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बालकाण्ड

बालकाण्ड

॥ श्री गणेशाय नमः ॥

श्रीजानकीवल्लभो विजयते

श्री रामचरित मानस
प्रथम सोपान
(बालकाण्ड)

॥ श्लोक ॥

वर्णानामर्थसंघानां रसानां छन्दसामपि ।

मङ्गलानां च कर्त्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ ॥1॥

भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ ।

याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धाःस्वान्तःस्थमीश्वरम् ॥2॥

वन्दे बोधमयं नित्यं गुरुं शङ्कररूपिणम् ।

यमाश्रितो हि वक्रोऽपि चन्द्रः सर्वत्र वन्द्यते ॥3॥

सीतारामगुणग्रामपुण्यारण्यविहारिणौ ।

वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कबीश्वरकपीश्वरौ ॥4॥

उद्भवस्थितिसंहारकारिणीं क्लेशहारिणीम् ।

सर्वश्रेयस्करीं सीतां नतोऽहं रामवल्लभाम् ॥5॥

यन्मायावशवर्तिं विश्वमखिलं ब्रह्मादिदेवासुरा

यत्सत्वादमृषैव भाति सकलं रज्जौ यथाहेर्भ्रमः ।

यत्पादप्लवमेकमेव हि भवाम्भोधेस्तितीर्षावतां

वन्देऽहं तमशेषकारणपरं रामाख्यमीशं हरिम् ॥6॥

नानापुराणनिगमागमसम्मतं यद्

रामायणे निगदितं क्वचिदन्यतोऽपि ।

स्वान्तःसुखाय तुलसी रघुनाथगाथा-

भाषानिबन्धमतिमञ्जुलमातनोति ॥7॥

सो0-जो सुमिरत सिधि होइ गन नायक करिबर बदन ।

करउ अनुग्रह सोइ बुद्धि रासि सुभ गुन सदन ॥1॥

मूक होइ बाचाल पंगु चढइ गिरिबर गहन ।

जासु कृपाँ सो दयाल द्रवउ सकल कलि मल दहन ॥2॥

नील सरोरुह स्याम तरुन अरुन बारिज नयन ।

करउ सो मम उर धाम सदा छीरसागर सयन ॥3॥

कुंद इंदु सम देह उमा रमन करुना अयन ।

जाहि दीन पर नेह करउ कृपा मर्दन मयन ॥4॥

बंदउ गुरु पद कंज कृपा सिंधु नररूप हरि ।

महामोह तम पुंज जासु बचन रबि कर निकर ॥5॥

॥ चौपाई ॥

बंदउ गुरु पद पदुम परागा । सुरुचि सुबास सरस अनुरागा ॥

अमिय मूरिमय चूरन चारू । समन सकल भव रुज परिवारू ॥

सुकृति संभु तन बिमल बिभूती । मंजुल मंगल मोद प्रसूती ॥

जन मन मंजु मुकुर मल हरनी । किएँ तिलक गुन गन बस करनी ॥

श्रीगुर पद नख मनि गन जोती । सुमिरत दिब्य द्रृष्टि हियँ होती ॥

दलन मोह तम सो सप्रकासू । बड़े भाग उर आवइ जासू ॥

उघरहिं बिमल बिलोचन ही के । मिटहिं दोष दुख भव रजनी के ॥

सूझहिं राम चरित मनि मानिक । गुपुत प्रगट जहँ जो जेहि खानिक ॥

॥ दोहा ॥

जथा सुअंजन अंजि दृग साधक सिद्ध सुजान ।

कौतुक देखत सैल बन भूतल भूरि निधान ॥1॥

॥ चौपाई ॥

एहि महँ रघुपति नाम उदारा । अति पावन पुरान श्रुति सारा ॥

मंगल भवन अमंगल हारी । उमा सहित जेहि जपत पुरारी ॥

भनिति बिचित्र सुकबि कृत जोऊ । राम नाम बिनु सोह न सोऊ ॥

बिधुबदनी सब भाँति सँवारी । सोन न बसन बिना बर नारी ॥

सब गुन रहित कुकबि कृत बानी । राम नाम जस अंकित जानी ॥

सादर कहहिं सुनहिं बुध ताही । मधुकर सरिस संत गुनग्राही ॥

जदपि कबित रस एकउ नाही । राम प्रताप प्रकट एहि माहीं ॥

सोइ भरोस मोरें मन आवा । केहिं न सुसंग बडप्पनु पावा ॥

धूमउ तजइ सहज करुआई । अगरु प्रसंग सुगंध बसाई ॥

भनिति भदेस बस्तु भलि बरनी । राम कथा जग मंगल करनी ॥

॥ छन्द ॥

मंगल करनि कलि मल हरनि तुलसी कथा रघुनाथ की ॥

गति कूर कबिता सरित की ज्यों सरित पावन पाथ की ॥

प्रभु सुजस संगति भनिति भलि होइहि सुजन मन भावनी ॥

भव अंग भूति मसान की सुमिरत सुहावनि पावनी ॥

॥ दोहा ॥

प्रिय लागिहि अति सबहि मम भनिति राम जस संग ।

दारु बिचारु कि करइ कोउ बंदिअ मलय प्रसंग ॥10(क)॥

स्याम सुरभि पय बिसद अति गुनद करहिं सब पान ।

गिरा ग्राम्य सिय राम जस गावहिं सुनहिं सुजान ॥10(ख)॥

॥ चौपाई ॥

गुरु पद रज मृदु मंजुल अंजन । नयन अमिअ दृग दोष बिभंजन ॥

तेहिं करि बिमल बिबेक बिलोचन । बरनउँ राम चरित भव मोचन ॥

बंदउँ प्रथम महीसुर चरना । मोह जनित संसय सब हरना ॥

सुजन समाज सकल गुन खानी । करउँ प्रनाम सप्रेम सुबानी ॥

साधु चरित सुभ चरित कपासू । निरस बिसद गुनमय फल जासू ॥

जो सहि दुख परछिद्र दुरावा । बंदनीय जेहिं जग जस पावा ॥

मुद मंगलमय संत समाजू । जो जग जंगम तीरथराजू ॥

राम भक्ति जहँ सुरसरि धारा । सरसइ ब्रह्म बिचार प्रचारा ॥

बिधि निषेधमय कलि मल हरनी । करम कथा रबिनंदनि बरनी ॥

हरि हर कथा बिराजति बेनी । सुनत सकल मुद मंगल देनी ॥

बटु बिस्वास अचल निज धरमा । तीरथराज समाज सुकरमा ॥

सबहिं सुलभ सब दिन सब देसा । सेवत सादर समन कलेसा ॥

अकथ अलौकिक तीरथराऊ । देइ सद्य फल प्रगट प्रभाऊ ॥

॥ दोहा ॥

सुनि समुझहिं जन मुदित मन मज्जहिं अति अनुराग ।

लहहिं चारि फल अछत तनु साधु समाज प्रयाग ॥2॥

॥ चौपाई ॥

मज्जन फल पेखिअ ततकाला । काक होहिं पिक बकउ मराला ॥

सुनि आचरज करै जनि कोई । सतसंगति महिमा नहिं गोई ॥

बालमीक नारद घटजोनी । निज निज मुखनि कही निज होनी ॥

जलचर थलचर नभचर नाना । जे जड़ चेतन जीव जहाना ॥

मति कीरति गति भूति भलाई । जब जेहिं जतन जहाँ जेहिं पाई ॥

सो जानब सतसंग प्रभाऊ । लोकहुँ बेद न आन उपाऊ ॥

बिनु सतसंग बिबेक न होई । राम कृपा बिनु सुलभ न सोई ॥

सतसंगत मुद मंगल मूला । सोइ फल सिधि सब साधन फूला ॥

सठ सुधरहिं सतसंगति पाई । पारस परस कुधात सुहाई ॥

बिधि बस सुजन कुसंगत परहीं । फनि मनि सम निज गुन अनुसरहीं ॥

बिधि हरि हर कबि कोबिद बानी । कहत साधु महिमा सकुचानी ॥

सो मो सन कहि जात न कैसें । साक बनिक मनि गुन गन जैसें ॥

॥ दोहा ॥

बंदउँ संत समान चित हित अनहित नहिं कोइ ।

अंजलि गत सुभ सुमन जिमि सम सुगंध कर दोइ ॥3(क)॥

संत सरल चित जगत हित जानि सुभाउ सनेहु ।

बालबिनय सुनि करि कृपा राम चरन रति देहु ॥3(ख)॥

॥ चौपाई ॥

बहुरि बंदि खल गन सतिभाएँ । जे बिनु काज दाहिनेहु बाएँ ॥

पर हित हानि लाभ जिन्ह केरें । उजरें हरष बिषाद बसेरें ॥

हरि हर जस राकेस राहु से । पर अकाज भट सहसबाहु से ॥

जे पर दोष लखहिं सहसाखी । पर हित घृत जिन्ह के मन माखी ॥

तेज कृसानु रोष महिषेसा । अघ अवगुन धन धनी धनेसा ॥

उदय केत सम हित सबही के । कुंभकरन सम सोवत नीके ॥

पर अकाजु लगि तनु परिहरहीं । जिमि हिम उपल कृषी दलि गरहीं ॥

बंदउँ खल जस सेष सरोषा । सहस बदन बरनइ पर दोषा ॥

पुनि प्रनवउँ पृथुराज समाना । पर अघ सुनइ सहस दस काना ॥

बहुरि सक्र सम बिनवउँ तेही । संतत सुरानीक हित जेही ॥

बचन बज्र जेहि सदा पिआरा । सहस नयन पर दोष निहारा ॥

॥ दोहा ॥

उदासीन अरि मीत हित सुनत जरहिं खल रीति ।

जानि पानि जुग जोरि जन बिनती करइ सप्रीति ॥4॥

॥ चौपाई ॥

मैं अपनी दिसि कीन्ह निहोरा । तिन्ह निज ओर न लाउब भोरा ॥

बायस पलिअहिं अति अनुरागा । होहिं निरामिष कबहुँ कि कागा ॥

बंदउँ संत असज्जन चरना । दुखप्रद उभय बीच कछु बरना ॥

बिछुरत एक प्रान हरि लेहीं । मिलत एक दुख दारुन देहीं ॥

उपजहिं एक संग जग माहीं । जलज जोंक जिमि गुन बिलगाहीं ॥

सुधा सुरा सम साधू असाधू । जनक एक जग जलधि अगाधू ॥

भल अनभल निज निज करतूती । लहत सुजस अपलोक बिभूती ॥

सुधा सुधाकर सुरसरि साधू । गरल अनल कलिमल सरि ब्याधू ॥

गुन अवगुन जानत सब कोई । जो जेहि भाव नीक तेहि सोई ॥

॥ दोहा ॥

भलो भलाइहि पै लहइ लहइ निचाइहि नीचु ।

सुधा सराहिअ अमरताँ गरल सराहिअ मीचु ॥5॥

॥ चौपाई ॥

खल अघ अगुन साधू गुन गाहा । उभय अपार उदधि अवगाहा ॥

तेहि तें कछु गुन दोष बखाने । संग्रह त्याग न बिनु पहिचाने ॥

भलेउ पोच सब बिधि उपजाए । गनि गुन दोष बेद बिलगाए ॥

कहहिं बेद इतिहास पुराना । बिधि प्रपंचु गुन अवगुन साना ॥

दुख सुख पाप पुन्य दिन राती । साधु असाधु सुजाति कुजाती ॥

दानव देव ऊँच अरु नीचू । अमिअ सुजीवनु माहुरु मीचू ॥

माया ब्रह्म जीव जगदीसा । लच्छि अलच्छि रंक अवनीसा ॥

कासी मग सुरसरि क्रमनासा । मरु मारव महिदेव गवासा ॥

सरग नरक अनुराग बिरागा । निगमागम गुन दोष बिभागा ॥

॥ दोहा ॥

जड़ चेतन गुन दोषमय बिस्व कीन्ह करतार ।

संत हंस गुन गहहिं पय परिहरि बारि बिकार ॥6॥

॥ चौपाई ॥

अस बिबेक जब देइ बिधाता । तब तजि दोष गुनहिं मनु राता ॥

काल सुभाउ करम बरिआई । भलेउ प्रकृति बस चुकइ भलाई ॥

सो सुधारि हरिजन जिमि लेहीं । दलि दुख दोष बिमल जसु देहीं ॥

खलउ करहिं भल पाइ सुसंगू । मिटइ न मलिन सुभाउ अभंगू ॥

लखि सुबेष जग बंचक जेऊ । बेष प्रताप पूजिअहिं तेऊ ॥

उधरहिं अंत न होइ निबाहू । कालनेमि जिमि रावन राहू ॥

किएहुँ कुबेष साधु सनमानू । जिमि जग जामवंत हनुमानू ॥

हानि कुसंग सुसंगति लाहू । लोकहुँ बेद बिदित सब काहू ॥

गगन चढ़इ रज पवन प्रसंगा । कीचहिं मिलइ नीच जल संगा ॥

साधु असाधु सदन सुक सारीं । सुमिरहिं राम देहिं गनि गारी ॥

धूम कुसंगति कारिख होई । लिखिअ पुरान मंजु मसि सोई ॥

सोइ जल अनल अनिल संघाता । होइ जलद जग जीवन दाता ॥

॥ दोहा ॥

ग्रह भेषज जल पवन पट पाइ कुजोग सुजोग ।

होहि कुबस्तु सुबस्तु जग लखहिं सुलच्छन लोग ॥7(क)॥

सम प्रकास तम पाख दुहुँ नाम भेद बिधि कीन्ह ।

ससि सोषक पोषक समुझि जग जस अपजस दीन्ह ॥7(ख)॥

जड़ चेतन जग जीव जत सकल राममय जानि ।

बंदउँ सब के पद कमल सदा जोरि जुग पानि ॥7(ग)॥

देव दनुज नर नाग खग प्रेत पितर गंधर्ब ।

बंदउँ किंनर रजनिचर कृपा करहु अब सर्ब ॥7(घ)॥

॥ चौपाई ॥

आकर चारि लाख चौरासी । जाति जीव जल थल नभ बासी ॥

सीय राममय सब जग जानी । करउँ प्रनाम जोरि जुग पानी ॥

जानि कृपाकर किंकर मोहू । सब मिलि करहु छाड़ि छल छोहू ॥

निज बुधि बल भरोस मोहि नाहीं । तातें बिनय करउँ सब पाही ॥

करन चहउँ रघुपति गुन गाहा । लघु मति मोरि चरित अवगाहा ॥

सूझ न एकउ अंग उपाऊ । मन मति रंक मनोरथ राऊ ॥

मति अति नीच ऊँचि रुचि आछी । चहिअ अमिअ जग जुरइ न छाछी ॥

छमिहहिं सज्जन मोरि ढिठाई । सुनिहहिं बालबचन मन लाई ॥

जौ बालक कह तोतरि बाता । सुनहिं मुदित मन पितु अरु माता ॥

हँसिहहि कूर कुटिल कुबिचारी । जे पर दूषन भूषनधारी ॥

निज कवित केहि लाग न नीका । सरस होउ अथवा अति फीका ॥

जे पर भनिति सुनत हरषाही । ते बर पुरुष बहुत जग नाहीं ॥

जग बहु नर सर सरि सम भाई । जे निज बाढ़ि बढ़हिं जल पाई ॥

सज्जन सकृत सिंधु सम कोई । देखि पूर बिधु बाढ़इ जोई ॥

॥ दोहा ॥

भाग छोट अभिलाषु बड़ करउँ एक बिस्वास ।

पैहहिं सुख सुनि सुजन सब खल करहहिं उपहास ॥8॥

॥ चौपाई ॥

खल परिहास होइ हित मोरा । काक कहहिं कलकंठ कठोरा ॥

हंसहि बक दादुर चातकही । हँसहिं मलिन खल बिमल बतकही ॥

कबित रसिक न राम पद नेहू । तिन्ह कहँ सुखद हास रस एहू ॥

भाषा भनिति भोरि मति मोरी । हँसिबे जोग हँसें नहिं खोरी ॥

प्रभु पद प्रीति न सामुझि नीकी । तिन्हहि कथा सुनि लागहि फीकी ॥

हरि हर पद रति मति न कुतरकी । तिन्ह कहुँ मधुर कथा रघुवर की ॥

राम भगति भूषित जियँ जानी । सुनिहहिं सुजन सराहि सुबानी ॥

कबि न होउँ नहिं बचन प्रबीनू । सकल कला सब बिद्या हीनू ॥

आखर अरथ अलंकृति नाना । छंद प्रबंध अनेक बिधाना ॥

भाव भेद रस भेद अपारा । कबित दोष गुन बिबिध प्रकारा ॥

कबित बिबेक एक नहिं मोरें । सत्य कहउँ लिखि कागद कोरे ॥

॥ दोहा ॥

भनिति मोरि सब गुन रहित बिस्व बिदित गुन एक ।

सो बिचारि सुनिहहिं सुमति जिन्ह कें बिमल बिवेक ॥9॥

॥ चौपाई ॥

मनि मानिक मुकुता छबि जैसी । अहि गिरि गज सिर सोह न तैसी ॥

नृप किरीट तरुनी तनु पाई । लहहिं सकल सोभा अधिकाई ॥

तैसेहिं सुकबि कबित बुध कहहीं । उपजहिं अनत अनत छबि लहहीं ॥

भगति हेतु बिधि भवन बिहाई । सुमिरत सारद आवति धाई ॥

राम चरित सर बिनु अन्हवाएँ । सो श्रम जाइ न कोटि उपाएँ ॥

कबि कोबिद अस हृदयँ बिचारी । गावहिं हरि जस कलि मल हारी ॥

कीन्हें प्राकृत जन गुन गाना । सिर धुनि गिरा लगत पछिताना ॥

हृदय सिंधु मति सीप समाना । स्वाति सारदा कहहिं सुजाना ॥

जौं बरषइ बर बारि बिचारू । होहिं कबित मुकुतामनि चारू ॥

॥ दोहा ॥

जुगुति बेधि पुनि पोहिअहिं रामचरित बर ताग ।

पहिरहिं सज्जन बिमल उर सोभा अति अनुराग ॥11॥

॥ दोहा ॥

जे जनमे कलिकाल कराला । करतब बायस बेष मराला ॥

चलत कुपंथ बेद मग छाँड़े । कपट कलेवर कलि मल भाँड़ें ॥

बंचक भगत कहाइ राम के । किंकर कंचन कोह काम के ॥

तिन्ह महँ प्रथम रेख जग मोरी । धींग धरमध्वज धंधक धोरी ॥

जौं अपने अवगुन सब कहऊँ । बाढ़इ कथा पार नहिं लहऊँ ॥

ताते मैं अति अलप बखाने । थोरे महुँ जानिहहिं सयाने ॥

समुझि बिबिधि बिधि बिनती मोरी । कोउ न कथा सुनि देइहि खोरी ॥

एतेहु पर करिहहिं जे असंका । मोहि ते अधिक ते जड़ मति रंका ॥

कबि न होउँ नहिं चतुर कहावउँ । मति अनुरूप राम गुन गावउँ ॥

कहँ रघुपति के चरित अपारा । कहँ मति मोरि निरत संसारा ॥

जेहिं मारुत गिरि मेरु उड़ाहीं । कहहु तूल केहि लेखे माहीं ॥

समुझत अमित राम प्रभुताई । करत कथा मन अति कदराई ॥

॥ दोहा ॥

सारद सेस महेस बिधि आगम निगम पुरान ।

नेति नेति कहि जासु गुन करहिं निरंतर गान ॥12॥

॥ चौपाई ॥

सब जानत प्रभु प्रभुता सोई । तदपि कहें बिनु रहा न कोई ॥

तहाँ बेद अस कारन राखा । भजन प्रभाउ भाँति बहु भाषा ॥

एक अनीह अरूप अनामा । अज सच्चिदानंद पर धामा ॥

ब्यापक बिस्वरूप भगवाना । तेहिं धरि देह चरित कृत नाना ॥

सो केवल भगतन हित लागी । परम कृपाल प्रनत अनुरागी ॥

जेहि जन पर ममता अति छोहू । जेहिं करुना करि कीन्ह न कोहू ॥

गई बहोर गरीब नेवाजू । सरल सबल साहिब रघुराजू ॥

बुध बरनहिं हरि जस अस जानी । करहि पुनीत सुफल निज बानी ॥

तेहिं बल मैं रघुपति गुन गाथा । कहिहउँ नाइ राम पद माथा ॥

मुनिन्ह प्रथम हरि कीरति गाई । तेहिं मग चलत सुगम मोहि भाई ॥

॥ दोहा ॥

अति अपार जे सरित बर जौं नृप सेतु कराहिं ।

चढि पिपीलिकउ परम लघु बिनु श्रम पारहि जाहिं ॥13॥

॥ चौपाई ॥

एहि प्रकार बल मनहि देखाई । करिहउँ रघुपति कथा सुहाई ॥

ब्यास आदि कबि पुंगव नाना । जिन्ह सादर हरि सुजस बखाना ॥

चरन कमल बंदउँ तिन्ह केरे । पुरवहुँ सकल मनोरथ मेरे ॥

कलि के कबिन्ह करउँ परनामा । जिन्ह बरने रघुपति गुन ग्रामा ॥

जे प्राकृत कबि परम सयाने । भाषाँ जिन्ह हरि चरित बखाने ॥

भए जे अहहिं जे होइहहिं आगें । प्रनवउँ सबहिं कपट सब त्यागें ॥

होहु प्रसन्न देहु बरदानू । साधु समाज भनिति सनमानू ॥

जो प्रबंध बुध नहिं आदरहीं । सो श्रम बादि बाल कबि करहीं ॥

कीरति भनिति भूति भलि सोई । सुरसरि सम सब कहँ हित होई ॥

राम सुकीरति भनिति भदेसा । असमंजस अस मोहि अँदेसा ॥

तुम्हरी कृपा सुलभ सोउ मोरे । सिअनि सुहावनि टाट पटोरे ॥

॥ दोहा ॥

सरल कबित कीरति बिमल सोइ आदरहिं सुजान ।

सहज बयर बिसराइ रिपु जो सुनि करहिं बखान ॥14(क)॥

सो न होइ बिनु बिमल मति मोहि मति बल अति थोर ।

करहु कृपा हरि जस कहउँ पुनि पुनि करउँ निहोर ॥14(ख)॥

कबि कोबिद रघुबर चरित मानस मंजु मराल ।

बाल बिनय सुनि सुरुचि लखि मोपर होहु कृपाल ॥14(ग)॥

सो0-बंदउँ मुनि पद कंजु रामायन जेहिं निरमयउ ।

सखर सुकोमल मंजु दोष रहित दूषन सहित ॥14(घ)॥

बंदउँ चारिउ बेद भव बारिधि बोहित सरिस ।

जिन्हहि न सपनेहुँ खेद बरनत रघुबर बिसद जसु ॥14(ङ)॥

बंदउँ बिधि पद रेनु भव सागर जेहि कीन्ह जहँ ।

संत सुधा ससि धेनु प्रगटे खल बिष बारुनी ॥14(च)॥

बिबुध बिप्र बुध ग्रह चरन बंदि कहउँ कर जोरि ।

होइ प्रसन्न पुरवहु सकल मंजु मनोरथ मोरि ॥14(छ)॥

॥ चौपाई ॥

पुनि बंदउँ सारद सुरसरिता । जुगल पुनीत मनोहर चरिता ॥

मज्जन पान पाप हर एका । कहत सुनत एक हर अबिबेका ॥

गुर पितु मातु महेस भवानी । प्रनवउँ दीनबंधु दिन दानी ॥

सेवक स्वामि सखा सिय पी के । हित निरुपधि सब बिधि तुलसीके ॥

कलि बिलोकि जग हित हर गिरिजा । साबर मंत्र जाल जिन्ह सिरिजा ॥

अनमिल आखर अरथ न जापू । प्रगट प्रभाउ महेस प्रतापू ॥

सो उमेस मोहि पर अनुकूला । करिहिं कथा मुद मंगल मूला ॥

सुमिरि सिवा सिव पाइ पसाऊ । बरनउँ रामचरित चित चाऊ ॥

भनिति मोरि सिव कृपाँ बिभाती । ससि समाज मिलि मनहुँ सुराती ॥

जे एहि कथहि सनेह समेता । कहिहहिं सुनिहहिं समुझि सचेता ॥

होइहहिं राम चरन अनुरागी । कलि मल रहित सुमंगल भागी ॥

॥ दोहा ॥

सपनेहुँ साचेहुँ मोहि पर जौं हर गौरि पसाउ ।

तौ फुर होउ जो कहेउँ सब भाषा भनिति प्रभाउ ॥15॥

॥ चौपाई ॥

बंदउँ अवध पुरी अति पावनि । सरजू सरि कलि कलुष नसावनि ॥

प्रनवउँ पुर नर नारि बहोरी । ममता जिन्ह पर प्रभुहि न थोरी ॥

सिय निंदक अघ ओघ नसाए । लोक बिसोक बनाइ बसाए ॥

बंदउँ कौसल्या दिसि प्राची । कीरति जासु सकल जग माची ॥

प्रगटेउ जहँ रघुपति ससि चारू । बिस्व सुखद खल कमल तुसारू ॥

दसरथ राउ सहित सब रानी । सुकृत सुमंगल मूरति मानी ॥

करउँ प्रनाम करम मन बानी । करहु कृपा सुत सेवक जानी ॥

जिन्हहि बिरचि बड़ भयउ बिधाता । महिमा अवधि राम पितु माता ॥

॥ सोरठा ॥

बंदउँ अवध भुआल सत्य प्रेम जेहि राम पद ।

बिछुरत दीनदयाल प्रिय तनु तृन इव परिहरेउ ॥16॥

॥ चौपाई ॥

प्रनवउँ परिजन सहित बिदेहू । जाहि राम पद गूढ़ सनेहू ॥

जोग भोग महँ राखेउ गोई । राम बिलोकत प्रगटेउ सोई ॥

प्रनवउँ प्रथम भरत के चरना । जासु नेम ब्रत जाइ न बरना ॥

राम चरन पंकज मन जासू । लुबुध मधुप इव तजइ न पासू ॥

बंदउँ लछिमन पद जलजाता । सीतल सुभग भगत सुख दाता ॥

रघुपति कीरति बिमल पताका । दंड समान भयउ जस जाका ॥

सेष सहस्त्रसीस जग कारन । जो अवतरेउ भूमि भय टारन ॥

सदा सो सानुकूल रह मो पर । कृपासिंधु सौमित्रि गुनाकर ॥

रिपुसूदन पद कमल नमामी । सूर सुसील भरत अनुगामी ॥

महावीर बिनवउँ हनुमाना । राम जासु जस आप बखाना ॥

॥ सोरठा ॥

प्रनवउँ पवनकुमार खल बन पावक ग्यानधन ।

जासु हृदय आगार बसहिं राम सर चाप धर ॥17॥

॥ चौपाई ॥

कपिपति रीछ निसाचर राजा । अंगदादि जे कीस समाजा ॥

बंदउँ सब के चरन सुहाए । अधम सरीर राम जिन्ह पाए ॥

रघुपति चरन उपासक जेते । खग मृग सुर नर असुर समेते ॥

बंदउँ पद सरोज सब केरे । जे बिनु काम राम के चेरे ॥

सुक सनकादि भगत मुनि नारद । जे मुनिबर बिग्यान बिसारद ॥

प्रनवउँ सबहिं धरनि धरि सीसा । करहु कृपा जन जानि मुनीसा ॥

जनकसुता जग जननि जानकी । अतिसय प्रिय करुना निधान की ॥

ताके जुग पद कमल मनावउँ । जासु कृपाँ निरमल मति पावउँ ॥

पुनि मन बचन कर्म रघुनायक । चरन कमल बंदउँ सब लायक ॥

राजिवनयन धरें धनु सायक । भगत बिपति भंजन सुख दायक ॥

॥ दोहा ॥

गिरा अरथ जल बीचि सम कहिअत भिन्न न भिन्न ।

बदउँ सीता राम पद जिन्हहि परम प्रिय खिन्न ॥18॥

॥ चौपाई ॥

बंदउँ नाम राम रघुवर को । हेतु कृसानु भानु हिमकर को ॥

बिधि हरि हरमय बेद प्रान सो । अगुन अनूपम गुन निधान सो ॥

महामंत्र जोइ जपत महेसू । कासीं मुकुति हेतु उपदेसू ॥

महिमा जासु जान गनराउ । प्रथम पूजिअत नाम प्रभाऊ ॥

जान आदिकबि नाम प्रतापू । भयउ सुद्ध करि उलटा जापू ॥

सहस नाम सम सुनि सिव बानी । जपि जेई पिय संग भवानी ॥

हरषे हेतु हेरि हर ही को । किय भूषन तिय भूषन ती को ॥

नाम प्रभाउ जान सिव नीको । कालकूट फलु दीन्ह अमी को ॥

॥ दोहा ॥

बरषा रितु रघुपति भगति तुलसी सालि सुदास ॥

राम नाम बर बरन जुग सावन भादव मास ॥19॥

॥ चौपाई ॥

आखर मधुर मनोहर दोऊ । बरन बिलोचन जन जिय जोऊ ॥

सुमिरत सुलभ सुखद सब काहू । लोक लाहु परलोक निबाहू ॥

कहत सुनत सुमिरत सुठि नीके । राम लखन सम प्रिय तुलसी के ॥

बरनत बरन प्रीति बिलगाती । ब्रह्म जीव सम सहज सँघाती ॥

नर नारायन सरिस सुभ्राता । जग पालक बिसेषि जन त्राता ॥

भगति सुतिय कल करन बिभूषन । जग हित हेतु बिमल बिधु पूषन ।

स्वाद तोष सम सुगति सुधा के । कमठ सेष सम धर बसुधा के ॥

जन मन मंजु कंज मधुकर से । जीह जसोमति हरि हलधर से ॥

॥ दोहा ॥

एकु छत्रु एकु मुकुटमनि सब बरननि पर जोउ ।

तुलसी रघुबर नाम के बरन बिराजत दोउ ॥20॥

॥ चौपाई ॥

समुझत सरिस नाम अरु नामी । प्रीति परसपर प्रभु अनुगामी ॥

नाम रूप दुइ ईस उपाधी । अकथ अनादि सुसामुझि साधी ॥

को बड़ छोट कहत अपराधू । सुनि गुन भेद समुझिहहिं साधू ॥

देखिअहिं रूप नाम आधीना । रूप ग्यान नहिं नाम बिहीना ॥

रूप बिसेष नाम बिनु जानें । करतल गत न परहिं पहिचानें ॥

सुमिरिअ नाम रूप बिनु देखें । आवत हृदयँ सनेह बिसेषें ॥

नाम रूप गति अकथ कहानी । समुझत सुखद न परति बखानी ॥

अगुन सगुन बिच नाम सुसाखी । उभय प्रबोधक चतुर दुभाषी ॥

॥ दोहा ॥

राम नाम मनिदीप धरु जीह देहरी द्वार ।

तुलसी भीतर बाहेरहुँ जौं चाहसि उजिआर ॥21॥

॥ चौपाई ॥

नाम जीहँ जपि जागहिं जोगी । बिरति बिरंचि प्रपंच बियोगी ॥

ब्रह्मसुखहि अनुभवहिं अनूपा । अकथ अनामय नाम न रूपा ॥

जाना चहहिं गूढ़ गति जेऊ । नाम जीहँ जपि जानहिं तेऊ ॥

साधक नाम जपहिं लय लाएँ । होहिं सिद्ध अनिमादिक पाएँ ॥

जपहिं नामु जन आरत भारी । मिटहिं कुसंकट होहिं सुखारी ॥

राम भगत जग चारि प्रकारा । सुकृती चारिउ अनघ उदारा ॥

चहू चतुर कहुँ नाम अधारा । ग्यानी प्रभुहि बिसेषि पिआरा ॥

चहुँ जुग चहुँ श्रुति ना प्रभाऊ । कलि बिसेषि नहिं आन उपाऊ ॥

॥ दोहा ॥

सकल कामना हीन जे राम भगति रस लीन ।

नाम सुप्रेम पियूष हद तिन्हहुँ किए मन मीन ॥22॥

॥ चौपाई ॥

अगुन सगुन दुइ ब्रह्म सरूपा । अकथ अगाध अनादि अनूपा ॥

मोरें मत बड़ नामु दुहू तें । किए जेहिं जुग निज बस निज बूतें ॥

प्रोढ़ि सुजन जनि जानहिं जन की । कहउँ प्रतीति प्रीति रुचि मन की ॥

एकु दारुगत देखिअ एकू । पावक सम जुग ब्रह्म बिबेकू ॥

उभय अगम जुग सुगम नाम तें । कहेउँ नामु बड़ ब्रह्म राम तें ॥

ब्यापकु एकु ब्रह्म अबिनासी । सत चेतन धन आनँद रासी ॥

अस प्रभु हृदयँ अछत अबिकारी । सकल जीव जग दीन दुखारी ॥

नाम निरूपन नाम जतन तें । सोउ प्रगटत जिमि मोल रतन तें ॥

॥ दोहा ॥

निरगुन तें एहि भाँति बड़ नाम प्रभाउ अपार ।

कहउँ नामु बड़ राम तें निज बिचार अनुसार ॥23॥

॥ चौपाई ॥

राम भगत हित नर तनु धारी । सहि संकट किए साधु सुखारी ॥

नामु सप्रेम जपत अनयासा । भगत होहिं मुद मंगल बासा ॥

राम एक तापस तिय तारी । नाम कोटि खल कुमति सुधारी ॥

रिषि हित राम सुकेतुसुता की । सहित सेन सुत कीन्ह बिबाकी ॥

सहित दोष दुख दास दुरासा । दलइ नामु जिमि रबि निसि नासा ॥

भंजेउ राम आपु भव चापू । भव भय भंजन नाम प्रतापू ॥

दंडक बनु प्रभु कीन्ह सुहावन । जन मन अमित नाम किए पावन ॥ ।

निसिचर निकर दले रघुनंदन । नामु सकल कलि कलुष निकंदन ॥

॥ दोहा ॥

सबरी गीध सुसेवकनि सुगति दीन्हि रघुनाथ ।

नाम उधारे अमित खल बेद बिदित गुन गाथ ॥24॥

॥ चौपाई ॥

राम सुकंठ बिभीषन दोऊ । राखे सरन जान सबु कोऊ ॥

नाम गरीब अनेक नेवाजे । लोक बेद बर बिरिद बिराजे ॥

राम भालु कपि कटकु बटोरा । सेतु हेतु श्रमु कीन्ह न थोरा ॥

नामु लेत भवसिंधु सुखाहीं । करहु बिचारु सुजन मन माहीं ॥

राम सकुल रन रावनु मारा । सीय सहित निज पुर पगु धारा ॥

राजा रामु अवध रजधानी । गावत गुन सुर मुनि बर बानी ॥

सेवक सुमिरत नामु सप्रीती । बिनु श्रम प्रबल मोह दलु जीती ॥

फिरत सनेहँ मगन सुख अपनें । नाम प्रसाद सोच नहिं सपनें ॥

॥ दोहा ॥

ब्रह्म राम तें नामु बड़ बर दायक बर दानि ।

रामचरित सत कोटि महँ लिय महेस जियँ जानि ॥25॥

मासपारायण, पहला विश्राम

॥ चौपाई ॥

नाम प्रसाद संभु अबिनासी । साजु अमंगल मंगल रासी ॥

सुक सनकादि सिद्ध मुनि जोगी । नाम प्रसाद ब्रह्मसुख भोगी ॥

नारद जानेउ नाम प्रतापू । जग प्रिय हरि हरि हर प्रिय आपू ॥

नामु जपत प्रभु कीन्ह प्रसादू । भगत सिरोमनि भे प्रहलादू ॥

ध्रुवँ सगलानि जपेउ हरि नाऊँ । पायउ अचल अनूपम ठाऊँ ॥

सुमिरि पवनसुत पावन नामू । अपने बस करि राखे रामू ॥

अपतु अजामिलु गजु गनिकाऊ । भए मुकुत हरि नाम प्रभाऊ ॥

कहौं कहाँ लगि नाम बड़ाई । रामु न सकहिं नाम गुन गाई ॥

॥ दोहा ॥

नामु राम को कलपतरु कलि कल्यान निवासु ।

जो सुमिरत भयो भाँग तें तुलसी तुलसीदासु ॥26॥

॥ चौपाई ॥

चहुँ जुग तीनि काल तिहुँ लोका । भए नाम जपि जीव बिसोका ॥

बेद पुरान संत मत एहू । सकल सुकृत फल राम सनेहू ॥

ध्यानु प्रथम जुग मखबिधि दूजें । द्वापर परितोषत प्रभु पूजें ॥

कलि केवल मल मूल मलीना । पाप पयोनिधि जन जन मीना ॥

नाम कामतरु काल कराला । सुमिरत समन सकल जग जाला ॥

राम नाम कलि अभिमत दाता । हित परलोक लोक पितु माता ॥

नहिं कलि करम न भगति बिबेकू । राम नाम अवलंबन एकू ॥

कालनेमि कलि कपट निधानू । नाम सुमति समरथ हनुमानू ॥

॥ दोहा ॥

राम नाम नरकेसरी कनककसिपु कलिकाल ।

जापक जन प्रहलाद जिमि पालिहि दलि सुरसाल ॥27॥

॥ चौपाई ॥

भायँ कुभायँ अनख आलसहूँ । नाम जपत मंगल दिसि दसहूँ ॥

सुमिरि सो नाम राम गुन गाथा । करउँ नाइ रघुनाथहि माथा ॥

मोरि सुधारिहि सो सब भाँती । जासु कृपा नहिं कृपाँ अघाती ॥

राम सुस्वामि कुसेवकु मोसो । निज दिसि दैखि दयानिधि पोसो ॥

लोकहुँ बेद सुसाहिब रीतीं । बिनय सुनत पहिचानत प्रीती ॥

गनी गरीब ग्रामनर नागर । पंडित मूढ़ मलीन उजागर ॥

सुकबि कुकबि निज मति अनुहारी । नृपहि सराहत सब नर नारी ॥

साधु सुजान सुसील नृपाला । ईस अंस भव परम कृपाला ॥

सुनि सनमानहिं सबहि सुबानी । भनिति भगति नति गति पहिचानी ॥

यह प्राकृत महिपाल सुभाऊ । जान सिरोमनि कोसलराऊ ॥

रीझत राम सनेह निसोतें । को जग मंद मलिनमति मोतें ॥

॥ दोहा ॥

सठ सेवक की प्रीति रुचि रखिहहिं राम कृपालु ।

उपल किए जलजान जेहिं सचिव सुमति कपि भालु ॥28(क)॥

हौहु कहावत सबु कहत राम सहत उपहास ।

साहिब सीतानाथ सो सेवक तुलसीदास ॥28(ख) ॥

॥ चौपाई ॥

अति बड़ि मोरि ढिठाई खोरी । सुनि अघ नरकहुँ नाक सकोरी ॥

समुझि सहम मोहि अपडर अपनें । सो सुधि राम कीन्हि नहिं सपनें ॥

सुनि अवलोकि सुचित चख चाही । भगति मोरि मति स्वामि सराही ॥

कहत नसाइ होइ हियँ नीकी । रीझत राम जानि जन जी की ॥

रहति न प्रभु चित चूक किए की । करत सुरति सय बार हिए की ॥

जेहिं अघ बधेउ ब्याध जिमि बाली । फिरि सुकंठ सोइ कीन्ह कुचाली ॥

सोइ करतूति बिभीषन केरी । सपनेहुँ सो न राम हियँ हेरी ॥

ते भरतहि भेंटत सनमाने । राजसभाँ रघुबीर बखाने ॥

॥ दोहा ॥

प्रभु तरु तर कपि डार पर ते किए आपु समान ॥

तुलसी कहूँ न राम से साहिब सीलनिधान ॥29(क)॥

राम निकाईं रावरी है सबही को नीक ।

जों यह साँची है सदा तौ नीको तुलसीक ॥29(ख)॥

एहि बिधि निज गुन दोष कहि सबहि बहुरि सिरु नाइ ।

बरनउँ रघुबर बिसद जसु सुनि कलि कलुष नसाइ ॥29(ग)॥

॥ चौपाई ॥

जागबलिक जो कथा सुहाई । भरद्वाज मुनिबरहि सुनाई ॥

कहिहउँ सोइ संबाद बखानी । सुनहुँ सकल सज्जन सुखु मानी ॥

संभु कीन्ह यह चरित सुहावा । बहुरि कृपा करि उमहि सुनावा ॥

सोइ सिव कागभुसुंडिहि दीन्हा । राम भगत अधिकारी चीन्हा ॥

तेहि सन जागबलिक पुनि पावा । तिन्ह पुनि भरद्वाज प्रति गावा ॥

ते श्रोता बकता समसीला । सवँदरसी जानहिं हरिलीला ॥

जानहिं तीनि काल निज ग्याना । करतल गत आमलक समाना ॥

औरउ जे हरिभगत सुजाना । कहहिं सुनहिं समुझहिं बिधि नाना ॥

॥ दोहा ॥

मै पुनि निज गुर सन सुनी कथा सो सूकरखेत ।

समुझी नहि तसि बालपन तब अति रहेउँ अचेत ॥30(क)॥

श्रोता बकता ग्याननिधि कथा राम कै गूढ़ ।

किमि समुझौं मै जीव जड़ कलि मल ग्रसित बिमूढ़ ॥30(ख)

॥ चौपाई ॥

तदपि कही गुर बारहिं बारा । समुझि परी कछु मति अनुसारा ॥

भाषाबद्ध करबि मैं सोई । मोरें मन प्रबोध जेहिं होई ॥

जस कछु बुधि बिबेक बल मेरें । तस कहिहउँ हियँ हरि के प्रेरें ॥

निज संदेह मोह भ्रम हरनी । करउँ कथा भव सरिता तरनी ॥

बुध बिश्राम सकल जन रंजनि । रामकथा कलि कलुष बिभंजनि ॥

रामकथा कलि पंनग भरनी । पुनि बिबेक पावक कहुँ अरनी ॥

रामकथा कलि कामद गाई । सुजन सजीवनि मूरि सुहाई ॥

सोइ बसुधातल सुधा तरंगिनि । भय भंजनि भ्रम भेक भुअंगिनि ॥

असुर सेन सम नरक निकंदिनि । साधु बिबुध कुल हित गिरिनंदिनि ॥

संत समाज पयोधि रमा सी । बिस्व भार भर अचल छमा सी ॥

जम गन मुहँ मसि जग जमुना सी । जीवन मुकुति हेतु जनु कासी ॥

रामहि प्रिय पावनि तुलसी सी । तुलसिदास हित हियँ हुलसी सी ॥

सिवप्रय मेकल सैल सुता सी । सकल सिद्धि सुख संपति रासी ॥

सदगुन सुरगन अंब अदिति सी । रघुबर भगति प्रेम परमिति सी ॥

॥ दोहा ॥

राम कथा मंदाकिनी चित्रकूट चित चारु ।

तुलसी सुभग सनेह बन सिय रघुबीर बिहारु ॥31॥

॥ चौपाई ॥

राम चरित चिंतामनि चारू । संत सुमति तिय सुभग सिंगारू ॥

जग मंगल गुन ग्राम राम के । दानि मुकुति धन धरम धाम के ॥

सदगुर ग्यान बिराग जोग के । बिबुध बैद भव भीम रोग के ॥

जननि जनक सिय राम प्रेम के । बीज सकल ब्रत धरम नेम के ॥

समन पाप संताप सोक के । प्रिय पालक परलोक लोक के ॥

सचिव सुभट भूपति बिचार के । कुंभज लोभ उदधि अपार के ॥

काम कोह कलिमल करिगन के । केहरि सावक जन मन बन के ॥

अतिथि पूज्य प्रियतम पुरारि के । कामद घन दारिद दवारि के ॥

मंत्र महामनि बिषय ब्याल के । मेटत कठिन कुअंक भाल के ॥

हरन मोह तम दिनकर कर से । सेवक सालि पाल जलधर से ॥

अभिमत दानि देवतरु बर से । सेवत सुलभ सुखद हरि हर से ॥

सुकबि सरद नभ मन उडगन से । रामभगत जन जीवन धन से ॥

सकल सुकृत फल भूरि भोग से । जग हित निरुपधि साधु लोग से ॥

सेवक मन मानस मराल से । पावक गंग तंरग माल से ॥

॥ दोहा ॥

कुपथ कुतरक कुचालि कलि कपट दंभ पाषंड ।

दहन राम गुन ग्राम जिमि इंधन अनल प्रचंड ॥32(क)॥

रामचरित राकेस कर सरिस सुखद सब काहु ।

सज्जन कुमुद चकोर चित हित बिसेषि बड़ लाहु ॥32(ख)॥

॥ चौपाई ॥

कीन्हि प्रस्न जेहि भाँति भवानी । जेहि बिधि संकर कहा बखानी ॥

सो सब हेतु कहब मैं गाई । कथाप्रबंध बिचित्र बनाई ॥

जेहि यह कथा सुनी नहिं होई । जनि आचरजु करैं सुनि सोई ॥

कथा अलौकिक सुनहिं जे ग्यानी । नहिं आचरजु करहिं अस जानी ॥

रामकथा कै मिति जग नाहीं । असि प्रतीति तिन्ह के मन माहीं ॥

नाना भाँति राम अवतारा । रामायन सत कोटि अपारा ॥

कलपभेद हरिचरित सुहाए । भाँति अनेक मुनीसन्ह गाए ॥

करिअ न संसय अस उर आनी । सुनिअ कथा सारद रति मानी ॥

॥ दोहा ॥

राम अनंत अनंत गुन अमित कथा बिस्तार ।

सुनि आचरजु न मानिहहिं जिन्ह कें बिमल बिचार ॥33॥

॥ चौपाई ॥

एहि बिधि सब संसय करि दूरी । सिर धरि गुर पद पंकज धूरी ॥

पुनि सबही बिनवउँ कर जोरी । करत कथा जेहिं लाग न खोरी ॥

सादर सिवहि नाइ अब माथा । बरनउँ बिसद राम गुन गाथा ॥

संबत सोरह सै एकतीसा । करउँ कथा हरि पद धरि सीसा ॥

नौमी भौम बार मधु मासा । अवधपुरीं यह चरित प्रकासा ॥

जेहि दिन राम जनम श्रुति गावहिं । तीरथ सकल तहाँ चलि आवहिं ॥

असुर नाग खग नर मुनि देवा । आइ करहिं रघुनायक सेवा ॥

जन्म महोत्सव रचहिं सुजाना । करहिं राम कल कीरति गाना ॥

॥ दोहा ॥

मज्जहि सज्जन बृंद बहु पावन सरजू नीर ।

जपहिं राम धरि ध्यान उर सुंदर स्याम सरीर ॥34॥

॥ चौपाई ॥

दरस परस मज्जन अरु पाना । हरइ पाप कह बेद पुराना ॥

नदी पुनीत अमित महिमा अति । कहि न सकइ सारद बिमलमति ॥

राम धामदा पुरी सुहावनि । लोक समस्त बिदित अति पावनि ॥

चारि खानि जग जीव अपारा । अवध तजे तनु नहि संसारा ॥

सब बिधि पुरी मनोहर जानी । सकल सिद्धिप्रद मंगल खानी ॥

बिमल कथा कर कीन्ह अरंभा । सुनत नसाहिं काम मद दंभा ॥

रामचरितमानस एहि नामा । सुनत श्रवन पाइअ बिश्रामा ॥

मन करि विषय अनल बन जरई । होइ सुखी जौ एहिं सर परई ॥

रामचरितमानस मुनि भावन । बिरचेउ संभु सुहावन पावन ॥

त्रिबिध दोष दुख दारिद दावन । कलि कुचालि कुलि कलुष नसावन ॥

रचि महेस निज मानस राखा । पाइ सुसमउ सिवा सन भाषा ॥

तातें रामचरितमानस बर । धरेउ नाम हियँ हेरि हरषि हर ॥

कहउँ कथा सोइ सुखद सुहाई । सादर सुनहु सुजन मन लाई ॥

॥ दोहा ॥

जस मानस जेहि बिधि भयउ जग प्रचार जेहि हेतु ।

अब सोइ कहउँ प्रसंग सब सुमिरि उमा बृषकेतु ॥35॥

॥ चौपाई ॥

संभु प्रसाद सुमति हियँ हुलसी । रामचरितमानस कबि तुलसी ॥

करइ मनोहर मति अनुहारी । सुजन सुचित सुनि लेहु सुधारी ॥

सुमति भूमि थल हृदय अगाधू । बेद पुरान उदधि घन साधू ॥

बरषहिं राम सुजस बर बारी । मधुर मनोहर मंगलकारी ॥

लीला सगुन जो कहहिं बखानी । सोइ स्वच्छता करइ मल हानी ॥

प्रेम भगति जो बरनि न जाई । सोइ मधुरता सुसीतलताई ॥

सो जल सुकृत सालि हित होई । राम भगत जन जीवन सोई ॥

मेधा महि गत सो जल पावन । सकिलि श्रवन मग चलेउ सुहावन ॥

भरेउ सुमानस सुथल थिराना । सुखद सीत रुचि चारु चिराना ॥

॥ दोहा ॥

सुठि सुंदर संबाद बर बिरचे बुद्धि बिचारि ।

तेइ एहि पावन सुभग सर घाट मनोहर चारि ॥36॥

॥ चौपाई ॥

सप्त प्रबन्ध सुभग सोपाना । ग्यान नयन निरखत मन माना ॥

रघुपति महिमा अगुन अबाधा । बरनब सोइ बर बारि अगाधा ॥

राम सीय जस सलिल सुधासम । उपमा बीचि बिलास मनोरम ॥

पुरइनि सघन चारु चौपाई । जुगुति मंजु मनि सीप सुहाई ॥

छंद सोरठा सुंदर दोहा । सोइ बहुरंग कमल कुल सोहा ॥

अरथ अनूप सुमाव सुभासा । सोइ पराग मकरंद सुबासा ॥

सुकृत पुंज मंजुल अलि माला । ग्यान बिराग बिचार मराला ॥

धुनि अवरेब कबित गुन जाती । मीन मनोहर ते बहुभाँती ॥

अरथ धरम कामादिक चारी । कहब ग्यान बिग्यान बिचारी ॥

नव रस जप तप जोग बिरागा । ते सब जलचर चारु तड़ागा ॥

सुकृती साधु नाम गुन गाना । ते बिचित्र जल बिहग समाना ॥

संतसभा चहुँ दिसि अवँराई । श्रद्धा रितु बसंत सम गाई ॥

भगति निरुपन बिबिध बिधाना । छमा दया दम लता बिताना ॥

सम जम नियम फूल फल ग्याना । हरि पत रति रस बेद बखाना ॥

औरउ कथा अनेक प्रसंगा । तेइ सुक पिक बहुबरन बिहंगा ॥

॥ दोहा ॥

पुलक बाटिका बाग बन सुख सुबिहंग बिहारु ।

माली सुमन सनेह जल सींचत लोचन चारु ॥37॥

॥ चौपाई ॥

जे गावहिं यह चरित सँभारे । तेइ एहि ताल चतुर रखवारे ॥

सदा सुनहिं सादर नर नारी । तेइ सुरबर मानस अधिकारी ॥

अति खल जे बिषई बग कागा । एहिं सर निकट न जाहिं अभागा ॥

संबुक भेक सेवार समाना । इहाँ न बिषय कथा रस नाना ॥

तेहि कारन आवत हियँ हारे । कामी काक बलाक बिचारे ॥

आवत एहिं सर अति कठिनाई । राम कृपा बिनु आइ न जाई ॥

कठिन कुसंग कुपंथ कराला । तिन्ह के बचन बाघ हरि ब्याला ॥

गृह कारज नाना जंजाला । ते अति दुर्गम सैल बिसाला ॥

बन बहु बिषम मोह मद माना । नदीं कुतर्क भयंकर नाना ॥

॥ दोहा ॥

जे श्रद्धा संबल रहित नहि संतन्ह कर साथ ।

तिन्ह कहुँ मानस अगम अति जिन्हहि न प्रिय रघुनाथ ॥38॥

॥ चौपाई ॥

जौं करि कष्ट जाइ पुनि कोई । जातहिं नींद जुड़ाई होई ॥

जड़ता जाड़ बिषम उर लागा । गएहुँ न मज्जन पाव अभागा ॥

करि न जाइ सर मज्जन पाना । फिरि आवइ समेत अभिमाना ॥

जौं बहोरि कोउ पूछन आवा । सर निंदा करि ताहि बुझावा ॥

सकल बिघ्न ब्यापहि नहिं तेही । राम सुकृपाँ बिलोकहिं जेही ॥

सोइ सादर सर मज्जनु करई । महा घोर त्रयताप न जरई ॥

ते नर यह सर तजहिं न काऊ । जिन्ह के राम चरन भल भाऊ ॥

जो नहाइ चह एहिं सर भाई । सो सतसंग करउ मन लाई ॥

अस मानस मानस चख चाही । भइ कबि बुद्धि बिमल अवगाही ॥

भयउ हृदयँ आनंद उछाहू । उमगेउ प्रेम प्रमोद प्रबाहू ॥

चली सुभग कबिता सरिता सो । राम बिमल जस जल भरिता सो ॥

सरजू नाम सुमंगल मूला । लोक बेद मत मंजुल कूला ॥

नदी पुनीत सुमानस नंदिनि । कलिमल तृन तरु मूल निकंदिनि ॥

॥ दोहा ॥

श्रोता त्रिबिध समाज पुर ग्राम नगर दुहुँ कूल ।

संतसभा अनुपम अवध सकल सुमंगल मूल ॥39॥

॥ चौपाई ॥

रामभगति सुरसरितहि जाई । मिली सुकीरति सरजु सुहाई ॥

सानुज राम समर जसु पावन । मिलेउ महानदु सोन सुहावन ॥

जुग बिच भगति देवधुनि धारा । सोहति सहित सुबिरति बिचारा ॥

त्रिबिध ताप त्रासक तिमुहानी । राम सरुप सिंधु समुहानी ॥

मानस मूल मिली सुरसरिही । सुनत सुजन मन पावन करिही ॥

बिच बिच कथा बिचित्र बिभागा । जनु सरि तीर तीर बन बागा ॥

उमा महेस बिबाह बराती । ते जलचर अगनित बहुभाँती ॥

रघुबर जनम अनंद बधाई । भवँर तरंग मनोहरताई ॥

॥ दोहा ॥

बालचरित चहु बंधु के बनज बिपुल बहुरंग ।

नृप रानी परिजन सुकृत मधुकर बारिबिहंग ॥40॥

॥ चौपाई ॥

सीय स्वयंबर कथा सुहाई । सरित सुहावनि सो छबि छाई ॥

नदी नाव पटु प्रस्न अनेका । केवट कुसल उतर सबिबेका ॥

सुनि अनुकथन परस्पर होई । पथिक समाज सोह सरि सोई ॥

घोर धार भृगुनाथ रिसानी । घाट सुबद्ध राम बर बानी ॥

सानुज राम बिबाह उछाहू । सो सुभ उमग सुखद सब काहू ॥

कहत सुनत हरषहिं पुलकाहीं । ते सुकृती मन मुदित नहाहीं ॥

राम तिलक हित मंगल साजा । परब जोग जनु जुरे समाजा ॥

काई कुमति केकई केरी । परी जासु फल बिपति घनेरी ॥

॥ दोहा ॥

समन अमित उतपात सब भरतचरित जपजाग ।

कलि अघ खल अवगुन कथन ते जलमल बग काग ॥41॥

॥ चौपाई ॥

कीरति सरित छहूँ रितु रूरी । समय सुहावनि पावनि भूरी ॥

हिम हिमसैलसुता सिव ब्याहू । सिसिर सुखद प्रभु जनम उछाहू ॥

बरनब राम बिबाह समाजू । सो मुद मंगलमय रितुराजू ॥

ग्रीषम दुसह राम बनगवनू । पंथकथा खर आतप पवनू ॥

बरषा घोर निसाचर रारी । सुरकुल सालि सुमंगलकारी ॥

राम राज सुख बिनय बड़ाई । बिसद सुखद सोइ सरद सुहाई ॥

सती सिरोमनि सिय गुनगाथा । सोइ गुन अमल अनूपम पाथा ॥

भरत सुभाउ सुसीतलताई । सदा एकरस बरनि न जाई ॥

॥ दोहा ॥

अवलोकनि बोलनि मिलनि प्रीति परसपर हास ।

भायप भलि चहु बंधु की जल माधुरी सुबास ॥42॥

॥ चौपाई ॥

आरति बिनय दीनता मोरी । लघुता ललित सुबारि न थोरी ॥

अदभुत सलिल सुनत गुनकारी । आस पिआस मनोमल हारी ॥

राम सुप्रेमहि पोषत पानी । हरत सकल कलि कलुष गलानौ ॥

भव श्रम सोषक तोषक तोषा । समन दुरित दुख दारिद दोषा ॥

काम कोह मद मोह नसावन । बिमल बिबेक बिराग बढ़ावन ॥

सादर मज्जन पान किए तें । मिटहिं पाप परिताप हिए तें ॥

जिन्ह एहि बारि न मानस धोए । ते कायर कलिकाल बिगोए ॥

तृषित निरखि रबि कर भव बारी । फिरिहहि मृग जिमि जीव दुखारी ॥

॥ दोहा ॥

मति अनुहारि सुबारि गुन गनि मन अन्हवाइ ।

सुमिरि भवानी संकरहि कह कबि कथा सुहाइ ॥43(क)॥

अब रघुपति पद पंकरुह हियँ धरि पाइ प्रसाद ।

कहउँ जुगल मुनिबर्ज कर मिलन सुभग संबाद ॥43(ख)॥

॥ चौपाई ॥

भरद्वाज मुनि बसहिं प्रयागा । तिन्हहि राम पद अति अनुरागा ॥

तापस सम दम दया निधाना । परमारथ पथ परम सुजाना ॥

माघ मकरगत रबि जब होई । तीरथपतिहिं आव सब कोई ॥

देव दनुज किंनर नर श्रेनी । सादर मज्जहिं सकल त्रिबेनीं ॥

पूजहि माधव पद जलजाता । परसि अखय बटु हरषहिं गाता ॥

भरद्वाज आश्रम अति पावन । परम रम्य मुनिबर मन भावन ॥

तहाँ होइ मुनि रिषय समाजा । जाहिं जे मज्जन तीरथराजा ॥

मज्जहिं प्रात समेत उछाहा । कहहिं परसपर हरि गुन गाहा ॥

॥ दोहा ॥

ब्रह्म निरूपम धरम बिधि बरनहिं तत्त्व बिभाग ।

कहहिं भगति भगवंत कै संजुत ग्यान बिराग ॥44॥

॥ चौपाई ॥

एहि प्रकार भरि माघ नहाहीं । पुनि सब निज निज आश्रम जाहीं ॥

प्रति संबत अति होइ अनंदा । मकर मज्जि गवनहिं मुनिबृंदा ॥

एक बार भरि मकर नहाए । सब मुनीस आश्रमन्ह सिधाए ॥

जगबालिक मुनि परम बिबेकी । भरव्दाज राखे पद टेकी ॥

सादर चरन सरोज पखारे । अति पुनीत आसन बैठारे ॥

करि पूजा मुनि सुजस बखानी । बोले अति पुनीत मृदु बानी ॥

नाथ एक संसउ बड़ मोरें । करगत बेदतत्व सबु तोरें ॥

कहत सो मोहि लागत भय लाजा । जौ न कहउँ बड़ होइ अकाजा ॥

॥ दोहा ॥

संत कहहि असि नीति प्रभु श्रुति पुरान मुनि गाव ।

होइ न बिमल बिबेक उर गुर सन किएँ दुराव ॥45॥

॥ चौपाई ॥

अस बिचारि प्रगटउँ निज मोहू । हरहु नाथ करि जन पर छोहू ॥

रास नाम कर अमित प्रभावा । संत पुरान उपनिषद गावा ॥

संतत जपत संभु अबिनासी । सिव भगवान ग्यान गुन रासी ॥

आकर चारि जीव जग अहहीं । कासीं मरत परम पद लहहीं ॥

सोपि राम महिमा मुनिराया । सिव उपदेसु करत करि दाया ॥

रामु कवन प्रभु पूछउँ तोही । कहिअ बुझाइ कृपानिधि मोही ॥

एक राम अवधेस कुमारा । तिन्ह कर चरित बिदित संसारा ॥

नारि बिरहँ दुखु लहेउ अपारा । भयहु रोषु रन रावनु मारा ॥

॥ दोहा ॥

प्रभु सोइ राम कि अपर कोउ जाहि जपत त्रिपुरारि ।

सत्यधाम सर्बग्य तुम्ह कहहु बिबेकु बिचारि ॥46॥

॥ चौपाई ॥

जैसे मिटै मोर भ्रम भारी । कहहु सो कथा नाथ बिस्तारी ॥

जागबलिक बोले मुसुकाई । तुम्हहि बिदित रघुपति प्रभुताई ॥

राममगत तुम्ह मन क्रम बानी । चतुराई तुम्हारी मैं जानी ॥

चाहहु सुनै राम गुन गूढ़ा । कीन्हिहु प्रस्न मनहुँ अति मूढ़ा ॥

तात सुनहु सादर मनु लाई । कहउँ राम कै कथा सुहाई ॥

महामोहु महिषेसु बिसाला । रामकथा कालिका कराला ॥

रामकथा ससि किरन समाना । संत चकोर करहिं जेहि पाना ॥

ऐसेइ संसय कीन्ह भवानी । महादेव तब कहा बखानी ॥

॥ दोहा ॥

कहउँ सो मति अनुहारि अब उमा संभु संबाद ।

भयउ समय जेहि हेतु जेहि सुनु मुनि मिटिहि बिषाद ॥47॥

॥ चौपाई ॥

एक बार त्रेता जुग माहीं । संभु गए कुंभज रिषि पाहीं ॥

संग सती जगजननि भवानी । पूजे रिषि अखिलेस्वर जानी ॥

रामकथा मुनीबर्ज बखानी । सुनी महेस परम सुखु मानी ॥

रिषि पूछी हरिभगति सुहाई । कही संभु अधिकारी पाई ॥

कहत सुनत रघुपति गुन गाथा । कछु दिन तहाँ रहे गिरिनाथा ॥

मुनि सन बिदा मागि त्रिपुरारी । चले भवन सँग दच्छकुमारी ॥

तेहि अवसर भंजन महिभारा । हरि रघुबंस लीन्ह अवतारा ॥

पिता बचन तजि राजु उदासी । दंडक बन बिचरत अबिनासी ॥

॥ दोहा ॥

ह्दयँ बिचारत जात हर केहि बिधि दरसनु होइ ।

गुप्त रुप अवतरेउ प्रभु गएँ जान सबु कोइ ॥48(क)॥

संकर उर अति छोभु सती न जानहिं मरमु सोइ ॥

तुलसी दरसन लोभु मन डरु लोचन लालची ॥48(ख)॥

॥ चौपाई ॥

रावन मरन मनुज कर जाचा । प्रभु बिधि बचनु कीन्ह चह साचा ॥

जौं नहिं जाउँ रहइ पछितावा । करत बिचारु न बनत बनावा ॥

एहि बिधि भए सोचबस ईसा । तेहि समय जाइ दससीसा ॥

लीन्ह नीच मारीचहि संगा । भयउ तुरत सोइ कपट कुरंगा ॥

करि छलु मूढ़ हरी बैदेही । प्रभु प्रभाउ तस बिदित न तेही ॥

मृग बधि बन्धु सहित हरि आए । आश्रमु देखि नयन जल छाए ॥

बिरह बिकल नर इव रघुराई । खोजत बिपिन फिरत दोउ भाई ॥

कबहूँ जोग बियोग न जाकें । देखा प्रगट बिरह दुख ताकें ॥

॥ दोहा ॥

अति विचित्र रघुपति चरित जानहिं परम सुजान ।

जे मतिमंद बिमोह बस हृदयँ धरहिं कछु आन ॥49॥

॥ चौपाई ॥

संभु समय तेहि रामहि देखा । उपजा हियँ अति हरपु बिसेषा ॥

भरि लोचन छबिसिंधु निहारी । कुसमय जानिन कीन्हि चिन्हारी ॥

जय सच्चिदानंद जग पावन । अस कहि चलेउ मनोज नसावन ॥

चले जात सिव सती समेता । पुनि पुनि पुलकत कृपानिकेता ॥

सतीं सो दसा संभु कै देखी । उर उपजा संदेहु बिसेषी ॥

संकरु जगतबंद्य जगदीसा । सुर नर मुनि सब नावत सीसा ॥

तिन्ह नृपसुतहि नह परनामा । कहि सच्चिदानंद परधमा ॥

भए मगन छबि तासु बिलोकी । अजहुँ प्रीति उर रहति न रोकी ॥

॥ दोहा ॥

ब्रह्म जो व्यापक बिरज अज अकल अनीह अभेद ।

सो कि देह धरि होइ नर जाहि न जानत वेद ॥ 50॥

॥ चौपाई ॥

बिष्नु जो सुर हित नरतनु धारी । सोउ सर्बग्य जथा त्रिपुरारी ॥

खोजइ सो कि अग्य इव नारी । ग्यानधाम श्रीपति असुरारी ॥

संभुगिरा पुनि मृषा न होई । सिव सर्बग्य जान सबु कोई ॥

अस संसय मन भयउ अपारा । होई न हृदयँ प्रबोध प्रचारा ॥

जद्यपि प्रगट न कहेउ भवानी । हर अंतरजामी सब जानी ॥

सुनहि सती तव नारि सुभाऊ । संसय अस न धरिअ उर काऊ ॥

जासु कथा कुभंज रिषि गाई । भगति जासु मैं मुनिहि सुनाई ॥

सोउ मम इष्टदेव रघुबीरा । सेवत जाहि सदा मुनि धीरा ॥

॥ छन्द ॥

मुनि धीर जोगी सिद्ध संतत बिमल मन जेहि ध्यावहीं ।

कहि नेति निगम पुरान आगम जासु कीरति गावहीं ॥

सोइ रामु ब्यापक ब्रह्म भुवन निकाय पति माया धनी ।

अवतरेउ अपने भगत हित निजतंत्र नित रघुकुलमनि ॥

॥ सोरठा ॥

लाग न उर उपदेसु जदपि कहेउ सिवँ बार बहु ।

बोले बिहसि महेसु हरिमाया बलु जानि जियँ ॥51॥

॥ चौपाई ॥

जौं तुम्हरें मन अति संदेहू । तौ किन जाइ परीछा लेहू ॥

तब लगि बैठ अहउँ बटछाहिं । जब लगि तुम्ह ऐहहु मोहि पाही ॥

जैसें जाइ मोह भ्रम भारी । करेहु सो जतनु बिबेक बिचारी ॥

चलीं सती सिव आयसु पाई । करहिं बिचारु करौं का भाई ॥

इहाँ संभु अस मन अनुमाना । दच्छसुता कहुँ नहिं कल्याना ॥

मोरेहु कहें न संसय जाहीं । बिधी बिपरीत भलाई नाहीं ॥

होइहि सोइ जो राम रचि राखा । को करि तर्क बढ़ावै साखा ॥

अस कहि लगे जपन हरिनामा । गई सती जहँ प्रभु सुखधामा ॥

॥ दोहा ॥

पुनि पुनि हृदयँ विचारु करि धरि सीता कर रुप ।

आगें होइ चलि पंथ तेहि जेहिं आवत नरभूप ॥52॥

॥ चौपाई ॥

लछिमन दीख उमाकृत बेषा चकित भए भ्रम हृदयँ बिसेषा ॥

कहि न सकत कछु अति गंभीरा । प्रभु प्रभाउ जानत मतिधीरा ॥

सती कपटु जानेउ सुरस्वामी । सबदरसी सब अंतरजामी ॥

सुमिरत जाहि मिटइ अग्याना । सोइ सरबग्य रामु भगवाना ॥

सती कीन्ह चह तहँहुँ दुराऊ । देखहु नारि सुभाव प्रभाऊ ॥

निज माया बलु हृदयँ बखानी । बोले बिहसि रामु मृदु बानी ॥

जोरि पानि प्रभु कीन्ह प्रनामू । पिता समेत लीन्ह निज नामू ॥

कहेउ बहोरि कहाँ बृषकेतू । बिपिन अकेलि फिरहु केहि हेतू ॥

॥ दोहा ॥

राम बचन मृदु गूढ़ सुनि उपजा अति संकोचु ।

सती सभीत महेस पहिं चलीं हृदयँ बड़ सोचु ॥53॥

॥ चौपाई ॥

मैं संकर कर कहा न माना । निज अग्यानु राम पर आना ॥

जाइ उतरु अब देहउँ काहा । उर उपजा अति दारुन दाहा ॥

जाना राम सतीं दुखु पावा । निज प्रभाउ कछु प्रगटि जनावा ॥

सतीं दीख कौतुकु मग जाता । आगें रामु सहित श्री भ्राता ॥

फिरि चितवा पाछें प्रभु देखा । सहित बंधु सिय सुंदर वेषा ॥

जहँ चितवहिं तहँ प्रभु आसीना । सेवहिं सिद्ध मुनीस प्रबीना ॥

देखे सिव बिधि बिष्नु अनेका । अमित प्रभाउ एक तें एका ॥

बंदत चरन करत प्रभु सेवा । बिबिध बेष देखे सब देवा ॥

॥ दोहा ॥

सती बिधात्री इंदिरा देखीं अमित अनूप ।

जेहिं जेहिं बेष अजादि सुर तेहि तेहि तन अनुरूप ॥54॥

॥ चौपाई ॥

देखे जहँ तहँ रघुपति जेते । सक्तिन्ह सहित सकल सुर तेते ॥

जीव चराचर जो संसारा । देखे सकल अनेक प्रकारा ॥

पूजहिं प्रभुहि देव बहु बेषा । राम रूप दूसर नहिं देखा ॥

अवलोके रघुपति बहुतेरे । सीता सहित न बेष घनेरे ॥

सोइ रघुबर सोइ लछिमनु सीता । देखि सती अति भई सभीता ॥

हृदय कंप तन सुधि कछु नाहीं । नयन मूदि बैठीं मग माहीं ॥

बहुरि बिलोकेउ नयन उघारी । कछु न दीख तहँ दच्छकुमारी ॥

पुनि पुनि नाइ राम पद सीसा । चलीं तहाँ जहँ रहे गिरीसा ॥

॥ दोहा ॥

गई समीप महेस तब हँसि पूछी कुसलात ।

लीन्ही परीछा कवन बिधि कहहु सत्य सब बात ॥55॥

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