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लंकाकाण्ड

लंकाकाण्ड

॥ श्री गणेशाय नमः ॥

श्री जानकीवल्लभो विजयते

श्री रामचरितमानस
षष्ठ सोपान
(लंकाकाण्ड)

॥ श्लोक ॥

रामं कामारिसेव्यं भवभयहरणं कालमत्तेभसिंहं

योगीन्द्रं ज्ञानगम्यं गुणनिधिमजितं निर्गुणं निर्विकारम् ।

मायातीतं सुरेशं खलवधनिरतं ब्रह्मवृन्दैकदेवं

वन्दे कन्दावदातं सरसिजनयनं देवमुर्वीशरूपम् ॥1॥

शंखेन्द्वाभमतीवसुन्दरतनुं शार्दूलचर्माम्बरं

कालव्यालकरालभूषणधरं गंगाशशांकप्रियम् ।

काशीशं कलिकल्मषौघशमनं कल्याणकल्पद्रुमं

नौमीड्यं गिरिजापतिं गुणनिधिं कन्दर्पहं शङ्करम् ॥2॥

यो ददाति सतां शम्भुः कैवल्यमपि दुर्लभम् ।

खलानां दण्डकृद्योऽसौ शङ्करः शं तनोतु मे ॥3॥

॥ दोहा ॥

लव निमेष परमानु जुग बरष कलप सर चंड ।

भजसि न मन तेहि राम को कालु जासु कोदंड ॥

॥ छन्द ॥

सिंधु बचन सुनि राम सचिव बोलि प्रभु अस कहेउ ।

अब बिलंबु केहि काम करहु सेतु उतरै कटकु ॥

सुनहु भानुकुल केतु जामवंत कर जोरि कह ।

नाथ नाम तव सेतु नर चढ़ि भव सागर तरिहिं ॥

यह लघु जलधि तरत कति बारा । अस सुनि पुनि कह पवनकुमारा ॥

प्रभु प्रताप बड़वानल भारी । सोषेउ प्रथम पयोनिधि बारी ॥

तब रिपु नारी रुदन जल धारा । भरेउ बहोरि भयउ तेहिं खारा ॥

सुनि अति उकुति पवनसुत केरी । हरषे कपि रघुपति तन हेरी ॥

जामवंत बोले दोउ भाई । नल नीलहि सब कथा सुनाई ॥

राम प्रताप सुमिरि मन माहीं । करहु सेतु प्रयास कछु नाहीं ॥

बोलि लिए कपि निकर बहोरी । सकल सुनहु बिनती कछु मोरी ॥

राम चरन पंकज उर धरहू । कौतुक एक भालु कपि करहू ॥

धावहु मर्कट बिकट बरूथा । आनहु बिटप गिरिन्ह के जूथा ॥

सुनि कपि भालु चले करि हूहा । जय रघुबीर प्रताप समूहा ॥

॥ दोहा ॥

अति उतंग गिरि पादप लीलहिं लेहिं उठाइ ।

आनि देहिं नल नीलहि रचहिं ते सेतु बनाइ ॥1॥

॥ चौपाई ॥

सैल बिसाल आनि कपि देहीं । कंदुक इव नल नील ते लेहीं ॥

देखि सेतु अति सुंदर रचना । बिहसि कृपानिधि बोले बचना ॥

परम रम्य उत्तम यह धरनी । महिमा अमित जाइ नहिं बरनी ॥

करिहउँ इहाँ संभु थापना । मोरे हृदयँ परम कलपना ॥

सुनि कपीस बहु दूत पठाए । मुनिबर सकल बोलि लै आए ॥

लिंग थापि बिधिवत करि पूजा । सिव समान प्रिय मोहि न दूजा ॥

सिव द्रोही मम भगत कहावा । सो नर सपनेहुँ मोहि न पावा ॥

संकर बिमुख भगति चह मोरी । सो नारकी मूढ़ मति थोरी ॥

॥ दोहा ॥

संकर प्रिय मम द्रोही सिव द्रोही मम दास ।

ते नर करहि कलप भरि धोर नरक महुँ बास ॥2॥

॥ चौपाई ॥

जे रामेस्वर दरसनु करिहहिं । ते तनु तजि मम लोक सिधरिहहिं ॥

जो गंगाजलु आनि चढ़ाइहि । सो साजुज्य मुक्ति नर पाइहि ॥

होइ अकाम जो छल तजि सेइहि । भगति मोरि तेहि संकर देइहि ॥

मम कृत सेतु जो दरसनु करिही । सो बिनु श्रम भवसागर तरिही ॥

राम बचन सब के जिय भाए । मुनिबर निज निज आश्रम आए ॥

गिरिजा रघुपति कै यह रीती । संतत करहिं प्रनत पर प्रीती ॥

बाँधा सेतु नील नल नागर । राम कृपाँ जसु भयउ उजागर ॥

बूड़हिं आनहि बोरहिं जेई । भए उपल बोहित सम तेई ॥

महिमा यह न जलधि कइ बरनी । पाहन गुन न कपिन्ह कइ करनी ॥

॥ दोहा ॥

श्री रघुबीर प्रताप ते सिंधु तरे पाषान ।

ते मतिमंद जे राम तजि भजहिं जाइ प्रभु आन ॥3॥

॥ चौपाई ॥

बाँधि सेतु अति सुदृढ़ बनावा । देखि कृपानिधि के मन भावा ॥

चली सेन कछु बरनि न जाई । गर्जहिं मर्कट भट समुदाई ॥

सेतुबंध ढिग चढ़ि रघुराई । चितव कृपाल सिंधु बहुताई ॥

देखन कहुँ प्रभु करुना कंदा । प्रगट भए सब जलचर बृंदा ॥

मकर नक्र नाना झष ब्याला । सत जोजन तन परम बिसाला ॥

अइसेउ एक तिन्हहि जे खाहीं । एकन्ह कें डर तेपि डेराहीं ॥

प्रभुहि बिलोकहिं टरहिं न टारे । मन हरषित सब भए सुखारे ॥

तिन्ह की ओट न देखिअ बारी । मगन भए हरि रूप निहारी ॥

चला कटकु प्रभु आयसु पाई । को कहि सक कपि दल बिपुलाई ॥

॥ दोहा ॥

सेतुबंध भइ भीर अति कपि नभ पंथ उड़ाहिं ।

अपर जलचरन्हि ऊपर चढ़ि चढ़ि पारहि जाहिं ॥4॥

॥ चौपाई ॥

अस कौतुक बिलोकि द्वौ भाई । बिहँसि चले कृपाल रघुराई ॥

सेन सहित उतरे रघुबीरा । कहि न जाइ कपि जूथप भीरा ॥

सिंधु पार प्रभु डेरा कीन्हा । सकल कपिन्ह कहुँ आयसु दीन्हा ॥

खाहु जाइ फल मूल सुहाए । सुनत भालु कपि जहँ तहँ धाए ॥

सब तरु फरे राम हित लागी । रितु अरु कुरितु काल गति त्यागी ॥

खाहिं मधुर फल बटप हलावहिं । लंका सन्मुख सिखर चलावहिं ॥

जहँ कहुँ फिरत निसाचर पावहिं । घेरि सकल बहु नाच नचावहिं ॥

दसनन्हि काटि नासिका काना । कहि प्रभु सुजसु देहिं तब जाना ॥

जिन्ह कर नासा कान निपाता । तिन्ह रावनहि कही सब बाता ॥

सुनत श्रवन बारिधि बंधाना । दस मुख बोलि उठा अकुलाना ॥

॥ दोहा ॥

बांध्यो बननिधि नीरनिधि जलधि सिंधु बारीस ।

सत्य तोयनिधि कंपति उदधि पयोधि नदीस ॥5॥

॥ चौपाई ॥

निज बिकलता बिचारि बहोरी । बिहँसि गयउ ग्रह करि भय भोरी ॥

मंदोदरीं सुन्यो प्रभु आयो । कौतुकहीं पाथोधि बँधायो ॥

कर गहि पतिहि भवन निज आनी । बोली परम मनोहर बानी ॥

चरन नाइ सिरु अंचलु रोपा । सुनहु बचन पिय परिहरि कोपा ॥

नाथ बयरु कीजे ताही सों । बुधि बल सकिअ जीति जाही सों ॥

तुम्हहि रघुपतिहि अंतर कैसा । खलु खद्योत दिनकरहि जैसा ॥

अतिबल मधु कैटभ जेहिं मारे । महाबीर दितिसुत संघारे ॥

जेहिं बलि बाँधि सहजभुज मारा । सोइ अवतरेउ हरन महि भारा ॥

तासु बिरोध न कीजिअ नाथा । काल करम जिव जाकें हाथा ॥

॥ दोहा ॥

रामहि सौपि जानकी नाइ कमल पद माथ ।

सुत कहुँ राज समर्पि बन जाइ भजिअ रघुनाथ ॥6॥

॥ चौपाई ॥

नाथ दीनदयाल रघुराई । बाघउ सनमुख गएँ न खाई ॥

चाहिअ करन सो सब करि बीते । तुम्ह सुर असुर चराचर जीते ॥

संत कहहिं असि नीति दसानन । चौथेंपन जाइहि नृप कानन ॥

तासु भजन कीजिअ तहँ भर्ता । जो कर्ता पालक संहर्ता ॥

सोइ रघुवीर प्रनत अनुरागी । भजहु नाथ ममता सब त्यागी ॥

मुनिबर जतनु करहिं जेहि लागी । भूप राजु तजि होहिं बिरागी ॥

सोइ कोसलधीस रघुराया । आयउ करन तोहि पर दाया ॥

जौं पिय मानहु मोर सिखावन । सुजसु होइ तिहुँ पुर अति पावन ॥

॥ दोहा ॥

अस कहि नयन नीर भरि गहि पद कंपित गात ।

नाथ भजहु रघुनाथहि अचल होइ अहिवात ॥7॥

॥ चौपाई ॥

तब रावन मयसुता उठाई । कहै लाग खल निज प्रभुताई ॥

सुनु तै प्रिया बृथा भय माना । जग जोधा को मोहि समाना ॥

बरुन कुबेर पवन जम काला । भुज बल जितेउँ सकल दिगपाला ॥

देव दनुज नर सब बस मोरें । कवन हेतु उपजा भय तोरें ॥

नाना बिधि तेहि कहेसि बुझाई । सभाँ बहोरि बैठ सो जाई ॥

मंदोदरीं हदयँ अस जाना । काल बस्य उपजा अभिमाना ॥

सभाँ आइ मंत्रिन्ह तेंहि बूझा । करब कवन बिधि रिपु सैं जूझा ॥

कहहिं सचिव सुनु निसिचर नाहा । बार बार प्रभु पूछहु काहा ॥

कहहु कवन भय करिअ बिचारा । नर कपि भालु अहार हमारा ॥

॥ दोहा ॥

सब के बचन श्रवन सुनि कह प्रहस्त कर जोरि ।

निति बिरोध न करिअ प्रभु मत्रिंन्ह मति अति थोरि ॥8॥

॥ चौपाई ॥

कहहिं सचिव सठ ठकुरसोहाती । नाथ न पूर आव एहि भाँती ॥

बारिधि नाघि एक कपि आवा । तासु चरित मन महुँ सबु गावा ॥

छुधा न रही तुम्हहि तब काहू । जारत नगरु कस न धरि खाहू ॥

सुनत नीक आगें दुख पावा । सचिवन अस मत प्रभुहि सुनावा ॥

जेहिं बारीस बँधायउ हेला । उतरेउ सेन समेत सुबेला ॥

सो भनु मनुज खाब हम भाई । बचन कहहिं सब गाल फुलाई ॥

तात बचन मम सुनु अति आदर । जनि मन गुनहु मोहि करि कादर ॥

प्रिय बानी जे सुनहिं जे कहहीं । ऐसे नर निकाय जग अहहीं ॥

बचन परम हित सुनत कठोरे । सुनहिं जे कहहिं ते नर प्रभु थोरे ॥

प्रथम बसीठ पठउ सुनु नीती । सीता देइ करहु पुनि प्रीती ॥

॥ दोहा ॥

नारि पाइ फिरि जाहिं जौं तौ न बढ़ाइअ रारि ।

नाहिं त सन्मुख समर महि तात करिअ हठि मारि ॥9॥

॥ चौपाई ॥

यह मत जौं मानहु प्रभु मोरा । उभय प्रकार सुजसु जग तोरा ॥

सुत सन कह दसकंठ रिसाई । असि मति सठ केहिं तोहि सिखाई ॥

अबहीं ते उर संसय होई । बेनुमूल सुत भयहु घमोई ॥

सुनि पितु गिरा परुष अति घोरा । चला भवन कहि बचन कठोरा ॥

हित मत तोहि न लागत कैसें । काल बिबस कहुँ भेषज जैसें ॥

संध्या समय जानि दससीसा । भवन चलेउ निरखत भुज बीसा ॥

लंका सिखर उपर आगारा । अति बिचित्र तहँ होइ अखारा ॥

बैठ जाइ तेही मंदिर रावन । लागे किंनर गुन गन गावन ॥

बाजहिं ताल पखाउज बीना । नृत्य करहिं अपछरा प्रबीना ॥

॥ दोहा ॥

सुनासीर सत सरिस सो संतत करइ बिलास ।

परम प्रबल रिपु सीस पर तद्यपि सोच न त्रास ॥10॥

॥ चौपाई ॥

इहाँ सुबेल सैल रघुबीरा । उतरे सेन सहित अति भीरा ॥

सिखर एक उतंग अति देखी । परम रम्य सम सुभ्र बिसेषी ॥

तहँ तरु किसलय सुमन सुहाए । लछिमन रचि निज हाथ डसाए ॥

ता पर रूचिर मृदुल मृगछाला । तेहीं आसान आसीन कृपाला ॥

प्रभु कृत सीस कपीस उछंगा । बाम दहिन दिसि चाप निषंगा ॥

दुहुँ कर कमल सुधारत बाना । कह लंकेस मंत्र लगि काना ॥

बड़भागी अंगद हनुमाना । चरन कमल चापत बिधि नाना ॥

प्रभु पाछें लछिमन बीरासन । कटि निषंग कर बान सरासन ॥

॥ दोहा ॥

एहि बिधि कृपा रूप गुन धाम रामु आसीन ।

धन्य ते नर एहिं ध्यान जे रहत सदा लयलीन ॥11(क)॥

पूरब दिसा बिलोकि प्रभु देखा उदित मंयक ।

कहत सबहि देखहु ससिहि मृगपति सरिस असंक ॥11(ख)॥

॥ चौपाई ॥

पूरब दिसि गिरिगुहा निवासी । परम प्रताप तेज बल रासी ॥

मत्त नाग तम कुंभ बिदारी । ससि केसरी गगन बन चारी ॥

बिथुरे नभ मुकुताहल तारा । निसि सुंदरी केर सिंगारा ॥

कह प्रभु ससि महुँ मेचकताई । कहहु काह निज निज मति भाई ॥

कह सुग़ीव सुनहु रघुराई । ससि महुँ प्रगट भूमि कै झाँई ॥

मारेउ राहु ससिहि कह कोई । उर महँ परी स्यामता सोई ॥

कोउ कह जब बिधि रति मुख कीन्हा । सार भाग ससि कर हरि लीन्हा ॥

छिद्र सो प्रगट इंदु उर माहीं । तेहि मग देखिअ नभ परिछाहीं ॥

प्रभु कह गरल बंधु ससि केरा । अति प्रिय निज उर दीन्ह बसेरा ॥

बिष संजुत कर निकर पसारी । जारत बिरहवंत नर नारी ॥

॥ दोहा ॥

कह हनुमंत सुनहु प्रभु ससि तुम्हारा प्रिय दास ।

तव मूरति बिधु उर बसति सोइ स्यामता अभास ॥12(क)॥

नवान्हपारायण ॥ सातवाँ विश्राम

पवन तनय के बचन सुनि बिहँसे रामु सुजान ।

दच्छिन दिसि अवलोकि प्रभु बोले कृपा निधान ॥12(ख)॥

॥ दोहा ॥

देखु बिभीषन दच्छिन आसा । घन घंमड दामिनि बिलासा ॥

मधुर मधुर गरजइ घन घोरा । होइ बृष्टि जनि उपल कठोरा ॥

कहत बिभीषन सुनहु कृपाला । होइ न तड़ित न बारिद माला ॥

लंका सिखर उपर आगारा । तहँ दसकंघर देख अखारा ॥

छत्र मेघडंबर सिर धारी । सोइ जनु जलद घटा अति कारी ॥

मंदोदरी श्रवन ताटंका । सोइ प्रभु जनु दामिनी दमंका ॥

बाजहिं ताल मृदंग अनूपा । सोइ रव मधुर सुनहु सुरभूपा ॥

प्रभु मुसुकान समुझि अभिमाना । चाप चढ़ाइ बान संधाना ॥

॥ दोहा ॥

छत्र मुकुट ताटंक तब हते एकहीं बान ।

सबकें देखत महि परे मरमु न कोऊ जान ॥13(क)॥

अस कौतुक करि राम सर प्रबिसेउ आइ निषंग ।

रावन सभा ससंक सब देखि महा रसभंग ॥13(ख)॥

॥ चौपाई ॥

कंप न भूमि न मरुत बिसेषा । अस्त्र सस्त्र कछु नयन न देखा ॥

सोचहिं सब निज हृदय मझारी । असगुन भयउ भयंकर भारी ॥

दसमुख देखि सभा भय पाई । बिहसि बचन कह जुगुति बनाई ॥

सिरउ गिरे संतत सुभ जाही । मुकुट परे कस असगुन ताही ॥

सयन करहु निज निज गृह जाई । गवने भवन सकल सिर नाई ॥

मंदोदरी सोच उर बसेऊ । जब ते श्रवनपूर महि खसेऊ ॥

सजल नयन कह जुग कर जोरी । सुनहु प्रानपति बिनती मोरी ॥

कंत राम बिरोध परिहरहू । जानि मनुज जनि हठ मन धरहू ॥

॥ दोहा ॥

बिस्वरुप रघुबंस मनि करहु बचन बिस्वासु ।

लोक कल्पना बेद कर अंग अंग प्रति जासु ॥14॥

॥ चौपाई ॥

पद पाताल सीस अज धामा । अपर लोक अँग अँग बिश्रामा ॥

भृकुटि बिलास भयंकर काला । नयन दिवाकर कच घन माला ॥

जासु घ्रान अस्विनीकुमारा । निसि अरु दिवस निमेष अपारा ॥

श्रवन दिसा दस बेद बखानी । मारुत स्वास निगम निज बानी ॥

अधर लोभ जम दसन कराला । माया हास बाहु दिगपाला ॥

आनन अनल अंबुपति जीहा । उतपति पालन प्रलय समीहा ॥

रोम राजि अष्टादस भारा । अस्थि सैल सरिता नस जारा ॥

उदर उदधि अधगो जातना । जगमय प्रभु का बहु कलपना ॥

॥ दोहा ॥

अहंकार सिव बुद्धि अज मन ससि चित्त महान ।

मनुज बास सचराचर रुप राम भगवान ॥15क॥

अस बिचारि सुनु प्रानपति प्रभु सन बयरु बिहाइ ।

प्रीति करहु रघुबीर पद मम अहिवात न जाइ ॥15ख॥

॥ चौपाई ॥

बिहँसा नारि बचन सुनि काना । अहो मोह महिमा बलवाना ॥

नारि सुभाउ सत्य सब कहहीं । अवगुन आठ सदा उर रहहीं ॥

साहस अनृत चपलता माया । भय अबिबेक असौच अदाया ॥

रिपु कर रुप सकल तैं गावा । अति बिसाल भय मोहि सुनावा ॥

सो सब प्रिया सहज बस मोरें । समुझि परा प्रसाद अब तोरें ॥

जानिउँ प्रिया तोरि चतुराई । एहि बिधि कहहु मोरि प्रभुताई ॥

तव बतकही गूढ़ मृगलोचनि । समुझत सुखद सुनत भय मोचनि ॥

मंदोदरि मन महुँ अस ठयऊ । पियहि काल बस मतिभ्रम भयऊ ॥

॥ दोहा ॥

एहि बिधि करत बिनोद बहु प्रात प्रगट दसकंध ।

सहज असंक लंकपति सभाँ गयउ मद अंध ॥16(क)॥

॥ सोरठा ॥

फूलह फरइ न बेत जदपि सुधा बरषहिं जलद ।

मूरुख हृदयँ न चेत जौं गुर मिलहिं बिरंचि सम ॥16(ख)॥

इहाँ प्रात जागे रघुराई । पूछा मत सब सचिव बोलाई ॥

कहहु बेगि का करिअ उपाई । जामवंत कह पद सिरु नाई ॥

सुनु सर्बग्य सकल उर बासी । बुधि बल तेज धर्म गुन रासी ॥

मंत्र कहउँ निज मति अनुसारा । दूत पठाइअ बालिकुमारा ॥

नीक मंत्र सब के मन माना । अंगद सन कह कृपानिधाना ॥

बालितनय बुधि बल गुन धामा । लंका जाहु तात मम कामा ॥

बहुत बुझाइ तुम्हहि का कहऊँ । परम चतुर मैं जानत अहऊँ ॥

काजु हमार तासु हित होई । रिपु सन करेहु बतकही सोई ॥

॥ सोरठा ॥

प्रभु अग्या धरि सीस चरन बंदि अंगद उठेउ ।

सोइ गुन सागर ईस राम कृपा जा पर करहु ॥17(क)॥

स्वयं सिद्ध सब काज नाथ मोहि आदरु दियउ ।

अस बिचारि जुबराज तन पुलकित हरषित हियउ ॥17(ख)॥

॥ चौपाई ॥

बंदि चरन उर धरि प्रभुताई । अंगद चलेउ सबहि सिरु नाई ॥

प्रभु प्रताप उर सहज असंका । रन बाँकुरा बालिसुत बंका ॥

पुर पैठत रावन कर बेटा । खेलत रहा सो होइ गै भैंटा ॥

बातहिं बात करष बढ़ि आई । जुगल अतुल बल पुनि तरुनाई ॥

तेहि अंगद कहुँ लात उठाई । गहि पद पटकेउ भूमि भवाँई ॥

निसिचर निकर देखि भट भारी । जहँ तहँ चले न सकहिं पुकारी ॥

एक एक सन मरमु न कहहीं । समुझि तासु बध चुप करि रहहीं ॥

भयउ कोलाहल नगर मझारी । आवा कपि लंका जेहीं जारी ॥

अब धौं कहा करिहि करतारा । अति सभीत सब करहिं बिचारा ॥

बिनु पूछें मगु देहिं दिखाई । जेहि बिलोक सोइ जाइ सुखाई ॥

॥ दोहा ॥

गयउ सभा दरबार तब सुमिरि राम पद कंज ।

सिंह ठवनि इत उत चितव धीर बीर बल पुंज ॥18॥

॥ चौपाई ॥

तुरत निसाचर एक पठावा । समाचार रावनहि जनावा ॥

सुनत बिहँसि बोला दससीसा । आनहु बोलि कहाँ कर कीसा ॥

आयसु पाइ दूत बहु धाए । कपिकुंजरहि बोलि लै आए ॥

अंगद दीख दसानन बैंसें । सहित प्रान कज्जलगिरि जैसें ॥

भुजा बिटप सिर सृंग समाना । रोमावली लता जनु नाना ॥

मुख नासिका नयन अरु काना । गिरि कंदरा खोह अनुमाना ॥

गयउ सभाँ मन नेकु न मुरा । बालितनय अतिबल बाँकुरा ॥

उठे सभासद कपि कहुँ देखी । रावन उर भा क्रौध बिसेषी ॥

॥ दोहा ॥

जथा मत्त गज जूथ महुँ पंचानन चलि जाइ ।

राम प्रताप सुमिरि मन बैठ सभाँ सिरु नाइ ॥19॥

॥ चौपाई ॥

कह दसकंठ कवन तैं बंदर । मैं रघुबीर दूत दसकंधर ॥

मम जनकहि तोहि रही मिताई । तव हित कारन आयउँ भाई ॥

उत्तम कुल पुलस्ति कर नाती । सिव बिरंचि पूजेहु बहु भाँती ॥

बर पायहु कीन्हेहु सब काजा । जीतेहु लोकपाल सब राजा ॥

नृप अभिमान मोह बस किंबा । हरि आनिहु सीता जगदंबा ॥

अब सुभ कहा सुनहु तुम्ह मोरा । सब अपराध छमिहि प्रभु तोरा ॥

दसन गहहु तृन कंठ कुठारी । परिजन सहित संग निज नारी ॥

सादर जनकसुता करि आगें । एहि बिधि चलहु सकल भय त्यागें ॥

॥ दोहा ॥

प्रनतपाल रघुबंसमनि त्राहि त्राहि अब मोहि ।

आरत गिरा सुनत प्रभु अभय करैगो तोहि ॥20॥

॥ चौपाई ॥

रे कपिपोत बोलु संभारी । मूढ़ न जानेहि मोहि सुरारी ॥

कहु निज नाम जनक कर भाई । केहि नातें मानिऐ मिताई ॥

अंगद नाम बालि कर बेटा । तासों कबहुँ भई ही भेटा ॥

अंगद बचन सुनत सकुचाना । रहा बालि बानर मैं जाना ॥

अंगद तहीं बालि कर बालक । उपजेहु बंस अनल कुल घालक ॥

गर्भ न गयहु ब्यर्थ तुम्ह जायहु । निज मुख तापस दूत कहायहु ॥

अब कहु कुसल बालि कहँ अहई । बिहँसि बचन तब अंगद कहई ॥

दिन दस गएँ बालि पहिं जाई । बूझेहु कुसल सखा उर लाई ॥

राम बिरोध कुसल जसि होई । सो सब तोहि सुनाइहि सोई ॥

सुनु सठ भेद होइ मन ताकें । श्रीरघुबीर हृदय नहिं जाकें ॥

॥ दोहा ॥

हम कुल घालक सत्य तुम्ह कुल पालक दससीस ।

अंधउ बधिर न अस कहहिं नयन कान तव बीस ॥21॥

॥ दोहा ॥

सिव बिरंचि सुर मुनि समुदाई । चाहत जासु चरन सेवकाई ॥

तासु दूत होइ हम कुल बोरा । अइसिहुँ मति उर बिहर न तोरा ॥

सुनि कठोर बानी कपि केरी । कहत दसानन नयन तरेरी ॥

खल तव कठिन बचन सब सहऊँ । नीति धर्म मैं जानत अहऊँ ॥

कह कपि धर्मसीलता तोरी । हमहुँ सुनी कृत पर त्रिय चोरी ॥

देखी नयन दूत रखवारी । बूड़ि न मरहु धर्म ब्रतधारी ॥

कान नाक बिनु भगिनि निहारी । छमा कीन्हि तुम्ह धर्म बिचारी ॥

धर्मसीलता तव जग जागी । पावा दरसु हमहुँ बड़भागी ॥

॥ दोहा ॥

जनि जल्पसि जड़ जंतु कपि सठ बिलोकु मम बाहु ।

लोकपाल बल बिपुल ससि ग्रसन हेतु सब राहु ॥22(क)॥

पुनि नभ सर मम कर निकर कमलन्हि पर करि बास ।

सोभत भयउ मराल इव संभु सहित कैलास ॥22(ख)॥

॥ दोहा ॥

तुम्हरे कटक माझ सुनु अंगद । मो सन भिरिहि कवन जोधा बद ॥

तव प्रभु नारि बिरहँ बलहीना । अनुज तासु दुख दुखी मलीना ॥

तुम्ह सुग्रीव कूलद्रुम दोऊ । अनुज हमार भीरु अति सोऊ ॥

जामवंत मंत्री अति बूढ़ा । सो कि होइ अब समरारूढ़ा ॥

सिल्पि कर्म जानहिं नल नीला । है कपि एक महा बलसीला ॥

आवा प्रथम नगरु जेंहिं जारा । सुनत बचन कह बालिकुमारा ॥

सत्य बचन कहु निसिचर नाहा । साँचेहुँ कीस कीन्ह पुर दाहा ॥

रावन नगर अल्प कपि दहई । सुनि अस बचन सत्य को कहई ॥

जो अति सुभट सराहेहु रावन । सो सुग्रीव केर लघु धावन ॥

चलइ बहुत सो बीर न होई । पठवा खबरि लेन हम सोई ॥

॥ दोहा ॥

सत्य नगरु कपि जारेउ बिनु प्रभु आयसु पाइ ।

फिरि न गयउ सुग्रीव पहिं तेहिं भय रहा लुकाइ ॥23(क)॥

सत्य कहहि दसकंठ सब मोहि न सुनि कछु कोह ।

कोउ न हमारें कटक अस तो सन लरत जो सोह ॥23(ख)॥

प्रीति बिरोध समान सन करिअ नीति असि आहि ।

जौं मृगपति बध मेड़ुकन्हि भल कि कहइ कोउ ताहि ॥23(ग)॥

जद्यपि लघुता राम कहुँ तोहि बधें बड़ दोष ।

तदपि कठिन दसकंठ सुनु छत्र जाति कर रोष ॥23(घ)॥

बक्र उक्ति धनु बचन सर हृदय दहेउ रिपु कीस ।

प्रतिउत्तर सड़सिन्ह मनहुँ काढ़त भट दससीस ॥23(ङ)॥

हँसि बोलेउ दसमौलि तब कपि कर बड़ गुन एक ।

जो प्रतिपालइ तासु हित करइ उपाय अनेक ॥23(छ)॥

॥ चौपाई ॥

धन्य कीस जो निज प्रभु काजा । जहँ तहँ नाचइ परिहरि लाजा ॥

नाचि कूदि करि लोग रिझाई । पति हित करइ धर्म निपुनाई ॥

अंगद स्वामिभक्त तव जाती । प्रभु गुन कस न कहसि एहि भाँती ॥

मैं गुन गाहक परम सुजाना । तव कटु रटनि करउँ नहिं काना ॥

कह कपि तव गुन गाहकताई । सत्य पवनसुत मोहि सुनाई ॥

बन बिधंसि सुत बधि पुर जारा । तदपि न तेहिं कछु कृत अपकारा ॥

सोइ बिचारि तव प्रकृति सुहाई । दसकंधर मैं कीन्हि ढिठाई ॥

देखेउँ आइ जो कछु कपि भाषा । तुम्हरें लाज न रोष न माखा ॥

जौं असि मति पितु खाए कीसा । कहि अस बचन हँसा दससीसा ॥

पितहि खाइ खातेउँ पुनि तोही । अबहीं समुझि परा कछु मोही ॥

बालि बिमल जस भाजन जानी । हतउँ न तोहि अधम अभिमानी ॥

कहु रावन रावन जग केते । मैं निज श्रवन सुने सुनु जेते ॥

बलिहि जितन एक गयउ पताला । राखेउ बाँधि सिसुन्ह हयसाला ॥

खेलहिं बालक मारहिं जाई । दया लागि बलि दीन्ह छोड़ाई ॥

एक बहोरि सहसभुज देखा । धाइ धरा जिमि जंतु बिसेषा ॥

कौतुक लागि भवन लै आवा । सो पुलस्ति मुनि जाइ छोड़ावा ॥

॥ दोहा ॥

एक कहत मोहि सकुच अति रहा बालि की काँख ।

इन्ह महुँ रावन तैं कवन सत्य बदहि तजि माख ॥24॥

॥ चौपाई ॥

सुनु सठ सोइ रावन बलसीला । हरगिरि जान जासु भुज लीला ॥

जान उमापति जासु सुराई । पूजेउँ जेहि सिर सुमन चढ़ाई ॥

सिर सरोज निज करन्हि उतारी । पूजेउँ अमित बार त्रिपुरारी ॥

भुज बिक्रम जानहिं दिगपाला । सठ अजहूँ जिन्ह कें उर साला ॥

जानहिं दिग्गज उर कठिनाई । जब जब भिरउँ जाइ बरिआई ॥

जिन्ह के दसन कराल न फूटे । उर लागत मूलक इव टूटे ॥

जासु चलत डोलति इमि धरनी । चढ़त मत्त गज जिमि लघु तरनी ॥

सोइ रावन जग बिदित प्रतापी । सुनेहि न श्रवन अलीक प्रलापी ॥

॥ दोहा ॥

तेहि रावन कहँ लघु कहसि नर कर करसि बखान ।

रे कपि बर्बर खर्ब खल अब जाना तव ग्यान ॥25॥

॥ चौपाई ॥

सुनि अंगद सकोप कह बानी । बोलु सँभारि अधम अभिमानी ॥

सहसबाहु भुज गहन अपारा । दहन अनल सम जासु कुठारा ॥

जासु परसु सागर खर धारा । बूड़े नृप अगनित बहु बारा ॥

तासु गर्ब जेहि देखत भागा । सो नर क्यों दससीस अभागा ॥

राम मनुज कस रे सठ बंगा । धन्वी कामु नदी पुनि गंगा ॥

पसु सुरधेनु कल्पतरु रूखा । अन्न दान अरु रस पीयूषा ॥

बैनतेय खग अहि सहसानन । चिंतामनि पुनि उपल दसानन ॥

सुनु मतिमंद लोक बैकुंठा । लाभ कि रघुपति भगति अकुंठा ॥

॥ दोहा ॥

सेन सहित तब मान मथि बन उजारि पुर जारि ॥

कस रे सठ हनुमान कपि गयउ जो तव सुत मारि ॥26॥

॥ चौपाई ॥

सुनु रावन परिहरि चतुराई । भजसि न कृपासिंधु रघुराई ॥

जौ खल भएसि राम कर द्रोही । ब्रह्म रुद्र सक राखि न तोही ॥

मूढ़ बृथा जनि मारसि गाला । राम बयर अस होइहि हाला ॥

तव सिर निकर कपिन्ह के आगें । परिहहिं धरनि राम सर लागें ॥

ते तव सिर कंदुक सम नाना । खेलहहिं भालु कीस चौगाना ॥

जबहिं समर कोपहि रघुनायक । छुटिहहिं अति कराल बहु सायक ॥

तब कि चलिहि अस गाल तुम्हारा । अस बिचारि भजु राम उदारा ॥

सुनत बचन रावन परजरा । जरत महानल जनु घृत परा ॥

॥ दोहा ॥

कुंभकरन अस बंधु मम सुत प्रसिद्ध सक्रारि ।

मोर पराक्रम नहिं सुनेहि जितेउँ चराचर झारि ॥27॥

॥ चौपाई ॥

सठ साखामृग जोरि सहाई । बाँधा सिंधु इहइ प्रभुताई ॥

नाघहिं खग अनेक बारीसा । सूर न होहिं ते सुनु सब कीसा ॥

मम भुज सागर बल जल पूरा । जहँ बूड़े बहु सुर नर सूरा ॥

बीस पयोधि अगाध अपारा । को अस बीर जो पाइहि पारा ॥

दिगपालन्ह मैं नीर भरावा । भूप सुजस खल मोहि सुनावा ॥

जौं पै समर सुभट तव नाथा । पुनि पुनि कहसि जासु गुन गाथा ॥

तौ बसीठ पठवत केहि काजा । रिपु सन प्रीति करत नहिं लाजा ॥

हरगिरि मथन निरखु मम बाहू । पुनि सठ कपि निज प्रभुहि सराहू ॥

॥ दोहा ॥

सूर कवन रावन सरिस स्वकर काटि जेहिं सीस ।

हुने अनल अति हरष बहु बार साखि गौरीस ॥28॥

जरत बिलोकेउँ जबहिं कपाला । बिधि के लिखे अंक निज भाला ॥

नर कें कर आपन बध बाँची । हसेउँ जानि बिधि गिरा असाँची ॥

सोउ मन समुझि त्रास नहिं मोरें । लिखा बिरंचि जरठ मति भोरें ॥

आन बीर बल सठ मम आगें । पुनि पुनि कहसि लाज पति त्यागे ॥

कह अंगद सलज्ज जग माहीं । रावन तोहि समान कोउ नाहीं ॥

लाजवंत तव सहज सुभाऊ । निज मुख निज गुन कहसि न काऊ ॥

सिर अरु सैल कथा चित रही । ताते बार बीस तैं कही ॥

सो भुजबल राखेउ उर घाली । जीतेहु सहसबाहु बलि बाली ॥

सुनु मतिमंद देहि अब पूरा । काटें सीस कि होइअ सूरा ॥

इंद्रजालि कहु कहिअ न बीरा । काटइ निज कर सकल सरीरा ॥

॥ दोहा ॥

जरहिं पतंग मोह बस भार बहहिं खर बृंद ।

ते नहिं सूर कहावहिं समुझि देखु मतिमंद ॥29॥

॥ चौपाई ॥

अब जनि बतबढ़ाव खल करही । सुनु मम बचन मान परिहरही ॥

दसमुख मैं न बसीठीं आयउँ । अस बिचारि रघुबीष पठायउँ ॥

बार बार अस कहइ कृपाला । नहिं गजारि जसु बधें सृकाला ॥

मन महुँ समुझि बचन प्रभु केरे । सहेउँ कठोर बचन सठ तेरे ॥

नाहिं त करि मुख भंजन तोरा । लै जातेउँ सीतहि बरजोरा ॥

जानेउँ तव बल अधम सुरारी । सूनें हरि आनिहि परनारी ॥

तैं निसिचर पति गर्ब बहूता । मैं रघुपति सेवक कर दूता ॥

जौं न राम अपमानहि डरउँ । तोहि देखत अस कौतुक करऊँ ॥

॥ दोहा ॥

तोहि पटकि महि सेन हति चौपट करि तव गाउँ ।

तव जुबतिन्ह समेत सठ जनकसुतहि लै जाउँ ॥30॥

॥ चौपाई ॥

जौ अस करौं तदपि न बड़ाई । मुएहि बधें नहिं कछु मनुसाई ॥

कौल कामबस कृपिन बिमूढ़ा । अति दरिद्र अजसी अति बूढ़ा ॥

सदा रोगबस संतत क्रोधी । बिष्नु बिमूख श्रुति संत बिरोधी ॥

तनु पोषक निंदक अघ खानी । जीवन सव सम चौदह प्रानी ॥

अस बिचारि खल बधउँ न तोही । अब जनि रिस उपजावसि मोही ॥

सुनि सकोप कह निसिचर नाथा । अधर दसन दसि मीजत हाथा ॥

रे कपि अधम मरन अब चहसी । छोटे बदन बात बड़ि कहसी ॥

कटु जल्पसि जड़ कपि बल जाकें । बल प्रताप बुधि तेज न ताकें ॥

॥ दोहा ॥

अगुन अमान जानि तेहि दीन्ह पिता बनबास ।

सो दुख अरु जुबती बिरह पुनि निसि दिन मम त्रास ॥31(क)॥

जिन्ह के बल कर गर्ब तोहि अइसे मनुज अनेक ।

खाहीं निसाचर दिवस निसि मूढ़ समुझु तजि टेक ॥31(ख)॥

॥ चौपाई ॥

जब तेहिं कीन्ह राम कै निंदा । क्रोधवंत अति भयउ कपिंदा ॥

हरि हर निंदा सुनइ जो काना । होइ पाप गोघात समाना ॥

कटकटान कपिकुंजर भारी । दुहु भुजदंड तमकि महि मारी ॥

डोलत धरनि सभासद खसे । चले भाजि भय मारुत ग्रसे ॥

गिरत सँभारि उठा दसकंधर । भूतल परे मुकुट अति सुंदर ॥

कछु तेहिं लै निज सिरन्हि सँवारे । कछु अंगद प्रभु पास पबारे ॥

आवत मुकुट देखि कपि भागे । दिनहीं लूक परन बिधि लागे ॥

की रावन करि कोप चलाए । कुलिस चारि आवत अति धाए ॥

कह प्रभु हँसि जनि हृदयँ डेराहू । लूक न असनि केतु नहिं राहू ॥

ए किरीट दसकंधर केरे । आवत बालितनय के प्रेरे ॥

॥ दोहा ॥

तरकि पवनसुत कर गहे आनि धरे प्रभु पास ।

कौतुक देखहिं भालु कपि दिनकर सरिस प्रकास ॥32(क) ॥

उहाँ सकोपि दसानन सब सन कहत रिसाइ ।

धरहु कपिहि धरि मारहु सुनि अंगद मुसुकाइ ॥32(ख)॥

॥ चौपाई ॥

एहि बिधि बेगि सूभट सब धावहु । खाहु भालु कपि जहँ जहँ पावहु ॥

मर्कटहीन करहु महि जाई । जिअत धरहु तापस द्वौ भाई ॥

पुनि सकोप बोलेउ जुबराजा । गाल बजावत तोहि न लाजा ॥

मरु गर काटि निलज कुलघाती । बल बिलोकि बिहरति नहिं छाती ॥

रे त्रिय चोर कुमारग गामी । खल मल रासि मंदमति कामी ॥

सन्यपात जल्पसि दुर्बादा । भएसि कालबस खल मनुजादा ॥

याको फलु पावहिगो आगें । बानर भालु चपेटन्हि लागें ॥

रामु मनुज बोलत असि बानी । गिरहिं न तव रसना अभिमानी ॥

गिरिहहिं रसना संसय नाहीं । सिरन्हि समेत समर महि माहीं ॥

॥ चौपाई ॥

सो0-सो नर क्यों दसकंध बालि बध्यो जेहिं एक सर ।

बीसहुँ लोचन अंध धिग तव जन्म कुजाति जड़ ॥33(क)॥

तब सोनित की प्यास तृषित राम सायक निकर ।

तजउँ तोहि तेहि त्रास कटु जल्पक निसिचर अधम ॥33(ख)॥

॥ चौपाई ॥

मै तव दसन तोरिबे लायक । आयसु मोहि न दीन्ह रघुनायक ॥

असि रिस होति दसउ मुख तोरौं । लंका गहि समुद्र महँ बोरौं ॥

गूलरि फल समान तव लंका । बसहु मध्य तुम्ह जंतु असंका ॥

मैं बानर फल खात न बारा । आयसु दीन्ह न राम उदारा ॥

जुगति सुनत रावन मुसुकाई । मूढ़ सिखिहि कहँ बहुत झुठाई ॥

बालि न कबहुँ गाल अस मारा । मिलि तपसिन्ह तैं भएसि लबारा ॥

साँचेहुँ मैं लबार भुज बीहा । जौं न उपारिउँ तव दस जीहा ॥

समुझि राम प्रताप कपि कोपा । सभा माझ पन करि पद रोपा ॥

जौं मम चरन सकसि सठ टारी । फिरहिं रामु सीता मैं हारी ॥

सुनहु सुभट सब कह दससीसा । पद गहि धरनि पछारहु कीसा ॥

इंद्रजीत आदिक बलवाना । हरषि उठे जहँ तहँ भट नाना ॥

झपटहिं करि बल बिपुल उपाई । पद न टरइ बैठहिं सिरु नाई ॥

पुनि उठि झपटहीं सुर आराती । टरइ न कीस चरन एहि भाँती ॥

पुरुष कुजोगी जिमि उरगारी । मोह बिटप नहिं सकहिं उपारी ॥

॥ दोहा ॥

कोटिन्ह मेघनाद सम सुभट उठे हरषाइ ।

झपटहिं टरै न कपि चरन पुनि बैठहिं सिर नाइ ॥34(क) ॥

भूमि न छाँडत कपि चरन देखत रिपु मद भाग ॥

कोटि बिघ्न ते संत कर मन जिमि नीति न त्याग ॥34(ख)॥

॥ चौपाई ॥

कपि बल देखि सकल हियँ हारे । उठा आपु कपि कें परचारे ॥

गहत चरन कह बालिकुमारा । मम पद गहें न तोर उबारा ॥

गहसि न राम चरन सठ जाई । सुनत फिरा मन अति सकुचाई ॥

भयउ तेजहत श्री सब गई । मध्य दिवस जिमि ससि सोहई ॥

सिंघासन बैठेउ सिर नाई । मानहुँ संपति सकल गँवाई ॥

जगदातमा प्रानपति रामा । तासु बिमुख किमि लह बिश्रामा ॥

उमा राम की भृकुटि बिलासा । होइ बिस्व पुनि पावइ नासा ॥

तृन ते कुलिस कुलिस तृन करई । तासु दूत पन कहु किमि टरई ॥

पुनि कपि कही नीति बिधि नाना । मान न ताहि कालु निअराना ॥

रिपु मद मथि प्रभु सुजसु सुनायो । यह कहि चल्यो बालि नृप जायो ॥

हतौं न खेत खेलाइ खेलाई । तोहि अबहिं का करौं बड़ाई ॥

प्रथमहिं तासु तनय कपि मारा । सो सुनि रावन भयउ दुखारा ॥

जातुधान अंगद पन देखी । भय ब्याकुल सब भए बिसेषी ॥

॥ दोहा ॥

रिपु बल धरषि हरषि कपि बालितनय बल पुंज ।

पुलक सरीर नयन जल गहे राम पद कंज ॥35(क)॥

साँझ जानि दसकंधर भवन गयउ बिलखाइ ।

मंदोदरी रावनहि बहुरि कहा समुझाइ ॥(ख) ॥

॥ चौपाई ॥

कंत समुझि मन तजहु कुमतिही । सोह न समर तुम्हहि रघुपतिही ॥

रामानुज लघु रेख खचाई । सोउ नहिं नाघेहु असि मनुसाई ॥

पिय तुम्ह ताहि जितब संग्रामा । जाके दूत केर यह कामा ॥

कौतुक सिंधु नाघी तव लंका । आयउ कपि केहरी असंका ॥

रखवारे हति बिपिन उजारा । देखत तोहि अच्छ तेहिं मारा ॥

जारि सकल पुर कीन्हेसि छारा । कहाँ रहा बल गर्ब तुम्हारा ॥

अब पति मृषा गाल जनि मारहु । मोर कहा कछु हृदयँ बिचारहु ॥

पति रघुपतिहि नृपति जनि मानहु । अग जग नाथ अतुल बल जानहु ॥

बान प्रताप जान मारीचा । तासु कहा नहिं मानेहि नीचा ॥

जनक सभाँ अगनित भूपाला । रहे तुम्हउ बल अतुल बिसाला ॥

भंजि धनुष जानकी बिआही । तब संग्राम जितेहु किन ताही ॥

सुरपति सुत जानइ बल थोरा । राखा जिअत आँखि गहि फोरा ॥

सूपनखा कै गति तुम्ह देखी । तदपि हृदयँ नहिं लाज बिषेषी ॥

॥ दोहा ॥

बधि बिराध खर दूषनहि लीँलाँ हत्यो कबंध ।

बालि एक सर मारयो तेहि जानहु दसकंध ॥36॥

॥ चौपाई ॥

जेहिं जलनाथ बँधायउ हेला । उतरे प्रभु दल सहित सुबेला ॥

कारुनीक दिनकर कुल केतू । दूत पठायउ तव हित हेतू ॥

सभा माझ जेहिं तव बल मथा । करि बरूथ महुँ मृगपति जथा ॥

अंगद हनुमत अनुचर जाके । रन बाँकुरे बीर अति बाँके ॥

तेहि कहँ पिय पुनि पुनि नर कहहू । मुधा मान ममता मद बहहू ॥

अहह कंत कृत राम बिरोधा । काल बिबस मन उपज न बोधा ॥

काल दंड गहि काहु न मारा । हरइ धर्म बल बुद्धि बिचारा ॥

निकट काल जेहि आवत साईं । तेहि भ्रम होइ तुम्हारिहि नाईं ॥

॥ दोहा ॥

दुइ सुत मरे दहेउ पुर अजहुँ पूर पिय देहु ।

कृपासिंधु रघुनाथ भजि नाथ बिमल जसु लेहु ॥37॥

॥ चौपाई ॥

नारि बचन सुनि बिसिख समाना । सभाँ गयउ उठि होत बिहाना ॥

बैठ जाइ सिंघासन फूली । अति अभिमान त्रास सब भूली ॥

इहाँ राम अंगदहि बोलावा । आइ चरन पंकज सिरु नावा ॥

अति आदर सपीप बैठारी । बोले बिहँसि कृपाल खरारी ॥

बालितनय कौतुक अति मोही । तात सत्य कहु पूछउँ तोही ॥ ।

रावनु जातुधान कुल टीका । भुज बल अतुल जासु जग लीका ॥

तासु मुकुट तुम्ह चारि चलाए । कहहु तात कवनी बिधि पाए ॥

सुनु सर्बग्य प्रनत सुखकारी । मुकुट न होहिं भूप गुन चारी ॥

साम दान अरु दंड बिभेदा । नृप उर बसहिं नाथ कह बेदा ॥

नीति धर्म के चरन सुहाए । अस जियँ जानि नाथ पहिं आए ॥

॥ दोहा ॥

धर्महीन प्रभु पद बिमुख काल बिबस दससीस ।

तेहि परिहरि गुन आए सुनहु कोसलाधीस ॥38(((क)॥

परम चतुरता श्रवन सुनि बिहँसे रामु उदार ।

समाचार पुनि सब कहे गढ़ के बालिकुमार ॥38(ख)॥

॥ चौपाई ॥

रिपु के समाचार जब पाए । राम सचिव सब निकट बोलाए ॥

लंका बाँके चारि दुआरा । केहि बिधि लागिअ करहु बिचारा ॥

तब कपीस रिच्छेस बिभीषन । सुमिरि हृदयँ दिनकर कुल भूषन ॥

करि बिचार तिन्ह मंत्र दृढ़ावा । चारि अनी कपि कटकु बनावा ॥

जथाजोग सेनापति कीन्हे । जूथप सकल बोलि तब लीन्हे ॥

प्रभु प्रताप कहि सब समुझाए । सुनि कपि सिंघनाद करि धाए ॥

हरषित राम चरन सिर नावहिं । गहि गिरि सिखर बीर सब धावहिं ॥

गर्जहिं तर्जहिं भालु कपीसा । जय रघुबीर कोसलाधीसा ॥

जानत परम दुर्ग अति लंका । प्रभु प्रताप कपि चले असंका ॥

घटाटोप करि चहुँ दिसि घेरी । मुखहिं निसान बजावहीं भेरी ॥

॥ दोहा ॥

जयति राम जय लछिमन जय कपीस सुग्रीव ।

गर्जहिं सिंघनाद कपि भालु महा बल सींव ॥39॥

॥ चौपाई ॥

लंकाँ भयउ कोलाहल भारी । सुना दसानन अति अहँकारी ॥

देखहु बनरन्ह केरि ढिठाई । बिहँसि निसाचर सेन बोलाई ॥

आए कीस काल के प्रेरे । छुधावंत सब निसिचर मेरे ॥

अस कहि अट्टहास सठ कीन्हा । गृह बैठे अहार बिधि दीन्हा ॥

सुभट सकल चारिहुँ दिसि जाहू । धरि धरि भालु कीस सब खाहू ॥

उमा रावनहि अस अभिमाना । जिमि टिट्टिभ खग सूत उताना ॥

चले निसाचर आयसु मागी । गहि कर भिंडिपाल बर साँगी ॥

तोमर मुग्दर परसु प्रचंडा । सुल कृपान परिघ गिरिखंडा ॥

जिमि अरुनोपल निकर निहारी । धावहिं सठ खग मांस अहारी ॥

चोंच भंग दुख तिन्हहि न सूझा । तिमि धाए मनुजाद अबूझा ॥

॥ दोहा ॥

नानायुध सर चाप धर जातुधान बल बीर ।

कोट कँगूरन्हि चढ़ि गए कोटि कोटि रनधीर ॥40॥

॥ चौपाई ॥

कोट कँगूरन्हि सोहहिं कैसे । मेरु के सृंगनि जनु घन बैसे ॥

बाजहिं ढोल निसान जुझाऊ । सुनि धुनि होइ भटन्हि मन चाऊ ॥

बाजहिं भेरि नफीरि अपारा । सुनि कादर उर जाहिं दरारा ॥

देखिन्ह जाइ कपिन्ह के ठट्टा । अति बिसाल तनु भालु सुभट्टा ॥

धावहिं गनहिं न अवघट घाटा । पर्बत फोरि करहिं गहि बाटा ॥

कटकटाहिं कोटिन्ह भट गर्जहिं । दसन ओठ काटहिं अति तर्जहिं ॥

उत रावन इत राम दोहाई । जयति जयति जय परी लराई ॥

निसिचर सिखर समूह ढहावहिं । कूदि धरहिं कपि फेरि चलावहिं ॥

धरि कुधर खंड प्रचंड कर्कट भालु गढ़ पर डारहीं ।

झपटहिं चरन गहि पटकि महि भजि चलत बहुरि पचारहीं ॥

अति तरल तरुन प्रताप तरपहिं तमकि गढ़ चढ़ि चढ़ि गए ।

कपि भालु चढ़ि मंदिरन्ह जहँ तहँ राम जसु गावत भए ॥

॥ दोहा ॥

एकु एकु निसिचर गहि पुनि कपि चले पराइ ।

ऊपर आपु हेठ भट गिरहिं धरनि पर आइ ॥41॥

॥ चौपाई ॥

राम प्रताप प्रबल कपिजूथा । मर्दहिं निसिचर सुभट बरूथा ॥

चढ़े दुर्ग पुनि जहँ तहँ बानर । जय रघुबीर प्रताप दिवाकर ॥

चले निसाचर निकर पराई । प्रबल पवन जिमि घन समुदाई ॥

हाहाकार भयउ पुर भारी । रोवहिं बालक आतुर नारी ॥

सब मिलि देहिं रावनहि गारी । राज करत एहिं मृत्यु हँकारी ॥

निज दल बिचल सुनी तेहिं काना । फेरि सुभट लंकेस रिसाना ॥

जो रन बिमुख सुना मैं काना । सो मैं हतब कराल कृपाना ॥

सर्बसु खाइ भोग करि नाना । समर भूमि भए बल्लभ प्राना ॥

उग्र बचन सुनि सकल डेराने । चले क्रोध करि सुभट लजाने ॥

सन्मुख मरन बीर कै सोभा । तब तिन्ह तजा प्रान कर लोभा ॥

॥ दोहा ॥

बहु आयुध धर सुभट सब भिरहिं पचारि पचारि ।

ब्याकुल किए भालु कपि परिघ त्रिसूलन्हि मारी ॥42॥

॥ चौपाई ॥

भय आतुर कपि भागन लागे । जद्यपि उमा जीतिहहिं आगे ॥

कोउ कह कहँ अंगद हनुमंता । कहँ नल नील दुबिद बलवंता ॥

निज दल बिकल सुना हनुमाना । पच्छिम द्वार रहा बलवाना ॥

मेघनाद तहँ करइ लराई । टूट न द्वार परम कठिनाई ॥

पवनतनय मन भा अति क्रोधा । गर्जेउ प्रबल काल सम जोधा ॥

कूदि लंक गढ़ ऊपर आवा । गहि गिरि मेघनाद कहुँ धावा ॥

भंजेउ रथ सारथी निपाता । ताहि हृदय महुँ मारेसि लाता ॥

दुसरें सूत बिकल तेहि जाना । स्यंदन घालि तुरत गृह आना ॥

॥ दोहा ॥

अंगद सुना पवनसुत गढ़ पर गयउ अकेल ।

रन बाँकुरा बालिसुत तरकि चढ़ेउ कपि खेल ॥43॥

॥ चौपाई ॥

जुद्ध बिरुद्ध क्रुद्ध द्वौ बंदर । राम प्रताप सुमिरि उर अंतर ॥

रावन भवन चढ़े द्वौ धाई । करहि कोसलाधीस दोहाई ॥

कलस सहित गहि भवनु ढहावा । देखि निसाचरपति भय पावा ॥

नारि बृंद कर पीटहिं छाती । अब दुइ कपि आए उतपाती ॥

कपिलीला करि तिन्हहि डेरावहिं । रामचंद्र कर सुजसु सुनावहिं ॥

पुनि कर गहि कंचन के खंभा । कहेन्हि करिअ उतपात अरंभा ॥

गर्जि परे रिपु कटक मझारी । लागे मर्दै भुज बल भारी ॥

काहुहि लात चपेटन्हि केहू । भजहु न रामहि सो फल लेहू ॥

॥ दोहा ॥

एक एक सों मर्दहिं तोरि चलावहिं मुंड ।

रावन आगें परहिं ते जनु फूटहिं दधि कुंड ॥44॥

॥ चौपाई ॥

महा महा मुखिआ जे पावहिं । ते पद गहि प्रभु पास चलावहिं ॥

कहइ बिभीषनु तिन्ह के नामा । देहिं राम तिन्हहू निज धामा ॥

खल मनुजाद द्विजामिष भोगी । पावहिं गति जो जाचत जोगी ॥

उमा राम मृदुचित करुनाकर । बयर भाव सुमिरत मोहि निसिचर ॥

देहिं परम गति सो जियँ जानी । अस कृपाल को कहहु भवानी ॥

अस प्रभु सुनि न भजहिं भ्रम त्यागी । नर मतिमंद ते परम अभागी ॥

अंगद अरु हनुमंत प्रबेसा । कीन्ह दुर्ग अस कह अवधेसा ॥

लंकाँ द्वौ कपि सोहहिं कैसें । मथहि सिंधु दुइ मंदर जैसें ॥

॥ दोहा ॥

भुज बल रिपु दल दलमलि देखि दिवस कर अंत ।

कूदे जुगल बिगत श्रम आए जहँ भगवंत ॥45॥

॥ चौपाई ॥

प्रभु पद कमल सीस तिन्ह नाए । देखि सुभट रघुपति मन भाए ॥

राम कृपा करि जुगल निहारे । भए बिगतश्रम परम सुखारे ॥

गए जानि अंगद हनुमाना । फिरे भालु मर्कट भट नाना ॥

जातुधान प्रदोष बल पाई । धाए करि दससीस दोहाई ॥

निसिचर अनी देखि कपि फिरे । जहँ तहँ कटकटाइ भट भिरे ॥

द्वौ दल प्रबल पचारि पचारी । लरत सुभट नहिं मानहिं हारी ॥

महाबीर निसिचर सब कारे । नाना बरन बलीमुख भारे ॥

सबल जुगल दल समबल जोधा । कौतुक करत लरत करि क्रोधा ॥

प्राबिट सरद पयोद घनेरे । लरत मनहुँ मारुत के प्रेरे ॥

अनिप अकंपन अरु अतिकाया । बिचलत सेन कीन्हि इन्ह माया ॥

भयउ निमिष महँ अति अँधियारा । बृष्टि होइ रुधिरोपल छारा ॥

॥ दोहा ॥

देखि निबिड़ तम दसहुँ दिसि कपिदल भयउ खभार ।

एकहि एक न देखई जहँ तहँ करहिं पुकार ॥46॥

॥ चौपाई ॥

सकल मरमु रघुनायक जाना । लिए बोलि अंगद हनुमाना ॥

समाचार सब कहि समुझाए । सुनत कोपि कपिकुंजर धाए ॥

पुनि कृपाल हँसि चाप चढ़ावा । पावक सायक सपदि चलावा ॥

भयउ प्रकास कतहुँ तम नाहीं । ग्यान उदयँ जिमि संसय जाहीं ॥

भालु बलीमुख पाइ प्रकासा । धाए हरष बिगत श्रम त्रासा ॥

हनूमान अंगद रन गाजे । हाँक सुनत रजनीचर भाजे ॥

भागत पट पटकहिं धरि धरनी । करहिं भालु कपि अद्भुत करनी ॥

गहि पद डारहिं सागर माहीं । मकर उरग झष धरि धरि खाहीं ॥

॥ दोहा ॥

कछु मारे कछु घायल कछु गढ़ चढ़े पराइ ।

गर्जहिं भालु बलीमुख रिपु दल बल बिचलाइ ॥47॥

॥ चौपाई ॥

निसा जानि कपि चारिउ अनी । आए जहाँ कोसला धनी ॥

राम कृपा करि चितवा सबही । भए बिगतश्रम बानर तबही ॥

उहाँ दसानन सचिव हँकारे । सब सन कहेसि सुभट जे मारे ॥

आधा कटकु कपिन्ह संघारा । कहहु बेगि का करिअ बिचारा ॥

माल्यवंत अति जरठ निसाचर । रावन मातु पिता मंत्री बर ॥

बोला बचन नीति अति पावन । सुनहु तात कछु मोर सिखावन ॥

जब ते तुम्ह सीता हरि आनी । असगुन होहिं न जाहिं बखानी ॥

बेद पुरान जासु जसु गायो । राम बिमुख काहुँ न सुख पायो ॥

॥ दोहा ॥

हिरन्याच्छ भ्राता सहित मधु कैटभ बलवान ।

जेहि मारे सोइ अवतरेउ कृपासिंधु भगवान ॥48(क)॥

मासपारायण, पचीसवाँ विश्राम

कालरूप खल बन दहन गुनागार घनबोध ।

सिव बिरंचि जेहि सेवहिं तासों कवन बिरोध ॥48(ख)॥

॥ चौपाई ॥

परिहरि बयरु देहु बैदेही । भजहु कृपानिधि परम सनेही ॥

ताके बचन बान सम लागे । करिआ मुह करि जाहि अभागे ॥

बूढ़ भएसि न त मरतेउँ तोही । अब जनि नयन देखावसि मोही ॥

तेहि अपने मन अस अनुमाना । बध्यो चहत एहि कृपानिधाना ॥

सो उठि गयउ कहत दुर्बादा । तब सकोप बोलेउ घननादा ॥

कौतुक प्रात देखिअहु मोरा । करिहउँ बहुत कहौं का थोरा ॥

सुनि सुत बचन भरोसा आवा । प्रीति समेत अंक बैठावा ॥

करत बिचार भयउ भिनुसारा । लागे कपि पुनि चहूँ दुआरा ॥

कोपि कपिन्ह दुर्घट गढ़ु घेरा । नगर कोलाहलु भयउ घनेरा ॥

बिबिधायुध धर निसिचर धाए । गढ़ ते पर्बत सिखर ढहाए ॥

॥ छन्द ॥

ढाहे महीधर सिखर कोटिन्ह बिबिध बिधि गोला चले ।

घहरात जिमि पबिपात गर्जत जनु प्रलय के बादले ॥

मर्कट बिकट भट जुटत कटत न लटत तन जर्जर भए ।

गहि सैल तेहि गढ़ पर चलावहिं जहँ सो तहँ निसिचर हए ॥

॥ दोहा ॥

मेघनाद सुनि श्रवन अस गढ़ु पुनि छेंका आइ ।

उतर्यो बीर दुर्ग तें सन्मुख चल्यो बजाइ ॥49॥

॥ चौपाई ॥

कहँ कोसलाधीस द्वौ भ्राता । धन्वी सकल लोक बिख्याता ॥

कहँ नल नील दुबिद सुग्रीवा । अंगद हनूमंत बल सींवा ॥

कहाँ बिभीषनु भ्राताद्रोही । आजु सबहि हठि मारउँ ओही ॥

अस कहि कठिन बान संधाने । अतिसय क्रोध श्रवन लगि ताने ॥

सर समुह सो छाड़ै लागा । जनु सपच्छ धावहिं बहु नागा ॥

जहँ तहँ परत देखिअहिं बानर । सन्मुख होइ न सके तेहि अवसर ॥

जहँ तहँ भागि चले कपि रीछा । बिसरी सबहि जुद्ध कै ईछा ॥

सो कपि भालु न रन महँ देखा । कीन्हेसि जेहि न प्रान अवसेषा ॥

॥ दोहा ॥

दस दस सर सब मारेसि परे भूमि कपि बीर ।

सिंहनाद करि गर्जा मेघनाद बल धीर ॥50॥

॥ चौपाई ॥

देखि पवनसुत कटक बिहाला । क्रोधवंत जनु धायउ काला ॥

महासैल एक तुरत उपारा । अति रिस मेघनाद पर डारा ॥

आवत देखि गयउ नभ सोई । रथ सारथी तुरग सब खोई ॥

बार बार पचार हनुमाना । निकट न आव मरमु सो जाना ॥

रघुपति निकट गयउ घननादा । नाना भाँति करेसि दुर्बादा ॥

अस्त्र सस्त्र आयुध सब डारे । कौतुकहीं प्रभु काटि निवारे ॥

देखि प्रताप मूढ़ खिसिआना । करै लाग माया बिधि नाना ॥

जिमि कोउ करै गरुड़ सैं खेला । डरपावै गहि स्वल्प सपेला ॥

॥ दोहा ॥

जासु प्रबल माया बल सिव बिरंचि बड़ छोट ।

ताहि दिखावइ निसिचर निज माया मति खोट ॥51॥

॥ चौपाई ॥

नभ चढ़ि बरष बिपुल अंगारा । महि ते प्रगट होहिं जलधारा ॥

नाना भाँति पिसाच पिसाची । मारु काटु धुनि बोलहिं नाची ॥

बिष्टा पूय रुधिर कच हाड़ा । बरषइ कबहुँ उपल बहु छाड़ा ॥

बरषि धूरि कीन्हेसि अँधिआरा । सूझ न आपन हाथ पसारा ॥

कपि अकुलाने माया देखें । सब कर मरन बना एहि लेखें ॥

कौतुक देखि राम मुसुकाने । भए सभीत सकल कपि जाने ॥

एक बान काटी सब माया । जिमि दिनकर हर तिमिर निकाया ॥

कृपादृष्टि कपि भालु बिलोके । भए प्रबल रन रहहिं न रोके ॥

॥ दोहा ॥

आयसु मागि राम पहिं अंगदादि कपि साथ ।

लछिमन चले क्रुद्ध होइ बान सरासन हाथ ॥52॥

॥ चौपाई ॥

छतज नयन उर बाहु बिसाला । हिमगिरि निभ तनु कछु एक लाला ॥

इहाँ दसानन सुभट पठाए । नाना अस्त्र सस्त्र गहि धाए ॥

भूधर नख बिटपायुध धारी । धाए कपि जय राम पुकारी ॥

भिरे सकल जोरिहि सन जोरी । इत उत जय इच्छा नहिं थोरी ॥

मुठिकन्ह लातन्ह दातन्ह काटहिं । कपि जयसील मारि पुनि डाटहिं ॥

मारु मारु धरु धरु धरु मारू । सीस तोरि गहि भुजा उपारू ॥

असि रव पूरि रही नव खंडा । धावहिं जहँ तहँ रुंड प्रचंडा ॥

देखहिं कौतुक नभ सुर बृंदा । कबहुँक बिसमय कबहुँ अनंदा ॥

॥ दोहा ॥

रुधिर गाड़ भरि भरि जम्यो ऊपर धूरि उड़ाइ ।

जनु अँगार रासिन्ह पर मृतक धूम रह्यो छाइ ॥53॥

॥ चौपाई ॥

घायल बीर बिराजहिं कैसे । कुसुमित किंसुक के तरु जैसे ॥

लछिमन मेघनाद द्वौ जोधा । भिरहिं परसपर करि अति क्रोधा ॥

एकहि एक सकइ नहिं जीती । निसिचर छल बल करइ अनीती ॥

क्रोधवंत तब भयउ अनंता । भंजेउ रथ सारथी तुरंता ॥

नाना बिधि प्रहार कर सेषा । राच्छस भयउ प्रान अवसेषा ॥

रावन सुत निज मन अनुमाना । संकठ भयउ हरिहि मम प्राना ॥

बीरघातिनी छाड़िसि साँगी । तेज पुंज लछिमन उर लागी ॥

मुरुछा भई सक्ति के लागें । तब चलि गयउ निकट भय त्यागें ॥

॥ दोहा ॥

मेघनाद सम कोटि सत जोधा रहे उठाइ ।

जगदाधार सेष किमि उठै चले खिसिआइ ॥54 ॥

॥ चौपाई ॥

सुनु गिरिजा क्रोधानल जासू । जारइ भुवन चारिदस आसू ॥

सक संग्राम जीति को ताही । सेवहिं सुर नर अग जग जाही ॥

यह कौतूहल जानइ सोई । जा पर कृपा राम कै होई ॥

संध्या भइ फिरि द्वौ बाहनी । लगे सँभारन निज निज अनी ॥

ब्यापक ब्रह्म अजित भुवनेस्वर । लछिमन कहाँ बूझ करुनाकर ॥

तब लगि लै आयउ हनुमाना । अनुज देखि प्रभु अति दुख माना ॥

जामवंत कह बैद सुषेना । लंकाँ रहइ को पठई लेना ॥

धरि लघु रूप गयउ हनुमंता । आनेउ भवन समेत तुरंता ॥

॥ दोहा ॥

राम पदारबिंद सिर नायउ आइ सुषेन ।

कहा नाम गिरि औषधी जाहु पवनसुत लेन ॥55॥

॥ दोहा ॥

राम चरन सरसिज उर राखी । चला प्रभंजन सुत बल भाषी ॥

उहाँ दूत एक मरमु जनावा । रावन कालनेमि गृह आवा ॥

दसमुख कहा मरमु तेहिं सुना । पुनि पुनि कालनेमि सिरु धुना ॥

देखत तुम्हहि नगरु जेहिं जारा । तासु पंथ को रोकन पारा ॥

भजि रघुपति करु हित आपना । छाँड़हु नाथ मृषा जल्पना ॥

नील कंज तनु सुंदर स्यामा । हृदयँ राखु लोचनाभिरामा ॥

मैं तैं मोर मूढ़ता त्यागू । महा मोह निसि सूतत जागू ॥

काल ब्याल कर भच्छक जोई । सपनेहुँ समर कि जीतिअ सोई ॥

॥ दोहा ॥

सुनि दसकंठ रिसान अति तेहिं मन कीन्ह बिचार ।

राम दूत कर मरौं बरु यह खल रत मल भार ॥56॥

॥ चौपाई ॥

अस कहि चला रचिसि मग माया । सर मंदिर बर बाग बनाया ॥

मारुतसुत देखा सुभ आश्रम । मुनिहि बूझि जल पियौं जाइ श्रम ॥

राच्छस कपट बेष तहँ सोहा । मायापति दूतहि चह मोहा ॥

जाइ पवनसुत नायउ माथा । लाग सो कहै राम गुन गाथा ॥

होत महा रन रावन रामहिं । जितहहिं राम न संसय या महिं ॥

इहाँ भएँ मैं देखेउँ भाई । ग्यान दृष्टि बल मोहि अधिकाई ॥

मागा जल तेहिं दीन्ह कमंडल । कह कपि नहिं अघाउँ थोरें जल ॥

सर मज्जन करि आतुर आवहु । दिच्छा देउँ ग्यान जेहिं पावहु ॥

॥ दोहा ॥

सर पैठत कपि पद गहा मकरीं तब अकुलान ।

मारी सो धरि दिव्य तनु चली गगन चढ़ि जान ॥57॥

॥ चौपाई ॥

कपि तव दरस भइउँ निष्पापा । मिटा तात मुनिबर कर सापा ॥

मुनि न होइ यह निसिचर घोरा । मानहु सत्य बचन कपि मोरा ॥

अस कहि गई अपछरा जबहीं । निसिचर निकट गयउ कपि तबहीं ॥

कह कपि मुनि गुरदछिना लेहू । पाछें हमहि मंत्र तुम्ह देहू ॥

सिर लंगूर लपेटि पछारा । निज तनु प्रगटेसि मरती बारा ॥

राम राम कहि छाड़ेसि प्राना । सुनि मन हरषि चलेउ हनुमाना ॥

देखा सैल न औषध चीन्हा । सहसा कपि उपारि गिरि लीन्हा ॥

गहि गिरि निसि नभ धावत भयऊ । अवधपुरी उपर कपि गयऊ ॥

॥ दोहा ॥

देखा भरत बिसाल अति निसिचर मन अनुमानि ।

बिनु फर सायक मारेउ चाप श्रवन लगि तानि ॥58॥

॥ चौपाई ॥

परेउ मुरुछि महि लागत सायक । सुमिरत राम राम रघुनायक ॥

सुनि प्रिय बचन भरत तब धाए । कपि समीप अति आतुर आए ॥

बिकल बिलोकि कीस उर लावा । जागत नहिं बहु भाँति जगावा ॥

मुख मलीन मन भए दुखारी । कहत बचन भरि लोचन बारी ॥

जेहिं बिधि राम बिमुख मोहि कीन्हा । तेहिं पुनि यह दारुन दुख दीन्हा ॥

जौं मोरें मन बच अरु काया । प्रीति राम पद कमल अमाया ॥

तौ कपि होउ बिगत श्रम सूला । जौं मो पर रघुपति अनुकूला ॥

सुनत बचन उठि बैठ कपीसा । कहि जय जयति कोसलाधीसा ॥

॥ सोरठा ॥

लीन्ह कपिहि उर लाइ पुलकित तनु लोचन सजल ।

प्रीति न हृदयँ समाइ सुमिरि राम रघुकुल तिलक ॥59॥

॥ चौपाई ॥

तात कुसल कहु सुखनिधान की । सहित अनुज अरु मातु जानकी ॥

कपि सब चरित समास बखाने । भए दुखी मन महुँ पछिताने ॥

अहह दैव मैं कत जग जायउँ । प्रभु के एकहु काज न आयउँ ॥

जानि कुअवसरु मन धरि धीरा । पुनि कपि सन बोले बलबीरा ॥

तात गहरु होइहि तोहि जाता । काजु नसाइहि होत प्रभाता ॥

चढ़ु मम सायक सैल समेता । पठवौं तोहि जहँ कृपानिकेता ॥

सुनि कपि मन उपजा अभिमाना । मोरें भार चलिहि किमि बाना ॥

राम प्रभाव बिचारि बहोरी । बंदि चरन कह कपि कर जोरी ॥

॥ दोहा ॥

तव प्रताप उर राखि प्रभु जेहउँ नाथ तुरंत ।

अस कहि आयसु पाइ पद बंदि चलेउ हनुमंत ॥60(क)॥

भरत बाहु बल सील गुन प्रभु पद प्रीति अपार ।

मन महुँ जात सराहत पुनि पुनि पवनकुमार ॥60(ख)॥

॥ चौपाई ॥

उहाँ राम लछिमनहिं निहारी । बोले बचन मनुज अनुसारी ॥

अर्ध राति गइ कपि नहिं आयउ । राम उठाइ अनुज उर लायउ ॥

सकहु न दुखित देखि मोहि काऊ । बंधु सदा तव मृदुल सुभाऊ ॥

मम हित लागि तजेहु पितु माता । सहेहु बिपिन हिम आतप बाता ॥

सो अनुराग कहाँ अब भाई । उठहु न सुनि मम बच बिकलाई ॥

जौं जनतेउँ बन बंधु बिछोहू । पिता बचन मनतेउँ नहिं ओहू ॥

सुत बित नारि भवन परिवारा । होहिं जाहिं जग बारहिं बारा ॥

अस बिचारि जियँ जागहु ताता । मिलइ न जगत सहोदर भ्राता ॥

जथा पंख बिनु खग अति दीना । मनि बिनु फनि करिबर कर हीना ॥

अस मम जिवन बंधु बिनु तोही । जौं जड़ दैव जिआवै मोही ॥

जैहउँ अवध कवन मुहु लाई । नारि हेतु प्रिय भाइ गँवाई ॥

बरु अपजस सहतेउँ जग माहीं । नारि हानि बिसेष छति नाहीं ॥

अब अपलोकु सोकु सुत तोरा । सहिहि निठुर कठोर उर मोरा ॥

निज जननी के एक कुमारा । तात तासु तुम्ह प्रान अधारा ॥

सौंपेसि मोहि तुम्हहि गहि पानी । सब बिधि सुखद परम हित जानी ॥

उतरु काह दैहउँ तेहि जाई । उठि किन मोहि सिखावहु भाई ॥

बहु बिधि सिचत सोच बिमोचन । स्त्रवत सलिल राजिव दल लोचन ॥

उमा एक अखंड रघुराई । नर गति भगत कृपाल देखाई ॥

॥ सोरठा ॥

प्रभु प्रलाप सुनि कान बिकल भए बानर निकर ।

आइ गयउ हनुमान जिमि करुना महँ बीर रस ॥61॥

॥ चौपाई ॥

हरषि राम भेंटेउ हनुमाना । अति कृतग्य प्रभु परम सुजाना ॥

तुरत बैद तब कीन्ह उपाई । उठि बैठे लछिमन हरषाई ॥

हृदयँ लाइ प्रभु भेंटेउ भ्राता । हरषे सकल भालु कपि ब्राता ॥

कपि पुनि बैद तहाँ पहुँचावा । जेहि बिधि तबहिं ताहि लइ आवा ॥

यह बृत्तांत दसानन सुनेऊ । अति बिषअद पुनि पुनि सिर धुनेऊ ॥

ब्याकुल कुंभकरन पहिं आवा । बिबिध जतन करि ताहि जगावा ॥

जागा निसिचर देखिअ कैसा । मानहुँ कालु देह धरि बैसा ॥

कुंभकरन बूझा कहु भाई । काहे तव मुख रहे सुखाई ॥

कथा कही सब तेहिं अभिमानी । जेहि प्रकार सीता हरि आनी ॥

तात कपिन्ह सब निसिचर मारे । महामहा जोधा संघारे ॥

दुर्मुख सुररिपु मनुज अहारी । भट अतिकाय अकंपन भारी ॥

अपर महोदर आदिक बीरा । परे समर महि सब रनधीरा ॥

॥ दोहा ॥

सुनि दसकंधर बचन तब कुंभकरन बिलखान ।

जगदंबा हरि आनि अब सठ चाहत कल्यान ॥62॥

॥ चौपाई ॥

भल न कीन्ह तैं निसिचर नाहा । अब मोहि आइ जगाएहि काहा ॥

अजहूँ तात त्यागि अभिमाना । भजहु राम होइहि कल्याना ॥

हैं दससीस मनुज रघुनायक । जाके हनूमान से पायक ॥

अहह बंधु तैं कीन्हि खोटाई । प्रथमहिं मोहि न सुनाएहि आई ॥

कीन्हेहु प्रभू बिरोध तेहि देवक । सिव बिरंचि सुर जाके सेवक ॥

नारद मुनि मोहि ग्यान जो कहा । कहतेउँ तोहि समय निरबहा ॥

अब भरि अंक भेंटु मोहि भाई । लोचन सूफल करौ मैं जाई ॥

स्याम गात सरसीरुह लोचन । देखौं जाइ ताप त्रय मोचन ॥

॥ दोहा ॥

राम रूप गुन सुमिरत मगन भयउ छन एक ।

रावन मागेउ कोटि घट मद अरु महिष अनेक ॥63॥

॥ चौपाई ॥

महिष खाइ करि मदिरा पाना । गर्जा बज्राघात समाना ॥

कुंभकरन दुर्मद रन रंगा । चला दुर्ग तजि सेन न संगा ॥

देखि बिभीषनु आगें आयउ । परेउ चरन निज नाम सुनायउ ॥

अनुज उठाइ हृदयँ तेहि लायो । रघुपति भक्त जानि मन भायो ॥

तात लात रावन मोहि मारा । कहत परम हित मंत्र बिचारा ॥

तेहिं गलानि रघुपति पहिं आयउँ । देखि दीन प्रभु के मन भायउँ ॥

सुनु सुत भयउ कालबस रावन । सो कि मान अब परम सिखावन ॥

धन्य धन्य तैं धन्य बिभीषन । भयहु तात निसिचर कुल भूषन ॥

बंधु बंस तैं कीन्ह उजागर । भजेहु राम सोभा सुख सागर ॥

॥ दोहा ॥

बचन कर्म मन कपट तजि भजेहु राम रनधीर ।

जाहु न निज पर सूझ मोहि भयउँ कालबस बीर ॥64॥

॥ चौपाई ॥

बंधु बचन सुनि चला बिभीषन । आयउ जहँ त्रैलोक बिभूषन ॥

नाथ भूधराकार सरीरा । कुंभकरन आवत रनधीरा ॥

एतना कपिन्ह सुना जब काना । किलकिलाइ धाए बलवाना ॥

लिए उठाइ बिटप अरु भूधर । कटकटाइ डारहिं ता ऊपर ॥

कोटि कोटि गिरि सिखर प्रहारा । करहिं भालु कपि एक एक बारा ॥

मुर् यो न मन तनु टर् यो न टार् यो । जिमि गज अर्क फलनि को मार्यो ॥

तब मारुतसुत मुठिका हन्यो । पर् यो धरनि ब्याकुल सिर धुन्यो ॥

पुनि उठि तेहिं मारेउ हनुमंता । घुर्मित भूतल परेउ तुरंता ॥

पुनि नल नीलहि अवनि पछारेसि । जहँ तहँ पटकि पटकि भट डारेसि ॥

चली बलीमुख सेन पराई । अति भय त्रसित न कोउ समुहाई ॥

॥ दोहा ॥

अंगदादि कपि मुरुछित करि समेत सुग्रीव ।

काँख दाबि कपिराज कहुँ चला अमित बल सींव ॥65॥

॥ चौपाई ॥

उमा करत रघुपति नरलीला । खेलत गरुड़ जिमि अहिगन मीला ॥

भृकुटि भंग जो कालहि खाई । ताहि कि सोहइ ऐसि लराई ॥

जग पावनि कीरति बिस्तरिहहिं । गाइ गाइ भवनिधि नर तरिहहिं ॥

मुरुछा गइ मारुतसुत जागा । सुग्रीवहि तब खोजन लागा ॥

सुग्रीवहु कै मुरुछा बीती । निबुक गयउ तेहि मृतक प्रतीती ॥

काटेसि दसन नासिका काना । गरजि अकास चलउ तेहिं जाना ॥

गहेउ चरन गहि भूमि पछारा । अति लाघवँ उठि पुनि तेहि मारा ॥

पुनि आयसु प्रभु पहिं बलवाना । जयति जयति जय कृपानिधाना ॥

नाक कान काटे जियँ जानी । फिरा क्रोध करि भइ मन ग्लानी ॥

सहज भीम पुनि बिनु श्रुति नासा । देखत कपि दल उपजी त्रासा ॥

॥ दोहा ॥

जय जय जय रघुबंस मनि धाए कपि दै हूह ।

एकहि बार तासु पर छाड़ेन्हि गिरि तरु जूह ॥66 ॥

॥ चौपाई ॥

कुंभकरन रन रंग बिरुद्धा । सन्मुख चला काल जनु क्रुद्धा ॥

कोटि कोटि कपि धरि धरि खाई । जनु टीड़ी गिरि गुहाँ समाई ॥

कोटिन्ह गहि सरीर सन मर्दा । कोटिन्ह मीजि मिलव महि गर्दा ॥

मुख नासा श्रवनन्हि कीं बाटा । निसरि पराहिं भालु कपि ठाटा ॥

रन मद मत्त निसाचर दर्पा । बिस्व ग्रसिहि जनु एहि बिधि अर्पा ॥

मुरे सुभट सब फिरहिं न फेरे । सूझ न नयन सुनहिं नहिं टेरे ॥

कुंभकरन कपि फौज बिडारी । सुनि धाई रजनीचर धारी ॥

देखि राम बिकल कटकाई । रिपु अनीक नाना बिधि आई ॥

॥ दोहा ॥

सुनु सुग्रीव बिभीषन अनुज सँभारेहु सैन ।

मैं देखउँ खल बल दलहि बोले राजिवनैन ॥67॥

॥ चौपाई ॥

कर सारंग साजि कटि भाथा । अरि दल दलन चले रघुनाथा ॥

प्रथम कीन्ह प्रभु धनुष टँकोरा । रिपु दल बधिर भयउ सुनि सोरा ॥

सत्यसंध छाँड़े सर लच्छा । कालसर्प जनु चले सपच्छा ॥

जहँ तहँ चले बिपुल नाराचा । लगे कटन भट बिकट पिसाचा ॥

कटहिं चरन उर सिर भुजदंडा । बहुतक बीर होहिं सत खंडा ॥

घुर्मि घुर्मि घायल महि परहीं । उठि संभारि सुभट पुनि लरहीं ॥

लागत बान जलद जिमि गाजहीं । बहुतक देखी कठिन सर भाजहिं ॥

रुंड प्रचंड मुंड बिनु धावहिं । धरु धरु मारू मारु धुनि गावहिं ॥

॥ दोहा ॥

छन महुँ प्रभु के सायकन्हि काटे बिकट पिसाच ।

पुनि रघुबीर निषंग महुँ प्रबिसे सब नाराच ॥68॥

॥ चौपाई ॥

कुंभकरन मन दीख बिचारी । हति धन माझ निसाचर धारी ॥

भा अति क्रुद्ध महाबल बीरा । कियो मृगनायक नाद गँभीरा ॥

कोपि महीधर लेइ उपारी । डारइ जहँ मर्कट भट भारी ॥

आवत देखि सैल प्रभू भारे । सरन्हि काटि रज सम करि डारे ॥ ।

पुनि धनु तानि कोपि रघुनायक । छाँड़े अति कराल बहु सायक ॥

तनु महुँ प्रबिसि निसरि सर जाहीं । जिमि दामिनि घन माझ समाहीं ॥

सोनित स्त्रवत सोह तन कारे । जनु कज्जल गिरि गेरु पनारे ॥

बिकल बिलोकि भालु कपि धाए । बिहँसा जबहिं निकट कपि आए ॥

॥ दोहा ॥

महानाद करि गर्जा कोटि कोटि गहि कीस ।

महि पटकइ गजराज इव सपथ करइ दससीस ॥69॥

॥ चौपाई ॥

भागे भालु बलीमुख जूथा । बृकु बिलोकि जिमि मेष बरूथा ॥

चले भागि कपि भालु भवानी । बिकल पुकारत आरत बानी ॥

यह निसिचर दुकाल सम अहई । कपिकुल देस परन अब चहई ॥

कृपा बारिधर राम खरारी । पाहि पाहि प्रनतारति हारी ॥

सकरुन बचन सुनत भगवाना । चले सुधारि सरासन बाना ॥

राम सेन निज पाछैं घाली । चले सकोप महा बलसाली ॥

खैंचि धनुष सर सत संधाने । छूटे तीर सरीर समाने ॥

लागत सर धावा रिस भरा । कुधर डगमगत डोलति धरा ॥

लीन्ह एक तेहिं सैल उपाटी । रघुकुल तिलक भुजा सोइ काटी ॥

धावा बाम बाहु गिरि धारी । प्रभु सोउ भुजा काटि महि पारी ॥

काटें भुजा सोह खल कैसा । पच्छहीन मंदर गिरि जैसा ॥

उग्र बिलोकनि प्रभुहि बिलोका । ग्रसन चहत मानहुँ त्रेलोका ॥

॥ दोहा ॥

करि चिक्कार घोर अति धावा बदनु पसारि ।

गगन सिद्ध सुर त्रासित हा हा हेति पुकारि ॥70॥

॥ चौपाई ॥

सभय देव करुनानिधि जान्यो । श्रवन प्रजंत सरासनु तान्यो ॥

बिसिख निकर निसिचर मुख भरेऊ । तदपि महाबल भूमि न परेऊ ॥

सरन्हि भरा मुख सन्मुख धावा । काल त्रोन सजीव जनु आवा ॥

तब प्रभु कोपि तीब्र सर लीन्हा । धर ते भिन्न तासु सिर कीन्हा ॥

सो सिर परेउ दसानन आगें । बिकल भयउ जिमि फनि मनि त्यागें ॥

धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा । तब प्रभु काटि कीन्ह दुइ खंडा ॥

परे भूमि जिमि नभ तें भूधर । हेठ दाबि कपि भालु निसाचर ॥

तासु तेज प्रभु बदन समाना । सुर मुनि सबहिं अचंभव माना ॥

सुर दुंदुभीं बजावहिं हरषहिं । अस्तुति करहिं सुमन बहु बरषहिं ॥

करि बिनती सुर सकल सिधाए । तेही समय देवरिषि आए ॥

गगनोपरि हरि गुन गन गाए । रुचिर बीररस प्रभु मन भाए ॥

बेगि हतहु खल कहि मुनि गए । राम समर महि सोभत भए ॥

॥ छन्द ॥

संग्राम भूमि बिराज रघुपति अतुल बल कोसल धनी ।

श्रम बिंदु मुख राजीव लोचन अरुन तन सोनित कनी ॥

भुज जुगल फेरत सर सरासन भालु कपि चहु दिसि बने ।

कह दास तुलसी कहि न सक छबि सेष जेहि आनन घने ॥

॥ दोहा ॥

निसिचर अधम मलाकर ताहि दीन्ह निज धाम ।

गिरिजा ते नर मंदमति जे न भजहिं श्रीराम ॥71॥

॥ चौपाई ॥

दिन कें अंत फिरीं दोउ अनी । समर भई सुभटन्ह श्रम घनी ॥

राम कृपाँ कपि दल बल बाढ़ा । जिमि तृन पाइ लाग अति डाढ़ा ॥

छीजहिं निसिचर दिनु अरु राती । निज मुख कहें सुकृत जेहि भाँती ॥

बहु बिलाप दसकंधर करई । बंधु सीस पुनि पुनि उर धरई ॥

रोवहिं नारि हृदय हति पानी । तासु तेज बल बिपुल बखानी ॥

मेघनाद तेहि अवसर आयउ । कहि बहु कथा पिता समुझायउ ॥

देखेहु कालि मोरि मनुसाई । अबहिं बहुत का करौं बड़ाई ॥

इष्टदेव सैं बल रथ पायउँ । सो बल तात न तोहि देखायउँ ॥

एहि बिधि जल्पत भयउ बिहाना । चहुँ दुआर लागे कपि नाना ॥

इत कपि भालु काल सम बीरा । उत रजनीचर अति रनधीरा ॥

लरहिं सुभट निज निज जय हेतू । बरनि न जाइ समर खगकेतू ॥

॥ दोहा ॥

मेघनाद मायामय रथ चढ़ि गयउ अकास ॥

गर्जेउ अट्टहास करि भइ कपि कटकहि त्रास ॥72॥

॥ दोहा ॥

सक्ति सूल तरवारि कृपाना । अस्त्र सस्त्र कुलिसायुध नाना ॥

डारह परसु परिघ पाषाना । लागेउ बृष्टि करै बहु बाना ॥

दस दिसि रहे बान नभ छाई । मानहुँ मघा मेघ झरि लाई ॥

धरु धरु मारु सुनिअ धुनि काना । जो मारइ तेहि कोउ न जाना ॥

गहि गिरि तरु अकास कपि धावहिं । देखहि तेहि न दुखित फिरि आवहिं ॥

अवघट घाट बाट गिरि कंदर । माया बल कीन्हेसि सर पंजर ॥

जाहिं कहाँ ब्याकुल भए बंदर । सुरपति बंदि परे जनु मंदर ॥

मारुतसुत अंगद नल नीला । कीन्हेसि बिकल सकल बलसीला ॥

पुनि लछिमन सुग्रीव बिभीषन । सरन्हि मारि कीन्हेसि जर्जर तन ॥

पुनि रघुपति सैं जूझे लागा । सर छाँड़इ होइ लागहिं नागा ॥

ब्याल पास बस भए खरारी । स्वबस अनंत एक अबिकारी ॥

नट इव कपट चरित कर नाना । सदा स्वतंत्र एक भगवाना ॥

रन सोभा लगि प्रभुहिं बँधायो । नागपास देवन्ह भय पायो ॥

॥ दोहा ॥

गिरिजा जासु नाम जपि मुनि काटहिं भव पास ।

सो कि बंध तर आवइ ब्यापक बिस्व निवास ॥73॥

॥ चौपाई ॥

चरित राम के सगुन भवानी । तर्कि न जाहिं बुद्धि बल बानी ॥

अस बिचारि जे तग्य बिरागी । रामहि भजहिं तर्क सब त्यागी ॥

ब्याकुल कटकु कीन्ह घननादा । पुनि भा प्रगट कहइ दुर्बादा ॥

जामवंत कह खल रहु ठाढ़ा । सुनि करि ताहि क्रोध अति बाढ़ा ॥

बूढ़ जानि सठ छाँड़ेउँ तोही । लागेसि अधम पचारै मोही ॥

अस कहि तरल त्रिसूल चलायो । जामवंत कर गहि सोइ धायो ॥

मारिसि मेघनाद कै छाती । परा भूमि घुर्मित सुरघाती ॥

पुनि रिसान गहि चरन फिरायौ । महि पछारि निज बल देखरायो ॥

बर प्रसाद सो मरइ न मारा । तब गहि पद लंका पर डारा ॥

इहाँ देवरिषि गरुड़ पठायो । राम समीप सपदि सो आयो ॥

॥ दोहा ॥

खगपति सब धरि खाए माया नाग बरूथ ।

माया बिगत भए सब हरषे बानर जूथ ॥74(क)॥

गहि गिरि पादप उपल नख धाए कीस रिसाइ ।

चले तमीचर बिकलतर गढ़ पर चढ़े पराइ ॥74(ख)॥

॥ चौपाई ॥

मेघनाद के मुरछा जागी । पितहि बिलोकि लाज अति लागी ॥

तुरत गयउ गिरिबर कंदरा । करौं अजय मख अस मन धरा ॥

इहाँ बिभीषन मंत्र बिचारा । सुनहु नाथ बल अतुल उदारा ॥

मेघनाद मख करइ अपावन । खल मायावी देव सतावन ॥

जौं प्रभु सिद्ध होइ सो पाइहि । नाथ बेगि पुनि जीति न जाइहि ॥

सुनि रघुपति अतिसय सुख माना । बोले अंगदादि कपि नाना ॥

लछिमन संग जाहु सब भाई । करहु बिधंस जग्य कर जाई ॥

तुम्ह लछिमन मारेहु रन ओही । देखि सभय सुर दुख अति मोही ॥

मारेहु तेहि बल बुद्धि उपाई । जेहिं छीजै निसिचर सुनु भाई ॥

जामवंत सुग्रीव बिभीषन । सेन समेत रहेहु तीनिउ जन ॥

जब रघुबीर दीन्हि अनुसासन । कटि निषंग कसि साजि सरासन ॥

प्रभु प्रताप उर धरि रनधीरा । बोले घन इव गिरा गँभीरा ॥

जौं तेहि आजु बधें बिनु आवौं । तौ रघुपति सेवक न कहावौं ॥

जौं सत संकर करहिं सहाई । तदपि हतउँ रघुबीर दोहाई ॥

॥ दोहा ॥

रघुपति चरन नाइ सिरु चलेउ तुरंत अनंत ।

अंगद नील मयंद नल संग सुभट हनुमंत ॥75॥

॥ चौपाई ॥

जाइ कपिन्ह सो देखा बैसा । आहुति देत रुधिर अरु भैंसा ॥

कीन्ह कपिन्ह सब जग्य बिधंसा । जब न उठइ तब करहिं प्रसंसा ॥

तदपि न उठइ धरेन्हि कच जाई । लातन्हि हति हति चले पराई ॥

लै त्रिसुल धावा कपि भागे । आए जहँ रामानुज आगे ॥

आवा परम क्रोध कर मारा । गर्ज घोर रव बारहिं बारा ॥

कोपि मरुतसुत अंगद धाए । हति त्रिसूल उर धरनि गिराए ॥

प्रभु कहँ छाँड़ेसि सूल प्रचंडा । सर हति कृत अनंत जुग खंडा ॥

उठि बहोरि मारुति जुबराजा । हतहिं कोपि तेहि घाउ न बाजा ॥

फिरे बीर रिपु मरइ न मारा । तब धावा करि घोर चिकारा ॥

आवत देखि क्रुद्ध जनु काला । लछिमन छाड़े बिसिख कराला ॥

देखेसि आवत पबि सम बाना । तुरत भयउ खल अंतरधाना ॥

बिबिध बेष धरि करइ लराई । कबहुँक प्रगट कबहुँ दुरि जाई ॥

देखि अजय रिपु डरपे कीसा । परम क्रुद्ध तब भयउ अहीसा ॥

लछिमन मन अस मंत्र दृढ़ावा । एहि पापिहि मैं बहुत खेलावा ॥

सुमिरि कोसलाधीस प्रतापा । सर संधान कीन्ह करि दापा ॥

छाड़ा बान माझ उर लागा । मरती बार कपटु सब त्यागा ॥

॥ दोहा ॥

रामानुज कहँ रामु कहँ अस कहि छाँड़ेसि प्रान ।

धन्य धन्य तव जननी कह अंगद हनुमान ॥76 ॥

॥ चौपाई ॥

बिनु प्रयास हनुमान उठायो । लंका द्वार राखि पुनि आयो ॥

तासु मरन सुनि सुर गंधर्बा । चढ़ि बिमान आए नभ सर्बा ॥

बरषि सुमन दुंदुभीं बजावहिं । श्रीरघुनाथ बिमल जसु गावहिं ॥

जय अनंत जय जगदाधारा । तुम्ह प्रभु सब देवन्हि निस्तारा ॥

अस्तुति करि सुर सिद्ध सिधाए । लछिमन कृपासिन्धु पहिं आए ॥

सुत बध सुना दसानन जबहीं । मुरुछित भयउ परेउ महि तबहीं ॥

मंदोदरी रुदन कर भारी । उर ताड़न बहु भाँति पुकारी ॥

नगर लोग सब ब्याकुल सोचा । सकल कहहिं दसकंधर पोचा ॥

॥ दोहा ॥

तब दसकंठ बिबिध बिधि समुझाईं सब नारि ।

नस्वर रूप जगत सब देखहु हृदयँ बिचारि ॥77॥

॥ चौपाई ॥

तिन्हहि ग्यान उपदेसा रावन । आपुन मंद कथा सुभ पावन ॥

पर उपदेस कुसल बहुतेरे । जे आचरहिं ते नर न घनेरे ॥

निसा सिरानि भयउ भिनुसारा । लगे भालु कपि चारिहुँ द्वारा ॥

सुभट बोलाइ दसानन बोला । रन सन्मुख जा कर मन डोला ॥

सो अबहीं बरु जाउ पराई । संजुग बिमुख भएँ न भलाई ॥

निज भुज बल मैं बयरु बढ़ावा । देहउँ उतरु जो रिपु चढ़ि आवा ॥

अस कहि मरुत बेग रथ साजा । बाजे सकल जुझाऊ बाजा ॥

चले बीर सब अतुलित बली । जनु कज्जल कै आँधी चली ॥

असगुन अमित होहिं तेहि काला । गनइ न भुजबल गर्ब बिसाला ॥

॥ छन्द ॥

अति गर्ब गनइ न सगुन असगुन स्त्रवहिं आयुध हाथ ते ।

भट गिरत रथ ते बाजि गज चिक्करत भाजहिं साथ ते ॥

गोमाय गीध कराल खर रव स्वान बोलहिं अति घने ।

जनु कालदूत उलूक बोलहिं बचन परम भयावने ॥

॥ दोहा ॥

ताहि कि संपति सगुन सुभ सपनेहुँ मन बिश्राम ।

भूत द्रोह रत मोहबस राम बिमुख रति काम ॥78॥

॥ चौपाई ॥

चलेउ निसाचर कटकु अपारा । चतुरंगिनी अनी बहु धारा ॥

बिबिध भाँति बाहन रथ जाना । बिपुल बरन पताक ध्वज नाना ॥

चले मत्त गज जूथ घनेरे । प्राबिट जलद मरुत जनु प्रेरे ॥

बरन बरद बिरदैत निकाया । समर सूर जानहिं बहु माया ॥

अति बिचित्र बाहिनी बिराजी । बीर बसंत सेन जनु साजी ॥

चलत कटक दिगसिधुंर डगहीं । छुभित पयोधि कुधर डगमगहीं ॥

उठी रेनु रबि गयउ छपाई । मरुत थकित बसुधा अकुलाई ॥

पनव निसान घोर रव बाजहिं । प्रलय समय के घन जनु गाजहिं ॥

भेरि नफीरि बाज सहनाई । मारू राग सुभट सुखदाई ॥

केहरि नाद बीर सब करहीं । निज निज बल पौरुष उच्चरहीं ॥

कहइ दसानन सुनहु सुभट्टा । मर्दहु भालु कपिन्ह के ठट्टा ॥

हौं मारिहउँ भूप द्वौ भाई । अस कहि सन्मुख फौज रेंगाई ॥

यह सुधि सकल कपिन्ह जब पाई । धाए करि रघुबीर दोहाई ॥

॥ छन्द ॥

धाए बिसाल कराल मर्कट भालु काल समान ते ।

मानहुँ सपच्छ उड़ाहिं भूधर बृंद नाना बान ते ॥

नख दसन सैल महाद्रुमायुध सबल संक न मानहीं ।

जय राम रावन मत्त गज मृगराज सुजसु बखानहीं ॥

॥ दोहा ॥

दुहु दिसि जय जयकार करि निज निज जोरी जानि ।

भिरे बीर इत रामहि उत रावनहि बखानि ॥79॥

॥ चौपाई ॥

रावनु रथी बिरथ रघुबीरा । देखि बिभीषन भयउ अधीरा ॥

अधिक प्रीति मन भा संदेहा । बंदि चरन कह सहित सनेहा ॥

नाथ न रथ नहिं तन पद त्राना । केहि बिधि जितब बीर बलवाना ॥

सुनहु सखा कह कृपानिधाना । जेहिं जय होइ सो स्यंदन आना ॥

सौरज धीरज तेहि रथ चाका । सत्य सील दृढ़ ध्वजा पताका ॥

बल बिबेक दम परहित घोरे । छमा कृपा समता रजु जोरे ॥

ईस भजनु सारथी सुजाना । बिरति चर्म संतोष कृपाना ॥

दान परसु बुधि सक्ति प्रचंड़ा । बर बिग्यान कठिन कोदंडा ॥

अमल अचल मन त्रोन समाना । सम जम नियम सिलीमुख नाना ॥

कवच अभेद बिप्र गुर पूजा । एहि सम बिजय उपाय न दूजा ॥

सखा धर्ममय अस रथ जाकें । जीतन कहँ न कतहुँ रिपु ताकें ॥

॥ दोहा ॥

महा अजय संसार रिपु जीति सकइ सो बीर ।

जाकें अस रथ होइ दृढ़ सुनहु सखा मतिधीर ॥80(क)॥

सुनि प्रभु बचन बिभीषन हरषि गहे पद कंज ।

एहि मिस मोहि उपदेसेहु राम कृपा सुख पुंज ॥80(ख)॥

उत पचार दसकंधर इत अंगद हनुमान ।

लरत निसाचर भालु कपि करि निज निज प्रभु आन ॥80(ग)॥

॥ चौपाई ॥

सुर ब्रह्मादि सिद्ध मुनि नाना । देखत रन नभ चढ़े बिमाना ॥

हमहू उमा रहे तेहि संगा । देखत राम चरित रन रंगा ॥

सुभट समर रस दुहु दिसि माते । कपि जयसील राम बल ताते ॥

एक एक सन भिरहिं पचारहिं । एकन्ह एक मर्दि महि पारहिं ॥

मारहिं काटहिं धरहिं पछारहिं । सीस तोरि सीसन्ह सन मारहिं ॥

उदर बिदारहिं भुजा उपारहिं । गहि पद अवनि पटकि भट डारहिं ॥

निसिचर भट महि गाड़हि भालू । ऊपर ढारि देहिं बहु बालू ॥

बीर बलिमुख जुद्ध बिरुद्धे । देखिअत बिपुल काल जनु क्रुद्धे ॥

॥ छन्द ॥

क्रुद्धे कृतांत समान कपि तन स्त्रवत सोनित राजहीं ।

मर्दहिं निसाचर कटक भट बलवंत घन जिमि गाजहीं ॥

मारहिं चपेटन्हि डाटि दातन्ह काटि लातन्ह मीजहीं ।

चिक्करहिं मर्कट भालु छल बल करहिं जेहिं खल छीजहीं ॥

धरि गाल फारहिं उर बिदारहिं गल अँतावरि मेलहीं ।

प्रहलादपति जनु बिबिध तनु धरि समर अंगन खेलहीं ॥

धरु मारु काटु पछारु घोर गिरा गगन महि भरि रही ।

जय राम जो तृन ते कुलिस कर कुलिस ते कर तृन सही ॥

॥ दोहा ॥

निज दल बिचलत देखेसि बीस भुजाँ दस चाप ।

रथ चढ़ि चलेउ दसानन फिरहु फिरहु करि दाप ॥81॥

॥ चौपाई ॥

धायउ परम क्रुद्ध दसकंधर । सन्मुख चले हूह दै बंदर ॥

गहि कर पादप उपल पहारा । डारेन्हि ता पर एकहिं बारा ॥

लागहिं सैल बज्र तन तासू । खंड खंड होइ फूटहिं आसू ॥

चला न अचल रहा रथ रोपी । रन दुर्मद रावन अति कोपी ॥

इत उत झपटि दपटि कपि जोधा । मर्दै लाग भयउ अति क्रोधा ॥

चले पराइ भालु कपि नाना । त्राहि त्राहि अंगद हनुमाना ॥

पाहि पाहि रघुबीर गोसाई । यह खल खाइ काल की नाई ॥

तेहि देखे कपि सकल पराने । दसहुँ चाप सायक संधाने ॥

॥ छन्द ॥

संधानि धनु सर निकर छाड़ेसि उरग जिमि उड़ि लागहीं ।

रहे पूरि सर धरनी गगन दिसि बिदसि कहँ कपि भागहीं ॥

भयो अति कोलाहल बिकल कपि दल भालु बोलहिं आतुरे ।

रघुबीर करुना सिंधु आरत बंधु जन रच्छक हरे ॥

॥ दोहा ॥

निज दल बिकल देखि कटि कसि निषंग धनु हाथ ।

लछिमन चले क्रुद्ध होइ नाइ राम पद माथ ॥82॥

॥ चौपाई ॥

रे खल का मारसि कपि भालू । मोहि बिलोकु तोर मैं कालू ॥

खोजत रहेउँ तोहि सुतघाती । आजु निपाति जुड़ावउँ छाती ॥

अस कहि छाड़ेसि बान प्रचंडा । लछिमन किए सकल सत खंडा ॥

कोटिन्ह आयुध रावन डारे । तिल प्रवान करि काटि निवारे ॥

पुनि निज बानन्ह कीन्ह प्रहारा । स्यंदनु भंजि सारथी मारा ॥

सत सत सर मारे दस भाला । गिरि सृंगन्ह जनु प्रबिसहिं ब्याला ॥

पुनि सत सर मारा उर माहीं । परेउ धरनि तल सुधि कछु नाहीं ॥

उठा प्रबल पुनि मुरुछा जागी । छाड़िसि ब्रह्म दीन्हि जो साँगी ॥

॥ छन्द ॥

सो ब्रह्म दत्त प्रचंड सक्ति अनंत उर लागी सही ।

पर्यो बीर बिकल उठाव दसमुख अतुल बल महिमा रही ॥

ब्रह्मांड भवन बिराज जाकें एक सिर जिमि रज कनी ।

तेहि चह उठावन मूढ़ रावन जान नहिं त्रिभुअन धनी ॥

॥ दोहा ॥

देखि पवनसुत धायउ बोलत बचन कठोर ।

आवत कपिहि हन्यो तेहिं मुष्टि प्रहार प्रघोर ॥83॥

॥ चौपाई ॥

जानु टेकि कपि भूमि न गिरा । उठा सँभारि बहुत रिस भरा ॥

मुठिका एक ताहि कपि मारा । परेउ सैल जनु बज्र प्रहारा ॥

मुरुछा गै बहोरि सो जागा । कपि बल बिपुल सराहन लागा ॥

धिग धिग मम पौरुष धिग मोही । जौं तैं जिअत रहेसि सुरद्रोही ॥

अस कहि लछिमन कहुँ कपि ल्यायो । देखि दसानन बिसमय पायो ॥

कह रघुबीर समुझु जियँ भ्राता । तुम्ह कृतांत भच्छक सुर त्राता ॥

सुनत बचन उठि बैठ कृपाला । गई गगन सो सकति कराला ॥

पुनि कोदंड बान गहि धाए । रिपु सन्मुख अति आतुर आए ॥

॥ छन्द ॥

आतुर बहोरि बिभंजि स्यंदन सूत हति ब्याकुल कियो ।

गिर् यो धरनि दसकंधर बिकलतर बान सत बेध्यो हियो ॥

सारथी दूसर घालि रथ तेहि तुरत लंका लै गयो ।

रघुबीर बंधु प्रताप पुंज बहोरि प्रभु चरनन्हि नयो ॥

॥ दोहा ॥

उहाँ दसानन जागि करि करै लाग कछु जग्य ।

राम बिरोध बिजय चह सठ हठ बस अति अग्य ॥84॥

॥ चौपाई ॥

इहाँ बिभीषन सब सुधि पाई । सपदि जाइ रघुपतिहि सुनाई ॥

नाथ करइ रावन एक जागा । सिद्ध भएँ नहिं मरिहि अभागा ॥

पठवहु नाथ बेगि भट बंदर । करहिं बिधंस आव दसकंधर ॥

प्रात होत प्रभु सुभट पठाए । हनुमदादि अंगद सब धाए ॥

कौतुक कूदि चढ़े कपि लंका । पैठे रावन भवन असंका ॥

जग्य करत जबहीं सो देखा । सकल कपिन्ह भा क्रोध बिसेषा ॥

रन ते निलज भाजि गृह आवा । इहाँ आइ बक ध्यान लगावा ॥

अस कहि अंगद मारा लाता । चितव न सठ स्वारथ मन राता ॥

॥ छन्द ॥

नहिं चितव जब करि कोप कपि गहि दसन लातन्ह मारहीं ।

धरि केस नारि निकारि बाहेर तेऽतिदीन पुकारहीं ॥

तब उठेउ क्रुद्ध कृतांत सम गहि चरन बानर डारई ।

एहि बीच कपिन्ह बिधंस कृत मख देखि मन महुँ हारई ॥

॥ दोहा ॥

जग्य बिधंसि कुसल कपि आए रघुपति पास ।

चलेउ निसाचर क्रुर्द्ध होइ त्यागि जिवन कै आस ॥85॥

॥ चौपाई ॥

चलत होहिं अति असुभ भयंकर । बैठहिं गीध उड़ाइ सिरन्ह पर ॥

भयउ कालबस काहु न माना । कहेसि बजावहु जुद्ध निसाना ॥

चली तमीचर अनी अपारा । बहु गज रथ पदाति असवारा ॥

प्रभु सन्मुख धाए खल कैंसें । सलभ समूह अनल कहँ जैंसें ॥

इहाँ देवतन्ह अस्तुति कीन्ही । दारुन बिपति हमहि एहिं दीन्ही ॥

अब जनि राम खेलावहु एही । अतिसय दुखित होति बैदेही ॥

देव बचन सुनि प्रभु मुसकाना । उठि रघुबीर सुधारे बाना ।

जटा जूट दृढ़ बाँधै माथे । सोहहिं सुमन बीच बिच गाथे ॥

अरुन नयन बारिद तनु स्यामा । अखिल लोक लोचनाभिरामा ॥

कटितट परिकर कस्यो निषंगा । कर कोदंड कठिन सारंगा ॥

॥ छन्द ॥

सारंग कर सुंदर निषंग सिलीमुखाकर कटि कस्यो ।

भुजदंड पीन मनोहरायत उर धरासुर पद लस्यो ॥

कह दास तुलसी जबहिं प्रभु सर चाप कर फेरन लगे ।

ब्रह्मांड दिग्गज कमठ अहि महि सिंधु भूधर डगमगे ॥

॥ दोहा ॥

सोभा देखि हरषि सुर बरषहिं सुमन अपार ।

जय जय जय करुनानिधि छबि बल गुन आगार ॥86॥

॥ चौपाई ॥

एहीं बीच निसाचर अनी । कसमसात आई अति घनी ।

देखि चले सन्मुख कपि भट्टा । प्रलयकाल के जनु घन घट्टा ॥

बहु कृपान तरवारि चमंकहिं । जनु दहँ दिसि दामिनीं दमंकहिं ॥

गज रथ तुरग चिकार कठोरा । गर्जहिं मनहुँ बलाहक घोरा ॥

कपि लंगूर बिपुल नभ छाए । मनहुँ इंद्रधनु उए सुहाए ॥

उठइ धूरि मानहुँ जलधारा । बान बुंद भै बृष्टि अपारा ॥

दुहुँ दिसि पर्बत करहिं प्रहारा । बज्रपात जनु बारहिं बारा ॥

रघुपति कोपि बान झरि लाई । घायल भै निसिचर समुदाई ॥

लागत बान बीर चिक्करहीं । घुर्मि घुर्मि जहँ तहँ महि परहीं ॥

स्त्रवहिं सैल जनु निर्झर भारी । सोनित सरि कादर भयकारी ॥

॥ छन्द ॥

कादर भयंकर रुधिर सरिता चली परम अपावनी ।

दोउ कूल दल रथ रेत चक्र अबर्त बहति भयावनी ॥

जल जंतुगज पदचर तुरग खर बिबिध बाहन को गने ।

सर सक्ति तोमर सर्प चाप तरंग चर्म कमठ घने ॥

॥ दोहा ॥

बीर परहिं जनु तीर तरु मज्जा बहु बह फेन ।

कादर देखि डरहिं तहँ सुभटन्ह के मन चेन ॥87॥

॥ चौपाई ॥

मज्जहि भूत पिसाच बेताला । प्रमथ महा झोटिंग कराला ॥

काक कंक लै भुजा उड़ाहीं । एक ते छीनि एक लै खाहीं ॥

एक कहहिं ऐसिउ सौंघाई । सठहु तुम्हार दरिद्र न जाई ॥

कहँरत भट घायल तट गिरे । जहँ तहँ मनहुँ अर्धजल परे ॥

खैंचहिं गीध आँत तट भए । जनु बंसी खेलत चित दए ॥

बहु भट बहहिं चढ़े खग जाहीं । जनु नावरि खेलहिं सरि माहीं ॥

जोगिनि भरि भरि खप्पर संचहिं । भूत पिसाच बधू नभ नंचहिं ॥

भट कपाल करताल बजावहिं । चामुंडा नाना बिधि गावहिं ॥

जंबुक निकर कटक्कट कट्टहिं । खाहिं हुआहिं अघाहिं दपट्टहिं ॥

कोटिन्ह रुंड मुंड बिनु डोल्लहिं । सीस परे महि जय जय बोल्लहिं ॥

॥ छन्द ॥

बोल्लहिं जो जय जय मुंड रुंड प्रचंड सिर बिनु धावहीं ।

खप्परिन्ह खग्ग अलुज्झि जुज्झहिं सुभट भटन्ह ढहावहीं ॥

बानर निसाचर निकर मर्दहिं राम बल दर्पित भए ।

संग्राम अंगन सुभट सोवहिं राम सर निकरन्हि हए ॥

॥ दोहा ॥

रावन हृदयँ बिचारा भा निसिचर संघार ।

मैं अकेल कपि भालु बहु माया करौं अपार ॥88॥

॥ चौपाई ॥

देवन्ह प्रभुहि पयादें देखा । उपजा उर अति छोभ बिसेषा ॥

सुरपति निज रथ तुरत पठावा । हरष सहित मातलि लै आवा ॥

तेज पुंज रथ दिब्य अनूपा । हरषि चढ़े कोसलपुर भूपा ॥

चंचल तुरग मनोहर चारी । अजर अमर मन सम गतिकारी ॥

रथारूढ़ रघुनाथहि देखी । धाए कपि बलु पाइ बिसेषी ॥

सही न जाइ कपिन्ह कै मारी । तब रावन माया बिस्तारी ॥

सो माया रघुबीरहि बाँची । लछिमन कपिन्ह सो मानी साँची ॥

देखी कपिन्ह निसाचर अनी । अनुज सहित बहु कोसलधनी ॥

॥ छन्द ॥

बहु राम लछिमन देखि मर्कट भालु मन अति अपडरे ।

जनु चित्र लिखित समेत लछिमन जहँ सो तहँ चितवहिं खरे ॥

निज सेन चकित बिलोकि हँसि सर चाप सजि कोसल धनी ।

माया हरी हरि निमिष महुँ हरषी सकल मर्कट अनी ॥

॥ दोहा ॥

बहुरि राम सब तन चितइ बोले बचन गँभीर ।

द्वंदजुद्ध देखहु सकल श्रमित भए अति बीर ॥89॥

॥ चौपाई ॥

अस कहि रथ रघुनाथ चलावा । बिप्र चरन पंकज सिरु नावा ॥

तब लंकेस क्रोध उर छावा । गर्जत तर्जत सन्मुख धावा ॥

जीतेहु जे भट संजुग माहीं । सुनु तापस मैं तिन्ह सम नाहीं ॥

रावन नाम जगत जस जाना । लोकप जाकें बंदीखाना ॥

खर दूषन बिराध तुम्ह मारा । बधेहु ब्याध इव बालि बिचारा ॥

निसिचर निकर सुभट संघारेहु । कुंभकरन घननादहि मारेहु ॥

आजु बयरु सबु लेउँ निबाही । जौं रन भूप भाजि नहिं जाहीं ॥

आजु करउँ खलु काल हवाले । परेहु कठिन रावन के पाले ॥

सुनि दुर्बचन कालबस जाना । बिहँसि बचन कह कृपानिधाना ॥

सत्य सत्य सब तव प्रभुताई । जल्पसि जनि देखाउ मनुसाई ॥

॥ छन्द ॥

जनि जल्पना करि सुजसु नासहि नीति सुनहि करहि छमा ।

संसार महँ पूरुष त्रिबिध पाटल रसाल पनस समा ॥

एक सुमनप्रद एक सुमन फल एक फलइ केवल लागहीं ।

एक कहहिं कहहिं करहिं अपर एक करहिं कहत न बागहीं ॥

॥ दोहा ॥

राम बचन सुनि बिहँसा मोहि सिखावत ग्यान ।

बयरु करत नहिं तब डरे अब लागे प्रिय प्रान ॥90॥

॥ चौपाई ॥

कहि दुर्बचन क्रुद्ध दसकंधर । कुलिस समान लाग छाँड़ै सर ॥

नानाकार सिलीमुख धाए । दिसि अरु बिदिस गगन महि छाए ॥

पावक सर छाँड़ेउ रघुबीरा । छन महुँ जरे निसाचर तीरा ॥

छाड़िसि तीब्र सक्ति खिसिआई । बान संग प्रभु फेरि चलाई ॥

कोटिक चक्र त्रिसूल पबारै । बिनु प्रयास प्रभु काटि निवारै ॥

निफल होहिं रावन सर कैसें । खल के सकल मनोरथ जैसें ॥

तब सत बान सारथी मारेसि । परेउ भूमि जय राम पुकारेसि ॥

राम कृपा करि सूत उठावा । तब प्रभु परम क्रोध कहुँ पावा ॥

॥ छन्द ॥

भए क्रुद्ध जुद्ध बिरुद्ध रघुपति त्रोन सायक कसमसे ।

कोदंड धुनि अति चंड सुनि मनुजाद सब मारुत ग्रसे ॥

मँदोदरी उर कंप कंपति कमठ भू भूधर त्रसे ।

चिक्करहिं दिग्गज दसन गहि महि देखि कौतुक सुर हँसे ॥

॥ दोहा ॥

तानेउ चाप श्रवन लगि छाँड़े बिसिख कराल ।

राम मारगन गन चले लहलहात जनु ब्याल ॥91॥

॥ चौपाई ॥

चले बान सपच्छ जनु उरगा । प्रथमहिं हतेउ सारथी तुरगा ॥

रथ बिभंजि हति केतु पताका । गर्जा अति अंतर बल थाका ॥

तुरत आन रथ चढ़ि खिसिआना । अस्त्र सस्त्र छाँड़ेसि बिधि नाना ॥

बिफल होहिं सब उद्यम ताके । जिमि परद्रोह निरत मनसा के ॥

तब रावन दस सूल चलावा । बाजि चारि महि मारि गिरावा ॥

तुरग उठाइ कोपि रघुनायक । खैंचि सरासन छाँड़े सायक ॥

रावन सिर सरोज बनचारी । चलि रघुबीर सिलीमुख धारी ॥

दस दस बान भाल दस मारे । निसरि गए चले रुधिर पनारे ॥

स्त्रवत रुधिर धायउ बलवाना । प्रभु पुनि कृत धनु सर संधाना ॥

तीस तीर रघुबीर पबारे । भुजन्हि समेत सीस महि पारे ॥

काटतहीं पुनि भए नबीने । राम बहोरि भुजा सिर छीने ॥

प्रभु बहु बार बाहु सिर हए । कटत झटिति पुनि नूतन भए ॥

पुनि पुनि प्रभु काटत भुज सीसा । अति कौतुकी कोसलाधीसा ॥

रहे छाइ नभ सिर अरु बाहू । मानहुँ अमित केतु अरु राहू ॥

॥ छन्द ॥

जनु राहु केतु अनेक नभ पथ स्त्रवत सोनित धावहीं ।

रघुबीर तीर प्रचंड लागहिं भूमि गिरन न पावहीं ॥

एक एक सर सिर निकर छेदे नभ उड़त इमि सोहहीं ।

जनु कोपि दिनकर कर निकर जहँ तहँ बिधुंतुद पोहहीं ॥

॥ दोहा ॥

जिमि जिमि प्रभु हर तासु सिर तिमि तिमि होहिं अपार ।

सेवत बिषय बिबर्ध जिमि नित नित नूतन मार ॥92॥

॥ चौपाई ॥

दसमुख देखि सिरन्ह कै बाढ़ी । बिसरा मरन भई रिस गाढ़ी ॥

गर्जेउ मूढ़ महा अभिमानी । धायउ दसहु सरासन तानी ॥

समर भूमि दसकंधर कोप्यो । बरषि बान रघुपति रथ तोप्यो ॥

दंड एक रथ देखि न परेऊ । जनु निहार महुँ दिनकर दुरेऊ ॥

हाहाकार सुरन्ह जब कीन्हा । तब प्रभु कोपि कारमुक लीन्हा ॥

सर निवारि रिपु के सिर काटे । ते दिसि बिदिस गगन महि पाटे ॥

काटे सिर नभ मारग धावहिं । जय जय धुनि करि भय उपजावहिं ॥

कहँ लछिमन सुग्रीव कपीसा । कहँ रघुबीर कोसलाधीसा ॥

॥ छन्द ॥

कहँ रामु कहि सिर निकर धाए देखि मर्कट भजि चले ।

संधानि धनु रघुबंसमनि हँसि सरन्हि सिर बेधे भले ॥

सिर मालिका कर कालिका गहि बृंद बृंदन्हि बहु मिलीं ।

करि रुधिर सरि मज्जनु मनहुँ संग्राम बट पूजन चलीं ॥

॥ दोहा ॥

पुनि दसकंठ क्रुद्ध होइ छाँड़ी सक्ति प्रचंड ।

चली बिभीषन सन्मुख मनहुँ काल कर दंड ॥93॥

॥ चौपाई ॥

आवत देखि सक्ति अति घोरा । प्रनतारति भंजन पन मोरा ॥

तुरत बिभीषन पाछें मेला । सन्मुख राम सहेउ सोइ सेला ॥

लागि सक्ति मुरुछा कछु भई । प्रभु कृत खेल सुरन्ह बिकलई ॥

देखि बिभीषन प्रभु श्रम पायो । गहि कर गदा क्रुद्ध होइ धायो ॥

रे कुभाग्य सठ मंद कुबुद्धे । तैं सुर नर मुनि नाग बिरुद्धे ॥

सादर सिव कहुँ सीस चढ़ाए । एक एक के कोटिन्ह पाए ॥

तेहि कारन खल अब लगि बाँच्यो । अब तव कालु सीस पर नाच्यो ॥

राम बिमुख सठ चहसि संपदा । अस कहि हनेसि माझ उर गदा ॥

॥ छन्द ॥

उर माझ गदा प्रहार घोर कठोर लागत महि पर् यो ।

दस बदन सोनित स्त्रवत पुनि संभारि धायो रिस भर् यो ॥

द्वौ भिरे अतिबल मल्लजुद्ध बिरुद्ध एकु एकहि हनै ।

रघुबीर बल दर्पित बिभीषनु घालि नहिं ता कहुँ गनै ॥

॥ दोहा ॥

उमा बिभीषनु रावनहि सन्मुख चितव कि काउ ।

सो अब भिरत काल ज्यों श्रीरघुबीर प्रभाउ ॥94॥

॥ चौपाई ॥

देखा श्रमित बिभीषनु भारी । धायउ हनूमान गिरि धारी ॥

रथ तुरंग सारथी निपाता । हृदय माझ तेहि मारेसि लाता ॥

ठाढ़ रहा अति कंपित गाता । गयउ बिभीषनु जहँ जनत्राता ॥

पुनि रावन कपि हतेउ पचारी । चलेउ गगन कपि पूँछ पसारी ॥

गहिसि पूँछ कपि सहित उड़ाना । पुनि फिरि भिरेउ प्रबल हनुमाना ॥

लरत अकास जुगल सम जोधा । एकहि एकु हनत करि क्रोधा ॥

सोहहिं नभ छल बल बहु करहीं । कज्जल गिरि सुमेरु जनु लरहीं ॥

बुधि बल निसिचर परइ न पार् यो । तब मारुत सुत प्रभु संभार् यो ॥

॥ छन्द ॥

संभारि श्रीरघुबीर धीर पचारि कपि रावनु हन्यो ।

महि परत पुनि उठि लरत देवन्ह जुगल कहुँ जय जय भन्यो ॥

हनुमंत संकट देखि मर्कट भालु क्रोधातुर चले ।

रन मत्त रावन सकल सुभट प्रचंड भुज बल दलमले ॥

॥ दोहा ॥

तब रघुबीर पचारे धाए कीस प्रचंड ।

कपि बल प्रबल देखि तेहिं कीन्ह प्रगट पाषंड ॥95॥

॥ चौपाई ॥

अंतरधान भयउ छन एका । पुनि प्रगटे खल रूप अनेका ॥

रघुपति कटक भालु कपि जेते । जहँ तहँ प्रगट दसानन तेते ॥

देखे कपिन्ह अमित दससीसा । जहँ तहँ भजे भालु अरु कीसा ॥

भागे बानर धरहिं न धीरा । त्राहि त्राहि लछिमन रघुबीरा ॥

दहँ दिसि धावहिं कोटिन्ह रावन । गर्जहिं घोर कठोर भयावन ॥

डरे सकल सुर चले पराई । जय कै आस तजहु अब भाई ॥

सब सुर जिते एक दसकंधर । अब बहु भए तकहु गिरि कंदर ॥

रहे बिरंचि संभु मुनि ग्यानी । जिन्ह जिन्ह प्रभु महिमा कछु जानी ॥

॥ छन्द ॥

जाना प्रताप ते रहे निर्भय कपिन्ह रिपु माने फुरे ।

चले बिचलि मर्कट भालु सकल कृपाल पाहि भयातुरे ॥

हनुमंत अंगद नील नल अतिबल लरत रन बाँकुरे ।

मर्दहिं दसानन कोटि कोटिन्ह कपट भू भट अंकुरे ॥

॥ दोहा ॥

सुर बानर देखे बिकल हँस्यो कोसलाधीस ।

सजि सारंग एक सर हते सकल दससीस ॥96॥

॥ चौपाई ॥

प्रभु छन महुँ माया सब काटी । जिमि रबि उएँ जाहिं तम फाटी ॥

रावनु एकु देखि सुर हरषे । फिरे सुमन बहु प्रभु पर बरषे ॥

भुज उठाइ रघुपति कपि फेरे । फिरे एक एकन्ह तब टेरे ॥

प्रभु बलु पाइ भालु कपि धाए । तरल तमकि संजुग महि आए ॥

अस्तुति करत देवतन्हि देखें । भयउँ एक मैं इन्ह के लेखें ॥

सठहु सदा तुम्ह मोर मरायल । अस कहि कोपि गगन पर धायल ॥

हाहाकार करत सुर भागे । खलहु जाहु कहँ मोरें आगे ॥

देखि बिकल सुर अंगद धायो । कूदि चरन गहि भूमि गिरायो ॥

॥ छन्द ॥

गहि भूमि पार् यो लात मार् यो बालिसुत प्रभु पहिं गयो ।

संभारि उठि दसकंठ घोर कठोर रव गर्जत भयो ॥

करि दाप चाप चढ़ाइ दस संधानि सर बहु बरषई ।

किए सकल भट घायल भयाकुल देखि निज बल हरषई ॥

॥ दोहा ॥

तब रघुपति रावन के सीस भुजा सर चाप ।

काटे बहुत बढ़े पुनि जिमि तीरथ कर पाप ॥97॥

॥ चौपाई ॥

सिर भुज बाढ़ि देखि रिपु केरी । भालु कपिन्ह रिस भई घनेरी ॥

मरत न मूढ़ कटेउ भुज सीसा । धाए कोपि भालु भट कीसा ॥

बालितनय मारुति नल नीला । बानरराज दुबिद बलसीला ॥

बिटप महीधर करहिं प्रहारा । सोइ गिरि तरु गहि कपिन्ह सो मारा ॥

एक नखन्हि रिपु बपुष बिदारी । भअगि चलहिं एक लातन्ह मारी ॥

तब नल नील सिरन्हि चढ़ि गयऊ । नखन्हि लिलार बिदारत भयऊ ॥

रुधिर देखि बिषाद उर भारी । तिन्हहि धरन कहुँ भुजा पसारी ॥

गहे न जाहिं करन्हि पर फिरहीं । जनु जुग मधुप कमल बन चरहीं ॥

कोपि कूदि द्वौ धरेसि बहोरी । महि पटकत भजे भुजा मरोरी ॥

पुनि सकोप दस धनु कर लीन्हे । सरन्हि मारि घायल कपि कीन्हे ॥

हनुमदादि मुरुछित करि बंदर । पाइ प्रदोष हरष दसकंधर ॥

मुरुछित देखि सकल कपि बीरा । जामवंत धायउ रनधीरा ॥

संग भालु भूधर तरु धारी । मारन लगे पचारि पचारी ॥

भयउ क्रुद्ध रावन बलवाना । गहि पद महि पटकइ भट नाना ॥

देखि भालुपति निज दल घाता । कोपि माझ उर मारेसि लाता ॥

॥ छन्द ॥

उर लात घात प्रचंड लागत बिकल रथ ते महि परा ।

गहि भालु बीसहुँ कर मनहुँ कमलन्हि बसे निसि मधुकरा ॥

मुरुछित बिलोकि बहोरि पद हति भालुपति प्रभु पहिं गयौ ।

निसि जानि स्यंदन घालि तेहि तब सूत जतनु करत भयो ॥

॥ दोहा ॥

मुरुछा बिगत भालु कपि सब आए प्रभु पास ।

निसिचर सकल रावनहि घेरि रहे अति त्रास ॥98॥

मासपारायण, छब्बीसवाँ विश्राम

॥ चौपाई ॥

तेही निसि सीता पहिं जाई । त्रिजटा कहि सब कथा सुनाई ॥

सिर भुज बाढ़ि सुनत रिपु केरी । सीता उर भइ त्रास घनेरी ॥

मुख मलीन उपजी मन चिंता । त्रिजटा सन बोली तब सीता ॥

होइहि कहा कहसि किन माता । केहि बिधि मरिहि बिस्व दुखदाता ॥

रघुपति सर सिर कटेहुँ न मरई । बिधि बिपरीत चरित सब करई ॥

मोर अभाग्य जिआवत ओही । जेहिं हौ हरि पद कमल बिछोही ॥

जेहिं कृत कपट कनक मृग झूठा । अजहुँ सो दैव मोहि पर रूठा ॥

जेहिं बिधि मोहि दुख दुसह सहाए । लछिमन कहुँ कटु बचन कहाए ॥

रघुपति बिरह सबिष सर भारी । तकि तकि मार बार बहु मारी ॥

ऐसेहुँ दुख जो राख मम प्राना । सोइ बिधि ताहि जिआव न आना ॥

बहु बिधि कर बिलाप जानकी । करि करि सुरति कृपानिधान की ॥

कह त्रिजटा सुनु राजकुमारी । उर सर लागत मरइ सुरारी ॥

प्रभु ताते उर हतइ न तेही । एहि के हृदयँ बसति बैदेही ॥

॥ छन्द ॥

एहि के हृदयँ बस जानकी जानकी उर मम बास है ।

मम उदर भुअन अनेक लागत बान सब कर नास है ॥

सुनि बचन हरष बिषाद मन अति देखि पुनि त्रिजटाँ कहा ।

अब मरिहि रिपु एहि बिधि सुनहि सुंदरि तजहि संसय महा ॥

॥ दोहा ॥

काटत सिर होइहि बिकल छुटि जाइहि तव ध्यान ।

तब रावनहि हृदय महुँमरिहहिं रामु सुजान ॥99॥

॥ चौपाई ॥

अस कहि बहुत भाँति समुझाई । पुनि त्रिजटा निज भवन सिधाई ॥

राम सुभाउ सुमिरि बैदेही । उपजी बिरह बिथा अति तेही ॥

निसिहि ससिहि निंदति बहु भाँती । जुग सम भई सिराति न राती ॥

करति बिलाप मनहिं मन भारी । राम बिरहँ जानकी दुखारी ॥

जब अति भयउ बिरह उर दाहू । फरकेउ बाम नयन अरु बाहू ॥

सगुन बिचारि धरी मन धीरा । अब मिलिहहिं कृपाल रघुबीरा ॥

इहाँ अर्धनिसि रावनु जागा । निज सारथि सन खीझन लागा ॥

सठ रनभूमि छड़ाइसि मोही । धिग धिग अधम मंदमति तोही ॥

तेहिं पद गहि बहु बिधि समुझावा । भौरु भएँ रथ चढ़ि पुनि धावा ॥

सुनि आगवनु दसानन केरा । कपि दल खरभर भयउ घनेरा ॥

जहँ तहँ भूधर बिटप उपारी । धाए कटकटाइ भट भारी ॥

॥ छन्द ॥

धाए जो मर्कट बिकट भालु कराल कर भूधर धरा ।

अति कोप करहिं प्रहार मारत भजि चले रजनीचरा ॥

बिचलाइ दल बलवंत कीसन्ह घेरि पुनि रावनु लियो ।

चहुँ दिसि चपेटन्हि मारि नखन्हि बिदारि तनु ब्याकुल कियो ॥

॥ दोहा ॥

देखि महा मर्कट प्रबल रावन कीन्ह बिचार ।

अंतरहित होइ निमिष महुँ कृत माया बिस्तार ॥100॥

॥ छन्द ॥

जब कीन्ह तेहिं पाषंड । भए प्रगट जंतु प्रचंड ॥

बेताल भूत पिसाच । कर धरें धनु नाराच ॥1॥

जोगिनि गहें करबाल । एक हाथ मनुज कपाल ॥

करि सद्य सोनित पान । नाचहिं करहिं बहु गान ॥2॥

धरु मारु बोलहिं घोर । रहि पूरि धुनि चहुँ ओर ॥

मुख बाइ धावहिं खान । तब लगे कीस परान ॥3॥

जहँ जाहिं मर्कट भागि । तहँ बरत देखहिं आगि ॥

भए बिकल बानर भालु । पुनि लाग बरषै बालु ॥4॥

जहँ तहँ थकित करि कीस । गर्जेउ बहुरि दससीस ॥

लछिमन कपीस समेत । भए सकल बीर अचेत ॥5॥

हा राम हा रघुनाथ । कहि सुभट मीजहिं हाथ ॥

एहि बिधि सकल बल तोरि । तेहिं कीन्ह कपट बहोरि ॥6॥

प्रगटेसि बिपुल हनुमान । धाए गहे पाषान ॥

तिन्ह रामु घेरे जाइ । चहुँ दिसि बरूथ बनाइ ॥7॥

मारहु धरहु जनि जाइ । कटकटहिं पूँछ उठाइ ॥

दहँ दिसि लँगूर बिराज । तेहिं मध्य कोसलराज ॥8॥

॥ छन्द ॥

तेहिं मध्य कोसलराज सुंदर स्याम तन सोभा लही ।

जनु इंद्रधनुष अनेक की बर बारि तुंग तमालही ॥

प्रभु देखि हरष बिषाद उर सुर बदत जय जय जय करी ।

रघुबीर एकहि तीर कोपि निमेष महुँ माया हरी ॥1॥

माया बिगत कपि भालु हरषे बिटप गिरि गहि सब फिरे ।

सर निकर छाड़े राम रावन बाहु सिर पुनि महि गिरे ॥

श्रीराम रावन समर चरित अनेक कल्प जो गावहीं ।

सत सेष सारद निगम कबि तेउ तदपि पार न पावहीं ॥2॥

॥ दोहा ॥

ताके गुन गन कछु कहे जड़मति तुलसीदास ।

जिमि निज बल अनुरूप ते माछी उड़इ अकास ॥101(क)॥

काटे सिर भुज बार बहु मरत न भट लंकेस ।

प्रभु क्रीड़त सुर सिद्ध मुनि ब्याकुल देखि कलेस ॥101(ख)॥

॥ चौपाई ॥

काटत बढ़हिं सीस समुदाई । जिमि प्रति लाभ लोभ अधिकाई ॥

मरइ न रिपु श्रम भयउ बिसेषा । राम बिभीषन तन तब देखा ॥

उमा काल मर जाकीं ईछा । सो प्रभु जन कर प्रीति परीछा ॥

सुनु सरबग्य चराचर नायक । प्रनतपाल सुर मुनि सुखदायक ॥

नाभिकुंड पियूष बस याकें । नाथ जिअत रावनु बल ताकें ॥

सुनत बिभीषन बचन कृपाला । हरषि गहे कर बान कराला ॥

असुभ होन लागे तब नाना । रोवहिं खर सृकाल बहु स्वाना ॥

बोलहि खग जग आरति हेतू । प्रगट भए नभ जहँ तहँ केतू ॥

दस दिसि दाह होन अति लागा । भयउ परब बिनु रबि उपरागा ॥

मंदोदरि उर कंपति भारी । प्रतिमा स्त्रवहिं नयन मग बारी ॥

॥ छन्द ॥

प्रतिमा रुदहिं पबिपात नभ अति बात बह डोलति मही ।

बरषहिं बलाहक रुधिर कच रज असुभ अति सक को कही ॥

उतपात अमित बिलोकि नभ सुर बिकल बोलहि जय जए ।

सुर सभय जानि कृपाल रघुपति चाप सर जोरत भए ॥

॥ दोहा ॥

खैचि सरासन श्रवन लगि छाड़े सर एकतीस ।

रघुनायक सायक चले मानहुँ काल फनीस ॥102॥

॥ चौपाई ॥

सायक एक नाभि सर सोषा । अपर लगे भुज सिर करि रोषा ॥

लै सिर बाहु चले नाराचा । सिर भुज हीन रुंड महि नाचा ॥

धरनि धसइ धर धाव प्रचंडा । तब सर हति प्रभु कृत दुइ खंडा ॥

गर्जेउ मरत घोर रव भारी । कहाँ रामु रन हतौं पचारी ॥

डोली भूमि गिरत दसकंधर । छुभित सिंधु सरि दिग्गज भूधर ॥

धरनि परेउ द्वौ खंड बढ़ाई । चापि भालु मर्कट समुदाई ॥

मंदोदरि आगें भुज सीसा । धरि सर चले जहाँ जगदीसा ॥

प्रबिसे सब निषंग महु जाई । देखि सुरन्ह दुंदुभीं बजाई ॥

तासु तेज समान प्रभु आनन । हरषे देखि संभु चतुरानन ॥

जय जय धुनि पूरी ब्रह्मंडा । जय रघुबीर प्रबल भुजदंडा ॥

बरषहि सुमन देव मुनि बृंदा । जय कृपाल जय जयति मुकुंदा ॥

॥ छन्द ॥

जय कृपा कंद मुकंद द्वंद हरन सरन सुखप्रद प्रभो ।

खल दल बिदारन परम कारन कारुनीक सदा बिभो ॥

सुर सुमन बरषहिं हरष संकुल बाज दुंदुभि गहगही ।

संग्राम अंगन राम अंग अनंग बहु सोभा लही ॥

सिर जटा मुकुट प्रसून बिच बिच अति मनोहर राजहीं ।

जनु नीलगिरि पर तड़ित पटल समेत उड़ुगन भ्राजहीं ॥

भुजदंड सर कोदंड फेरत रुधिर कन तन अति बने ।

जनु रायमुनीं तमाल पर बैठीं बिपुल सुख आपने ॥

॥ दोहा ॥

कृपादृष्टि करि प्रभु अभय किए सुर बृंद ।

भालु कीस सब हरषे जय सुख धाम मुकंद ॥103॥

॥ चौपाई ॥

पति सिर देखत मंदोदरी । मुरुछित बिकल धरनि खसि परी ॥

जुबति बृंद रोवत उठि धाईं । तेहि उठाइ रावन पहिं आई ॥

पति गति देखि ते करहिं पुकारा । छूटे कच नहिं बपुष सँभारा ॥

उर ताड़ना करहिं बिधि नाना । रोवत करहिं प्रताप बखाना ॥

तव बल नाथ डोल नित धरनी । तेज हीन पावक ससि तरनी ॥

सेष कमठ सहि सकहिं न भारा । सो तनु भूमि परेउ भरि छारा ॥

बरुन कुबेर सुरेस समीरा । रन सन्मुख धरि काहुँ न धीरा ॥

भुजबल जितेहु काल जम साईं । आजु परेहु अनाथ की नाईं ॥

जगत बिदित तुम्हारी प्रभुताई । सुत परिजन बल बरनि न जाई ॥

राम बिमुख अस हाल तुम्हारा । रहा न कोउ कुल रोवनिहारा ॥

तव बस बिधि प्रपंच सब नाथा । सभय दिसिप नित नावहिं माथा ॥

अब तव सिर भुज जंबुक खाहीं । राम बिमुख यह अनुचित नाहीं ॥

काल बिबस पति कहा न माना । अग जग नाथु मनुज करि जाना ॥

॥ छन्द ॥

जान्यो मनुज करि दनुज कानन दहन पावक हरि स्वयं ।

जेहि नमत सिव ब्रह्मादि सुर पिय भजेहु नहिं करुनामयं ॥

आजन्म ते परद्रोह रत पापौघमय तव तनु अयं ।

तुम्हहू दियो निज धाम राम नमामि ब्रह्म निरामयं ॥

॥ दोहा ॥

अहह नाथ रघुनाथ सम कृपासिंधु नहिं आन ।

जोगि बृंद दुर्लभ गति तोहि दीन्हि भगवान ॥104॥

॥ चौपाई ॥

मंदोदरी बचन सुनि काना । सुर मुनि सिद्ध सबन्हि सुख माना ॥

अज महेस नारद सनकादी । जे मुनिबर परमारथबादी ॥

भरि लोचन रघुपतिहि निहारी । प्रेम मगन सब भए सुखारी ॥

रुदन करत देखीं सब नारी । गयउ बिभीषनु मन दुख भारी ॥

बंधु दसा बिलोकि दुख कीन्हा । तब प्रभु अनुजहि आयसु दीन्हा ॥

लछिमन तेहि बहु बिधि समुझायो । बहुरि बिभीषन प्रभु पहिं आयो ॥

कृपादृष्टि प्रभु ताहि बिलोका । करहु क्रिया परिहरि सब सोका ॥

कीन्हि क्रिया प्रभु आयसु मानी । बिधिवत देस काल जियँ जानी ॥

॥ दोहा ॥

मंदोदरी आदि सब देइ तिलांजलि ताहि ।

भवन गई रघुपति गुन गन बरनत मन माहि ॥105॥

॥ चौपाई ॥

आइ बिभीषन पुनि सिरु नायो । कृपासिंधु तब अनुज बोलायो ॥

तुम्ह कपीस अंगद नल नीला । जामवंत मारुति नयसीला ॥

सब मिलि जाहु बिभीषन साथा । सारेहु तिलक कहेउ रघुनाथा ॥

पिता बचन मैं नगर न आवउँ । आपु सरिस कपि अनुज पठावउँ ॥

तुरत चले कपि सुनि प्रभु बचना । कीन्ही जाइ तिलक की रचना ॥

सादर सिंहासन बैठारी । तिलक सारि अस्तुति अनुसारी ॥

जोरि पानि सबहीं सिर नाए । सहित बिभीषन प्रभु पहिं आए ॥

तब रघुबीर बोलि कपि लीन्हे । कहि प्रिय बचन सुखी सब कीन्हे ॥

॥ छन्द ॥

किए सुखी कहि बानी सुधा सम बल तुम्हारें रिपु हयो ।

पायो बिभीषन राज तिहुँ पुर जसु तुम्हारो नित नयो ॥

मोहि सहित सुभ कीरति तुम्हारी परम प्रीति जो गाइहैं ।

संसार सिंधु अपार पार प्रयास बिनु नर पाइहैं ॥

॥ दोहा ॥

प्रभु के बचन श्रवन सुनि नहिं अघाहिं कपि पुंज ।

बार बार सिर नावहिं गहहिं सकल पद कंज ॥106॥

॥ चौपाई ॥

पुनि प्रभु बोलि लियउ हनुमाना । लंका जाहु कहेउ भगवाना ॥

समाचार जानकिहि सुनावहु । तासु कुसल लै तुम्ह चलि आवहु ॥

तब हनुमंत नगर महुँ आए । सुनि निसिचरी निसाचर धाए ॥

बहु प्रकार तिन्ह पूजा कीन्ही । जनकसुता देखाइ पुनि दीन्ही ॥

दूरहि ते प्रनाम कपि कीन्हा । रघुपति दूत जानकीं चीन्हा ॥

कहहु तात प्रभु कृपानिकेता । कुसल अनुज कपि सेन समेता ॥

सब बिधि कुसल कोसलाधीसा । मातु समर जीत्यो दससीसा ॥

अबिचल राजु बिभीषन पायो । सुनि कपि बचन हरष उर छायो ॥

॥ छन्द ॥

अति हरष मन तन पुलक लोचन सजल कह पुनि पुनि रमा ।

का देउँ तोहि त्रेलोक महुँ कपि किमपि नहिं बानी समा ॥

सुनु मातु मैं पायो अखिल जग राजु आजु न संसयं ।

रन जीति रिपुदल बंधु जुत पस्यामि राममनामयं ॥

॥ दोहा ॥

सुनु सुत सदगुन सकल तव हृदयँ बसहुँ हनुमंत ।

सानुकूल कोसलपति रहहुँ समेत अनंत ॥107॥

॥ चौपाई ॥

अब सोइ जतन करहु तुम्ह ताता । देखौं नयन स्याम मृदु गाता ॥

तब हनुमान राम पहिं जाई । जनकसुता कै कुसल सुनाई ॥

सुनि संदेसु भानुकुलभूषन । बोलि लिए जुबराज बिभीषन ॥

मारुतसुत के संग सिधावहु । सादर जनकसुतहि लै आवहु ॥

तुरतहिं सकल गए जहँ सीता । सेवहिं सब निसिचरीं बिनीता ॥

बेगि बिभीषन तिन्हहि सिखायो । तिन्ह बहु बिधि मज्जन करवायो ॥

बहु प्रकार भूषन पहिराए । सिबिका रुचिर साजि पुनि ल्याए ॥

ता पर हरषि चढ़ी बैदेही । सुमिरि राम सुखधाम सनेही ॥

बेतपानि रच्छक चहुँ पासा । चले सकल मन परम हुलासा ॥

देखन भालु कीस सब आए । रच्छक कोपि निवारन धाए ॥

कह रघुबीर कहा मम मानहु । सीतहि सखा पयादें आनहु ॥

देखहुँ कपि जननी की नाईं । बिहसि कहा रघुनाथ गोसाई ॥

सुनि प्रभु बचन भालु कपि हरषे । नभ ते सुरन्ह सुमन बहु बरषे ॥

सीता प्रथम अनल महुँ राखी । प्रगट कीन्हि चह अंतर साखी ॥

॥ दोहा ॥

तेहि कारन करुनानिधि कहे कछुक दुर्बाद ।

सुनत जातुधानीं सब लागीं करै बिषाद ॥108॥

॥ चौपाई ॥

प्रभु के बचन सीस धरि सीता । बोली मन क्रम बचन पुनीता ॥

लछिमन होहु धरम के नेगी । पावक प्रगट करहु तुम्ह बेगी ॥

सुनि लछिमन सीता कै बानी । बिरह बिबेक धरम निति सानी ॥

लोचन सजल जोरि कर दोऊ । प्रभु सन कछु कहि सकत न ओऊ ॥

देखि राम रुख लछिमन धाए । पावक प्रगटि काठ बहु लाए ॥

पावक प्रबल देखि बैदेही । हृदयँ हरष नहिं भय कछु तेही ॥

जौं मन बच क्रम मम उर माहीं । तजि रघुबीर आन गति नाहीं ॥

तौ कृसानु सब कै गति जाना । मो कहुँ होउ श्रीखंड समाना ॥

॥ छन्द ॥

श्रीखंड सम पावक प्रबेस कियो सुमिरि प्रभु मैथिली ।

जय कोसलेस महेस बंदित चरन रति अति निर्मली ॥

प्रतिबिंब अरु लौकिक कलंक प्रचंड पावक महुँ जरे ।

प्रभु चरित काहुँ न लखे नभ सुर सिद्ध मुनि देखहिं खरे ॥1॥

धरि रूप पावक पानि गहि श्री सत्य श्रुति जग बिदित जो ।

जिमि छीरसागर इंदिरा रामहि समर्पी आनि सो ॥

सो राम बाम बिभाग राजति रुचिर अति सोभा भली ।

नव नील नीरज निकट मानहुँ कनक पंकज की कली ॥2॥

॥ दोहा ॥

बरषहिं सुमन हरषि सुन बाजहिं गगन निसान ।

गावहिं किंनर सुरबधू नाचहिं चढ़ीं बिमान ॥109(क)॥

जनकसुता समेत प्रभु सोभा अमित अपार ।

देखि भालु कपि हरषे जय रघुपति सुख सार ॥109(ख)॥

॥ चौपाई ॥

तब रघुपति अनुसासन पाई । मातलि चलेउ चरन सिरु नाई ॥

आए देव सदा स्वारथी । बचन कहहिं जनु परमारथी ॥

दीन बंधु दयाल रघुराया । देव कीन्हि देवन्ह पर दाया ॥

बिस्व द्रोह रत यह खल कामी । निज अघ गयउ कुमारगगामी ॥

तुम्ह समरूप ब्रह्म अबिनासी । सदा एकरस सहज उदासी ॥

अकल अगुन अज अनघ अनामय । अजित अमोघसक्ति करुनामय ॥

मीन कमठ सूकर नरहरी । बामन परसुराम बपु धरी ॥

जब जब नाथ सुरन्ह दुखु पायो । नाना तनु धरि तुम्हइँ नसायो ॥

यह खल मलिन सदा सुरद्रोही । काम लोभ मद रत अति कोही ॥

अधम सिरोमनि तव पद पावा । यह हमरे मन बिसमय आवा ॥

हम देवता परम अधिकारी । स्वारथ रत प्रभु भगति बिसारी ॥

भव प्रबाहँ संतत हम परे । अब प्रभु पाहि सरन अनुसरे ॥

॥ चौपाई ॥

करि बिनती सुर सिद्ध सब रहे जहँ तहँ कर जोरि ।

अति सप्रेम तन पुलकि बिधि अस्तुति करत बहोरि ॥110॥

॥ छन्द ॥

जय राम सदा सुखधाम हरे । रघुनायक सायक चाप धरे ॥

भव बारन दारन सिंह प्रभो । गुन सागर नागर नाथ बिभो ॥

तन काम अनेक अनूप छबी । गुन गावत सिद्ध मुनींद्र कबी ॥

जसु पावन रावन नाग महा । खगनाथ जथा करि कोप गहा ॥

जन रंजन भंजन सोक भयं । गतक्रोध सदा प्रभु बोधमयं ॥

अवतार उदार अपार गुनं । महि भार बिभंजन ग्यानघनं ॥

अज ब्यापकमेकमनादि सदा । करुनाकर राम नमामि मुदा ॥

रघुबंस बिभूषन दूषन हा । कृत भूप बिभीषन दीन रहा ॥

गुन ग्यान निधान अमान अजं । नित राम नमामि बिभुं बिरजं ॥

भुजदंड प्रचंड प्रताप बलं । खल बृंद निकंद महा कुसलं ॥

बिनु कारन दीन दयाल हितं । छबि धाम नमामि रमा सहितं ॥

भव तारन कारन काज परं । मन संभव दारुन दोष हरं ॥

सर चाप मनोहर त्रोन धरं । जरजारुन लोचन भूपबरं ॥

सुख मंदिर सुंदर श्रीरमनं । मद मार मुधा ममता समनं ॥

अनवद्य अखंड न गोचर गो । सबरूप सदा सब होइ न गो ॥

इति बेद बदंति न दंतकथा । रबि आतप भिन्नमभिन्न जथा ॥

कृतकृत्य बिभो सब बानर ए । निरखंति तवानन सादर ए ॥

धिग जीवन देव सरीर हरे । तव भक्ति बिना भव भूलि परे ॥

अब दीन दयाल दया करिऐ । मति मोरि बिभेदकरी हरिऐ ॥

जेहि ते बिपरीत क्रिया करिऐ । दुख सो सुख मानि सुखी चरिऐ ॥

खल खंडन मंडन रम्य छमा । पद पंकज सेवित संभु उमा ॥

नृप नायक दे बरदानमिदं । चरनांबुज प्रेम सदा सुभदं ॥

॥ दोहा ॥

बिनय कीन्हि चतुरानन प्रेम पुलक अति गात ।

सोभासिंधु बिलोकत लोचन नहीं अघात ॥111॥

॥ चौपाई ॥

तेहि अवसर दसरथ तहँ आए । तनय बिलोकि नयन जल छाए ॥

अनुज सहित प्रभु बंदन कीन्हा । आसिरबाद पिताँ तब दीन्हा ॥

तात सकल तव पुन्य प्रभाऊ । जीत्यों अजय निसाचर राऊ ॥

सुनि सुत बचन प्रीति अति बाढ़ी । नयन सलिल रोमावलि ठाढ़ी ॥

रघुपति प्रथम प्रेम अनुमाना । चितइ पितहि दीन्हेउ दृढ़ ग्याना ॥

ताते उमा मोच्छ नहिं पायो । दसरथ भेद भगति मन लायो ॥

सगुनोपासक मोच्छ न लेहीं । तिन्ह कहुँ राम भगति निज देहीं ॥

बार बार करि प्रभुहि प्रनामा । दसरथ हरषि गए सुरधामा ॥

॥ दोहा ॥

अनुज जानकी सहित प्रभु कुसल कोसलाधीस ।

सोभा देखि हरषि मन अस्तुति कर सुर ईस ॥112॥

॥ छन्द ॥

जय राम सोभा धाम । दायक प्रनत बिश्राम ॥

धृत त्रोन बर सर चाप । भुजदंड प्रबल प्रताप ॥1॥

जय दूषनारि खरारि । मर्दन निसाचर धारि ॥

यह दुष्ट मारेउ नाथ । भए देव सकल सनाथ ॥2॥

जय हरन धरनी भार । महिमा उदार अपार ॥

जय रावनारि कृपाल । किए जातुधान बिहाल ॥3॥

लंकेस अति बल गर्ब । किए बस्य सुर गंधर्ब ॥

मुनि सिद्ध नर खग नाग । हठि पंथ सब कें लाग ॥4॥

परद्रोह रत अति दुष्ट । पायो सो फलु पापिष्ट ॥

अब सुनहु दीन दयाल । राजीव नयन बिसाल ॥5॥

मोहि रहा अति अभिमान । नहिं कोउ मोहि समान ॥

अब देखि प्रभु पद कंज । गत मान प्रद दुख पुंज ॥6॥

कोउ ब्रह्म निर्गुन ध्याव । अब्यक्त जेहि श्रुति गाव ॥

मोहि भाव कोसल भूप । श्रीराम सगुन सरूप ॥7॥

बैदेहि अनुज समेत । मम हृदयँ करहु निकेत ॥

मोहि जानिए निज दास । दे भक्ति रमानिवास ॥8॥

॥ चौपाई ॥

दे भक्ति रमानिवास त्रास हरन सरन सुखदायकं ।

सुख धाम राम नमामि काम अनेक छबि रघुनायकं ॥

सुर बृंद रंजन द्वंद भंजन मनुज तनु अतुलितबलं ।

ब्रह्मादि संकर सेब्य राम नमामि करुना कोमलं ॥

॥ दोहा ॥

अब करि कृपा बिलोकि मोहि आयसु देहु कृपाल ।

काह करौं सुनि प्रिय बचन बोले दीनदयाल ॥113॥

॥ चौपाई ॥

सुनु सुरपति कपि भालु हमारे । परे भूमि निसचरन्हि जे मारे ॥

मम हित लागि तजे इन्ह प्राना । सकल जिआउ सुरेस सुजाना ॥

सुनु खगेस प्रभु कै यह बानी । अति अगाध जानहिं मुनि ग्यानी ॥

प्रभु सक त्रिभुअन मारि जिआई । केवल सक्रहि दीन्हि बड़ाई ॥

सुधा बरषि कपि भालु जिआए । हरषि उठे सब प्रभु पहिं आए ॥

सुधाबृष्टि भै दुहु दल ऊपर । जिए भालु कपि नहिं रजनीचर ॥

रामाकार भए तिन्ह के मन । मुक्त भए छूटे भव बंधन ॥

सुर अंसिक सब कपि अरु रीछा । जिए सकल रघुपति कीं ईछा ॥

राम सरिस को दीन हितकारी । कीन्हे मुकुत निसाचर झारी ॥

खल मल धाम काम रत रावन । गति पाई जो मुनिबर पाव न ॥

॥ दोहा ॥

सुमन बरषि सब सुर चले चढ़ि चढ़ि रुचिर बिमान ।

देखि सुअवसरु प्रभु पहिं आयउ संभु सुजान ॥114(क)॥

परम प्रीति कर जोरि जुग नलिन नयन भरि बारि ।

पुलकित तन गदगद गिराँ बिनय करत त्रिपुरारि ॥114(ख)॥

॥ छन्द ॥

मामभिरक्षय रघुकुल नायक । धृत बर चाप रुचिर कर सायक ॥

मोह महा घन पटल प्रभंजन । संसय बिपिन अनल सुर रंजन ॥1॥

अगुन सगुन गुन मंदिर सुंदर । भ्रम तम प्रबल प्रताप दिवाकर ॥

काम क्रोध मद गज पंचानन । बसहु निरंतर जन मन कानन ॥2॥

बिषय मनोरथ पुंज कंज बन । प्रबल तुषार उदार पार मन ॥

भव बारिधि मंदर परमं दर । बारय तारय संसृति दुस्तर ॥3॥

स्याम गात राजीव बिलोचन । दीन बंधु प्रनतारति मोचन ॥

अनुज जानकी सहित निरंतर । बसहु राम नृप मम उर अंतर ॥4॥

मुनि रंजन महि मंडल मंडन । तुलसिदास प्रभु त्रास बिखंडन ॥5॥

॥ दोहा ॥

नाथ जबहिं कोसलपुरीं होइहि तिलक तुम्हार ।

कृपासिंधु मैं आउब देखन चरित उदार ॥115॥

॥ चौपाई ॥

करि बिनती जब संभु सिधाए । तब प्रभु निकट बिभीषनु आए ॥

नाइ चरन सिरु कह मृदु बानी । बिनय सुनहु प्रभु सारँगपानी ॥

सकुल सदल प्रभु रावन मार् यो । पावन जस त्रिभुवन बिस्तार् यो ॥

दीन मलीन हीन मति जाती । मो पर कृपा कीन्हि बहु भाँती ॥

अब जन गृह पुनीत प्रभु कीजे । मज्जनु करिअ समर श्रम छीजे ॥

देखि कोस मंदिर संपदा । देहु कृपाल कपिन्ह कहुँ मुदा ॥

सब बिधि नाथ मोहि अपनाइअ । पुनि मोहि सहित अवधपुर जाइअ ॥

सुनत बचन मृदु दीनदयाला । सजल भए द्वौ नयन बिसाला ॥

॥ दोहा ॥

तोर कोस गृह मोर सब सत्य बचन सुनु भ्रात ।

भरत दसा सुमिरत मोहि निमिष कल्प सम जात ॥116(क)॥

तापस बेष गात कृस जपत निरंतर मोहि ।

देखौं बेगि सो जतनु करु सखा निहोरउँ तोहि ॥116(ख)॥

बीतें अवधि जाउँ जौं जिअत न पावउँ बीर ।

सुमिरत अनुज प्रीति प्रभु पुनि पुनि पुलक सरीर ॥116(ग)॥

करेहु कल्प भरि राजु तुम्ह मोहि सुमिरेहु मन माहिं ।

पुनि मम धाम पाइहहु जहाँ संत सब जाहिं ॥116(घ)॥

॥ चौपाई ॥

सुनत बिभीषन बचन राम के । हरषि गहे पद कृपाधाम के ॥

बानर भालु सकल हरषाने । गहि प्रभु पद गुन बिमल बखाने ॥

बहुरि बिभीषन भवन सिधायो । मनि गन बसन बिमान भरायो ॥

लै पुष्पक प्रभु आगें राखा । हँसि करि कृपासिंधु तब भाषा ॥

चढ़ि बिमान सुनु सखा बिभीषन । गगन जाइ बरषहु पट भूषन ॥

नभ पर जाइ बिभीषन तबही । बरषि दिए मनि अंबर सबही ॥

जोइ जोइ मन भावइ सोइ लेहीं । मनि मुख मेलि डारि कपि देहीं ॥

हँसे रामु श्री अनुज समेता । परम कौतुकी कृपा निकेता ॥

॥ दोहा ॥

मुनि जेहि ध्यान न पावहिं नेति नेति कह बेद ।

कृपासिंधु सोइ कपिन्ह सन करत अनेक बिनोद ॥117(क)॥

उमा जोग जप दान तप नाना मख ब्रत नेम ।

राम कृपा नहि करहिं तसि जसि निष्केवल प्रेम ॥117(ख)॥

॥ चौपाई ॥

भालु कपिन्ह पट भूषन पाए । पहिरि पहिरि रघुपति पहिं आए ॥

नाना जिनस देखि सब कीसा । पुनि पुनि हँसत कोसलाधीसा ॥

चितइ सबन्हि पर कीन्हि दाया । बोले मृदुल बचन रघुराया ॥

तुम्हरें बल मैं रावनु मार् यो । तिलक बिभीषन कहँ पुनि सार् यो ॥

निज निज गृह अब तुम्ह सब जाहू । सुमिरेहु मोहि डरपहु जनि काहू ॥

सुनत बचन प्रेमाकुल बानर । जोरि पानि बोले सब सादर ॥

प्रभु जोइ कहहु तुम्हहि सब सोहा । हमरे होत बचन सुनि मोहा ॥

दीन जानि कपि किए सनाथा । तुम्ह त्रेलोक ईस रघुनाथा ॥

सुनि प्रभु बचन लाज हम मरहीं । मसक कहूँ खगपति हित करहीं ॥

देखि राम रुख बानर रीछा । प्रेम मगन नहिं गृह कै ईछा ॥

॥ दोहा ॥

प्रभु प्रेरित कपि भालु सब राम रूप उर राखि ।

हरष बिषाद सहित चले बिनय बिबिध बिधि भाषि ॥118(क)॥

कपिपति नील रीछपति अंगद नल हनुमान ।

सहित बिभीषन अपर जे जूथप कपि बलवान ॥118(ख)॥

कहि न सकहिं कछु प्रेम बस भरि भरि लोचन बारि ।

सन्मुख चितवहिं राम तन नयन निमेष निवारि ॥118(ग)॥

॥ चौपाई ॥

अतिसय प्रीति देख रघुराई । लिन्हे सकल बिमान चढ़ाई ॥

मन महुँ बिप्र चरन सिरु नायो । उत्तर दिसिहि बिमान चलायो ॥

चलत बिमान कोलाहल होई । जय रघुबीर कहइ सबु कोई ॥

सिंहासन अति उच्च मनोहर । श्री समेत प्रभु बैठै ता पर ॥

राजत रामु सहित भामिनी । मेरु सृंग जनु घन दामिनी ॥

रुचिर बिमानु चलेउ अति आतुर । कीन्ही सुमन बृष्टि हरषे सुर ॥

परम सुखद चलि त्रिबिध बयारी । सागर सर सरि निर्मल बारी ॥

सगुन होहिं सुंदर चहुँ पासा । मन प्रसन्न निर्मल नभ आसा ॥

कह रघुबीर देखु रन सीता । लछिमन इहाँ हत्यो इँद्रजीता ॥

हनूमान अंगद के मारे । रन महि परे निसाचर भारे ॥

कुंभकरन रावन द्वौ भाई । इहाँ हते सुर मुनि दुखदाई ॥

॥ दोहा ॥

इहाँ सेतु बाँध्यो अरु थापेउँ सिव सुख धाम ।

सीता सहित कृपानिधि संभुहि कीन्ह प्रनाम ॥119(क)॥

जहँ जहँ कृपासिंधु बन कीन्ह बास बिश्राम ।

सकल देखाए जानकिहि कहे सबन्हि के नाम ॥119(ख)॥

॥ चौपाई ॥

तुरत बिमान तहाँ चलि आवा । दंडक बन जहँ परम सुहावा ॥

कुंभजादि मुनिनायक नाना । गए रामु सब कें अस्थाना ॥

सकल रिषिन्ह सन पाइ असीसा । चित्रकूट आए जगदीसा ॥

तहँ करि मुनिन्ह केर संतोषा । चला बिमानु तहाँ ते चोखा ॥

बहुरि राम जानकिहि देखाई । जमुना कलि मल हरनि सुहाई ॥

पुनि देखी सुरसरी पुनीता । राम कहा प्रनाम करु सीता ॥

तीरथपति पुनि देखु प्रयागा । निरखत जन्म कोटि अघ भागा ॥

देखु परम पावनि पुनि बेनी । हरनि सोक हरि लोक निसेनी ॥

पुनि देखु अवधपुरी अति पावनि । त्रिबिध ताप भव रोग नसावनि ॥

॥ दोहा ॥

सीता सहित अवध कहुँ कीन्ह कृपाल प्रनाम ।

सजल नयन तन पुलकित पुनि पुनि हरषित राम ॥120(क)॥

पुनि प्रभु आइ त्रिबेनीं हरषित मज्जनु कीन्ह ।

कपिन्ह सहित बिप्रन्ह कहुँ दान बिबिध बिधि दीन्ह ॥120(ख)॥

॥ चौपाई ॥

प्रभु हनुमंतहि कहा बुझाई । धरि बटु रूप अवधपुर जाई ॥

भरतहि कुसल हमारि सुनाएहु । समाचार लै तुम्ह चलि आएहु ॥

तुरत पवनसुत गवनत भयउ । तब प्रभु भरद्वाज पहिं गयऊ ॥

नाना बिधि मुनि पूजा कीन्ही । अस्तुती करि पुनि आसिष दीन्ही ॥

मुनि पद बंदि जुगल कर जोरी । चढ़ि बिमान प्रभु चले बहोरी ॥

इहाँ निषाद सुना प्रभु आए । नाव नाव कहँ लोग बोलाए ॥

सुरसरि नाघि जान तब आयो । उतरेउ तट प्रभु आयसु पायो ॥

तब सीताँ पूजी सुरसरी । बहु प्रकार पुनि चरनन्हि परी ॥

दीन्हि असीस हरषि मन गंगा । सुंदरि तव अहिवात अभंगा ॥

सुनत गुहा धायउ प्रेमाकुल । आयउ निकट परम सुख संकुल ॥

प्रभुहि सहित बिलोकि बैदेही । परेउ अवनि तन सुधि नहिं तेही ॥

प्रीति परम बिलोकि रघुराई । हरषि उठाइ लियो उर लाई ॥

॥ छन्द ॥

लियो हृदयँ लाइ कृपा निधान सुजान रायँ रमापती ।

बैठारि परम समीप बूझी कुसल सो कर बीनती ।

अब कुसल पद पंकज बिलोकि बिरंचि संकर सेब्य जे ।

सुख धाम पूरनकाम राम नमामि राम नमामि ते ॥1॥

सब भाँति अधम निषाद सो हरि भरत ज्यों उर लाइयो ।

मतिमंद तुलसीदास सो प्रभु मोह बस बिसराइयो ॥

यह रावनारि चरित्र पावन राम पद रतिप्रद सदा ।

॥ दोहा ॥

कामादिहर बिग्यानकर सुर सिद्ध मुनि गावहिं मुदा ॥2॥

समर बिजय रघुबीर के चरित जे सुनहिं सुजान ।

बिजय बिबेक बिभूति नित तिन्हहि देहिं भगवान ॥121(क)॥

यह कलिकाल मलायतन मन करि देखु बिचार ।

श्रीरघुनाथ नाम तजि नाहिन आन अधार ॥121(ख)॥

मासपारायण, सत्ताईसवाँ विश्राम

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने

षष्ठः सोपानः समाप्तः ।
(लंकाकाण्ड समाप्त)

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