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श्री शैल शक्तिपीठ

श्री शैल शक्तिपीठ

श्री शैल शक्तिपीठ

आंध्र प्रदेश राज्य के कुर्नूल ज़िले में नल्लमाला पर्वत पर स्थित ‘श्रीसैलम’ भगवान् शिव और माता शक्ति के पावन धामों में से एक है, इसे ‘दक्षिण का कैलाश’ भी कहा जाता है। भारत में विभिन्न स्थानों पर शक्तिपीठ और ज्योतिर्लिंग विद्यमान हैं। श्रीसैलम की विशेषता यह है कि यहाँ देवी भ्रमराम्बा शक्तिपीठ और मल्लिकार्जुन ज्योतिर्लिंग दोनों ही स्थित हैं, और इसके पौराणिक और ऐतिहासिक संदर्भ भी मिलते हैं।

इसी प्राचीन मंदिर के विशाल परसिर में ‘माँ भ्रमराम्बा मंदिर’ स्थापित है, जो माँ शक्ति के पतित पावन 51 शक्तिपीठों में से एक है। ऐसी मान्यता है कि यहाँ माता सती की ग्रीवा का पतन हुआ था। यहाँ माता की मूर्ति ‘महालक्ष्मी’ के रूप में स्थापित है और उन्हें ‘भ्रमराम्बिका’ या ‘भ्रमराम्बा’ देवी के नाम से पूजा जाता है। उनके साथ भगवान् शिव ‘शम्बरानंद भैरव’ के रूप में विराजमान हैं, उन्हें ‘मल्लिकार्जुन स्वामी’ भी कहा जाता है।

मंदिर के परिसर में ही अर्द्धनारीश्वर मंदिर और अनेक छोटे-छोटे कुंड भी बने हुए हैं। इनमें से मनोहर कुंड के जल से भगवान् शिव का अभिषेक किया जाता है।

पावन 12 ज्योतिर्लिंगों और 18 महा शक्तिपीठों में से एक होने के कारण इस मंदिर की अत्यधिक मान्यता है। विश्व के कोने-कोने से यहाँ भक्तजन भगवान् शिव और माता के दर्शन करने, और उनका आशीर्वाद पाने आते हैं।

श्रीसैलम का ऐतिहासिक सन्दर्भ:

श्रीसैलम के इतिहास का आरम्भ दक्षिण भारत के प्रथम साम्राज्य संस्थापक शतवाहन राजाओं के शासनकाल के साथ होता है। श्रीसैलम पर्वत का प्रथम ऐतिहासिक उल्लेख पहली शताब्दी ईसवी के नासिक शिलालेख में मिलता है। कहा जाता है कि सतवाहन, इक्ष्वाकु, पल्लव, चालुक्य, काकतिया और रेड्डी वंश के राजा, विजयनगर के सम्राट और छत्रपति शिवाजी भी भगवान् मल्लिकार्जुन स्वामी की पूजा करते थे। यह भी उल्लेख मिलता है कि राजा प्रोलय वेमा रेड्डी ने 14वीं सदी में श्रीसैलम और पातालगंगा के लिए पैदल यात्रियों के लिए पथ का निर्माण कराया था।

कैसे हुई माँ भ्रमराम्बा (भ्रमराम्बिका) की उत्पत्ति?

भ्रमराम्बा (भ्रामरी) का अर्थ है, ‘मधुमक्खियों की माता’। एक समय ‘अरुणासुर’ नामक एक राक्षस ने संपूर्ण विश्व पर अपना अधिपत्य कायम कर लिया था। गायत्री मंत्र का निरंतर जाप करते हुए उसने लंबे समय तक कठोर तपस्या की और अंततः ब्रह्मा जी को प्रसन्न कर लिया। जब ब्रह्मा जी ने अरुणासुर से मनचाहा वर माँगने को कहा तो उसने यह इच्छा व्यक्त की कि कोई भी दो पैरों या चार पैरों वाला जीव उसका वध न कर सके। ब्रह्मा जी ने उसे यह वरदान दे दिया, जिससे सभी देवता भयभीत हो गए और माँ आदि शक्ति की शरण में पहुँचे और उनसे सुरक्षा माँगी।

माता आदि शक्ति देवताओं के समक्ष प्रकट हुईं और उन्हें बताया कि अरुणासुर उनका भक्त है, इसलिए जब तक वह उनकी पूजा करना बंद नहीं करता, वे उसका वध नहीं कर सकतीं। तब देवताओं ने एक युक्ति सोची, जिसके अनुसार देवगुरु बृहस्पति अरुणासुर से मिलने जा पहुँचे। देवगुरु को देख दैत्य अरुणासुर चकित हो गया और उसने उनके वहाँ आने का कारण पूछा। तब देवगुरु बृहस्पति ने अरुणासुर से कहा कि उनके वहाँ उससे मिलने आने में कोई विस्मय नहीं है क्योंकि वे दोनों एक ही देवी अर्थात ‘माँ गायत्री’ की पूजा करते हैं। यह सुनकर अरुणासुर लज्जित हो गया और सोचने लगा कि जिस देवी की पूजा देवता करते हैं, उसकी पूजा वह कैसे कर सकता है!

अरुणासुर ने उसी क्षण माता की पूजा करना छोड़ दिया। उसके ऐसा करने से माँ आदि शक्ति क्रोधित हो गईं और उन्होंने भ्रामरी (भ्रमराम्बिका) का रूप धारण कर लिया। उन्होंने छह पैरों वाली असंख्य मधुमक्खियों की उत्पत्ति की और उन सारी मधुमक्खियों ने कुछ ही क्षणों में अरुणासुर का वध करके उसकी पूरी सेना का भी विध्वंस कर दिया।

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