आंध्र प्रदेश के नन्दयाल ज़िले में नल्लामला पर्वतमाला के शांत वनाच्छादित अंचल में स्थित श्रीशैलम सनातन धर्म के परम पावन तीर्थों में से एक है। कृष्णा नदी के निकट स्थित यह प्राचीन क्षेत्र श्रीपर्वत तथा दक्षिण का कैलाश जैसे नामों से भी प्रसिद्ध है। यहाँ भगवान शिव और आदिशक्ति की संयुक्त उपासना की अत्यंत प्राचीन परंपरा विद्यमान है।
परिचय
श्रीशैल क्षेत्र की सबसे बड़ी विशेषता यह है कि यहाँ भगवान श्री मल्लिकार्जुन स्वामी द्वादश ज्योतिर्लिंगों में से एक के रूप में तथा माँ भ्रमराम्बा अष्टादश महाशक्तिपीठ परंपरा की प्रमुख देवी के रूप में एक ही पवित्र मंदिर-क्षेत्र में पूजित हैं।
इसी कारण श्रीशैलम शैव और शाक्त—दोनों उपासना परंपराओं के लिए अत्यंत महत्त्वपूर्ण तीर्थ है। श्रीशैल देवस्थानम भी इस धाम को श्री भ्रमराम्बा समेत मल्लिकार्जुन स्वामी के पावन निवास के रूप में प्रस्तुत करता है।
शक्तिपीठ बनने की कथा
पौराणिक आख्यानों के अनुसार, जब प्रजापति दक्ष के यज्ञ में माता सती ने भगवान शिव के अपमान से व्यथित होकर अपने प्राणों का त्याग कर दिया, तब शोकाकुल भगवान शिव उनके पार्थिव शरीर को लेकर ब्रह्मांड में विचरण करने लगे।
सृष्टि का संतुलन बनाए रखने के लिए भगवान श्रीविष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से माता सती के शरीर को विभक्त किया। जिन-जिन पवित्र स्थानों पर देवी के अंग अथवा आभूषण गिरे, वे आगे चलकर शक्तिपीठ कहलाए।
सती का अंग/आभूषण
श्रीशैल शक्तिपीठ के संबंध में अलग-अलग शक्तिपीठ सूचियों में मतांतर मिलता है। एक प्रमुख परंपरा के अनुसार यहाँ माता सती की ग्रीवा अर्थात् गर्दन का निपात माना जाता है।
श्रीशैले च मम ग्रीवा महालक्ष्मीस्तु देवता।
भैरवः सम्बरानन्दो देशे देशे व्यवस्थितः॥
वहीं कुछ 51 शक्तिपीठ परंपराओं में श्रीपर्वत को माता सती के नूपुर अथवा चरणाभूषण से भी जोड़ा गया है। इसलिए ग्रीवा और नूपुर—दोनों वर्णन विभिन्न शक्तिपीठ सूचियों की अलग-अलग परंपराओं के संदर्भ में समझे जाने चाहिए।
देवी का नाम
श्रीशैलम में आदिशक्ति माँ भ्रमराम्बा अथवा भ्रमराम्बिका के नाम से पूजित हैं। वे भगवान मल्लिकार्जुन स्वामी के साथ इस पवित्र क्षेत्र की अधिष्ठात्री देवी हैं।
अलम्पुरे जोगुलाम्बा श्रीशैले भ्रमराम्बिका।
कोल्हापुरे महालक्ष्मी माहुर्ये एकवीरिका॥
अष्टादश महाशक्तिपीठ परंपरा में इस श्लोक के माध्यम से श्रीशैल की देवी को भ्रमराम्बिका के रूप में स्मरण किया जाता है।
माँ भ्रमराम्बा नाम की कथा
‘भ्रमराम्बा’ नाम का संबंध भ्रामरी देवी के स्वरूप से जोड़ा जाता है। ‘भ्रमर’ का अर्थ मधुमक्खी अथवा भौंरा है। पौराणिक परंपरा के अनुसार अरुणासुर नामक असुर ने कठोर तपस्या से ऐसा वर प्राप्त किया कि दो अथवा चार पैरों वाला कोई प्राणी उसका वध न कर सके।
वरदान के कारण अत्यंत शक्तिशाली होकर उसने देवताओं और ऋषियों को पीड़ित करना आरंभ कर दिया। देवताओं ने आदिशक्ति की शरण ली और उनसे रक्षा की प्रार्थना की।
तब भगवती ने भ्रामरी स्वरूप धारण किया और असंख्य छह पैरों वाले भ्रमरों को प्रकट किया। उन दिव्य भ्रमरों ने अरुणासुर और उसकी सेना का संहार कर दिया। इसी भ्रामरी स्वरूप की परंपरा श्रीशैल की माँ भ्रमराम्बा से जोड़ी जाती है।
इस कथा का आध्यात्मिक भाव यह है कि भगवती के लिए धर्म की रक्षा हेतु किसी निश्चित रूप में प्रकट होना आवश्यक नहीं है; उनकी शक्ति सूक्ष्म से सूक्ष्म स्वरूप के माध्यम से भी अधर्म का विनाश कर सकती है।
भैरव
कुछ तांत्रिक शक्तिपीठ परंपराओं में श्रीशैल के भैरव का नाम सम्बरानन्द अथवा पाठभेद से सुन्दरानन्द मिलता है।
वर्तमान श्रीशैलम की जीवित मंदिर परंपरा में भगवान मल्लिकार्जुन स्वामी ही इस पवित्र क्षेत्र के प्रधान शिव स्वरूप हैं और माँ भ्रमराम्बा के साथ संयुक्त रूप से पूजे जाते हैं। इसलिए तांत्रिक भैरव-नाम और वर्तमान मंदिर के मल्लिकार्जुन स्वरूप को उनके अलग-अलग धार्मिक संदर्भों में समझना उचित है।
शिव और शक्ति का अद्वितीय संगम
श्रीशैलम की सबसे विशिष्ट धार्मिक पहचान भगवान मल्लिकार्जुन और माँ भ्रमराम्बा की संयुक्त उपासना है। यहाँ भक्त एक ही पवित्र मंदिर-क्षेत्र में ज्योतिर्लिंग और महाशक्तिपीठ दोनों के दर्शन करते हैं।
इस प्रकार यह धाम शिव और शक्ति की अभिन्नता का जीवंत प्रतीक है। शाक्त परंपरा शक्ति को ब्रह्मांड की क्रियाशील ऊर्जा मानती है, जबकि शिव उस परम चेतना का प्रतीक हैं जिसके बिना शक्ति और शक्ति के बिना शिव की पूर्ण अभिव्यक्ति संभव नहीं मानी जाती।
धार्मिक महत्व
श्रीशैलम का माहात्म्य विभिन्न पुराणों और दक्षिण भारत की प्राचीन धार्मिक परंपराओं में वर्णित है। श्रीशैल देवस्थानम इसे पृथ्वी पर कैलाश के समान पवित्र क्षेत्र के रूप में प्रस्तुत करता है।
यहाँ ज्योतिर्लिंग और शक्तिपीठ दोनों की उपस्थिति के कारण शैव, शाक्त और तांत्रिक साधना की विभिन्न धाराएँ एक ही तीर्थ क्षेत्र में मिलती हैं। सदियों से संत, योगी, तपस्वी और सामान्य श्रद्धालु इस क्षेत्र में साधना और दर्शन के लिए आते रहे हैं।
पूजा/दर्शन
श्रीशैलम मंदिर में नित्य पूजा-अर्चना प्रातःकाल से आरंभ हो जाती है। श्रद्धालु भगवान मल्लिकार्जुन स्वामी के दर्शन और अभिषेक के बाद माँ भ्रमराम्बा के दर्शन करते हैं।
माँ भ्रमराम्बा के मंदिर में देवी की विधिपूर्वक अर्चना के साथ कुमकुम अर्चना और अन्य शाक्त उपासनाएँ भी की जाती हैं। श्रीशैल देवस्थानम द्वारा रुद्र होम, चंडी होम, मृत्युञ्जय होम तथा विभिन्न विशेष सेवाओं की व्यवस्था भी की जाती है।
श्रीचक्र उपासना
माँ भ्रमराम्बा की पूजा-परंपरा में श्रीविद्या और श्रीचक्र का भी विशेष महत्त्व माना जाता है। शाक्त साधना में श्रीचक्र को आदिशक्ति के समस्त तत्त्वों का दिव्य ज्यामितीय स्वरूप माना जाता है।
इसी कारण श्रीशैलम केवल सामान्य देवी-दर्शन का स्थान नहीं, बल्कि दक्षिण भारत की गहन शक्ति-साधना परंपराओं से जुड़ा एक महत्त्वपूर्ण क्षेत्र भी माना जाता है।
अर्द्धनारीश्वर परंपरा
श्रीशैल परंपरा में अर्द्धनारीश्वर तत्त्व का भी विशेष महत्त्व है। श्रीशैल देवस्थानम की परंपरा के अनुसार माता पार्वती ने इस क्षेत्र से संबंधित उमामहेश्वर में तपस्या की और अर्द्धनारीश्वरी स्वरूप से उनका संबंध माना जाता है।
अर्द्धनारीश्वर स्वरूप यह दर्शाता है कि शिव और शक्ति दो स्वतंत्र सत्ताएँ नहीं, बल्कि एक ही परम सत्य के पूरक आयाम हैं।
मनोहर कुंड और अन्य पवित्र स्थल
पुरानी स्थानीय परंपराओं में मंदिर परिसर और आसपास अनेक पवित्र कुंडों तथा तीर्थ-स्थलों का उल्लेख मिलता है। इनमें मनोहर कुंड का विशेष उल्लेख किया जाता है और इसके जल को पारंपरिक रूप से पवित्र माना गया है।
श्रीशैल क्षेत्र में साक्षी गणपति, शिखरेश्वर, पातालगंगा, हटकेश्वरम् और अन्य अनेक पवित्र स्थल भी स्थित हैं। इनमें से शिखरेश्वरम् श्रीशैल पर्वत का एक अत्यंत महत्त्वपूर्ण तीर्थ है। देवस्थानम के अनुसार श्रीशैल शिखर के दर्शन को भी विशेष धार्मिक महत्त्व दिया गया है।
प्रमुख पर्व
महाशिवरात्रि ब्रह्मोत्सवम् श्रीशैलम का सबसे प्रमुख उत्सव है। इस अवधि में भगवान मल्लिकार्जुन और माँ भ्रमराम्बा की विशेष पूजा, उत्सव और धार्मिक अनुष्ठान आयोजित किए जाते हैं।
शारदीय नवरात्रि और चैत्र नवरात्रि में माँ भ्रमराम्बा की विशेष पूजा होती है। इसके अतिरिक्त कार्तिक मास, उगादि और अन्य प्रमुख धार्मिक अवसरों पर भी बड़ी संख्या में श्रद्धालु श्रीशैलम पहुँचते हैं।
इतिहास
श्रीशैलम की ऐतिहासिक परंपरा अत्यंत प्राचीन है और इसकी मूल स्थापना का कोई एक निश्चित काल निर्धारित करना संभव नहीं है। विभिन्न ऐतिहासिक अभिलेख इस तीर्थ के अनेक राजवंशों से संबंध की ओर संकेत करते हैं।
सातवाहन काल से श्रीशैल क्षेत्र के प्राचीन उल्लेख मिलने की परंपरा है। बाद के समय में इक्ष्वाकु, चालुक्य, काकतीय, रेड्डी और विजयनगर शासकों ने इस क्षेत्र के विकास और मंदिर संरचनाओं में योगदान दिया।
रेड्डी शासकों के काल में श्रीशैलम तक यात्रियों की सुविधा के लिए मार्ग और सीढ़ियों के निर्माण का उल्लेख मिलता है। विजयनगर काल में भी मंदिर परिसर का विस्तार हुआ और विभिन्न गोपुरम तथा मंडप निर्मित किए गए।
छत्रपति शिवाजी महाराज की श्रीशैलम यात्रा से संबंधित परंपराएँ भी प्रसिद्ध हैं। इस प्रकार श्रीशैलम केवल धार्मिक ही नहीं, बल्कि दक्षिण भारत के राजनीतिक और सांस्कृतिक इतिहास का भी एक महत्त्वपूर्ण तीर्थ रहा है।
आदि शंकराचार्य और श्रीशैलम
श्रीशैलम को जगद्गुरु आदि शंकराचार्य की साधना-परंपरा से भी जोड़ा जाता है। परंपरा में माना जाता है कि उन्होंने यहाँ साधना की और भगवान मल्लिकार्जुन एवं देवी की आराधना की।
प्रसिद्ध शिवानन्द लहरी को भी श्रीशैलम की आध्यात्मिक परंपरा से जोड़ा जाता है, यद्यपि ऐसी परंपरागत मान्यताओं को ऐतिहासिक और भक्तिपरक स्रोतों के संदर्भ में समझना उचित है।
कैसे पहुँचें
रेल मार्ग: श्रीशैलम के लिए निकटवर्ती प्रमुख रेलवे विकल्पों में मार्कापुर रोड प्रमुख है। स्टेशन से आगे की यात्रा सड़क मार्ग द्वारा की जाती है।
सड़क मार्ग: श्रीशैलम आंध्र प्रदेश और तेलंगाना के प्रमुख नगरों से सड़क मार्ग द्वारा जुड़ा हुआ है। हैदराबाद, कर्नूल और अन्य शहरों से बस तथा निजी वाहन उपलब्ध रहते हैं।
वायु मार्ग: हवाई यात्रा करने वाले श्रद्धालुओं के लिए राजीव गांधी अंतरराष्ट्रीय हवाई अड्डा, हैदराबाद प्रमुख विकल्प है। वहाँ से श्रीशैलम तक सड़क मार्ग से यात्रा की जा सकती है।
दर्शन समय
श्रीशैलम में दर्शन, अभिषेक और विभिन्न अर्जित सेवाओं के समय दिन, पर्व और विशेष धार्मिक अवसरों के अनुसार बदल सकते हैं। मंदिर में पूजा-अनुष्ठान प्रातः बहुत जल्दी आरंभ होते हैं और दिनभर विभिन्न दर्शन तथा सेवाएँ चलती रहती हैं।
महाशिवरात्रि, नवरात्रि, कार्तिक मास और अन्य विशेष अवसरों पर समय-सारिणी में परिवर्तन हो सकता है। इसलिए यात्रा से पहले श्रीशैल देवस्थानम की आधिकारिक वेबसाइट से वर्तमान दर्शन और सेवा समय की पुष्टि करना उचित है।
विशेष मान्यताएँ
श्रीशैलम की नल्लामला पर्वतमाला को स्वयं एक पवित्र तपोभूमि माना जाता है। भक्तों की मान्यता है कि इस क्षेत्र में प्रवेश करने और श्रीशैल शिखर के दर्शन करने से मन में वैराग्य, शांति और भगवद्भक्ति की भावना जागृत होती है।
माँ भ्रमराम्बा से जुड़ी एक प्रसिद्ध लोकमान्यता यह भी है कि देवी के मंदिर क्षेत्र में कभी-कभी भ्रमरों अथवा मधुमक्खियों जैसी गुंजार सुनाई देती है। भक्त इसे माँ भ्रामरी की उपस्थिति से जोड़ते हैं। इसे धार्मिक लोकविश्वास के रूप में समझना उचित है।
आध्यात्मिक संदेश
माँ भ्रमराम्बा की अरुणासुर-वध कथा यह संदेश देती है कि धर्म की रक्षा के लिए परमशक्ति किसी भी स्वरूप में प्रकट हो सकती हैं। जिस शक्ति को संसार अत्यंत सूक्ष्म या नगण्य समझता है, वही भगवती की कृपा से अधर्म के सबसे बड़े बल को भी पराजित कर सकती है।
श्रीशैलम में भगवान मल्लिकार्जुन और माँ भ्रमराम्बा का संयुक्त निवास साधक को शिव और शक्ति की अभिन्नता का बोध कराता है। चेतना और शक्ति, ज्ञान और क्रिया, वैराग्य और करुणा—इनका संतुलन ही आध्यात्मिक जीवन को पूर्णता प्रदान करता है।



