सनातन धर्म की पावन शाक्त परंपरा में भगवती के शक्तिपीठों को दैवीय चेतना का परम केंद्र माना गया है। प्राचीन आर्यावर्त के सांस्कृतिक व दार्शनिक हृदयस्थल मिथिला में स्थित यह शक्तिपीठ मातृशक्ति के अविरल अनुग्रह और साधना का परम पावन तीर्थ है।
परिचय
श्री मिथिला शक्तिपीठ भारत के प्राचीनतम शक्ति केंद्रों में से एक है। भौगोलिक दृष्टि से मिथिला एक ऐतिहासिक एवं सांस्कृतिक जनपद रहा है, जिसका विस्तार वर्तमान भारत के उत्तरी बिहार तथा नेपाल के तराई क्षेत्र तक फैला हुआ है। शास्त्रीय ग्रंथों में इस शक्तिपीठ का विशेष उल्लेख मिलता है, जहाँ जगन्माता के वाम स्कंध की पूजा की जाती है।
शक्तिपीठ बनने की कथा
पौराणिक इतिहास के अनुसार प्रजापति दक्ष द्वारा आयोजित यज्ञ में देवाधिदेव महादेव के अपमान से व्यथित होकर माता सती ने योगाग्नि में अपने देह का त्याग कर दिया था। भगवान शिव उनके पावन पार्थिव शरीर को लेकर वैराग्य भाव से त्रिलोकी में भ्रमण करने लगे। तब सृष्टि का संतुलन बनाए रखने हेतु भगवान विष्णु ने अपने सुदर्शन चक्र से देवी के अंगों को विच्छेदित किया। वे पावन अंग जहाँ-जहाँ गिरे, वहाँ शक्तिपीठों की स्थापना हुई।
सती का अंग/आभूषण
तन्त्रचूड़ामणि (पीठनिर्णय) के प्रामाणिक श्लोकों के अनुसार पावन मिथिला क्षेत्र में माता सती का बायाँ कंधा यानी वाम स्कन्ध गिरा था।
रत्नावल्यां दक्षस्कन्धः कुमारी भैरवः शिवः ।
मिथिलायामुमा देवी वामस्कन्धो महोदरः ॥
देवी का नाम
इस शक्तिपीठ में आदिपराशक्ति भगवती को माता ‘उमा’ के रूप में पूजा जाता है। कई परंपराओं में इन्हें महादेवी अथवा वनदुर्गा के रूप में भी नमन किया जाता है।
भैरव
मिथिला शक्तिपीठ के अधिष्ठाता भैरव भगवान ‘महोदर’ हैं। शक्ति साधना में देवी के साथ उनके भैरव का दर्शन व स्मरण अनिवार्य माना जाता है, जो साधक को अभय और रक्षा प्रदान करते हैं।
धार्मिक महत्व
मिथिला ज्ञान, दर्शन और तंत्र साधना की उर्वर भूमि रही है। महर्षि जनक, याज्ञवल्क्य, और मंडन मिश्र की इस धरा पर शक्तिपीठ का विद्यमान होना आध्यात्मिक दृष्टि से अत्यंत महत्वपूर्ण है। यहाँ माता उमा की उपासना से साधक को आत्मज्ञान, विद्या तथा आंतरिक संबल की प्राप्ति होती है।
पूजा/दर्शन
श्रद्धालु यहाँ शुद्ध अंतःकरण से देवी के विग्रह का दर्शन कर पुष्प, अक्षत, सिन्दूर तथा नैवेद्य अर्पित करते हैं। नित्य प्रभात एवं संध्या काल में देवी की आरती संपन्न होती है। साधक दुर्गा सप्तशती का पाठ कर माँ का आशीष प्राप्त करते हैं।
प्रमुख पर्व
यहाँ चैत्र एवं आश्विन मास की शारदीय नवरात्रि अत्यंत उल्लास और विधि-विधान से मनाई जाती है। इसके अतिरिक्त महाशिवरात्रि तथा कार्तिक पूर्णिमा पर भी विशेष अनुष्ठान और दर्शन का विधान रहता है।
इतिहास
शास्त्रीय ग्रंथों में केवल समग्र ‘मिथिला’ क्षेत्र का उल्लेख मिलता है, किसी आधुनिक गाँव या मंदिर भवन का नहीं। इसी कारण मिथिलांचल में तीन प्रमुख प्राचीन शक्ति केंद्रों को इस पीठ परंपरा से संबद्ध माना जाता है—मधुबनी का उच्चैठ भगवती मंदिर, जहाँ देवी केवल स्कंध (धड़) रूप में अधिष्ठित हैं; बेगूसराय का प्राचीन जयमंगला गढ़; तथा सहरसा का महिषी उग्रतारा स्थान। पुरातात्विक साक्ष्य इन स्थलों को गुप्त एवं पाल कालीन साधना केंद्रों के रूप में प्रमाणित करते हैं।
कैसे पहुँचें
मिथिला क्षेत्र के प्रमुख शक्ति स्थलों तक पहुँचने के लिए दरभंगा, मधुबनी, समस्तीपुर एवं सहरसा रेलवे स्टेशन प्रमुख केंद्र हैं। वायुमार्ग के लिए दरभंगा हवाई अड्डा सबसे निकटतम संपर्क बिंदु है, जहाँ से सड़क मार्ग द्वारा इन सभी पावन तीर्थों तक आसानी से पहुँचा जा सकता है।
दर्शन समय
सामान्य दिनों में क्षेत्र के प्रमुख मंदिरों में दर्शन प्रातः 6:00 बजे से दोपहर 12:00 बजे तक तथा सायं 4:00 बजे से रात्रि 8:00 बजे तक सुलभ रहते हैं। नवरात्रि के पावन दिनों में कपाट निरंतर खुले रहते हैं।
विशेष मान्यताएँ
उच्चैठ भगवती स्थान के विषय में दृढ़ जनश्रुति है कि महाकवि कालिदास ने यहीं भगवती की घोर तपस्या कर मूर्खता से मुक्ति और विद्या-वैभव का वरदान प्राप्त किया था। वहीं जयमंगला गढ़ तांत्रिक अनुष्ठानों और मनोकामना पूर्ति के लिए प्रसिद्ध है।
आध्यात्मिक संदेश
मिथिला शक्तिपीठ हमें यह पावन संदेश देता है कि ज्ञान और शक्ति परस्पर पूरक हैं। अहंकार का त्याग कर विनम्रतापूर्वक ज्ञानदायिनी माता उमा और संहारक शक्ति महोदर के चरणों में शरणागति से ही मानव जीवन का कल्याण संभव है।



