रम ॥

अब श्रीराम कथा अति पावनि । सदा सुखद दुख पुंज नसावनि ॥

सादर तात सुनावहु मोही । बार बार बिनवउँ प्रभु तोही ॥

सुनत गरुड़ कै गिरा बिनीता । सरल सुप्रेम सुखद सुपुनीता ॥

भयउ तासु मन परम उछाहा । लाग कहै रघुपति गुन गाहा ॥

प्रथमहिं अति अनुराग भवानी । रामचरित सर कहेसि बखानी ॥

पुनि नारद कर मोह अपारा । कहेसि बहुरि रावन अवतारा ॥

प्रभु अवतार कथा पुनि गाई । तब सिसु चरित कहेसि मन लाई ॥

॥ दोहा ॥

बालचरित कहिं बिबिध बिधि मन महँ परम उछाह ।

रिषि आगवन कहेसि पुनि श्री रघुबीर बिबाह ॥64॥

॥ चौपाई ॥

बहुरि राम अभिषेक प्रसंगा । पुनि नृप बचन राज रस भंगा ॥

पुरबासिन्ह कर बिरह बिषादा । कहेसि राम लछिमन संबादा ॥

बिपिन गवन केवट अनुरागा । सुरसरि उतरि निवास प्रयागा ॥

बालमीक प्रभु मिलन बखाना । चित्रकूट जिमि बसे भगवाना ॥

सचिवागवन नगर नृप मरना । भरतागवन प्रेम बहु बरना ॥

करि नृप क्रिया संग पुरबासी । भरत गए जहँ प्रभु सुख रासी ॥

पुनि रघुपति बहु बिधि समुझाए । लै पादुका अवधपुर आए ॥

भरत रहनि सुरपति सुत करनी । प्रभु अरु अत्रि भेंट पुनि बरनी ॥

॥ दोहा ॥

कहि बिराध बध जेहि बिधि देह तजी सरभंग ॥

बरनि सुतीछन प्रीति पुनि प्रभु अगस्ति सतसंग ॥65॥

॥ चौपाई ॥

कहि दंडक बन पावनताई । गीध मइत्री पुनि तेहिं गाई ॥

पुनि प्रभु पंचवटीं कृत बासा । भंजी सकल मुनिन्ह की त्रासा ॥

पुनि लछिमन उपदेस अनूपा । सूपनखा जिमि कीन्हि कुरूपा ॥

खर दूषन बध बहुरि बखाना । जिमि सब मरमु दसानन जाना ॥

दसकंधर मारीच बतकहीं । जेहि बिधि भई सो सब तेहिं कही ॥

पुनि माया सीता कर हरना । श्रीरघुबीर बिरह कछु बरना ॥

पुनि प्रभु गीध क्रिया जिमि कीन्ही । बधि कबंध सबरिहि गति दीन्ही ॥

बहुरि बिरह बरनत रघुबीरा । जेहि बिधि गए सरोबर तीरा ॥

॥ दोहा ॥

प्रभु नारद संबाद कहि मारुति मिलन प्रसंग ।

पुनि सुग्रीव मिताई बालि प्रान कर भंग ॥66((क)॥

कपिहि तिलक करि प्रभु कृत सैल प्रबरषन बास ।

बरनन बर्षा सरद अरु राम रोष कपि त्रास ॥66(ख)॥

॥ चौपाई ॥

जेहि बिधि कपिपति कीस पठाए । सीता खोज सकल दिसि धाए ॥

बिबर प्रबेस कीन्ह जेहि भाँती । कपिन्ह बहोरि मिला संपाती ॥

सुनि सब कथा समीरकुमारा । नाघत भयउ पयोधि अपारा ॥

लंकाँ कपि प्रबेस जिमि कीन्हा । पुनि सीतहि धीरजु जिमि दीन्हा ॥

बन उजारि रावनहि प्रबोधी । पुर दहि नाघेउ बहुरि पयोधी ॥

आए कपि सब जहँ रघुराई । बैदेही कि कुसल सुनाई ॥

सेन समेति जथा रघुबीरा । उतरे जाइ बारिनिधि तीरा ॥

मिला बिभीषन जेहि बिधि आई । सागर निग्रह कथा सुनाई ॥

॥ दोहा ॥

सेतु बाँधि कपि सेन जिमि उतरी सागर पार ।

गयउ बसीठी बीरबर जेहि बिधि बालिकुमार ॥67(क)॥

निसिचर कीस लराई बरनिसि बिबिध प्रकार ।

कुंभकरन घननाद कर बल पौरुष संघार ॥67(ख)॥

॥ चौपाई ॥

निसिचर निकर मरन बिधि नाना । रघुपति रावन समर बखाना ॥

रावन बध मंदोदरि सोका । राज बिभीषण देव असोका ॥

सीता रघुपति मिलन बहोरी । सुरन्ह कीन्ह अस्तुति कर जोरी ॥

पुनि पुष्पक चढ़ि कपिन्ह समेता । अवध चले प्रभु कृपा निकेता ॥

जेहि बिधि राम नगर निज आए । बायस बिसद चरित सब गाए ॥

कहेसि बहोरि राम अभिषैका । पुर बरनत नृपनीति अनेका ॥

कथा समस्त भुसुंड बखानी । जो मैं तुम्ह सन कही भवानी ॥

सुनि सब राम कथा खगनाहा । कहत बचन मन परम उछाहा ॥

॥ सोरठा ॥

गयउ मोर संदेह सुनेउँ सकल रघुपति चरित ।

भयउ राम पद नेह तव प्रसाद बायस तिलक ॥68(क)॥

मोहि भयउ अति मोह प्रभु बंधन रन महुँ निरखि ।

चिदानंद संदोह राम बिकल कारन कवन ॥68(ख)॥

॥ चौपाई ॥

देखि चरित अति नर अनुसारी । भयउ हृदयँ मम संसय भारी ॥

सोइ भ्रम अब हित करि मैं माना । कीन्ह अनुग्रह कृपानिधाना ॥

जो अति आतप ब्याकुल होई । तरु छाया सुख जानइ सोई ॥

जौं नहिं होत मोह अति मोही । मिलतेउँ तात कवन बिधि तोही ॥

सुनतेउँ किमि हरि कथा सुहाई । अति बिचित्र बहु बिधि तुम्ह गाई ॥

निगमागम पुरान मत एहा । कहहिं सिद्ध मुनि नहिं संदेहा ॥

संत बिसुद्ध मिलहिं परि तेही । चितवहिं राम कृपा करि जेही ॥

राम कृपाँ तव दरसन भयऊ । तव प्रसाद सब संसय गयऊ ॥

॥ दोहा ॥

सुनि बिहंगपति बानी सहित बिनय अनुराग ।

पुलक गात लोचन सजल मन हरषेउ अति काग ॥69(क)॥

श्रोता सुमति सुसील सुचि कथा रसिक हरि दास ।

पाइ उमा अति गोप्यमपि सज्जन करहिं प्रकास ॥69(ख)॥

॥ चौपाई ॥

बोलेउ काकभसुंड बहोरी । नभग नाथ पर प्रीति न थोरी ॥

सब बिधि नाथ पूज्य तुम्ह मेरे । कृपापात्र रघुनायक केरे ॥

तुम्हहि न संसय मोह न माया । मो पर नाथ कीन्ह तुम्ह दाया ॥

पठइ मोह मिस खगपति तोही । रघुपति दीन्हि बड़ाई मोही ॥

तुम्ह निज मोह कही खग साईं । सो नहिं कछु आचरज गोसाईं ॥

नारद भव बिरंचि सनकादी । जे मुनिनायक आतमबादी ॥

मोह न अंध कीन्ह केहि केही । को जग काम नचाव न जेही ॥

तृस्नाँ केहि न कीन्ह बौराहा । केहि कर हृदय क्रोध नहिं दाहा ॥

॥ दोहा ॥

ग्यानी तापस सूर कबि कोबिद गुन आगार ।

केहि कै लौभ बिडंबना कीन्हि न एहिं संसार ॥70(क)॥

श्री मद बक्र न कीन्ह केहि प्रभुता बधिर न काहि ।

मृगलोचनि के नैन सर को अस लाग न जाहि ॥70(ख)॥

॥ चौपाई ॥

गुन कृत सन्यपात नहिं केही । कोउ न मान मद तजेउ निबेही ॥

जोबन ज्वर केहि नहिं बलकावा । ममता केहि कर जस न नसावा ॥

मच्छर काहि कलंक न लावा । काहि न सोक समीर डोलावा ॥

चिंता साँपिनि को नहिं खाया । को जग जाहि न ब्यापी माया ॥

कीट मनोरथ दारु सरीरा । जेहि न लाग घुन को अस धीरा ॥

सुत बित लोक ईषना तीनी । केहि के मति इन्ह कृत न मलीनी ॥

यह सब माया कर परिवारा । प्रबल अमिति को बरनै पारा ॥

सिव चतुरानन जाहि डेराहीं । अपर जीव केहि लेखे माहीं ॥

॥ दोहा ॥

ब्यापि रहेउ संसार महुँ माया कटक प्रचंड ॥

सेनापति कामादि भट दंभ कपट पाषंड ॥71(क)॥

सो दासी रघुबीर कै समुझें मिथ्या सोपि ।

छूट न राम कृपा बिनु नाथ कहउँ पद रोपि ॥71(ख)॥

॥ चौपाई ॥

जो माया सब जगहि नचावा । जासु चरित लखि काहुँ न पावा ॥

सोइ प्रभु भ्रू बिलास खगराजा । नाच नटी इव सहित समाजा ॥

सोइ सच्चिदानंद घन रामा । अज बिग्यान रूपो बल धामा ॥

ब्यापक ब्याप्य अखंड अनंता । अखिल अमोघसक्ति भगवंता ॥

अगुन अदभ्र गिरा गोतीता । सबदरसी अनवद्य अजीता ॥

निर्मम निराकार निरमोहा । नित्य निरंजन सुख संदोहा ॥

प्रकृति पार प्रभु सब उर बासी । ब्रह्म निरीह बिरज अबिनासी ॥

इहाँ मोह कर कारन नाहीं । रबि सन्मुख तम कबहुँ कि जाहीं ॥

॥ दोहा ॥

भगत हेतु भगवान प्रभु राम धरेउ तनु भूप ।

किए चरित पावन परम प्राकृत नर अनुरूप ॥72(क)॥

जथा अनेक बेष धरि नृत्य करइ नट कोइ ।

सोइ सोइ भाव देखावइ आपुन होइ न सोइ ॥72(ख)॥

॥ चौपाई ॥

असि रघुपति लीला उरगारी । दनुज बिमोहनि जन सुखकारी ॥

जे मति मलिन बिषयबस कामी । प्रभु मोह धरहिं इमि स्वामी ॥

नयन दोष जा कहँ जब होई । पीत बरन ससि कहुँ कह सोई ॥

जब जेहि दिसि भ्रम होइ खगेसा । सो कह पच्छिम उयउ दिनेसा ॥

नौकारूढ़ चलत जग देखा । अचल मोह बस आपुहि लेखा ॥

बालक भ्रमहिं न भ्रमहिं गृहादीं । कहहिं परस्पर मिथ्याबादी ॥

हरि बिषइक अस मोह बिहंगा । सपनेहुँ नहिं अग्यान प्रसंगा ॥

मायाबस मतिमंद अभागी । हृदयँ जमनिका बहुबिधि लागी ॥

ते सठ हठ बस संसय करहीं । निज अग्यान राम पर धरहीं ॥

॥ दोहा ॥

काम क्रोध मद लोभ रत गृहासक्त दुखरूप ।

ते किमि जानहिं रघुपतिहि मूढ़ परे तम कूप ॥73(क)॥

निर्गुन रूप सुलभ अति सगुन जान नहिं कोइ ।

सुगम अगम नाना चरित सुनि मुनि मन भ्रम होइ ॥73(ख)॥

॥ चौपाई ॥

सुनु खगेस रघुपति प्रभुताई । कहउँ जथामति कथा सुहाई ॥

जेहि बिधि मोह भयउ प्रभु मोही । सोउ सब कथा सुनावउँ तोही ॥

राम कृपा भाजन तुम्ह ताता । हरि गुन प्रीति मोहि सुखदाता ॥

ताते नहिं कछु तुम्हहिं दुरावउँ । परम रहस्य मनोहर गावउँ ॥

सुनहु राम कर सहज सुभाऊ । जन अभिमान न राखहिं काऊ ॥

संसृत मूल सूलप्रद नाना । सकल सोक दायक अभिमाना ॥

ताते करहिं कृपानिधि दूरी । सेवक पर ममता अति भूरी ॥

जिमि सिसु तन ब्रन होइ गोसाई । मातु चिराव कठिन की नाईं ॥

॥ दोहा ॥

जदपि प्रथम दुख पावइ रोवइ बाल अधीर ।

ब्याधि नास हित जननी गनति न सो सिसु पीर ॥74(क)॥

तिमि रघुपति निज दासकर हरहिं मान हित लागि ।

तुलसिदास ऐसे प्रभुहि कस न भजहु भ्रम त्यागि ॥74(ख)॥

॥ चौपाई ॥

राम कृपा आपनि जड़ताई । कहउँ खगेस सुनहु मन लाई ॥

जब जब राम मनुज तनु धरहीं । भक्त हेतु लील बहु करहीं ॥

तब तब अवधपुरी मैं ज़ाऊँ । बालचरित बिलोकि हरषाऊँ ॥

जन्म महोत्सव देखउँ जाई । बरष पाँच तहँ रहउँ लोभाई ॥

इष्टदेव मम बालक रामा । सोभा बपुष कोटि सत कामा ॥

निज प्रभु बदन निहारि निहारी । लोचन सुफल करउँ उरगारी ॥

लघु बायस बपु धरि हरि संगा । देखउँ बालचरित बहुरंगा ॥

॥ दोहा ॥

लरिकाईं जहँ जहँ फिरहिं तहँ तहँ संग उड़ाउँ ।

जूठनि परइ अजिर महँ सो उठाइ करि खाउँ ॥75(क)॥

एक बार अतिसय सब चरित किए रघुबीर ।

सुमिरत प्रभु लीला सोइ पुलकित भयउ सरीर ॥75(ख)॥

॥ दोहा ॥

कहइ भसुंड सुनहु खगनायक । रामचरित सेवक सुखदायक ॥

नृपमंदिर सुंदर सब भाँती । खचित कनक मनि नाना जाती ॥

बरनि न जाइ रुचिर अँगनाई । जहँ खेलहिं नित चारिउ भाई ॥

बालबिनोद करत रघुराई । बिचरत अजिर जननि सुखदाई ॥

मरकत मृदुल कलेवर स्यामा । अंग अंग प्रति छबि बहु कामा ॥

नव राजीव अरुन मृदु चरना । पदज रुचिर नख ससि दुति हरना ॥

ललित अंक कुलिसादिक चारी । नूपुर चारू मधुर रवकारी ॥

चारु पुरट मनि रचित बनाई । कटि किंकिन कल मुखर सुहाई ॥

॥ दोहा ॥

रेखा त्रय सुन्दर उदर नाभी रुचिर गँभीर ।

उर आयत भ्राजत बिबिध बाल बिभूषन चीर ॥76 ॥

॥ चौपाई ॥

अरुन पानि नख करज मनोहर । बाहु बिसाल बिभूषन सुंदर ॥

कंध बाल केहरि दर ग्रीवा । चारु चिबुक आनन छबि सींवा ॥

कलबल बचन अधर अरुनारे । दुइ दुइ दसन बिसद बर बारे ॥

ललित कपोल मनोहर नासा । सकल सुखद ससि कर सम हासा ॥

नील कंज लोचन भव मोचन । भ्राजत भाल तिलक गोरोचन ॥

बिकट भृकुटि सम श्रवन सुहाए । कुंचित कच मेचक छबि छाए ॥

पीत झीनि झगुली तन सोही । किलकनि चितवनि भावति मोही ॥

रूप रासि नृप अजिर बिहारी । नाचहिं निज प्रतिबिंब निहारी ॥

मोहि सन करहीं बिबिध बिधि क्रीड़ा । बरनत मोहि होति अति ब्रीड़ा ॥

किलकत मोहि धरन जब धावहिं । चलउँ भागि तब पूप देखावहिं ॥

॥ दोहा ॥

आवत निकट हँसहिं प्रभु भाजत रुदन कराहिं ।

जाउँ समीप गहन पद फिरि फिरि चितइ पराहिं ॥77(क)॥

प्राकृत सिसु इव लीला देखि भयउ मोहि मोह ।

कवन चरित्र करत प्रभु चिदानंद संदोह ॥77(ख)॥

॥ चौपाई ॥

एतना मन आनत खगराया । रघुपति प्रेरित ब्यापी माया ॥

सो माया न दुखद मोहि काहीं । आन जीव इव संसृत नाहीं ॥

नाथ इहाँ कछु कारन आना । सुनहु सो सावधान हरिजाना ॥

ग्यान अखंड एक सीताबर । माया बस्य जीव सचराचर ॥

जौं सब कें रह ग्यान एकरस । ईस्वर जीवहि भेद कहहु कस ॥

माया बस्य जीव अभिमानी । ईस बस्य माया गुनखानी ॥

परबस जीव स्वबस भगवंता । जीव अनेक एक श्रीकंता ॥

मुधा भेद जद्यपि कृत माया । बिनु हरि जाइ न कोटि उपाया ॥

॥ दोहा ॥

रामचंद्र के भजन बिनु जो चह पद निर्बान ।

ग्यानवंत अपि सो नर पसु बिनु पूँछ बिषान ॥78(क)॥

राकापति षोड़स उअहिं तारागन समुदाइ ॥

सकल गिरिन्ह दव लाइअ बिनु रबि राति न जाइ ॥78(ख)॥

॥ चौपाई ॥

ऐसेहिं हरि बिनु भजन खगेसा । मिटइ न जीवन्ह केर कलेसा ॥

हरि सेवकहि न ब्याप अबिद्या । प्रभु प्रेरित ब्यापइ तेहि बिद्या ॥

ताते नास न होइ दास कर । भेद भगति भाढ़इ बिहंगबर ॥

भ्रम ते चकित राम मोहि देखा । बिहँसे सो सुनु चरित बिसेषा ॥

तेहि कौतुक कर मरमु न काहूँ । जाना अनुज न मातु पिताहूँ ॥

जानु पानि धाए मोहि धरना । स्यामल गात अरुन कर चरना ॥

तब मैं भागि चलेउँ उरगामी । राम गहन कहँ भुजा पसारी ॥

जिमि जिमि दूरि उड़ाउँ अकासा । तहँ भुज हरि देखउँ निज पासा ॥

॥ दोहा ॥

ब्रह्मलोक लगि गयउँ मैं चितयउँ पाछ उड़ात ।

जुग अंगुल कर बीच सब राम भुजहि मोहि तात ॥79(क)॥

सप्ताबरन भेद करि जहाँ लगें गति मोरि ।

गयउँ तहाँ प्रभु भुज निरखि ब्याकुल भयउँ बहोरि ॥79(ख)॥

॥ दोहा ॥

॥ चौपाई ॥

मूदेउँ नयन त्रसित जब भयउँ । पुनि चितवत कोसलपुर गयऊँ ॥

मोहि बिलोकि राम मुसुकाहीं । बिहँसत तुरत गयउँ मुख माहीं ॥

उदर माझ सुनु अंडज राया । देखेउँ बहु ब्रह्मांड निकाया ॥

अति बिचित्र तहँ लोक अनेका । रचना अधिक एक ते एका ॥

कोटिन्ह चतुरानन गौरीसा । अगनित उडगन रबि रजनीसा ॥

अगनित लोकपाल जम काला । अगनित भूधर भूमि बिसाला ॥

सागर सरि सर बिपिन अपारा । नाना भाँति सृष्टि बिस्तारा ॥

सुर मुनि सिद्ध नाग नर किंनर । चारि प्रकार जीव सचराचर ॥

॥ दोहा ॥

जो नहिं देखा नहिं सुना जो मनहूँ न समाइ ।

सो सब अद्भुत देखेउँ बरनि कवनि बिधि जाइ ॥80(क)॥

एक एक ब्रह्मांड महुँ रहउँ बरष सत एक ।

एहि बिधि देखत फिरउँ मैं अंड कटाह अनेक ॥80(ख)॥

एहि बिधि देखत फिरउँ मैं अंड कटाह अनेक ॥80(ख)॥

॥ दोहा ॥

लोक लोक प्रति भिन्न बिधाता । भिन्न बिष्नु सिव मनु दिसित्राता ॥

नर गंधर्ब भूत बेताला । किंनर निसिचर पसु खग ब्याला ॥

देव दनुज गन नाना जाती । सकल जीव तहँ आनहि भाँती ॥

महि सरि सागर सर गिरि नाना । सब प्रपंच तहँ आनइ आना ॥

अंडकोस प्रति प्रति निज रुपा । देखेउँ जिनस अनेक अनूपा ॥

अवधपुरी प्रति भुवन निनारी । सरजू भिन्न भिन्न नर नारी ॥

दसरथ कौसल्या सुनु ताता । बिबिध रूप भरतादिक भ्राता ॥

प्रति ब्रह्मांड राम अवतारा । देखउँ बालबिनोद अपारा ॥

॥ दोहा ॥

भिन्न भिन्न मै दीख सबु अति बिचित्र हरिजान ।

अगनित भुवन फिरेउँ प्रभु राम न देखेउँ आन ॥81(क)॥

सोइ सिसुपन सोइ सोभा सोइ कृपाल रघुबीर ।

भुवन भुवन देखत फिरउँ प्रेरित मोह समीर ॥81(ख)

॥ चौपाई ॥

भ्रमत मोहि ब्रह्मांड अनेका । बीते मनहुँ कल्प सत एका ॥

फिरत फिरत निज आश्रम आयउँ । तहँ पुनि रहि कछु काल गवाँयउँ ॥

निज प्रभु जन्म अवध सुनि पायउँ । निर्भर प्रेम हरषि उठि धायउँ ॥

देखउँ जन्म महोत्सव जाई । जेहि बिधि प्रथम कहा मैं गाई ॥

राम उदर देखेउँ जग नाना । देखत बनइ न जाइ बखाना ॥

तहँ पुनि देखेउँ राम सुजाना । माया पति कृपाल भगवाना ॥

करउँ बिचार बहोरि बहोरी । मोह कलिल ब्यापित मति मोरी ॥

उभय घरी महँ मैं सब देखा । भयउँ भ्रमित मन मोह बिसेषा ॥

॥ दोहा ॥

देखि कृपाल बिकल मोहि बिहँसे तब रघुबीर ।

बिहँसतहीं मुख बाहेर आयउँ सुनु मतिधीर ॥82(क)॥

सोइ लरिकाई मो सन करन लगे पुनि राम ।

कोटि भाँति समुझावउँ मनु न लहइ बिश्राम ॥82(ख)॥

॥ दोहा ॥

देखि चरित यह सो प्रभुताई । समुझत देह दसा बिसराई ॥

धरनि परेउँ मुख आव न बाता । त्राहि त्राहि आरत जन त्राता ॥

प्रेमाकुल प्रभु मोहि बिलोकी । निज माया प्रभुता तब रोकी ॥

कर सरोज प्रभु मम सिर धरेऊ । दीनदयाल सकल दुख हरेऊ ॥

कीन्ह राम मोहि बिगत बिमोहा । सेवक सुखद कृपा संदोहा ॥

प्रभुता प्रथम बिचारि बिचारी । मन महँ होइ हरष अति भारी ॥

भगत बछलता प्रभु कै देखी । उपजी मम उर प्रीति बिसेषी ॥

सजल नयन पुलकित कर जोरी । कीन्हिउँ बहु बिधि बिनय बहोरी ॥

॥ दोहा ॥

सुनि सप्रेम मम बानी देखि दीन निज दास ।

बचन सुखद गंभीर मृदु बोले रमानिवास ॥83(क)॥

काकभसुंडि मागु बर अति प्रसन्न मोहि जानि ।

अनिमादिक सिधि अपर रिधि मोच्छ सकल सुख खानि ॥83(ख)॥

॥ चौपाई ॥

ग्यान बिबेक बिरति बिग्याना । मुनि दुर्लभ गुन जे जग नाना ॥

आजु देउँ सब संसय नाहीं । मागु जो तोहि भाव मन माहीं ॥

सुनि प्रभु बचन अधिक अनुरागेउँ । मन अनुमान करन तब लागेऊँ ॥

प्रभु कह देन सकल सुख सही । भगति आपनी देन न कही ॥

भगति हीन गुन सब सुख ऐसे । लवन बिना बहु बिंजन जैसे ॥

भजन हीन सुख कवने काजा । अस बिचारि बोलेउँ खगराजा ॥

जौं प्रभु होइ प्रसन्न बर देहू । मो पर करहु कृपा अरु नेहू ॥

मन भावत बर मागउँ स्वामी । तुम्ह उदार उर अंतरजामी ॥

॥ दोहा ॥

अबिरल भगति बिसुध्द तव श्रुति पुरान जो गाव ।

जेहि खोजत जोगीस मुनि प्रभु प्रसाद कोउ पाव ॥84(क)॥

भगत कल्पतरु प्रनत हित कृपा सिंधु सुख धाम ।

सोइ निज भगति मोहि प्रभु देहु दया करि राम ॥84(ख)॥

॥ चौपाई ॥

एवमस्तु कहि रघुकुलनायक । बोले बचन परम सुखदायक ॥

सुनु बायस तैं सहज सयाना । काहे न मागसि अस बरदाना ॥

सब सुख खानि भगति तैं मागी । नहिं जग कोउ तोहि सम बड़भागी ॥

जो मुनि कोटि जतन नहिं लहहीं । जे जप जोग अनल तन दहहीं ॥

रीझेउँ देखि तोरि चतुराई । मागेहु भगति मोहि अति भाई ॥

सुनु बिहंग प्रसाद अब मोरें । सब सुभ गुन बसिहहिं उर तोरें ॥

भगति ग्यान बिग्यान बिरागा । जोग चरित्र रहस्य बिभागा ॥

जानब तैं सबही कर भेदा । मम प्रसाद नहिं साधन खेदा ॥

॥ दोहा ॥

माया संभव भ्रम सब अब न ब्यापिहहिं तोहि ।

जानेसु ब्रह्म अनादि अज अगुन गुनाकर मोहि ॥85(क)॥

मोहि भगत प्रिय संतत अस बिचारि सुनु काग ।

कायँ बचन मन मम पद करेसु अचल अनुराग ॥85(ख)॥

॥ चौपाई ॥

अब सुनु परम बिमल मम बानी । सत्य सुगम निगमादि बखानी ॥

निज सिद्धांत सुनावउँ तोही । सुनु मन धरु सब तजि भजु मोही ॥

मम माया संभव संसारा । जीव चराचर बिबिधि प्रकारा ॥

सब मम प्रिय सब मम उपजाए । सब ते अधिक मनुज मोहि भाए ॥

तिन्ह महँ द्विज द्विज महँ श्रुतिधारी । तिन्ह महुँ निगम धरम अनुसारी ॥

तिन्ह महँ प्रिय बिरक्त पुनि ग्यानी । ग्यानिहु ते अति प्रिय बिग्यानी ॥

तिन्ह ते पुनि मोहि प्रिय निज दासा । जेहि गति मोरि न दूसरि आसा ॥

पुनि पुनि सत्य कहउँ तोहि पाहीं । मोहि सेवक सम प्रिय कोउ नाहीं ॥

भगति हीन बिरंचि किन होई । सब जीवहु सम प्रिय मोहि सोई ॥

भगतिवंत अति नीचउ प्रानी । मोहि प्रानप्रिय असि मम बानी ॥

॥ दोहा ॥

सुचि सुसील सेवक सुमति प्रिय कहु काहि न लाग ।

श्रुति पुरान कह नीति असि सावधान सुनु काग ॥86॥

॥ चौपाई ॥

एक पिता के बिपुल कुमारा । होहिं पृथक गुन सील अचारा ॥

कोउ पंडिंत कोउ तापस ग्याता । कोउ धनवंत सूर कोउ दाता ॥

कोउ सर्बग्य धर्मरत कोई । सब पर पितहि प्रीति सम होई ॥

कोउ पितु भगत बचन मन कर्मा । सपनेहुँ जान न दूसर धर्मा ॥

सो सुत प्रिय पितु प्रान समाना । जद्यपि सो सब भाँति अयाना ॥

एहि बिधि जीव चराचर जेते । त्रिजग देव नर असुर समेते ॥

अखिल बिस्व यह मोर उपाया । सब पर मोहि बराबरि दाया ॥

तिन्ह महँ जो परिहरि मद माया । भजै मोहि मन बच अरू काया ॥

॥ दोहा ॥

पुरूष नपुंसक नारि वा जीव चराचर कोइ ।

सर्ब भाव भज कपट तजि मोहि परम प्रिय सोइ ॥87(क)॥

सत्य कहउँ खग तोहि सुचि सेवक मम प्रानप्रिय ।

अस बिचारि भजु मोहि परिहरि आस भरोस सब ॥87(ख)॥

॥ चौपाई ॥

कबहूँ काल न ब्यापिहि तोही । सुमिरेसु भजेसु निरंतर मोही ॥

प्रभु बचनामृत सुनि न अघाऊँ । तनु पुलकित मन अति हरषाऊँ ॥

सो सुख जानइ मन अरु काना । नहिं रसना पहिं जाइ बखाना ॥

प्रभु सोभा सुख जानहिं नयना । कहि किमि सकहिं तिन्हहि नहिं बयना ॥

बहु बिधि मोहि प्रबोधि सुख देई । लगे करन सिसु कौतुक तेई ॥

सजल नयन कछु मुख करि रूखा । चितइ मातु लागी अति भूखा ॥

देखि मातु आतुर उठि धाई । कहि मृदु बचन लिए उर लाई ॥

गोद राखि कराव पय पाना । रघुपति चरित ललित कर गाना ॥

॥ दोहा ॥

सो0-जेहि सुख लागि पुरारि असुभ बेष कृत सिव सुखद ।

अवधपुरी नर नारि तेहि सुख महुँ संतत मगन ॥88(क)॥

॥ सोरठा ॥

सोइ सुख लवलेस जिन्ह बारक सपनेहुँ लहेउ ।

ते नहिं गनहिं खगेस ब्रह्मसुखहि सज्जन सुमति ॥88(ख)॥

॥ दोहा ॥

॥ चौपाई ॥

मैं पुनि अवध रहेउँ कछु काला । देखेउँ बालबिनोद रसाला ॥

राम प्रसाद भगति बर पायउँ । प्रभु पद बंदि निजाश्रम आयउँ ॥

तब ते मोहि न ब्यापी माया । जब ते रघुनायक अपनाया ॥

यह सब गुप्त चरित मैं गावा । हरि मायाँ जिमि मोहि नचावा ॥

निज अनुभव अब कहउँ खगेसा । बिनु हरि भजन न जाहि कलेसा ॥

राम कृपा बिनु सुनु खगराई । जानि न जाइ राम प्रभुताई ॥

जानें बिनु न होइ परतीती । बिनु परतीति होइ नहिं प्रीती ॥

प्रीति बिना नहिं भगति दिढ़ाई । जिमि खगपति जल कै चिकनाई ॥

॥ सोरठा ॥

बिनु गुर होइ कि ग्यान ग्यान कि होइ बिराग बिनु ।

गावहिं बेद पुरान सुख कि लहिअ हरि भगति बिनु ॥89(क)॥

कोउ बिश्राम कि पाव तात सहज संतोष बिनु ।

चलै कि जल बिनु नाव कोटि जतन पचि पचि मरिअ ॥89(ख)॥

॥ चौपाई ॥

बिनु संतोष न काम नसाहीं । काम अछत सुख सपनेहुँ नाहीं ॥

राम भजन बिनु मिटहिं कि कामा । थल बिहीन तरु कबहुँ कि जामा ॥

बिनु बिग्यान कि समता आवइ । कोउ अवकास कि नभ बिनु पावइ ॥

श्रद्धा बिना धर्म नहिं होई । बिनु महि गंध कि पावइ कोई ॥

बिनु तप तेज कि कर बिस्तारा । जल बिनु रस कि होइ संसारा ॥

सील कि मिल बिनु बुध सेवकाई । जिमि बिनु तेज न रूप गोसाई ॥

निज सुख बिनु मन होइ कि थीरा । परस कि होइ बिहीन समीरा ॥

कवनिउ सिद्धि कि बिनु बिस्वासा । बिनु हरि भजन न भव भय नासा ॥

॥ दोहा ॥

बिनु बिस्वास भगति नहिं तेहि बिनु द्रवहिं न रामु ।

राम कृपा बिनु सपनेहुँ जीव न लह बिश्रामु ॥90(क)॥

सो0-अस बिचारि मतिधीर तजि कुतर्क संसय सकल ।

भजहु राम रघुबीर करुनाकर सुंदर सुखद ॥90(ख)॥

॥ चौपाई ॥

निज मति सरिस नाथ मैं गाई । प्रभु प्रताप महिमा खगराई ॥

कहेउँ न कछु करि जुगुति बिसेषी । यह सब मैं निज नयनन्हि देखी ॥

महिमा नाम रूप गुन गाथा । सकल अमित अनंत रघुनाथा ॥

निज निज मति मुनि हरि गुन गावहिं । निगम सेष सिव पार न पावहिं ॥

तुम्हहि आदि खग मसक प्रजंता । नभ उड़ाहिं नहिं पावहिं अंता ॥

तिमि रघुपति महिमा अवगाहा । तात कबहुँ कोउ पाव कि थाहा ॥

रामु काम सत कोटि सुभग तन । दुर्गा कोटि अमित अरि मर्दन ॥

सक्र कोटि सत सरिस बिलासा । नभ सत कोटि अमित अवकासा ॥

॥ दोहा ॥

मरुत कोटि सत बिपुल बल रबि सत कोटि प्रकास ।

ससि सत कोटि सुसीतल समन सकल भव त्रास ॥91(क)॥

काल कोटि सत सरिस अति दुस्तर दुर्ग दुरंत ।

धूमकेतु सत कोटि सम दुराधरष भगवंत ॥91(ख)॥

॥ चौपाई ॥

प्रभु अगाध सत कोटि पताला । समन कोटि सत सरिस कराला ॥

तीरथ अमित कोटि सम पावन । नाम अखिल अघ पूग नसावन ॥

हिमगिरि कोटि अचल रघुबीरा । सिंधु कोटि सत सम गंभीरा ॥

कामधेनु सत कोटि समाना । सकल काम दायक भगवाना ॥

सारद कोटि अमित चतुराई । बिधि सत कोटि सृष्टि निपुनाई ॥

बिष्नु कोटि सम पालन कर्ता । रुद्र कोटि सत सम संहर्ता ॥

धनद कोटि सत सम धनवाना । माया कोटि प्रपंच निधाना ॥

भार धरन सत कोटि अहीसा । निरवधि निरुपम प्रभु जगदीसा ॥

छं0-निरुपम न उपमा आन राम समान रामु निगम कहै ।

जिमि कोटि सत खद्योत सम रबि कहत अति लघुता लहै ॥

एहि भाँति निज निज मति बिलास मुनिस हरिहि बखानहीं ।

प्रभु भाव गाहक अति कृपाल सप्रेम सुनि सुख मानहीं ॥

॥ चौपाई ॥

रामु अमित गुन सागर थाह कि पावइ कोइ ।

संतन्ह सन जस किछु सुनेउँ तुम्हहि सुनायउँ सोइ ॥92(क)॥

सो0-भाव बस्य भगवान सुख निधान करुना भवन ।

तजि ममता मद मान भजिअ सदा सीता रवन ॥92(ख)॥

॥ चौपाई ॥

सुनि भुसुंडि के बचन सुहाए । हरषित खगपति पंख फुलाए ॥

नयन नीर मन अति हरषाना । श्रीरघुपति प्रताप उर आना ॥

पाछिल मोह समुझि पछिताना । ब्रह्म अनादि मनुज करि माना ॥

पुनि पुनि काग चरन सिरु नावा । जानि राम सम प्रेम बढ़ावा ॥

गुर बिनु भव निधि तरइ न कोई । जौं बिरंचि संकर सम होई ॥

संसय सर्प ग्रसेउ मोहि ताता । दुखद लहरि कुतर्क बहु ब्राता ॥

तव सरूप गारुड़ि रघुनायक । मोहि जिआयउ जन सुखदायक ॥

तव प्रसाद मम मोह नसाना । राम रहस्य अनूपम जाना ॥

॥ दोहा ॥

ताहि प्रसंसि बिबिध बिधि सीस नाइ कर जोरि ।

बचन बिनीत सप्रेम मृदु बोलेउ गरुड़ बहोरि ॥93(क)॥

प्रभु अपने अबिबेक ते बूझउँ स्वामी तोहि ।

कृपासिंधु सादर कहहु जानि दास निज मोहि ॥93(ख)॥

॥ चौपाई ॥

तुम्ह सर्बग्य तन्य तम पारा । सुमति सुसील सरल आचारा ॥

ग्यान बिरति बिग्यान निवासा । रघुनायक के तुम्ह प्रिय दासा ॥

कारन कवन देह यह पाई । तात सकल मोहि कहहु बुझाई ॥

राम चरित सर सुंदर स्वामी । पायहु कहाँ कहहु नभगामी ॥

नाथ सुना मैं अस सिव पाहीं । महा प्रलयहुँ नास तव नाहीं ॥

मुधा बचन नहिं ईस्वर कहई । सोउ मोरें मन संसय अहई ॥

अग जग जीव नाग नर देवा । नाथ सकल जगु काल कलेवा ॥

अंड कटाह अमित लय कारी । कालु सदा दुरतिक्रम भारी ॥

॥ सोरठा ॥

तुम्हहि न ब्यापत काल अति कराल कारन कवन ।

मोहि सो कहहु कृपाल ग्यान प्रभाव कि जोग बल ॥94(क)॥

॥ दोहा ॥

प्रभु तव आश्रम आएँ मोर मोह भ्रम भाग ।

कारन कवन सो नाथ सब कहहु सहित अनुराग ॥94(ख)॥

॥ चौपाई ॥

गरुड़ गिरा सुनि हरषेउ कागा । बोलेउ उमा परम अनुरागा ॥

धन्य धन्य तव मति उरगारी । प्रस्न तुम्हारि मोहि अति प्यारी ॥

सुनि तव प्रस्न सप्रेम सुहाई । बहुत जनम कै सुधि मोहि आई ॥

सब निज कथा कहउँ मैं गाई । तात सुनहु सादर मन लाई ॥

जप तप मख सम दम ब्रत दाना । बिरति बिबेक जोग बिग्याना ॥

सब कर फल रघुपति पद प्रेमा । तेहि बिनु कोउ न पावइ छेमा ॥

एहि तन राम भगति मैं पाई । ताते मोहि ममता अधिकाई ॥

जेहि तें कछु निज स्वारथ होई । तेहि पर ममता कर सब कोई ॥

॥ सोरठा ॥

पन्नगारि असि नीति श्रुति संमत सज्जन कहहिं ।

अति नीचहु सन प्रीति करिअ जानि निज परम हित ॥95(क)॥

पाट कीट तें होइ तेहि तें पाटंबर रुचिर ।

कृमि पालइ सबु कोइ परम अपावन प्रान सम ॥95(ख)॥

॥ चौपाई ॥

स्वारथ साँच जीव कहुँ एहा । मन क्रम बचन राम पद नेहा ॥

सोइ पावन सोइ सुभग सरीरा । जो तनु पाइ भजिअ रघुबीरा ॥

राम बिमुख लहि बिधि सम देही । कबि कोबिद न प्रसंसहिं तेही ॥

राम भगति एहिं तन उर जामी । ताते मोहि परम प्रिय स्वामी ॥

तजउँ न तन निज इच्छा मरना । तन बिनु बेद भजन नहिं बरना ॥

प्रथम मोहँ मोहि बहुत बिगोवा । राम बिमुख सुख कबहुँ न सोवा ॥

नाना जनम कर्म पुनि नाना । किए जोग जप तप मख दाना ॥

कवन जोनि जनमेउँ जहँ नाहीं । मैं खगेस भ्रमि भ्रमि जग माहीं ॥

देखेउँ करि सब करम गोसाई । सुखी न भयउँ अबहिं की नाई ॥

सुधि मोहि नाथ जन्म बहु केरी । सिव प्रसाद मति मोहँ न घेरी ॥

॥ दोहा ॥

प्रथम जन्म के चरित अब कहउँ सुनहु बिहगेस ।

सुनि प्रभु पद रति उपजइ जातें मिटहिं कलेस ॥96(क)॥

पूरुब कल्प एक प्रभु जुग कलिजुग मल मूल ॥

नर अरु नारि अधर्म रत सकल निगम प्रतिकूल ॥96(ख)॥

॥ चौपाई ॥

तेहि कलिजुग कोसलपुर जाई । जन्मत भयउँ सूद्र तनु पाई ॥

सिव सेवक मन क्रम अरु बानी । आन देव निंदक अभिमानी ॥

धन मद मत्त परम बाचाला । उग्रबुद्धि उर दंभ बिसाला ॥

जदपि रहेउँ रघुपति रजधानी । तदपि न कछु महिमा तब जानी ॥

अब जाना मैं अवध प्रभावा । निगमागम पुरान अस गावा ॥

कवनेहुँ जन्म अवध बस जोई । राम परायन सो परि होई ॥

अवध प्रभाव जान तब प्रानी । जब उर बसहिं रामु धनुपानी ॥

सो कलिकाल कठिन उरगारी । पाप परायन सब नर नारी ॥

॥ दोहा ॥

कलिमल ग्रसे धर्म सब लुप्त भए सदग्रंथ ।

दंभिन्ह निज मति कल्पि करि प्रगट किए बहु पंथ ॥97(क)॥

भए लोग सब मोहबस लोभ ग्रसे सुभ कर्म ।

सुनु हरिजान ग्यान निधि कहउँ कछुक कलिधर्म ॥97(ख)॥

॥ चौपाई ॥

बरन धर्म नहिं आश्रम चारी । श्रुति बिरोध रत सब नर नारी ॥

द्विज श्रुति बेचक भूप प्रजासन । कोउ नहिं मान निगम अनुसासन ॥

मारग सोइ जा कहुँ जोइ भावा । पंडित सोइ जो गाल बजावा ॥

मिथ्यारंभ दंभ रत जोई । ता कहुँ संत कहइ सब कोई ॥

सोइ सयान जो परधन हारी । जो कर दंभ सो बड़ आचारी ॥

जौ कह झूँठ मसखरी जाना । कलिजुग सोइ गुनवंत बखाना ॥

निराचार जो श्रुति पथ त्यागी । कलिजुग सोइ ग्यानी सो बिरागी ॥

जाकें नख अरु जटा बिसाला । सोइ तापस प्रसिद्ध कलिकाला ॥

॥ दोहा ॥

असुभ बेष भूषन धरें भच्छाभच्छ जे खाहिं ।

तेइ जोगी तेइ सिद्ध नर पूज्य ते कलिजुग माहिं ॥98(क)॥

॥ सोरठा ॥

जे अपकारी चार तिन्ह कर गौरव मान्य तेइ ।

मन क्रम बचन लबार तेइ बकता कलिकाल महुँ ॥98(ख)॥

॥ चौपाई ॥

नारि बिबस नर सकल गोसाई । नाचहिं नट मर्कट की नाई ॥

सूद्र द्विजन्ह उपदेसहिं ग्याना । मेलि जनेऊ लेहिं कुदाना ॥

सब नर काम लोभ रत क्रोधी । देव बिप्र श्रुति संत बिरोधी ॥

गुन मंदिर सुंदर पति त्यागी । भजहिं नारि पर पुरुष अभागी ॥

सौभागिनीं बिभूषन हीना । बिधवन्ह के सिंगार नबीना ॥

गुर सिष बधिर अंध का लेखा । एक न सुनइ एक नहिं देखा ॥

हरइ सिष्य धन सोक न हरई । सो गुर घोर नरक महुँ परई ॥

मातु पिता बालकन्हि बोलाबहिं । उदर भरै सोइ धर्म सिखावहिं ॥

॥ दोहा ॥

ब्रह्म ग्यान बिनु नारि नर कहहिं न दूसरि बात ।

कौड़ी लागि लोभ बस करहिं बिप्र गुर घात ॥99(क)॥

बादहिं सूद्र द्विजन्ह सन हम तुम्ह ते कछु घाटि ।

जानइ ब्रह्म सो बिप्रबर आँखि देखावहिं डाटि ॥99(ख)॥

॥ दोहा ॥

पर त्रिय लंपट कपट सयाने । मोह द्रोह ममता लपटाने ॥

तेइ अभेदबादी ग्यानी नर । देखा में चरित्र कलिजुग कर ॥

आपु गए अरु तिन्हहू घालहिं । जे कहुँ सत मारग प्रतिपालहिं ॥

कल्प कल्प भरि एक एक नरका । परहिं जे दूषहिं श्रुति करि तरका ॥

जे बरनाधम तेलि कुम्हारा । स्वपच किरात कोल कलवारा ॥

नारि मुई गृह संपति नासी । मूड़ मुड़ाइ होहिं सन्यासी ॥

ते बिप्रन्ह सन आपु पुजावहिं । उभय लोक निज हाथ नसावहिं ॥

बिप्र निरच्छर लोलुप कामी । निराचार सठ बृषली स्वामी ॥

सूद्र करहिं जप तप ब्रत नाना । बैठि बरासन कहहिं पुराना ॥

सब नर कल्पित करहिं अचारा । जाइ न बरनि अनीति अपारा ॥

॥ दोहा ॥

भए बरन संकर कलि भिन्नसेतु सब लोग ।

करहिं पाप पावहिं दुख भय रुज सोक बियोग ॥100(क)॥

श्रुति संमत हरि भक्ति पथ संजुत बिरति बिबेक ।

तेहि न चलहिं नर मोह बस कल्पहिं पंथ अनेक ॥100(ख)॥

॥ छन्द ॥

बहु दाम सँवारहिं धाम जती । बिषया हरि लीन्हि न रहि बिरती ॥

तपसी धनवंत दरिद्र गृही । कलि कौतुक तात न जात कही ॥

कुलवंति निकारहिं नारि सती । गृह आनिहिं चेरी निबेरि गती ॥

सुत मानहिं मातु पिता तब लौं । अबलानन दीख नहीं जब लौं ॥

ससुरारि पिआरि लगी जब तें । रिपरूप कुटुंब भए तब तें ॥

नृप पाप परायन धर्म नहीं । करि दंड बिडंब प्रजा नितहीं ॥

धनवंत कुलीन मलीन अपी । द्विज चिन्ह जनेउ उघार तपी ॥

नहिं मान पुरान न बेदहि जो । हरि सेवक संत सही कलि सो ।

कबि बृंद उदार दुनी न सुनी । गुन दूषक ब्रात न कोपि गुनी ॥

कलि बारहिं बार दुकाल परै । बिनु अन्न दुखी सब लोग मरै ॥

॥ दोहा ॥

सुनु खगेस कलि कपट हठ दंभ द्वेष पाषंड ।

मान मोह मारादि मद ब्यापि रहे ब्रह्मंड ॥101(क)॥

तामस धर्म करहिं नर जप तप ब्रत मख दान ।

देव न बरषहिं धरनीं बए न जामहिं धान ॥101(ख)॥

॥ छन्द ॥

अबला कच भूषन भूरि छुधा । धनहीन दुखी ममता बहुधा ॥

सुख चाहहिं मूढ़ न धर्म रता । मति थोरि कठोरि न कोमलता ॥1॥

नर पीड़ित रोग न भोग कहीं । अभिमान बिरोध अकारनहीं ॥

लघु जीवन संबतु पंच दसा । कलपांत न नास गुमानु असा ॥2॥

कलिकाल बिहाल किए मनुजा । नहिं मानत क्वौ अनुजा तनुजा ।

नहिं तोष बिचार न सीतलता । सब जाति कुजाति भए मगता ॥3॥

इरिषा परुषाच्छर लोलुपता । भरि पूरि रही समता बिगता ॥

सब लोग बियोग बिसोक हुए । बरनाश्रम धर्म अचार गए ॥4॥

दम दान दया नहिं जानपनी । जड़ता परबंचनताति घनी ॥

तनु पोषक नारि नरा सगरे । परनिंदक जे जग मो बगरे ॥5॥

॥ दोहा ॥

सुनु ब्यालारि काल कलि मल अवगुन आगार ।

गुनउँ बहुत कलिजुग कर बिनु प्रयास निस्तार ॥102(क)॥

कृतजुग त्रेता द्वापर पूजा मख अरु जोग ।

जो गति होइ सो कलि हरि नाम ते पावहिं लोग ॥102(ख)॥

॥ चौपाई ॥

कृतजुग सब जोगी बिग्यानी । करि हरि ध्यान तरहिं भव प्रानी ॥

त्रेताँ बिबिध जग्य नर करहीं । प्रभुहि समर्पि कर्म भव तरहीं ॥

द्वापर करि रघुपति पद पूजा । नर भव तरहिं उपाय न दूजा ॥

कलिजुग केवल हरि गुन गाहा । गावत नर पावहिं भव थाहा ॥

कलिजुग जोग न जग्य न ग्याना । एक अधार राम गुन गाना ॥

सब भरोस तजि जो भज रामहि । प्रेम समेत गाव गुन ग्रामहि ॥

सोइ भव तर कछु संसय नाहीं । नाम प्रताप प्रगट कलि माहीं ॥

कलि कर एक पुनीत प्रतापा । मानस पुन्य होहिं नहिं पापा ॥

॥ दोहा ॥

कलिजुग सम जुग आन नहिं जौं नर कर बिस्वास ।

गाइ राम गुन गन बिमलँ भव तर बिनहिं प्रयास ॥103(क)॥

प्रगट चारि पद धर्म के कलिल महुँ एक प्रधान ।

जेन केन बिधि दीन्हें दान करइ कल्यान ॥103(ख)॥

॥ चौपाई ॥

नित जुग धर्म होहिं सब केरे । हृदयँ राम माया के प्रेरे ॥

सुद्ध सत्व समता बिग्याना । कृत प्रभाव प्रसन्न मन जाना ॥

सत्व बहुत रज कछु रति कर्मा । सब बिधि सुख त्रेता कर धर्मा ॥

बहु रज स्वल्प सत्व कछु तामस । द्वापर धर्म हरष भय मानस ॥

तामस बहुत रजोगुन थोरा । कलि प्रभाव बिरोध चहुँ ओरा ॥

बुध जुग धर्म जानि मन माहीं । तजि अधर्म रति धर्म कराहीं ॥

काल धर्म नहिं ब्यापहिं ताही । रघुपति चरन प्रीति अति जाही ॥

नट कृत बिकट कपट खगराया । नट सेवकहि न ब्यापइ माया ॥

॥ दोहा ॥

हरि माया कृत दोष गुन बिनु हरि भजन न जाहिं ।

भजिअ राम तजि काम सब अस बिचारि मन माहिं ॥104(क)॥

तेहि कलिकाल बरष बहु बसेउँ अवध बिहगेस ।

परेउ दुकाल बिपति बस तब मैं गयउँ बिदेस ॥104(ख)॥

॥ दोहा ॥

गयउँ उजेनी सुनु उरगारी । दीन मलीन दरिद्र दुखारी ॥

गएँ काल कछु संपति पाई । तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई ॥

बिप्र एक बैदिक सिव पूजा । करइ सदा तेहि काजु न दूजा ॥

परम साधु परमारथ बिंदक । संभु उपासक नहिं हरि निंदक ॥

तेहि सेवउँ मैं कपट समेता । द्विज दयाल अति नीति निकेता ॥

बाहिज नम्र देखि मोहि साईं । बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाईं ॥

संभु मंत्र मोहि द्विजबर दीन्हा । सुभ उपदेस बिबिध बिधि कीन्हा ॥

जपउँ मंत्र सिव मंदिर जाई । हृदयँ दंभ अहमिति अधिकाई ॥

॥ दोहा ॥

मैं खल मल संकुल मति नीच जाति बस मोह ।

हरि जन द्विज देखें जरउँ करउँ बिष्नु कर द्रोह ॥105(क)॥

॥ सोरठा ॥

गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम ।

मोहि उपजइ अति क्रोध दंभिहि नीति कि भावई ॥105(ख)॥

॥ चौपाई ॥

एक बार गुर लीन्ह बोलाई । मोहि नीति बहु भाँति सिखाई ॥

सिव सेवा कर फल सुत सोई । अबिरल भगति राम पद होई ॥

रामहि भजहिं तात सिव धाता । नर पावँर कै केतिक बाता ॥

जासु चरन अज सिव अनुरागी । तातु द्रोहँ सुख चहसि अभागी ॥

हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ । सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ ॥

अधम जाति मैं बिद्या पाएँ । भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ ॥

मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती । गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती ॥

अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा । पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा ॥

जेहि ते नीच बड़ाई पावा । सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा ॥

धूम अनल संभव सुनु भाई । तेहि बुझाव घन पदवी पाई ॥

रज मग परी निरादर रहई । सब कर पद प्रहार नित सहई ॥

मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई । पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई ॥

सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा । बुध नहिं करहिं अधम कर संगा ॥

कबि कोबिद गावहिं असि नीती । खल सन कलह न भल नहिं प्रीती ॥

उदासीन नित रहिअ गोसाईं । खल परिहरिअ स्वान की नाईं ॥

मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई । गुर हित कहइ न मोहि सोहाई ॥

॥ दोहा ॥

एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम ।

गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम ॥106(क)॥

सो दयाल नहिं कहेउ कछु उर न रोष लवलेस ।

अति अघ गुर अपमानता सहि नहिं सके महेस ॥106(ख)॥

॥ चौपाई ॥

मंदिर माझ भई नभ बानी । रे हतभाग्य अग्य अभिमानी ॥

जद्यपि तव गुर कें नहिं क्रोधा । अति कृपाल चित सम्यक बोधा ॥

तदपि साप सठ दैहउँ तोही । नीति बिरोध सोहाइ न मोही ॥

जौं नहिं दंड करौं खल तोरा । भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा ॥

जे सठ गुर सन इरिषा करहीं । रौरव नरक कोटि जुग परहीं ॥

त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा । अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा ॥

बैठ रहेसि अजगर इव पापी । सर्प होहि खल मल मति ब्यापी ॥

महा बिटप कोटर महुँ जाई ॥रहु अधमाधम अधगति पाई ॥

॥ दोहा ॥

हाहाकार कीन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप ॥

कंपित मोहि बिलोकि अति उर उपजा परिताप ॥107(क)॥

करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि ।

बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि ॥107(ख)॥

॥ चौपाई ॥

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं । विंभुं ब्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं ।

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरींह । चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं ॥

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं । गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं ॥

करालं महाकाल कालं कृपालं । गुणागार संसारपारं नतोऽहं ॥

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं । मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं ॥

स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा । लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा ॥

चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं । प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं ॥

मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं । प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥

प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं । अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं ॥

त्रयःशूल निर्मूलनं शूलपाणिं । भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं ॥

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी । सदा सज्जनान्ददाता पुरारी ॥

चिदानंदसंदोह मोहापहारी । प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥

न यावद् उमानाथ पादारविन्दं । भजंतीह लोके परे वा नराणां ॥

न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं । प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां । नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं ॥

जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं । प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो ॥

॥ दोहा ॥

श्लोक-रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ।

ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥9॥

॥ चौपाई ॥

गयउँ उजेनी सुनु उरगारी । दीन मलीन दरिद्र दुखारी ॥

गएँ काल कछु संपति पाई । तहँ पुनि करउँ संभु सेवकाई ॥

बिप्र एक बैदिक सिव पूजा । करइ सदा तेहि काजु न दूजा ॥

परम साधु परमारथ बिंदक । संभु उपासक नहिं हरि निंदक ॥

तेहि सेवउँ मैं कपट समेता । द्विज दयाल अति नीति निकेता ॥

बाहिज नम्र देखि मोहि साईं । बिप्र पढ़ाव पुत्र की नाईं ॥

संभु मंत्र मोहि द्विजबर दीन्हा । सुभ उपदेस बिबिध बिधि कीन्हा ॥

जपउँ मंत्र सिव मंदिर जाई । हृदयँ दंभ अहमिति अधिकाई ॥

॥ दोहा ॥

मैं खल मल संकुल मति नीच जाति बस मोह ।

हरि जन द्विज देखें जरउँ करउँ बिष्नु कर द्रोह ॥105(क)॥

॥ सोरठा ॥

गुर नित मोहि प्रबोध दुखित देखि आचरन मम ।

मोहि उपजइ अति क्रोध दंभिहि नीति कि भावई ॥105(ख)॥

॥ चौपाई ॥

एक बार गुर लीन्ह बोलाई । मोहि नीति बहु भाँति सिखाई ॥

सिव सेवा कर फल सुत सोई । अबिरल भगति राम पद होई ॥

रामहि भजहिं तात सिव धाता । नर पावँर कै केतिक बाता ॥

जासु चरन अज सिव अनुरागी । तातु द्रोहँ सुख चहसि अभागी ॥

हर कहुँ हरि सेवक गुर कहेऊ । सुनि खगनाथ हृदय मम दहेऊ ॥

अधम जाति मैं बिद्या पाएँ । भयउँ जथा अहि दूध पिआएँ ॥

मानी कुटिल कुभाग्य कुजाती । गुर कर द्रोह करउँ दिनु राती ॥

अति दयाल गुर स्वल्प न क्रोधा । पुनि पुनि मोहि सिखाव सुबोधा ॥

जेहि ते नीच बड़ाई पावा । सो प्रथमहिं हति ताहि नसावा ॥

धूम अनल संभव सुनु भाई । तेहि बुझाव घन पदवी पाई ॥

रज मग परी निरादर रहई । सब कर पद प्रहार नित सहई ॥

मरुत उड़ाव प्रथम तेहि भरई । पुनि नृप नयन किरीटन्हि परई ॥

सुनु खगपति अस समुझि प्रसंगा । बुध नहिं करहिं अधम कर संगा ॥

कबि कोबिद गावहिं असि नीती । खल सन कलह न भल नहिं प्रीती ॥

उदासीन नित रहिअ गोसाईं । खल परिहरिअ स्वान की नाईं ॥

मैं खल हृदयँ कपट कुटिलाई । गुर हित कहइ न मोहि सोहाई ॥

॥ दोहा ॥

एक बार हर मंदिर जपत रहेउँ सिव नाम ।

गुर आयउ अभिमान तें उठि नहिं कीन्ह प्रनाम ॥106(क)॥

सो दयाल नहिं कहेउ कछु उर न रोष लवलेस ।

अति अघ गुर अपमानता सहि नहिं सके महेस ॥106(ख)॥

॥ चौपाई ॥

मंदिर माझ भई नभ बानी । रे हतभाग्य अग्य अभिमानी ॥

जद्यपि तव गुर कें नहिं क्रोधा । अति कृपाल चित सम्यक बोधा ॥

तदपि साप सठ दैहउँ तोही । नीति बिरोध सोहाइ न मोही ॥

जौं नहिं दंड करौं खल तोरा । भ्रष्ट होइ श्रुतिमारग मोरा ॥

जे सठ गुर सन इरिषा करहीं । रौरव नरक कोटि जुग परहीं ॥

त्रिजग जोनि पुनि धरहिं सरीरा । अयुत जन्म भरि पावहिं पीरा ॥

बैठ रहेसि अजगर इव पापी । सर्प होहि खल मल मति ब्यापी ॥

महा बिटप कोटर महुँ जाई ॥रहु अधमाधम अधगति पाई ॥

॥ दोहा ॥

हाहाकार कीन्ह गुर दारुन सुनि सिव साप ॥

कंपित मोहि बिलोकि अति उर उपजा परिताप ॥107(क)॥

करि दंडवत सप्रेम द्विज सिव सन्मुख कर जोरि ।

बिनय करत गदगद स्वर समुझि घोर गति मोरि ॥107(ख)॥

॥ चौपाई ॥

नमामीशमीशान निर्वाणरूपं । विंभुं ब्यापकं ब्रह्म वेदस्वरूपं ।

निजं निर्गुणं निर्विकल्पं निरींह । चिदाकाशमाकाशवासं भजेऽहं ॥

निराकारमोंकारमूलं तुरीयं । गिरा ग्यान गोतीतमीशं गिरीशं ॥

करालं महाकाल कालं कृपालं । गुणागार संसारपारं नतोऽहं ॥

तुषाराद्रि संकाश गौरं गभीरं । मनोभूत कोटि प्रभा श्री शरीरं ॥

स्फुरन्मौलि कल्लोलिनी चारु गंगा । लसद्भालबालेन्दु कंठे भुजंगा ॥

चलत्कुंडलं भ्रू सुनेत्रं विशालं । प्रसन्नाननं नीलकंठं दयालं ॥

मृगाधीशचर्माम्बरं मुण्डमालं । प्रियं शंकरं सर्वनाथं भजामि ॥

प्रचंडं प्रकृष्टं प्रगल्भं परेशं । अखंडं अजं भानुकोटिप्रकाशं ॥

त्रयःशूल निर्मूलनं शूलपाणिं । भजेऽहं भवानीपतिं भावगम्यं ॥

कलातीत कल्याण कल्पान्तकारी । सदा सज्जनान्ददाता पुरारी ॥

चिदानंदसंदोह मोहापहारी । प्रसीद प्रसीद प्रभो मन्मथारी ॥

न यावद् उमानाथ पादारविन्दं । भजंतीह लोके परे वा नराणां ॥

न तावत्सुखं शान्ति सन्तापनाशं । प्रसीद प्रभो सर्वभूताधिवासं ॥

न जानामि योगं जपं नैव पूजां । नतोऽहं सदा सर्वदा शंभु तुभ्यं ॥

जरा जन्म दुःखौघ तातप्यमानं । प्रभो पाहि आपन्नमामीश शंभो ॥

श्लोक-रुद्राष्टकमिदं प्रोक्तं विप्रेण हरतोषये ।

ये पठन्ति नरा भक्त्या तेषां शम्भुः प्रसीदति ॥9॥

॥ दोहा ॥

सुनि बिनती सर्बग्य सिव देखि ब्रिप्र अनुरागु ।

पुनि मंदिर नभबानी भइ द्विजबर बर मागु ॥108(क)॥

जौं प्रसन्न प्रभु मो पर नाथ दीन पर नेहु ।

निज पद भगति देइ प्रभु पुनि दूसर बर देहु ॥108(ख)॥

तव माया बस जीव जड़ संतत फिरइ भुलान ।

तेहि पर क्रोध न करिअ प्रभु कृपा सिंधु भगवान ॥108(ग)॥

संकर दीनदयाल अब एहि पर होहु कृपाल ।

साप अनुग्रह होइ जेहिं नाथ थोरेहीं काल ॥108(घ)॥

॥ चौपाई ॥

एहि कर होइ परम कल्याना । सोइ करहु अब कृपानिधाना ॥

बिप्रगिरा सुनि परहित सानी । एवमस्तु इति भइ नभबानी ॥

जदपि कीन्ह एहिं दारुन पापा । मैं पुनि दीन्ह कोप करि सापा ॥

तदपि तुम्हार साधुता देखी । करिहउँ एहि पर कृपा बिसेषी ॥

छमासील जे पर उपकारी । ते द्विज मोहि प्रिय जथा खरारी ॥

मोर श्राप द्विज ब्यर्थ न जाइहि । जन्म सहस अवस्य यह पाइहि ॥

जनमत मरत दुसह दुख होई । अहि स्वल्पउ नहिं ब्यापिहि सोई ॥

कवनेउँ जन्म मिटिहि नहिं ग्याना । सुनहि सूद्र मम बचन प्रवाना ॥

रघुपति पुरीं जन्म तब भयऊ । पुनि तैं मम सेवाँ मन दयऊ ॥

पुरी प्रभाव अनुग्रह मोरें । राम भगति उपजिहि उर तोरें ॥

सुनु मम बचन सत्य अब भाई । हरितोषन ब्रत द्विज सेवकाई ॥

अब जनि करहि बिप्र अपमाना । जानेहु संत अनंत समाना ॥

इंद्र कुलिस मम सूल बिसाला । कालदंड हरि चक्र कराला ॥

जो इन्ह कर मारा नहिं मरई । बिप्रद्रोह पावक सो जरई ॥

अस बिबेक राखेहु मन माहीं । तुम्ह कहँ जग दुर्लभ कछु नाहीं ॥

औरउ एक आसिषा मोरी । अप्रतिहत गति होइहि तोरी ॥

॥ चौपाई ॥

सुनि सिव बचन हरषि गुर एवमस्तु इति भाषि ।

मोहि प्रबोधि गयउ गृह संभु चरन उर राखि ॥109(क)॥

प्रेरित काल बिधि गिरि जाइ भयउँ मैं ब्याल ।

पुनि प्रयास बिनु सो तनु जजेउँ गएँ कछु काल ॥109(ख)॥

जोइ तनु धरउँ तजउँ पुनि अनायास हरिजान ।

जिमि नूतन पट पहिरइ नर परिहरइ पुरान ॥109(ग)॥

सिवँ राखी श्रुति नीति अरु मैं नहिं पावा क्लेस ।

एहि बिधि धरेउँ बिबिध तनु ग्यान न गयउ खगेस ॥109(घ)॥

॥ चौपाई ॥

त्रिजग देव नर जोइ तनु धरउँ । तहँ तहँ राम भजन अनुसरऊँ ॥

एक सूल मोहि बिसर न काऊ । गुर कर कोमल सील सुभाऊ ॥

चरम देह द्विज कै मैं पाई । सुर दुर्लभ पुरान श्रुति गाई ॥

खेलउँ तहूँ बालकन्ह मीला । करउँ सकल रघुनायक लीला ॥

प्रौढ़ भएँ मोहि पिता पढ़ावा । समझउँ सुनउँ गुनउँ नहिं भावा ॥

मन ते सकल बासना भागी । केवल राम चरन लय लागी ॥

कहु खगेस अस कवन अभागी । खरी सेव सुरधेनुहि त्यागी ॥

प्रेम मगन मोहि कछु न सोहाई । हारेउ पिता पढ़ाइ पढ़ाई ॥

भए कालबस जब पितु माता । मैं बन गयउँ भजन जनत्राता ॥

जहँ जहँ बिपिन मुनीस्वर पावउँ । आश्रम जाइ जाइ सिरु नावउँ ॥

बूझत तिन्हहि राम गुन गाहा । कहहिं सुनउँ हरषित खगनाहा ॥

सुनत फिरउँ हरि गुन अनुबादा । अब्याहत गति संभु प्रसादा ॥

छूटी त्रिबिध ईषना गाढ़ी । एक लालसा उर अति बाढ़ी ॥

राम चरन बारिज जब देखौं । तब निज जन्म सफल करि लेखौं ॥

जेहि पूँछउँ सोइ मुनि अस कहई । ईस्वर सर्ब भूतमय अहई ॥

निर्गुन मत नहिं मोहि सोहाई । सगुन ब्रह्म रति उर अधिकाई ॥

॥ दोहा ॥

गुर के बचन सुरति करि राम चरन मनु लाग ।

रघुपति जस गावत फिरउँ छन छन नव अनुराग ॥110(क)॥

मेरु सिखर बट छायाँ मुनि लोमस आसीन ।

देखि चरन सिरु नायउँ बचन कहेउँ अति दीन ॥110(ख)॥

सुनि मम बचन बिनीत मृदु मुनि कृपाल खगराज ।

मोहि सादर पूँछत भए द्विज आयहु केहि काज ॥110(ग)॥

तब मैं कहा कृपानिधि तुम्ह सर्बग्य सुजान ।

सगुन ब्रह्म अवराधन मोहि कहहु भगवान ॥110(घ)॥

॥ चौपाई ॥

तब मुनिष रघुपति गुन गाथा । कहे कछुक सादर खगनाथा ॥

ब्रह्मग्यान रत मुनि बिग्यानि । मोहि परम अधिकारी जानी ॥

लागे करन ब्रह्म उपदेसा । अज अद्वेत अगुन हृदयेसा ॥

अकल अनीह अनाम अरुपा । अनुभव गम्य अखंड अनूपा ॥

मन गोतीत अमल अबिनासी । निर्बिकार निरवधि सुख रासी ॥

सो तैं ताहि तोहि नहिं भेदा । बारि बीचि इव गावहि बेदा ॥

बिबिध भाँति मोहि मुनि समुझावा । निर्गुन मत मम हृदयँ न आवा ॥

पुनि मैं कहेउँ नाइ पद सीसा । सगुन उपासन कहहु मुनीसा ॥

राम भगति जल मम मन मीना । किमि बिलगाइ मुनीस प्रबीना ॥

सोइ उपदेस कहहु करि दाया । निज नयनन्हि देखौं रघुराया ॥

भरि लोचन बिलोकि अवधेसा । तब सुनिहउँ निर्गुन उपदेसा ॥

मुनि पुनि कहि हरिकथा अनूपा । खंडि सगुन मत अगुन निरूपा ॥

तब मैं निर्गुन मत कर दूरी । सगुन निरूपउँ करि हठ भूरी ॥

उत्तर प्रतिउत्तर मैं कीन्हा । मुनि तन भए क्रोध के चीन्हा ॥

सुनु प्रभु बहुत अवग्या किएँ । उपज क्रोध ग्यानिन्ह के हिएँ ॥

अति संघरषन जौं कर कोई । अनल प्रगट चंदन ते होई ॥

॥ दोहा ॥

बारंबार सकोप मुनि करइ निरुपन ग्यान ।

मैं अपनें मन बैठ तब करउँ बिबिध अनुमान ॥111(क)॥

क्रोध कि द्वेतबुद्धि बिनु द्वैत कि बिनु अग्यान ।

मायाबस परिछिन्न जड़ जीव कि ईस समान ॥111(ख)॥

॥ चौपाई ॥

कबहुँ कि दुख सब कर हित ताकें । तेहि कि दरिद्र परस मनि जाकें ॥

परद्रोही की होहिं निसंका । कामी पुनि कि रहहिं अकलंका ॥

बंस कि रह द्विज अनहित कीन्हें । कर्म कि होहिं स्वरूपहि चीन्हें ॥

काहू सुमति कि खल सँग जामी । सुभ गति पाव कि परत्रिय गामी ॥

भव कि परहिं परमात्मा बिंदक । सुखी कि होहिं कबहुँ हरिनिंदक ॥

राजु कि रहइ नीति बिनु जानें । अघ कि रहहिं हरिचरित बखानें ॥

पावन जस कि पुन्य बिनु होई । बिनु अघ अजस कि पावइ कोई ॥

लाभु कि किछु हरि भगति समाना । जेहि गावहिं श्रुति संत पुराना ॥

हानि कि जग एहि सम किछु भाई । भजिअ न रामहि नर तनु पाई ॥

अघ कि पिसुनता सम कछु आना । धर्म कि दया सरिस हरिजाना ॥

एहि बिधि अमिति जुगुति मन गुनऊँ । मुनि उपदेस न सादर सुनऊँ ॥

पुनि पुनि सगुन पच्छ मैं रोपा । तब मुनि बोलेउ बचन सकोपा ॥

मूढ़ परम सिख देउँ न मानसि । उत्तर प्रतिउत्तर बहु आनसि ॥

सत्य बचन बिस्वास न करही । बायस इव सबही ते डरही ॥

सठ स्वपच्छ तब हृदयँ बिसाला । सपदि होहि पच्छी चंडाला ॥

लीन्ह श्राप मैं सीस चढ़ाई । नहिं कछु भय न दीनता आई ॥

॥ दोहा ॥

तुरत भयउँ मैं काग तब पुनि मुनि पद सिरु नाइ ।

सुमिरि राम रघुबंस मनि हरषित चलेउँ उड़ाइ ॥112(क)॥

उमा जे राम चरन रत बिगत काम मद क्रोध ॥

निज प्रभुमय देखहिं जगत केहि सन करहिं बिरोध ॥112(ख)॥

॥ चौपाई ॥

सुनु खगेस नहिं कछु रिषि दूषन । उर प्रेरक रघुबंस बिभूषन ॥

कृपासिंधु मुनि मति करि भोरी । लीन्हि प्रेम परिच्छा मोरी ॥

मन बच क्रम मोहि निज जन जाना । मुनि मति पुनि फेरी भगवाना ॥

रिषि मम महत सीलता देखी । राम चरन बिस्वास बिसेषी ॥

अति बिसमय पुनि पुनि पछिताई । सादर मुनि मोहि लीन्ह बोलाई ॥

मम परितोष बिबिध बिधि कीन्हा । हरषित राममंत्र तब दीन्हा ॥

बालकरूप राम कर ध्याना । कहेउ मोहि मुनि कृपानिधाना ॥

सुंदर सुखद मिहि अति भावा । सो प्रथमहिं मैं तुम्हहि सुनावा ॥

मुनि मोहि कछुक काल तहँ राखा । रामचरितमानस तब भाषा ॥

सादर मोहि यह कथा सुनाई । पुनि बोले मुनि गिरा सुहाई ॥

रामचरित सर गुप्त सुहावा । संभु प्रसाद तात मैं पावा ॥

तोहि निज भगत राम कर जानी । ताते मैं सब कहेउँ बखानी ॥

राम भगति जिन्ह कें उर नाहीं । कबहुँ न तात कहिअ तिन्ह पाहीं ॥

मुनि मोहि बिबिध भाँति समुझावा । मैं सप्रेम मुनि पद सिरु नावा ॥

निज कर कमल परसि मम सीसा । हरषित आसिष दीन्ह मुनीसा ॥

राम भगति अबिरल उर तोरें । बसिहि सदा प्रसाद अब मोरें ॥

॥ दोहा ॥

सदा राम प्रिय होहु तुम्ह सुभ गुन भवन अमान ।

कामरूप इच्धामरन ग्यान बिराग निधान ॥113(क)॥

जेंहिं आश्रम तुम्ह बसब पुनि सुमिरत श्रीभगवंत ।

ब्यापिहि तहँ न अबिद्या जोजन एक प्रजंत ॥113(ख)॥

॥ चौपाई ॥

काल कर्म गुन दोष सुभाऊ । कछु दुख तुम्हहि न ब्यापिहि काऊ ॥

राम रहस्य ललित बिधि नाना । गुप्त प्रगट इतिहास पुराना ॥

बिनु श्रम तुम्ह जानब सब सोऊ । नित नव नेह राम पद होऊ ॥

जो इच्छा करिहहु मन माहीं । हरि प्रसाद कछु दुर्लभ नाहीं ॥

सुनि मुनि आसिष सुनु मतिधीरा । ब्रह्मगिरा भइ गगन गँभीरा ॥

एवमस्तु तव बच मुनि ग्यानी । यह मम भगत कर्म मन बानी ॥

सुनि नभगिरा हरष मोहि भयऊ । प्रेम मगन सब संसय गयऊ ॥

करि बिनती मुनि आयसु पाई । पद सरोज पुनि पुनि सिरु नाई ॥

हरष सहित एहिं आश्रम आयउँ । प्रभु प्रसाद दुर्लभ बर पायउँ ॥

इहाँ बसत मोहि सुनु खग ईसा । बीते कलप सात अरु बीसा ॥

करउँ सदा रघुपति गुन गाना । सादर सुनहिं बिहंग सुजाना ॥

जब जब अवधपुरीं रघुबीरा । धरहिं भगत हित मनुज सरीरा ॥

तब तब जाइ राम पुर रहऊँ । सिसुलीला बिलोकि सुख लहऊँ ॥

पुनि उर राखि राम सिसुरूपा । निज आश्रम आवउँ खगभूपा ॥

कथा सकल मैं तुम्हहि सुनाई । काग देह जेहिं कारन पाई ॥

कहिउँ तात सब प्रस्न तुम्हारी । राम भगति महिमा अति भारी ॥

॥ दोहा ॥

ताते यह तन मोहि प्रिय भयउ राम पद नेह ।

निज प्रभु दरसन पायउँ गए सकल संदेह ॥114(क)॥

मासपारायण, उन्तीसवाँ विश्राम

॥ दोहा ॥

भगति पच्छ हठ करि रहेउँ दीन्हि महारिषि साप ।

मुनि दुर्लभ बर पायउँ देखहु भजन प्रताप ॥114(ख)॥

॥ चौपाई ॥

जे असि भगति जानि परिहरहीं । केवल ग्यान हेतु श्रम करहीं ॥

ते जड़ कामधेनु गृहँ त्यागी । खोजत आकु फिरहिं पय लागी ॥

सुनु खगेस हरि भगति बिहाई । जे सुख चाहहिं आन उपाई ॥

ते सठ महासिंधु बिनु तरनी । पैरि पार चाहहिं जड़ करनी ॥

सुनि भसुंडि के बचन भवानी । बोलेउ गरुड़ हरषि मृदु बानी ॥

तव प्रसाद प्रभु मम उर माहीं । संसय सोक मोह भ्रम नाहीं ॥

सुनेउँ पुनीत राम गुन ग्रामा । तुम्हरी कृपाँ लहेउँ बिश्रामा ॥

एक बात प्रभु पूँछउँ तोही । कहहु बुझाइ कृपानिधि मोही ॥

कहहिं संत मुनि बेद पुराना । नहिं कछु दुर्लभ ग्यान समाना ॥

सोइ मुनि तुम्ह सन कहेउ गोसाईं । नहिं आदरेहु भगति की नाईं ॥

ग्यानहि भगतिहि अंतर केता । सकल कहहु प्रभु कृपा निकेता ॥

सुनि उरगारि बचन सुख माना । सादर बोलेउ काग सुजाना ॥

भगतिहि ग्यानहि नहिं कछु भेदा । उभय हरहिं भव संभव खेदा ॥

नाथ मुनीस कहहिं कछु अंतर । सावधान सोउ सुनु बिहंगबर ॥

ग्यान बिराग जोग बिग्याना । ए सब पुरुष सुनहु हरिजाना ॥

पुरुष प्रताप प्रबल सब भाँती । अबला अबल सहज जड़ जाती ॥

॥ दोहा ॥

पुरुष त्यागि सक नारिहि जो बिरक्त मति धीर ॥

न तु कामी बिषयाबस बिमुख जो पद रघुबीर ॥115(क)॥

सो0-सोउ मुनि ग्याननिधान मृगनयनी बिधु मुख निरखि ।

बिबस होइ हरिजान नारि बिष्नु माया प्रगट ॥115(ख)॥

॥ चौपाई ॥

इहाँ न पच्छपात कछु राखउँ । बेद पुरान संत मत भाषउँ ॥

मोह न नारि नारि कें रूपा । पन्नगारि यह रीति अनूपा ॥

माया भगति सुनहु तुम्ह दोऊ । नारि बर्ग जानइ सब कोऊ ॥

पुनि रघुबीरहि भगति पिआरी । माया खलु नर्तकी बिचारी ॥

भगतिहि सानुकूल रघुराया । ताते तेहि डरपति अति माया ॥

राम भगति निरुपम निरुपाधी । बसइ जासु उर सदा अबाधी ॥

तेहि बिलोकि माया सकुचाई । करि न सकइ कछु निज प्रभुताई ॥

अस बिचारि जे मुनि बिग्यानी । जाचहीं भगति सकल सुख खानी ॥

॥ दोहा ॥

यह रहस्य रघुनाथ कर बेगि न जानइ कोइ ।

जो जानइ रघुपति कृपाँ सपनेहुँ मोह न होइ ॥116(क)॥

औरउ ग्यान भगति कर भेद सुनहु सुप्रबीन ।

जो सुनि होइ राम पद प्रीति सदा अबिछीन ॥116(ख)॥

॥ चौपाई ॥

सुनहु तात यह अकथ कहानी । समुझत बनइ न जाइ बखानी ॥

ईस्वर अंस जीव अबिनासी । चेतन अमल सहज सुख रासी ॥

सो मायाबस भयउ गोसाईं । बँध्यो कीर मरकट की नाई ॥

जड़ चेतनहि ग्रंथि परि गई । जदपि मृषा छूटत कठिनई ॥

तब ते जीव भयउ संसारी । छूट न ग्रंथि न होइ सुखारी ॥

श्रुति पुरान बहु कहेउ उपाई । छूट न अधिक अधिक अरुझाई ॥

जीव हृदयँ तम मोह बिसेषी । ग्रंथि छूट किमि परइ न देखी ॥

अस संजोग ईस जब करई । तबहुँ कदाचित सो निरुअरई ॥

सात्त्विक श्रद्धा धेनु सुहाई । जौं हरि कृपाँ हृदयँ बस आई ॥

जप तप ब्रत जम नियम अपारा । जे श्रुति कह सुभ धर्म अचारा ॥

तेइ तृन हरित चरै जब गाई । भाव बच्छ सिसु पाइ पेन्हाई ॥

नोइ निबृत्ति पात्र बिस्वासा । निर्मल मन अहीर निज दासा ॥

परम धर्ममय पय दुहि भाई । अवटै अनल अकाम बिहाई ॥

तोष मरुत तब छमाँ जुड़ावै । धृति सम जावनु देइ जमावै ॥

मुदिताँ मथैं बिचार मथानी । दम अधार रजु सत्य सुबानी ॥

तब मथि काढ़ि लेइ नवनीता । बिमल बिराग सुभग सुपुनीता ॥

॥ दोहा ॥

जोग अगिनि करि प्रगट तब कर्म सुभासुभ लाइ ।

बुद्धि सिरावैं ग्यान घृत ममता मल जरि जाइ ॥117(क)॥

तब बिग्यानरूपिनि बुद्धि बिसद घृत पाइ ।

चित्त दिआ भरि धरै दृढ़ समता दिअटि बनाइ ॥117(ख)॥

तीनि अवस्था तीनि गुन तेहि कपास तें काढ़ि ।

तूल तुरीय सँवारि पुनि बाती करै सुगाढ़ि ॥117(ग)॥

॥ सोरठा ॥

सो0-एहि बिधि लेसै दीप तेज रासि बिग्यानमय ॥

जातहिं जासु समीप जरहिं मदादिक सलभ सब ॥117(घ)॥

॥ चौपाई ॥

सोहमस्मि इति बृत्ति अखंडा । दीप सिखा सोइ परम प्रचंडा ॥

आतम अनुभव सुख सुप्रकासा । तब भव मूल भेद भ्रम नासा ॥

प्रबल अबिद्या कर परिवारा । मोह आदि तम मिटइ अपारा ॥

तब सोइ बुद्धि पाइ उँजिआरा । उर गृहँ बैठि ग्रंथि निरुआरा ॥

छोरन ग्रंथि पाव जौं सोई । तब यह जीव कृतारथ होई ॥

छोरत ग्रंथि जानि खगराया । बिघ्न अनेक करइ तब माया ॥

रिद्धि सिद्धि प्रेरइ बहु भाई । बुद्धहि लोभ दिखावहिं आई ॥

कल बल छल करि जाहिं समीपा । अंचल बात बुझावहिं दीपा ॥

होइ बुद्धि जौं परम सयानी । तिन्ह तन चितव न अनहित जानी ॥

जौं तेहि बिघ्न बुद्धि नहिं बाधी । तौ बहोरि सुर करहिं उपाधी ॥

इंद्रीं द्वार झरोखा नाना । तहँ तहँ सुर बैठे करि थाना ॥

आवत देखहिं बिषय बयारी । ते हठि देही कपाट उघारी ॥

जब सो प्रभंजन उर गृहँ जाई । तबहिं दीप बिग्यान बुझाई ॥

ग्रंथि न छूटि मिटा सो प्रकासा । बुद्धि बिकल भइ बिषय बतासा ॥

इंद्रिन्ह सुरन्ह न ग्यान सोहाई । बिषय भोग पर प्रीति सदाई ॥

बिषय समीर बुद्धि कृत भोरी । तेहि बिधि दीप को बार बहोरी ॥

॥ दोहा ॥

तब फिरि जीव बिबिध बिधि पावइ संसृति क्लेस ।

हरि माया अति दुस्तर तरि न जाइ बिहगेस ॥118(क)॥

कहत कठिन समुझत कठिन साधन कठिन बिबेक ।

होइ घुनाच्छर न्याय जौं पुनि प्रत्यूह अनेक ॥118(ख)॥

॥ चौपाई ॥

ग्यान पंथ कृपान कै धारा । परत खगेस होइ नहिं बारा ॥

जो निर्बिघ्न पंथ निर्बहई । सो कैवल्य परम पद लहई ॥

अति दुर्लभ कैवल्य परम पद । संत पुरान निगम आगम बद ॥

राम भजत सोइ मुकुति गोसाई । अनइच्छित आवइ बरिआई ॥

जिमि थल बिनु जल रहि न सकाई । कोटि भाँति कोउ करै उपाई ॥

तथा मोच्छ सुख सुनु खगराई । रहि न सकइ हरि भगति बिहाई ॥

अस बिचारि हरि भगत सयाने । मुक्ति निरादर भगति लुभाने ॥

भगति करत बिनु जतन प्रयासा । संसृति मूल अबिद्या नासा ॥

भोजन करिअ तृपिति हित लागी । जिमि सो असन पचवै जठरागी ॥

असि हरिभगति सुगम सुखदाई । को अस मूढ़ न जाहि सोहाई ॥

॥ दोहा ॥

सेवक सेब्य भाव बिनु भव न तरिअ उरगारि ॥

भजहु राम पद पंकज अस सिद्धांत बिचारि ॥119(क)॥

जो चेतन कहँ ज़ड़ करइ ज़ड़हि करइ चैतन्य ।

अस समर्थ रघुनायकहिं भजहिं जीव ते धन्य ॥119(ख)॥

॥ चौपाई ॥

कहेउँ ग्यान सिद्धांत बुझाई । सुनहु भगति मनि कै प्रभुताई ॥

राम भगति चिंतामनि सुंदर । बसइ गरुड़ जाके उर अंतर ॥

परम प्रकास रूप दिन राती । नहिं कछु चहिअ दिआ घृत बाती ॥

मोह दरिद्र निकट नहिं आवा । लोभ बात नहिं ताहि बुझावा ॥

प्रबल अबिद्या तम मिटि जाई । हारहिं सकल सलभ समुदाई ॥

खल कामादि निकट नहिं जाहीं । बसइ भगति जाके उर माहीं ॥

गरल सुधासम अरि हित होई । तेहि मनि बिनु सुख पाव न कोई ॥

ब्यापहिं मानस रोग न भारी । जिन्ह के बस सब जीव दुखारी ॥

राम भगति मनि उर बस जाकें । दुख लवलेस न सपनेहुँ ताकें ॥

चतुर सिरोमनि तेइ जग माहीं । जे मनि लागि सुजतन कराहीं ॥

सो मनि जदपि प्रगट जग अहई । राम कृपा बिनु नहिं कोउ लहई ॥

सुगम उपाय पाइबे केरे । नर हतभाग्य देहिं भटमेरे ॥

पावन पर्बत बेद पुराना । राम कथा रुचिराकर नाना ॥

मर्मी सज्जन सुमति कुदारी । ग्यान बिराग नयन उरगारी ॥

भाव सहित खोजइ जो प्रानी । पाव भगति मनि सब सुख खानी ॥

मोरें मन प्रभु अस बिस्वासा । राम ते अधिक राम कर दासा ॥

राम सिंधु घन सज्जन धीरा । चंदन तरु हरि संत समीरा ॥

सब कर फल हरि भगति सुहाई । सो बिनु संत न काहूँ पाई ॥

अस बिचारि जोइ कर सतसंगा । राम भगति तेहि सुलभ बिहंगा ॥

॥ दोहा ॥

ब्रह्म पयोनिधि मंदर ग्यान संत सुर आहिं ।

कथा सुधा मथि काढ़हिं भगति मधुरता जाहिं ॥120(क)॥

बिरति चर्म असि ग्यान मद लोभ मोह रिपु मारि ।

जय पाइअ सो हरि भगति देखु खगेस बिचारि ॥120(ख)॥

॥ चौपाई ॥

पुनि सप्रेम बोलेउ खगराऊ । जौं कृपाल मोहि ऊपर भाऊ ॥

नाथ मोहि निज सेवक जानी । सप्त प्रस्न कहहु बखानी ॥

प्रथमहिं कहहु नाथ मतिधीरा । सब ते दुर्लभ कवन सरीरा ॥

बड़ दुख कवन कवन सुख भारी । सोउ संछेपहिं कहहु बिचारी ॥

संत असंत मरम तुम्ह जानहु । तिन्ह कर सहज सुभाव बखानहु ॥

कवन पुन्य श्रुति बिदित बिसाला । कहहु कवन अघ परम कराला ॥

मानस रोग कहहु समुझाई । तुम्ह सर्बग्य कृपा अधिकाई ॥

तात सुनहु सादर अति प्रीती । मैं संछेप कहउँ यह नीती ॥

नर तन सम नहिं कवनिउ देही । जीव चराचर जाचत तेही ॥

नरग स्वर्ग अपबर्ग निसेनी । ग्यान बिराग भगति सुभ देनी ॥

सो तनु धरि हरि भजहिं न जे नर । होहिं बिषय रत मंद मंद तर ॥

काँच किरिच बदलें ते लेही । कर ते डारि परस मनि देहीं ॥

नहिं दरिद्र सम दुख जग माहीं । संत मिलन सम सुख जग नाहीं ॥

पर उपकार बचन मन काया । संत सहज सुभाउ खगराया ॥

संत सहहिं दुख परहित लागी । परदुख हेतु असंत अभागी ॥

भूर्ज तरू सम संत कृपाला । परहित निति सह बिपति बिसाला ॥

सन इव खल पर बंधन करई । खाल कढ़ाइ बिपति सहि मरई ॥

खल बिनु स्वारथ पर अपकारी । अहि मूषक इव सुनु उरगारी ॥

पर संपदा बिनासि नसाहीं । जिमि ससि हति हिम उपल बिलाहीं ॥

दुष्ट उदय जग आरति हेतू । जथा प्रसिद्ध अधम ग्रह केतू ॥

संत उदय संतत सुखकारी । बिस्व सुखद जिमि इंदु तमारी ॥

परम धर्म श्रुति बिदित अहिंसा । पर निंदा सम अघ न गरीसा ॥

हर गुर निंदक दादुर होई । जन्म सहस्त्र पाव तन सोई ॥

द्विज निंदक बहु नरक भोग करि । जग जनमइ बायस सरीर धरि ॥

सुर श्रुति निंदक जे अभिमानी । रौरव नरक परहिं ते प्रानी ॥

होहिं उलूक संत निंदा रत । मोह निसा प्रिय ग्यान भानु गत ॥

सब के निंदा जे जड़ करहीं । ते चमगादुर होइ अवतरहीं ॥

सुनहु तात अब मानस रोगा । जिन्ह ते दुख पावहिं सब लोगा ॥

मोह सकल ब्याधिन्ह कर मूला । तिन्ह ते पुनि उपजहिं बहु सूला ॥

काम बात कफ लोभ अपारा । क्रोध पित्त नित छाती जारा ॥

प्रीति करहिं जौं तीनिउ भाई । उपजइ सन्यपात दुखदाई ॥

बिषय मनोरथ दुर्गम नाना । ते सब सूल नाम को जाना ॥

ममता दादु कंडु इरषाई । हरष बिषाद गरह बहुताई ॥

पर सुख देखि जरनि सोइ छई । कुष्ट दुष्टता मन कुटिलई ॥

अहंकार अति दुखद डमरुआ । दंभ कपट मद मान नेहरुआ ॥

तृस्ना उदरबृद्धि अति भारी । त्रिबिध ईषना तरुन तिजारी ॥

जुग बिधि ज्वर मत्सर अबिबेका । कहँ लागि कहौं कुरोग अनेका ॥

॥ दोहा ॥

एक ब्याधि बस नर मरहिं ए असाधि बहु ब्याधि ।

पीड़हिं संतत जीव कहुँ सो किमि लहै समाधि ॥121(क)॥

नेम धर्म आचार तप ग्यान जग्य जप दान ।

भेषज पुनि कोटिन्ह नहिं रोग जाहिं हरिजान ॥121(ख)॥

॥ चौपाई ॥

एहि बिधि सकल जीव जग रोगी । सोक हरष भय प्रीति बियोगी ॥

मानक रोग कछुक मैं गाए । हहिं सब कें लखि बिरलेन्ह पाए ॥

जाने ते छीजहिं कछु पापी । नास न पावहिं जन परितापी ॥

बिषय कुपथ्य पाइ अंकुरे । मुनिहु हृदयँ का नर बापुरे ॥

राम कृपाँ नासहि सब रोगा । जौं एहि भाँति बनै संयोगा ॥

सदगुर बैद बचन बिस्वासा । संजम यह न बिषय कै आसा ॥

रघुपति भगति सजीवन मूरी । अनूपान श्रद्धा मति पूरी ॥

एहि बिधि भलेहिं सो रोग नसाहीं । नाहिं त जतन कोटि नहिं जाहीं ॥

जानिअ तब मन बिरुज गोसाँई । जब उर बल बिराग अधिकाई ॥

सुमति छुधा बाढ़इ नित नई । बिषय आस दुर्बलता गई ॥

बिमल ग्यान जल जब सो नहाई । तब रह राम भगति उर छाई ॥

सिव अज सुक सनकादिक नारद । जे मुनि ब्रह्म बिचार बिसारद ॥

सब कर मत खगनायक एहा । करिअ राम पद पंकज नेहा ॥

श्रुति पुरान सब ग्रंथ कहाहीं । रघुपति भगति बिना सुख नाहीं ॥

कमठ पीठ जामहिं बरु बारा । बंध्या सुत बरु काहुहि मारा ॥

फूलहिं नभ बरु बहुबिधि फूला । जीव न लह सुख हरि प्रतिकूला ॥

तृषा जाइ बरु मृगजल पाना । बरु जामहिं सस सीस बिषाना ॥

अंधकारु बरु रबिहि नसावै । राम बिमुख न जीव सुख पावै ॥

हिम ते अनल प्रगट बरु होई । बिमुख राम सुख पाव न कोई ॥

॥ दोहा ॥

दो0=बारि मथें घृत होइ बरु सिकता ते बरु तेल ।

बिनु हरि भजन न भव तरिअ यह सिद्धांत अपेल ॥122(क)॥

मसकहि करइ बिंरंचि प्रभु अजहि मसक ते हीन ।

अस बिचारि तजि संसय रामहि भजहिं प्रबीन ॥122(ख)॥

श्लोक- विनिच्श्रितं वदामि ते न अन्यथा वचांसि मे ।

हरिं नरा भजन्ति येऽतिदुस्तरं तरन्ति ते ॥122(ग)॥

॥ चौपाई ॥

कहेउँ नाथ हरि चरित अनूपा । ब्यास समास स्वमति अनुरुपा ॥

श्रुति सिद्धांत इहइ उरगारी । राम भजिअ सब काज बिसारी ॥

प्रभु रघुपति तजि सेइअ काही । मोहि से सठ पर ममता जाही ॥

तुम्ह बिग्यानरूप नहिं मोहा । नाथ कीन्हि मो पर अति छोहा ॥

पूछिहुँ राम कथा अति पावनि । सुक सनकादि संभु मन भावनि ॥

सत संगति दुर्लभ संसारा । निमिष दंड भरि एकउ बारा ॥

देखु गरुड़ निज हृदयँ बिचारी । मैं रघुबीर भजन अधिकारी ॥

सकुनाधम सब भाँति अपावन । प्रभु मोहि कीन्ह बिदित जग पावन ॥

॥ दोहा ॥

आजु धन्य मैं धन्य अति जद्यपि सब बिधि हीन ।

निज जन जानि राम मोहि संत समागम दीन ॥123(क)॥

नाथ जथामति भाषेउँ राखेउँ नहिं कछु गोइ ।

चरित सिंधु रघुनायक थाह कि पावइ कोइ ॥123॥

॥ चौपाई ॥

सुमिरि राम के गुन गन नाना । पुनि पुनि हरष भुसुंडि सुजाना ॥

महिमा निगम नेति करि गाई । अतुलित बल प्रताप प्रभुताई ॥

सिव अज पूज्य चरन रघुराई । मो पर कृपा परम मृदुलाई ॥

अस सुभाउ कहुँ सुनउँ न देखउँ । केहि खगेस रघुपति सम लेखउँ ॥

साधक सिद्ध बिमुक्त उदासी । कबि कोबिद कृतग्य संन्यासी ॥

जोगी सूर सुतापस ग्यानी । धर्म निरत पंडित बिग्यानी ॥

तरहिं न बिनु सेएँ मम स्वामी । राम नमामि नमामि नमामी ॥

सरन गएँ मो से अघ रासी । होहिं सुद्ध नमामि अबिनासी ॥

॥ दोहा ॥

जासु नाम भव भेषज हरन घोर त्रय सूल ।

सो कृपालु मोहि तो पर सदा रहउ अनुकूल ॥124(क)॥

सुनि भुसुंडि के बचन सुभ देखि राम पद नेह ।

बोलेउ प्रेम सहित गिरा गरुड़ बिगत संदेह ॥124(ख)॥

॥ चौपाई ॥

मै कृत्कृत्य भयउँ तव बानी । सुनि रघुबीर भगति रस सानी ॥

राम चरन नूतन रति भई । माया जनित बिपति सब गई ॥

मोह जलधि बोहित तुम्ह भए । मो कहँ नाथ बिबिध सुख दए ॥

मो पहिं होइ न प्रति उपकारा । बंदउँ तव पद बारहिं बारा ॥

पूरन काम राम अनुरागी । तुम्ह सम तात न कोउ बड़भागी ॥

संत बिटप सरिता गिरि धरनी । पर हित हेतु सबन्ह कै करनी ॥

संत हृदय नवनीत समाना । कहा कबिन्ह परि कहै न जाना ॥

निज परिताप द्रवइ नवनीता । पर दुख द्रवहिं संत सुपुनीता ॥

जीवन जन्म सुफल मम भयऊ । तव प्रसाद संसय सब गयऊ ॥

जानेहु सदा मोहि निज किंकर । पुनि पुनि उमा कहइ बिहंगबर ॥

॥ दोहा ॥

तासु चरन सिरु नाइ करि प्रेम सहित मतिधीर ।

गयउ गरुड़ बैकुंठ तब हृदयँ राखि रघुबीर ॥125(क)॥

गिरिजा संत समागम सम न लाभ कछु आन ।

बिनु हरि कृपा न होइ सो गावहिं बेद पुरान ॥125(ख)॥

॥ चौपाई ॥

कहेउँ परम पुनीत इतिहासा । सुनत श्रवन छूटहिं भव पासा ॥

प्रनत कल्पतरु करुना पुंजा । उपजइ प्रीति राम पद कंजा ॥

मन क्रम बचन जनित अघ जाई । सुनहिं जे कथा श्रवन मन लाई ॥

तीर्थाटन साधन समुदाई । जोग बिराग ग्यान निपुनाई ॥

नाना कर्म धर्म ब्रत दाना । संजम दम जप तप मख नाना ॥

भूत दया द्विज गुर सेवकाई । बिद्या बिनय बिबेक बड़ाई ॥

जहँ लगि साधन बेद बखानी । सब कर फल हरि भगति भवानी ॥

सो रघुनाथ भगति श्रुति गाई । राम कृपाँ काहूँ एक पाई ॥

॥ दोहा ॥

मुनि दुर्लभ हरि भगति नर पावहिं बिनहिं प्रयास ।

जे यह कथा निरंतर सुनहिं मानि बिस्वास ॥126॥

॥ चौपाई ॥

सोइ सर्बग्य गुनी सोइ ग्याता । सोइ महि मंडित पंडित दाता ॥

धर्म परायन सोइ कुल त्राता । राम चरन जा कर मन राता ॥

नीति निपुन सोइ परम सयाना । श्रुति सिद्धांत नीक तेहिं जाना ॥

सोइ कबि कोबिद सोइ रनधीरा । जो छल छाड़ि भजइ रघुबीरा ॥

धन्य देस सो जहँ सुरसरी । धन्य नारि पतिब्रत अनुसरी ॥

धन्य सो भूपु नीति जो करई । धन्य सो द्विज निज धर्म न टरई ॥

सो धन धन्य प्रथम गति जाकी । धन्य पुन्य रत मति सोइ पाकी ॥

धन्य घरी सोइ जब सतसंगा । धन्य जन्म द्विज भगति अभंगा ॥

॥ दोहा ॥

सो कुल धन्य उमा सुनु जगत पूज्य सुपुनीत ।

श्रीरघुबीर परायन जेहिं नर उपज बिनीत ॥127॥

॥ चौपाई ॥

मति अनुरूप कथा मैं भाषी । जद्यपि प्रथम गुप्त करि राखी ॥

तव मन प्रीति देखि अधिकाई । तब मैं रघुपति कथा सुनाई ॥

यह न कहिअ सठही हठसीलहि । जो मन लाइ न सुन हरि लीलहि ॥

कहिअ न लोभिहि क्रोधहि कामिहि । जो न भजइ सचराचर स्वामिहि ॥

द्विज द्रोहिहि न सुनाइअ कबहूँ । सुरपति सरिस होइ नृप जबहूँ ॥

राम कथा के तेइ अधिकारी । जिन्ह कें सतसंगति अति प्यारी ॥

गुर पद प्रीति नीति रत जेई । द्विज सेवक अधिकारी तेई ॥

ता कहँ यह बिसेष सुखदाई । जाहि प्रानप्रिय श्रीरघुराई ॥

॥ दोहा ॥

राम चरन रति जो चह अथवा पद निर्बान ।

भाव सहित सो यह कथा करउ श्रवन पुट पान ॥128॥

॥ चौपाई ॥

राम कथा गिरिजा मैं बरनी । कलि मल समनि मनोमल हरनी ॥

संसृति रोग सजीवन मूरी । राम कथा गावहिं श्रुति सूरी ॥

एहि महँ रुचिर सप्त सोपाना । रघुपति भगति केर पंथाना ॥

अति हरि कृपा जाहि पर होई । पाउँ देइ एहिं मारग सोई ॥

मन कामना सिद्धि नर पावा । जे यह कथा कपट तजि गावा ॥

कहहिं सुनहिं अनुमोदन करहीं । ते गोपद इव भवनिधि तरहीं ॥

सुनि सब कथा हृदयँ अति भाई । गिरिजा बोली गिरा सुहाई ॥

नाथ कृपाँ मम गत संदेहा । राम चरन उपजेउ नव नेहा ॥

॥ दोहा ॥

मैं कृतकृत्य भइउँ अब तव प्रसाद बिस्वेस ।

उपजी राम भगति दृढ़ बीते सकल कलेस ॥129॥

॥ चौपाई ॥

यह सुभ संभु उमा संबादा । सुख संपादन समन बिषादा ॥

भव भंजन गंजन संदेहा । जन रंजन सज्जन प्रिय एहा ॥

राम उपासक जे जग माहीं । एहि सम प्रिय तिन्ह के कछु नाहीं ॥

रघुपति कृपाँ जथामति गावा । मैं यह पावन चरित सुहावा ॥

एहिं कलिकाल न साधन दूजा । जोग जग्य जप तप ब्रत पूजा ॥

रामहि सुमिरिअ गाइअ रामहि । संतत सुनिअ राम गुन ग्रामहि ॥

जासु पतित पावन बड़ बाना । गावहिं कबि श्रुति संत पुराना ॥

ताहि भजहि मन तजि कुटिलाई । राम भजें गति केहिं नहिं पाई ॥

॥ छन्द ॥

पाई न केहिं गति पतित पावन राम भजि सुनु सठ मना ।

गनिका अजामिल ब्याध गीध गजादि खल तारे घना ॥

आभीर जमन किरात खस स्वपचादि अति अघरूप जे ।

कहि नाम बारक तेपि पावन होहिं राम नमामि ते ॥1॥

रघुबंस भूषन चरित यह नर कहहिं सुनहिं जे गावहीं ।

कलि मल मनोमल धोइ बिनु श्रम राम धाम सिधावहीं ॥

सत पंच चौपाईं मनोहर जानि जो नर उर धरै ।

दारुन अबिद्या पंच जनित बिकार श्रीरघुबर हरै ॥2॥

सुंदर सुजान कृपा निधान अनाथ पर कर प्रीति जो ।

सो एक राम अकाम हित निर्बानप्रद सम आन को ॥

जाकी कृपा लवलेस ते मतिमंद तुलसीदासहूँ ।

पायो परम बिश्रामु राम समान प्रभु नाहीं कहूँ ॥3॥

॥ दोहा ॥

मो सम दीन न दीन हित तुम्ह समान रघुबीर ।

अस बिचारि रघुबंस मनि हरहु बिषम भव भीर ॥130(क)॥

कामिहि नारि पिआरि जिमि लोभहि प्रिय जिमि दाम ।

तिमि रघुनाथ निरंतर प्रिय लागहु मोहि राम ॥130(ख)॥

श्लोक-यत्पूर्व प्रभुणा कृतं सुकविना श्रीशम्भुना दुर्गमं

श्रीमद्रामपदाब्जभक्तिमनिशं प्राप्त्यै तु रामायणम् ।

मत्वा तद्रघुनाथमनिरतं स्वान्तस्तमःशान्तये

भाषाबद्धमिदं चकार तुलसीदासस्तथा मानसम् ॥1॥

पुण्यं पापहरं सदा शिवकरं विज्ञानभक्तिप्रदं

मायामोहमलापहं सुविमलं प्रेमाम्बुपूरं शुभम् ।

श्रीमद्रामचरित्रमानसमिदं भक्त्यावगाहन्ति ये

ते संसारपतङ्गघोरकिरणैर्दह्यन्ति नो मानवाः ॥2॥

मासपारायण, तीसवाँ विश्राम

नवान्हपारायण, नवाँ विश्राम

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने

सप्तमः सोपानः समाप्तः ।

उत्तरकाण्ड समाप्त)

आरति श्रीरामायनजी की । कीरति कलित ललित सिय पी की ॥

गावत ब्रह्मादिक मुनि नारद । बालमीक बिग्यान बिसारद ।

सुक सनकादि सेष अरु सारद । बरनि पवनसुत कीरति नीकी ॥1॥

गावत बेद पुरान अष्टदस । छओ सास्त्र सब ग्रंथन को रस ।

मुनि जन धन संतन को सरबस । सार अंस संमत सबही की ॥2॥

गावत संतत संभु भवानी । अरु घटसंभव मुनि बिग्यानी ।

ब्यास आदि कबिबर्ज बखानी । कागभुसुंडि गरुड के ही की ॥3॥

कलिमल हरनि बिषय रस फीकी । सुभग सिंगार मुक्ति जुबती की ।

दलन रोग भव मूरि अमी की । तात मात सब बिधि तुलसी की ॥4॥

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