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अयोध्याकाण्ड

अयोध्याकाण्ड

॥ श्रीगणेशायनमः ॥

श्रीजानकीवल्लभो विजयते

श्रीरामचरितमानस
द्वितीय सोपान
(अयोध्या-काण्ड)

॥ श्लोक ॥

यस्याङ्के च विभाति भूधरसुता देवापगा मस्तके

भाले बालविधुर्गले च गरलं यस्योरसि व्यालराट् ।

सोऽयं भूतिविभूषणः सुरवरः सर्वाधिपः सर्वदा

शर्वः सर्वगतः शिवः शशिनिभः श्रीशङ्करः पातु माम् ॥1॥

प्रसन्नतां या न गताभिषेकतस्तथा न मम्ले वनवासदुःखतः ।

मुखाम्बुजश्री रघुनन्दनस्य मे सदास्तु सा मञ्जुलमंगलप्रदा ॥2॥

नीलाम्बुजश्यामलकोमलाङ्गं सीतासमारोपितवामभागम् ।

पाणौ महासायकचारुचापं नमामि रामं रघुवंशनाथम् ॥3॥

॥ दोहा ॥

श्रीगुरु चरन सरोज रज निज मनु मुकुरु सुधारि ।

बरनउँ रघुबर बिमल जसु जो दायकु फल चारि ॥

॥ चौपाई ॥

जब तें रामु ब्याहि घर आए । नित नव मंगल मोद बधाए ॥

भुवन चारिदस भूधर भारी । सुकृत मेघ बरषहि सुख बारी ॥

रिधि सिधि संपति नदीं सुहाई । उमगि अवध अंबुधि कहुँ आई ॥

मनिगन पुर नर नारि सुजाती । सुचि अमोल सुंदर सब भाँती ॥

कहि न जाइ कछु नगर बिभूती । जनु एतनिअ बिरंचि करतूती ॥

सब बिधि सब पुर लोग सुखारी । रामचंद मुख चंदु निहारी ॥

मुदित मातु सब सखीं सहेली । फलित बिलोकि मनोरथ बेली ॥

राम रूपु गुनसीलु सुभाऊ । प्रमुदित होइ देखि सुनि राऊ ॥

॥ दोहा ॥

सब कें उर अभिलाषु अस कहहिं मनाइ महेसु ।

आप अछत जुबराज पद रामहि देउ नरेसु ॥1॥

॥ चौपाई ॥

एक समय सब सहित समाजा ।राजसभाँ रघुराजु बिराजा ॥

सकल सुकृत मूरति नरनाहू ।राम सुजसु सुनि अतिहि उछाहू ॥

नृप सब रहहिं कृपा अभिलाषें ।लोकप करहिं प्रीति रुख राखें ॥

तिभुवन तीनि काल जग माहीं ।भूरि भाग दसरथ सम नाहीं ॥

मंगलमूल रामु सुत जासू ।जो कछु कहिज थोर सबु तासू ॥

रायँ सुभायँ मुकुरु कर लीन्हा ।बदनु बिलोकि मुकुट सम कीन्हा ॥

श्रवन समीप भए सित केसा ।मनहुँ जरठपनु अस उपदेसा ॥

नृप जुबराज राम कहुँ देहू ।जीवन जनम लाहु किन लेहू ॥

॥ दोहा ॥

यह बिचारु उर आनि नृप सुदिनु सुअवसरु पाइ ।

प्रेम पुलकि तन मुदित मन गुरहि सुनायउ जाइ ॥2॥

॥ चौपाई ॥

कहइ भुआलु सुनिअ मुनिनायक ।भए राम सब बिधि सब लायक ॥

सेवक सचिव सकल पुरबासी ।जे हमारे अरि मित्र उदासी ॥

सबहि रामु प्रिय जेहि बिधि मोही ।प्रभु असीस जनु तनु धरि सोही ॥

बिप्र सहित परिवार गोसाईं ।करहिं छोहु सब रौरिहि नाई ॥

जे गुर चरन रेनु सिर धरहीं ।ते जनु सकल बिभव बस करहीं ॥

मोहि सम यहु अनुभयउ न दूजें ।सबु पायउँ रज पावनि पूजें ॥

अब अभिलाषु एकु मन मोरें ।पूजहि नाथ अनुग्रह तोरें ॥

मुनि प्रसन्न लखि सहज सनेहू ।कहेउ नरेस रजायसु देहू ॥

॥ दोहा ॥

राजन राउर नामु जसु सब अभिमत दातार ।

फल अनुगामी महिप मनि मन अभिलाषु तुम्हार ॥3॥

॥ चौपाई ॥

सब बिधि गुरु प्रसन्न जियँ जानी ।बोलेउ राउ रहँसि मृदु बानी ॥

नाथ रामु करिअहिं जुबराजू ।कहिअ कृपा करि करिअ समाजू ॥

मोहि अछत यहु होइ उछाहू ।लहहिं लोग सब लोचन लाहू ॥

प्रभु प्रसाद सिव सबइ निबाहीं ।यह लालसा एक मन माहीं ॥

पुनि न सोच तनु रहउ कि जाऊ ।जेहिं न होइ पाछें पछिताऊ ॥

सुनि मुनि दसरथ बचन सुहाए ।मंगल मोद मूल मन भाए ॥

सुनु नृप जासु बिमुख पछिताहीं ।जासु भजन बिनु जरनि न जाहीं ॥

भयउ तुम्हार तनय सोइ स्वामी ।रामु पुनीत प्रेम अनुगामी ॥

॥ दोहा ॥

बेगि बिलंबु न करिअ नृप साजिअ सबुइ समाजु ।

सुदिन सुमंगलु तबहिं जब रामु होहिं जुबराजु ॥4॥

॥ चौपाई ॥

मुदित महिपति मंदिर आए ।सेवक सचिव सुमंत्रु बोलाए ॥

कहि जयजीव सीस तिन्ह नाए ।भूप सुमंगल बचन सुनाए ॥

जौं पाँचहि मत लागै नीका ।करहु हरषि हियँ रामहि टीका ॥

मंत्री मुदित सुनत प्रिय बानी ।अभिमत बिरवँ परेउ जनु पानी ॥

बिनती सचिव करहि कर जोरी ।जिअहु जगतपति बरिस करोरी ॥

जग मंगल भल काजु बिचारा ।बेगिअ नाथ न लाइअ बारा ॥

नृपहि मोदु सुनि सचिव सुभाषा ।बढ़त बौंड़ जनु लही सुसाखा ॥

॥ दोहा ॥

कहेउ भूप मुनिराज कर जोइ जोइ आयसु होइ ।

राम राज अभिषेक हित बेगि करहु सोइ सोइ ॥5॥

॥ चौपाई ॥

हरषि मुनीस कहेउ मृदु बानी ।आनहु सकल सुतीरथ पानी ॥

औषध मूल फूल फल पाना ।कहे नाम गनि मंगल नाना ॥

चामर चरम बसन बहु भाँती ।रोम पाट पट अगनित जाती ॥

मनिगन मंगल बस्तु अनेका ।जो जग जोगु भूप अभिषेका ॥

बेद बिदित कहि सकल बिधाना ।कहेउ रचहु पुर बिबिध बिताना ॥

सफल रसाल पूगफल केरा ।रोपहु बीथिन्ह पुर चहुँ फेरा ॥

रचहु मंजु मनि चौकें चारू ।कहहु बनावन बेगि बजारू ॥

पूजहु गनपति गुर कुलदेवा ।सब बिधि करहु भूमिसुर सेवा ॥

॥ दोहा ॥

ध्वज पताक तोरन कलस सजहु तुरग रथ नाग ।

सिर धरि मुनिबर बचन सबु निज निज काजहिं लाग ॥6॥

॥ चौपाई ॥

जो मुनीस जेहि आयसु दीन्हा । सो तेहिं काजु प्रथम जनु कीन्हा ॥

बिप्र साधु सुर पूजत राजा ।करत राम हित मंगल काजा ॥

सुनत राम अभिषेक सुहावा ।बाज गहागह अवध बधावा ॥

राम सीय तन सगुन जनाए ।फरकहिं मंगल अंग सुहाए ॥

पुलकि सप्रेम परसपर कहहीं ।भरत आगमनु सूचक अहहीं ॥

भए बहुत दिन अति अवसेरी ।सगुन प्रतीति भेंट प्रिय केरी ॥

भरत सरिस प्रिय को जग माहीं ।इहइ सगुन फलु दूसर नाहीं ॥

रामहि बंधु सोच दिन राती ।अंडन्हि कमठ ह्रदउ जेहि भाँती ॥

॥ चौपाई ॥

एहि अवसर मंगलु परम ।सुनि रहँसेउ रनिवासु

सोभत लखि बिधु बढ़त । जनु बारिधि बीचि बिलासु ॥7॥

प्रथम जाइ जिन्ह बचन सुनाए । भूषन बसन भूरि तिन्ह पाए ॥

प्रेम पुलकि तन मन अनुरागीं । मंगल कलस सजन सब लागीं ॥

चौकें चारु सुमित्राँ पुरी । मनिमय बिबिध भाँति अति रुरी ॥

आनँद मगन राम महतारी । दिए दान बहु बिप्र हँकारी ॥

पूजीं ग्रामदेबि सुर नागा । कहेउ बहोरि देन बलिभागा ॥

जेहि बिधि होइ राम कल्यानू । देहु दया करि सो बरदानू ॥

गावहिं मंगल कोकिलबयनीं । बिधुबदनीं मृगसावकनयनीं ॥

॥ दोहा ॥

राम राज अभिषेकु ।सुनि हियँ हरषे नर नारि ।

लगे सुमंगल सजन सब बिधि अनुकूल बिचारि ॥8॥

॥ चौपाई ॥

तब नरनाहँ बसिष्ठु बोलाए । रामधाम सिख देन पठाए ॥

गुर आगमनु सुनत रघुनाथा । द्वार आइ पद नायउ माथा ॥

सादर अरघ देइ घर आने । सोरह भाँति पूजि सनमाने ॥

गहे चरन सिय सहित बहोरी । बोले रामु कमल कर जोरी ॥

सेवक सदन स्वामि आगमनू । मंगल मूल अमंगल दमनू ॥

तदपि उचित जनु बोलि सप्रीती । पठइअ काज नाथ असि नीती ॥

प्रभुता तजि प्रभु कीन्ह सनेहू । भयउ पुनीत आजु यहु गेहू ॥

आयसु होइ सो करौं गोसाई । सेवक लहइ स्वामि सेवकाई ॥

॥ दोहा ॥

सुनि सनेह साने बचन । मुनि रघुबरहि प्रसंस

राम कस न तुम्ह कहहु ।अस हंस बंस अवतंस ॥9॥

॥ चौपाई ॥

बरनि राम गुन सीलु सुभाऊ । बोले प्रेम पुलकि मुनिराऊ ॥

भूप सजेउ अभिषेक समाजू । चाहत देन तुम्हहि जुबराजू ॥

राम करहु सब संजम आजू । जौं बिधि कुसल निबाहै काजू ॥

गुरु सिख देइ राय पहिं गयउ । राम हृदयँ अस बिसमउ भयऊ ॥

जनमे एक संग सब भाई । भोजन सयन केलि लरिकाई ॥

करनबेध उपबीत बिआहा । संग संग सब भए उछाहा ॥

बिमल बंस यहु अनुचित एकू । बंधु बिहाइ बड़ेहि अभिषेकू ॥

प्रभु सप्रेम पछितानि सुहाई । हरउ भगत मन कै कुटिलाई ॥

॥ दोहा ॥

तेहि अवसर आए ।लखन मगन प्रेम आनंद ।

सनमाने प्रिय बचन ।कहि रघुकुल कैरव चंद ॥10॥

॥ चौपाई ॥

बाजहिं बाजने बिबिध बिधाना । पुर प्रमोदु नहिं जाइ बखाना ॥

भरत आगमनु सकल मनावहिं । आवहुँ बेगि नयन फलु पावहिं ॥

हाट बाट घर गलीं अथाई । कहहिं परसपर लोग लोगाई ॥

कालि लगन भलि केतिक बारा । पूजिहि बिधि अभिलाषु हमारा ॥

कनक सिंघासन सीय समेता । बैठहिं रामु होइ चित चेता ॥

सकल कहहिं कब होइहि काली । बिघन मनावहिं देव कुचाली ॥

तिन्हहि सोहाइ न अवध बधावा । चोरहि चंदिनि राति न भावा ॥

सारद बोलि बिनय सुर करहीं । बारहिं बार पाय लै परहीं ॥

॥ दोहा ॥

बिपति हमारि बिलोकि ।बड़ि मातु करिअ सोइ आजु ।

रामु जाहिं बन राजु ।तजि होइ सकल सुरकाजु ॥11॥

॥ चौपाई ॥

सुनि सुर बिनय ठाढ़ि पछिताती । भइउँ सरोज बिपिन हिमराती ॥

देखि देव पुनि कहहिं निहोरी । मातु तोहि नहिं थोरिउ खोरी ॥

बिसमय हरष रहित रघुराऊ । तुम्ह जानहु सब राम प्रभाऊ ॥

जीव करम बस सुख दुख भागी । जाइअ अवध देव हित लागी ॥

बार बार गहि चरन सँकोचौ । चली बिचारि बिबुध मति पोची ॥

ऊँच निवासु नीचि करतूती । देखि न सकहिं पराइ बिभूती ॥

आगिल काजु बिचारि बहोरी । करहहिं चाह कुसल कबि मोरी ॥

हरषि हृदयँ दसरथ पुर आई । जनु ग्रह दसा दुसह दुखदाई ॥

॥ दोहा ॥

नामु मंथरा मंदमति । चेरी कैकेइ केरि ।

अजस पेटारी ताहि करि । गई गिरा मति फेरि ॥12॥

॥ चौपाई ॥

दीख मंथरा नगरु बनावा । मंजुल मंगल बाज बधावा ॥

पूछेसि लोगन्ह काह उछाहू । राम तिलकु सुनि भा उर दाहू ॥

करइ बिचारु कुबुद्धि कुजाती । होइ अकाजु कवनि बिधि राती ॥

देखि लागि मधु कुटिल किराती । जिमि गवँ तकइ लेउँ केहि भाँती ॥

भरत मातु पहिं गइ बिलखानी । का अनमनि हसि कह हँसि रानी ॥

ऊतरु देइ न लेइ उसासू । नारि चरित करि ढारइ आँसू ॥

हँसि कह रानि गालु बड़ तोरें । दीन्ह लखन सिख अस मन मोरें ॥

तबहुँ न बोल चेरि बड़ि पापिनि । छाड़इ स्वास कारि जनु साँपिनि ॥

॥ दोहा ॥

सभय रानि कह कहसि । किन कुसल रामु महिपालु ।

लखनु भरतु रिपुदमनु ।सुनि भा कुबरी उर सालु ॥13॥

॥ चौपाई ॥

कत सिख देइ हमहि कोउ माई । गालु करब केहि कर बलु पाई ॥

रामहि छाड़ि कुसल केहि आजू । जेहि जनेसु देइ जुबराजू ॥

भयउ कौसिलहि बिधि अति दाहिन । देखत गरब रहत उर नाहिन ॥

देखेहु कस न जाइ सब सोभा । जो अवलोकि मोर मनु छोभा ॥

पूतु बिदेस न सोचु तुम्हारें । जानति हहु बस नाहु हमारें ॥

नीद बहुत प्रिय सेज तुराई । लखहु न भूप कपट चतुराई ॥

सुनि प्रिय बचन मलिन मनु जानी । झुकी रानि अब रहु अरगानी ॥

पुनि अस कबहुँ कहसि घरफोरी । तब धरि जीभ कढ़ावउँ तोरी ॥

॥ दोहा ॥

काने खोरे कूबरे । कुटिल कुचाली जानि

तिय बिसेषि पुनि चेरि । कहि भरतमातु मुसुकानि ॥14॥

॥ चौपाई ॥

प्रियबादिनि सिख दीन्हिउँ तोही । सपनेहुँ तो पर कोपु न मोही ॥

सुदिनु सुमंगल दायकु सोई । तोर कहा फुर जेहि दिन होई ॥

जेठ स्वामि सेवक लघु भाई । यह दिनकर कुल रीति सुहाई ॥

राम तिलकु जौं साँचेहुँ काली । देउँ मागु मन भावत आली ॥

कौसल्या सम सब महतारी । रामहि सहज सुभायँ पिआरी ॥

मो पर करहिं सनेहु बिसेषी । मैं करि प्रीति परीछा देखी ॥

जौं बिधि जनमु देइ करि छोहू । होहुँ राम सिय पूत पुतोहू ॥

प्रान तें अधिक रामु प्रिय मोरें । तिन्ह कें तिलक छोभु कस तोरें ॥

॥ दोहा ॥

भरत सपथ तोहि सत्य । कहु परिहरि कपट दुराउ ।

हरष समय बिसमउ ।करसि कारन मोहि सुनाउ ॥15॥

॥ चौपाई ॥

एकहिं बार आस सब पूजी । अब कछु कहब जीभ करि दूजी ॥

फोरै जोगु कपारु अभागा । भलेउ कहत दुख रउरेहि लागा ॥

कहहिं झूठि फुरि बात बनाई । ते प्रिय तुम्हहि करुइ मैं माई ॥

हमहुँ कहबि अब ठकुरसोहाती । नाहिं त मौन रहब दिनु राती ॥

करि कुरूप बिधि परबस कीन्हा । बवा सो लुनिअ लहिअ जो दीन्हा ॥

कोउ नृप होउ हमहि का हानी । चेरि छाड़ि अब होब कि रानी ॥

जारै जोगु सुभाउ हमारा । अनभल देखि न जाइ तुम्हारा ॥

तातें कछुक बात अनुसारी । छमिअ देबि बड़ि चूक हमारी ॥

॥ दोहा ॥

गूढ़ कपट प्रिय बचन । सुनि तीय अधरबुधि रानि

सुरमाया बस बैरिनिहि । सुह्द जानि पतिआनि ॥16॥

॥ चौपाई ॥

सादर पुनि पुनि पूँछति ओही । सबरी गान मृगी जनु मोही ॥

तसि मति फिरी अहइ जसि भाबी । रहसी चेरि घात जनु फाबी ॥

तुम्ह पूँछहु मैं कहत डेराऊँ । धरेउ मोर घरफोरी नाऊँ ॥

सजि प्रतीति बहुबिधि गढ़ि छोली । अवध साढ़साती तब बोली ॥

प्रिय सिय रामु कहा तुम्ह रानी । रामहि तुम्ह प्रिय सो फुरि बानी ॥

रहा प्रथम अब ते दिन बीते । समउ फिरें रिपु होहिं पिंरीते ॥

भानु कमल कुल पोषनिहारा । बिनु जल जारि करइ सोइ छारा ॥

जरि तुम्हारि चह सवति उखारी । रूँधहु करि उपाउ बर बारी ॥

॥ दोहा ॥

तुम्हहि न सोचु सोहाग । बल निज बस जानहु राउ

मन मलीन मुह मीठ । नृप राउर सरल सुभाउ ॥17॥

॥ चौपाई ॥

चतुर गँभीर राम महतारी । बीचु पाइ निज बात सँवारी ॥

पठए भरतु भूप ननिअउरें । राम मातु मत जानव रउरें ॥

सेवहिं सकल सवति मोहि नीकें । गरबित भरत मातु बल पी कें ॥

सालु तुम्हार कौसिलहि माई । कपट चतुर नहिं होइ जनाई ॥

राजहि तुम्ह पर प्रेमु बिसेषी । सवति सुभाउ सकइ नहिं देखी ॥

रची प्रंपचु भूपहि अपनाई । राम तिलक हित लगन धराई ॥

यह कुल उचित राम कहुँ टीका । सबहि सोहाइ मोहि सुठि नीका ॥

आगिलि बात समुझि डरु मोही । देउ दैउ फिरि सो फलु ओही ॥

॥ दोहा ॥

रचि पचि कोटिक । कुटिलपन कीन्हेसि कपट प्रबोधु ॥

कहिसि कथा सत सवति कै जेहि बिधि बाढ़ बिरोधु ॥18॥

॥ चौपाई ॥

भावी बस प्रतीति उर आई । पूँछ रानि पुनि सपथ देवाई ॥

का पूछहुँ तुम्ह अबहुँ न जाना । निज हित अनहित पसु पहिचाना ॥

भयउ पाखु दिन सजत समाजू । तुम्ह पाई सुधि मोहि सन आजू ॥

खाइअ पहिरिअ राज तुम्हारें । सत्य कहें नहिं दोषु हमारें ॥

जौं असत्य कछु कहब बनाई । तौ बिधि देइहि हमहि सजाई ॥

रामहि तिलक कालि जौं भयऊ ।þ तुम्ह कहुँ बिपति बीजु बिधि बयऊ ॥

रेख खँचाइ कहउँ बलु भाषी । भामिनि भइहु दूध कइ माखी ॥

जौं सुत सहित करहु सेवकाई । तौ घर रहहु न आन उपाई ॥

॥ दोहा ॥

कद्रूँ बिनतहि दीन्ह दुखु तुम्हहि कौसिलाँ देब ।

भरतु बंदिगृह सेइहहिं लखनु राम के नेब ॥19॥

॥ चौपाई ॥

कैकयसुता सुनत कटु बानी । कहि न सकइ कछु सहमि सुखानी ॥

तन पसेउ कदली जिमि काँपी । कुबरीं दसन जीभ तब चाँपी ॥

कहि कहि कोटिक कपट कहानी । धीरजु धरहु प्रबोधिसि रानी ॥

फिरा करमु प्रिय लागि कुचाली । बकिहि सराहइ मानि मराली ॥

सुनु मंथरा बात फुरि तोरी । दहिनि आँखि नित फरकइ मोरी ॥

दिन प्रति देखउँ राति कुसपने । कहउँ न तोहि मोह बस अपने ॥

काह करौ सखि सूध सुभाऊ । दाहिन बाम न जानउँ काऊ ॥

॥ दोहा ॥

अपने चलत न आजु लगि अनभल काहुक कीन्ह ।

केहिं अघ एकहि बार मोहि दैअँ दुसह दुखु दीन्ह ॥20॥

॥ चौपाई ॥

नैहर जनमु भरब बरु जाइ । जिअत न करबि सवति सेवकाई ॥

अरि बस दैउ जिआवत जाही । मरनु नीक तेहि जीवन चाही ॥

दीन बचन कह बहुबिधि रानी । सुनि कुबरीं तियमाया ठानी ॥

अस कस कहहु मानि मन ऊना । सुखु सोहागु तुम्ह कहुँ दिन दूना ॥

जेहिं राउर अति अनभल ताका । सोइ पाइहि यहु फलु परिपाका ॥

जब तें कुमत सुना मैं स्वामिनि । भूख न बासर नींद न जामिनि ॥

पूँछेउ गुनिन्ह रेख तिन्ह खाँची । भरत भुआल होहिं यह साँची ॥

भामिनि करहु त कहौं उपाऊ । है तुम्हरीं सेवा बस राऊ ॥

॥ दोहा ॥

परउँ कूप तुअ बचन पर सकउँ पूत पति त्यागि ।

कहसि मोर दुखु देखि बड़ कस न करब हित लागि ॥21॥

॥ चौपाई ॥

कुबरीं करि कबुली कैकेई । कपट छुरी उर पाहन टेई ॥

लखइ न रानि निकट दुखु कैंसे । चरइ हरित तिन बलिपसु जैसें ॥

सुनत बात मृदु अंत कठोरी । देति मनहुँ मधु माहुर घोरी ॥

कहइ चेरि सुधि अहइ कि नाही । स्वामिनि कहिहु कथा मोहि पाहीं ॥

दुइ बरदान भूप सन थाती । मागहु आजु जुड़ावहु छाती ॥

सुतहि राजु रामहि बनवासू । देहु लेहु सब सवति हुलासु ॥

भूपति राम सपथ जब करई । तब मागेहु जेहिं बचनु न टरई ॥

होइ अकाजु आजु निसि बीतें । बचनु मोर प्रिय मानेहु जी तें ॥

॥ दोहा ॥

बड़ कुघातु करि पातकिनि कहेसि कोपगृहँ जाहु ।

काजु सँवारेहु सजग सबु सहसा जनि पतिआहु ॥22॥

॥ चौपाई ॥

कुबरिहि रानि प्रानप्रिय जानी । बार बार बड़ि बुद्धि बखानी ॥

तोहि सम हित न मोर संसारा । बहे जात कइ भइसि अधारा ॥

जौं बिधि पुरब मनोरथु काली । करौं तोहि चख पूतरि आली ॥

बहुबिधि चेरिहि आदरु देई । कोपभवन गवनि कैकेई ॥

बिपति बीजु बरषा रितु चेरी । भुइँ भइ कुमति कैकेई केरी ॥

पाइ कपट जलु अंकुर जामा । बर दोउ दल दुख फल परिनामा ॥

कोप समाजु साजि सबु सोई । राजु करत निज कुमति बिगोई ॥

राउर नगर कोलाहलु होई । यह कुचालि कछु जान न कोई ॥

॥ दोहा ॥

प्रमुदित पुर नर नारि । सब सजहिं सुमंगलचार ।

एक प्रबिसहिं एक निर्गमहिं भीर भूप दरबार ॥23॥

॥ चौपाई ॥

बाल सखा सुन हियँ हरषाहीं । मिलि दस पाँच राम पहिं जाहीं ॥

प्रभु आदरहिं प्रेमु पहिचानी । पूँछहिं कुसल खेम मृदु बानी ॥

फिरहिं भवन प्रिय आयसु पाई । करत परसपर राम बड़ाई ॥

को रघुबीर सरिस संसारा । सीलु सनेह निबाहनिहारा ।

जेंहि जेंहि जोनि करम बस भ्रमहीं । तहँ तहँ ईसु देउ यह हमहीं ॥

सेवक हम स्वामी सियनाहू । होउ नात यह ओर निबाहू ॥

अस अभिलाषु नगर सब काहू । कैकयसुता ह्दयँ अति दाहू ॥

को न कुसंगति पाइ नसाई । रहइ न नीच मतें चतुराई ॥

॥ दोहा ॥

साँस समय सानंद नृपु गयउ कैकेई गेहँ ।

गवनु निठुरता निकट किय जनु धरि देह सनेहँ ॥24॥

॥ चौपाई ॥

कोपभवन सुनि सकुचेउ राउ । भय बस अगहुड़ परइ न पाऊ ॥

सुरपति बसइ बाहँबल जाके । नरपति सकल रहहिं रुख ताकें ॥

सो सुनि तिय रिस गयउ सुखाई । देखहु काम प्रताप बड़ाई ॥

सूल कुलिस असि अँगवनिहारे । ते रतिनाथ सुमन सर मारे ॥

सभय नरेसु प्रिया पहिं गयऊ । देखि दसा दुखु दारुन भयऊ ॥

भूमि सयन पटु मोट पुराना । दिए डारि तन भूषण नाना ॥

कुमतिहि कसि कुबेषता फाबी । अन अहिवातु सूच जनु भाबी ॥

जाइ निकट नृपु कह मृदु बानी । प्रानप्रिया केहि हेतु रिसानी ॥

॥ छन्द ॥

केहि हेतु रानि रिसानि परसत पानि पतिहि नेवारई ।

मानहुँ सरोष भुअंग भामिनि बिषम भाँति निहारई ॥

दोउ बासना रसना दसन बर मरम ठाहरु देखई ।

तुलसी नृपति भवतब्यता बस काम कौतुक लेखई ॥

॥ सोरठा ॥

बार बार कह राउ सुमुखि सुलोचिनि पिकबचनि ।

कारन मोहि सुनाउ गजगामिनि निज कोप कर ॥25॥

॥ चौपाई ॥

अनहित तोर प्रिया केइँ कीन्हा । केहि दुइ सिर केहि जमु चह लीन्हा ॥

कहु केहि रंकहि करौ नरेसू । कहु केहि नृपहि निकासौं देसू ॥

सकउँ तोर अरि अमरउ मारी । काह कीट बपुरे नर नारी ॥

जानसि मोर सुभाउ बरोरू । मनु तव आनन चंद चकोरू ॥

प्रिया प्रान सुत सरबसु मोरें । परिजन प्रजा सकल बस तोरें ॥

जौं कछु कहौ कपटु करि तोही । भामिनि राम सपथ सत मोही ॥

बिहसि मागु मनभावति बाता । भूषन सजहि मनोहर गाता ॥

घरी कुघरी समुझि जियँ देखू । बेगि प्रिया परिहरहि कुबेषू ॥

॥ दोहा ॥

यह सुनि मन गुनि सपथ बड़ि बिहसि उठी मतिमंद ।

भूषन सजति बिलोकि मृगु मनहुँ किरातिनि फंद ॥26॥

॥ चौपाई ॥

पुनि कह राउ सुह्रद जियँ जानी । प्रेम पुलकि मृदु मंजुल बानी ॥

भामिनि भयउ तोर मनभावा । घर घर नगर अनंद बधावा ॥

रामहि देउँ कालि जुबराजू । सजहि सुलोचनि मंगल साजू ॥

दलकि उठेउ सुनि ह्रदउ कठोरू । जनु छुइ गयउ पाक बरतोरू ॥

ऐसिउ पीर बिहसि तेहि गोई । चोर नारि जिमि प्रगटि न रोई ॥

लखहिं न भूप कपट चतुराई । कोटि कुटिल मनि गुरू पढ़ाई ॥

जद्यपि नीति निपुन नरनाहू । नारिचरित जलनिधि अवगाहू ॥

कपट सनेहु बढ़ाइ बहोरी । बोली बिहसि नयन मुहु मोरी ॥

॥ दोहा ॥

मागु मागु पै कहहु पिय कबहुँ न देहु न लेहु ।

देन कहेहु बरदान दुइ तेउ पावत संदेहु ॥27॥

॥ चौपाई ॥

जानेउँ मरमु राउ हँसि कहई । तुम्हहि कोहाब परम प्रिय अहई ॥

थाति राखि न मागिहु काऊ । बिसरि गयउ मोहि भोर सुभाऊ ॥

झूठेहुँ हमहि दोषु जनि देहू । दुइ कै चारि मागि मकु लेहू ॥

रघुकुल रीति सदा चलि आई । प्रान जाहुँ बरु बचनु न जाई ॥

नहिं असत्य सम पातक पुंजा । गिरि सम होहिं कि कोटिक गुंजा ॥

सत्यमूल सब सुकृत सुहाए । बेद पुरान बिदित मनु गाए ॥

तेहि पर राम सपथ करि आई । सुकृत सनेह अवधि रघुराई ॥

बात दृढ़ाइ कुमति हँसि बोली । कुमत कुबिहग कुलह जनु खोली ॥

॥ दोहा ॥

भूप मनोरथ सुभग बनु सुख सुबिहंग समाजु ।

भिल्लनि जिमि छाड़न चहति बचनु भयंकरु बाजु ॥28॥

मासपारायण, तेरहवाँ विश्राम

॥ चौपाई ॥

सुनहु प्रानप्रिय भावत जी का । देहु एक बर भरतहि टीका ॥

मागउँ दूसर बर कर जोरी । पुरवहु नाथ मनोरथ मोरी ॥

तापस बेष बिसेषि उदासी । चौदह बरिस रामु बनबासी ॥

सुनि मृदु बचन भूप हियँ सोकू । ससि कर छुअत बिकल जिमि कोकू ॥

गयउ सहमि नहिं कछु कहि आवा । जनु सचान बन झपटेउ लावा ॥

बिबरन भयउ निपट नरपालू । दामिनि हनेउ मनहुँ तरु तालू ॥

माथे हाथ मूदि दोउ लोचन । तनु धरि सोचु लाग जनु सोचन ॥

मोर मनोरथु सुरतरु फूला । फरत करिनि जिमि हतेउ समूला ॥

अवध उजारि कीन्हि कैकेईं । दीन्हसि अचल बिपति कै नेईं ॥

॥ दोहा ॥

कवनें अवसर का भयउ गयउँ नारि बिस्वास ।

जोग सिद्धि फल समय जिमि जतिहि अबिद्या नास ॥29॥

॥ चौपाई ॥

एहि बिधि राउ मनहिं मन झाँखा । देखि कुभाँति कुमति मन माखा ॥

भरतु कि राउर पूत न होहीं । आनेहु मोल बेसाहि कि मोही ॥

जो सुनि सरु अस लाग तुम्हारें । काहे न बोलहु बचनु सँभारे ॥

देहु उतरु अनु करहु कि नाहीं । सत्यसंध तुम्ह रघुकुल माहीं ॥

देन कहेहु अब जनि बरु देहू । तजहुँ सत्य जग अपजसु लेहू ॥

सत्य सराहि कहेहु बरु देना । जानेहु लेइहि मागि चबेना ॥

सिबि दधीचि बलि जो कछु भाषा । तनु धनु तजेउ बचन पनु राखा ॥

अति कटु बचन कहति कैकेई । मानहुँ लोन जरे पर देई ॥

॥ दोहा ॥

धरम धुरंधर धीर धरि नयन उघारे रायँ ।

सिरु धुनि लीन्हि उसास असि मारेसि मोहि कुठायँ ॥30॥

॥ चौपाई ॥

आगें दीखि जरत रिस भारी । मनहुँ रोष तरवारि उघारी ॥

मूठि कुबुद्धि धार निठुराई । धरी कूबरीं सान बनाई ॥

लखी महीप कराल कठोरा । सत्य कि जीवनु लेइहि मोरा ॥

बोले राउ कठिन करि छाती । बानी सबिनय तासु सोहाती ॥

प्रिया बचन कस कहसि कुभाँती । भीर प्रतीति प्रीति करि हाँती ॥

मोरें भरतु रामु दुइ आँखी । सत्य कहउँ करि संकरू साखी ॥

अवसि दूतु मैं पठइब प्राता । ऐहहिं बेगि सुनत दोउ भ्राता ॥

सुदिन सोधि सबु साजु सजाई । देउँ भरत कहुँ राजु बजाई ॥

॥ दोहा ॥

लोभु न रामहि राजु कर बहुत भरत पर प्रीति ।

मैं बड़ छोट बिचारि जियँ करत रहेउँ नृपनीति ॥31॥

॥ चौपाई ॥

राम सपथ सत कहुउँ सुभाऊ । राममातु कछु कहेउ न काऊ ॥

मैं सबु कीन्ह तोहि बिनु पूँछें । तेहि तें परेउ मनोरथु छूछें ॥

रिस परिहरू अब मंगल साजू । कछु दिन गएँ भरत जुबराजू ॥

एकहि बात मोहि दुखु लागा । बर दूसर असमंजस मागा ॥

अजहुँ हृदय जरत तेहि आँचा । रिस परिहास कि साँचेहुँ साँचा ॥

कहु तजि रोषु राम अपराधू । सबु कोउ कहइ रामु सुठि साधू ॥

तुहूँ सराहसि करसि सनेहू । अब सुनि मोहि भयउ संदेहू ॥

जासु सुभाउ अरिहि अनुकूला । सो किमि करिहि मातु प्रतिकूला ॥

॥ दोहा ॥

प्रिया हास रिस परिहरहि मागु बिचारि बिबेकु ।

जेहिं देखाँ अब नयन भरि भरत राज अभिषेकु ॥32॥

॥ चौपाई ॥

जिऐ मीन बरू बारि बिहीना । मनि बिनु फनिकु जिऐ दुख दीना ॥

कहउँ सुभाउ न छलु मन माहीं । जीवनु मोर राम बिनु नाहीं ॥

समुझि देखु जियँ प्रिया प्रबीना । जीवनु राम दरस आधीना ॥

सुनि म्रदु बचन कुमति अति जरई । मनहुँ अनल आहुति घृत परई ॥

कहइ करहु किन कोटि उपाया । इहाँ न लागिहि राउरि माया ॥

देहु कि लेहु अजसु करि नाहीं । मोहि न बहुत प्रपंच सोहाहीं ।

रामु साधु तुम्ह साधु सयाने । राममातु भलि सब पहिचाने ॥

जस कौसिलाँ मोर भल ताका । तस फलु उन्हहि देउँ करि साका ॥

॥ दोहा ॥

होत प्रात मुनिबेष धरि जौं न रामु बन जाहिं ।

मोर मरनु राउर अजस नृप समुझिअ मन माहिं ॥33॥

॥ चौपाई ॥

अस कहि कुटिल भई उठि ठाढ़ी । मानहुँ रोष तरंगिनि बाढ़ी ॥

पाप पहार प्रगट भइ सोई । भरी क्रोध जल जाइ न जोई ॥

दोउ बर कूल कठिन हठ धारा । भवँर कूबरी बचन प्रचारा ॥

ढाहत भूपरूप तरु मूला । चली बिपति बारिधि अनुकूला ॥

लखी नरेस बात फुरि साँची । तिय मिस मीचु सीस पर नाची ॥

गहि पद बिनय कीन्ह बैठारी । जनि दिनकर कुल होसि कुठारी ॥

मागु माथ अबहीं देउँ तोही । राम बिरहँ जनि मारसि मोही ॥

राखु राम कहुँ जेहि तेहि भाँती । नाहिं त जरिहि जनम भरि छाती ॥

॥ दोहा ॥

देखी ब्याधि असाध नृपु परेउ धरनि धुनि माथ ।

कहत परम आरत बचन राम राम रघुनाथ ॥34॥

॥ चौपाई ॥

ब्याकुल राउ सिथिल सब गाता । करिनि कलपतरु मनहुँ निपाता ॥

कंठु सूख मुख आव न बानी । जनु पाठीनु दीन बिनु पानी ॥

पुनि कह कटु कठोर कैकेई । मनहुँ घाय महुँ माहुर देई ॥

जौं अंतहुँ अस करतबु रहेऊ । मागु मागु तुम्ह केहिं बल कहेऊ ॥

दुइ कि होइ एक समय भुआला । हँसब ठठाइ फुलाउब गाला ॥

दानि कहाउब अरु कृपनाई । होइ कि खेम कुसल रौताई ॥

छाड़हु बचनु कि धीरजु धरहू । जनि अबला जिमि करुना करहू ॥

तनु तिय तनय धामु धनु धरनी । सत्यसंध कहुँ तृन सम बरनी ॥

॥ दोहा ॥

मरम बचन सुनि राउ कह कहु कछु दोषु न तोर ।

लागेउ तोहि पिसाच जिमि कालु कहावत मोर ॥35॥

॥ चौपाई ॥

चहत न भरत भूपतहि भोरें । बिधि बस कुमति बसी जिय तोरें ॥

सो सबु मोर पाप परिनामू । भयउ कुठाहर जेहिं बिधि बामू ॥

सुबस बसिहि फिरि अवध सुहाई । सब गुन धाम राम प्रभुताई ॥

करिहहिं भाइ सकल सेवकाई । होइहि तिहुँ पुर राम बड़ाई ॥

तोर कलंकु मोर पछिताऊ । मुएहुँ न मिटहि न जाइहि काऊ ॥

अब तोहि नीक लाग करु सोई । लोचन ओट बैठु मुहु गोई ॥

जब लगि जिऔं कहउँ कर जोरी । तब लगि जनि कछु कहसि बहोरी ॥

फिरि पछितैहसि अंत अभागी । मारसि गाइ नहारु लागी ॥

॥ दोहा ॥

परेउ राउ कहि कोटि बिधि काहे करसि निदानु ।

कपट सयानि न कहति कछु जागति मनहुँ मसानु ॥36॥

॥ चौपाई ॥

राम राम रट बिकल भुआलू । जनु बिनु पंख बिहंग बेहालू ॥

हृदयँ मनाव भोरु जनि होई । रामहि जाइ कहै जनि कोई ॥

उदउ करहु जनि रबि रघुकुल गुर । अवध बिलोकि सूल होइहि उर ॥

भूप प्रीति कैकइ कठिनाई । उभय अवधि बिधि रची बनाई ॥

बिलपत नृपहि भयउ भिनुसारा । बीना बेनु संख धुनि द्वारा ॥

पढ़हिं भाट गुन गावहिं गायक । सुनत नृपहि जनु लागहिं सायक ॥

मंगल सकल सोहाहिं न कैसें । सहगामिनिहि बिभूषन जैसें ॥

तेहिं निसि नीद परी नहि काहू । राम दरस लालसा उछाहू ॥

॥ दोहा ॥

द्वार भीर सेवक सचिव कहहिं उदित रबि देखि ।

जागेउ अजहुँ न अवधपति कारनु कवनु बिसेषि ॥37॥

॥ चौपाई ॥

पछिले पहर भूपु नित जागा । आजु हमहि बड़ अचरजु लागा ॥

जाहु सुमंत्र जगावहु जाई । कीजिअ काजु रजायसु पाई ॥

गए सुमंत्रु तब राउर माही । देखि भयावन जात डेराहीं ॥

धाइ खाइ जनु जाइ न हेरा । मानहुँ बिपति बिषाद बसेरा ॥

पूछें कोउ न ऊतरु देई । गए जेंहिं भवन भूप कैकैई ॥

कहि जयजीव बैठ सिरु नाई । दैखि भूप गति गयउ सुखाई ॥

सोच बिकल बिबरन महि परेऊ । मानहुँ कमल मूलु परिहरेऊ ॥

सचिउ सभीत सकइ नहिं पूँछी । बोली असुभ भरी सुभ छूछी ॥

॥ दोहा ॥

परी न राजहि नीद निसि हेतु जान जगदीसु ।

रामु रामु रटि भोरु किय कहइ न मरमु महीसु ॥38॥

॥ चौपाई ॥

आनहु रामहि बेगि बोलाई । समाचार तब पूँछेहु आई ॥

चलेउ सुमंत्र राय रूख जानी । लखी कुचालि कीन्हि कछु रानी ॥

सोच बिकल मग परइ न पाऊ । रामहि बोलि कहिहि का राऊ ॥

उर धरि धीरजु गयउ दुआरें । पूछँहिं सकल देखि मनु मारें ॥

समाधानु करि सो सबही का । गयउ जहाँ दिनकर कुल टीका ॥

रामु सुमंत्रहि आवत देखा । आदरु कीन्ह पिता सम लेखा ॥

निरखि बदनु कहि भूप रजाई । रघुकुलदीपहि चलेउ लेवाई ॥

रामु कुभाँति सचिव सँग जाहीं । देखि लोग जहँ तहँ बिलखाहीं ॥

॥ दोहा ॥

जाइ दीख रघुबंसमनि नरपति निपट कुसाजु ॥

सहमि परेउ लखि सिंघिनिहि मनहुँ बृद्ध गजराजु ॥39॥

॥ चौपाई ॥

सूखहिं अधर जरइ सबु अंगू । मनहुँ दीन मनिहीन भुअंगू ॥

सरुष समीप दीखि कैकेई । मानहुँ मीचु घरी गनि लेई ॥

करुनामय मृदु राम सुभाऊ । प्रथम दीख दुखु सुना न काऊ ॥

तदपि धीर धरि समउ बिचारी । पूँछी मधुर बचन महतारी ॥

मोहि कहु मातु तात दुख कारन । करिअ जतन जेहिं होइ निवारन ॥

सुनहु राम सबु कारन एहू । राजहि तुम पर बहुत सनेहू ॥

देन कहेन्हि मोहि दुइ बरदाना । मागेउँ जो कछु मोहि सोहाना ।

सो सुनि भयउ भूप उर सोचू । छाड़ि न सकहिं तुम्हार सँकोचू ॥

॥ दोहा ॥

सुत सनेह इत बचनु उत संकट परेउ नरेसु ।

सकहु न आयसु धरहु सिर मेटहु कठिन कलेसु ॥40॥

॥ चौपाई ॥

निधरक बैठि कहइ कटु बानी । सुनत कठिनता अति अकुलानी ॥

जीभ कमान बचन सर नाना । मनहुँ महिप मृदु लच्छ समाना ॥

जनु कठोरपनु धरें सरीरू । सिखइ धनुषबिद्या बर बीरू ॥

सब प्रसंगु रघुपतिहि सुनाई । बैठि मनहुँ तनु धरि निठुराई ॥

मन मुसकाइ भानुकुल भानु । रामु सहज आनंद निधानू ॥

बोले बचन बिगत सब दूषन । मृदु मंजुल जनु बाग बिभूषन ॥

सुनु जननी सोइ सुतु बड़भागी । जो पितु मातु बचन अनुरागी ॥

तनय मातु पितु तोषनिहारा । दुर्लभ जननि सकल संसारा ॥

॥ दोहा ॥

मुनिगन मिलनु बिसेषि बन सबहि भाँति हित मोर ।

तेहि महँ पितु आयसु बहुरि संमत जननी तोर ॥41॥

॥ चौपाई ॥

भरत प्रानप्रिय पावहिं राजू । बिधि सब बिधि मोहि सनमुख आजु ।

जों न जाउँ बन ऐसेहु काजा । प्रथम गनिअ मोहि मूढ़ समाजा ॥

सेवहिं अरँडु कलपतरु त्यागी । परिहरि अमृत लेहिं बिषु मागी ॥

तेउ न पाइ अस समउ चुकाहीं । देखु बिचारि मातु मन माहीं ॥

अंब एक दुखु मोहि बिसेषी । निपट बिकल नरनायकु देखी ॥

थोरिहिं बात पितहि दुख भारी । होति प्रतीति न मोहि महतारी ॥

राउ धीर गुन उदधि अगाधू । भा मोहि ते कछु बड़ अपराधू ॥

जातें मोहि न कहत कछु राऊ । मोरि सपथ तोहि कहु सतिभाऊ ॥

॥ दोहा ॥

सहज सरल रघुबर बचन कुमति कुटिल करि जान ।

चलइ जोंक जल बक्रगति जद्यपि सलिलु समान ॥42॥

॥ चौपाई ॥

रहसी रानि राम रुख पाई । बोली कपट सनेहु जनाई ॥

सपथ तुम्हार भरत कै आना । हेतु न दूसर मै कछु जाना ॥

तुम्ह अपराध जोगु नहिं ताता । जननी जनक बंधु सुखदाता ॥

राम सत्य सबु जो कछु कहहू । तुम्ह पितु मातु बचन रत अहहू ॥

पितहि बुझाइ कहहु बलि सोई । चौथेंपन जेहिं अजसु न होई ॥

तुम्ह सम सुअन सुकृत जेहिं दीन्हे । उचित न तासु निरादरु कीन्हे ॥

लागहिं कुमुख बचन सुभ कैसे । मगहँ गयादिक तीरथ जैसे ॥

रामहि मातु बचन सब भाए । जिमि सुरसरि गत सलिल सुहाए ॥

॥ दोहा ॥

गइ मुरुछा रामहि सुमिरि नृप फिरि करवट लीन्ह ।

सचिव राम आगमन कहि बिनय समय सम कीन्ह ॥43॥

॥ चौपाई ॥

अवनिप अकनि रामु पगु धारे । धरि धीरजु तब नयन उघारे ॥

सचिवँ सँभारि राउ बैठारे । चरन परत नृप रामु निहारे ॥

लिए सनेह बिकल उर लाई । गै मनि मनहुँ फनिक फिरि पाई ॥

रामहि चितइ रहेउ नरनाहू । चला बिलोचन बारि प्रबाहू ॥

सोक बिबस कछु कहै न पारा । हृदयँ लगावत बारहिं बारा ॥

बिधिहि मनाव राउ मन माहीं । जेहिं रघुनाथ न कानन जाहीं ॥

सुमिरि महेसहि कहइ निहोरी । बिनती सुनहु सदासिव मोरी ॥

आसुतोष तुम्ह अवढर दानी । आरति हरहु दीन जनु जानी ॥

॥ दोहा ॥

तुम्ह प्रेरक सब के हृदयँ सो मति रामहि देहु ।

बचनु मोर तजि रहहि घर परिहरि सीलु सनेहु ॥44॥

॥ चौपाई ॥

अजसु होउ जग सुजसु नसाऊ । नरक परौ बरु सुरपुरु जाऊ ॥

सब दुख दुसह सहावहु मोही । लोचन ओट रामु जनि होंही ॥

अस मन गुनइ राउ नहिं बोला । पीपर पात सरिस मनु डोला ॥

रघुपति पितहि प्रेमबस जानी । पुनि कछु कहिहि मातु अनुमानी ॥

देस काल अवसर अनुसारी । बोले बचन बिनीत बिचारी ॥

तात कहउँ कछु करउँ ढिठाई । अनुचितु छमब जानि लरिकाई ॥

अति लघु बात लागि दुखु पावा । काहुँ न मोहि कहि प्रथम जनावा ॥

देखि गोसाइँहि पूँछिउँ माता । सुनि प्रसंगु भए सीतल गाता ॥

॥ दोहा ॥

मंगल समय सनेह बस सोच परिहरिअ तात ।

आयसु देइअ हरषि हियँ कहि पुलके प्रभु गात ॥45॥

॥ चौपाई ॥

धन्य जनमु जगतीतल तासू । पितहि प्रमोदु चरित सुनि जासू ॥

चारि पदारथ करतल ताकें । प्रिय पितु मातु प्रान सम जाकें ॥

आयसु पालि जनम फलु पाई । ऐहउँ बेगिहिं होउ रजाई ॥

बिदा मातु सन आवउँ मागी । चलिहउँ बनहि बहुरि पग लागी ॥

अस कहि राम गवनु तब कीन्हा । भूप सोक बसु उतरु न दीन्हा ॥

नगर ब्यापि गइ बात सुतीछी । छुअत चढ़ी जनु सब तन बीछी ॥

सुनि भए बिकल सकल नर नारी । बेलि बिटप जिमि देखि दवारी ॥

जो जहँ सुनइ धुनइ सिरु सोई । बड़ बिषादु नहिं धीरजु होई ॥

॥ दोहा ॥

मुख सुखाहिं लोचन स्त्रवहि सोकु न हृदयँ समाइ ।

मनहुँ ०करुन रस कटकई उतरी अवध बजाइ ॥46॥

॥ चौपाई ॥

मिलेहि माझ बिधि बात बेगारी । जहँ तहँ देहिं कैकेइहि गारी ॥

एहि पापिनिहि बूझि का परेऊ । छाइ भवन पर पावकु धरेऊ ॥

निज कर नयन काढ़ि चह दीखा । डारि सुधा बिषु चाहत चीखा ॥

कुटिल कठोर कुबुद्धि अभागी । भइ रघुबंस बेनु बन आगी ॥

पालव बैठि पेड़ु एहिं काटा । सुख महुँ सोक ठाटु धरि ठाटा ॥

सदा रामु एहि प्रान समाना । कारन कवन कुटिलपनु ठाना ॥

सत्य कहहिं कबि नारि सुभाऊ । सब बिधि अगहु अगाध दुराऊ ॥

निज प्रतिबिंबु बरुकु गहि जाई । जानि न जाइ नारि गति भाई ॥

॥ दोहा ॥

काह न पावकु जारि सक का न समुद्र समाइ ।

का न करै अबला प्रबल केहि जग कालु न खाइ ॥47॥

॥ चौपाई ॥

का सुनाइ बिधि काह सुनावा । का देखाइ चह काह देखावा ॥

एक कहहिं भल भूप न कीन्हा । बरु बिचारि नहिं कुमतिहि दीन्हा ॥

जो हठि भयउ सकल दुख भाजनु । अबला बिबस ग्यानु गुनु गा जनु ॥

एक धरम परमिति पहिचाने । नृपहि दोसु नहिं देहिं सयाने ॥

सिबि दधीचि हरिचंद कहानी । एक एक सन कहहिं बखानी ॥

एक भरत कर संमत कहहीं । एक उदास भायँ सुनि रहहीं ॥

कान मूदि कर रद गहि जीहा । एक कहहिं यह बात अलीहा ॥

सुकृत जाहिं अस कहत तुम्हारे । रामु भरत कहुँ प्रानपिआरे ॥

॥ दोहा ॥

चंदु चवै बरु अनल कन सुधा होइ बिषतूल ।

सपनेहुँ कबहुँ न करहिं किछु भरतु राम प्रतिकूल ॥48॥

॥ चौपाई ॥

एक बिधातहिं दूषनु देंहीं । सुधा देखाइ दीन्ह बिषु जेहीं ॥

खरभरु नगर सोचु सब काहू । दुसह दाहु उर मिटा उछाहू ॥

बिप्रबधू कुलमान्य जठेरी । जे प्रिय परम कैकेई केरी ॥

लगीं देन सिख सीलु सराही । बचन बानसम लागहिं ताही ॥

भरतु न मोहि प्रिय राम समाना । सदा कहहु यहु सबु जगु जाना ॥

करहु राम पर सहज सनेहू । केहिं अपराध आजु बनु देहू ॥

कबहुँ न कियहु सवति आरेसू । प्रीति प्रतीति जान सबु देसू ॥

कौसल्याँ अब काह बिगारा । तुम्ह जेहि लागि बज्र पुर पारा ॥

॥ दोहा ॥

सीय कि पिय सँगु परिहरिहि लखनु कि रहिहहिं धाम ।

राजु कि भूँजब भरत पुर नृपु कि जिइहि बिनु राम ॥49॥

॥ चौपाई ॥

अस बिचारि उर छाड़हु कोहू । सोक कलंक कोठि जनि होहू ॥

भरतहि अवसि देहु जुबराजू । कानन काह राम कर काजू ॥

नाहिन रामु राज के भूखे । धरम धुरीन बिषय रस रूखे ॥

गुर गृह बसहुँ रामु तजि गेहू । नृप सन अस बरु दूसर लेहू ॥

जौं नहिं लगिहहु कहें हमारे । नहिं लागिहि कछु हाथ तुम्हारे ॥

जौं परिहास कीन्हि कछु होई । तौ कहि प्रगट जनावहु सोई ॥

राम सरिस सुत कानन जोगू । काह कहिहि सुनि तुम्ह कहुँ लोगू ॥

उठहु बेगि सोइ करहु उपाई । जेहि बिधि सोकु कलंकु नसाई ॥

॥ छन्द ॥

जेहि भाँति सोकु कलंकु जाइ उपाय करि कुल पालही ।

हठि फेरु रामहि जात बन जनि बात दूसरि चालही ॥

जिमि भानु बिनु दिनु प्रान बिनु तनु चंद बिनु जिमि जामिनी ।

तिमि अवध तुलसीदास प्रभु बिनु समुझि धौं जियँ भामिनी ॥

॥ सोरठा ॥

सखिन्ह सिखावनु दीन्ह सुनत मधुर परिनाम हित ।

तेइँ कछु कान न कीन्ह कुटिल प्रबोधी कूबरी ॥50॥

॥ चौपाई ॥

उतरु न देइ दुसह रिस रूखी । मृगिन्ह चितव जनु बाघिनि भूखी ॥

ब्याधि असाधि जानि तिन्ह त्यागी । चलीं कहत मतिमंद अभागी ॥

राजु करत यह दैअँ बिगोई । कीन्हेसि अस जस करइ न कोई ॥

एहि बिधि बिलपहिं पुर नर नारीं । देहिं कुचालिहि कोटिक गारीं ॥

जरहिं बिषम जर लेहिं उसासा । कवनि राम बिनु जीवन आसा ॥

बिपुल बियोग प्रजा अकुलानी । जनु जलचर गन सूखत पानी ॥

अति बिषाद बस लोग लोगाई । गए मातु पहिं रामु गोसाई ॥

मुख प्रसन्न चित चौगुन चाऊ । मिटा सोचु जनि राखै राऊ ॥

॥ दोहा ॥

दो-नव गयंदु रघुबीर मनु राजु अलान समान ।

छूट जानि बन गवनु सुनि उर अनंदु अधिकान ॥51॥

॥ चौपाई ॥

रघुकुलतिलक जोरि दोउ हाथा । मुदित मातु पद नायउ माथा ॥

दीन्हि असीस लाइ उर लीन्हे । भूषन बसन निछावरि कीन्हे ॥

बार बार मुख चुंबति माता । नयन नेह जलु पुलकित गाता ॥

गोद राखि पुनि हृदयँ लगाए । स्त्रवत प्रेनरस पयद सुहाए ॥

प्रेमु प्रमोदु न कछु कहि जाई । रंक धनद पदबी जनु पाई ॥

सादर सुंदर बदनु निहारी । बोली मधुर बचन महतारी ॥

कहहु तात जननी बलिहारी । कबहिं लगन मुद मंगलकारी ॥

सुकृत सील सुख सीवँ सुहाई । जनम लाभ कइ अवधि अघाई ॥

॥ दोहा ॥

जेहि चाहत नर नारि सब अति आरत एहि भाँति ।

जिमि चातक चातकि तृषित बृष्टि सरद रितु स्वाति ॥52॥

॥ चौपाई ॥

तात जाउँ बलि बेगि नहाहू । जो मन भाव मधुर कछु खाहू ॥

पितु समीप तब जाएहु भैआ । भइ बड़ि बार जाइ बलि मैआ ॥

मातु बचन सुनि अति अनुकूला । जनु सनेह सुरतरु के फूला ॥

सुख मकरंद भरे श्रियमूला । निरखि राम मनु भवरुँ न भूला ॥

धरम धुरीन धरम गति जानी । कहेउ मातु सन अति मृदु बानी ॥

पिताँ दीन्ह मोहि कानन राजू । जहँ सब भाँति मोर बड़ काजू ॥

आयसु देहि मुदित मन माता । जेहिं मुद मंगल कानन जाता ॥

जनि सनेह बस डरपसि भोरें । आनँदु अंब अनुग्रह तोरें ॥

॥ दोहा ॥

बरष चारिदस बिपिन बसि करि पितु बचन प्रमान ।

आइ पाय पुनि देखिहउँ मनु जनि करसि मलान ॥53॥

॥ चौपाई ॥

बचन बिनीत मधुर रघुबर के । सर सम लगे मातु उर करके ॥

सहमि सूखि सुनि सीतलि बानी । जिमि जवास परें पावस पानी ॥

कहि न जाइ कछु हृदय बिषादू । मनहुँ मृगी सुनि केहरि नादू ॥

नयन सजल तन थर थर काँपी । माजहि खाइ मीन जनु मापी ॥

धरि धीरजु सुत बदनु निहारी । गदगद बचन कहति महतारी ॥

तात पितहि तुम्ह प्रानपिआरे । देखि मुदित नित चरित तुम्हारे ॥

राजु देन कहुँ सुभ दिन साधा । कहेउ जान बन केहिं अपराधा ॥

तात सुनावहु मोहि निदानू । को दिनकर कुल भयउ कृसानू ॥

॥ दोहा ॥

निरखि राम रुख सचिवसुत कारनु कहेउ बुझाइ ।

सुनि प्रसंगु रहि मूक जिमि दसा बरनि नहिं जाइ ॥54॥

॥ चौपाई ॥

राखि न सकइ न कहि सक जाहू । दुहूँ भाँति उर दारुन दाहू ॥

लिखत सुधाकर गा लिखि राहू । बिधि गति बाम सदा सब काहू ॥

धरम सनेह उभयँ मति घेरी । भइ गति साँप छुछुंदरि केरी ॥

राखउँ सुतहि करउँ अनुरोधू । धरमु जाइ अरु बंधु बिरोधू ॥

कहउँ जान बन तौ बड़ि हानी । संकट सोच बिबस भइ रानी ॥

बहुरि समुझि तिय धरमु सयानी । रामु भरतु दोउ सुत सम जानी ॥

सरल सुभाउ राम महतारी । बोली बचन धीर धरि भारी ॥

तात जाउँ बलि कीन्हेहु नीका । पितु आयसु सब धरमक टीका ॥

॥ दोहा ॥

राजु देन कहि दीन्ह बनु मोहि न सो दुख लेसु ।

तुम्ह बिनु भरतहि भूपतिहि प्रजहि प्रचंड कलेसु ॥55॥

॥ चौपाई ॥

जौं केवल पितु आयसु ताता । तौ जनि जाहु जानि बड़ि माता ॥

जौं पितु मातु कहेउ बन जाना । तौं कानन सत अवध समाना ॥

पितु बनदेव मातु बनदेवी । खग मृग चरन सरोरुह सेवी ॥

अंतहुँ उचित नृपहि बनबासू । बय बिलोकि हियँ होइ हराँसू ॥

बड़भागी बनु अवध अभागी । जो रघुबंसतिलक तुम्ह त्यागी ॥

जौं सुत कहौ संग मोहि लेहू । तुम्हरे हृदयँ होइ संदेहू ॥

पूत परम प्रिय तुम्ह सबही के । प्रान प्रान के जीवन जी के ॥

ते तुम्ह कहहु मातु बन जाऊँ । मैं सुनि बचन बैठि पछिताऊँ ॥

॥ दोहा ॥

यह बिचारि नहिं करउँ हठ झूठ सनेहु बढ़ाइ ।

मानि मातु कर नात बलि सुरति बिसरि जनि जाइ ॥56॥

॥ चौपाई ॥

देव पितर सब तुन्हहि गोसाई । राखहुँ पलक नयन की नाई ॥

अवधि अंबु प्रिय परिजन मीना । तुम्ह करुनाकर धरम धुरीना ॥

अस बिचारि सोइ करहु उपाई । सबहि जिअत जेहिं भेंटेहु आई ॥

जाहु सुखेन बनहि बलि जाऊँ । करि अनाथ जन परिजन गाऊँ ॥

सब कर आजु सुकृत फल बीता । भयउ कराल कालु बिपरीता ॥

बहुबिधि बिलपि चरन लपटानी । परम अभागिनि आपुहि जानी ॥

दारुन दुसह दाहु उर ब्यापा । बरनि न जाहिं बिलाप कलापा ॥

राम उठाइ मातु उर लाई । कहि मृदु बचन बहुरि समुझाई ॥

॥ दोहा ॥

समाचार तेहि समय सुनि सीय उठी अकुलाइ ।

जाइ सासु पद कमल जुग बंदि बैठि सिरु नाइ ॥57॥

॥ चौपाई ॥

दीन्हि असीस सासु मृदु बानी । अति सुकुमारि देखि अकुलानी ॥

बैठि नमितमुख सोचति सीता । रूप रासि पति प्रेम पुनीता ॥

चलन चहत बन जीवननाथू । केहि सुकृती सन होइहि साथू ॥

की तनु प्रान कि केवल प्राना । बिधि करतबु कछु जाइ न जाना ॥

चारु चरन नख लेखति धरनी । नूपुर मुखर मधुर कबि बरनी ॥

मनहुँ प्रेम बस बिनती करहीं । हमहि सीय पद जनि परिहरहीं ॥

मंजु बिलोचन मोचति बारी । बोली देखि राम महतारी ॥

तात सुनहु सिय अति सुकुमारी । सासु ससुर परिजनहि पिआरी ॥

॥ दोहा ॥

पिता जनक भूपाल मनि ससुर भानुकुल भानु ।

पति रबिकुल कैरव बिपिन बिधु गुन रूप निधानु ॥58॥

॥ चौपाई ॥

मैं पुनि पुत्रबधू प्रिय पाई । रूप रासि गुन सील सुहाई ॥

नयन पुतरि करि प्रीति बढ़ाई । राखेउँ प्रान जानिकिहिं लाई ॥

कलपबेलि जिमि बहुबिधि लाली । सींचि सनेह सलिल प्रतिपाली ॥

फूलत फलत भयउ बिधि बामा । जानि न जाइ काह परिनामा ॥

पलँग पीठ तजि गोद हिंड़ोरा । सियँ न दीन्ह पगु अवनि कठोरा ॥

जिअनमूरि जिमि जोगवत रहऊँ । दीप बाति नहिं टारन कहऊँ ॥

सोइ सिय चलन चहति बन साथा । आयसु काह होइ रघुनाथा ।

चंद किरन रस रसिक चकोरी । रबि रुख नयन सकइ किमि जोरी ॥

॥ दोहा ॥

करि केहरि निसिचर चरहिं दुष्ट जंतु बन भूरि ।

बिष बाटिकाँ कि सोह सुत सुभग सजीवनि मूरि ॥59॥

॥ चौपाई ॥

बन हित कोल किरात किसोरी । रचीं बिरंचि बिषय सुख भोरी ॥

पाइन कृमि जिमि कठिन सुभाऊ । तिन्हहि कलेसु न कानन काऊ ॥

कै तापस तिय कानन जोगू । जिन्ह तप हेतु तजा सब भोगू ॥

सिय बन बसिहि तात केहि भाँती । चित्रलिखित कपि देखि डेराती ॥

सुरसर सुभग बनज बन चारी । डाबर जोगु कि हंसकुमारी ॥

अस बिचारि जस आयसु होई । मैं सिख देउँ जानकिहि सोई ॥

जौं सिय भवन रहै कह अंबा । मोहि कहँ होइ बहुत अवलंबा ॥

सुनि रघुबीर मातु प्रिय बानी । सील सनेह सुधाँ जनु सानी ॥

॥ दोहा ॥

कहि प्रिय बचन बिबेकमय कीन्हि मातु परितोष ।

लगे प्रबोधन जानकिहि प्रगटि बिपिन गुन दोष ॥60॥

मासपारायण, चौदहवाँ विश्राम

॥ चौपाई ॥

मातु समीप कहत सकुचाहीं । बोले समउ समुझि मन माहीं ॥

राजकुमारि सिखावन सुनहू । आन भाँति जियँ जनि कछु गुनहू ॥

आपन मोर नीक जौं चहहू । बचनु हमार मानि गृह रहहू ॥

आयसु मोर सासु सेवकाई । सब बिधि भामिनि भवन भलाई ॥

एहि ते अधिक धरमु नहिं दूजा । सादर सासु ससुर पद पूजा ॥

जब जब मातु करिहि सुधि मोरी । होइहि प्रेम बिकल मति भोरी ॥

तब तब तुम्ह कहि कथा पुरानी । सुंदरि समुझाएहु मृदु बानी ॥

कहउँ सुभायँ सपथ सत मोही । सुमुखि मातु हित राखउँ तोही ॥

॥ दोहा ॥

गुर श्रुति संमत धरम फलु पाइअ बिनहिं कलेस ।

हठ बस सब संकट सहे गालव नहुष नरेस ॥61॥

॥ चौपाई ॥

मैं पुनि करि प्रवान पितु बानी । बेगि फिरब सुनु सुमुखि सयानी ॥

दिवस जात नहिं लागिहि बारा । सुंदरि सिखवनु सुनहु हमारा ॥

जौ हठ करहु प्रेम बस बामा । तौ तुम्ह दुखु पाउब परिनामा ॥

काननु कठिन भयंकरु भारी । घोर घामु हिम बारि बयारी ॥

कुस कंटक मग काँकर नाना । चलब पयादेहिं बिनु पदत्राना ॥

चरन कमल मुदु मंजु तुम्हारे । मारग अगम भूमिधर भारे ॥

कंदर खोह नदीं नद नारे । अगम अगाध न जाहिं निहारे ॥

भालु बाघ बृक केहरि नागा । करहिं नाद सुनि धीरजु भागा ॥

॥ दोहा ॥

भूमि सयन बलकल बसन असनु कंद फल मूल ।

ते कि सदा सब दिन मिलिहिं सबुइ समय अनुकूल ॥62॥

॥ चौपाई ॥

नर अहार रजनीचर चरहीं । कपट बेष बिधि कोटिक करहीं ॥

लागइ अति पहार कर पानी । बिपिन बिपति नहिं जाइ बखानी ॥

ब्याल कराल बिहग बन घोरा । निसिचर निकर नारि नर चोरा ॥

डरपहिं धीर गहन सुधि आएँ । मृगलोचनि तुम्ह भीरु सुभाएँ ॥

हंसगवनि तुम्ह नहिं बन जोगू । सुनि अपजसु मोहि देइहि लोगू ॥

मानस सलिल सुधाँ प्रतिपाली । जिअइ कि लवन पयोधि मराली ॥

नव रसाल बन बिहरनसीला । सोह कि कोकिल बिपिन करीला ॥

रहहु भवन अस हृदयँ बिचारी । चंदबदनि दुखु कानन भारी ॥

॥ दोहा ॥

सहज सुह्द गुर स्वामि सिख जो न करइ सिर मानि ॥

सो पछिताइ अघाइ उर अवसि होइ हित हानि ॥63॥

॥ चौपाई ॥

सुनि मृदु बचन मनोहर पिय के । लोचन ललित भरे जल सिय के ॥

सीतल सिख दाहक भइ कैंसें । चकइहि सरद चंद निसि जैंसें ॥

उतरु न आव बिकल बैदेही । तजन चहत सुचि स्वामि सनेही ॥

बरबस रोकि बिलोचन बारी । धरि धीरजु उर अवनिकुमारी ॥

लागि सासु पग कह कर जोरी । छमबि देबि बड़ि अबिनय मोरी ॥

दीन्हि प्रानपति मोहि सिख सोई । जेहि बिधि मोर परम हित होई ॥

मैं पुनि समुझि दीखि मन माहीं । पिय बियोग सम दुखु जग नाहीं ॥

॥ दोहा ॥

प्राननाथ करुनायतन सुंदर सुखद सुजान ।

तुम्ह बिनु रघुकुल कुमुद बिधु सुरपुर नरक समान ॥64॥

॥ चौपाई ॥

मातु पिता भगिनी प्रिय भाई । प्रिय परिवारु सुह्रद समुदाई ॥

सासु ससुर गुर सजन सहाई । सुत सुंदर सुसील सुखदाई ॥

जहँ लगि नाथ नेह अरु नाते । पिय बिनु तियहि तरनिहु ते ताते ॥

तनु धनु धामु धरनि पुर राजू । पति बिहीन सबु सोक समाजू ॥

भोग रोगसम भूषन भारू । जम जातना सरिस संसारू ॥

प्राननाथ तुम्ह बिनु जग माहीं । मो कहुँ सुखद कतहुँ कछु नाहीं ॥

जिय बिनु देह नदी बिनु बारी । तैसिअ नाथ पुरुष बिनु नारी ॥

नाथ सकल सुख साथ तुम्हारें । सरद बिमल बिधु बदनु निहारें ॥

॥ दोहा ॥

खग मृग परिजन नगरु बनु बलकल बिमल दुकूल ।

नाथ साथ सुरसदन सम परनसाल सुख मूल ॥65॥

॥ चौपाई ॥

बनदेवीं बनदेव उदारा । करिहहिं सासु ससुर सम सारा ॥

कुस किसलय साथरी सुहाई । प्रभु सँग मंजु मनोज तुराई ॥

कंद मूल फल अमिअ अहारू । अवध सौध सत सरिस पहारू ॥

छिनु छिनु प्रभु पद कमल बिलोकि । रहिहउँ मुदित दिवस जिमि कोकी ॥

बन दुख नाथ कहे बहुतेरे । भय बिषाद परिताप घनेरे ॥

प्रभु बियोग लवलेस समाना । सब मिलि होहिं न कृपानिधाना ॥

अस जियँ जानि सुजान सिरोमनि । लेइअ संग मोहि छाड़िअ जनि ॥

बिनती बहुत करौं का स्वामी । करुनामय उर अंतरजामी ॥

॥ दोहा ॥

राखिअ अवध जो अवधि लगि रहत न जनिअहिं प्रान ।

दीनबंधु संदर सुखद सील सनेह निधान ॥66॥

॥ चौपाई ॥

मोहि मग चलत न होइहि हारी । छिनु छिनु चरन सरोज निहारी ॥

सबहि भाँति पिय सेवा करिहौं । मारग जनित सकल श्रम हरिहौं ॥

पाय पखारी बैठि तरु छाहीं । करिहउँ बाउ मुदित मन माहीं ॥

श्रम कन सहित स्याम तनु देखें । कहँ दुख समउ प्रानपति पेखें ॥

सम महि तृन तरुपल्लव डासी । पाग पलोटिहि सब निसि दासी ॥

बारबार मृदु मूरति जोही । लागहि तात बयारि न मोही ।

को प्रभु सँग मोहि चितवनिहारा । सिंघबधुहि जिमि ससक सिआरा ॥

मैं सुकुमारि नाथ बन जोगू । तुम्हहि उचित तप मो कहुँ भोगू ॥

॥ दोहा ॥

ऐसेउ बचन कठोर सुनि जौं न ह्रदउ बिलगान ।

तौ प्रभु बिषम बियोग दुख सहिहहिं पावँर प्रान ॥67॥

॥ चौपाई ॥

अस कहि सीय बिकल भइ भारी । बचन बियोगु न सकी सँभारी ॥

देखि दसा रघुपति जियँ जाना । हठि राखें नहिं राखिहि प्राना ॥

कहेउ कृपाल भानुकुलनाथा । परिहरि सोचु चलहु बन साथा ॥

नहिं बिषाद कर अवसरु आजू । बेगि करहु बन गवन समाजू ॥

कहि प्रिय बचन प्रिया समुझाई । लगे मातु पद आसिष पाई ॥

बेगि प्रजा दुख मेटब आई । जननी निठुर बिसरि जनि जाई ॥

फिरहि दसा बिधि बहुरि कि मोरी । देखिहउँ नयन मनोहर जोरी ॥

सुदिन सुघरी तात कब होइहि । जननी जिअत बदन बिधु जोइहि ॥

॥ दोहा ॥

बहुरि बच्छ कहि लालु कहि रघुपति रघुबर तात ।

कबहिं बोलाइ लगाइ हियँ हरषि निरखिहउँ गात ॥68॥

॥ चौपाई ॥

लखि सनेह कातरि महतारी । बचनु न आव बिकल भइ भारी ॥

राम प्रबोधु कीन्ह बिधि नाना । समउ सनेहु न जाइ बखाना ॥

तब जानकी सासु पग लागी । सुनिअ माय मैं परम अभागी ॥

सेवा समय दैअँ बनु दीन्हा । मोर मनोरथु सफल न कीन्हा ॥

तजब छोभु जनि छाड़िअ छोहू । करमु कठिन कछु दोसु न मोहू ॥

सुनि सिय बचन सासु अकुलानी । दसा कवनि बिधि कहौं बखानी ॥

बारहि बार लाइ उर लीन्ही । धरि धीरजु सिख आसिष दीन्ही ॥

अचल होउ अहिवातु तुम्हारा । जब लगि गंग जमुन जल धारा ॥

॥ दोहा ॥

सीतहि सासु असीस सिख दीन्हि अनेक प्रकार ।

चली नाइ पद पदुम सिरु अति हित बारहिं बार ॥69॥

॥ चौपाई ॥

समाचार जब लछिमन पाए । ब्याकुल बिलख बदन उठि धाए ॥

कंप पुलक तन नयन सनीरा । गहे चरन अति प्रेम अधीरा ॥

कहि न सकत कछु चितवत ठाढ़े । मीनु दीन जनु जल तें काढ़े ॥

सोचु हृदयँ बिधि का होनिहारा । सबु सुखु सुकृत सिरान हमारा ॥

मो कहुँ काह कहब रघुनाथा । रखिहहिं भवन कि लेहहिं साथा ॥

राम बिलोकि बंधु कर जोरें । देह गेह सब सन तृनु तोरें ॥

बोले बचनु राम नय नागर । सील सनेह सरल सुख सागर ॥

तात प्रेम बस जनि कदराहू । समुझि हृदयँ परिनाम उछाहू ॥

॥ दोहा ॥

मातु पिता गुरु स्वामि सिख सिर धरि करहि सुभायँ ।

लहेउ लाभु तिन्ह जनम कर नतरु जनमु जग जायँ ॥70॥

॥ चौपाई ॥

अस जियँ जानि सुनहु सिख भाई । करहु मातु पितु पद सेवकाई ॥

भवन भरतु रिपुसूदन नाहीं । राउ बृद्ध मम दुखु मन माहीं ॥

मैं बन जाउँ तुम्हहि लेइ साथा । होइ सबहि बिधि अवध अनाथा ॥

गुरु पितु मातु प्रजा परिवारू । सब कहुँ परइ दुसह दुख भारू ॥

रहहु करहु सब कर परितोषू । नतरु तात होइहि बड़ दोषू ॥

जासु राज प्रिय प्रजा दुखारी । सो नृपु अवसि नरक अधिकारी ॥

रहहु तात असि नीति बिचारी । सुनत लखनु भए ब्याकुल भारी ॥

सिअरें बचन सूखि गए कैंसें । परसत तुहिन तामरसु जैसें ॥

॥ दोहा ॥

उतरु न आवत प्रेम बस गहे चरन अकुलाइ ।

नाथ दासु मैं स्वामि तुम्ह तजहु त काह बसाइ ॥71॥

॥ चौपाई ॥

दीन्हि मोहि सिख नीकि गोसाईं । लागि अगम अपनी कदराईं ॥

नरबर धीर धरम धुर धारी । निगम नीति कहुँ ते अधिकारी ॥

मैं सिसु प्रभु सनेहँ प्रतिपाला । मंदरु मेरु कि लेहिं मराला ॥

गुर पितु मातु न जानउँ काहू । कहउँ सुभाउ नाथ पतिआहू ॥

जहँ लगि जगत सनेह सगाई । प्रीति प्रतीति निगम निजु गाई ॥

मोरें सबइ एक तुम्ह स्वामी । दीनबंधु उर अंतरजामी ॥

धरम नीति उपदेसिअ ताही । कीरति भूति सुगति प्रिय जाही ॥

मन क्रम बचन चरन रत होई । कृपासिंधु परिहरिअ कि सोई ॥

॥ दोहा ॥

करुनासिंधु सुबंध के सुनि मृदु बचन बिनीत ।

समुझाए उर लाइ प्रभु जानि सनेहँ सभीत ॥72॥

॥ चौपाई ॥

मागहु बिदा मातु सन जाई । आवहु बेगि चलहु बन भाई ॥

मुदित भए सुनि रघुबर बानी । भयउ लाभ बड़ गइ बड़ि हानी ॥

हरषित ह्दयँ मातु पहिं आए । मनहुँ अंध फिरि लोचन पाए ।

जाइ जननि पग नायउ माथा । मनु रघुनंदन जानकि साथा ॥

पूँछे मातु मलिन मन देखी । लखन कही सब कथा बिसेषी ॥

गई सहमि सुनि बचन कठोरा । मृगी देखि दव जनु चहु ओरा ॥

लखन लखेउ भा अनरथ आजू । एहिं सनेह बस करब अकाजू ॥

मागत बिदा सभय सकुचाहीं । जाइ संग बिधि कहिहि कि नाही ॥

॥ दोहा ॥

समुझि सुमित्राँ राम सिय रूप सुसीलु सुभाउ ।

नृप सनेहु लखि धुनेउ सिरु पापिनि दीन्ह कुदाउ ॥73॥

॥ चौपाई ॥

धीरजु धरेउ कुअवसर जानी । सहज सुह्द बोली मृदु बानी ॥

तात तुम्हारि मातु बैदेही । पिता रामु सब भाँति सनेही ॥

अवध तहाँ जहँ राम निवासू । तहँइँ दिवसु जहँ भानु प्रकासू ॥

जौ पै सीय रामु बन जाहीं । अवध तुम्हार काजु कछु नाहिं ॥

गुर पितु मातु बंधु सुर साई । सेइअहिं सकल प्रान की नाईं ॥

रामु प्रानप्रिय जीवन जी के । स्वारथ रहित सखा सबही कै ॥

पूजनीय प्रिय परम जहाँ तें । सब मानिअहिं राम के नातें ॥

अस जियँ जानि संग बन जाहू । लेहु तात जग जीवन लाहू ॥

॥ दोहा ॥

भूरि भाग भाजनु भयहु मोहि समेत बलि जाउँ ।

जौम तुम्हरें मन छाड़ि छलु कीन्ह राम पद ठाउँ ॥74॥

॥ चौपाई ॥

पुत्रवती जुबती जग सोई । रघुपति भगतु जासु सुतु होई ॥

नतरु बाँझ भलि बादि बिआनी । राम बिमुख सुत तें हित जानी ॥

तुम्हरेहिं भाग रामु बन जाहीं । दूसर हेतु तात कछु नाहीं ॥

सकल सुकृत कर बड़ फलु एहू । राम सीय पद सहज सनेहू ॥

राग रोषु इरिषा मदु मोहू । जनि सपनेहुँ इन्ह के बस होहू ॥

सकल प्रकार बिकार बिहाई । मन क्रम बचन करेहु सेवकाई ॥

तुम्ह कहुँ बन सब भाँति सुपासू । सँग पितु मातु रामु सिय जासू ॥

जेहिं न रामु बन लहहिं कलेसू । सुत सोइ करेहु इहइ उपदेसू ॥

छं0-उपदेसु यहु जेहिं तात तुम्हरे राम सिय सुख पावहीं ।

पितु मातु प्रिय परिवार पुर सुख सुरति बन बिसरावहीं ।

तुलसी प्रभुहि सिख देइ आयसु दीन्ह पुनि आसिष दई ।

रति होउ अबिरल अमल सिय रघुबीर पद नित नित नई ॥

॥ दोहा ॥

सो0-मातु चरन सिरु नाइ चले तुरत संकित हृदयँ ।

बागुर बिषम तोराइ मनहुँ भाग मृगु भाग बस ॥75॥

॥ चौपाई ॥

गए लखनु जहँ जानकिनाथू । भे मन मुदित पाइ प्रिय साथू ॥

बंदि राम सिय चरन सुहाए । चले संग नृपमंदिर आए ॥

कहहिं परसपर पुर नर नारी । भलि बनाइ बिधि बात बिगारी ॥

तन कृस दुखु बदन मलीने । बिकल मनहुँ माखी मधु छीने ॥

कर मीजहिं सिरु धुनि पछिताहीं । जनु बिन पंख बिहग अकुलाहीं ॥

भइ बड़ि भीर भूप दरबारा । बरनि न जाइ बिषादु अपारा ॥

सचिवँ उठाइ राउ बैठारे । कहि प्रिय बचन रामु पगु धारे ॥

सिय समेत दोउ तनय निहारी । ब्याकुल भयउ भूमिपति भारी ॥

॥ दोहा ॥

सीय सहित सुत सुभग दोउ देखि देखि अकुलाइ ।

बारहिं बार सनेह बस राउ लेइ उर लाइ ॥76॥

॥ चौपाई ॥

सकइ न बोलि बिकल नरनाहू । सोक जनित उर दारुन दाहू ॥

नाइ सीसु पद अति अनुरागा । उठि रघुबीर बिदा तब मागा ॥

पितु असीस आयसु मोहि दीजै । हरष समय बिसमउ कत कीजै ॥

तात किएँ प्रिय प्रेम प्रमादू । जसु जग जाइ होइ अपबादू ॥

सुनि सनेह बस उठि नरनाहाँ । बैठारे रघुपति गहि बाहाँ ॥

सुनहु तात तुम्ह कहुँ मुनि कहहीं । रामु चराचर नायक अहहीं ॥

सुभ अरु असुभ करम अनुहारी । ईस देइ फलु ह्दयँ बिचारी ॥

करइ जो करम पाव फल सोई । निगम नीति असि कह सबु कोई ॥

॥ दोहा ॥

औरु करै अपराधु कोउ और पाव फल भोगु ।

अति बिचित्र भगवंत गति को जग जानै जोगु ॥77॥

॥ चौपाई ॥

रायँ राम राखन हित लागी । बहुत उपाय किए छलु त्यागी ॥

लखी राम रुख रहत न जाने । धरम धुरंधर धीर सयाने ॥

तब नृप सीय लाइ उर लीन्ही । अति हित बहुत भाँति सिख दीन्ही ॥

कहि बन के दुख दुसह सुनाए । सासु ससुर पितु सुख समुझाए ॥

सिय मनु राम चरन अनुरागा । घरु न सुगमु बनु बिषमु न लागा ॥

औरउ सबहिं सीय समुझाई । कहि कहि बिपिन बिपति अधिकाई ॥

सचिव नारि गुर नारि सयानी । सहित सनेह कहहिं मृदु बानी ॥

तुम्ह कहुँ तौ न दीन्ह बनबासू । करहु जो कहहिं ससुर गुर सासू ॥

॥ दोहा ॥

सिख सीतलि हित मधुर मृदु सुनि सीतहि न सोहानि ।

सरद चंद चंदनि लगत जनु चकई अकुलानि ॥78॥

॥ चौपाई ॥

सीय सकुच बस उतरु न देई । सो सुनि तमकि उठी कैकेई ॥

मुनि पट भूषन भाजन आनी । आगें धरि बोली मृदु बानी ॥

नृपहि प्रान प्रिय तुम्ह रघुबीरा । सील सनेह न छाड़िहि भीरा ॥

सुकृत सुजसु परलोकु नसाऊ । तुम्हहि जान बन कहिहि न काऊ ॥

अस बिचारि सोइ करहु जो भावा । राम जननि सिख सुनि सुखु पावा ॥

भूपहि बचन बानसम लागे । करहिं न प्रान पयान अभागे ॥

लोग बिकल मुरुछित नरनाहू । काह करिअ कछु सूझ न काहू ॥

रामु तुरत मुनि बेषु बनाई । चले जनक जननिहि सिरु नाई ॥

॥ दोहा ॥

सजि बन साजु समाजु सबु बनिता बंधु समेत ।

बंदि बिप्र गुर चरन प्रभु चले करि सबहि अचेत ॥79॥

॥ चौपाई ॥

निकसि बसिष्ठ द्वार भए ठाढ़े । देखे लोग बिरह दव दाढ़े ॥

कहि प्रिय बचन सकल समुझाए । बिप्र बृंद रघुबीर बोलाए ॥

गुर सन कहि बरषासन दीन्हे । आदर दान बिनय बस कीन्हे ॥

जाचक दान मान संतोषे । मीत पुनीत प्रेम परितोषे ॥

दासीं दास बोलाइ बहोरी । गुरहि सौंपि बोले कर जोरी ॥

सब कै सार सँभार गोसाईं । करबि जनक जननी की नाई ॥

बारहिं बार जोरि जुग पानी । कहत रामु सब सन मृदु बानी ॥

सोइ सब भाँति मोर हितकारी । जेहि तें रहै भुआल सुखारी ॥

॥ दोहा ॥

मातु सकल मोरे बिरहँ जेहिं न होहिं दुख दीन ।

सोइ उपाउ तुम्ह करेहु सब पुर जन परम प्रबीन ॥80॥

॥ चौपाई ॥

एहि बिधि राम सबहि समुझावा । गुर पद पदुम हरषि सिरु नावा ।

गनपती गौरि गिरीसु मनाई । चले असीस पाइ रघुराई ॥

राम चलत अति भयउ बिषादू । सुनि न जाइ पुर आरत नादू ॥

कुसगुन लंक अवध अति सोकू । हहरष बिषाद बिबस सुरलोकू ॥

गइ मुरुछा तब भूपति जागे । बोलि सुमंत्रु कहन अस लागे ॥

रामु चले बन प्रान न जाहीं । केहि सुख लागि रहत तन माहीं ।

एहि तें कवन ब्यथा बलवाना । जो दुखु पाइ तजहिं तनु प्राना ॥

पुनि धरि धीर कहइ नरनाहू । लै रथु संग सखा तुम्ह जाहू ॥

॥ दोहा ॥

सुठि सुकुमार कुमार दोउ जनकसुता सुकुमारि ।

रथ चढ़ाइ देखराइ बनु फिरेहु गएँ दिन चारि ॥81॥

॥ चौपाई ॥

जौ नहिं फिरहिं धीर दोउ भाई । सत्यसंध दृढ़ब्रत रघुराई ॥

तौ तुम्ह बिनय करेहु कर जोरी । फेरिअ प्रभु मिथिलेसकिसोरी ॥

जब सिय कानन देखि डेराई । कहेहु मोरि सिख अवसरु पाई ॥

सासु ससुर अस कहेउ सँदेसू । पुत्रि फिरिअ बन बहुत कलेसू ॥

पितृगृह कबहुँ कबहुँ ससुरारी । रहेहु जहाँ रुचि होइ तुम्हारी ॥

एहि बिधि करेहु उपाय कदंबा । फिरइ त होइ प्रान अवलंबा ॥

नाहिं त मोर मरनु परिनामा । कछु न बसाइ भएँ बिधि बामा ॥

अस कहि मुरुछि परा महि राऊ । रामु लखनु सिय आनि देखाऊ ॥

॥ दोहा ॥

पाइ रजायसु नाइ सिरु रथु अति बेग बनाइ ।

गयउ जहाँ बाहेर नगर सीय सहित दोउ भाइ ॥82॥

॥ चौपाई ॥

तब सुमंत्र नृप बचन सुनाए । करि बिनती रथ रामु चढ़ाए ॥

चढ़ि रथ सीय सहित दोउ भाई । चले हृदयँ अवधहि सिरु नाई ॥

चलत रामु लखि अवध अनाथा । बिकल लोग सब लागे साथा ॥

कृपासिंधु बहुबिधि समुझावहिं । फिरहिं प्रेम बस पुनि फिरि आवहिं ॥

लागति अवध भयावनि भारी । मानहुँ कालराति अँधिआरी ॥

घोर जंतु सम पुर नर नारी । डरपहिं एकहि एक निहारी ॥

घर मसान परिजन जनु भूता । सुत हित मीत मनहुँ जमदूता ॥

बागन्ह बिटप बेलि कुम्हिलाहीं । सरित सरोवर देखि न जाहीं ॥

॥ दोहा ॥

हय गय कोटिन्ह केलिमृग पुरपसु चातक मोर ।

पिक रथांग सुक सारिका सारस हंस चकोर ॥83॥

॥ चौपाई ॥

राम बियोग बिकल सब ठाढ़े । जहँ तहँ मनहुँ चित्र लिखि काढ़े ॥

नगरु सफल बनु गहबर भारी । खग मृग बिपुल सकल नर नारी ॥

बिधि कैकेई किरातिनि कीन्ही । जेंहि दव दुसह दसहुँ दिसि दीन्ही ॥

सहि न सके रघुबर बिरहागी । चले लोग सब ब्याकुल भागी ॥

सबहिं बिचार कीन्ह मन माहीं । राम लखन सिय बिनु सुखु नाहीं ॥

जहाँ रामु तहँ सबुइ समाजू । बिनु रघुबीर अवध नहिं काजू ॥

चले साथ अस मंत्रु दृढ़ाई । सुर दुर्लभ सुख सदन बिहाई ॥

राम चरन पंकज प्रिय जिन्हही । बिषय भोग बस करहिं कि तिन्हही ॥

॥ दोहा ॥

बालक बृद्ध बिहाइ गृँह लगे लोग सब साथ ।

तमसा तीर निवासु किय प्रथम दिवस रघुनाथ ॥84॥

॥ चौपाई ॥

रघुपति प्रजा प्रेमबस देखी । सदय हृदयँ दुखु भयउ बिसेषी ॥

करुनामय रघुनाथ गोसाँई । बेगि पाइअहिं पीर पराई ॥

कहि सप्रेम मृदु बचन सुहाए । बहुबिधि राम लोग समुझाए ॥

किए धरम उपदेस घनेरे । लोग प्रेम बस फिरहिं न फेरे ॥

सीलु सनेहु छाड़ि नहिं जाई । असमंजस बस भे रघुराई ॥

लोग सोग श्रम बस गए सोई । कछुक देवमायाँ मति मोई ॥

जबहिं जाम जुग जामिनि बीती । राम सचिव सन कहेउ सप्रीती ॥

खोज मारि रथु हाँकहु ताता । आन उपायँ बनिहि नहिं बाता ॥

॥ दोहा ॥

राम लखन सुय जान चढ़ि संभु चरन सिरु नाइ ॥

सचिवँ चलायउ तुरत रथु इत उत खोज दुराइ ॥85॥

॥ चौपाई ॥

जागे सकल लोग भएँ भोरू । गे रघुनाथ भयउ अति सोरू ॥

रथ कर खोज कतहहुँ नहिं पावहिं । राम राम कहि चहु दिसि धावहिं ॥

मनहुँ बारिनिधि बूड़ जहाजू । भयउ बिकल बड़ बनिक समाजू ॥

एकहि एक देंहिं उपदेसू । तजे राम हम जानि कलेसू ॥

निंदहिं आपु सराहहिं मीना । धिग जीवनु रघुबीर बिहीना ॥

जौं पै प्रिय बियोगु बिधि कीन्हा । तौ कस मरनु न मागें दीन्हा ॥

एहि बिधि करत प्रलाप कलापा । आए अवध भरे परितापा ॥

बिषम बियोगु न जाइ बखाना । अवधि आस सब राखहिं प्राना ॥

॥ दोहा ॥

राम दरस हित नेम ब्रत लगे करन नर नारि ।

मनहुँ कोक कोकी कमल दीन बिहीन तमारि ॥86॥

॥ चौपाई ॥

सीता सचिव सहित दोउ भाई । सृंगबेरपुर पहुँचे जाई ॥

उतरे राम देवसरि देखी । कीन्ह दंडवत हरषु बिसेषी ॥

लखन सचिवँ सियँ किए प्रनामा । सबहि सहित सुखु पायउ रामा ॥

गंग सकल मुद मंगल मूला । सब सुख करनि हरनि सब सूला ॥

कहि कहि कोटिक कथा प्रसंगा । रामु बिलोकहिं गंग तरंगा ॥

सचिवहि अनुजहि प्रियहि सुनाई । बिबुध नदी महिमा अधिकाई ॥

मज्जनु कीन्ह पंथ श्रम गयऊ । सुचि जलु पिअत मुदित मन भयऊ ॥

सुमिरत जाहि मिटइ श्रम भारू । तेहि श्रम यह लौकिक ब्यवहारू ॥

॥ दोहा ॥

सुध्द सचिदानंदमय कंद भानुकुल केतु ।

चरित करत नर अनुहरत संसृति सागर सेतु ॥87॥

॥ चौपाई ॥

यह सुधि गुहँ निषाद जब पाई । मुदित लिए प्रिय बंधु बोलाई ॥

लिए फल मूल भेंट भरि भारा । मिलन चलेउ हिँयँ हरषु अपारा ॥

करि दंडवत भेंट धरि आगें । प्रभुहि बिलोकत अति अनुरागें ॥

सहज सनेह बिबस रघुराई । पूँछी कुसल निकट बैठाई ॥

नाथ कुसल पद पंकज देखें । भयउँ भागभाजन जन लेखें ॥

देव धरनि धनु धामु तुम्हारा । मैं जनु नीचु सहित परिवारा ॥

कृपा करिअ पुर धारिअ पाऊ । थापिय जनु सबु लोगु सिहाऊ ॥

कहेहु सत्य सबु सखा सुजाना । मोहि दीन्ह पितु आयसु आना ॥

॥ दोहा ॥

बरष चारिदस बासु बन मुनि ब्रत बेषु अहारु ।

ग्राम बासु नहिं उचित सुनि गुहहि भयउ दुखु भारु ॥88॥

॥ चौपाई ॥

राम लखन सिय रूप निहारी । कहहिं सप्रेम ग्राम नर नारी ॥

ते पितु मातु कहहु सखि कैसे । जिन्ह पठए बन बालक ऐसे ॥

एक कहहिं भल भूपति कीन्हा । लोयन लाहु हमहि बिधि दीन्हा ॥

तब निषादपति उर अनुमाना । तरु सिंसुपा मनोहर जाना ॥

लै रघुनाथहि ठाउँ देखावा । कहेउ राम सब भाँति सुहावा ॥

पुरजन करि जोहारु घर आए । रघुबर संध्या करन सिधाए ॥

गुहँ सँवारि साँथरी डसाई । कुस किसलयमय मृदुल सुहाई ॥

सुचि फल मूल मधुर मृदु जानी । दोना भरि भरि राखेसि पानी ॥

॥ दोहा ॥

सिय सुमंत्र भ्रातासहित कंद मूल फल खाइ ।

सयन कीन्ह रघुबंसमनि पाय पलोटत भाइ ॥89॥

॥ चौपाई ॥

उठे लखनु प्रभु सोवत जानी । कहि सचिवहि सोवन मृदु बानी ॥

कछुक दूर सजि बान सरासन । जागन लगे बैठि बीरासन ॥

गुँह बोलाइ पाहरू प्रतीती । ठावँ ठाँव राखे अति प्रीती ॥

आपु लखन पहिं बैठेउ जाई । कटि भाथी सर चाप चढ़ाई ॥

सोवत प्रभुहि निहारि निषादू । भयउ प्रेम बस ह्दयँ बिषादू ॥

तनु पुलकित जलु लोचन बहई । बचन सप्रेम लखन सन कहई ॥

भूपति भवन सुभायँ सुहावा । सुरपति सदनु न पटतर पावा ॥

मनिमय रचित चारु चौबारे । जनु रतिपति निज हाथ सँवारे ॥

॥ दोहा ॥

सुचि सुबिचित्र सुभोगमय सुमन सुगंध सुबास ।

पलँग मंजु मनिदीप जहँ सब बिधि सकल सुपास ॥90॥

॥ चौपाई ॥

बिबिध बसन उपधान तुराई । छीर फेन मृदु बिसद सुहाई ॥

तहँ सिय रामु सयन निसि करहीं । निज छबि रति मनोज मदु हरहीं ॥

ते सिय रामु साथरीं सोए । श्रमित बसन बिनु जाहिं न जोए ॥

मातु पिता परिजन पुरबासी । सखा सुसील दास अरु दासी ॥

जोगवहिं जिन्हहि प्रान की नाई । महि सोवत तेइ राम गोसाईं ॥

पिता जनक जग बिदित प्रभाऊ । ससुर सुरेस सखा रघुराऊ ॥

रामचंदु पति सो बैदेही । सोवत महि बिधि बाम न केही ॥

सिय रघुबीर कि कानन जोगू । करम प्रधान सत्य कह लोगू ॥

॥ दोहा ॥

कैकयनंदिनि मंदमतिकठिन कुटिलपनु कीन्ह ।

जेहीं रघुनंदन जानकिहि सुख अवसर दुखु दीन्ह ॥91॥

॥ चौपाई ॥

भइ दिनकर कुल बिटप कुठारी । कुमति कीन्ह सब बिस्व दुखारी ॥

भयउ बिषादु निषादहि भारी । राम सीय महि सयन निहारी ॥

बोले लखन मधुर मृदु बानी । ग्यान बिराग भगति रस सानी ॥

काहु न कोउ सुख दुख कर दाता । निज कृत करम भोग सबु भ्राता ॥

जोग बियोग भोग भल मंदा । हित अनहित मध्यम भ्रम फंदा ॥

जनमु मरनु जहँ लगि जग जालू । संपती बिपति करमु अरु कालू ॥

धरनि धामु धनु पुर परिवारू । सरगु नरकु जहँ लगि ब्यवहारू ॥

देखिअ सुनिअ गुनिअ मन माहीं । मोह मूल परमारथु नाहीं ॥

॥ दोहा ॥

सपनें होइ भिखारि नृप रंकु नाकपति होइ ।

जागें लाभु न हानि कछु तिमि प्रपंच जियँ जोइ ॥92॥

॥ चौपाई ॥

अस बिचारि नहिं कीजअ रोसू । काहुहि बादि न देइअ दोसू ॥

मोह निसाँ सबु सोवनिहारा । देखिअ सपन अनेक प्रकारा ॥

एहिं जग जामिनि जागहिं जोगी । परमारथी प्रपंच बियोगी ॥

जानिअ तबहिं जीव जग जागा । जब जब बिषय बिलास बिरागा ॥

होइ बिबेकु मोह भ्रम भागा । तब रघुनाथ चरन अनुरागा ॥

सखा परम परमारथु एहू । मन क्रम बचन राम पद नेहू ॥

राम ब्रह्म परमारथ रूपा । अबिगत अलख अनादि अनूपा ॥

सकल बिकार रहित गतभेदा । कहि नित नेति निरूपहिं बेदा ।

॥ दोहा ॥

भगत भूमि भूसुर सुरभि सुर हित लागि कृपाल ।

करत चरित धरि मनुज तनु सुनत मिटहि जग जाल ॥93॥

मासपारायण, पंद्रहवा विश्राम

॥ चौपाई ॥

सखा समुझि अस परिहरि मोहु । सिय रघुबीर चरन रत होहू ॥

कहत राम गुन भा भिनुसारा । जागे जग मंगल सुखदारा ॥

सकल सोच करि राम नहावा । सुचि सुजान बट छीर मगावा ॥

अनुज सहित सिर जटा बनाए । देखि सुमंत्र नयन जल छाए ॥

हृदयँ दाहु अति बदन मलीना । कह कर जोरि बचन अति दीना ॥

नाथ कहेउ अस कोसलनाथा । लै रथु जाहु राम कें साथा ॥

बनु देखाइ सुरसरि अन्हवाई । आनेहु फेरि बेगि दोउ भाई ॥

लखनु रामु सिय आनेहु फेरी । संसय सकल सँकोच निबेरी ॥

॥ दोहा ॥

नृप अस कहेउ गोसाईँ जस कहइ करौं बलि सोइ ।

करि बिनती पायन्ह परेउ दीन्ह बाल जिमि रोइ ॥94॥

॥ चौपाई ॥

तात कृपा करि कीजिअ सोई । जातें अवध अनाथ न होई ॥

मंत्रहि राम उठाइ प्रबोधा । तात धरम मतु तुम्ह सबु सोधा ॥

सिबि दधीचि हरिचंद नरेसा । सहे धरम हित कोटि कलेसा ॥

रंतिदेव बलि भूप सुजाना । धरमु धरेउ सहि संकट नाना ॥

धरमु न दूसर सत्य समाना । आगम निगम पुरान बखाना ॥

मैं सोइ धरमु सुलभ करि पावा । तजें तिहूँ पुर अपजसु छावा ॥

संभावित कहुँ अपजस लाहू । मरन कोटि सम दारुन दाहू ॥

तुम्ह सन तात बहुत का कहऊँ । दिएँ उतरु फिरि पातकु लहऊँ ॥

॥ दोहा ॥

पितु पद गहि कहि कोटि नति बिनय करब कर जोरि ।

चिंता कवनिहु बात कै तात करिअ जनि मोरि ॥95॥

॥ चौपाई ॥

तुम्ह पुनि पितु सम अति हित मोरें । बिनती करउँ तात कर जोरें ॥

सब बिधि सोइ करतब्य तुम्हारें । दुख न पाव पितु सोच हमारें ॥

सुनि रघुनाथ सचिव संबादू । भयउ सपरिजन बिकल निषादू ॥

पुनि कछु लखन कही कटु बानी । प्रभु बरजे बड़ अनुचित जानी ॥

सकुचि राम निज सपथ देवाई । लखन सँदेसु कहिअ जनि जाई ॥

कह सुमंत्रु पुनि भूप सँदेसू । सहि न सकिहि सिय बिपिन कलेसू ॥

जेहि बिधि अवध आव फिरि सीया । सोइ रघुबरहि तुम्हहि करनीया ॥

नतरु निपट अवलंब बिहीना । मैं न जिअब जिमि जल बिनु मीना ॥

॥ दोहा ॥

मइकें ससरें सकल सुख जबहिं जहाँ मनु मान ॥

तँह तब रहिहि सुखेन सिय जब लगि बिपति बिहान ॥96॥

॥ चौपाई ॥

बिनती भूप कीन्ह जेहि भाँती । आरति प्रीति न सो कहि जाती ॥

पितु सँदेसु सुनि कृपानिधाना । सियहि दीन्ह सिख कोटि बिधाना ॥

सासु ससुर गुर प्रिय परिवारू । फिरतु त सब कर मिटै खभारू ॥

सुनि पति बचन कहति बैदेही । सुनहु प्रानपति परम सनेही ॥

प्रभु करुनामय परम बिबेकी । तनु तजि रहति छाँह किमि छेंकी ॥

प्रभा जाइ कहँ भानु बिहाई । कहँ चंद्रिका चंदु तजि जाई ॥

पतिहि प्रेममय बिनय सुनाई । कहति सचिव सन गिरा सुहाई ॥

तुम्ह पितु ससुर सरिस हितकारी । उतरु देउँ फिरि अनुचित भारी ॥

॥ दोहा ॥

आरति बस सनमुख भइउँ बिलगु न मानब तात ।

आरजसुत पद कमल बिनु बादि जहाँ लगि नात ॥97॥

॥ चौपाई ॥

पितु बैभव बिलास मैं डीठा । नृप मनि मुकुट मिलित पद पीठा ॥

सुखनिधान अस पितु गृह मोरें । पिय बिहीन मन भाव न भोरें ॥

ससुर चक्कवइ कोसलराऊ । भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ ॥

आगें होइ जेहि सुरपति लेई । अरध सिंघासन आसनु देई ॥

ससुरु एतादृस अवध निवासू । प्रिय परिवारु मातु सम सासू ॥

बिनु रघुपति पद पदुम परागा । मोहि केउ सपनेहुँ सुखद न लागा ॥

अगम पंथ बनभूमि पहारा । करि केहरि सर सरित अपारा ॥

कोल किरात कुरंग बिहंगा । मोहि सब सुखद प्रानपति संगा ॥

॥ दोहा ॥

सासु ससुर सन मोरि हुँति बिनय करबि परि पायँ ॥

मोर सोचु जनि करिअ कछु मैं बन सुखी सुभायँ ॥98॥

॥ चौपाई ॥

प्राननाथ प्रिय देवर साथा । बीर धुरीन धरें धनु भाथा ॥

नहिं मग श्रमु भ्रमु दुख मन मोरें । मोहि लगि सोचु करिअ जनि भोरें ॥

सुनि सुमंत्रु सिय सीतलि बानी । भयउ बिकल जनु फनि मनि हानी ॥

नयन सूझ नहिं सुनइ न काना । कहि न सकइ कछु अति अकुलाना ॥

राम प्रबोधु कीन्ह बहु भाँति । तदपि होति नहिं सीतलि छाती ॥

जतन अनेक साथ हित कीन्हे । उचित उतर रघुनंदन दीन्हे ॥

मेटि जाइ नहिं राम रजाई । कठिन करम गति कछु न बसाई ॥

राम लखन सिय पद सिरु नाई । फिरेउ बनिक जिमि मूर गवाँई ॥

॥ दोहा ॥

रथ हाँकेउ हय राम तन हेरि हेरि हिहिनाहिं ।

देखि निषाद बिषादबस धुनहिं सीस पछिताहिं ॥99॥

॥ चौपाई ॥

जासु बियोग बिकल पसु ऐसे । प्रजा मातु पितु जिइहहिं कैसें ॥

बरबस राम सुमंत्रु पठाए । सुरसरि तीर आपु तब आए ॥

मागी नाव न केवटु आना । कहइ तुम्हार मरमु मैं जाना ॥

चरन कमल रज कहुँ सबु कहई । मानुष करनि मूरि कछु अहई ॥

छुअत सिला भइ नारि सुहाई । पाहन तें न काठ कठिनाई ॥

तरनिउ मुनि घरिनि होइ जाई । बाट परइ मोरि नाव उड़ाई ॥

एहिं प्रतिपालउँ सबु परिवारू । नहिं जानउँ कछु अउर कबारू ॥

जौ प्रभु पार अवसि गा चहहू । मोहि पद पदुम पखारन कहहू ॥

॥ छन्द ॥

छं0-पद कमल धोइ चढ़ाइ नाव न नाथ उतराई चहौं ।

मोहि राम राउरि आन दसरथ सपथ सब साची कहौं ॥

बरु तीर मारहुँ लखनु पै जब लगि न पाय पखारिहौं ।

तब लगि न तुलसीदास नाथ कृपाल पारु उतारिहौं ॥

॥ सोरठा ॥

सो0-सुनि केबट के बैन प्रेम लपेटे अटपटे ।

बिहसे करुनाऐन चितइ जानकी लखन तन ॥100॥

॥ चौपाई ॥

कृपासिंधु बोले मुसुकाई । सोइ करु जेंहि तव नाव न जाई ॥

वेगि आनु जल पाय पखारू । होत बिलंबु उतारहि पारू ॥

जासु नाम सुमरत एक बारा । उतरहिं नर भवसिंधु अपारा ॥

सोइ कृपालु केवटहि निहोरा । जेहिं जगु किय तिहु पगहु ते थोरा ॥

पद नख निरखि देवसरि हरषी । सुनि प्रभु बचन मोहँ मति करषी ॥

केवट राम रजायसु पावा । पानि कठवता भरि लेइ आवा ॥

अति आनंद उमगि अनुरागा । चरन सरोज पखारन लागा ॥

बरषि सुमन सुर सकल सिहाहीं । एहि सम पुन्यपुंज कोउ नाहीं ॥

॥ दोहा ॥

पद पखारि जलु पान करि आपु सहित परिवार ।

पितर पारु करि प्रभुहि पुनि मुदित गयउ लेइ पार ॥101॥

॥ चौपाई ॥

उतरि ठाड़ भए सुरसरि रेता । सीयराम गुह लखन समेता ॥

केवट उतरि दंडवत कीन्हा । प्रभुहि सकुच एहि नहिं कछु दीन्हा ॥

पिय हिय की सिय जाननिहारी । मनि मुदरी मन मुदित उतारी ॥

कहेउ कृपाल लेहि उतराई । केवट चरन गहे अकुलाई ॥

नाथ आजु मैं काह न पावा । मिटे दोष दुख दारिद दावा ॥

बहुत काल मैं कीन्हि मजूरी । आजु दीन्ह बिधि बनि भलि भूरी ॥

अब कछु नाथ न चाहिअ मोरें । दीनदयाल अनुग्रह तोरें ॥

फिरती बार मोहि जे देबा । सो प्रसादु मैं सिर धरि लेबा ॥

॥ दोहा ॥

बहुत कीन्ह प्रभु लखन सियँ नहिं कछु केवटु लेइ ।

बिदा कीन्ह करुनायतन भगति बिमल बरु देइ ॥102॥

॥ चौपाई ॥

तब मज्जनु करि रघुकुलनाथा । पूजि पारथिव नायउ माथा ॥

सियँ सुरसरिहि कहेउ कर जोरी । मातु मनोरथ पुरउबि मोरी ॥

पति देवर संग कुसल बहोरी । आइ करौं जेहिं पूजा तोरी ॥

सुनि सिय बिनय प्रेम रस सानी । भइ तब बिमल बारि बर बानी ॥

सुनु रघुबीर प्रिया बैदेही । तव प्रभाउ जग बिदित न केही ॥

लोकप होहिं बिलोकत तोरें । तोहि सेवहिं सब सिधि कर जोरें ॥

तुम्ह जो हमहि बड़ि बिनय सुनाई । कृपा कीन्हि मोहि दीन्हि बड़ाई ॥

तदपि देबि मैं देबि असीसा । सफल होपन हित निज बागीसा ॥

॥ दोहा ॥

प्राननाथ देवर सहित कुसल कोसला आइ ।

पूजहि सब मनकामना सुजसु रहिहि जग छाइ ॥103॥

॥ चौपाई ॥

गंग बचन सुनि मंगल मूला । मुदित सीय सुरसरि अनुकुला ॥

तब प्रभु गुहहि कहेउ घर जाहू । सुनत सूख मुखु भा उर दाहू ॥

दीन बचन गुह कह कर जोरी । बिनय सुनहु रघुकुलमनि मोरी ॥

नाथ साथ रहि पंथु देखाई । करि दिन चारि चरन सेवकाई ॥

जेहिं बन जाइ रहब रघुराई । परनकुटी मैं करबि सुहाई ॥

तब मोहि कहँ जसि देब रजाई । सोइ करिहउँ रघुबीर दोहाई ॥

सहज सनेह राम लखि तासु । संग लीन्ह गुह हृदय हुलासू ॥

पुनि गुहँ ग्याति बोलि सब लीन्हे । करि परितोषु बिदा तब कीन्हे ॥

॥ दोहा ॥

तब गनपति सिव सुमिरि प्रभु नाइ सुरसरिहि माथ ॥

सखा अनुज सिया सहित बन गवनु कीन्ह रधुनाथ ॥104॥

॥ चौपाई ॥

तेहि दिन भयउ बिटप तर बासू । लखन सखाँ सब कीन्ह सुपासू ॥

प्रात प्रातकृत करि रधुसाई । तीरथराजु दीख प्रभु जाई ॥

सचिव सत्य श्रध्दा प्रिय नारी । माधव सरिस मीतु हितकारी ॥

चारि पदारथ भरा भँडारु । पुन्य प्रदेस देस अति चारु ॥

छेत्र अगम गढ़ु गाढ़ सुहावा । सपनेहुँ नहिं प्रतिपच्छिन्ह पावा ॥

सेन सकल तीरथ बर बीरा । कलुष अनीक दलन रनधीरा ॥

संगमु सिंहासनु सुठि सोहा । छत्रु अखयबटु मुनि मनु मोहा ॥

चवँर जमुन अरु गंग तरंगा । देखि होहिं दुख दारिद भंगा ॥

॥ दोहा ॥

सेवहिं सुकृति साधु सुचि पावहिं सब मनकाम ।

बंदी बेद पुरान गन कहहिं बिमल गुन ग्राम ॥105॥

॥ चौपाई ॥

को कहि सकइ प्रयाग प्रभाऊ । कलुष पुंज कुंजर मृगराऊ ॥

अस तीरथपति देखि सुहावा । सुख सागर रघुबर सुखु पावा ॥

कहि सिय लखनहि सखहि सुनाई । श्रीमुख तीरथराज बड़ाई ॥

करि प्रनामु देखत बन बागा । कहत महातम अति अनुरागा ॥

एहि बिधि आइ बिलोकी बेनी । सुमिरत सकल सुमंगल देनी ॥

मुदित नहाइ कीन्हि सिव सेवा । पुजि जथाबिधि तीरथ देवा ॥

तब प्रभु भरद्वाज पहिं आए । करत दंडवत मुनि उर लाए ॥

मुनि मन मोद न कछु कहि जाइ । ब्रह्मानंद रासि जनु पाई ॥

॥ दोहा ॥

दीन्हि असीस मुनीस उर अति अनंदु अस जानि ।

लोचन गोचर सुकृत फल मनहुँ किए बिधि आनि ॥106॥

॥ चौपाई ॥

कुसल प्रस्न करि आसन दीन्हे । पूजि प्रेम परिपूरन कीन्हे ॥

कंद मूल फल अंकुर नीके । दिए आनि मुनि मनहुँ अमी के ॥

सीय लखन जन सहित सुहाए । अति रुचि राम मूल फल खाए ॥

भए बिगतश्रम रामु सुखारे । भरव्दाज मृदु बचन उचारे ॥

आजु सुफल तपु तीरथ त्यागू । आजु सुफल जप जोग बिरागू ॥

सफल सकल सुभ साधन साजू । राम तुम्हहि अवलोकत आजू ॥

लाभ अवधि सुख अवधि न दूजी । तुम्हारें दरस आस सब पूजी ॥

अब करि कृपा देहु बर एहू । निज पद सरसिज सहज सनेहू ॥

॥ दोहा ॥

करम बचन मन छाड़ि छलु जब लगि जनु न तुम्हार ।

तब लगि सुखु सपनेहुँ नहीं किएँ कोटि उपचार ॥

॥ चौपाई ॥

सुनि मुनि बचन रामु सकुचाने । भाव भगति आनंद अघाने ॥

तब रघुबर मुनि सुजसु सुहावा । कोटि भाँति कहि सबहि सुनावा ॥

सो बड सो सब गुन गन गेहू । जेहि मुनीस तुम्ह आदर देहू ॥

मुनि रघुबीर परसपर नवहीं । बचन अगोचर सुखु अनुभवहीं ॥

यह सुधि पाइ प्रयाग निवासी । बटु तापस मुनि सिद्ध उदासी ॥

भरद्वाज आश्रम सब आए । देखन दसरथ सुअन सुहाए ॥

राम प्रनाम कीन्ह सब काहू । मुदित भए लहि लोयन लाहू ॥

देहिं असीस परम सुखु पाई । फिरे सराहत सुंदरताई ॥

॥ दोहा ॥

राम कीन्ह बिश्राम निसि प्रात प्रयाग नहाइ ।

चले सहित सिय लखन जन मुददित मुनिहि सिरु नाइ ॥108॥

॥ चौपाई ॥

राम सप्रेम कहेउ मुनि पाहीं । नाथ कहिअ हम केहि मग जाहीं ॥

मुनि मन बिहसि राम सन कहहीं । सुगम सकल मग तुम्ह कहुँ अहहीं ॥

साथ लागि मुनि सिष्य बोलाए । सुनि मन मुदित पचासक आए ॥

सबन्हि राम पर प्रेम अपारा । सकल कहहि मगु दीख हमारा ॥

मुनि बटु चारि संग तब दीन्हे । जिन्ह बहु जनम सुकृत सब कीन्हे ॥

करि प्रनामु रिषि आयसु पाई । प्रमुदित हृदयँ चले रघुराई ॥

ग्राम निकट जब निकसहि जाई । देखहि दरसु नारि नर धाई ॥

होहि सनाथ जनम फलु पाई । फिरहि दुखित मनु संग पठाई ॥

॥ दोहा ॥

बिदा किए बटु बिनय करि फिरे पाइ मन काम ।

उतरि नहाए जमुन जल जो सरीर सम स्याम ॥109॥

॥ चौपाई ॥

सुनत तीरवासी नर नारी । धाए निज निज काज बिसारी ॥

लखन राम सिय सुन्दरताई । देखि करहिं निज भाग्य बड़ाई ॥

अति लालसा बसहिं मन माहीं । नाउँ गाउँ बूझत सकुचाहीं ॥

जे तिन्ह महुँ बयबिरिध सयाने । तिन्ह करि जुगुति रामु पहिचाने ॥

सकल कथा तिन्ह सबहि सुनाई । बनहि चले पितु आयसु पाई ॥

सुनि सबिषाद सकल पछिताहीं । रानी रायँ कीन्ह भल नाहीं ॥

तेहि अवसर एक तापसु आवा । तेजपुंज लघुबयस सुहावा ॥

कवि अलखित गति बेषु बिरागी । मन क्रम बचन राम अनुरागी ॥

॥ दोहा ॥

सजल नयन तन पुलकि निज इष्टदेउ पहिचानि ।

परेउ दंड जिमि धरनितल दसा न जाइ बखानि ॥110॥

॥ चौपाई ॥

राम सप्रेम पुलकि उर लावा । परम रंक जनु पारसु पावा ॥

मनहुँ प्रेमु परमारथु दोऊ । मिलत धरे तन कह सबु कोऊ ॥

बहुरि लखन पायन्ह सोइ लागा । लीन्ह उठाइ उमगि अनुरागा ॥

पुनि सिय चरन धूरि धरि सीसा । जननि जानि सिसु दीन्हि असीसा ॥

कीन्ह निषाद दंडवत तेही । मिलेउ मुदित लखि राम सनेही ॥

पिअत नयन पुट रूपु पियूषा । मुदित सुअसनु पाइ जिमि भूखा ॥

ते पितु मातु कहहु सखि कैसे । जिन्ह पठए बन बालक ऐसे ॥

राम लखन सिय रूपु निहारी । होहिं सनेह बिकल नर नारी ॥

॥ दोहा ॥

तब रघुबीर अनेक बिधि सखहि सिखावनु दीन्ह ।

राम रजायसु सीस धरि भवन गवनु तेँइँ कीन्ह ॥111॥

॥ चौपाई ॥

पुनि सियँ राम लखन कर जोरी । जमुनहि कीन्ह प्रनामु बहोरी ॥

चले ससीय मुदित दोउ भाई । रबितनुजा कइ करत बड़ाई ॥

पथिक अनेक मिलहिं मग जाता । कहहिं सप्रेम देखि दोउ भ्राता ॥

राज लखन सब अंग तुम्हारें । देखि सोचु अति हृदय हमारें ॥

मारग चलहु पयादेहि पाएँ । ज्योतिषु झूठ हमारें भाएँ ॥

अगमु पंथ गिरि कानन भारी । तेहि महँ साथ नारि सुकुमारी ॥

करि केहरि बन जाइ न जोई । हम सँग चलहि जो आयसु होई ॥

जाब जहाँ लगि तहँ पहुँचाई । फिरब बहोरि तुम्हहि सिरु नाई ॥

॥ दोहा ॥

एहि बिधि पूँछहिं प्रेम बस पुलक गात जलु नैन ।

कृपासिंधु फेरहि तिन्हहि कहि बिनीत मृदु बैन ॥112॥

॥ चौपाई ॥

जे पुर गाँव बसहिं मग माहीं । तिन्हहि नाग सुर नगर सिहाहीं ॥

केहि सुकृतीं केहि घरीं बसाए । धन्य पुन्यमय परम सुहाए ॥

जहँ जहँ राम चरन चलि जाहीं । तिन्ह समान अमरावति नाहीं ॥

पुन्यपुंज मग निकट निवासी । तिन्हहि सराहहिं सुरपुरबासी ॥

जे भरि नयन बिलोकहिं रामहि । सीता लखन सहित घनस्यामहि ॥

जे सर सरित राम अवगाहहिं । तिन्हहि देव सर सरित सराहहिं ॥

जेहि तरु तर प्रभु बैठहिं जाई । करहिं कलपतरु तासु बड़ाई ॥

परसि राम पद पदुम परागा । मानति भूमि भूरि निज भागा ॥

॥ दोहा ॥

छाँह करहि घन बिबुधगन बरषहि सुमन सिहाहिं ।

देखत गिरि बन बिहग मृग रामु चले मग जाहिं ॥113॥

॥ चौपाई ॥

सीता लखन सहित रघुराई । गाँव निकट जब निकसहिं जाई ॥

सुनि सब बाल बृद्ध नर नारी । चलहिं तुरत गृहकाजु बिसारी ॥

राम लखन सिय रूप निहारी । पाइ नयनफलु होहिं सुखारी ॥

सजल बिलोचन पुलक सरीरा । सब भए मगन देखि दोउ बीरा ॥

बरनि न जाइ दसा तिन्ह केरी । लहि जनु रंकन्ह सुरमनि ढेरी ॥

एकन्ह एक बोलि सिख देहीं । लोचन लाहु लेहु छन एहीं ॥

रामहि देखि एक अनुरागे । चितवत चले जाहिं सँग लागे ॥

एक नयन मग छबि उर आनी । होहिं सिथिल तन मन बर बानी ॥

॥ दोहा ॥

एक देखिं बट छाँह भलि डासि मृदुल तृन पात ।

कहहिं गवाँइअ छिनुकु श्रमु गवनब अबहिं कि प्रात ॥114॥

॥ चौपाई ॥

एक कलस भरि आनहिं पानी । अँचइअ नाथ कहहिं मृदु बानी ॥

सुनि प्रिय बचन प्रीति अति देखी । राम कृपाल सुसील बिसेषी ॥

जानी श्रमित सीय मन माहीं । घरिक बिलंबु कीन्ह बट छाहीं ॥

मुदित नारि नर देखहिं सोभा । रूप अनूप नयन मनु लोभा ॥

एकटक सब सोहहिं चहुँ ओरा । रामचंद्र मुख चंद चकोरा ॥

तरुन तमाल बरन तनु सोहा । देखत कोटि मदन मनु मोहा ॥

दामिनि बरन लखन सुठि नीके । नख सिख सुभग भावते जी के ॥

मुनिपट कटिन्ह कसें तूनीरा । सोहहिं कर कमलिनि धनु तीरा ॥

॥ दोहा ॥

जटा मुकुट सीसनि सुभग उर भुज नयन बिसाल ।

सरद परब बिधु बदन बर लसत स्वेद कन जाल ॥115॥

॥ चौपाई ॥

बरनि न जाइ मनोहर जोरी । सोभा बहुत थोरि मति मोरी ॥

राम लखन सिय सुंदरताई । सब चितवहिं चित मन मति लाई ॥

थके नारि नर प्रेम पिआसे । मनहुँ मृगी मृग देखि दिआ से ॥

सीय समीप ग्रामतिय जाहीं । पूँछत अति सनेहँ सकुचाहीं ॥

बार बार सब लागहिं पाएँ । कहहिं बचन मृदु सरल सुभाएँ ॥

राजकुमारि बिनय हम करहीं । तिय सुभायँ कछु पूँछत डरहीं ।

स्वामिनि अबिनय छमबि हमारी । बिलगु न मानब जानि गवाँरी ॥

राजकुअँर दोउ सहज सलोने । इन्ह तें लही दुति मरकत सोने ॥

॥ दोहा ॥

स्यामल गौर किसोर बर सुंदर सुषमा ऐन ।

सरद सर्बरीनाथ मुखु सरद सरोरुह नैन ॥116॥

मासपारायण, सोलहवाँ विश्राम

नवान्हपारायण, चौथा विश्राम

॥ चौपाई ॥

कोटि मनोज लजावनिहारे । सुमुखि कहहु को आहिं तुम्हारे ॥

सुनि सनेहमय मंजुल बानी । सकुची सिय मन महुँ मुसुकानी ॥

तिन्हहि बिलोकि बिलोकति धरनी । दुहुँ सकोच सकुचित बरबरनी ॥

सकुचि सप्रेम बाल मृग नयनी । बोली मधुर बचन पिकबयनी ॥

सहज सुभाय सुभग तन गोरे । नामु लखनु लघु देवर मोरे ॥

बहुरि बदनु बिधु अंचल ढाँकी । पिय तन चितइ भौंह करि बाँकी ॥

खंजन मंजु तिरीछे नयननि । निज पति कहेउ तिन्हहि सियँ सयननि ॥

भइ मुदित सब ग्रामबधूटीं । रंकन्ह राय रासि जनु लूटीं ॥

॥ दोहा ॥

अति सप्रेम सिय पायँ परि बहुबिधि देहिं असीस ।

सदा सोहागिनि होहु तुम्ह जब लगि महि अहि सीस ॥117॥

॥ चौपाई ॥

पारबती सम पतिप्रिय होहू । देबि न हम पर छाड़ब छोहू ॥

पुनि पुनि बिनय करिअ कर जोरी । जौं एहि मारग फिरिअ बहोरी ॥

दरसनु देब जानि निज दासी । लखीं सीयँ सब प्रेम पिआसी ॥

मधुर बचन कहि कहि परितोषीं । जनु कुमुदिनीं कौमुदीं पोषीं ॥

तबहिं लखन रघुबर रुख जानी । पूँछेउ मगु लोगन्हि मृदु बानी ॥

सुनत नारि नर भए दुखारी । पुलकित गात बिलोचन बारी ॥

मिटा मोदु मन भए मलीने । बिधि निधि दीन्ह लेत जनु छीने ॥

समुझि करम गति धीरजु कीन्हा । सोधि सुगम मगु तिन्ह कहि दीन्हा ॥

॥ दोहा ॥

लखन जानकी सहित तब गवनु कीन्ह रघुनाथ ।

फेरे सब प्रिय बचन कहि लिए लाइ मन साथ ॥118॥

॥ चौपाई ॥

फिरत नारि नर अति पछिताहीं । देअहि दोषु देहिं मन माहीं ॥

सहित बिषाद परसपर कहहीं । बिधि करतब उलटे सब अहहीं ॥

निपट निरंकुस निठुर निसंकू । जेहिं ससि कीन्ह सरुज सकलंकू ॥

रूख कलपतरु सागरु खारा । तेहिं पठए बन राजकुमारा ॥

जौं पे इन्हहि दीन्ह बनबासू । कीन्ह बादि बिधि भोग बिलासू ॥

ए बिचरहिं मग बिनु पदत्राना । रचे बादि बिधि बाहन नाना ॥

ए महि परहिं डासि कुस पाता । सुभग सेज कत सृजत बिधाता ॥

तरुबर बास इन्हहि बिधि दीन्हा । धवल धाम रचि रचि श्रमु कीन्हा ॥

॥ दोहा ॥

जौं ए मुनि पट धर जटिल सुंदर सुठि सुकुमार ।

बिबिध भाँति भूषन बसन बादि किए करतार ॥119॥

॥ चौपाई ॥

जौं ए कंद मूल फल खाहीं । बादि सुधादि असन जग माहीं ॥

एक कहहिं ए सहज सुहाए । आपु प्रगट भए बिधि न बनाए ॥

जहँ लगि बेद कही बिधि करनी । श्रवन नयन मन गोचर बरनी ॥

देखहु खोजि भुअन दस चारी । कहँ अस पुरुष कहाँ असि नारी ॥

इन्हहि देखि बिधि मनु अनुरागा । पटतर जोग बनावै लागा ॥

कीन्ह बहुत श्रम ऐक न आए । तेहिं इरिषा बन आनि दुराए ॥

एक कहहिं हम बहुत न जानहिं । आपुहि परम धन्य करि मानहिं ॥

ते पुनि पुन्यपुंज हम लेखे । जे देखहिं देखिहहिं जिन्ह देखे ॥

॥ दोहा ॥

एहि बिधि कहि कहि बचन प्रिय लेहिं नयन भरि नीर ।

किमि चलिहहि मारग अगम सुठि सुकुमार सरीर ॥120॥

॥ चौपाई ॥

नारि सनेह बिकल बस होहीं । चकई साँझ समय जनु सोहीं ॥

मृदु पद कमल कठिन मगु जानी । गहबरि हृदयँ कहहिं बर बानी ॥

परसत मृदुल चरन अरुनारे । सकुचति महि जिमि हृदय हमारे ॥

जौं जगदीस इन्हहि बनु दीन्हा । कस न सुमनमय मारगु कीन्हा ॥

जौं मागा पाइअ बिधि पाहीं । ए रखिअहिं सखि आँखिन्ह माहीं ॥

जे नर नारि न अवसर आए । तिन्ह सिय रामु न देखन पाए ॥

सुनि सुरुप बूझहिं अकुलाई । अब लगि गए कहाँ लगि भाई ॥

समरथ धाइ बिलोकहिं जाई । प्रमुदित फिरहिं जनमफलु पाई ॥

॥ दोहा ॥

अबला बालक बृद्ध जन कर मीजहिं पछिताहिं ॥

होहिं प्रेमबस लोग इमि रामु जहाँ जहँ जाहिं ॥121॥

॥ चौपाई ॥

गाँव गाँव अस होइ अनंदू । देखि भानुकुल कैरव चंदू ॥

जे कछु समाचार सुनि पावहिं । ते नृप रानिहि दोसु लगावहिं ॥

कहहिं एक अति भल नरनाहू । दीन्ह हमहि जोइ लोचन लाहू ॥

कहहिं परस्पर लोग लोगाईं । बातें सरल सनेह सुहाईं ॥

ते पितु मातु धन्य जिन्ह जाए । धन्य सो नगरु जहाँ तें आए ॥

धन्य सो देसु सैलु बन गाऊँ । जहँ जहँ जाहिं धन्य सोइ ठाऊँ ॥

सुख पायउ बिरंचि रचि तेही । ए जेहि के सब भाँति सनेही ॥

राम लखन पथि कथा सुहाई । रही सकल मग कानन छाई ॥

॥ दोहा ॥

एहि बिधि रघुकुल कमल रबि मग लोगन्ह सुख देत ।

जाहिं चले देखत बिपिन सिय सौमित्रि समेत ॥122॥

॥ चौपाई ॥

आगे रामु लखनु बने पाछें । तापस बेष बिराजत काछें ॥

उभय बीच सिय सोहति कैसे । ब्रह्म जीव बिच माया जैसे ॥

बहुरि कहउँ छबि जसि मन बसई । जनु मधु मदन मध्य रति लसई ॥

उपमा बहुरि कहउँ जियँ जोही । जनु बुध बिधु बिच रोहिनि सोही ॥

प्रभु पद रेख बीच बिच सीता । धरति चरन मग चलति सभीता ॥

सीय राम पद अंक बराएँ । लखन चलहिं मगु दाहिन लाएँ ॥

राम लखन सिय प्रीति सुहाई । बचन अगोचर किमि कहि जाई ॥

खग मृग मगन देखि छबि होहीं । लिए चोरि चित राम बटोहीं ॥

॥ दोहा ॥

जिन्ह जिन्ह देखे पथिक प्रिय सिय समेत दोउ भाइ ।

भव मगु अगमु अनंदु तेइ बिनु श्रम रहे सिराइ ॥123॥

॥ दोहा ॥

अजहुँ जासु उर सपनेहुँ काऊ । बसहुँ लखनु सिय रामु बटाऊ ॥

राम धाम पथ पाइहि सोई । जो पथ पाव कबहुँ मुनि कोई ॥

तब रघुबीर श्रमित सिय जानी । देखि निकट बटु सीतल पानी ॥

तहँ बसि कंद मूल फल खाई । प्रात नहाइ चले रघुराई ॥

देखत बन सर सैल सुहाए । बालमीकि आश्रम प्रभु आए ॥

राम दीख मुनि बासु सुहावन । सुंदर गिरि काननु जलु पावन ॥

सरनि सरोज बिटप बन फूले । गुंजत मंजु मधुप रस भूले ॥

खग मृग बिपुल कोलाहल करहीं । बिरहित बैर मुदित मन चरहीं ॥

॥ दोहा ॥

सुचि सुंदर आश्रमु निरखि हरषे राजिवनेन ।

सुनि रघुबर आगमनु मुनि आगें आयउ लेन ॥124॥

॥ चौपाई ॥

मुनि कहुँ राम दंडवत कीन्हा । आसिरबादु बिप्रबर दीन्हा ॥

देखि राम छबि नयन जुड़ाने । करि सनमानु आश्रमहिं आने ॥

मुनिबर अतिथि प्रानप्रिय पाए । कंद मूल फल मधुर मगाए ॥

सिय सौमित्रि राम फल खाए । तब मुनि आश्रम दिए सुहाए ॥

बालमीकि मन आनँदु भारी । मंगल मूरति नयन निहारी ॥

तब कर कमल जोरि रघुराई । बोले बचन श्रवन सुखदाई ॥

तुम्ह त्रिकाल दरसी मुनिनाथा । बिस्व बदर जिमि तुम्हरें हाथा ॥

अस कहि प्रभु सब कथा बखानी । जेहि जेहि भाँति दीन्ह बनु रानी ॥

॥ दोहा ॥

तात बचन पुनि मातु हित भाइ भरत अस राउ ।

मो कहुँ दरस तुम्हार प्रभु सबु मम पुन्य प्रभाउ ॥125॥

॥ चौपाई ॥

देखि पाय मुनिराय तुम्हारे । भए सुकृत सब सुफल हमारे ॥

अब जहँ राउर आयसु होई । मुनि उदबेगु न पावै कोई ॥

मुनि तापस जिन्ह तें दुखु लहहीं । ते नरेस बिनु पावक दहहीं ॥

मंगल मूल बिप्र परितोषू । दहइ कोटि कुल भूसुर रोषू ॥

अस जियँ जानि कहिअ सोइ ठाऊँ । सिय सौमित्रि सहित जहँ जाऊँ ॥

तहँ रचि रुचिर परन तृन साला । बासु करौ कछु काल कृपाला ॥

सहज सरल सुनि रघुबर बानी । साधु साधु बोले मुनि ग्यानी ॥

कस न कहहु अस रघुकुलकेतू । तुम्ह पालक संतत श्रुति सेतू ॥

॥ छन्द ॥

श्रुति सेतु पालक राम तुम्ह जगदीस माया जानकी ।

जो सृजति जगु पालति हरति रूख पाइ कृपानिधान की ॥

जो सहससीसु अहीसु महिधरु लखनु सचराचर धनी ।

सुर काज धरि नरराज तनु चले दलन खल निसिचर अनी ॥

॥ सोरठा ॥

राम सरुप तुम्हार बचन अगोचर बुद्धिपर ।

अबिगत अकथ अपार नेति नित निगम कह ॥126॥

॥ चौपाई ॥

जगु पेखन तुम्ह देखनिहारे । बिधि हरि संभु नचावनिहारे ॥

तेउ न जानहिं मरमु तुम्हारा । औरु तुम्हहि को जाननिहारा ॥

सोइ जानइ जेहि देहु जनाई । जानत तुम्हहि तुम्हइ होइ जाई ॥

तुम्हरिहि कृपाँ तुम्हहि रघुनंदन । जानहिं भगत भगत उर चंदन ॥

चिदानंदमय देह तुम्हारी । बिगत बिकार जान अधिकारी ॥

नर तनु धरेहु संत सुर काजा । कहहु करहु जस प्राकृत राजा ॥

राम देखि सुनि चरित तुम्हारे । जड़ मोहहिं बुध होहिं सुखारे ॥

तुम्ह जो कहहु करहु सबु साँचा । जस काछिअ तस चाहिअ नाचा ॥

॥ दोहा ॥

पूँछेहु मोहि कि रहौं कहँ मैं पूँछत सकुचाउँ ।

जहँ न होहु तहँ देहु कहि तुम्हहि देखावौं ठाउँ ॥127॥

॥ चौपाई ॥

सुनि मुनि बचन प्रेम रस साने । सकुचि राम मन महुँ मुसुकाने ॥

बालमीकि हँसि कहहिं बहोरी । बानी मधुर अमिअ रस बोरी ॥

सुनहु राम अब कहउँ निकेता । जहाँ बसहु सिय लखन समेता ॥

जिन्ह के श्रवन समुद्र समाना । कथा तुम्हारि सुभग सरि नाना ॥

भरहिं निरंतर होहिं न पूरे । तिन्ह के हिय तुम्ह कहुँ गृह रूरे ॥

लोचन चातक जिन्ह करि राखे । रहहिं दरस जलधर अभिलाषे ॥

निदरहिं सरित सिंधु सर भारी । रूप बिंदु जल होहिं सुखारी ॥

तिन्ह के हृदय सदन सुखदायक । बसहु बंधु सिय सह रघुनायक ॥

॥ दोहा ॥

जसु तुम्हार मानस बिमल हंसिनि जीहा जासु ।

मुकुताहल गुन गन चुनइ राम बसहु हियँ तासु ॥128॥

॥ चौपाई ॥

प्रभु प्रसाद सुचि सुभग सुबासा । सादर जासु लहइ नित नासा ॥

तुम्हहि निबेदित भोजन करहीं । प्रभु प्रसाद पट भूषन धरहीं ॥

सीस नवहिं सुर गुरु द्विज देखी । प्रीति सहित करि बिनय बिसेषी ॥

कर नित करहिं राम पद पूजा । राम भरोस हृदयँ नहि दूजा ॥

चरन राम तीरथ चलि जाहीं । राम बसहु तिन्ह के मन माहीं ॥

मंत्रराजु नित जपहिं तुम्हारा । पूजहिं तुम्हहि सहित परिवारा ॥

तरपन होम करहिं बिधि नाना । बिप्र जेवाँइ देहिं बहु दाना ॥

तुम्ह तें अधिक गुरहि जियँ जानी । सकल भायँ सेवहिं सनमानी ॥

॥ दोहा ॥

सबु करि मागहिं एक फलु राम चरन रति होउ ।

तिन्ह कें मन मंदिर बसहु सिय रघुनंदन दोउ ॥129॥

॥ चौपाई ॥

काम कोह मद मान न मोहा । लोभ न छोभ न राग न द्रोहा ॥

जिन्ह कें कपट दंभ नहिं माया । तिन्ह कें हृदय बसहु रघुराया ॥

सब के प्रिय सब के हितकारी । दुख सुख सरिस प्रसंसा गारी ॥

कहहिं सत्य प्रिय बचन बिचारी । जागत सोवत सरन तुम्हारी ॥

तुम्हहि छाड़ि गति दूसरि नाहीं । राम बसहु तिन्ह के मन माहीं ॥

जननी सम जानहिं परनारी । धनु पराव बिष तें बिष भारी ॥

जे हरषहिं पर संपति देखी । दुखित होहिं पर बिपति बिसेषी ॥

जिन्हहि राम तुम्ह प्रानपिआरे । तिन्ह के मन सुभ सदन तुम्हारे ॥

॥ दोहा ॥

स्वामि सखा पितु मातु गुर जिन्ह के सब तुम्ह तात ।

मन मंदिर तिन्ह कें बसहु सीय सहित दोउ भ्रात ॥130॥

॥ चौपाई ॥

अवगुन तजि सब के गुन गहहीं । बिप्र धेनु हित संकट सहहीं ॥

नीति निपुन जिन्ह कइ जग लीका । घर तुम्हार तिन्ह कर मनु नीका ॥

गुन तुम्हार समुझइ निज दोसा । जेहि सब भाँति तुम्हार भरोसा ॥

राम भगत प्रिय लागहिं जेही । तेहि उर बसहु सहित बैदेही ॥

जाति पाँति धनु धरम बड़ाई । प्रिय परिवार सदन सुखदाई ॥

सब तजि तुम्हहि रहइ उर लाई । तेहि के हृदयँ रहहु रघुराई ॥

सरगु नरकु अपबरगु समाना । जहँ तहँ देख धरें धनु बाना ॥

करम बचन मन राउर चेरा । राम करहु तेहि कें उर डेरा ॥

॥ दोहा ॥

जाहि न चाहिअ कबहुँ कछु तुम्ह सन सहज सनेहु ।

बसहु निरंतर तासु मन सो राउर निज गेहु ॥131॥

॥ चौपाई ॥

एहि बिधि मुनिबर भवन देखाए । बचन सप्रेम राम मन भाए ॥

कह मुनि सुनहु भानुकुलनायक । आश्रम कहउँ समय सुखदायक ॥

चित्रकूट गिरि करहु निवासू । तहँ तुम्हार सब भाँति सुपासू ॥

सैलु सुहावन कानन चारू । करि केहरि मृग बिहग बिहारू ॥

नदी पुनीत पुरान बखानी । अत्रिप्रिया निज तपबल आनी ॥

सुरसरि धार नाउँ मंदाकिनि । जो सब पातक पोतक डाकिनि ॥

अत्रि आदि मुनिबर बहु बसहीं । करहिं जोग जप तप तन कसहीं ॥

चलहु सफल श्रम सब कर करहू । राम देहु गौरव गिरिबरहू ॥

॥ दोहा ॥

चित्रकूट महिमा अमित कहीं महामुनि गाइ ।

आए नहाए सरित बर सिय समेत दोउ भाइ ॥132॥

रघुबर कहेउ लखन भल घाटू । करहु कतहुँ अब ठाहर ठाटू ॥

लखन दीख पय उतर करारा । चहुँ दिसि फिरेउ धनुष जिमि नारा ॥

नदी पनच सर सम दम दाना । सकल कलुष कलि साउज नाना ॥

चित्रकूट जनु अचल अहेरी । चुकइ न घात मार मुठभेरी ॥

अस कहि लखन ठाउँ देखरावा । थलु बिलोकि रघुबर सुखु पावा ॥

रमेउ राम मनु देवन्ह जाना । चले सहित सुर थपति प्रधाना ॥

कोल किरात बेष सब आए । रचे परन तृन सदन सुहाए ॥

बरनि न जाहि मंजु दुइ साला । एक ललित लघु एक बिसाला ॥

॥ चौपाई ॥

लखन जानकी सहित प्रभु राजत रुचिर निकेत ।

सोह मदनु मुनि बेष जनु रति रितुराज समेत ॥133॥

मासपारायण, सत्रहँवा विश्राम

॥ चौपाई ॥

अमर नाग किंनर दिसिपाला । चित्रकूट आए तेहि काला ॥

राम प्रनामु कीन्ह सब काहू । मुदित देव लहि लोचन लाहू ॥

बरषि सुमन कह देव समाजू । नाथ सनाथ भए हम आजू ॥

करि बिनती दुख दुसह सुनाए । हरषित निज निज सदन सिधाए ॥

चित्रकूट रघुनंदनु छाए । समाचार सुनि सुनि मुनि आए ॥

आवत देखि मुदित मुनिबृंदा । कीन्ह दंडवत रघुकुल चंदा ॥

मुनि रघुबरहि लाइ उर लेहीं । सुफल होन हित आसिष देहीं ॥

सिय सौमित्र राम छबि देखहिं । साधन सकल सफल करि लेखहिं ॥

॥ दोहा ॥

जथाजोग सनमानि प्रभु बिदा किए मुनिबृंद ।

करहि जोग जप जाग तप निज आश्रमन्हि सुछंद ॥134॥

॥ चौपाई ॥

यह सुधि कोल किरातन्ह पाई । हरषे जनु नव निधि घर आई ॥

कंद मूल फल भरि भरि दोना । चले रंक जनु लूटन सोना ॥

तिन्ह महँ जिन्ह देखे दोउ भ्राता । अपर तिन्हहि पूँछहि मगु जाता ॥

कहत सुनत रघुबीर निकाई । आइ सबन्हि देखे रघुराई ॥

करहिं जोहारु भेंट धरि आगे । प्रभुहि बिलोकहिं अति अनुरागे ॥

चित्र लिखे जनु जहँ तहँ ठाढ़े । पुलक सरीर नयन जल बाढ़े ॥

राम सनेह मगन सब जाने । कहि प्रिय बचन सकल सनमाने ॥

प्रभुहि जोहारि बहोरि बहोरी । बचन बिनीत कहहिं कर जोरी ॥

॥ दोहा ॥

अब हम नाथ सनाथ सब भए देखि प्रभु पाय ।

भाग हमारे आगमनु राउर कोसलराय ॥135॥

॥ चौपाई ॥

धन्य भूमि बन पंथ पहारा । जहँ जहँ नाथ पाउ तुम्ह धारा ॥

धन्य बिहग मृग काननचारी । सफल जनम भए तुम्हहि निहारी ॥

हम सब धन्य सहित परिवारा । दीख दरसु भरि नयन तुम्हारा ॥

कीन्ह बासु भल ठाउँ बिचारी । इहाँ सकल रितु रहब सुखारी ॥

हम सब भाँति करब सेवकाई । करि केहरि अहि बाघ बराई ॥

बन बेहड़ गिरि कंदर खोहा । सब हमार प्रभु पग पग जोहा ॥

तहँ तहँ तुम्हहि अहेर खेलाउब । सर निरझर जलठाउँ देखाउब ॥

हम सेवक परिवार समेता । नाथ न सकुचब आयसु देता ॥

॥ दोहा ॥

बेद बचन मुनि मन अगम ते प्रभु करुना ऐन ।

बचन किरातन्ह के सुनत जिमि पितु बालक बैन ॥136॥

॥ चौपाई ॥

रामहि केवल प्रेमु पिआरा । जानि लेउ जो जाननिहारा ॥

राम सकल बनचर तब तोषे । कहि मृदु बचन प्रेम परिपोषे ॥

बिदा किए सिर नाइ सिधाए । प्रभु गुन कहत सुनत घर आए ॥

एहि बिधि सिय समेत दोउ भाई । बसहिं बिपिन सुर मुनि सुखदाई ॥

जब ते आइ रहे रघुनायकु । तब तें भयउ बनु मंगलदायकु ॥

फूलहिं फलहिं बिटप बिधि नाना ॥मंजु बलित बर बेलि बिताना ॥

सुरतरु सरिस सुभायँ सुहाए । मनहुँ बिबुध बन परिहरि आए ॥

गंज मंजुतर मधुकर श्रेनी । त्रिबिध बयारि बहइ सुख देनी ॥

॥ दोहा ॥

नीलकंठ कलकंठ सुक चातक चक्क चकोर ।

भाँति भाँति बोलहिं बिहग श्रवन सुखद चित चोर ॥137॥

॥ चौपाई ॥

केरि केहरि कपि कोल कुरंगा । बिगतबैर बिचरहिं सब संगा ॥

फिरत अहेर राम छबि देखी । होहिं मुदित मृगबंद बिसेषी ॥

बिबुध बिपिन जहँ लगि जग माहीं । देखि राम बनु सकल सिहाहीं ॥

सुरसरि सरसइ दिनकर कन्या । मेकलसुता गोदावरि धन्या ॥

सब सर सिंधु नदी नद नाना । मंदाकिनि कर करहिं बखाना ॥

उदय अस्त गिरि अरु कैलासू । मंदर मेरु सकल सुरबासू ॥

सैल हिमाचल आदिक जेते । चित्रकूट जसु गावहिं तेते ॥

िंधि मुदित मन सुखु न समाई । श्रम बिनु बिपुल बड़ाई पाई ॥

॥ दोहा ॥

चित्रकूट के बिहग मृग बेलि बिटप तृन जाति ।

पुन्य पुंज सब धन्य अस कहहिं देव दिन राति ॥138॥

॥ चौपाई ॥

नयनवंत रघुबरहि बिलोकी । पाइ जनम फल होहिं बिसोकी ॥

परसि चरन रज अचर सुखारी । भए परम पद के अधिकारी ॥

सो बनु सैलु सुभायँ सुहावन । मंगलमय अति पावन पावन ॥

महिमा कहिअ कवनि बिधि तासू । सुखसागर जहँ कीन्ह निवासू ॥

पय पयोधि तजि अवध बिहाई । जहँ सिय लखनु रामु रहे आई ॥

कहि न सकहिं सुषमा जसि कानन । जौं सत सहस होंहिं सहसानन ॥

सो मैं बरनि कहौं बिधि केहीं । डाबर कमठ कि मंदर लेहीं ॥

सेवहिं लखनु करम मन बानी । जाइ न सीलु सनेहु बखानी ॥

॥ दोहा ॥

छिनु छिनु लखि सिय राम पद जानि आपु पर नेहु ।

करत न सपनेहुँ लखनु चितु बंधु मातु पितु गेहु ॥139॥

॥ चौपाई ॥

राम संग सिय रहति सुखारी । पुर परिजन गृह सुरति बिसारी ॥

छिनु छिनु पिय बिधु बदनु निहारी । प्रमुदित मनहुँ चकोरकुमारी ॥

नाह नेहु नित बढ़त बिलोकी । हरषित रहति दिवस जिमि कोकी ॥

सिय मनु राम चरन अनुरागा । अवध सहस सम बनु प्रिय लागा ॥

परनकुटी प्रिय प्रियतम संगा । प्रिय परिवारु कुरंग बिहंगा ॥

सासु ससुर सम मुनितिय मुनिबर । असनु अमिअ सम कंद मूल फर ॥

नाथ साथ साँथरी सुहाई । मयन सयन सय सम सुखदाई ॥

लोकप होहिं बिलोकत जासू । तेहि कि मोहि सक बिषय बिलासू ॥

॥ दोहा ॥

सुमिरत रामहि तजहिं जन तृन सम बिषय बिलासु ।

रामप्रिया जग जननि सिय कछु न आचरजु तासु ॥140॥

॥ चौपाई ॥

सीय लखन जेहि बिधि सुखु लहहीं । सोइ रघुनाथ करहि सोइ कहहीं ॥

कहहिं पुरातन कथा कहानी । सुनहिं लखनु सिय अति सुखु मानी ।

जब जब रामु अवध सुधि करहीं । तब तब बारि बिलोचन भरहीं ॥

सुमिरि मातु पितु परिजन भाई । भरत सनेहु सीलु सेवकाई ॥

कृपासिंधु प्रभु होहिं दुखारी । धीरजु धरहिं कुसमउ बिचारी ॥

लखि सिय लखनु बिकल होइ जाहीं । जिमि पुरुषहि अनुसर परिछाहीं ॥

प्रिया बंधु गति लखि रघुनंदनु । धीर कृपाल भगत उर चंदनु ॥

लगे कहन कछु कथा पुनीता । सुनि सुखु लहहिं लखनु अरु सीता ॥

॥ चौपाई ॥

रामु लखन सीता सहित सोहत परन निकेत ।

जिमि बासव बस अमरपुर सची जयंत समेत ॥141॥

॥ चौपाई ॥

जोगवहिं प्रभु सिय लखनहिं कैसें । पलक बिलोचन गोलक जैसें ॥

सेवहिं लखनु सीय रघुबीरहि । जिमि अबिबेकी पुरुष सरीरहि ॥

एहि बिधि प्रभु बन बसहिं सुखारी । खग मृग सुर तापस हितकारी ॥

कहेउँ राम बन गवनु सुहावा । सुनहु सुमंत्र अवध जिमि आवा ॥

फिरेउ निषादु प्रभुहि पहुँचाई । सचिव सहित रथ देखेसि आई ॥

मंत्री बिकल बिलोकि निषादू । कहि न जाइ जस भयउ बिषादू ॥

राम राम सिय लखन पुकारी । परेउ धरनितल ब्याकुल भारी ॥

देखि दखिन दिसि हय हिहिनाहीं । जनु बिनु पंख बिहग अकुलाहीं ॥

॥ दोहा ॥

नहिं तृन चरहिं पिअहिं जलु मोचहिं लोचन बारि ।

ब्याकुल भए निषाद सब रघुबर बाजि निहारि ॥142॥

॥ चौपाई ॥

धरि धीरज तब कहइ निषादू । अब सुमंत्र परिहरहु बिषादू ॥

तुम्ह पंडित परमारथ ग्याता । धरहु धीर लखि बिमुख बिधाता

बिबिध कथा कहि कहि मृदु बानी । रथ बैठारेउ बरबस आनी ॥

सोक सिथिल रथ सकइ न हाँकी । रघुबर बिरह पीर उर बाँकी ॥

चरफराहिँ मग चलहिं न घोरे । बन मृग मनहुँ आनि रथ जोरे ॥

अढ़ुकि परहिं फिरि हेरहिं पीछें । राम बियोगि बिकल दुख तीछें ॥

जो कह रामु लखनु बैदेही । हिंकरि हिंकरि हित हेरहिं तेही ॥

बाजि बिरह गति कहि किमि जाती । बिनु मनि फनिक बिकल जेहि भाँती ॥

॥ दोहा ॥

भयउ निषाद बिषादबस देखत सचिव तुरंग ।

बोलि सुसेवक चारि तब दिए सारथी संग ॥143॥

॥ चौपाई ॥

गुह सारथिहि फिरेउ पहुँचाई । बिरहु बिषादु बरनि नहिं जाई ॥

चले अवध लेइ रथहि निषादा । होहि छनहिं छन मगन बिषादा ॥

सोच सुमंत्र बिकल दुख दीना । धिग जीवन रघुबीर बिहीना ॥

रहिहि न अंतहुँ अधम सरीरू । जसु न लहेउ बिछुरत रघुबीरू ॥

भए अजस अघ भाजन प्राना । कवन हेतु नहिं करत पयाना ॥

अहह मंद मनु अवसर चूका । अजहुँ न हृदय होत दुइ टूका ॥

मीजि हाथ सिरु धुनि पछिताई । मनहँ कृपन धन रासि गवाँई ॥

बिरिद बाँधि बर बीरु कहाई । चलेउ समर जनु सुभट पराई ॥

॥ दोहा ॥

बिप्र बिबेकी बेदबिद संमत साधु सुजाति ।

जिमि धोखें मदपान कर सचिव सोच तेहि भाँति ॥144॥

॥ चौपाई ॥

जिमि कुलीन तिय साधु सयानी । पतिदेवता करम मन बानी ॥

रहै करम बस परिहरि नाहू । सचिव हृदयँ तिमि दारुन दाहु ॥

लोचन सजल डीठि भइ थोरी । सुनइ न श्रवन बिकल मति भोरी ॥

सूखहिं अधर लागि मुहँ लाटी । जिउ न जाइ उर अवधि कपाटी ॥

बिबरन भयउ न जाइ निहारी । मारेसि मनहुँ पिता महतारी ॥

हानि गलानि बिपुल मन ब्यापी । जमपुर पंथ सोच जिमि पापी ॥

बचनु न आव हृदयँ पछिताई । अवध काह मैं देखब जाई ॥

राम रहित रथ देखिहि जोई । सकुचिहि मोहि बिलोकत सोई ॥

॥ दोहा ॥

धाइ पूँछिहहिं मोहि जब बिकल नगर नर नारि ।

उतरु देब मैं सबहि तब हृदयँ बज्रु बैठारि ॥145॥

॥ चौपाई ॥

पुछिहहिं दीन दुखित सब माता । कहब काह मैं तिन्हहि बिधाता ॥

पूछिहि जबहिं लखन महतारी । कहिहउँ कवन सँदेस सुखारी ॥

राम जननि जब आइहि धाई । सुमिरि बच्छु जिमि धेनु लवाई ॥

पूँछत उतरु देब मैं तेही । गे बनु राम लखनु बैदेही ॥

जोइ पूँछिहि तेहि ऊतरु देबा ।जाइ अवध अब यहु सुखु लेबा ॥

पूँछिहि जबहिं राउ दुख दीना । जिवनु जासु रघुनाथ अधीना ॥

देहउँ उतरु कौनु मुहु लाई । आयउँ कुसल कुअँर पहुँचाई ॥

सुनत लखन सिय राम सँदेसू । तृन जिमि तनु परिहरिहि नरेसू ॥

॥ दोहा ॥

ह्रदउ न बिदरेउ पंक जिमि बिछुरत प्रीतमु नीरु ॥

जानत हौं मोहि दीन्ह बिधि यहु जातना सरीरु ॥146॥

॥ चौपाई ॥

एहि बिधि करत पंथ पछितावा । तमसा तीर तुरत रथु आवा ॥

बिदा किए करि बिनय निषादा । फिरे पायँ परि बिकल बिषादा ॥

पैठत नगर सचिव सकुचाई । जनु मारेसि गुर बाँभन गाई ॥

बैठि बिटप तर दिवसु गवाँवा । साँझ समय तब अवसरु पावा ॥

अवध प्रबेसु कीन्ह अँधिआरें । पैठ भवन रथु राखि दुआरें ॥

जिन्ह जिन्ह समाचार सुनि पाए । भूप द्वार रथु देखन आए ॥

रथु पहिचानि बिकल लखि घोरे । गरहिं गात जिमि आतप ओरे ॥

नगर नारि नर ब्याकुल कैंसें । निघटत नीर मीनगन जैंसें ॥

॥ दोहा ॥

सचिव आगमनु सुनत सबु बिकल भयउ रनिवासु ।

भवन भयंकरु लाग तेहि मानहुँ प्रेत निवासु ॥147॥

॥ चौपाई ॥

अति आरति सब पूँछहिं रानी । उतरु न आव बिकल भइ बानी ॥

सुनइ न श्रवन नयन नहिं सूझा । कहहु कहाँ नृप तेहि तेहि बूझा ॥

दासिन्ह दीख सचिव बिकलाई । कौसल्या गृहँ गईं लवाई ॥

जाइ सुमंत्र दीख कस राजा । अमिअ रहित जनु चंदु बिराजा ॥

आसन सयन बिभूषन हीना । परेउ भूमितल निपट मलीना ॥

लेइ उसासु सोच एहि भाँती । सुरपुर तें जनु खँसेउ जजाती ॥

लेत सोच भरि छिनु छिनु छाती । जनु जरि पंख परेउ संपाती ॥

राम राम कह राम सनेही । पुनि कह राम लखन बैदेही ॥

॥ दोहा ॥

देखि सचिवँ जय जीव कहि कीन्हेउ दंड प्रनामु ।

सुनत उठेउ ब्याकुल नृपति कहु सुमंत्र कहँ रामु ॥148॥

॥ चौपाई ॥

भूप सुमंत्रु लीन्ह उर लाई । बूड़त कछु अधार जनु पाई ॥

सहित सनेह निकट बैठारी । पूँछत राउ नयन भरि बारी ॥

राम कुसल कहु सखा सनेही । कहँ रघुनाथु लखनु बैदेही ॥

आने फेरि कि बनहि सिधाए । सुनत सचिव लोचन जल छाए ॥

सोक बिकल पुनि पूँछ नरेसू । कहु सिय राम लखन संदेसू ॥

राम रूप गुन सील सुभाऊ । सुमिरि सुमिरि उर सोचत राऊ ॥

राउ सुनाइ दीन्ह बनबासू । सुनि मन भयउ न हरषु हराँसू ॥

सो सुत बिछुरत गए न प्राना । को पापी बड़ मोहि समाना ॥

॥ दोहा ॥

सखा रामु सिय लखनु जहँ तहाँ मोहि पहुँचाउ ।

नाहिं त चाहत चलन अब प्रान कहउँ सतिभाउ ॥149॥

॥ चौपाई ॥

पुनि पुनि पूँछत मंत्रहि राऊ । प्रियतम सुअन सँदेस सुनाऊ ॥

करहि सखा सोइ बेगि उपाऊ । रामु लखनु सिय नयन देखाऊ ॥

सचिव धीर धरि कह मुदु बानी । महाराज तुम्ह पंडित ग्यानी ॥

बीर सुधीर धुरंधर देवा । साधु समाजु सदा तुम्ह सेवा ॥

जनम मरन सब दुख भोगा । हानि लाभ प्रिय मिलन बियोगा ॥

काल करम बस हौहिं गोसाईं । बरबस राति दिवस की नाईं ॥

सुख हरषहिं जड़ दुख बिलखाहीं । दोउ सम धीर धरहिं मन माहीं ॥

धीरज धरहु बिबेकु बिचारी । छाड़िअ सोच सकल हितकारी ॥

॥ दोहा ॥

प्रथम बासु तमसा भयउ दूसर सुरसरि तीर ।

न्हाई रहे जलपानु करि सिय समेत दोउ बीर ॥150॥

॥ चौपाई ॥

केवट कीन्हि बहुत सेवकाई । सो जामिनि सिंगरौर गवाँई ॥

होत प्रात बट छीरु मगावा । जटा मुकुट निज सीस बनावा ॥

राम सखाँ तब नाव मगाई । प्रिया चढ़ाइ चढ़े रघुराई ॥

लखन बान धनु धरे बनाई । आपु चढ़े प्रभु आयसु पाई ॥

बिकल बिलोकि मोहि रघुबीरा । बोले मधुर बचन धरि धीरा ॥

तात प्रनामु तात सन कहेहु । बार बार पद पंकज गहेहू ॥

करबि पायँ परि बिनय बहोरी । तात करिअ जनि चिंता मोरी ॥

बन मग मंगल कुसल हमारें । कृपा अनुग्रह पुन्य तुम्हारें ॥

छं0- तुम्हरे अनुग्रह तात कानन जात सब सुखु पाइहौं ।

प्रतिपालि आयसु कुसल देखन पाय पुनि फिरि आइहौं ॥

जननीं सकल परितोषि परि परि पायँ करि बिनती घनी ।

तुलसी करेहु सोइ जतनु जेहिं कुसली रहहिं कोसल धनी ॥

॥ दोहा ॥

सो0-गुर सन कहब सँदेसु बार बार पद पदुम गहि ।

करब सोइ उपदेसु जेहिं न सोच मोहि अवधपति ॥151॥

॥ चौपाई ॥

पुरजन परिजन सकल निहोरी । तात सुनाएहु बिनती मोरी ॥

सोइ सब भाँति मोर हितकारी । जातें रह नरनाहु सुखारी ॥

कहब सँदेसु भरत के आएँ । नीति न तजिअ राजपदु पाएँ ॥

पालेहु प्रजहि करम मन बानी । सेएहु मातु सकल सम जानी ॥

ओर निबाहेहु भायप भाई । करि पितु मातु सुजन सेवकाई ॥

तात भाँति तेहि राखब राऊ । सोच मोर जेहिं करै न काऊ ॥

लखन कहे कछु बचन कठोरा । बरजि राम पुनि मोहि निहोरा ॥

बार बार निज सपथ देवाई । कहबि न तात लखन लरिकाई ॥

॥ दोहा ॥

कहि प्रनाम कछु कहन लिय सिय भइ सिथिल सनेह ।

थकित बचन लोचन सजल पुलक पल्लवित देह ॥152॥

॥ चौपाई ॥

तेहि अवसर रघुबर रूख पाई । केवट पारहि नाव चलाई ॥

रघुकुलतिलक चले एहि भाँती । देखउँ ठाढ़ कुलिस धरि छाती ॥

मैं आपन किमि कहौं कलेसू । जिअत फिरेउँ लेइ राम सँदेसू ॥

अस कहि सचिव बचन रहि गयऊ । हानि गलानि सोच बस भयऊ ॥

सुत बचन सुनतहिं नरनाहू । परेउ धरनि उर दारुन दाहू ॥

तलफत बिषम मोह मन मापा । माजा मनहुँ मीन कहुँ ब्यापा ॥

करि बिलाप सब रोवहिं रानी । महा बिपति किमि जाइ बखानी ॥

सुनि बिलाप दुखहू दुखु लागा । धीरजहू कर धीरजु भागा ॥

॥ दोहा ॥

भयउ कोलाहलु अवध अति सुनि नृप राउर सोरु ।

बिपुल बिहग बन परेउ निसि मानहुँ कुलिस कठोरु ॥153॥

॥ चौपाई ॥

प्रान कंठगत भयउ भुआलू । मनि बिहीन जनु ब्याकुल ब्यालू ॥

इद्रीं सकल बिकल भइँ भारी । जनु सर सरसिज बनु बिनु बारी ॥

कौसल्याँ नृपु दीख मलाना । रबिकुल रबि अँथयउ जियँ जाना ।

उर धरि धीर राम महतारी । बोली बचन समय अनुसारी ॥

नाथ समुझि मन करिअ बिचारू । राम बियोग पयोधि अपारू ॥

करनधार तुम्ह अवध जहाजू । चढ़ेउ सकल प्रिय पथिक समाजू ॥

धीरजु धरिअ त पाइअ पारू । नाहिं त बूड़िहि सबु परिवारू ॥

जौं जियँ धरिअ बिनय पिय मोरी । रामु लखनु सिय मिलहिं बहोरी ॥

॥ दोहा ॥

दो0–प्रिया बचन मृदु सुनत नृपु चितयउ आँखि उघारि ।

तलफत मीन मलीन जनु सींचत सीतल बारि ॥154॥

॥ चौपाई ॥

धरि धीरजु उठी बैठ भुआलू । कहु सुमंत्र कहँ राम कृपालू ॥

कहाँ लखनु कहँ रामु सनेही । कहँ प्रिय पुत्रबधू बैदेही ॥

बिलपत राउ बिकल बहु भाँती । भइ जुग सरिस सिराति न राती ॥

तापस अंध साप सुधि आई । कौसल्यहि सब कथा सुनाई ॥

भयउ बिकल बरनत इतिहासा । राम रहित धिग जीवन आसा ॥

सो तनु राखि करब मैं काहा । जेंहि न प्रेम पनु मोर निबाहा ॥

हा रघुनंदन प्रान पिरीते । तुम्ह बिनु जिअत बहुत दिन बीते ॥

हा जानकी लखन हा रघुबर । हा पितु हित चित चातक जलधर ।

॥ दोहा ॥

राम राम कहि राम कहि राम राम कहि राम ।

तनु परिहरि रघुबर बिरहँ राउ गयउ सुरधाम ॥155॥

॥ चौपाई ॥

जिअन मरन फलु दसरथ पावा । अंड अनेक अमल जसु छावा ॥

जिअत राम बिधु बदनु निहारा । राम बिरह करि मरनु सँवारा ॥

सोक बिकल सब रोवहिं रानी । रूपु सील बलु तेजु बखानी ॥

करहिं बिलाप अनेक प्रकारा । परहीं भूमितल बारहिं बारा ॥

बिलपहिं बिकल दास अरु दासी । घर घर रुदनु करहिं पुरबासी ॥

अँथयउ आजु भानुकुल भानू । धरम अवधि गुन रूप निधानू ॥

गारीं सकल कैकइहि देहीं । नयन बिहीन कीन्ह जग जेहीं ॥

एहि बिधि बिलपत रैनि बिहानी । आए सकल महामुनि ग्यानी ॥

॥ दोहा ॥

तब बसिष्ठ मुनि समय सम कहि अनेक इतिहास ।

सोक नेवारेउ सबहि कर निज बिग्यान प्रकास ॥156॥

॥ चौपाई ॥

तेल नाँव भरि नृप तनु राखा । दूत बोलाइ बहुरि अस भाषा ॥

धावहु बेगि भरत पहिं जाहू । नृप सुधि कतहुँ कहहु जनि काहू ॥

एतनेइ कहेहु भरत सन जाई । गुर बोलाई पठयउ दोउ भाई ॥

सुनि मुनि आयसु धावन धाए । चले बेग बर बाजि लजाए ॥

अनरथु अवध अरंभेउ जब तें । कुसगुन होहिं भरत कहुँ तब तें ॥

देखहिं राति भयानक सपना । जागि करहिं कटु कोटि कलपना ॥

बिप्र जेवाँइ देहिं दिन दाना । सिव अभिषेक करहिं बिधि नाना ॥

मागहिं हृदयँ महेस मनाई । कुसल मातु पितु परिजन भाई ॥

॥ दोहा ॥

एहि बिधि सोचत भरत मन धावन पहुँचे आइ ।

गुर अनुसासन श्रवन सुनि चले गनेसु मनाइ ॥157॥

॥ चौपाई ॥

चले समीर बेग हय हाँके । नाघत सरित सैल बन बाँके ॥

हृदयँ सोचु बड़ कछु न सोहाई । अस जानहिं जियँ जाउँ उड़ाई ॥

एक निमेष बरस सम जाई । एहि बिधि भरत नगर निअराई ॥

असगुन होहिं नगर पैठारा । रटहिं कुभाँति कुखेत करारा ॥

खर सिआर बोलहिं प्रतिकूला । सुनि सुनि होइ भरत मन सूला ॥

श्रीहत सर सरिता बन बागा । नगरु बिसेषि भयावनु लागा ॥

खग मृग हय गय जाहिं न जोए । राम बियोग कुरोग बिगोए ॥

नगर नारि नर निपट दुखारी । मनहुँ सबन्हि सब संपति हारी ॥

॥ दोहा ॥

पुरजन मिलिहिं न कहहिं कछु गवँहिं जोहारहिं जाहिं ।

भरत कुसल पूँछि न सकहिं भय बिषाद मन माहिं ॥158॥

॥ चौपाई ॥

हाट बाट नहिं जाइ निहारी । जनु पुर दहँ दिसि लागि दवारी ॥

आवत सुत सुनि कैकयनंदिनि । हरषी रबिकुल जलरुह चंदिनि ॥

सजि आरती मुदित उठि धाई । द्वारेहिं भेंटि भवन लेइ आई ॥

भरत दुखित परिवारु निहारा । मानहुँ तुहिन बनज बनु मारा ॥

कैकेई हरषित एहि भाँति । मनहुँ मुदित दव लाइ किराती ॥

सुतहि ससोच देखि मनु मारें । पूँछति नैहर कुसल हमारें ॥

सकल कुसल कहि भरत सुनाई । पूँछी निज कुल कुसल भलाई ॥

कहु कहँ तात कहाँ सब माता । कहँ सिय राम लखन प्रिय भ्राता ॥

॥ दोहा ॥

सुनि सुत बचन सनेहमय कपट नीर भरि नैन ।

भरत श्रवन मन सूल सम पापिनि बोली बैन ॥159॥

॥ चौपाई ॥

तात बात मैं सकल सँवारी । भै मंथरा सहाय बिचारी ॥

कछुक काज बिधि बीच बिगारेउ । भूपति सुरपति पुर पगु धारेउ ॥

सुनत भरतु भए बिबस बिषादा । जनु सहमेउ करि केहरि नादा ॥

तात तात हा तात पुकारी । परे भूमितल ब्याकुल भारी ॥

चलत न देखन पायउँ तोही । तात न रामहि सौंपेहु मोही ॥

बहुरि धीर धरि उठे सँभारी । कहु पितु मरन हेतु महतारी ॥

सुनि सुत बचन कहति कैकेई । मरमु पाँछि जनु माहुर देई ॥

आदिहु तें सब आपनि करनी । कुटिल कठोर मुदित मन बरनी ॥

॥ दोहा ॥

भरतहि बिसरेउ पितु मरन सुनत राम बन गौनु ।

हेतु अपनपउ जानि जियँ थकित रहे धरि मौनु ॥160॥

॥ चौपाई ॥

बिकल बिलोकि सुतहि समुझावति । मनहुँ जरे पर लोनु लगावति ॥

तात राउ नहिं सोचे जोगू । बिढ़इ सुकृत जसु कीन्हेउ भोगू ॥

जीवत सकल जनम फल पाए । अंत अमरपति सदन सिधाए ॥

अस अनुमानि सोच परिहरहू । सहित समाज राज पुर करहू ॥

सुनि सुठि सहमेउ राजकुमारू । पाकें छत जनु लाग अँगारू ॥

धीरज धरि भरि लेहिं उसासा । पापनि सबहि भाँति कुल नासा ॥

जौं पै कुरुचि रही अति तोही । जनमत काहे न मारे मोही ॥

पेड़ काटि तैं पालउ सींचा । मीन जिअन निति बारि उलीचा ॥

॥ दोहा ॥

हंसबंसु दसरथु जनकु राम लखन से भाइ ।

जननी तूँ जननी भई बिधि सन कछु न बसाइ ॥161॥

॥ चौपाई ॥

जब तैं कुमति कुमत जियँ ठयऊ । खंड खंड होइ ह्रदउ न गयऊ ॥

बर मागत मन भइ नहिं पीरा । गरि न जीह मुहँ परेउ न कीरा ॥

भूपँ प्रतीत तोरि किमि कीन्ही । मरन काल बिधि मति हरि लीन्ही ॥

बिधिहुँ न नारि हृदय गति जानी । सकल कपट अघ अवगुन खानी ॥

सरल सुसील धरम रत राऊ । सो किमि जानै तीय सुभाऊ ॥

अस को जीव जंतु जग माहीं । जेहि रघुनाथ प्रानप्रिय नाहीं ॥

भे अति अहित रामु तेउ तोही । को तू अहसि सत्य कहु मोही ॥

जो हसि सो हसि मुहँ मसि लाई । आँखि ओट उठि बैठहिं जाई ॥

॥ दोहा ॥

राम बिरोधी हृदय तें प्रगट कीन्ह बिधि मोहि ।

मो समान को पातकी बादि कहउँ कछु तोहि ॥162॥

॥ चौपाई ॥

सुनि सत्रुघुन मातु कुटिलाई । जरहिं गात रिस कछु न बसाई ॥

तेहि अवसर कुबरी तहँ आई । बसन बिभूषन बिबिध बनाई ॥

लखि रिस भरेउ लखन लघु भाई । बरत अनल घृत आहुति पाई ॥

हुमगि लात तकि कूबर मारा । परि मुह भर महि करत पुकारा ॥

कूबर टूटेउ फूट कपारू । दलित दसन मुख रुधिर प्रचारू ॥

आह दइअ मैं काह नसावा । करत नीक फलु अनइस पावा ॥

सुनि रिपुहन लखि नख सिख खोटी । लगे घसीटन धरि धरि झोंटी ॥

भरत दयानिधि दीन्हि छड़ाई । कौसल्या पहिं गे दोउ भाई ॥

॥ दोहा ॥

मलिन बसन बिबरन बिकल कृस सरीर दुख भार ।

कनक कलप बर बेलि बन मानहुँ हनी तुसार ॥163॥

॥ चौपाई ॥

भरतहि देखि मातु उठि धाई । मुरुछित अवनि परी झइँ आई ॥

देखत भरतु बिकल भए भारी । परे चरन तन दसा बिसारी ॥

मातु तात कहँ देहि देखाई । कहँ सिय रामु लखनु दोउ भाई ॥

कैकइ कत जनमी जग माझा । जौं जनमि त भइ काहे न बाँझा ॥

कुल कलंकु जेहिं जनमेउ मोही । अपजस भाजन प्रियजन द्रोही ॥

को तिभुवन मोहि सरिस अभागी । गति असि तोरि मातु जेहि लागी ॥

पितु सुरपुर बन रघुबर केतू । मैं केवल सब अनरथ हेतु ॥

धिग मोहि भयउँ बेनु बन आगी । दुसह दाह दुख दूषन भागी ॥

॥ दोहा ॥

मातु भरत के बचन मृदु सुनि सुनि उठी सँभारि ॥

लिए उठाइ लगाइ उर लोचन मोचति बारि ॥164॥

॥ चौपाई ॥

सरल सुभाय मायँ हियँ लाए । अति हित मनहुँ राम फिरि आए ॥

भेंटेउ बहुरि लखन लघु भाई । सोकु सनेहु न हृदयँ समाई ॥

देखि सुभाउ कहत सबु कोई । राम मातु अस काहे न होई ॥

माताँ भरतु गोद बैठारे । आँसु पौंछि मृदु बचन उचारे ॥

अजहुँ बच्छ बलि धीरज धरहू । कुसमउ समुझि सोक परिहरहू ॥

जनि मानहु हियँ हानि गलानी । काल करम गति अघटित जानि ॥

काहुहि दोसु देहु जनि ताता । भा मोहि सब बिधि बाम बिधाता ॥

जो एतेहुँ दुख मोहि जिआवा । अजहुँ को जानइ का तेहि भावा ॥

॥ दोहा ॥

पितु आयस भूषन बसन तात तजे रघुबीर ।

बिसमउ हरषु न हृदयँ कछु पहिरे बलकल चीर ॥165॥

॥ चौपाई ॥

मुख प्रसन्न मन रंग न रोषू । सब कर सब बिधि करि परितोषू ॥

चले बिपिन सुनि सिय सँग लागी । रहइ न राम चरन अनुरागी ॥

सुनतहिं लखनु चले उठि साथा । रहहिं न जतन किए रघुनाथा ॥

तब रघुपति सबही सिरु नाई । चले संग सिय अरु लघु भाई ॥

रामु लखनु सिय बनहि सिधाए । गइउँ न संग न प्रान पठाए ॥

यहु सबु भा इन्ह आँखिन्ह आगें । तउ न तजा तनु जीव अभागें ॥

मोहि न लाज निज नेहु निहारी । राम सरिस सुत मैं महतारी ॥

जिऐ मरै भल भूपति जाना । मोर हृदय सत कुलिस समाना ॥

॥ दोहा ॥

कौसल्या के बचन सुनि भरत सहित रनिवास ।

ब्याकुल बिलपत राजगृह मानहुँ सोक नेवासु ॥166॥

॥ चौपाई ॥

बिलपहिं बिकल भरत दोउ भाई । कौसल्याँ लिए हृदयँ लगाई ॥

भाँति अनेक भरतु समुझाए । कहि बिबेकमय बचन सुनाए ॥

भरतहुँ मातु सकल समुझाईं । कहि पुरान श्रुति कथा सुहाईं ॥

छल बिहीन सुचि सरल सुबानी । बोले भरत जोरि जुग पानी ॥

जे अघ मातु पिता सुत मारें । गाइ गोठ महिसुर पुर जारें ॥

जे अघ तिय बालक बध कीन्हें । मीत महीपति माहुर दीन्हें ॥

जे पातक उपपातक अहहीं । करम बचन मन भव कबि कहहीं ॥

ते पातक मोहि होहुँ बिधाता । जौं यहु होइ मोर मत माता ॥

॥ दोहा ॥

जे परिहरि हरि हर चरन भजहिं भूतगन घोर ।

तेहि कइ गति मोहि देउ बिधि जौं जननी मत मोर ॥167॥

॥ चौपाई ॥

बेचहिं बेदु धरमु दुहि लेहीं । पिसुन पराय पाप कहि देहीं ॥

कपटी कुटिल कलहप्रिय क्रोधी । बेद बिदूषक बिस्व बिरोधी ॥

लोभी लंपट लोलुपचारा । जे ताकहिं परधनु परदारा ॥

पावौं मैं तिन्ह के गति घोरा । जौं जननी यहु संमत मोरा ॥

जे नहिं साधुसंग अनुरागे । परमारथ पथ बिमुख अभागे ॥

जे न भजहिं हरि नरतनु पाई । जिन्हहि न हरि हर सुजसु सोहाई ॥

तजि श्रुतिपंथु बाम पथ चलहीं । बंचक बिरचि बेष जगु छलहीं ॥

तिन्ह कै गति मोहि संकर देऊ । जननी जौं यहु जानौं भेऊ ॥

॥ दोहा ॥

मातु भरत के बचन सुनि साँचे सरल सुभायँ ।

कहति राम प्रिय तात तुम्ह सदा बचन मन कायँ ॥168॥

॥ चौपाई ॥

राम प्रानहु तें प्रान तुम्हारे । तुम्ह रघुपतिहि प्रानहु तें प्यारे ॥

बिधु बिष चवै स्त्रवै हिमु आगी । होइ बारिचर बारि बिरागी ॥

भएँ ग्यानु बरु मिटै न मोहू । तुम्ह रामहि प्रतिकूल न होहू ॥

मत तुम्हार यहु जो जग कहहीं । सो सपनेहुँ सुख सुगति न लहहीं ॥

अस कहि मातु भरतु हियँ लाए । थन पय स्त्रवहिं नयन जल छाए ॥

करत बिलाप बहुत यहि भाँती । बैठेहिं बीति गइ सब राती ॥

बामदेउ बसिष्ठ तब आए । सचिव महाजन सकल बोलाए ॥

मुनि बहु भाँति भरत उपदेसे । कहि परमारथ बचन सुदेसे ॥

॥ दोहा ॥

तात हृदयँ धीरजु धरहु करहु जो अवसर आजु ।

उठे भरत गुर बचन सुनि करन कहेउ सबु साजु ॥169॥

॥ चौपाई ॥

नृपतनु बेद बिदित अन्हवावा । परम बिचित्र बिमानु बनावा ॥

गहि पद भरत मातु सब राखी । रहीं रानि दरसन अभिलाषी ॥

चंदन अगर भार बहु आए । अमित अनेक सुगंध सुहाए ॥

सरजु तीर रचि चिता बनाई । जनु सुरपुर सोपान सुहाई ॥

एहि बिधि दाह क्रिया सब कीन्ही । बिधिवत न्हाइ तिलांजुलि दीन्ही ॥

सोधि सुमृति सब बेद पुराना । कीन्ह भरत दसगात बिधाना ॥

जहँ जस मुनिबर आयसु दीन्हा । तहँ तस सहस भाँति सबु कीन्हा ॥

भए बिसुद्ध दिए सब दाना । धेनु बाजि गज बाहन नाना ॥

॥ दोहा ॥

सिंघासन भूषन बसन अन्न धरनि धन धाम ।

दिए भरत लहि भूमिसुर भे परिपूरन काम ॥170॥

॥ चौपाई ॥

पितु हित भरत कीन्हि जसि करनी । सो मुख लाख जाइ नहिं बरनी ॥

सुदिनु सोधि मुनिबर तब आए । सचिव महाजन सकल बोलाए ॥

बैठे राजसभाँ सब जाई । पठए बोलि भरत दोउ भाई ॥

भरतु बसिष्ठ निकट बैठारे । नीति धरममय बचन उचारे ॥

प्रथम कथा सब मुनिबर बरनी । कैकइ कुटिल कीन्हि जसि करनी ॥

भूप धरमब्रतु सत्य सराहा । जेहिं तनु परिहरि प्रेमु निबाहा ॥

कहत राम गुन सील सुभाऊ । सजल नयन पुलकेउ मुनिराऊ ॥

बहुरि लखन सिय प्रीति बखानी । सोक सनेह मगन मुनि ग्यानी ॥

॥ दोहा ॥

सुनहु भरत भावी प्रबल बिलखि कहेउ मुनिनाथ ।

हानि लाभु जीवन मरनु जसु अपजसु बिधि हाथ ॥171॥

॥ चौपाई ॥

अस बिचारि केहि देइअ दोसू । ब्यरथ काहि पर कीजिअ रोसू ॥

तात बिचारु केहि करहु मन माहीं । सोच जोगु दसरथु नृपु नाहीं ॥

सोचिअ बिप्र जो बेद बिहीना । तजि निज धरमु बिषय लयलीना ॥

सोचिअ नृपति जो नीति न जाना । जेहि न प्रजा प्रिय प्रान समाना ॥

सोचिअ बयसु कृपन धनवानू । जो न अतिथि सिव भगति सुजानू ॥

सोचिअ सूद्रु बिप्र अवमानी । मुखर मानप्रिय ग्यान गुमानी ॥

सोचिअ पुनि पति बंचक नारी । कुटिल कलहप्रिय इच्छाचारी ॥

सोचिअ बटु निज ब्रतु परिहरई । जो नहिं गुर आयसु अनुसरई ॥

॥ दोहा ॥

सोचिअ गृही जो मोह बस करइ करम पथ त्याग ।

सोचिअ जति प्रंपच रत बिगत बिबेक बिराग ॥172॥

॥ चौपाई ॥

बैखानस सोइ सोचै जोगु । तपु बिहाइ जेहि भावइ भोगू ॥

सोचिअ पिसुन अकारन क्रोधी । जननि जनक गुर बंधु बिरोधी ॥

सब बिधि सोचिअ पर अपकारी । निज तनु पोषक निरदय भारी ॥

सोचनीय सबहि बिधि सोई । जो न छाड़ि छलु हरि जन होई ॥

सोचनीय नहिं कोसलराऊ । भुवन चारिदस प्रगट प्रभाऊ ॥

भयउ न अहइ न अब होनिहारा । भूप भरत जस पिता तुम्हारा ॥

बिधि हरि हरु सुरपति दिसिनाथा । बरनहिं सब दसरथ गुन गाथा ॥

॥ दोहा ॥

कहहु तात केहि भाँति कोउ करिहि बड़ाई तासु ।

राम लखन तुम्ह सत्रुहन सरिस सुअन सुचि जासु ॥173॥

॥ चौपाई ॥

सब प्रकार भूपति बड़भागी । बादि बिषादु करिअ तेहि लागी ॥

यहु सुनि समुझि सोचु परिहरहू । सिर धरि राज रजायसु करहू ॥

राँय राजपदु तुम्ह कहुँ दीन्हा । पिता बचनु फुर चाहिअ कीन्हा ॥

तजे रामु जेहिं बचनहि लागी । तनु परिहरेउ राम बिरहागी ॥

नृपहि बचन प्रिय नहिं प्रिय प्राना । करहु तात पितु बचन प्रवाना ॥

करहु सीस धरि भूप रजाई । हइ तुम्ह कहँ सब भाँति भलाई ॥

परसुराम पितु अग्या राखी । मारी मातु लोक सब साखी ॥

तनय जजातिहि जौबनु दयऊ । पितु अग्याँ अघ अजसु न भयऊ ॥

॥ दोहा ॥

अनुचित उचित बिचारु तजि जे पालहिं पितु बैन ।

ते भाजन सुख सुजस के बसहिं अमरपति ऐन ॥174॥

॥ चौपाई ॥

अवसि नरेस बचन फुर करहू । पालहु प्रजा सोकु परिहरहू ॥

सुरपुर नृप पाइहि परितोषू । तुम्ह कहुँ सुकृत सुजसु नहिं दोषू ॥

बेद बिदित संमत सबही का । जेहि पितु देइ सो पावइ टीका ॥

करहु राजु परिहरहु गलानी । मानहु मोर बचन हित जानी ॥

सुनि सुखु लहब राम बैदेहीं । अनुचित कहब न पंडित केहीं ॥

कौसल्यादि सकल महतारीं । तेउ प्रजा सुख होहिं सुखारीं ॥

परम तुम्हार राम कर जानिहि । सो सब बिधि तुम्ह सन भल मानिहि ॥

सौंपेहु राजु राम कै आएँ । सेवा करेहु सनेह सुहाएँ ॥

॥ दोहा ॥

कीजिअ गुर आयसु अवसि कहहिं सचिव कर जोरि ।

रघुपति आएँ उचित जस तस तब करब बहोरि ॥175॥

॥ चौपाई ॥

कौसल्या धरि धीरजु कहई । पूत पथ्य गुर आयसु अहई ॥

सो आदरिअ करिअ हित मानी । तजिअ बिषादु काल गति जानी ॥

बन रघुपति सुरपति नरनाहू । तुम्ह एहि भाँति तात कदराहू ॥

परिजन प्रजा सचिव सब अंबा । तुम्हही सुत सब कहँ अवलंबा ॥

लखि बिधि बाम कालु कठिनाई । धीरजु धरहु मातु बलि जाई ॥

सिर धरि गुर आयसु अनुसरहू । प्रजा पालि परिजन दुखु हरहू ॥

गुर के बचन सचिव अभिनंदनु । सुने भरत हिय हित जनु चंदनु ॥

सुनी बहोरि मातु मृदु बानी । सील सनेह सरल रस सानी ॥

॥ छन्द ॥

सानी सरल रस मातु बानी सुनि भरत ब्याकुल भए ।

लोचन सरोरुह स्त्रवत सींचत बिरह उर अंकुर नए ॥

सो दसा देखत समय तेहि बिसरी सबहि सुधि देह की ।

तुलसी सराहत सकल सादर सीवँ सहज सनेह की ॥

॥ सोरठा ॥

भरतु कमल कर जोरि धीर धुरंधर धीर धरि ।

बचन अमिअँ जनु बोरि देत उचित उत्तर सबहि ॥176॥

मासपारायण, अठारहवाँ विश्राम

॥ चौपाई ॥

मोहि उपदेसु दीन्ह गुर नीका । प्रजा सचिव संमत सबही का ॥

मातु उचित धरि आयसु दीन्हा । अवसि सीस धरि चाहउँ कीन्हा ॥

गुर पितु मातु स्वामि हित बानी । सुनि मन मुदित करिअ भलि जानी ॥

उचित कि अनुचित किएँ बिचारू । धरमु जाइ सिर पातक भारू ॥

तुम्ह तौ देहु सरल सिख सोई । जो आचरत मोर भल होई ॥

जद्यपि यह समुझत हउँ नीकें । तदपि होत परितोषु न जी कें ॥

अब तुम्ह बिनय मोरि सुनि लेहू । मोहि अनुहरत सिखावनु देहू ॥

ऊतरु देउँ छमब अपराधू । दुखित दोष गुन गनहिं न साधू ॥

॥ दोहा ॥

पितु सुरपुर सिय रामु बन करन कहहु मोहि राजु ।

एहि तें जानहु मोर हित कै आपन बड़ काजु ॥177॥

॥ चौपाई ॥

हित हमार सियपति सेवकाई । सो हरि लीन्ह मातु कुटिलाई ॥

मैं अनुमानि दीख मन माहीं । आन उपायँ मोर हित नाहीं ॥

सोक समाजु राजु केहि लेखें । लखन राम सिय बिनु पद देखें ॥

बादि बसन बिनु भूषन भारू । बादि बिरति बिनु ब्रह्म बिचारू ॥

सरुज सरीर बादि बहु भोगा । बिनु हरिभगति जायँ जप जोगा ॥

जायँ जीव बिनु देह सुहाई । बादि मोर सबु बिनु रघुराई ॥

जाउँ राम पहिं आयसु देहू । एकहिं आँक मोर हित एहू ॥

मोहि नृप करि भल आपन चहहू । सोउ सनेह जड़ता बस कहहू ॥

॥ दोहा ॥

कैकेई सुअ कुटिलमति राम बिमुख गतलाज ।

तुम्ह चाहत सुखु मोहबस मोहि से अधम कें राज ॥178॥

॥ चौपाई ॥

कहउँ साँचु सब सुनि पतिआहू । चाहिअ धरमसील नरनाहू ॥

मोहि राजु हठि देइहहु जबहीं । रसा रसातल जाइहि तबहीं ॥

मोहि समान को पाप निवासू । जेहि लगि सीय राम बनबासू ॥

रायँ राम कहुँ काननु दीन्हा । बिछुरत गमनु अमरपुर कीन्हा ॥

मैं सठु सब अनरथ कर हेतू । बैठ बात सब सुनउँ सचेतू ॥

बिनु रघुबीर बिलोकि अबासू । रहे प्रान सहि जग उपहासू ॥

राम पुनीत बिषय रस रूखे । लोलुप भूमि भोग के भूखे ॥

कहँ लगि कहौं हृदय कठिनाई । निदरि कुलिसु जेहिं लही बड़ाई ॥

॥ दोहा ॥

कारन तें कारजु कठिन होइ दोसु नहि मोर ।

कुलिस अस्थि तें उपल तें लोह कराल कठोर ॥179॥

॥ चौपाई ॥

कैकेई भव तनु अनुरागे । पाँवर प्रान अघाइ अभागे ॥

जौं प्रिय बिरहँ प्रान प्रिय लागे । देखब सुनब बहुत अब आगे ॥

लखन राम सिय कहुँ बनु दीन्हा । पठइ अमरपुर पति हित कीन्हा ॥

लीन्ह बिधवपन अपजसु आपू । दीन्हेउ प्रजहि सोकु संतापू ॥

मोहि दीन्ह सुखु सुजसु सुराजू । कीन्ह कैकेईं सब कर काजू ॥

एहि तें मोर काह अब नीका । तेहि पर देन कहहु तुम्ह टीका ॥

कैकई जठर जनमि जग माहीं । यह मोहि कहँ कछु अनुचित नाहीं ॥

मोरि बात सब बिधिहिं बनाई । प्रजा पाँच कत करहु सहाई ॥

॥ दोहा ॥

ग्रह ग्रहीत पुनि बात बस तेहि पुनि बीछी मार ।

तेहि पिआइअ बारुनी कहहु काह उपचार ॥180॥

॥ चौपाई ॥

कैकइ सुअन जोगु जग जोई । चतुर बिरंचि दीन्ह मोहि सोई ॥

दसरथ तनय राम लघु भाई । दीन्हि मोहि बिधि बादि बड़ाई ॥

तुम्ह सब कहहु कढ़ावन टीका । राय रजायसु सब कहँ नीका ॥

उतरु देउँ केहि बिधि केहि केही । कहहु सुखेन जथा रुचि जेही ॥

मोहि कुमातु समेत बिहाई । कहहु कहिहि के कीन्ह भलाई ॥

मो बिनु को सचराचर माहीं । जेहि सिय रामु प्रानप्रिय नाहीं ॥

परम हानि सब कहँ बड़ लाहू । अदिनु मोर नहि दूषन काहू ॥

संसय सील प्रेम बस अहहू । सबुइ उचित सब जो कछु कहहू ॥

॥ दोहा ॥

राम मातु सुठि सरलचित मो पर प्रेमु बिसेषि ।

कहइ सुभाय सनेह बस मोरि दीनता देखि ॥181॥

॥ चौपाई ॥

गुर बिबेक सागर जगु जाना । जिन्हहि बिस्व कर बदर समाना ॥

मो कहँ तिलक साज सज सोऊ । भएँ बिधि बिमुख बिमुख सबु कोऊ ॥

परिहरि रामु सीय जग माहीं । कोउ न कहिहि मोर मत नाहीं ॥

सो मैं सुनब सहब सुखु मानी । अंतहुँ कीच तहाँ जहँ पानी ॥

डरु न मोहि जग कहिहि कि पोचू । परलोकहु कर नाहिन सोचू ॥

एकइ उर बस दुसह दवारी । मोहि लगि भे सिय रामु दुखारी ॥

जीवन लाहु लखन भल पावा । सबु तजि राम चरन मनु लावा ॥

मोर जनम रघुबर बन लागी । झूठ काह पछिताउँ अभागी ॥

॥ दोहा ॥

आपनि दारुन दीनता कहउँ सबहि सिरु नाइ ।

देखें बिनु रघुनाथ पद जिय कै जरनि न जाइ ॥182॥

॥ चौपाई ॥

आन उपाउ मोहि नहि सूझा । को जिय कै रघुबर बिनु बूझा ॥

एकहिं आँक इहइ मन माहीं । प्रातकाल चलिहउँ प्रभु पाहीं ॥

जद्यपि मैं अनभल अपराधी । भै मोहि कारन सकल उपाधी ॥

तदपि सरन सनमुख मोहि देखी । छमि सब करिहहिं कृपा बिसेषी ॥

सील सकुच सुठि सरल सुभाऊ । कृपा सनेह सदन रघुराऊ ॥

अरिहुक अनभल कीन्ह न रामा । मैं सिसु सेवक जद्यपि बामा ॥

तुम्ह पै पाँच मोर भल मानी । आयसु आसिष देहु सुबानी ॥

जेहिं सुनि बिनय मोहि जनु जानी । आवहिं बहुरि रामु रजधानी ॥

॥ दोहा ॥

जद्यपि जनमु कुमातु तें मैं सठु सदा सदोस ।

आपन जानि न त्यागिहहिं मोहि रघुबीर भरोस ॥183॥

॥ चौपाई ॥

भरत बचन सब कहँ प्रिय लागे । राम सनेह सुधाँ जनु पागे ॥

लोग बियोग बिषम बिष दागे । मंत्र सबीज सुनत जनु जागे ॥

मातु सचिव गुर पुर नर नारी । सकल सनेहँ बिकल भए भारी ॥

भरतहि कहहि सराहि सराही । राम प्रेम मूरति तनु आही ॥

तात भरत अस काहे न कहहू । प्रान समान राम प्रिय अहहू ॥

जो पावँरु अपनी जड़ताई । तुम्हहि सुगाइ मातु कुटिलाई ॥

सो सठु कोटिक पुरुष समेता । बसिहि कलप सत नरक निकेता ॥

अहि अघ अवगुन नहि मनि गहई । हरइ गरल दुख दारिद दहई ॥

॥ दोहा ॥

अवसि चलिअ बन रामु जहँ भरत मंत्रु भल कीन्ह ।

सोक सिंधु बूड़त सबहि तुम्ह अवलंबनु दीन्ह ॥184॥

॥ चौपाई ॥

भा सब कें मन मोदु न थोरा । जनु घन धुनि सुनि चातक मोरा ॥

चलत प्रात लखि निरनउ नीके । भरतु प्रानप्रिय भे सबही के ॥

मुनिहि बंदि भरतहि सिरु नाई । चले सकल घर बिदा कराई ॥

धन्य भरत जीवनु जग माहीं । सीलु सनेहु सराहत जाहीं ॥

कहहि परसपर भा बड़ काजू । सकल चलै कर साजहिं साजू ॥

जेहि राखहिं रहु घर रखवारी । सो जानइ जनु गरदनि मारी ॥

कोउ कह रहन कहिअ नहिं काहू । को न चहइ जग जीवन लाहू ॥

॥ दोहा ॥

जरउ सो संपति सदन सुखु सुहद मातु पितु भाइ ।

सनमुख होत जो राम पद करै न सहस सहाइ ॥185॥

॥ चौपाई ॥

घर घर साजहिं बाहन नाना । हरषु हृदयँ परभात पयाना ॥

भरत जाइ घर कीन्ह बिचारू । नगरु बाजि गज भवन भँडारू ॥

संपति सब रघुपति कै आही । जौ बिनु जतन चलौं तजि ताही ॥

तौ परिनाम न मोरि भलाई । पाप सिरोमनि साइँ दोहाई ॥

करइ स्वामि हित सेवकु सोई । दूषन कोटि देइ किन कोई ॥

अस बिचारि सुचि सेवक बोले । जे सपनेहुँ निज धरम न डोले ॥

कहि सबु मरमु धरमु भल भाषा । जो जेहि लायक सो तेहिं राखा ॥

करि सबु जतनु राखि रखवारे । राम मातु पहिं भरतु सिधारे ॥

॥ दोहा ॥

आरत जननी जानि सब भरत सनेह सुजान ।

कहेउ बनावन पालकीं सजन सुखासन जान ॥186॥

॥ चौपाई ॥

चक्क चक्कि जिमि पुर नर नारी । चहत प्रात उर आरत भारी ॥

जागत सब निसि भयउ बिहाना । भरत बोलाए सचिव सुजाना ॥

कहेउ लेहु सबु तिलक समाजू । बनहिं देब मुनि रामहिं राजू ॥

बेगि चलहु सुनि सचिव जोहारे । तुरत तुरग रथ नाग सँवारे ॥

अरुंधती अरु अगिनि समाऊ । रथ चढ़ि चले प्रथम मुनिराऊ ॥

बिप्र बृंद चढ़ि बाहन नाना । चले सकल तप तेज निधाना ॥

नगर लोग सब सजि सजि जाना । चित्रकूट कहँ कीन्ह पयाना ॥

सिबिका सुभग न जाहिं बखानी । चढ़ि चढ़ि चलत भई सब रानी ॥

॥ दोहा ॥

सौंपि नगर सुचि सेवकनि सादर सकल चलाइ ।

सुमिरि राम सिय चरन तब चले भरत दोउ भाइ ॥187॥

॥ चौपाई ॥

राम दरस बस सब नर नारी । जनु करि करिनि चले तकि बारी ॥

बन सिय रामु समुझि मन माहीं । सानुज भरत पयादेहिं जाहीं ॥

देखि सनेहु लोग अनुरागे । उतरि चले हय गय रथ त्यागे ॥

जाइ समीप राखि निज डोली । राम मातु मृदु बानी बोली ॥

तात चढ़हु रथ बलि महतारी । होइहि प्रिय परिवारु दुखारी ॥

तुम्हरें चलत चलिहि सबु लोगू । सकल सोक कृस नहिं मग जोगू ॥

सिर धरि बचन चरन सिरु नाई । रथ चढ़ि चलत भए दोउ भाई ॥

तमसा प्रथम दिवस करि बासू । दूसर गोमति तीर निवासू ॥

॥ दोहा ॥

पय अहार फल असन एक निसि भोजन एक लोग ।

करत राम हित नेम ब्रत परिहरि भूषन भोग ॥188॥

॥ चौपाई ॥

सई तीर बसि चले बिहाने । सृंगबेरपुर सब निअराने ॥

समाचार सब सुने निषादा । हृदयँ बिचार करइ सबिषादा ॥

कारन कवन भरतु बन जाहीं । है कछु कपट भाउ मन माहीं ॥

जौं पै जियँ न होति कुटिलाई । तौ कत लीन्ह संग कटकाई ॥

जानहिं सानुज रामहि मारी । करउँ अकंटक राजु सुखारी ॥

भरत न राजनीति उर आनी । तब कलंकु अब जीवन हानी ॥

सकल सुरासुर जुरहिं जुझारा । रामहि समर न जीतनिहारा ॥

का आचरजु भरतु अस करहीं । नहिं बिष बेलि अमिअ फल फरहीं ॥

॥ दोहा ॥

अस बिचारि गुहँ ग्याति सन कहेउ सजग सब होहु ।

हथवाँसहु बोरहु तरनि कीजिअ घाटारोहु ॥189 ॥

॥ चौपाई ॥

होहु सँजोइल रोकहु घाटा । ठाटहु सकल मरै के ठाटा ॥

सनमुख लोह भरत सन लेऊँ । जिअत न सुरसरि उतरन देऊँ ॥

समर मरनु पुनि सुरसरि तीरा । राम काजु छनभंगु सरीरा ॥

भरत भाइ नृपु मै जन नीचू । बड़ें भाग असि पाइअ मीचू ॥

स्वामि काज करिहउँ रन रारी । जस धवलिहउँ भुवन दस चारी ॥

तजउँ प्रान रघुनाथ निहोरें । दुहूँ हाथ मुद मोदक मोरें ॥

साधु समाज न जाकर लेखा । राम भगत महुँ जासु न रेखा ॥

जायँ जिअत जग सो महि भारू । जननी जौबन बिटप कुठारू ॥

॥ दोहा ॥

बिगत बिषाद निषादपति सबहि बढ़ाइ उछाहु ।

सुमिरि राम मागेउ तुरत तरकस धनुष सनाहु ॥190॥

॥ चौपाई ॥

बेगहु भाइहु सजहु सँजोऊ । सुनि रजाइ कदराइ न कोऊ ॥

भलेहिं नाथ सब कहहिं सहरषा । एकहिं एक बढ़ावइ करषा ॥

चले निषाद जोहारि जोहारी । सूर सकल रन रूचइ रारी ॥

सुमिरि राम पद पंकज पनहीं । भाथीं बाँधि चढ़ाइन्हि धनहीं ॥

अँगरी पहिरि कूँड़ि सिर धरहीं । फरसा बाँस सेल सम करहीं ॥

एक कुसल अति ओड़न खाँड़े । कूदहि गगन मनहुँ छिति छाँड़े ॥

निज निज साजु समाजु बनाई । गुह राउतहि जोहारे जाई ॥

देखि सुभट सब लायक जाने । लै लै नाम सकल सनमाने ॥

॥ दोहा ॥

भाइहु लावहु धोख जनि आजु काज बड़ मोहि ।

सुनि सरोष बोले सुभट बीर अधीर न होहि ॥191॥

॥ चौपाई ॥

राम प्रताप नाथ बल तोरे । करहिं कटकु बिनु भट बिनु घोरे ॥

जीवत पाउ न पाछें धरहीं । रुंड मुंडमय मेदिनि करहीं ॥

दीख निषादनाथ भल टोलू । कहेउ बजाउ जुझाऊ ढोलू ॥

एतना कहत छींक भइ बाँए । कहेउ सगुनिअन्ह खेत सुहाए ॥

बूढ़ु एकु कह सगुन बिचारी । भरतहि मिलिअ न होइहि रारी ॥

रामहि भरतु मनावन जाहीं । सगुन कहइ अस बिग्रहु नाहीं ॥

सुनि गुह कहइ नीक कह बूढ़ा । सहसा करि पछिताहिं बिमूढ़ा ॥

भरत सुभाउ सीलु बिनु बूझें । बड़ि हित हानि जानि बिनु जूझें ॥

॥ दोहा ॥

गहहु घाट भट समिटि सब लेउँ मरम मिलि जाइ ।

बूझि मित्र अरि मध्य गति तस तब करिहउँ आइ ॥192॥

॥ चौपाई ॥

लखन सनेहु सुभायँ सुहाएँ । बैरु प्रीति नहिं दुरइँ दुराएँ ॥

अस कहि भेंट सँजोवन लागे । कंद मूल फल खग मृग मागे ॥

मीन पीन पाठीन पुराने । भरि भरि भार कहारन्ह आने ॥

मिलन साजु सजि मिलन सिधाए । मंगल मूल सगुन सुभ पाए ॥

देखि दूरि तें कहि निज नामू । कीन्ह मुनीसहि दंड प्रनामू ॥

जानि रामप्रिय दीन्हि असीसा । भरतहि कहेउ बुझाइ मुनीसा ॥

राम सखा सुनि संदनु त्यागा । चले उतरि उमगत अनुरागा ॥

गाउँ जाति गुहँ नाउँ सुनाई । कीन्ह जोहारु माथ महि लाई ॥

॥ दोहा ॥

करत दंडवत देखि तेहि भरत लीन्ह उर लाइ ।

मनहुँ लखन सन भेंट भइ प्रेम न हृदयँ समाइ ॥193॥

॥ चौपाई ॥

भेंटत भरतु ताहि अति प्रीती । लोग सिहाहिं प्रेम कै रीती ॥

धन्य धन्य धुनि मंगल मूला । सुर सराहि तेहि बरिसहिं फूला ॥

लोक बेद सब भाँतिहिं नीचा । जासु छाँह छुइ लेइअ सींचा ॥

तेहि भरि अंक राम लघु भ्राता । मिलत पुलक परिपूरित गाता ॥

राम राम कहि जे जमुहाहीं । तिन्हहि न पाप पुंज समुहाहीं ॥

यह तौ राम लाइ उर लीन्हा । कुल समेत जगु पावन कीन्हा ॥

करमनास जलु सुरसरि परई । तेहि को कहहु सीस नहिं धरई ॥

उलटा नामु जपत जगु जाना । बालमीकि भए ब्रह्म समाना ॥

॥ दोहा ॥

स्वपच सबर खस जमन जड़ पावँर कोल किरात ।

रामु कहत पावन परम होत भुवन बिख्यात ॥194 ॥

॥ चौपाई ॥

नहिं अचिरजु जुग जुग चलि आई । केहि न दीन्हि रघुबीर बड़ाई ॥

राम नाम महिमा सुर कहहीं । सुनि सुनि अवधलोग सुखु लहहीं ॥

रामसखहि मिलि भरत सप्रेमा । पूँछी कुसल सुमंगल खेमा ॥

देखि भरत कर सील सनेहू । भा निषाद तेहि समय बिदेहू ॥

सकुच सनेहु मोदु मन बाढ़ा । भरतहि चितवत एकटक ठाढ़ा ॥

धरि धीरजु पद बंदि बहोरी । बिनय सप्रेम करत कर जोरी ॥

कुसल मूल पद पंकज पेखी । मैं तिहुँ काल कुसल निज लेखी ॥

अब प्रभु परम अनुग्रह तोरें । सहित कोटि कुल मंगल मोरें ॥

॥ दोहा ॥

समुझि मोरि करतूति कुलु प्रभु महिमा जियँ जोइ ।

जो न भजइ रघुबीर पद जग बिधि बंचित सोइ ॥195॥

॥ चौपाई ॥

कपटी कायर कुमति कुजाती । लोक बेद बाहेर सब भाँती ॥

राम कीन्ह आपन जबही तें । भयउँ भुवन भूषन तबही तें ॥

देखि प्रीति सुनि बिनय सुहाई । मिलेउ बहोरि भरत लघु भाई ॥

कहि निषाद निज नाम सुबानीं । सादर सकल जोहारीं रानीं ॥

जानि लखन सम देहिं असीसा । जिअहु सुखी सय लाख बरीसा ॥

निरखि निषादु नगर नर नारी । भए सुखी जनु लखनु निहारी ॥

कहहिं लहेउ एहिं जीवन लाहू । भेंटेउ रामभद्र भरि बाहू ॥

सुनि निषादु निज भाग बड़ाई । प्रमुदित मन लइ चलेउ लेवाई ॥

॥ दोहा ॥

सनकारे सेवक सकल चले स्वामि रुख पाइ ।

घर तरु तर सर बाग बन बास बनाएन्हि जाइ ॥196॥

॥ चौपाई ॥

सृंगबेरपुर भरत दीख जब । भे सनेहँ सब अंग सिथिल तब ॥

सोहत दिएँ निषादहि लागू । जनु तनु धरें बिनय अनुरागू ॥

एहि बिधि भरत सेनु सबु संगा । दीखि जाइ जग पावनि गंगा ॥

रामघाट कहँ कीन्ह प्रनामू । भा मनु मगनु मिले जनु रामू ॥

करहिं प्रनाम नगर नर नारी । मुदित ब्रह्ममय बारि निहारी ॥

करि मज्जनु मागहिं कर जोरी । रामचंद्र पद प्रीति न थोरी ॥

भरत कहेउ सुरसरि तव रेनू । सकल सुखद सेवक सुरधेनू ॥

जोरि पानि बर मागउँ एहू । सीय राम पद सहज सनेहू ॥

॥ दोहा ॥

एहि बिधि मज्जनु भरतु करि गुर अनुसासन पाइ ।

मातु नहानीं जानि सब डेरा चले लवाइ ॥197॥

॥ चौपाई ॥

जहँ तहँ लोगन्ह डेरा कीन्हा । भरत सोधु सबही कर लीन्हा ॥

सुर सेवा करि आयसु पाई । राम मातु पहिं गे दोउ भाई ॥

चरन चाँपि कहि कहि मृदु बानी । जननीं सकल भरत सनमानी ॥

भाइहि सौंपि मातु सेवकाई । आपु निषादहि लीन्ह बोलाई ॥

चले सखा कर सों कर जोरें । सिथिल सरीर सनेह न थोरें ॥

पूँछत सखहि सो ठाउँ देखाऊ । नेकु नयन मन जरनि जुड़ाऊ ॥

जहँ सिय रामु लखनु निसि सोए । कहत भरे जल लोचन कोए ॥

भरत बचन सुनि भयउ बिषादू । तुरत तहाँ लइ गयउ निषादू ॥

॥ दोहा ॥

जहँ सिंसुपा पुनीत तर रघुबर किय बिश्रामु ।

अति सनेहँ सादर भरत कीन्हेउ दंड प्रनामु ॥198॥

॥ चौपाई ॥

कुस साँथरीíनिहारि सुहाई । कीन्ह प्रनामु प्रदच्छिन जाई ॥

चरन रेख रज आँखिन्ह लाई । बनइ न कहत प्रीति अधिकाई ॥

कनक बिंदु दुइ चारिक देखे । राखे सीस सीय सम लेखे ॥

सजल बिलोचन हृदयँ गलानी । कहत सखा सन बचन सुबानी ॥

श्रीहत सीय बिरहँ दुतिहीना । जथा अवध नर नारि बिलीना ॥

पिता जनक देउँ पटतर केही । करतल भोगु जोगु जग जेही ॥

ससुर भानुकुल भानु भुआलू । जेहि सिहात अमरावतिपालू ॥

प्राननाथु रघुनाथ गोसाई । जो बड़ होत सो राम बड़ाई ॥

॥ दोहा ॥

पति देवता सुतीय मनि सीय साँथरी देखि ।

बिहरत ह्रदउ न हहरि हर पबि तें कठिन बिसेषि ॥199॥

॥ चौपाई ॥

लालन जोगु लखन लघु लोने । भे न भाइ अस अहहिं न होने ॥

पुरजन प्रिय पितु मातु दुलारे । सिय रघुबरहि प्रानपिआरे ॥

मृदु मूरति सुकुमार सुभाऊ । तात बाउ तन लाग न काऊ ॥

ते बन सहहिं बिपति सब भाँती । निदरे कोटि कुलिस एहिं छाती ॥

राम जनमि जगु कीन्ह उजागर । रूप सील सुख सब गुन सागर ॥

पुरजन परिजन गुर पितु माता । राम सुभाउ सबहि सुखदाता ॥

बैरिउ राम बड़ाई करहीं । बोलनि मिलनि बिनय मन हरहीं ॥

सारद कोटि कोटि सत सेषा । करि न सकहिं प्रभु गुन गन लेखा ॥

॥ दोहा ॥

सुखस्वरुप रघुबंसमनि मंगल मोद निधान ।

ते सोवत कुस डासि महि बिधि गति अति बलवान ॥200॥

॥ चौपाई ॥

राम सुना दुखु कान न काऊ । जीवनतरु जिमि जोगवइ राऊ ॥

पलक नयन फनि मनि जेहि भाँती । जोगवहिं जननि सकल दिन राती ॥

ते अब फिरत बिपिन पदचारी । कंद मूल फल फूल अहारी ॥

धिग कैकेई अमंगल मूला । भइसि प्रान प्रियतम प्रतिकूला ॥

मैं धिग धिग अघ उदधि अभागी । सबु उतपातु भयउ जेहि लागी ॥

कुल कलंकु करि सृजेउ बिधाताँ । साइँदोह मोहि कीन्ह कुमाताँ ॥

सुनि सप्रेम समुझाव निषादू । नाथ करिअ कत बादि बिषादू ॥

राम तुम्हहि प्रिय तुम्ह प्रिय रामहि । यह निरजोसु दोसु बिधि बामहि ॥

॥ छन्द ॥

बिधि बाम की करनी कठिन जेंहिं मातु कीन्ही बावरी ।

तेहि राति पुनि पुनि करहिं प्रभु सादर सरहना रावरी ॥

तुलसी न तुम्ह सो राम प्रीतमु कहतु हौं सौहें किएँ ।

परिनाम मंगल जानि अपने आनिए धीरजु हिएँ ॥

॥ सोरठा ॥

अंतरजामी रामु सकुच सप्रेम कृपायतन ।

चलिअ करिअ बिश्रामु यह बिचारि दृढ़ आनि मन ॥201॥

॥ चौपाई ॥

सखा बचन सुनि उर धरि धीरा । बास चले सुमिरत रघुबीरा ॥

यह सुधि पाइ नगर नर नारी । चले बिलोकन आरत भारी ॥

परदखिना करि करहिं प्रनामा । देहिं कैकइहि खोरि निकामा ॥

भरी भरि बारि बिलोचन लेंहीं । बाम बिधाताहि दूषन देहीं ॥

एक सराहहिं भरत सनेहू । कोउ कह नृपति निबाहेउ नेहू ॥

निंदहिं आपु सराहि निषादहि । को कहि सकइ बिमोह बिषादहि ॥

एहि बिधि राति लोगु सबु जागा । भा भिनुसार गुदारा लागा ॥

गुरहि सुनावँ चढ़ाइ सुहाईं । नईं नाव सब मातु चढ़ाईं ॥

दंड चारि महँ भा सबु पारा । उतरि भरत तब सबहि सँभारा ॥

॥ दोहा ॥

प्रातक्रिया करि मातु पद बंदि गुरहि सिरु नाइ ।

आगें किए निषाद गन दीन्हेउ कटकु चलाइ ॥202॥

॥ चौपाई ॥

कियउ निषादनाथु अगुआईं । मातु पालकीं सकल चलाईं ॥

साथ बोलाइ भाइ लघु दीन्हा । बिप्रन्ह सहित गवनु गुर कीन्हा ॥

आपु सुरसरिहि कीन्ह प्रनामू । सुमिरे लखन सहित सिय रामू ॥

गवने भरत पयोदेहिं पाए । कोतल संग जाहिं डोरिआए ॥

कहहिं सुसेवक बारहिं बारा । होइअ नाथ अस्व असवारा ॥

रामु पयोदेहि पायँ सिधाए । हम कहँ रथ गज बाजि बनाए ॥

सिर भर जाउँ उचित अस मोरा । सब तें सेवक धरमु कठोरा ॥

देखि भरत गति सुनि मृदु बानी । सब सेवक गन गरहिं गलानी ॥

॥ दोहा ॥

भरत तीसरे पहर कहँ कीन्ह प्रबेसु प्रयाग ।

कहत राम सिय राम सिय उमगि उमगि अनुराग ॥203॥

॥ चौपाई ॥

झलका झलकत पायन्ह कैंसें । पंकज कोस ओस कन जैसें ॥

भरत पयादेहिं आए आजू । भयउ दुखित सुनि सकल समाजू ॥

खबरि लीन्ह सब लोग नहाए । कीन्ह प्रनामु त्रिबेनिहिं आए ॥

सबिधि सितासित नीर नहाने । दिए दान महिसुर सनमाने ॥

देखत स्यामल धवल हलोरे । पुलकि सरीर भरत कर जोरे ॥

सकल काम प्रद तीरथराऊ । बेद बिदित जग प्रगट प्रभाऊ ॥

मागउँ भीख त्यागि निज धरमू । आरत काह न करइ कुकरमू ॥

अस जियँ जानि सुजान सुदानी । सफल करहिं जग जाचक बानी ॥

॥ दोहा ॥

अरथ न धरम न काम रुचि गति न चहउँ निरबान ।

जनम जनम रति राम पद यह बरदानु न आन ॥204॥

॥ चौपाई ॥

जानहुँ रामु कुटिल करि मोही । लोग कहउ गुर साहिब द्रोही ॥

सीता राम चरन रति मोरें । अनुदिन बढ़उ अनुग्रह तोरें ॥

जलदु जनम भरि सुरति बिसारउ । जाचत जलु पबि पाहन डारउ ॥

चातकु रटनि घटें घटि जाई । बढ़े प्रेमु सब भाँति भलाई ॥

कनकहिं बान चढ़इ जिमि दाहें । तिमि प्रियतम पद नेम निबाहें ॥

भरत बचन सुनि माझ त्रिबेनी । भइ मृदु बानि सुमंगल देनी ॥

तात भरत तुम्ह सब बिधि साधू । राम चरन अनुराग अगाधू ॥

बाद गलानि करहु मन माहीं । तुम्ह सम रामहि कोउ प्रिय नाहीं ॥

॥ दोहा ॥

तनु पुलकेउ हियँ हरषु सुनि बेनि बचन अनुकूल ।

भरत धन्य कहि धन्य सुर हरषित बरषहिं फूल ॥205॥

॥ चौपाई ॥

प्रमुदित तीरथराज निवासी । बैखानस बटु गृही उदासी ॥

कहहिं परसपर मिलि दस पाँचा । भरत सनेह सीलु सुचि साँचा ॥

सुनत राम गुन ग्राम सुहाए । भरद्वाज मुनिबर पहिं आए ॥

दंड प्रनामु करत मुनि देखे । मूरतिमंत भाग्य निज लेखे ॥

धाइ उठाइ लाइ उर लीन्हे । दीन्हि असीस कृतारथ कीन्हे ॥

आसनु दीन्ह नाइ सिरु बैठे । चहत सकुच गृहँ जनु भजि पैठे ॥

मुनि पूँछब कछु यह बड़ सोचू । बोले रिषि लखि सीलु सँकोचू ॥

सुनहु भरत हम सब सुधि पाई । बिधि करतब पर किछु न बसाई ॥

॥ दोहा ॥

तुम्ह गलानि जियँ जनि करहु समुझी मातु करतूति ।

तात कैकइहि दोसु नहिं गई गिरा मति धूति ॥206॥

॥ चौपाई ॥

यहउ कहत भल कहिहि न कोऊ । लोकु बेद बुध संमत दोऊ ॥

तात तुम्हार बिमल जसु गाई । पाइहि लोकउ बेदु बड़ाई ॥

लोक बेद संमत सबु कहई । जेहि पितु देइ राजु सो लहई ॥

राउ सत्यब्रत तुम्हहि बोलाई । देत राजु सुखु धरमु बड़ाई ॥

राम गवनु बन अनरथ मूला । जो सुनि सकल बिस्व भइ सूला ॥

सो भावी बस रानि अयानी । करि कुचालि अंतहुँ पछितानी ॥

तहँउँ तुम्हार अलप अपराधू । कहै सो अधम अयान असाधू ॥

करतेहु राजु त तुम्हहि न दोषू । रामहि होत सुनत संतोषू ॥

॥ दोहा ॥

अब अति कीन्हेहु भरत भल तुम्हहि उचित मत एहु ।

सकल सुमंगल मूल जग रघुबर चरन सनेहु ॥207॥

॥ चौपाई ॥

सो तुम्हार धनु जीवनु प्राना । भूरिभाग को तुम्हहि समाना ॥

यह तम्हार आचरजु न ताता । दसरथ सुअन राम प्रिय भ्राता ॥

सुनहु भरत रघुबर मन माहीं । पेम पात्रु तुम्ह सम कोउ नाहीं ॥

लखन राम सीतहि अति प्रीती । निसि सब तुम्हहि सराहत बीती ॥

जाना मरमु नहात प्रयागा । मगन होहिं तुम्हरें अनुरागा ॥

तुम्ह पर अस सनेहु रघुबर कें । सुख जीवन जग जस जड़ नर कें ॥

यह न अधिक रघुबीर बड़ाई । प्रनत कुटुंब पाल रघुराई ॥

तुम्ह तौ भरत मोर मत एहू । धरें देह जनु राम सनेहू ॥

॥ दोहा ॥

तुम्ह कहँ भरत कलंक यह हम सब कहँ उपदेसु ।

राम भगति रस सिद्धि हित भा यह समउ गनेसु ॥208॥

॥ चौपाई ॥

नव बिधु बिमल तात जसु तोरा । रघुबर किंकर कुमुद चकोरा ॥

उदित सदा अँथइहि कबहूँ ना । घटिहि न जग नभ दिन दिन दूना ॥

कोक तिलोक प्रीति अति करिही । प्रभु प्रताप रबि छबिहि न हरिही ॥

निसि दिन सुखद सदा सब काहू । ग्रसिहि न कैकइ करतबु राहू ॥

पूरन राम सुपेम पियूषा । गुर अवमान दोष नहिं दूषा ॥

राम भगत अब अमिअँ अघाहूँ । कीन्हेहु सुलभ सुधा बसुधाहूँ ॥

भूप भगीरथ सुरसरि आनी । सुमिरत सकल सुंमगल खानी ॥

दसरथ गुन गन बरनि न जाहीं । अधिकु कहा जेहि सम जग नाहीं ॥

॥ दोहा ॥

जासु सनेह सकोच बस राम प्रगट भए आइ ॥

जे हर हिय नयननि कबहुँ निरखे नहीं अघाइ ॥209॥

॥ चौपाई ॥

कीरति बिधु तुम्ह कीन्ह अनूपा । जहँ बस राम पेम मृगरूपा ॥

तात गलानि करहु जियँ जाएँ । डरहु दरिद्रहि पारसु पाएँ ॥ ॥

सुनहु भरत हम झूठ न कहहीं । उदासीन तापस बन रहहीं ॥

सब साधन कर सुफल सुहावा । लखन राम सिय दरसनु पावा ॥

तेहि फल कर फलु दरस तुम्हारा । सहित पयाग सुभाग हमारा ॥

भरत धन्य तुम्ह जसु जगु जयऊ । कहि अस पेम मगन पुनि भयऊ ॥

सुनि मुनि बचन सभासद हरषे । साधु सराहि सुमन सुर बरषे ॥

धन्य धन्य धुनि गगन पयागा । सुनि सुनि भरतु मगन अनुरागा ॥

॥ दोहा ॥

पुलक गात हियँ रामु सिय सजल सरोरुह नैन ।

करि प्रनामु मुनि मंडलिहि बोले गदगद बैन ॥210॥

॥ चौपाई ॥

मुनि समाजु अरु तीरथराजू । साँचिहुँ सपथ अघाइ अकाजू ॥

एहिं थल जौं किछु कहिअ बनाई । एहि सम अधिक न अघ अधमाई ॥

तुम्ह सर्बग्य कहउँ सतिभाऊ । उर अंतरजामी रघुराऊ ॥

मोहि न मातु करतब कर सोचू । नहिं दुखु जियँ जगु जानिहि पोचू ॥

नाहिन डरु बिगरिहि परलोकू । पितहु मरन कर मोहि न सोकू ॥

सुकृत सुजस भरि भुअन सुहाए । लछिमन राम सरिस सुत पाए ॥

राम बिरहँ तजि तनु छनभंगू । भूप सोच कर कवन प्रसंगू ॥

राम लखन सिय बिनु पग पनहीं । करि मुनि बेष फिरहिं बन बनही ॥

॥ दोहा ॥

अजिन बसन फल असन महि सयन डासि कुस पात ।

बसि तरु तर नित सहत हिम आतप बरषा बात ॥211॥

॥ चौपाई ॥

एहि दुख दाहँ दहइ दिन छाती । भूख न बासर नीद न राती ॥

एहि कुरोग कर औषधु नाहीं । सोधेउँ सकल बिस्व मन माहीं ॥

मातु कुमत बढ़ई अघ मूला । तेहिं हमार हित कीन्ह बँसूला ॥

कलि कुकाठ कर कीन्ह कुजंत्रू । गाड़ि अवधि पढ़ि कठिन कुमंत्रु ॥

मोहि लगि यहु कुठाटु तेहिं ठाटा । घालेसि सब जगु बारहबाटा ॥

मिटइ कुजोगु राम फिरि आएँ । बसइ अवध नहिं आन उपाएँ ॥

भरत बचन सुनि मुनि सुखु पाई । सबहिं कीन्ह बहु भाँति बड़ाई ॥

तात करहु जनि सोचु बिसेषी । सब दुखु मिटहि राम पग देखी ॥

॥ दोहा ॥

करि प्रबोध मुनिबर कहेउ अतिथि पेमप्रिय होहु ।

कंद मूल फल फूल हम देहिं लेहु करि छोहु ॥212॥

॥ चौपाई ॥

सुनि मुनि बचन भरत हिँय सोचू । भयउ कुअवसर कठिन सँकोचू ॥

जानि गरुइ गुर गिरा बहोरी । चरन बंदि बोले कर जोरी ॥

सिर धरि आयसु करिअ तुम्हारा । परम धरम यहु नाथ हमारा ॥

भरत बचन मुनिबर मन भाए । सुचि सेवक सिष निकट बोलाए ॥

चाहिए कीन्ह भरत पहुनाई । कंद मूल फल आनहु जाई ॥

भलेहीं नाथ कहि तिन्ह सिर नाए । प्रमुदित निज निज काज सिधाए ॥

मुनिहि सोच पाहुन बड़ नेवता । तसि पूजा चाहिअ जस देवता ॥

सुनि रिधि सिधि अनिमादिक आई । आयसु होइ सो करहिं गोसाई ॥

॥ दोहा ॥

राम बिरह ब्याकुल भरतु सानुज सहित समाज ।

पहुनाई करि हरहु श्रम कहा मुदित मुनिराज ॥213॥

॥ चौपाई ॥

रिधि सिधि सिर धरि मुनिबर बानी । बड़भागिनि आपुहि अनुमानी ॥

कहहिं परसपर सिधि समुदाई । अतुलित अतिथि राम लघु भाई ॥

मुनि पद बंदि करिअ सोइ आजू । होइ सुखी सब राज समाजू ॥

अस कहि रचेउ रुचिर गृह नाना । जेहि बिलोकि बिलखाहिं बिमाना ॥

भोग बिभूति भूरि भरि राखे । देखत जिन्हहि अमर अभिलाषे ॥

दासीं दास साजु सब लीन्हें । जोगवत रहहिं मनहि मनु दीन्हें ॥

सब समाजु सजि सिधि पल माहीं । जे सुख सुरपुर सपनेहुँ नाहीं ॥

प्रथमहिं बास दिए सब केही । सुंदर सुखद जथा रुचि जेही ॥

॥ दोहा ॥

बहुरि सपरिजन भरत कहुँ रिषि अस आयसु दीन्ह ।

बिधि बिसमय दायकु बिभव मुनिबर तपबल कीन्ह ॥214॥

॥ चौपाई ॥

मुनि प्रभाउ जब भरत बिलोका । सब लघु लगे लोकपति लोका ॥

सुख समाजु नहिं जाइ बखानी । देखत बिरति बिसारहीं ग्यानी ॥

आसन सयन सुबसन बिताना । बन बाटिका बिहग मृग नाना ॥

सुरभि फूल फल अमिअ समाना । बिमल जलासय बिबिध बिधाना ।

असन पान सुच अमिअ अमी से । देखि लोग सकुचात जमी से ॥

सुर सुरभी सुरतरु सबही कें । लखि अभिलाषु सुरेस सची कें ॥

रितु बसंत बह त्रिबिध बयारी । सब कहँ सुलभ पदारथ चारी ॥

स्त्रक चंदन बनितादिक भोगा । देखि हरष बिसमय बस लोगा ॥

॥ दोहा ॥

संपत चकई भरतु चक मुनि आयस खेलवार ॥

तेहि निसि आश्रम पिंजराँ राखे भा भिनुसार ॥215॥

मासपारायण, उन्नीसवाँ विश्राम

॥ चौपाई ॥

कीन्ह निमज्जनु तीरथराजा । नाइ मुनिहि सिरु सहित समाजा ॥

रिषि आयसु असीस सिर राखी । करि दंडवत बिनय बहु भाषी ॥

पथ गति कुसल साथ सब लीन्हे । चले चित्रकूटहिं चितु दीन्हें ॥

रामसखा कर दीन्हें लागू । चलत देह धरि जनु अनुरागू ॥

नहिं पद त्रान सीस नहिं छाया । पेमु नेमु ब्रतु धरमु अमाया ॥

लखन राम सिय पंथ कहानी । पूँछत सखहि कहत मृदु बानी ॥

राम बास थल बिटप बिलोकें । उर अनुराग रहत नहिं रोकैं ॥

दैखि दसा सुर बरिसहिं फूला । भइ मृदु महि मगु मंगल मूला ॥

॥ दोहा ॥

किएँ जाहिं छाया जलद सुखद बहइ बर बात ।

तस मगु भयउ न राम कहँ जस भा भरतहि जात ॥216॥

॥ चौपाई ॥

जड़ चेतन मग जीव घनेरे । जे चितए प्रभु जिन्ह प्रभु हेरे ॥

ते सब भए परम पद जोगू । भरत दरस मेटा भव रोगू ॥

यह बड़ि बात भरत कइ नाहीं । सुमिरत जिनहि रामु मन माहीं ॥

बारक राम कहत जग जेऊ । होत तरन तारन नर तेऊ ॥

भरतु राम प्रिय पुनि लघु भ्राता । कस न होइ मगु मंगलदाता ॥

सिद्ध साधु मुनिबर अस कहहीं । भरतहि निरखि हरषु हियँ लहहीं ॥

देखि प्रभाउ सुरेसहि सोचू । जगु भल भलेहि पोच कहुँ पोचू ॥

गुर सन कहेउ करिअ प्रभु सोई । रामहि भरतहि भेंट न होई ॥

॥ दोहा ॥

रामु सँकोची प्रेम बस भरत सपेम पयोधि ।

बनी बात बेगरन चहति करिअ जतनु छलु सोधि ॥217॥

॥ चौपाई ॥

बचन सुनत सुरगुरु मुसकाने । सहसनयन बिनु लोचन जाने ॥

मायापति सेवक सन माया । करइ त उलटि परइ सुरराया ॥

तब किछु कीन्ह राम रुख जानी । अब कुचालि करि होइहि हानी ॥

सुनु सुरेस रघुनाथ सुभाऊ । निज अपराध रिसाहिं न काऊ ॥

जो अपराधु भगत कर करई । राम रोष पावक सो जरई ॥

लोकहुँ बेद बिदित इतिहासा । यह महिमा जानहिं दुरबासा ॥

भरत सरिस को राम सनेही । जगु जप राम रामु जप जेही ॥

॥ दोहा ॥

मनहुँ न आनिअ अमरपति रघुबर भगत अकाजु ।

अजसु लोक परलोक दुख दिन दिन सोक समाजु ॥218॥

॥ चौपाई ॥

सुनु सुरेस उपदेसु हमारा । रामहि सेवकु परम पिआरा ॥

मानत सुखु सेवक सेवकाई । सेवक बैर बैरु अधिकाई ॥

जद्यपि सम नहिं राग न रोषू । गहहिं न पाप पूनु गुन दोषू ॥

करम प्रधान बिस्व करि राखा । जो जस करइ सो तस फलु चाखा ॥

तदपि करहिं सम बिषम बिहारा । भगत अभगत हृदय अनुसारा ॥

अगुन अलेप अमान एकरस । रामु सगुन भए भगत पेम बस ॥

राम सदा सेवक रुचि राखी । बेद पुरान साधु सुर साखी ॥

अस जियँ जानि तजहु कुटिलाई । करहु भरत पद प्रीति सुहाई ॥

॥ दोहा ॥

राम भगत परहित निरत पर दुख दुखी दयाल ।

भगत सिरोमनि भरत तें जनि डरपहु सुरपाल ॥219॥

॥ चौपाई ॥

सत्यसंध प्रभु सुर हितकारी । भरत राम आयस अनुसारी ॥

स्वारथ बिबस बिकल तुम्ह होहू । भरत दोसु नहिं राउर मोहू ॥

सुनि सुरबर सुरगुर बर बानी । भा प्रमोदु मन मिटी गलानी ॥

बरषि प्रसून हरषि सुरराऊ । लगे सराहन भरत सुभाऊ ॥

एहि बिधि भरत चले मग जाहीं । दसा देखि मुनि सिद्ध सिहाहीं ॥

जबहिं रामु कहि लेहिं उसासा । उमगत पेमु मनहँ चहु पासा ॥

द्रवहिं बचन सुनि कुलिस पषाना । पुरजन पेमु न जाइ बखाना ॥

बीच बास करि जमुनहिं आए । निरखि नीरु लोचन जल छाए ॥

॥ दोहा ॥

रघुबर बरन बिलोकि बर बारि समेत समाज ।

होत मगन बारिधि बिरह चढ़े बिबेक जहाज ॥220॥

॥ चौपाई ॥

जमुन तीर तेहि दिन करि बासू । भयउ समय सम सबहि सुपासू ॥

रातहिं घाट घाट की तरनी । आईं अगनित जाहिं न बरनी ॥

प्रात पार भए एकहि खेंवाँ । तोषे रामसखा की सेवाँ ॥

चले नहाइ नदिहि सिर नाई । साथ निषादनाथ दोउ भाई ॥

आगें मुनिबर बाहन आछें । राजसमाज जाइ सबु पाछें ॥

तेहिं पाछें दोउ बंधु पयादें । भूषन बसन बेष सुठि सादें ॥

सेवक सुह्रद सचिवसुत साथा । सुमिरत लखनु सीय रघुनाथा ॥

जहँ जहँ राम बास बिश्रामा । तहँ तहँ करहिं सप्रेम प्रनामा ॥

॥ दोहा ॥

मगबासी नर नारि सुनि धाम काम तजि धाइ ।

देखि सरूप सनेह सब मुदित जनम फलु पाइ ॥221॥

॥ चौपाई ॥

कहहिं सपेम एक एक पाहीं । रामु लखनु सखि होहिं कि नाहीं ॥

बय बपु बरन रूप सोइ आली । सीलु सनेहु सरिस सम चाली ॥

बेषु न सो सखि सीय न संगा । आगें अनी चली चतुरंगा ॥

नहिं प्रसन्न मुख मानस खेदा । सखि संदेहु होइ एहिं भेदा ॥

तासु तरक तियगन मन मानी । कहहिं सकल तेहि सम न सयानी ॥

तेहि सराहि बानी फुरि पूजी । बोली मधुर बचन तिय दूजी ॥

कहि सपेम सब कथाप्रसंगू । जेहि बिधि राम राज रस भंगू ॥

भरतहि बहुरि सराहन लागी । सील सनेह सुभाय सुभागी ॥

॥ दोहा ॥

चलत पयादें खात फल पिता दीन्ह तजि राजु ।

जात मनावन रघुबरहि भरत सरिस को आजु ॥222॥

॥ चौपाई ॥

भायप भगति भरत आचरनू । कहत सुनत दुख दूषन हरनू ॥

जो कछु कहब थोर सखि सोई । राम बंधु अस काहे न होई ॥

हम सब सानुज भरतहि देखें । भइन्ह धन्य जुबती जन लेखें ॥

सुनि गुन देखि दसा पछिताहीं । कैकइ जननि जोगु सुतु नाहीं ॥

कोउ कह दूषनु रानिहि नाहिन । बिधि सबु कीन्ह हमहि जो दाहिन ॥

कहँ हम लोक बेद बिधि हीनी । लघु तिय कुल करतूति मलीनी ॥

बसहिं कुदेस कुगाँव कुबामा । कहँ यह दरसु पुन्य परिनामा ॥

अस अनंदु अचिरिजु प्रति ग्रामा । जनु मरुभूमि कलपतरु जामा ॥

॥ दोहा ॥

भरत दरसु देखत खुलेउ मग लोगन्ह कर भागु ।

जनु सिंघलबासिन्ह भयउ बिधि बस सुलभ प्रयागु ॥223॥

॥ चौपाई ॥

निज गुन सहित राम गुन गाथा । सुनत जाहिं सुमिरत रघुनाथा ॥

तीरथ मुनि आश्रम सुरधामा । निरखि निमज्जहिं करहिं प्रनामा ॥

मनहीं मन मागहिं बरु एहू । सीय राम पद पदुम सनेहू ॥

मिलहिं किरात कोल बनबासी । बैखानस बटु जती उदासी ॥

करि प्रनामु पूँछहिं जेहिं तेही । केहि बन लखनु रामु बैदेही ॥

ते प्रभु समाचार सब कहहीं । भरतहि देखि जनम फलु लहहीं ॥

जे जन कहहिं कुसल हम देखे । ते प्रिय राम लखन सम लेखे ॥

एहि बिधि बूझत सबहि सुबानी । सुनत राम बनबास कहानी ॥

॥ दोहा ॥

तेहि बासर बसि प्रातहीं चले सुमिरि रघुनाथ ।

राम दरस की लालसा भरत सरिस सब साथ ॥224॥

॥ चौपाई ॥

मंगल सगुन होहिं सब काहू । फरकहिं सुखद बिलोचन बाहू ॥

भरतहि सहित समाज उछाहू । मिलिहहिं रामु मिटहि दुख दाहू ॥

करत मनोरथ जस जियँ जाके । जाहिं सनेह सुराँ सब छाके ॥

सिथिल अंग पग मग डगि डोलहिं । बिहबल बचन पेम बस बोलहिं ॥

रामसखाँ तेहि समय देखावा । सैल सिरोमनि सहज सुहावा ॥

जासु समीप सरित पय तीरा । सीय समेत बसहिं दोउ बीरा ॥

देखि करहिं सब दंड प्रनामा । कहि जय जानकि जीवन रामा ॥

प्रेम मगन अस राज समाजू । जनु फिरि अवध चले रघुराजू ॥

॥ दोहा ॥

भरत प्रेमु तेहि समय जस तस कहि सकइ न सेषु ।

कबिहिं अगम जिमि ब्रह्मसुखु अह मम मलिन जनेषु ॥225॥

॥ चौपाई ॥

सकल सनेह सिथिल रघुबर कें । गए कोस दुइ दिनकर ढरकें ॥

जलु थलु देखि बसे निसि बीतें । कीन्ह गवन रघुनाथ पिरीतें ॥

उहाँ रामु रजनी अवसेषा । जागे सीयँ सपन अस देखा ॥

सहित समाज भरत जनु आए । नाथ बियोग ताप तन ताए ॥

सकल मलिन मन दीन दुखारी । देखीं सासु आन अनुहारी ॥

सुनि सिय सपन भरे जल लोचन । भए सोचबस सोच बिमोचन ॥

लखन सपन यह नीक न होई । कठिन कुचाह सुनाइहि कोई ॥

अस कहि बंधु समेत नहाने । पूजि पुरारि साधु सनमाने ॥

॥ छन्द ॥

सनमानि सुर मुनि बंदि बैठे उत्तर दिसि देखत भए ।

नभ धूरि खग मृग भूरि भागे बिकल प्रभु आश्रम गए ॥

तुलसी उठे अवलोकि कारनु काह चित सचकित रहे ।

सब समाचार किरात कोलन्हि आइ तेहि अवसर कहे ॥

॥ दोहा ॥

सुनत सुमंगल बैन मन प्रमोद तन पुलक भर ।

सरद सरोरुह नैन तुलसी भरे सनेह जल ॥226॥

॥ चौपाई ॥

बहुरि सोचबस भे सियरवनू । कारन कवन भरत आगवनू ॥

एक आइ अस कहा बहोरी । सेन संग चतुरंग न थोरी ॥

सो सुनि रामहि भा अति सोचू । इत पितु बच इत बंधु सकोचू ॥

भरत सुभाउ समुझि मन माहीं । प्रभु चित हित थिति पावत नाही ॥

समाधान तब भा यह जाने । भरतु कहे महुँ साधु सयाने ॥

लखन लखेउ प्रभु हृदयँ खभारू । कहत समय सम नीति बिचारू ॥

बिनु पूँछ कछु कहउँ गोसाईं । सेवकु समयँ न ढीठ ढिठाई ॥

तुम्ह सर्बग्य सिरोमनि स्वामी । आपनि समुझि कहउँ अनुगामी ॥

॥ दोहा ॥

नाथ सुह्रद सुठि सरल चित सील सनेह निधान ॥

सब पर प्रीति प्रतीति जियँ जानिअ आपु समान ॥227॥

॥ चौपाई ॥

बिषई जीव पाइ प्रभुताई । मूढ़ मोह बस होहिं जनाई ॥

भरतु नीति रत साधु सुजाना । प्रभु पद प्रेम सकल जगु जाना ॥

तेऊ आजु राम पदु पाई । चले धरम मरजाद मेटाई ॥

कुटिल कुबंध कुअवसरु ताकी । जानि राम बनवास एकाकी ॥

करि कुमंत्रु मन साजि समाजू । आए करै अकंटक राजू ॥

कोटि प्रकार कलपि कुटलाई । आए दल बटोरि दोउ भाई ॥

जौं जियँ होति न कपट कुचाली । केहि सोहाति रथ बाजि गजाली ॥

भरतहि दोसु देइ को जाएँ । जग बौराइ राज पदु पाएँ ॥

॥ दोहा ॥

ससि गुर तिय गामी नघुषु चढ़ेउ भूमिसुर जान ।

लोक बेद तें बिमुख भा अधम न बेन समान ॥228॥

॥ चौपाई ॥

सहसबाहु सुरनाथु त्रिसंकू । केहि न राजमद दीन्ह कलंकू ॥

भरत कीन्ह यह उचित उपाऊ । रिपु रिन रंच न राखब काऊ ॥

एक कीन्हि नहिं भरत भलाई । निदरे रामु जानि असहाई ॥

समुझि परिहि सोउ आजु बिसेषी । समर सरोष राम मुखु पेखी ॥

एतना कहत नीति रस भूला । रन रस बिटपु पुलक मिस फूला ॥

प्रभु पद बंदि सीस रज राखी । बोले सत्य सहज बलु भाषी ॥

अनुचित नाथ न मानब मोरा । भरत हमहि उपचार न थोरा ॥

कहँ लगि सहिअ रहिअ मनु मारें । नाथ साथ धनु हाथ हमारें ॥

॥ दोहा ॥

छत्रि जाति रघुकुल जनमु राम अनुग जगु जान ।

लातहुँ मारें चढ़ति सिर नीच को धूरि समान ॥229॥

॥ चौपाई ॥

उठि कर जोरि रजायसु मागा । मनहुँ बीर रस सोवत जागा ॥

बाँधि जटा सिर कसि कटि भाथा । साजि सरासनु सायकु हाथा ॥

आजु राम सेवक जसु लेऊँ । भरतहि समर सिखावन देऊँ ॥

राम निरादर कर फलु पाई । सोवहुँ समर सेज दोउ भाई ॥

आइ बना भल सकल समाजू । प्रगट करउँ रिस पाछिल आजू ॥

जिमि करि निकर दलइ मृगराजू । लेइ लपेटि लवा जिमि बाजू ॥

तैसेहिं भरतहि सेन समेता । सानुज निदरि निपातउँ खेता ॥

जौं सहाय कर संकरु आई । तौ मारउँ रन राम दोहाई ॥

॥ दोहा ॥

अति सरोष माखे लखनु लखि सुनि सपथ प्रवान ।

सभय लोक सब लोकपति चाहत भभरि भगान ॥230॥

॥ चौपाई ॥

जगु भय मगन गगन भइ बानी । लखन बाहुबलु बिपुल बखानी ॥

तात प्रताप प्रभाउ तुम्हारा । को कहि सकइ को जाननिहारा ॥

अनुचित उचित काजु किछु होऊ । समुझि करिअ भल कह सबु कोऊ ॥

सहसा करि पाछैं पछिताहीं । कहहिं बेद बुध ते बुध नाहीं ॥

सुनि सुर बचन लखन सकुचाने । राम सीयँ सादर सनमाने ॥

कही तात तुम्ह नीति सुहाई । सब तें कठिन राजमदु भाई ॥

जो अचवँत नृप मातहिं तेई । नाहिन साधुसभा जेहिं सेई ॥

सुनहु लखन भल भरत सरीसा । बिधि प्रपंच महँ सुना न दीसा ॥

॥ दोहा ॥

भरतहि होइ न राजमदु बिधि हरि हर पद पाइ ॥

कबहुँ कि काँजी सीकरनि छीरसिंधु बिनसाइ ॥231॥

॥ चौपाई ॥

तिमिरु तरुन तरनिहि मकु गिलई । गगनु मगन मकु मेघहिं मिलई ॥

गोपद जल बूड़हिं घटजोनी । सहज छमा बरु छाड़ै छोनी ॥

मसक फूँक मकु मेरु उड़ाई । होइ न नृपमदु भरतहि भाई ॥

लखन तुम्हार सपथ पितु आना । सुचि सुबंधु नहिं भरत समाना ॥

सगुन खीरु अवगुन जलु ताता । मिलइ रचइ परपंचु बिधाता ॥

भरतु हंस रबिबंस तड़ागा । जनमि कीन्ह गुन दोष बिभागा ॥

गहि गुन पय तजि अवगुन बारी । निज जस जगत कीन्हि उजिआरी ॥

कहत भरत गुन सीलु सुभाऊ । पेम पयोधि मगन रघुराऊ ॥

॥ दोहा ॥

सुनि रघुबर बानी बिबुध देखि भरत पर हेतु ।

सकल सराहत राम सो प्रभु को कृपानिकेतु ॥232॥

॥ चौपाई ॥

जौं न होत जग जनम भरत को । सकल धरम धुर धरनि धरत को ॥

कबि कुल अगम भरत गुन गाथा । को जानइ तुम्ह बिनु रघुनाथा ॥

लखन राम सियँ सुनि सुर बानी । अति सुखु लहेउ न जाइ बखानी ॥

इहाँ भरतु सब सहित सहाए । मंदाकिनीं पुनीत नहाए ॥

सरित समीप राखि सब लोगा । मागि मातु गुर सचिव नियोगा ॥

चले भरतु जहँ सिय रघुराई । साथ निषादनाथु लघु भाई ॥

समुझि मातु करतब सकुचाहीं । करत कुतरक कोटि मन माहीं ॥

रामु लखनु सिय सुनि मम नाऊँ । उठि जनि अनत जाहिं तजि ठाऊँ ॥

॥ दोहा ॥

मातु मते महुँ मानि मोहि जो कछु करहिं सो थोर ।

अघ अवगुन छमि आदरहिं समुझि आपनी ओर ॥233॥

॥ चौपाई ॥

जौं परिहरहिं मलिन मनु जानी । जौ सनमानहिं सेवकु मानी ॥

मोरें सरन रामहि की पनही । राम सुस्वामि दोसु सब जनही ॥

जग जस भाजन चातक मीना । नेम पेम निज निपुन नबीना ॥

अस मन गुनत चले मग जाता । सकुच सनेहँ सिथिल सब गाता ॥

फेरत मनहुँ मातु कृत खोरी । चलत भगति बल धीरज धोरी ॥

जब समुझत रघुनाथ सुभाऊ । तब पथ परत उताइल पाऊ ॥

भरत दसा तेहि अवसर कैसी । जल प्रबाहँ जल अलि गति जैसी ॥

देखि भरत कर सोचु सनेहू । भा निषाद तेहि समयँ बिदेहू ॥

॥ दोहा ॥

लगे होन मंगल सगुन सुनि गुनि कहत निषादु ।

मिटिहि सोचु होइहि हरषु पुनि परिनाम बिषादु ॥234॥

॥ चौपाई ॥

सेवक बचन सत्य सब जाने । आश्रम निकट जाइ निअराने ॥

भरत दीख बन सैल समाजू । मुदित छुधित जनु पाइ सुनाजू ॥

ईति भीति जनु प्रजा दुखारी । त्रिबिध ताप पीड़ित ग्रह मारी ॥

जाइ सुराज सुदेस सुखारी । होहिं भरत गति तेहि अनुहारी ॥

राम बास बन संपति भ्राजा । सुखी प्रजा जनु पाइ सुराजा ॥

सचिव बिरागु बिबेकु नरेसू । बिपिन सुहावन पावन देसू ॥

भट जम नियम सैल रजधानी । सांति सुमति सुचि सुंदर रानी ॥

सकल अंग संपन्न सुराऊ । राम चरन आश्रित चित चाऊ ॥

॥ दोहा ॥

जीति मोह महिपालु दल सहित बिबेक भुआलु ।

करत अकंटक राजु पुरँ सुख संपदा सुकालु ॥235॥

॥ चौपाई ॥

बन प्रदेस मुनि बास घनेरे । जनु पुर नगर गाउँ गन खेरे ॥

बिपुल बिचित्र बिहग मृग नाना । प्रजा समाजु न जाइ बखाना ॥

खगहा करि हरि बाघ बराहा । देखि महिष बृष साजु सराहा ॥

बयरु बिहाइ चरहिं एक संगा । जहँ तहँ मनहुँ सेन चतुरंगा ॥

झरना झरहिं मत्त गज गाजहिं । मनहुँ निसान बिबिधि बिधि बाजहिं ॥

चक चकोर चातक सुक पिक गन । कूजत मंजु मराल मुदित मन ॥

अलिगन गावत नाचत मोरा । जनु सुराज मंगल चहु ओरा ॥

बेलि बिटप तृन सफल सफूला । सब समाजु मुद मंगल मूला ॥

॥ दोहा ॥

दो-राम सैल सोभा निरखि भरत हृदयँ अति पेमु ।

तापस तप फलु पाइ जिमि सुखी सिरानें नेमु ॥236॥

मासपारायण, बीसवाँ विश्राम

नवाह्नपारायण, पाँचवाँ विश्राम

॥ चौपाई ॥

तब केवट ऊँचें चढ़ि धाई । कहेउ भरत सन भुजा उठाई ॥

नाथ देखिअहिं बिटप बिसाला । पाकरि जंबु रसाल तमाला ॥

जिन्ह तरुबरन्ह मध्य बटु सोहा । मंजु बिसाल देखि मनु मोहा ॥

नील सघन पल्ल्व फल लाला । अबिरल छाहँ सुखद सब काला ॥

मानहुँ तिमिर अरुनमय रासी । बिरची बिधि सँकेलि सुषमा सी ॥

ए तरु सरित समीप गोसाँई । रघुबर परनकुटी जहँ छाई ॥

तुलसी तरुबर बिबिध सुहाए । कहुँ कहुँ सियँ कहुँ लखन लगाए ॥

बट छायाँ बेदिका बनाई । सियँ निज पानि सरोज सुहाई ॥

॥ दोहा ॥

जहाँ बैठि मुनिगन सहित नित सिय रामु सुजान ।

सुनहिं कथा इतिहास सब आगम निगम पुरान ॥237॥

॥ चौपाई ॥

सखा बचन सुनि बिटप निहारी । उमगे भरत बिलोचन बारी ॥

करत प्रनाम चले दोउ भाई । कहत प्रीति सारद सकुचाई ॥

हरषहिं निरखि राम पद अंका । मानहुँ पारसु पायउ रंका ॥

रज सिर धरि हियँ नयनन्हि लावहिं । रघुबर मिलन सरिस सुख पावहिं ॥

देखि भरत गति अकथ अतीवा । प्रेम मगन मृग खग जड़ जीवा ॥

सखहि सनेह बिबस मग भूला । कहि सुपंथ सुर बरषहिं फूला ॥

निरखि सिद्ध साधक अनुरागे । सहज सनेहु सराहन लागे ॥

होत न भूतल भाउ भरत को । अचर सचर चर अचर करत को ॥

॥ दोहा ॥

पेम अमिअ मंदरु बिरहु भरतु पयोधि गँभीर ।

मथि प्रगटेउ सुर साधु हित कृपासिंधु रघुबीर ॥238॥

॥ चौपाई ॥

सखा समेत मनोहर जोटा । लखेउ न लखन सघन बन ओटा ॥

भरत दीख प्रभु आश्रमु पावन । सकल सुमंगल सदनु सुहावन ॥

करत प्रबेस मिटे दुख दावा । जनु जोगीं परमारथु पावा ॥

देखे भरत लखन प्रभु आगे । पूँछे बचन कहत अनुरागे ॥

सीस जटा कटि मुनि पट बाँधें । तून कसें कर सरु धनु काँधें ॥

बेदी पर मुनि साधु समाजू । सीय सहित राजत रघुराजू ॥

बलकल बसन जटिल तनु स्यामा । जनु मुनि बेष कीन्ह रति कामा ॥

कर कमलनि धनु सायकु फेरत । जिय की जरनि हरत हँसि हेरत ॥

॥ दोहा ॥

लसत मंजु मुनि मंडली मध्य सीय रघुचंदु ।

ग्यान सभाँ जनु तनु धरे भगति सच्चिदानंदु ॥239॥

॥ चौपाई ॥

सानुज सखा समेत मगन मन । बिसरे हरष सोक सुख दुख गन ॥

पाहि नाथ कहि पाहि गोसाई । भूतल परे लकुट की नाई ॥

बचन सपेम लखन पहिचाने । करत प्रनामु भरत जियँ जाने ॥

बंधु सनेह सरस एहि ओरा । उत साहिब सेवा बस जोरा ॥

मिलि न जाइ नहिं गुदरत बनई । सुकबि लखन मन की गति भनई ॥

रहे राखि सेवा पर भारू । चढ़ी चंग जनु खैंच खेलारू ॥

कहत सप्रेम नाइ महि माथा । भरत प्रनाम करत रघुनाथा ॥

उठे रामु सुनि पेम अधीरा । कहुँ पट कहुँ निषंग धनु तीरा ॥

॥ दोहा ॥

बरबस लिए उठाइ उर लाए कृपानिधान ।

भरत राम की मिलनि लखि बिसरे सबहि अपान ॥240॥

॥ चौपाई ॥

मिलनि प्रीति किमि जाइ बखानी । कबिकुल अगम करम मन बानी ॥

परम पेम पूरन दोउ भाई । मन बुधि चित अहमिति बिसराई ॥

कहहु सुपेम प्रगट को करई । केहि छाया कबि मति अनुसरई ॥

कबिहि अरथ आखर बलु साँचा । अनुहरि ताल गतिहि नटु नाचा ॥

अगम सनेह भरत रघुबर को । जहँ न जाइ मनु बिधि हरि हर को ॥

सो मैं कुमति कहौं केहि भाँती । बाज सुराग कि गाँडर ताँती ॥

मिलनि बिलोकि भरत रघुबर की । सुरगन सभय धकधकी धरकी ॥

समुझाए सुरगुरु जड़ जागे । बरषि प्रसून प्रसंसन लागे ॥

॥ दोहा ॥

मिलि सपेम रिपुसूदनहि केवटु भेंटेउ राम ।

भूरि भायँ भेंटे भरत लछिमन करत प्रनाम ॥241॥

॥ चौपाई ॥

भेंटेउ लखन ललकि लघु भाई । बहुरि निषादु लीन्ह उर लाई ॥

पुनि मुनिगन दुहुँ भाइन्ह बंदे । अभिमत आसिष पाइ अनंदे ॥

सानुज भरत उमगि अनुरागा । धरि सिर सिय पद पदुम परागा ॥

पुनि पुनि करत प्रनाम उठाए । सिर कर कमल परसि बैठाए ॥

सीयँ असीस दीन्हि मन माहीं । मगन सनेहँ देह सुधि नाहीं ॥

सब बिधि सानुकूल लखि सीता । भे निसोच उर अपडर बीता ॥

कोउ किछु कहइ न कोउ किछु पूँछा । प्रेम भरा मन निज गति छूँछा ॥

तेहि अवसर केवटु धीरजु धरि । जोरि पानि बिनवत प्रनामु करि ॥

॥ दोहा ॥

नाथ साथ मुनिनाथ के मातु सकल पुर लोग ।

सेवक सेनप सचिव सब आए बिकल बियोग ॥242॥

॥ चौपाई ॥

सीलसिंधु सुनि गुर आगवनू । सिय समीप राखे रिपुदवनू ॥

चले सबेग रामु तेहि काला । धीर धरम धुर दीनदयाला ॥

गुरहि देखि सानुज अनुरागे । दंड प्रनाम करन प्रभु लागे ॥

मुनिबर धाइ लिए उर लाई । प्रेम उमगि भेंटे दोउ भाई ॥

प्रेम पुलकि केवट कहि नामू । कीन्ह दूरि तें दंड प्रनामू ॥

रामसखा रिषि बरबस भेंटा । जनु महि लुठत सनेह समेटा ॥

रघुपति भगति सुमंगल मूला । नभ सराहि सुर बरिसहिं फूला ॥

एहि सम निपट नीच कोउ नाहीं । बड़ बसिष्ठ सम को जग माहीं ॥

॥ दोहा ॥

जेहि लखि लखनहु तें अधिक मिले मुदित मुनिराउ ।

सो सीतापति भजन को प्रगट प्रताप प्रभाउ ॥243॥

॥ चौपाई ॥

आरत लोग राम सबु जाना । करुनाकर सुजान भगवाना ॥

जो जेहि भायँ रहा अभिलाषी । तेहि तेहि कै तसि तसि रुख राखी ॥

सानुज मिलि पल महु सब काहू । कीन्ह दूरि दुखु दारुन दाहू ॥

यह बड़ि बातँ राम कै नाहीं । जिमि घट कोटि एक रबि छाहीं ॥

मिलि केवटिहि उमगि अनुरागा । पुरजन सकल सराहहिं भागा ॥

देखीं राम दुखित महतारीं । जनु सुबेलि अवलीं हिम मारीं ॥

प्रथम राम भेंटी कैकेई । सरल सुभायँ भगति मति भेई ॥

पग परि कीन्ह प्रबोधु बहोरी । काल करम बिधि सिर धरि खोरी ॥

॥ दोहा ॥

भेटीं रघुबर मातु सब करि प्रबोधु परितोषु ॥

अंब ईस आधीन जगु काहु न देइअ दोषु ॥244॥

॥ चौपाई ॥

गुरतिय पद बंदे दुहु भाई । सहित बिप्रतिय जे सँग आई ॥

गंग गौरि सम सब सनमानीं ॥देहिं असीस मुदित मृदु बानी ॥

गहि पद लगे सुमित्रा अंका । जनु भेटीं संपति अति रंका ॥

पुनि जननि चरननि दोउ भ्राता । परे पेम ब्याकुल सब गाता ॥

अति अनुराग अंब उर लाए । नयन सनेह सलिल अन्हवाए ॥

तेहि अवसर कर हरष बिषादू । किमि कबि कहै मूक जिमि स्वादू ॥

मिलि जननहि सानुज रघुराऊ । गुर सन कहेउ कि धारिअ पाऊ ॥

पुरजन पाइ मुनीस नियोगू । जल थल तकि तकि उतरेउ लोगू ॥

॥ दोहा ॥

महिसुर मंत्री मातु गुर गने लोग लिए साथ ॥

पावन आश्रम गवनु किय भरत लखन रघुनाथ ॥245॥

॥ चौपाई ॥

सीय आइ मुनिबर पग लागी । उचित असीस लही मन मागी ॥

गुरपतिनिहि मुनितियन्ह समेता । मिली पेमु कहि जाइ न जेता ॥

बंदि बंदि पग सिय सबही के । आसिरबचन लहे प्रिय जी के ॥

सासु सकल जब सीयँ निहारीं । मूदे नयन सहमि सुकुमारीं ॥

परीं बधिक बस मनहुँ मरालीं । काह कीन्ह करतार कुचालीं ॥

तिन्ह सिय निरखि निपट दुखु पावा । सो सबु सहिअ जो दैउ सहावा ॥

जनकसुता तब उर धरि धीरा । नील नलिन लोयन भरि नीरा ॥

मिली सकल सासुन्ह सिय जाई । तेहि अवसर करुना महि छाई ॥

॥ दोहा ॥

लागि लागि पग सबनि सिय भेंटति अति अनुराग ॥

हृदयँ असीसहिं पेम बस रहिअहु भरी सोहाग ॥246॥

॥ चौपाई ॥

बिकल सनेहँ सीय सब रानीं । बैठन सबहि कहेउ गुर ग्यानीं ॥

कहि जग गति मायिक मुनिनाथा । कहे कछुक परमारथ गाथा ॥

नृप कर सुरपुर गवनु सुनावा । सुनि रघुनाथ दुसह दुखु पावा ॥

मरन हेतु निज नेहु बिचारी । भे अति बिकल धीर धुर धारी ॥

कुलिस कठोर सुनत कटु बानी । बिलपत लखन सीय सब रानी ॥

सोक बिकल अति सकल समाजू । मानहुँ राजु अकाजेउ आजू ॥

मुनिबर बहुरि राम समुझाए । सहित समाज सुसरित नहाए ॥

ब्रतु निरंबु तेहि दिन प्रभु कीन्हा । मुनिहु कहें जलु काहुँ न लीन्हा ॥

॥ दोहा ॥

भोरु भएँ रघुनंदनहि जो मुनि आयसु दीन्ह ॥

श्रद्धा भगति समेत प्रभु सो सबु सादरु कीन्ह ॥247॥

॥ चौपाई ॥

करि पितु क्रिया बेद जसि बरनी । भे पुनीत पातक तम तरनी ॥

जासु नाम पावक अघ तूला । सुमिरत सकल सुमंगल मूला ॥

सुद्ध सो भयउ साधु संमत अस । तीरथ आवाहन सुरसरि जस ॥

सुद्ध भएँ दुइ बासर बीते । बोले गुर सन राम पिरीते ॥

नाथ लोग सब निपट दुखारी । कंद मूल फल अंबु अहारी ॥

सानुज भरतु सचिव सब माता । देखि मोहि पल जिमि जुग जाता ॥

सब समेत पुर धारिअ पाऊ । आपु इहाँ अमरावति राऊ ॥

बहुत कहेउँ सब कियउँ ढिठाई । उचित होइ तस करिअ गोसाँई ॥

॥ दोहा ॥

धर्म सेतु करुनायतन कस न कहहु अस राम ।

लोग दुखित दिन दुइ दरस देखि लहहुँ बिश्राम ॥248॥

॥ चौपाई ॥

राम बचन सुनि सभय समाजू । जनु जलनिधि महुँ बिकल जहाजू ॥

सुनि गुर गिरा सुमंगल मूला । भयउ मनहुँ मारुत अनुकुला ॥

पावन पयँ तिहुँ काल नहाहीं । जो बिलोकि अंघ ओघ नसाहीं ॥

मंगलमूरति लोचन भरि भरि । निरखहिं हरषि दंडवत करि करि ॥

राम सैल बन देखन जाहीं । जहँ सुख सकल सकल दुख नाहीं ॥

झरना झरिहिं सुधासम बारी । त्रिबिध तापहर त्रिबिध बयारी ॥

बिटप बेलि तृन अगनित जाती । फल प्रसून पल्लव बहु भाँती ॥

सुंदर सिला सुखद तरु छाहीं । जाइ बरनि बन छबि केहि पाहीं ॥

॥ दोहा ॥

सरनि सरोरुह जल बिहग कूजत गुंजत भृंग ।

बैर बिगत बिहरत बिपिन मृग बिहंग बहुरंग ॥249॥

॥ चौपाई ॥

कोल किरात भिल्ल बनबासी । मधु सुचि सुंदर स्वादु सुधा सी ॥

भरि भरि परन पुटीं रचि रुरी । कंद मूल फल अंकुर जूरी ॥

सबहि देहिं करि बिनय प्रनामा । कहि कहि स्वाद भेद गुन नामा ॥

देहिं लोग बहु मोल न लेहीं । फेरत राम दोहाई देहीं ॥

कहहिं सनेह मगन मृदु बानी । मानत साधु पेम पहिचानी ॥

तुम्ह सुकृती हम नीच निषादा । पावा दरसनु राम प्रसादा ॥

हमहि अगम अति दरसु तुम्हारा । जस मरु धरनि देवधुनि धारा ॥

राम कृपाल निषाद नेवाजा । परिजन प्रजउ चहिअ जस राजा ॥

॥ दोहा ॥

यह जिँयँ जानि सँकोचु तजि करिअ छोहु लखि नेहु ।

हमहि कृतारथ करन लगि फल तृन अंकुर लेहु ॥250॥

॥ चौपाई ॥

तुम्ह प्रिय पाहुने बन पगु धारे । सेवा जोगु न भाग हमारे ॥

देब काह हम तुम्हहि गोसाँई । ईधनु पात किरात मिताई ॥

यह हमारि अति बड़ि सेवकाई । लेहि न बासन बसन चोराई ॥

हम जड़ जीव जीव गन घाती । कुटिल कुचाली कुमति कुजाती ॥

पाप करत निसि बासर जाहीं । नहिं पट कटि नहि पेट अघाहीं ॥

सपोनेहुँ धरम बुद्धि कस काऊ । यह रघुनंदन दरस प्रभाऊ ॥

जब तें प्रभु पद पदुम निहारे । मिटे दुसह दुख दोष हमारे ॥

बचन सुनत पुरजन अनुरागे । तिन्ह के भाग सराहन लागे ॥

॥ छन्द ॥

छं0-लागे सराहन भाग सब अनुराग बचन सुनावहीं ।

बोलनि मिलनि सिय राम चरन सनेहु लखि सुखु पावहीं ॥

नर नारि निदरहिं नेहु निज सुनि कोल भिल्लनि की गिरा ।

तुलसी कृपा रघुबंसमनि की लोह लै लौका तिरा ॥

॥ सोरठा ॥

सो0-बिहरहिं बन चहु ओर प्रतिदिन प्रमुदित लोग सब ।

जल ज्यों दादुर मोर भए पीन पावस प्रथम ॥251॥

॥ चौपाई ॥

पुर जन नारि मगन अति प्रीती । बासर जाहिं पलक सम बीती ॥

सीय सासु प्रति बेष बनाई । सादर करइ सरिस सेवकाई ॥

लखा न मरमु राम बिनु काहूँ । माया सब सिय माया माहूँ ॥

सीयँ सासु सेवा बस कीन्हीं । तिन्ह लहि सुख सिख आसिष दीन्हीं ॥

लखि सिय सहित सरल दोउ भाई । कुटिल रानि पछितानि अघाई ॥

अवनि जमहि जाचति कैकेई । महि न बीचु बिधि मीचु न देई ॥

लोकहुँ बेद बिदित कबि कहहीं । राम बिमुख थलु नरक न लहहीं ॥

यहु संसउ सब के मन माहीं । राम गवनु बिधि अवध कि नाहीं ॥

॥ दोहा ॥

निसि न नीद नहिं भूख दिन भरतु बिकल सुचि सोच ।

नीच कीच बिच मगन जस मीनहि सलिल सँकोच ॥252॥

॥ चौपाई ॥

कीन्ही मातु मिस काल कुचाली । ईति भीति जस पाकत साली ॥

केहि बिधि होइ राम अभिषेकू । मोहि अवकलत उपाउ न एकू ॥

अवसि फिरहिं गुर आयसु मानी । मुनि पुनि कहब राम रुचि जानी ॥

मातु कहेहुँ बहुरहिं रघुराऊ । राम जननि हठ करबि कि काऊ ॥

मोहि अनुचर कर केतिक बाता । तेहि महँ कुसमउ बाम बिधाता ॥

जौं हठ करउँ त निपट कुकरमू । हरगिरि तें गुरु सेवक धरमू ॥

एकउ जुगुति न मन ठहरानी । सोचत भरतहि रैनि बिहानी ॥

प्रात नहाइ प्रभुहि सिर नाई । बैठत पठए रिषयँ बोलाई ॥

॥ दोहा ॥

गुर पद कमल प्रनामु करि बैठे आयसु पाइ ।

बिप्र महाजन सचिव सब जुरे सभासद आइ ॥253॥

॥ चौपाई ॥

बोले मुनिबरु समय समाना । सुनहु सभासद भरत सुजाना ॥

धरम धुरीन भानुकुल भानू । राजा रामु स्वबस भगवानू ॥

सत्यसंध पालक श्रुति सेतू । राम जनमु जग मंगल हेतू ॥

गुर पितु मातु बचन अनुसारी । खल दलु दलन देव हितकारी ॥

नीति प्रीति परमारथ स्वारथु । कोउ न राम सम जान जथारथु ॥

बिधि हरि हरु ससि रबि दिसिपाला । माया जीव करम कुलि काला ॥

अहिप महिप जहँ लगि प्रभुताई । जोग सिद्धि निगमागम गाई ॥

करि बिचार जिँयँ देखहु नीकें । राम रजाइ सीस सबही कें ॥

॥ दोहा ॥

राखें राम रजाइ रुख हम सब कर हित होइ ।

समुझि सयाने करहु अब सब मिलि संमत सोइ ॥254॥

॥ चौपाई ॥

सब कहुँ सुखद राम अभिषेकू । मंगल मोद मूल मग एकू ॥

केहि बिधि अवध चलहिं रघुराऊ । कहहु समुझि सोइ करिअ उपाऊ ॥

सब सादर सुनि मुनिबर बानी । नय परमारथ स्वारथ सानी ॥

उतरु न आव लोग भए भोरे । तब सिरु नाइ भरत कर जोरे ॥

भानुबंस भए भूप घनेरे । अधिक एक तें एक बड़ेरे ॥

जनमु हेतु सब कहँ पितु माता । करम सुभासुभ देइ बिधाता ॥

दलि दुख सजइ सकल कल्याना । अस असीस राउरि जगु जाना ॥

सो गोसाइँ बिधि गति जेहिं छेंकी । सकइ को टारि टेक जो टेकी ॥

॥ दोहा ॥

बूझिअ मोहि उपाउ अब सो सब मोर अभागु ।

सुनि सनेहमय बचन गुर उर उमगा अनुरागु ॥255॥

॥ चौपाई ॥

तात बात फुरि राम कृपाहीं । राम बिमुख सिधि सपनेहुँ नाहीं ॥

सकुचउँ तात कहत एक बाता । अरध तजहिं बुध सरबस जाता ॥

तुम्ह कानन गवनहु दोउ भाई । फेरिअहिं लखन सीय रघुराई ॥

सुनि सुबचन हरषे दोउ भ्राता । भे प्रमोद परिपूरन गाता ॥

मन प्रसन्न तन तेजु बिराजा । जनु जिय राउ रामु भए राजा ॥

बहुत लाभ लोगन्ह लघु हानी । सम दुख सुख सब रोवहिं रानी ॥

कहहिं भरतु मुनि कहा सो कीन्हे । फलु जग जीवन्ह अभिमत दीन्हे ॥

कानन करउँ जनम भरि बासू । एहिं तें अधिक न मोर सुपासू ॥

॥ दोहा ॥

अँतरजामी रामु सिय तुम्ह सरबग्य सुजान ।

जो फुर कहहु त नाथ निज कीजिअ बचनु प्रवान ॥256॥

॥ चौपाई ॥

भरत बचन सुनि देखि सनेहू । सभा सहित मुनि भए बिदेहू ॥

भरत महा महिमा जलरासी । मुनि मति ठाढ़ि तीर अबला सी ॥

गा चह पार जतनु हियँ हेरा । पावति नाव न बोहितु बेरा ॥

औरु करिहि को भरत बड़ाई । सरसी सीपि कि सिंधु समाई ॥

भरतु मुनिहि मन भीतर भाए । सहित समाज राम पहिँ आए ॥

प्रभु प्रनामु करि दीन्ह सुआसनु । बैठे सब सुनि मुनि अनुसासनु ॥

बोले मुनिबरु बचन बिचारी । देस काल अवसर अनुहारी ॥

सुनहु राम सरबग्य सुजाना । धरम नीति गुन ग्यान निधाना ॥

॥ दोहा ॥

सब के उर अंतर बसहु जानहु भाउ कुभाउ ।

पुरजन जननी भरत हित होइ सो कहिअ उपाउ ॥257॥

॥ चौपाई ॥

आरत कहहिं बिचारि न काऊ । सूझ जूआरिहि आपन दाऊ ॥

सुनि मुनि बचन कहत रघुराऊ । नाथ तुम्हारेहि हाथ उपाऊ ॥

सब कर हित रुख राउरि राखेँ । आयसु किएँ मुदित फुर भाषें ॥

प्रथम जो आयसु मो कहुँ होई । माथेँ मानि करौ सिख सोई ॥

पुनि जेहि कहँ जस कहब गोसाईँ । सो सब भाँति घटिहि सेवकाईँ ॥

कह मुनि राम सत्य तुम्ह भाषा । भरत सनेहँ बिचारु न राखा ॥

तेहि तें कहउँ बहोरि बहोरी । भरत भगति बस भइ मति मोरी ॥

मोरेँ जान भरत रुचि राखि । जो कीजिअ सो सुभ सिव साखी ॥

॥ दोहा ॥

भरत बिनय सादर सुनिअ करिअ बिचारु बहोरि ।

करब साधुमत लोकमत नृपनय निगम निचोरि ॥258॥

॥ चौपाई ॥

गुरु अनुराग भरत पर देखी । राम ह्दयँ आनंदु बिसेषी ॥

भरतहि धरम धुरंधर जानी । निज सेवक तन मानस बानी ॥

बोले गुर आयस अनुकूला । बचन मंजु मृदु मंगलमूला ॥

नाथ सपथ पितु चरन दोहाई । भयउ न भुअन भरत सम भाई ॥

जे गुर पद अंबुज अनुरागी । ते लोकहुँ बेदहुँ बड़भागी ॥

राउर जा पर अस अनुरागू । को कहि सकइ भरत कर भागू ॥

लखि लघु बंधु बुद्धि सकुचाई । करत बदन पर भरत बड़ाई ॥

भरतु कहहीं सोइ किएँ भलाई । अस कहि राम रहे अरगाई ॥

॥ दोहा ॥

तब मुनि बोले भरत सन सब सँकोचु तजि तात ।

कृपासिंधु प्रिय बंधु सन कहहु हृदय कै बात ॥259॥

॥ चौपाई ॥

सुनि मुनि बचन राम रुख पाई । गुरु साहिब अनुकूल अघाई ॥

लखि अपने सिर सबु छरु भारू । कहि न सकहिं कछु करहिं बिचारू ॥

पुलकि सरीर सभाँ भए ठाढें । नीरज नयन नेह जल बाढ़ें ॥

कहब मोर मुनिनाथ निबाहा । एहि तें अधिक कहौं मैं काहा ।

मैं जानउँ निज नाथ सुभाऊ । अपराधिहु पर कोह न काऊ ॥

मो पर कृपा सनेह बिसेषी । खेलत खुनिस न कबहूँ देखी ॥

सिसुपन तेम परिहरेउँ न संगू । कबहुँ न कीन्ह मोर मन भंगू ॥

मैं प्रभु कृपा रीति जियँ जोही । हारेहुँ खेल जितावहिं मोही ॥

॥ दोहा ॥

महूँ सनेह सकोच बस सनमुख कही न बैन ।

दरसन तृपित न आजु लगि पेम पिआसे नैन ॥260॥

॥ चौपाई ॥

बिधि न सकेउ सहि मोर दुलारा । नीच बीचु जननी मिस पारा ।

यहउ कहत मोहि आजु न सोभा । अपनीं समुझि साधु सुचि को भा ॥

मातु मंदि मैं साधु सुचाली । उर अस आनत कोटि कुचाली ॥

फरइ कि कोदव बालि सुसाली । मुकुता प्रसव कि संबुक काली ॥

सपनेहुँ दोसक लेसु न काहू । मोर अभाग उदधि अवगाहू ॥

बिनु समुझें निज अघ परिपाकू । जारिउँ जायँ जननि कहि काकू ॥

हृदयँ हेरि हारेउँ सब ओरा । एकहि भाँति भलेहिं भल मोरा ॥

गुर गोसाइँ साहिब सिय रामू । लागत मोहि नीक परिनामू ॥

॥ दोहा ॥

साधु सभा गुर प्रभु निकट कहउँ सुथल सति भाउ ।

प्रेम प्रपंचु कि झूठ फुर जानहिं मुनि रघुराउ ॥261॥

॥ चौपाई ॥

भूपति मरन पेम पनु राखी । जननी कुमति जगतु सबु साखी ॥

देखि न जाहि बिकल महतारी । जरहिं दुसह जर पुर नर नारी ॥

महीं सकल अनरथ कर मूला । सो सुनि समुझि सहिउँ सब सूला ॥

सुनि बन गवनु कीन्ह रघुनाथा । करि मुनि बेष लखन सिय साथा ॥

बिनु पानहिन्ह पयादेहि पाएँ । संकरु साखि रहेउँ एहि घाएँ ॥

बहुरि निहार निषाद सनेहू । कुलिस कठिन उर भयउ न बेहू ॥

अब सबु आँखिन्ह देखेउँ आई । जिअत जीव जड़ सबइ सहाई ॥

जिन्हहि निरखि मग साँपिनि बीछी । तजहिं बिषम बिषु तामस तीछी ॥

॥ दोहा ॥

तेइ रघुनंदनु लखनु सिय अनहित लागे जाहि ।

तासु तनय तजि दुसह दुख दैउ सहावइ काहि ॥262॥

॥ चौपाई ॥

सुनि अति बिकल भरत बर बानी । आरति प्रीति बिनय नय सानी ॥

सोक मगन सब सभाँ खभारू । मनहुँ कमल बन परेउ तुसारू ॥

कहि अनेक बिधि कथा पुरानी । भरत प्रबोधु कीन्ह मुनि ग्यानी ॥

बोले उचित बचन रघुनंदू । दिनकर कुल कैरव बन चंदू ॥

तात जाँय जियँ करहु गलानी । ईस अधीन जीव गति जानी ॥

तीनि काल तिभुअन मत मोरें । पुन्यसिलोक तात तर तोरे ॥

उर आनत तुम्ह पर कुटिलाई । जाइ लोकु परलोकु नसाई ॥

दोसु देहिं जननिहि जड़ तेई । जिन्ह गुर साधु सभा नहिं सेई ॥

॥ दोहा ॥

मिटिहहिं पाप प्रपंच सब अखिल अमंगल भार ।

लोक सुजसु परलोक सुखु सुमिरत नामु तुम्हार ॥263॥

॥ चौपाई ॥

कहउँ सुभाउ सत्य सिव साखी । भरत भूमि रह राउरि राखी ॥

तात कुतरक करहु जनि जाएँ । बैर पेम नहि दुरइ दुराएँ ॥

मुनि गन निकट बिहग मृग जाहीं । बाधक बधिक बिलोकि पराहीं ॥

हित अनहित पसु पच्छिउ जाना । मानुष तनु गुन ग्यान निधाना ॥

तात तुम्हहि मैं जानउँ नीकें । करौं काह असमंजस जीकें ॥

राखेउ रायँ सत्य मोहि त्यागी । तनु परिहरेउ पेम पन लागी ॥

तासु बचन मेटत मन सोचू । तेहि तें अधिक तुम्हार सँकोचू ॥

ता पर गुर मोहि आयसु दीन्हा । अवसि जो कहहु चहउँ सोइ कीन्हा ॥

॥ दोहा ॥

मनु प्रसन्न करि सकुच तजि कहहु करौं सोइ आजु ।

सत्यसंध रघुबर बचन सुनि भा सुखी समाजु ॥264॥

॥ चौपाई ॥

सुर गन सहित सभय सुरराजू । सोचहिं चाहत होन अकाजू ॥

बनत उपाउ करत कछु नाहीं । राम सरन सब गे मन माहीं ॥

बहुरि बिचारि परस्पर कहहीं । रघुपति भगत भगति बस अहहीं ।

सुधि करि अंबरीष दुरबासा । भे सुर सुरपति निपट निरासा ॥

सहे सुरन्ह बहु काल बिषादा । नरहरि किए प्रगट प्रहलादा ॥

लगि लगि कान कहहिं धुनि माथा । अब सुर काज भरत के हाथा ॥

आन उपाउ न देखिअ देवा । मानत रामु सुसेवक सेवा ॥

हियँ सपेम सुमिरहु सब भरतहि । निज गुन सील राम बस करतहि ॥

॥ दोहा ॥

सुनि सुर मत सुरगुर कहेउ भल तुम्हार बड़ भागु ।

सकल सुमंगल मूल जग भरत चरन अनुरागु ॥265॥

॥ चौपाई ॥

सीतापति सेवक सेवकाई । कामधेनु सय सरिस सुहाई ॥

भरत भगति तुम्हरें मन आई । तजहु सोचु बिधि बात बनाई ॥

देखु देवपति भरत प्रभाऊ । सहज सुभायँ बिबस रघुराऊ ॥

मन थिर करहु देव डरु नाहीं । भरतहि जानि राम परिछाहीं ॥

सुनो सुरगुर सुर संमत सोचू । अंतरजामी प्रभुहि सकोचू ॥

निज सिर भारु भरत जियँ जाना । करत कोटि बिधि उर अनुमाना ॥

करि बिचारु मन दीन्ही ठीका । राम रजायस आपन नीका ॥

निज पन तजि राखेउ पनु मोरा । छोहु सनेहु कीन्ह नहिं थोरा ॥

॥ दोहा ॥

कीन्ह अनुग्रह अमित अति सब बिधि सीतानाथ ।

करि प्रनामु बोले भरतु जोरि जलज जुग हाथ ॥266॥

॥ चौपाई ॥

कहौं कहावौं का अब स्वामी । कृपा अंबुनिधि अंतरजामी ॥

गुर प्रसन्न साहिब अनुकूला । मिटी मलिन मन कलपित सूला ॥

अपडर डरेउँ न सोच समूलें । रबिहि न दोसु देव दिसि भूलें ॥

मोर अभागु मातु कुटिलाई । बिधि गति बिषम काल कठिनाई ॥

पाउ रोपि सब मिलि मोहि घाला । प्रनतपाल पन आपन पाला ॥

यह नइ रीति न राउरि होई । लोकहुँ बेद बिदित नहिं गोई ॥

जगु अनभल भल एकु गोसाईं । कहिअ होइ भल कासु भलाईं ॥

देउ देवतरु सरिस सुभाऊ । सनमुख बिमुख न काहुहि काऊ ॥

॥ दोहा ॥

जाइ निकट पहिचानि तरु छाहँ समनि सब सोच ।

मागत अभिमत पाव जग राउ रंकु भल पोच ॥267॥

॥ चौपाई ॥

लखि सब बिधि गुर स्वामि सनेहू । मिटेउ छोभु नहिं मन संदेहू ॥

अब करुनाकर कीजिअ सोई । जन हित प्रभु चित छोभु न होई ॥

जो सेवकु साहिबहि सँकोची । निज हित चहइ तासु मति पोची ॥

सेवक हित साहिब सेवकाई । करै सकल सुख लोभ बिहाई ॥

स्वारथु नाथ फिरें सबही का । किएँ रजाइ कोटि बिधि नीका ॥

यह स्वारथ परमारथ सारु । सकल सुकृत फल सुगति सिंगारु ॥

देव एक बिनती सुनि मोरी । उचित होइ तस करब बहोरी ॥

तिलक समाजु साजि सबु आना । करिअ सुफल प्रभु जौं मनु माना ॥

॥ दोहा ॥

सानुज पठइअ मोहि बन कीजिअ सबहि सनाथ ।

नतरु फेरिअहिं बंधु दोउ नाथ चलौं मैं साथ ॥268॥

॥ चौपाई ॥

नतरु जाहिं बन तीनिउ भाई । बहुरिअ सीय सहित रघुराई ॥

जेहि बिधि प्रभु प्रसन्न मन होई । करुना सागर कीजिअ सोई ॥

देवँ दीन्ह सबु मोहि अभारु । मोरें नीति न धरम बिचारु ॥

कहउँ बचन सब स्वारथ हेतू । रहत न आरत कें चित चेतू ॥

उतरु देइ सुनि स्वामि रजाई । सो सेवकु लखि लाज लजाई ॥

अस मैं अवगुन उदधि अगाधू । स्वामि सनेहँ सराहत साधू ॥

अब कृपाल मोहि सो मत भावा । सकुच स्वामि मन जाइँ न पावा ॥

प्रभु पद सपथ कहउँ सति भाऊ । जग मंगल हित एक उपाऊ ॥

॥ दोहा ॥

प्रभु प्रसन्न मन सकुच तजि जो जेहि आयसु देब ।

सो सिर धरि धरि करिहि सबु मिटिहि अनट अवरेब ॥269॥

॥ चौपाई ॥

भरत बचन सुचि सुनि सुर हरषे । साधु सराहि सुमन सुर बरषे ॥

असमंजस बस अवध नेवासी । प्रमुदित मन तापस बनबासी ॥

चुपहिं रहे रघुनाथ सँकोची । प्रभु गति देखि सभा सब सोची ॥

जनक दूत तेहि अवसर आए । मुनि बसिष्ठँ सुनि बेगि बोलाए ॥

करि प्रनाम तिन्ह रामु निहारे । बेषु देखि भए निपट दुखारे ॥

दूतन्ह मुनिबर बूझी बाता । कहहु बिदेह भूप कुसलाता ॥

सुनि सकुचाइ नाइ महि माथा । बोले चर बर जोरें हाथा ॥

बूझब राउर सादर साईं । कुसल हेतु सो भयउ गोसाईं ॥

॥ दोहा ॥

नाहि त कोसल नाथ कें साथ कुसल गइ नाथ ।

मिथिला अवध बिसेष तें जगु सब भयउ अनाथ ॥270॥

॥ चौपाई ॥

कोसलपति गति सुनि जनकौरा । भे सब लोक सोक बस बौरा ॥

जेहिं देखे तेहि समय बिदेहू । नामु सत्य अस लाग न केहू ॥

रानि कुचालि सुनत नरपालहि । सूझ न कछु जस मनि बिनु ब्यालहि ॥

भरत राज रघुबर बनबासू । भा मिथिलेसहि हृदयँ हराँसू ॥

नृप बूझे बुध सचिव समाजू । कहहु बिचारि उचित का आजू ॥

समुझि अवध असमंजस दोऊ । चलिअ कि रहिअ न कह कछु कोऊ ॥

नृपहि धीर धरि हृदयँ बिचारी । पठए अवध चतुर चर चारी ॥

बूझि भरत सति भाउ कुभाऊ । आएहु बेगि न होइ लखाऊ ॥

॥ दोहा ॥

गए अवध चर भरत गति बूझि देखि करतूति ।

चले चित्रकूटहि भरतु चार चले तेरहूति ॥271॥

॥ चौपाई ॥

दूतन्ह आइ भरत कइ करनी । जनक समाज जथामति बरनी ॥

सुनि गुर परिजन सचिव महीपति । भे सब सोच सनेहँ बिकल अति ॥

धरि धीरजु करि भरत बड़ाई । लिए सुभट साहनी बोलाई ॥

घर पुर देस राखि रखवारे । हय गय रथ बहु जान सँवारे ॥

दुघरी साधि चले ततकाला । किए बिश्रामु न मग महीपाला ॥

भोरहिं आजु नहाइ प्रयागा । चले जमुन उतरन सबु लागा ॥

खबरि लेन हम पठए नाथा । तिन्ह कहि अस महि नायउ माथा ॥

साथ किरात छ सातक दीन्हे । मुनिबर तुरत बिदा चर कीन्हे ॥

॥ दोहा ॥

सुनत जनक आगवनु सबु हरषेउ अवध समाजु ।

रघुनंदनहि सकोचु बड़ सोच बिबस सुरराजु ॥272॥

॥ चौपाई ॥

गरइ गलानि कुटिल कैकेई । काहि कहै केहि दूषनु देई ॥

अस मन आनि मुदित नर नारी । भयउ बहोरि रहब दिन चारी ॥

एहि प्रकार गत बासर सोऊ । प्रात नहान लाग सबु कोऊ ॥

करि मज्जनु पूजहिं नर नारी । गनप गौरि तिपुरारि तमारी ॥

रमा रमन पद बंदि बहोरी । बिनवहिं अंजुलि अंचल जोरी ॥

राजा रामु जानकी रानी । आनँद अवधि अवध रजधानी ॥

सुबस बसउ फिरि सहित समाजा । भरतहि रामु करहुँ जुबराजा ॥

एहि सुख सुधाँ सींची सब काहू । देव देहु जग जीवन लाहू ॥

॥ दोहा ॥

गुर समाज भाइन्ह सहित राम राजु पुर होउ ।

अछत राम राजा अवध मरिअ माग सबु कोउ ॥273॥

॥ चौपाई ॥

सुनि सनेहमय पुरजन बानी । निंदहिं जोग बिरति मुनि ग्यानी ॥

एहि बिधि नित्यकरम करि पुरजन । रामहि करहिं प्रनाम पुलकि तन ॥

ऊँच नीच मध्यम नर नारी । लहहिं दरसु निज निज अनुहारी ॥

सावधान सबही सनमानहिं । सकल सराहत कृपानिधानहिं ॥

लरिकाइहि ते रघुबर बानी । पालत नीति प्रीति पहिचानी ॥

सील सकोच सिंधु रघुराऊ । सुमुख सुलोचन सरल सुभाऊ ॥

कहत राम गुन गन अनुरागे । सब निज भाग सराहन लागे ॥

हम सम पुन्य पुंज जग थोरे । जिन्हहि रामु जानत करि मोरे ॥

॥ दोहा ॥

प्रेम मगन तेहि समय सब सुनि आवत मिथिलेसु ।

सहित सभा संभ्रम उठेउ रबिकुल कमल दिनेसु ॥274॥

॥ चौपाई ॥

भाइ सचिव गुर पुरजन साथा । आगें गवनु कीन्ह रघुनाथा ॥

गिरिबरु दीख जनकपति जबहीं । करि प्रनाम रथ त्यागेउ तबहीं ॥

राम दरस लालसा उछाहू । पथ श्रम लेसु कलेसु न काहू ॥

मन तहँ जहँ रघुबर बैदेही । बिनु मन तन दुख सुख सुधि केही ॥

आवत जनकु चले एहि भाँती । सहित समाज प्रेम मति माती ॥

आए निकट देखि अनुरागे । सादर मिलन परसपर लागे ॥

लगे जनक मुनिजन पद बंदन । रिषिन्ह प्रनामु कीन्ह रघुनंदन ॥

भाइन्ह सहित रामु मिलि राजहि । चले लवाइ समेत समाजहि ॥

॥ दोहा ॥

आश्रम सागर सांत रस पूरन पावन पाथु ।

सेन मनहुँ करुना सरित लिएँ जाहिं रघुनाथु ॥275॥

॥ चौपाई ॥

बोरति ग्यान बिराग करारे । बचन ससोक मिलत नद नारे ॥

सोच उसास समीर तंरगा । धीरज तट तरुबर कर भंगा ॥

बिषम बिषाद तोरावति धारा । भय भ्रम भवँर अबर्त अपारा ॥

केवट बुध बिद्या बड़ि नावा । सकहिं न खेइ ऐक नहिं आवा ॥

बनचर कोल किरात बिचारे । थके बिलोकि पथिक हियँ हारे ॥

आश्रम उदधि मिली जब जाई । मनहुँ उठेउ अंबुधि अकुलाई ॥

सोक बिकल दोउ राज समाजा । रहा न ग्यानु न धीरजु लाजा ॥

भूप रूप गुन सील सराही । रोवहिं सोक सिंधु अवगाही ॥

॥ छन्द ॥

अवगाहि सोक समुद्र सोचहिं नारि नर ब्याकुल महा ।

दै दोष सकल सरोष बोलहिं बाम बिधि कीन्हो कहा ॥

सुर सिद्ध तापस जोगिजन मुनि देखि दसा बिदेह की ।

तुलसी न समरथु कोउ जो तरि सकै सरित सनेह की ॥

॥ सोरठा ॥

किए अमित उपदेस जहँ तहँ लोगन्ह मुनिबरन्ह ।

धीरजु धरिअ नरेस कहेउ बसिष्ठ बिदेह सन ॥276॥

॥ दोहा ॥

जासु ग्यानु रबि भव निसि नासा । बचन किरन मुनि कमल बिकासा ॥

तेहि कि मोह ममता निअराई । यह सिय राम सनेह बड़ाई ॥

बिषई साधक सिद्ध सयाने । त्रिबिध जीव जग बेद बखाने ॥

राम सनेह सरस मन जासू । साधु सभाँ बड़ आदर तासू ॥

सोह न राम पेम बिनु ग्यानू । करनधार बिनु जिमि जलजानू ॥

मुनि बहुबिधि बिदेहु समुझाए । रामघाट सब लोग नहाए ॥

सकल सोक संकुल नर नारी । सो बासरु बीतेउ बिनु बारी ॥

पसु खग मृगन्ह न कीन्ह अहारू । प्रिय परिजन कर कौन बिचारू ॥

॥ दोहा ॥

दोउ समाज निमिराजु रघुराजु नहाने प्रात ।

बैठे सब बट बिटप तर मन मलीन कृस गात ॥277॥

॥ चौपाई ॥

जे महिसुर दसरथ पुर बासी । जे मिथिलापति नगर निवासी ॥

हंस बंस गुर जनक पुरोधा । जिन्ह जग मगु परमारथु सोधा ॥

लगे कहन उपदेस अनेका । सहित धरम नय बिरति बिबेका ॥

कौसिक कहि कहि कथा पुरानीं । समुझाई सब सभा सुबानीं ॥

तब रघुनाथ कोसिकहि कहेऊ । नाथ कालि जल बिनु सबु रहेऊ ॥

मुनि कह उचित कहत रघुराई । गयउ बीति दिन पहर अढ़ाई ॥

रिषि रुख लखि कह तेरहुतिराजू । इहाँ उचित नहिं असन अनाजू ॥

कहा भूप भल सबहि सोहाना । पाइ रजायसु चले नहाना ॥

॥ दोहा ॥

तेहि अवसर फल फूल दल मूल अनेक प्रकार ।

लइ आए बनचर बिपुल भरि भरि काँवरि भार ॥278॥

॥ चौपाई ॥

कामद मे गिरि राम प्रसादा । अवलोकत अपहरत बिषादा ॥

सर सरिता बन भूमि बिभागा । जनु उमगत आनँद अनुरागा ॥

बेलि बिटप सब सफल सफूला । बोलत खग मृग अलि अनुकूला ॥

तेहि अवसर बन अधिक उछाहू । त्रिबिध समीर सुखद सब काहू ॥

जाइ न बरनि मनोहरताई । जनु महि करति जनक पहुनाई ॥

तब सब लोग नहाइ नहाई । राम जनक मुनि आयसु पाई ॥

देखि देखि तरुबर अनुरागे । जहँ तहँ पुरजन उतरन लागे ॥

दल फल मूल कंद बिधि नाना । पावन सुंदर सुधा समाना ॥

॥ दोहा ॥

सादर सब कहँ रामगुर पठए भरि भरि भार ।

पूजि पितर सुर अतिथि गुर लगे करन फरहार ॥279॥

॥ चौपाई ॥

एहि बिधि बासर बीते चारी । रामु निरखि नर नारि सुखारी ॥

दुहु समाज असि रुचि मन माहीं । बिनु सिय राम फिरब भल नाहीं ॥

सीता राम संग बनबासू । कोटि अमरपुर सरिस सुपासू ॥

परिहरि लखन रामु बैदेही । जेहि घरु भाव बाम बिधि तेही ॥

दाहिन दइउ होइ जब सबही । राम समीप बसिअ बन तबही ॥

मंदाकिनि मज्जनु तिहु काला । राम दरसु मुद मंगल माला ॥

अटनु राम गिरि बन तापस थल । असनु अमिअ सम कंद मूल फल ॥

सुख समेत संबत दुइ साता । पल सम होहिं न जनिअहिं जाता ॥

॥ दोहा ॥

एहि सुख जोग न लोग सब कहहिं कहाँ अस भागु ॥

सहज सुभायँ समाज दुहु राम चरन अनुरागु ॥280॥

॥ चौपाई ॥

एहि बिधि सकल मनोरथ करहीं । बचन सप्रेम सुनत मन हरहीं ॥

सीय मातु तेहि समय पठाईं । दासीं देखि सुअवसरु आईं ॥

सावकास सुनि सब सिय सासू । आयउ जनकराज रनिवासू ॥

कौसल्याँ सादर सनमानी । आसन दिए समय सम आनी ॥

सीलु सनेह सकल दुहु ओरा । द्रवहिं देखि सुनि कुलिस कठोरा ॥

पुलक सिथिल तन बारि बिलोचन । महि नख लिखन लगीं सब सोचन ॥

सब सिय राम प्रीति कि सि मूरती । जनु करुना बहु बेष बिसूरति ॥

सीय मातु कह बिधि बुधि बाँकी । जो पय फेनु फोर पबि टाँकी ॥

॥ दोहा ॥

सुनिअ सुधा देखिअहिं गरल सब करतूति कराल ।

जहँ तहँ काक उलूक बक मानस सकृत मराल ॥281॥

॥ चौपाई ॥

सुनि ससोच कह देबि सुमित्रा । बिधि गति बड़ि बिपरीत बिचित्रा ॥

जो सृजि पालइ हरइ बहोरी । बाल केलि सम बिधि मति भोरी ॥

कौसल्या कह दोसु न काहू । करम बिबस दुख सुख छति लाहू ॥

कठिन करम गति जान बिधाता । जो सुभ असुभ सकल फल दाता ॥

ईस रजाइ सीस सबही कें । उतपति थिति लय बिषहु अमी कें ॥

देबि मोह बस सोचिअ बादी । बिधि प्रपंचु अस अचल अनादी ॥

भूपति जिअब मरब उर आनी । सोचिअ सखि लखि निज हित हानी ॥

सीय मातु कह सत्य सुबानी । सुकृती अवधि अवधपति रानी ॥

॥ दोहा ॥

लखनु राम सिय जाहुँ बन भल परिनाम न पोचु ।

गहबरि हियँ कह कौसिला मोहि भरत कर सोचु ॥282॥

॥ चौपाई ॥

ईस प्रसाद असीस तुम्हारी । सुत सुतबधू देवसरि बारी ॥

राम सपथ मैं कीन्ह न काऊ । सो करि कहउँ सखी सति भाऊ ॥

भरत सील गुन बिनय बड़ाई । भायप भगति भरोस भलाई ॥

कहत सारदहु कर मति हीचे । सागर सीप कि जाहिं उलीचे ॥

जानउँ सदा भरत कुलदीपा । बार बार मोहि कहेउ महीपा ॥

कसें कनकु मनि पारिखि पाएँ । पुरुष परिखिअहिं समयँ सुभाएँ ।

अनुचित आजु कहब अस मोरा । सोक सनेहँ सयानप थोरा ॥

सुनि सुरसरि सम पावनि बानी । भईं सनेह बिकल सब रानी ॥

॥ दोहा ॥

कौसल्या कह धीर धरि सुनहु देबि मिथिलेसि ।

को बिबेकनिधि बल्लभहि तुम्हहि सकइ उपदेसि ॥283॥

॥ चौपाई ॥

रानि राय सन अवसरु पाई । अपनी भाँति कहब समुझाई ॥

रखिअहिं लखनु भरतु गबनहिं बन । जौं यह मत मानै महीप मन ॥

तौ भल जतनु करब सुबिचारी । मोरें सौचु भरत कर भारी ॥

गूढ़ सनेह भरत मन माही । रहें नीक मोहि लागत नाहीं ॥

लखि सुभाउ सुनि सरल सुबानी । सब भइ मगन करुन रस रानी ॥

नभ प्रसून झरि धन्य धन्य धुनि । सिथिल सनेहँ सिद्ध जोगी मुनि ॥

सबु रनिवासु बिथकि लखि रहेऊ । तब धरि धीर सुमित्राँ कहेऊ ॥

देबि दंड जुग जामिनि बीती । राम मातु सुनी उठी सप्रीती ॥

॥ दोहा ॥

बेगि पाउ धारिअ थलहि कह सनेहँ सतिभाय ।

हमरें तौ अब ईस गति के मिथिलेस सहाय ॥284॥

॥ चौपाई ॥

लखि सनेह सुनि बचन बिनीता । जनकप्रिया गह पाय पुनीता ॥

देबि उचित असि बिनय तुम्हारी । दसरथ घरिनि राम महतारी ॥

प्रभु अपने नीचहु आदरहीं । अगिनि धूम गिरि सिर तिनु धरहीं ॥

सेवकु राउ करम मन बानी । सदा सहाय महेसु भवानी ॥

रउरे अंग जोगु जग को है । दीप सहाय कि दिनकर सोहै ॥

रामु जाइ बनु करि सुर काजू । अचल अवधपुर करिहहिं राजू ॥

अमर नाग नर राम बाहुबल । सुख बसिहहिं अपनें अपने थल ॥

यह सब जागबलिक कहि राखा । देबि न होइ मुधा मुनि भाषा ॥

॥ दोहा ॥

अस कहि पग परि पेम अति सिय हित बिनय सुनाइ ॥

सिय समेत सियमातु तब चली सुआयसु पाइ ॥285॥

॥ चौपाई ॥

प्रिय परिजनहि मिली बैदेही । जो जेहि जोगु भाँति तेहि तेही ॥

तापस बेष जानकी देखी । भा सबु बिकल बिषाद बिसेषी ॥

जनक राम गुर आयसु पाई । चले थलहि सिय देखी आई ॥

लीन्हि लाइ उर जनक जानकी । पाहुन पावन पेम प्रान की ॥

उर उमगेउ अंबुधि अनुरागू । भयउ भूप मनु मनहुँ पयागू ॥

सिय सनेह बटु बाढ़त जोहा । ता पर राम पेम सिसु सोहा ॥

चिरजीवी मुनि ग्यान बिकल जनु । बूड़त लहेउ बाल अवलंबनु ॥

मोह मगन मति नहिं बिदेह की । महिमा सिय रघुबर सनेह की ॥

॥ दोहा ॥

सिय पितु मातु सनेह बस बिकल न सकी सँभारि ।

धरनिसुताँ धीरजु धरेउ समउ सुधरमु बिचारि ॥286॥

॥ चौपाई ॥

तापस बेष जनक सिय देखी । भयउ पेमु परितोषु बिसेषी ॥

पुत्रि पवित्र किए कुल दोऊ । सुजस धवल जगु कह सबु कोऊ ॥

जिति सुरसरि कीरति सरि तोरी । गवनु कीन्ह बिधि अंड करोरी ॥

गंग अवनि थल तीनि बड़ेरे । एहिं किए साधु समाज घनेरे ॥

पितु कह सत्य सनेहँ सुबानी । सीय सकुच महुँ मनहुँ समानी ॥

पुनि पितु मातु लीन्ह उर लाई । सिख आसिष हित दीन्हि सुहाई ॥

कहति न सीय सकुचि मन माहीं । इहाँ बसब रजनीं भल नाहीं ॥

लखि रुख रानि जनायउ राऊ । हृदयँ सराहत सीलु सुभाऊ ॥

॥ दोहा ॥

बार बार मिलि भेंट सिय बिदा कीन्ह सनमानि ।

कही समय सिर भरत गति रानि सुबानि सयानि ॥287॥

॥ चौपाई ॥

सुनि भूपाल भरत ब्यवहारू । सोन सुगंध सुधा ससि सारू ॥

मूदे सजल नयन पुलके तन । सुजसु सराहन लगे मुदित मन ॥

सावधान सुनु सुमुखि सुलोचनि । भरत कथा भव बंध बिमोचनि ॥

धरम राजनय ब्रह्मबिचारू । इहाँ जथामति मोर प्रचारू ॥

सो मति मोरि भरत महिमाही । कहै काह छलि छुअति न छाँही ॥

बिधि गनपति अहिपति सिव सारद । कबि कोबिद बुध बुद्धि बिसारद ॥

भरत चरित कीरति करतूती । धरम सील गुन बिमल बिभूती ॥

समुझत सुनत सुखद सब काहू । सुचि सुरसरि रुचि निदर सुधाहू ॥

॥ दोहा ॥

निरवधि गुन निरुपम पुरुषु भरतु भरत सम जानि ।

कहिअ सुमेरु कि सेर सम कबिकुल मति सकुचानि ॥288॥

॥ चौपाई ॥

अगम सबहि बरनत बरबरनी । जिमि जलहीन मीन गमु धरनी ॥

भरत अमित महिमा सुनु रानी । जानहिं रामु न सकहिं बखानी ॥

बरनि सप्रेम भरत अनुभाऊ । तिय जिय की रुचि लखि कह राऊ ॥

बहुरहिं लखनु भरतु बन जाहीं । सब कर भल सब के मन माहीं ॥

देबि परंतु भरत रघुबर की । प्रीति प्रतीति जाइ नहिं तरकी ॥

भरतु अवधि सनेह ममता की । जद्यपि रामु सीम समता की ॥

परमारथ स्वारथ सुख सारे । भरत न सपनेहुँ मनहुँ निहारे ॥

साधन सिद्ध राम पग नेहू ॥ मोहि लखि परत भरत मत एहू ॥

॥ दोहा ॥

भोरेहुँ भरत न पेलिहहिं मनसहुँ राम रजाइ ।

करिअ न सोचु सनेह बस कहेउ भूप बिलखाइ ॥289॥

॥ चौपाई ॥

राम भरत गुन गनत सप्रीती । निसि दंपतिहि पलक सम बीती ॥

राज समाज प्रात जुग जागे । न्हाइ न्हाइ सुर पूजन लागे ॥

गे नहाइ गुर पहीं रघुराई । बंदि चरन बोले रुख पाई ॥

नाथ भरतु पुरजन महतारी । सोक बिकल बनबास दुखारी ॥

सहित समाज राउ मिथिलेसू । बहुत दिवस भए सहत कलेसू ॥

उचित होइ सोइ कीजिअ नाथा । हित सबही कर रौरें हाथा ॥

अस कहि अति सकुचे रघुराऊ । मुनि पुलके लखि सीलु सुभाऊ ॥

तुम्ह बिनु राम सकल सुख साजा । नरक सरिस दुहु राज समाजा ॥

॥ दोहा ॥

प्रान प्रान के जीव के जिव सुख के सुख राम ।

तुम्ह तजि तात सोहात गृह जिन्हहि तिन्हहिं बिधि बाम ॥290॥

॥ चौपाई ॥

सो सुखु करमु धरमु जरि जाऊ । जहँ न राम पद पंकज भाऊ ॥

जोगु कुजोगु ग्यानु अग्यानू । जहँ नहिं राम पेम परधानू ॥

तुम्ह बिनु दुखी सुखी तुम्ह तेहीं । तुम्ह जानहु जिय जो जेहि केहीं ॥

राउर आयसु सिर सबही कें । बिदित कृपालहि गति सब नीकें ॥

आपु आश्रमहि धारिअ पाऊ । भयउ सनेह सिथिल मुनिराऊ ॥

करि प्रनाम तब रामु सिधाए । रिषि धरि धीर जनक पहिं आए ॥

राम बचन गुरु नृपहि सुनाए । सील सनेह सुभायँ सुहाए ॥

महाराज अब कीजिअ सोई । सब कर धरम सहित हित होई ।

॥ दोहा ॥

ग्यान निधान सुजान सुचि धरम धीर नरपाल ।

तुम्ह बिनु असमंजस समन को समरथ एहि काल ॥291॥

॥ चौपाई ॥

सुनि मुनि बचन जनक अनुरागे । लखि गति ग्यानु बिरागु बिरागे ॥

सिथिल सनेहँ गुनत मन माहीं । आए इहाँ कीन्ह भल नाही ॥

रामहि रायँ कहेउ बन जाना । कीन्ह आपु प्रिय प्रेम प्रवाना ॥

हम अब बन तें बनहि पठाई । प्रमुदित फिरब बिबेक बड़ाई ॥

तापस मुनि महिसुर सुनि देखी । भए प्रेम बस बिकल बिसेषी ॥

समउ समुझि धरि धीरजु राजा । चले भरत पहिं सहित समाजा ॥

भरत आइ आगें भइ लीन्हे । अवसर सरिस सुआसन दीन्हे ॥

तात भरत कह तेरहुति राऊ । तुम्हहि बिदित रघुबीर सुभाऊ ॥

॥ दोहा ॥

राम सत्यब्रत धरम रत सब कर सीलु सनेहु ॥

संकट सहत सकोच बस कहिअ जो आयसु देहु ॥292॥

॥ चौपाई ॥

सुनि तन पुलकि नयन भरि बारी । बोले भरतु धीर धरि भारी ॥

प्रभु प्रिय पूज्य पिता सम आपू । कुलगुरु सम हित माय न बापू ॥

कौसिकादि मुनि सचिव समाजू । ग्यान अंबुनिधि आपुनु आजू ॥

सिसु सेवक आयसु अनुगामी । जानि मोहि सिख देइअ स्वामी ॥

एहिं समाज थल बूझब राउर । मौन मलिन मैं बोलब बाउर ॥

छोटे बदन कहउँ बड़ि बाता । छमब तात लखि बाम बिधाता ॥

आगम निगम प्रसिद्ध पुराना । सेवाधरमु कठिन जगु जाना ॥

स्वामि धरम स्वारथहि बिरोधू । बैरु अंध प्रेमहि न प्रबोधू ॥

॥ दोहा ॥

राखि राम रुख धरमु ब्रतु पराधीन मोहि जानि ।

सब कें संमत सर्ब हित करिअ पेमु पहिचानि ॥293॥

॥ चौपाई ॥

भरत बचन सुनि देखि सुभाऊ । सहित समाज सराहत राऊ ॥

सुगम अगम मृदु मंजु कठोरे । अरथु अमित अति आखर थोरे ॥

ज्यौ मुख मुकुर मुकुरु निज पानी । गहि न जाइ अस अदभुत बानी ॥

भूप भरत मुनि सहित समाजू । गे जहँ बिबुध कुमुद द्विजराजू ॥

सुनि सुधि सोच बिकल सब लोगा । मनहुँ मीनगन नव जल जोगा ॥

देवँ प्रथम कुलगुर गति देखी । निरखि बिदेह सनेह बिसेषी ॥

राम भगतिमय भरतु निहारे । सुर स्वारथी हहरि हियँ हारे ॥

सब कोउ राम पेममय पेखा । भउ अलेख सोच बस लेखा ॥

॥ दोहा ॥

रामु सनेह सकोच बस कह ससोच सुरराज ।

रचहु प्रपंचहि पंच मिलि नाहिं त भयउ अकाजु ॥294॥

॥ चौपाई ॥

सुरन्ह सुमिरि सारदा सराही । देबि देव सरनागत पाही ॥

फेरि भरत मति करि निज माया । पालु बिबुध कुल करि छल छाया ॥

बिबुध बिनय सुनि देबि सयानी । बोली सुर स्वारथ जड़ जानी ॥

मो सन कहहु भरत मति फेरू । लोचन सहस न सूझ सुमेरू ॥

बिधि हरि हर माया बड़ि भारी । सोउ न भरत मति सकइ निहारी ॥

सो मति मोहि कहत करु भोरी । चंदिनि कर कि चंडकर चोरी ॥

भरत हृदयँ सिय राम निवासू । तहँ कि तिमिर जहँ तरनि प्रकासू ॥

अस कहि सारद गइ बिधि लोका । बिबुध बिकल निसि मानहुँ कोका ॥

॥ दोहा ॥

सुर स्वारथी मलीन मन कीन्ह कुमंत्र कुठाटु ॥

रचि प्रपंच माया प्रबल भय भ्रम अरति उचाटु ॥295॥

॥ चौपाई ॥

करि कुचालि सोचत सुरराजू । भरत हाथ सबु काजु अकाजू ॥

गए जनकु रघुनाथ समीपा । सनमाने सब रबिकुल दीपा ॥

समय समाज धरम अबिरोधा । बोले तब रघुबंस पुरोधा ॥

जनक भरत संबादु सुनाई । भरत कहाउति कही सुहाई ॥

तात राम जस आयसु देहू । सो सबु करै मोर मत एहू ॥

सुनि रघुनाथ जोरि जुग पानी । बोले सत्य सरल मृदु बानी ॥

बिद्यमान आपुनि मिथिलेसू । मोर कहब सब भाँति भदेसू ॥

राउर राय रजायसु होई । राउरि सपथ सही सिर सोई ॥

॥ दोहा ॥

राम सपथ सुनि मुनि जनकु सकुचे सभा समेत ।

सकल बिलोकत भरत मुखु बनइ न उतरु देत ॥296॥

॥ चौपाई ॥

सभा सकुच बस भरत निहारी । रामबंधु धरि धीरजु भारी ॥

कुसमउ देखि सनेहु सँभारा । बढ़त बिंधि जिमि घटज निवारा ॥

सोक कनकलोचन मति छोनी । हरी बिमल गुन गन जगजोनी ॥

भरत बिबेक बराहँ बिसाला । अनायास उधरी तेहि काला ॥

करि प्रनामु सब कहँ कर जोरे । रामु राउ गुर साधु निहोरे ॥

छमब आजु अति अनुचित मोरा । कहउँ बदन मृदु बचन कठोरा ॥

हियँ सुमिरी सारदा सुहाई । मानस तें मुख पंकज आई ॥

बिमल बिबेक धरम नय साली । भरत भारती मंजु मराली ॥

॥ दोहा ॥

निरखि बिबेक बिलोचनन्हि सिथिल सनेहँ समाजु ।

करि प्रनामु बोले भरतु सुमिरि सीय रघुराजु ॥297॥

॥ चौपाई ॥

प्रभु पितु मातु सुह्रद गुर स्वामी । पूज्य परम हित अतंरजामी ॥

सरल सुसाहिबु सील निधानू । प्रनतपाल सर्बग्य सुजानू ॥

समरथ सरनागत हितकारी । गुनगाहकु अवगुन अघ हारी ॥

स्वामि गोसाँइहि सरिस गोसाई । मोहि समान मैं साइँ दोहाई ॥

प्रभु पितु बचन मोह बस पेली । आयउँ इहाँ समाजु सकेली ॥

जग भल पोच ऊँच अरु नीचू । अमिअ अमरपद माहुरु मीचू ॥

राम रजाइ मेट मन माहीं । देखा सुना कतहुँ कोउ नाहीं ॥

सो मैं सब बिधि कीन्हि ढिठाई । प्रभु मानी सनेह सेवकाई ॥

॥ दोहा ॥

कृपाँ भलाई आपनी नाथ कीन्ह भल मोर ।

दूषन भे भूषन सरिस सुजसु चारु चहु ओर ॥298॥

॥ चौपाई ॥

राउरि रीति सुबानि बड़ाई । जगत बिदित निगमागम गाई ॥

कूर कुटिल खल कुमति कलंकी । नीच निसील निरीस निसंकी ॥

तेउ सुनि सरन सामुहें आए । सकृत प्रनामु किहें अपनाए ॥

देखि दोष कबहुँ न उर आने । सुनि गुन साधु समाज बखाने ॥

को साहिब सेवकहि नेवाजी । आपु समाज साज सब साजी ॥

निज करतूति न समुझिअ सपनें । सेवक सकुच सोचु उर अपनें ॥

सो गोसाइँ नहि दूसर कोपी । भुजा उठाइ कहउँ पन रोपी ॥

पसु नाचत सुक पाठ प्रबीना । गुन गति नट पाठक आधीना ॥

॥ दोहा ॥

यों सुधारि सनमानि जन किए साधु सिरमोर ।

को कृपाल बिनु पालिहै बिरिदावलि बरजोर ॥299॥

॥ चौपाई ॥

सोक सनेहँ कि बाल सुभाएँ । आयउँ लाइ रजायसु बाएँ ॥

तबहुँ कृपाल हेरि निज ओरा । सबहि भाँति भल मानेउ मोरा ॥

देखेउँ पाय सुमंगल मूला । जानेउँ स्वामि सहज अनुकूला ॥

बड़ें समाज बिलोकेउँ भागू । बड़ीं चूक साहिब अनुरागू ॥

कृपा अनुग्रह अंगु अघाई । कीन्हि कृपानिधि सब अधिकाई ॥

राखा मोर दुलार गोसाईं । अपनें सील सुभायँ भलाईं ॥

नाथ निपट मैं कीन्हि ढिठाई । स्वामि समाज सकोच बिहाई ॥

अबिनय बिनय जथारुचि बानी । छमिहि देउ अति आरति जानी ॥

॥ दोहा ॥

सुह्रद सुजान सुसाहिबहि बहुत कहब बड़ि खोरि ।

आयसु देइअ देव अब सबइ सुधारी मोरि ॥300॥

॥ चौपाई ॥

प्रभु पद पदुम पराग दोहाई । सत्य सुकृत सुख सीवँ सुहाई ॥

सो करि कहउँ हिए अपने की । रुचि जागत सोवत सपने की ॥

सहज सनेहँ स्वामि सेवकाई । स्वारथ छल फल चारि बिहाई ॥

अग्या सम न सुसाहिब सेवा । सो प्रसादु जन पावै देवा ॥

अस कहि प्रेम बिबस भए भारी । पुलक सरीर बिलोचन बारी ॥

प्रभु पद कमल गहे अकुलाई । समउ सनेहु न सो कहि जाई ॥

कृपासिंधु सनमानि सुबानी । बैठाए समीप गहि पानी ॥

भरत बिनय सुनि देखि सुभाऊ । सिथिल सनेहँ सभा रघुराऊ ॥

॥ छन्द ॥

रघुराउ सिथिल सनेहँ साधु समाज मुनि मिथिला धनी ।

मन महुँ सराहत भरत भायप भगति की महिमा घनी ॥

भरतहि प्रसंसत बिबुध बरषत सुमन मानस मलिन से ।

तुलसी बिकल सब लोग सुनि सकुचे निसागम नलिन से ॥

॥ सोरठा ॥

देखि दुखारी दीन दुहु समाज नर नारि सब ।

मघवा महा मलीन मुए मारि मंगल चहत ॥301॥

॥ चौपाई ॥

कपट कुचालि सीवँ सुरराजू । पर अकाज प्रिय आपन काजू ॥

काक समान पाकरिपु रीती । छली मलीन कतहुँ न प्रतीती ॥

प्रथम कुमत करि कपटु सँकेला । सो उचाटु सब कें सिर मेला ॥

सुरमायाँ सब लोग बिमोहे । राम प्रेम अतिसय न बिछोहे ॥

भय उचाट बस मन थिर नाहीं । छन बन रुचि छन सदन सोहाहीं ॥

दुबिध मनोगति प्रजा दुखारी । सरित सिंधु संगम जनु बारी ॥

दुचित कतहुँ परितोषु न लहहीं । एक एक सन मरमु न कहहीं ॥

लखि हियँ हँसि कह कृपानिधानू । सरिस स्वान मघवान जुबानू ॥

॥ दोहा ॥

भरतु जनकु मुनिजन सचिव साधु सचेत बिहाइ ।

लागि देवमाया सबहि जथाजोगु जनु पाइ ॥302॥

॥ चौपाई ॥

कृपासिंधु लखि लोग दुखारे । निज सनेहँ सुरपति छल भारे ॥

सभा राउ गुर महिसुर मंत्री । भरत भगति सब कै मति जंत्री ॥

रामहि चितवत चित्र लिखे से । सकुचत बोलत बचन सिखे से ॥

भरत प्रीति नति बिनय बड़ाई । सुनत सुखद बरनत कठिनाई ॥

जासु बिलोकि भगति लवलेसू । प्रेम मगन मुनिगन मिथिलेसू ॥

महिमा तासु कहै किमि तुलसी । भगति सुभायँ सुमति हियँ हुलसी ॥

आपु छोटि महिमा बड़ि जानी । कबिकुल कानि मानि सकुचानी ॥

कहि न सकति गुन रुचि अधिकाई । मति गति बाल बचन की नाई ॥

॥ दोहा ॥

भरत बिमल जसु बिमल बिधु सुमति चकोरकुमारि ।

उदित बिमल जन हृदय नभ एकटक रही निहारि ॥303॥

॥ चौपाई ॥

भरत सुभाउ न सुगम निगमहूँ । लघु मति चापलता कबि छमहूँ ॥

कहत सुनत सति भाउ भरत को । सीय राम पद होइ न रत को ॥

सुमिरत भरतहि प्रेमु राम को । जेहि न सुलभ तेहि सरिस बाम को ॥

देखि दयाल दसा सबही की । राम सुजान जानि जन जी की ॥

धरम धुरीन धीर नय नागर । सत्य सनेह सील सुख सागर ॥

देसु काल लखि समउ समाजू । नीति प्रीति पालक रघुराजू ॥

बोले बचन बानि सरबसु से । हित परिनाम सुनत ससि रसु से ॥

तात भरत तुम्ह धरम धुरीना । लोक बेद बिद प्रेम प्रबीना ॥

॥ दोहा ॥

करम बचन मानस बिमल तुम्ह समान तुम्ह तात ।

गुर समाज लघु बंधु गुन कुसमयँ किमि कहि जात ॥304॥

॥ चौपाई ॥

जानहु तात तरनि कुल रीती । सत्यसंध पितु कीरति प्रीती ॥

समउ समाजु लाज गुरुजन की । उदासीन हित अनहित मन की ॥

तुम्हहि बिदित सबही कर करमू । आपन मोर परम हित धरमू ॥

मोहि सब भाँति भरोस तुम्हारा । तदपि कहउँ अवसर अनुसारा ॥

तात तात बिनु बात हमारी । केवल गुरुकुल कृपाँ सँभारी ॥

नतरु प्रजा परिजन परिवारू । हमहि सहित सबु होत खुआरू ॥

जौं बिनु अवसर अथवँ दिनेसू । जग केहि कहहु न होइ कलेसू ॥

तस उतपातु तात बिधि कीन्हा । मुनि मिथिलेस राखि सबु लीन्हा ॥

॥ दोहा ॥

राज काज सब लाज पति धरम धरनि धन धाम ।

गुर प्रभाउ पालिहि सबहि भल होइहि परिनाम ॥305॥

॥ चौपाई ॥

सहित समाज तुम्हार हमारा । घर बन गुर प्रसाद रखवारा ॥

मातु पिता गुर स्वामि निदेसू । सकल धरम धरनीधर सेसू ॥

सो तुम्ह करहु करावहु मोहू । तात तरनिकुल पालक होहू ॥

साधक एक सकल सिधि देनी । कीरति सुगति भूतिमय बेनी ॥

सो बिचारि सहि संकटु भारी । करहु प्रजा परिवारु सुखारी ॥

बाँटी बिपति सबहिं मोहि भाई । तुम्हहि अवधि भरि बड़ि कठिनाई ॥

जानि तुम्हहि मृदु कहउँ कठोरा । कुसमयँ तात न अनुचित मोरा ॥

होहिं कुठायँ सुबंधु सुहाए । ओड़िअहिं हाथ असनिहु के घाए ॥

॥ दोहा ॥

सेवक कर पद नयन से मुख सो साहिबु होइ ।

तुलसी प्रीति कि रीति सुनि सुकबि सराहहिं सोइ ॥306॥

॥ चौपाई ॥

सभा सकल सुनि रघुबर बानी । प्रेम पयोधि अमिअ जनु सानी ॥

सिथिल समाज सनेह समाधी । देखि दसा चुप सारद साधी ॥

भरतहि भयउ परम संतोषू । सनमुख स्वामि बिमुख दुख दोषू ॥

मुख प्रसन्न मन मिटा बिषादू । भा जनु गूँगेहि गिरा प्रसादू ॥

कीन्ह सप्रेम प्रनामु बहोरी । बोले पानि पंकरुह जोरी ॥

भयउ सुखु साथ गए को । लहेउँ लाहु जग जनमु भए को ॥

अब कृपाल जस आयसु होई । करौं सीस धरि सादर सोई ॥

सो अवलंब देव मोहि देई । अवधि पारु पावौं जेहि सेई ॥

॥ दोहा ॥

देव देव अभिषेक हित गुर अनुसासनु पाइ ।

आनेउँ सब तीरथ सलिलु तेहि कहँ काह रजाइ ॥307॥

॥ चौपाई ॥

एकु मनोरथु बड़ मन माहीं । सभयँ सकोच जात कहि नाहीं ॥

कहहु तात प्रभु आयसु पाई । बोले बानि सनेह सुहाई ॥

चित्रकूट सुचि थल तीरथ बन । खग मृग सर सरि निर्झर गिरिगन ॥

प्रभु पद अंकित अवनि बिसेषी । आयसु होइ त आवौं देखी ॥

अवसि अत्रि आयसु सिर धरहू । तात बिगतभय कानन चरहू ॥

मुनि प्रसाद बनु मंगल दाता । पावन परम सुहावन भ्राता ॥

रिषिनायकु जहँ आयसु देहीं । राखेहु तीरथ जलु थल तेहीं ॥

सुनि प्रभु बचन भरत सुख पावा । मुनि पद कमल मुदित सिरु नावा ॥

॥ दोहा ॥

भरत राम संबादु सुनि सकल सुमंगल मूल ।

सुर स्वारथी सराहि कुल बरषत सुरतरु फूल ॥308॥

॥ चौपाई ॥

धन्य भरत जय राम गोसाईं । कहत देव हरषत बरिआई ।

मुनि मिथिलेस सभाँ सब काहू । भरत बचन सुनि भयउ उछाहू ॥

भरत राम गुन ग्राम सनेहू । पुलकि प्रसंसत राउ बिदेहू ॥

सेवक स्वामि सुभाउ सुहावन । नेमु पेमु अति पावन पावन ॥

मति अनुसार सराहन लागे । सचिव सभासद सब अनुरागे ॥

सुनि सुनि राम भरत संबादू । दुहु समाज हियँ हरषु बिषादू ॥

राम मातु दुखु सुखु सम जानी । कहि गुन राम प्रबोधीं रानी ॥

एक कहहिं रघुबीर बड़ाई । एक सराहत भरत भलाई ॥

॥ दोहा ॥

अत्रि कहेउ तब भरत सन सैल समीप सुकूप ।

राखिअ तीरथ तोय तहँ पावन अमिअ अनूप ॥309॥

॥ चौपाई ॥

भरत अत्रि अनुसासन पाई । जल भाजन सब दिए चलाई ॥

सानुज आपु अत्रि मुनि साधू । सहित गए जहँ कूप अगाधू ॥

पावन पाथ पुन्यथल राखा । प्रमुदित प्रेम अत्रि अस भाषा ॥

तात अनादि सिद्ध थल एहू । लोपेउ काल बिदित नहिं केहू ॥

तब सेवकन्ह सरस थलु देखा । किन्ह सुजल हित कूप बिसेषा ॥

बिधि बस भयउ बिस्व उपकारू । सुगम अगम अति धरम बिचारू ॥

भरतकूप अब कहिहहिं लोगा । अति पावन तीरथ जल जोगा ॥

प्रेम सनेम निमज्जत प्रानी । होइहहिं बिमल करम मन बानी ॥

॥ दोहा ॥

कहत कूप महिमा सकल गए जहाँ रघुराउ ।

अत्रि सुनायउ रघुबरहि तीरथ पुन्य प्रभाउ ॥310॥

॥ चौपाई ॥

कहत धरम इतिहास सप्रीती । भयउ भोरु निसि सो सुख बीती ॥

नित्य निबाहि भरत दोउ भाई । राम अत्रि गुर आयसु पाई ॥

सहित समाज साज सब सादें । चले राम बन अटन पयादें ॥

कोमल चरन चलत बिनु पनहीं । भइ मृदु भूमि सकुचि मन मनहीं ॥

कुस कंटक काँकरीं कुराईं । कटुक कठोर कुबस्तु दुराईं ॥

महि मंजुल मृदु मारग कीन्हे । बहत समीर त्रिबिध सुख लीन्हे ॥

सुमन बरषि सुर घन करि छाहीं । बिटप फूलि फलि तृन मृदुताहीं ॥

मृग बिलोकि खग बोलि सुबानी । सेवहिं सकल राम प्रिय जानी ॥

॥ दोहा ॥

सुलभ सिद्धि सब प्राकृतहु राम कहत जमुहात ।

राम प्रान प्रिय भरत कहुँ यह न होइ बड़ि बात ॥311॥

॥ चौपाई ॥

एहि बिधि भरतु फिरत बन माहीं । नेमु प्रेमु लखि मुनि सकुचाहीं ॥

पुन्य जलाश्रय भूमि बिभागा । खग मृग तरु तृन गिरि बन बागा ॥

चारु बिचित्र पबित्र बिसेषी । बूझत भरतु दिब्य सब देखी ॥

सुनि मन मुदित कहत रिषिराऊ । हेतु नाम गुन पुन्य प्रभाऊ ॥

कतहुँ निमज्जन कतहुँ प्रनामा । कतहुँ बिलोकत मन अभिरामा ॥

कतहुँ बैठि मुनि आयसु पाई । सुमिरत सीय सहित दोउ भाई ॥

देखि सुभाउ सनेहु सुसेवा । देहिं असीस मुदित बनदेवा ॥

फिरहिं गएँ दिनु पहर अढ़ाई । प्रभु पद कमल बिलोकहिं आई ॥

॥ दोहा ॥

देखे थल तीरथ सकल भरत पाँच दिन माझ ।

कहत सुनत हरि हर सुजसु गयउ दिवसु भइ साँझ ॥312 ॥

॥ चौपाई ॥

भोर न्हाइ सबु जुरा समाजू । भरत भूमिसुर तेरहुति राजू ॥

भल दिन आजु जानि मन माहीं । रामु कृपाल कहत सकुचाहीं ॥

गुर नृप भरत सभा अवलोकी । सकुचि राम फिरि अवनि बिलोकी ॥

सील सराहि सभा सब सोची । कहुँ न राम सम स्वामि सँकोची ॥

भरत सुजान राम रुख देखी । उठि सप्रेम धरि धीर बिसेषी ॥

करि दंडवत कहत कर जोरी । राखीं नाथ सकल रुचि मोरी ॥

मोहि लगि सहेउ सबहिं संतापू । बहुत भाँति दुखु पावा आपू ॥

अब गोसाइँ मोहि देउ रजाई । सेवौं अवध अवधि भरि जाई ॥

॥ दोहा ॥

जेहिं उपाय पुनि पाय जनु देखै दीनदयाल ।

सो सिख देइअ अवधि लगि कोसलपाल कृपाल ॥313॥

॥ चौपाई ॥

पुरजन परिजन प्रजा गोसाई । सब सुचि सरस सनेहँ सगाई ॥

राउर बदि भल भव दुख दाहू । प्रभु बिनु बादि परम पद लाहू ॥

स्वामि सुजानु जानि सब ही की । रुचि लालसा रहनि जन जी की ॥

प्रनतपालु पालिहि सब काहू । देउ दुहू दिसि ओर निबाहू ॥

अस मोहि सब बिधि भूरि भरोसो । किएँ बिचारु न सोचु खरो सो ॥

आरति मोर नाथ कर छोहू । दुहुँ मिलि कीन्ह ढीठु हठि मोहू ॥

यह बड़ दोषु दूरि करि स्वामी । तजि सकोच सिखइअ अनुगामी ॥

भरत बिनय सुनि सबहिं प्रसंसी । खीर नीर बिबरन गति हंसी ॥

॥ दोहा ॥

दीनबंधु सुनि बंधु के बचन दीन छलहीन ।

देस काल अवसर सरिस बोले रामु प्रबीन ॥314॥

॥ चौपाई ॥

तात तुम्हारि मोरि परिजन की । चिंता गुरहि नृपहि घर बन की ॥

माथे पर गुर मुनि मिथिलेसू । हमहि तुम्हहि सपनेहुँ न कलेसू ॥

मोर तुम्हार परम पुरुषारथु । स्वारथु सुजसु धरमु परमारथु ॥

पितु आयसु पालिहिं दुहु भाई । लोक बेद भल भूप भलाई ॥

गुर पितु मातु स्वामि सिख पालें । चलेहुँ कुमग पग परहिं न खालें ॥

अस बिचारि सब सोच बिहाई । पालहु अवध अवधि भरि जाई ॥

देसु कोसु परिजन परिवारू । गुर पद रजहिं लाग छरुभारू ॥

तुम्ह मुनि मातु सचिव सिख मानी । पालेहु पुहुमि प्रजा रजधानी ॥

॥ दोहा ॥

मुखिआ मुखु सो चाहिऐ खान पान कहुँ एक ।

पालइ पोषइ सकल अँग तुलसी सहित बिबेक ॥315 ॥

॥ चौपाई ॥

राजधरम सरबसु एतनोई । जिमि मन माहँ मनोरथ गोई ॥

बंधु प्रबोधु कीन्ह बहु भाँती । बिनु अधार मन तोषु न साँती ॥

भरत सील गुर सचिव समाजू । सकुच सनेह बिबस रघुराजू ॥

प्रभु करि कृपा पाँवरीं दीन्हीं । सादर भरत सीस धरि लीन्हीं ॥

चरनपीठ करुनानिधान के । जनु जुग जामिक प्रजा प्रान के ॥

संपुट भरत सनेह रतन के । आखर जुग जुन जीव जतन के ॥

कुल कपाट कर कुसल करम के । बिमल नयन सेवा सुधरम के ॥

भरत मुदित अवलंब लहे तें । अस सुख जस सिय रामु रहे तें ॥

॥ दोहा ॥

मागेउ बिदा प्रनामु करि राम लिए उर लाइ ।

लोग उचाटे अमरपति कुटिल कुअवसरु पाइ ॥316॥

॥ चौपाई ॥

सो कुचालि सब कहँ भइ नीकी । अवधि आस सम जीवनि जी की ॥

नतरु लखन सिय सम बियोगा । हहरि मरत सब लोग कुरोगा ॥

रामकृपाँ अवरेब सुधारी । बिबुध धारि भइ गुनद गोहारी ॥

भेंटत भुज भरि भाइ भरत सो । राम प्रेम रसु कहि न परत सो ॥

तन मन बचन उमग अनुरागा । धीर धुरंधर धीरजु त्यागा ॥

बारिज लोचन मोचत बारी । देखि दसा सुर सभा दुखारी ॥

मुनिगन गुर धुर धीर जनक से । ग्यान अनल मन कसें कनक से ॥

जे बिरंचि निरलेप उपाए । पदुम पत्र जिमि जग जल जाए ॥

॥ दोहा ॥

तेउ बिलोकि रघुबर भरत प्रीति अनूप अपार ।

भए मगन मन तन बचन सहित बिराग बिचार ॥317॥

॥ चौपाई ॥

जहाँ जनक गुर मति भोरी । प्राकृत प्रीति कहत बड़ि खोरी ॥

बरनत रघुबर भरत बियोगू । सुनि कठोर कबि जानिहि लोगू ॥

सो सकोच रसु अकथ सुबानी । समउ सनेहु सुमिरि सकुचानी ॥

भेंटि भरत रघुबर समुझाए । पुनि रिपुदवनु हरषि हियँ लाए ॥

सेवक सचिव भरत रुख पाई । निज निज काज लगे सब जाई ॥

सुनि दारुन दुखु दुहूँ समाजा । लगे चलन के साजन साजा ॥

प्रभु पद पदुम बंदि दोउ भाई । चले सीस धरि राम रजाई ॥

मुनि तापस बनदेव निहोरी । सब सनमानि बहोरि बहोरी ॥

॥ दोहा ॥

लखनहि भेंटि प्रनामु करि सिर धरि सिय पद धूरि ।

चले सप्रेम असीस सुनि सकल सुमंगल मूरि ॥318 ॥

॥ चौपाई ॥

सानुज राम नृपहि सिर नाई । कीन्हि बहुत बिधि बिनय बड़ाई ॥

देव दया बस बड़ दुखु पायउ । सहित समाज काननहिं आयउ ॥

पुर पगु धारिअ देइ असीसा । कीन्ह धीर धरि गवनु महीसा ॥

मुनि महिदेव साधु सनमाने । बिदा किए हरि हर सम जाने ॥

सासु समीप गए दोउ भाई । फिरे बंदि पग आसिष पाई ॥

कौसिक बामदेव जाबाली । पुरजन परिजन सचिव सुचाली ॥

जथा जोगु करि बिनय प्रनामा । बिदा किए सब सानुज रामा ॥

नारि पुरुष लघु मध्य बड़ेरे । सब सनमानि कृपानिधि फेरे ॥

॥ दोहा ॥

भरत मातु पद बंदि प्रभु सुचि सनेहँ मिलि भेंटि ।

बिदा कीन्ह सजि पालकी सकुच सोच सब मेटि ॥319॥

॥ चौपाई ॥

परिजन मातु पितहि मिलि सीता । फिरी प्रानप्रिय प्रेम पुनीता ॥

करि प्रनामु भेंटी सब सासू । प्रीति कहत कबि हियँ न हुलासू ॥

सुनि सिख अभिमत आसिष पाई । रही सीय दुहु प्रीति समाई ॥

रघुपति पटु पालकीं मगाईं । करि प्रबोधु सब मातु चढ़ाई ॥

बार बार हिलि मिलि दुहु भाई । सम सनेहँ जननी पहुँचाई ॥

साजि बाजि गज बाहन नाना । भरत भूप दल कीन्ह पयाना ॥

हृदयँ रामु सिय लखन समेता । चले जाहिं सब लोग अचेता ॥

बसह बाजि गज पसु हियँ हारें । चले जाहिं परबस मन मारें ॥

॥ दोहा ॥

गुर गुरतिय पद बंदि प्रभु सीता लखन समेत ।

फिरे हरष बिसमय सहित आए परन निकेत ॥320॥

॥ चौपाई ॥

बिदा कीन्ह सनमानि निषादू । चलेउ हृदयँ बड़ बिरह बिषादू ॥

कोल किरात भिल्ल बनचारी । फेरे फिरे जोहारि जोहारी ॥

प्रभु सिय लखन बैठि बट छाहीं । प्रिय परिजन बियोग बिलखाहीं ॥

भरत सनेह सुभाउ सुबानी । प्रिया अनुज सन कहत बखानी ॥

प्रीति प्रतीति बचन मन करनी । श्रीमुख राम प्रेम बस बरनी ॥

तेहि अवसर खग मृग जल मीना । चित्रकूट चर अचर मलीना ॥

बिबुध बिलोकि दसा रघुबर की । बरषि सुमन कहि गति घर घर की ॥

प्रभु प्रनामु करि दीन्ह भरोसो । चले मुदित मन डर न खरो सो ॥

॥ दोहा ॥

सानुज सीय समेत प्रभु राजत परन कुटीर ।

भगति ग्यानु बैराग्य जनु सोहत धरें सरीर ॥321॥

॥ चौपाई ॥

मुनि महिसुर गुर भरत भुआलू । राम बिरहँ सबु साजु बिहालू ॥

प्रभु गुन ग्राम गनत मन माहीं । सब चुपचाप चले मग जाहीं ॥

जमुना उतरि पार सबु भयऊ । सो बासरु बिनु भोजन गयऊ ॥

उतरि देवसरि दूसर बासू । रामसखाँ सब कीन्ह सुपासू ॥

सई उतरि गोमतीं नहाए । चौथें दिवस अवधपुर आए ।

जनकु रहे पुर बासर चारी । राज काज सब साज सँभारी ॥

सौंपि सचिव गुर भरतहि राजू । तेरहुति चले साजि सबु साजू ॥

नगर नारि नर गुर सिख मानी । बसे सुखेन राम रजधानी ॥

॥ दोहा ॥

राम दरस लगि लोग सब करत नेम उपबास ।

तजि तजि भूषन भोग सुख जिअत अवधि कीं आस ॥322 ॥

॥ चौपाई ॥

सचिव सुसेवक भरत प्रबोधे । निज निज काज पाइ पाइ सिख ओधे ॥

पुनि सिख दीन्ह बोलि लघु भाई । सौंपी सकल मातु सेवकाई ॥

भूसुर बोलि भरत कर जोरे । करि प्रनाम बय बिनय निहोरे ॥

ऊँच नीच कारजु भल पोचू । आयसु देब न करब सँकोचू ॥

परिजन पुरजन प्रजा बोलाए । समाधानु करि सुबस बसाए ॥

सानुज गे गुर गेहँ बहोरी । करि दंडवत कहत कर जोरी ॥

आयसु होइ त रहौं सनेमा । बोले मुनि तन पुलकि सपेमा ॥

समुझव कहब करब तुम्ह जोई । धरम सारु जग होइहि सोई ॥

॥ दोहा ॥

सुनि सिख पाइ असीस बड़ि गनक बोलि दिनु साधि ।

सिंघासन प्रभु पादुका बैठारे निरुपाधि ॥323॥

॥ चौपाई ॥

राम मातु गुर पद सिरु नाई । प्रभु पद पीठ रजायसु पाई ॥

नंदिगावँ करि परन कुटीरा । कीन्ह निवासु धरम धुर धीरा ॥

जटाजूट सिर मुनिपट धारी । महि खनि कुस साँथरी सँवारी ॥

असन बसन बासन ब्रत नेमा । करत कठिन रिषिधरम सप्रेमा ॥

भूषन बसन भोग सुख भूरी । मन तन बचन तजे तिन तूरी ॥

अवध राजु सुर राजु सिहाई । दसरथ धनु सुनि धनदु लजाई ॥

तेहिं पुर बसत भरत बिनु रागा । चंचरीक जिमि चंपक बागा ॥

रमा बिलासु राम अनुरागी । तजत बमन जिमि जन बड़भागी ॥

॥ दोहा ॥

राम पेम भाजन भरतु बड़े न एहिं करतूति ।

चातक हंस सराहिअत टेंक बिबेक बिभूति ॥324॥

॥ चौपाई ॥

देह दिनहुँ दिन दूबरि होई । घटइ तेजु बलु मुखछबि सोई ॥

नित नव राम प्रेम पनु पीना । बढ़त धरम दलु मनु न मलीना ॥

जिमि जलु निघटत सरद प्रकासे । बिलसत बेतस बनज बिकासे ॥

सम दम संजम नियम उपासा । नखत भरत हिय बिमल अकासा ॥

ध्रुव बिस्वास अवधि राका सी । स्वामि सुरति सुरबीथि बिकासी ॥

राम पेम बिधु अचल अदोषा । सहित समाज सोह नित चोखा ॥

भरत रहनि समुझनि करतूती । भगति बिरति गुन बिमल बिभूती ॥

बरनत सकल सुकचि सकुचाहीं । सेस गनेस गिरा गमु नाहीं ॥

॥ दोहा ॥

नित पूजत प्रभु पाँवरी प्रीति न हृदयँ समाति ॥

मागि मागि आयसु करत राज काज बहु भाँति ॥325॥

॥ चौपाई ॥

पुलक गात हियँ सिय रघुबीरू । जीह नामु जप लोचन नीरू ॥

लखन राम सिय कानन बसहीं । भरतु भवन बसि तप तनु कसहीं ॥

दोउ दिसि समुझि कहत सबु लोगू । सब बिधि भरत सराहन जोगू ॥

सुनि ब्रत नेम साधु सकुचाहीं । देखि दसा मुनिराज लजाहीं ॥

परम पुनीत भरत आचरनू । मधुर मंजु मुद मंगल करनू ॥

हरन कठिन कलि कलुष कलेसू । महामोह निसि दलन दिनेसू ॥

पाप पुंज कुंजर मृगराजू । समन सकल संताप समाजू ।

जन रंजन भंजन भव भारू । राम सनेह सुधाकर सारू ॥

॥ छन्द ॥

सिय राम प्रेम पियूष पूरन होत जनमु न भरत को ।

मुनि मन अगम जम नियम सम दम बिषम ब्रत आचरत को ॥

दुख दाह दारिद दंभ दूषन सुजस मिस अपहरत को ।

कलिकाल तुलसी से सठन्हि हठि राम सनमुख करत को ॥

॥ सोरठा ॥

भरत चरित करि नेमु तुलसी जो सादर सुनहिं ।

सीय राम पद पेमु अवसि होइ भव रस बिरति ॥326॥

मासपारायण, इक्कीसवाँ विश्राम

इति श्रीमद्रामचरितमानसे सकलकलिकलुषविध्वंसने

द्वितीयः सोपानः समाप्तः ।
(अयोध्याकाण्ड समाप्त)

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